Matsya Purana· Matsya Purāṇa
158
अध्याय 158 / 176

Adhyaya 158

50 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ50 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय १५८

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १५८ एवमुक्त्वा गिरिसुता माता मे स्नेहवत्सला प्रवेशं लभते नान्या नारी कमललोचने

matsya-purāṇa 158 evamuktvā girisutā mātā me snehavatsalā praveśaṃ labhate nānyā nārī kamalalocane

हिन्दी अर्थ

मुख्याद् भृशं तथा शोषाद् वितथं यावदेव तु। सुग्रीवाददितिं यावन्मृगात् पर्जन्यमेव च मर्म चैतत् समाख्यातं त्रिशूलं कोणगं च यत्। स्तम्भं न्यासेषु वर्ज्यानि तुलाविधिषु सर्वदा कीलोच्छिष्टोपघातादि वर्जयेद् यतो जन: । प प 8 वास्तुनिर्दिष्टो पितृवैश्चानरायतः

English

Contemporaneous with all these kings will ilourish'in Kaliyuga other kings also, and they will onduro an equal time. There will be 24 Iksvfiku kings, 27 Panchhlas, 24 kings of Kuiii and 28 Ilaihaya kings. — 14-15.

अध्याय १५८

श्लोक 2

इत्युक्ता तु तदा देवी चिन्तयामास चेतसा न सा नारीति दैत्यो ऽसौ वायुर्मे यामभाषत

ityuktā tu tadā devī cintayāmāsa cetasā na sā nārīti daityo 'sau vāyurme yāmabhāṣata

हिन्दी अर्थ

करनी चाहिए। मैं उनके नाम और स्थान बतला रहा हूँ, आपलोग सुनिये। (इन्हें जानकर) मनुष्यको ईशान आदि कोणोंमें हविष्यद्वारा उन-उन देवताओंकी पूजा करनी चाहिए। शिखी, पर्जन्य, जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, जलाधिप, असुर, शोष, पाप, रोग, अहि, मुख्य, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति और दिति-ये बत्तीस बाह्य देवता हैं। बुद्धिमान् पुरुषको ईशान आदि चारों कोणोंमें स्थित इन देवताओंकी पूजा करनी चाहिए। अब वास्तु चक्रके

English

Then there will be 32 Kalinga kings, 25 Asmaka, 36 Kurava, 28 Maithilo, 23 Surasenas, and 20 Vitahotra kings. All these kings will endure the same time and will be contemporaries.

अध्याय १५८

श्लोक 3

वृथैव वीरकः शप्तो मया क्रोधपरीतया अकार्यं क्रियते मूढैः प्रायः क्रोधसमीरितैः

vṛthaiva vīrakaḥ śapto mayā krodhaparītayā akāryaṃ kriyate mūḍhaiḥ prāyaḥ krodhasamīritaiḥ

हिन्दी अर्थ

भीतरी देवताओंके नाम सुनिये-आप, सावित्र, जय, रुद्र-ये चार चारों ओरसे तथा मध्यके नौ कोष्ठोंमें ब्रह्मा और उनके समीप अन्य आठ देवताओंकी भी पूजा करनी चाहिए। (ये सब मिलकर मध्यके तेरह देवता होते हैं।) ब्रह्माके चारों ओर स्थित ये आठ देवता, जो क्रमशः पूर्वादि दिशाओंमें दो-दोके क्रमसे स्थित रहते हैं, साध्यनामसे कहे जाते हैं। उनके नाम सुनिये अग्नि तथा दिति-ये पाँच देवताओंके वर्ग हैं। (इनकी पूजा अग्निकोणमें करनी चाहिए।) उनके बाहर बीस

English

The Handaa. 422 B.O.— 322 B.O.

अध्याय १५८

श्लोक 4

क्रोधेन नश्यते कीर्तिः क्रोधो हन्ति स्थिरां श्रियम् अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था पुत्रं शापितवत्यहम् विपरीतार्थबुद्धीनां सुलभो विपदोदयः

krodhena naśyate kīrtiḥ krodho hanti sthirāṃ śriyam aparicchinnatattvārthā putraṃ śāpitavatyaham viparītārthabuddhīnāṃ sulabho vipadodayaḥ

हिन्दी अर्थ

मित्र और पृथ्वीधर-ये चार ब्रह्माके चारों ओर तीन- तीन पदोंमें स्थित रहते हैं अब मैं उनके वंशोंको पृथकू-पृथक् संक्षेपमें कह रहा हूँ। वायुसे लेकर रोगपर्यन्त, पितृगणसे शिखीपर्यन्त, मुख्यसे भृशपर्यन्त, शोषसे वितथपर्यन्त, सुग्रीवसे अदितिपर्यन्त तथा मृगसे पर्जन्यपर्यन्त-ये ही वंश कहे

English

Then, as an incarnation of Kali, will be born Mah4padma, a son of MahSnandi from a SOdra woman, and ho will be the exterminator of the Ksatriya kings. — 16-18.

अध्याय १५८

श्लोक 5

संचिन्त्यैवमुवाचेदं वीरकं प्रति शैलजा लज्जासज्जविकारेण वदनेनाम्बुजत्विषा

saṃcintyaivamuvācedaṃ vīrakaṃ prati śailajā lajjāsajjavikāreṇa vadanenāmbujatviṣā

हिन्दी अर्थ

जाते हैं। कहीं-कहीं मृगसे लेकर जयपर्यन्त वंश कहा गया है। पदके मध्यमें इनका जो सम्पात है, वह पद, मध्य तथा सम नामसे प्रसिद्ध है। त्रिशूल और कोणगामी मर्मस्थल कहे जाते हैं, जो सर्वदा स्तम्भन्यास और तुलाकी विधिमें वर्जित माने गये हैं। मनुष्यके लिये यत्नपूर्वक देवताके पदॉपर कीलें गाड़ना, जूँठन फेंकना तथा चोटें पहुँचाना वर्जित है। यह ० र पितृवर्गीय वैश्वानरके अधीन माना गया है। पूषा च पापयक्ष्मा च हस्तयोर्मणिबन्धने

English

Afterwards all the kings will be of the Sddra origin. (That MahSpadma will be the sole monarch and a universal Emperor. He will reign for 88 years on this earth. He will exterminate all Ksatriyas through his ambition. Ills eight sons, beginning with Sukalpa, will be kings for 12 years. They will bo kings in succession to Mahpadma one after another. Kautilya will uproot all these sons, during the course of 12 years. Then the empire will pass on to the Mauryas, after being enjoyed by [Kautilya?) for a hundred years [or then Kautilya, after enjoying the earth for one hundred years, will go to heaven]. —19-22.

अध्याय १५८

श्लोक 6

अहं वीरक ते माता मा ते ऽस्तु मनसो भ्रमः शंकरस्यास्मि दयिता सुता तुहिनभूभृतः

ahaṃ vīraka te mātā mā te 'stu manaso bhramaḥ śaṃkarasyāsmi dayitā sutā tuhinabhūbhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

जङ्घयोर्भृङ्गसुग्रीबौ स्फिकूस्थौ दौवारिको मृगः मध्ये नवपदे ब्रह्मा हृदये स तु पूज्यते

English

The Mauryas.

अध्याय १५८

श्लोक 7

मम गात्रच्छविभ्रान्त्या मा शङ्कां पुत्र भावय तुष्टेन गौरता दत्ता ममेयं पद्मजन्मना

mama gātracchavibhrāntyā mā śaṅkāṃ putra bhāvaya tuṣṭena gauratā dattā mameyaṃ padmajanmanā

हिन्दी अर्थ

चतुःषष्टिपदो वास्तुः प्रासादे ब्रह्मणा स्मृतः। ब्रह्मा चतुष्पदस्तत्र कोणेष्वर्धपदस्तथा बहिष्कोणेषु वास्तौ तु सार्धाश्चोभयसंस्थिताः। विंशतिद्विपदाश्चैव चतुःषष्टिपदे स्मृताः हीनाधिकाङ्कतां वास्तोः सर्वथा तु विवर्जयेत्

English

His son Satadhanva, will bo king for 6 years. His son Brihadratha will reign for 70 years. — 23.

अध्याय १५८

श्लोक 8

मया शप्तो ऽस्यविदिते वृत्तान्ते दैत्यनिर्मिते ज्ञात्वा नारीप्रवेशं तु शंकरे रहसि स्थिते

mayā śapto 'syavidite vṛttānte daityanirmite jñātvā nārīpraveśaṃ tu śaṃkare rahasi sthite

हिन्दी अर्थ

उसके मस्तकपर अग्नि और मुखमें जलका निवास है, दोनों स्कन्धोंपर पृथ्वीधर तथा अर्यमा अधिष्ठित हैं। बुद्धिमान्को वक्षःस्थलपर आपवत्सकी पूजा करनी चाहिए। नेत्रोंमें दिति और पर्जन्य तथा कानोंमें अदिति और जयन्त हैं। कंधोंपर सर्प और इन्द्रकी प्रयत्नपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इसी प्रकार बाहुओंमें सूर्य और चन्द्रमासे लेकर पाँच-पाँच देवता स्थित हैं। रुद्र और राजयक्ष्मा ये दोनों बायें हाथपर अवस्थित हैं । उसी प्रकार सावित्र

English

For 36 years Aioka will be the king. His grandson will then be the king for 70 years. — 24.

अध्याय १५८

श्लोक 9

न निवर्तयितुं शक्यः शापः किं तु ब्रवीमि ते शीघ्रमेष्यसि मानुष्यात् स त्वं कामसमन्वितः

na nivartayituṃ śakyaḥ śāpaḥ kiṃ tu bravīmi te śīghrameṣyasi mānuṣyāt sa tvaṃ kāmasamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

और सविता दाहिने हाथपर स्थित हैं। विवस्वान् और मित्र-ये उदरमें तथा पूषा और पापयक्ष्मा-ये हाथोंके मणिबन्धोंमें स्थित हैं। उसी प्रकार असुर और शोष- ये बायें पार्श्वमें तथा दाहिने पार्श्वमें वितथ और बृहत्क्षत स्थित हैं। ऊरुभागोंपर यम और वरुण, घुरनोंपर गन्धर्व और शक्र तथा पैरोंपर पितृगण स्थित हैं। मध्यके नौ पदोंमें, जो हृदय कहलाता है, ब्रह्माकी पूजा होती है॥ ३४--४६ ॥

English

His son Dasaratha will be the king for 8 years. His son Saptati will reign for 9 years (or his sou will be for 79 years). — 25.

अध्याय १५८

श्लोक 10

शिरसा तु ततो वन्द्य मातरं पूर्णमानसः उवाचोदितपूर्णेन्दुद्युतिं च हिमशैलजाम्

śirasā tu tato vandya mātaraṃ pūrṇamānasaḥ uvācoditapūrṇendudyutiṃ ca himaśailajām

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माने प्रासादके निर्माणमें चौंसठ पदोंवाले वास्तुको श्रेष्ठ बतलाया है। उसके चार पदोंमें ब्रह्मा तथा उनके कोणोंमें आपवत्स, सविता आदि आठ देवगण स्थित हैं। वास्तुके बाहरवाले कोणोंमें भी अग्नि आदि आठ गृहपतिके जिस अङ्गमें खुजली जान पड़े, महल तथा भवनमें वास्तुके उसी अङ्गपर गडी हुई शल्य या कोलको निकाल देना चाहिए; क्योंकि शल्यसहित गृह भयदायक और शल्यरहित कल्याणकारक होता है।

English

These are the ten Mauryas who will enjoy the earth for full 137 years, from whom she (the Earth) will pass to the Sungas.

अध्याय १५८

श्लोक 11

नतसुरासुरमौलिमिलन्मणिप्रचयकान्तिकरालनखाङ्किते नगसुते शरणागतवत्सले तव नतो ऽस्मि नतार्तिविनाशिनि

natasurāsuramaulimilanmaṇipracayakāntikarālanakhāṅkite nagasute śaraṇāgatavatsale tava nato 'smi natārtivināśini

हिन्दी अर्थ

वास्तुका अधिक एवं हीन अङ्गका होना सर्वथा त्याज्य है। इसी प्रकार नगर, ग्राम और देश-सभी जगहपर इन दोषोंका परित्याग करना चाहिए। द्विजवरो! अब मैं चतुःशाल, त्रिशाल, द्विशाल तथा एकशालवाले भवनोंके नाम और स्वरूपका वर्णन करूँगा॥ ४७--५१॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे एकाशीतिपदवास्तुनिर्णयो नाम त्रिपञ्जाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

of that number. The following note from Mr. Pargiter is appropriate " This dynasty is given by all five Puranas, but the account of it has suffered more than that of any other dynasty. Three versions exist here, the earliest in tho Matsya, the second in the Vfiyu,and the third in the Vayu generally and tho llrahmdnda# They agree in general purport, but have many differences. Tho second forms a stage of recension intermediate between tho first and tho third, and is tho only copy that has preserved the names of all the kings. Tho Matsya vorsion in all copies is incomplete and has one of its verses misplaced, thus only 5 MSS mention Chandra Gupta, the second king always omitted, and tho account generally begins with that verse 23, putting tho two kings first, and then mentions only four kings, Asoka and his three successors.'

अध्याय १५८

श्लोक 12

तपनमण्डलमण्डितकंधरे पृथुसुवर्णसुवर्णनगद्युते विषभुजंगनिषङ्गविभूषिते गिरिसुते भवतीमहमाश्रये

tapanamaṇḍalamaṇḍitakaṃdhare pṛthusuvarṇasuvarṇanagadyute viṣabhujaṃganiṣaṅgavibhūṣite girisute bhavatīmahamāśraye

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें इक्यासीपद-निर्णय नामक दो सौ तिरपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ वास्तुशास्त्रके अन्तर्गत राजप्रासाद आदिकी निर्माण-विधि

English

[Tliough the Matsya mentions only seven kings, and that also in a confused manner, the full list of the ten kings is given in the Visnu Purdna (Book IV. Cha , verses 7-8).

अध्याय १५८

श्लोक 13

जगति कः प्रणताभिमतं ददौ झटिति सिद्धनुते भवती यथा जगति कां च न वाञ्छति शंकरो भुवनधृत्तनये भवतीं यथा

jagati kaḥ praṇatābhimataṃ dadau jhaṭiti siddhanute bhavatī yathā jagati kāṃ ca na vāñchati śaṃkaro bhuvanadhṛttanaye bhavatīṃ yathā

हिन्दी अर्थ

चतुःशालं चतुर्द्वारिरलिन्है: सर्वतोमुखम्॥ नाम्ना तत् सर्वतोभद्रं शुभं देवनृपालये। क्षेमवृद्धिकरं नृणां बहुपुत्रफलप्रदम्। कुलक्षयकरं नृणां सर्वव्याधिभयावहम्।

English

The years of accession noted againet their names are taken from Mr. V. A. Smith's History of Ancient Indiapago 197.

अध्याय १५८

श्लोक 14

विमलयोगविनिर्मितदुर्जयस्वतनुतुल्यमहेश्वरमण्डले विदलितान्धकबान्धवसंहतिः सुरवरैः प्रथमं त्वमभिष्टुता

vimalayogavinirmitadurjayasvatanutulyamaheśvaramaṇḍale vidalitāndhakabāndhavasaṃhatiḥ suravaraiḥ prathamaṃ tvamabhiṣṭutā

हिन्दी अर्थ

मित्रबन्धुसुतान् हन्ति तथा सर्वभयावहम्। क्षेमवृद्धिकरं नृणां तथा पुत्रफलप्रदम्।

English

Date of ascension.

अध्याय १५८

श्लोक 15

सितसटापटलोद्धतकंधराभरमहामृगराजरथस्थिता विमलशक्तिमुखानलपिङ्गलायतभुजौघविपिष्टमहासुरा

sitasaṭāpaṭaloddhatakaṃdharābharamahāmṛgarājarathasthitā vimalaśaktimukhānalapiṅgalāyatabhujaughavipiṣṭamahāsurā

हिन्दी अर्थ

राजाग्निभयदं नृणां कुलक्षयकरं च यत्। सूतजी कहते हैं-ऋषियो! अब मैं चतुःशाल (त्रिशाल, द्विशाल आदि) भवनोंके स्वरूप, उनके विशिष्ट नामोंके साथ बतला रहा हूँ। जो चतुःशाल चारों ओर भवन, द्वार तथा बरामदोंसे युक्त हो, उसे 'सर्वतोभद्र' कहा जाता है। वह देव-मन्दिर तथा राजभवनके लिये मङ्गलकारक होता है। वह चतुःशाल यदि पश्चिम द्वारसे हीन हो तो 'नन्द्यावर्त', दक्षिणद्वारसे हीन हो तो ' वर्धमान ', पूर्वद्वारसे रहित हो तो 'स्वस्तिक', उत्तरद्वारसे विहीन हो

English

(1) Chandra Gupta......... 822 B.C.

अध्याय १५८

श्लोक 16

निगदिता भुवनैरिति चण्डिका जननि शुम्भनिशुम्भनिषूदनी प्रणतचिन्तितदानवदानवप्रमथनैकरतिस्तरसा भुवि

nigaditā bhuvanairiti caṇḍikā janani śumbhaniśumbhaniṣūdanī praṇatacintitadānavadānavapramathanaikaratistarasā bhuvi

हिन्दी अर्थ

तो 'रुचक' कहा जाता है। (अब त्रिशाल भवनोंके भेद बतलाते हैं ॥) उत्तर दिशाकी शालासे रहित जो त्रिशाल भवन होता है, उसे ' धान्यक' कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये कल्याण एवं वृद्धि करनेवाला तथा अनेक पुत्ररूप फल देनेवाला होता हैं। पूर्वकी शालासे विहीन त्रिशाल भवनको 'सुक्षेत्र' कहते हैं। वह धन, यश और आयु प्रदान करनेवाला तथा शोक-मोहका विनाशक होता है। जो दक्षिणकी शालासे विहीन होता है, उसे 'विशाल'

English

(2) Bindusdra Amitragh&ta......... 29S B.C.

अध्याय १५८

श्लोक 17

वियति वायुपथे ज्वलनोज्ज्वले ऽवनितले तव देवि च यद्वपुः तदजिते ऽप्रतिमे प्रणमाम्यहं भुवनभाविनि ते भववल्लभे

viyati vāyupathe jvalanojjvale 'vanitale tava devi ca yadvapuḥ tadajite 'pratime praṇamāmyahaṃ bhuvanabhāvini te bhavavallabhe

हिन्दी अर्थ

कहते हैं। वह मनुष्योंके कुलका क्षय करनेवाला तथा सब प्रकारकी व्याधि और भय देनेवाला होता है। जो पश्चिमशालासे हीन होता है, उसका नाम 'पक्षघ्न' है, वह मित्र, बन्धु और पुत्रोंका विनाशक तथा सब प्रकारका भय उत्पन्न करनेवाला होता है। (अब 'द्विशालों'के भेद कहते हैं-) दक्षिण एवं पश्‍चिम--दो शालाओंसे युक्त भवनको धनधान्यप्रद कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये कल्याणका वर्धक तथा पुत्रप्रद कहा गया है। पश्चिम और उत्तरशालावाले भवनको "यमसूर्य' नामक शाल जानना चाहिए। वह मनुष्योंके लिये राजा और अग्निसे भयदायक और कुलका विनाशक होता है। जिस भवनमें केवल पूर्व

English

(3) Asoka............ 273 B.C.

अध्याय १५८

श्लोक 18

जलधयो ललितोद्धतवीचयो हुतवहद्युतयश्च चराचरम् फणसहस्रभृतश्च भुजंगमास् त्वदभिधास्यति मय्यभयंकराः

jaladhayo lalitoddhatavīcayo hutavahadyutayaśca carācaram phaṇasahasrabhṛtaśca bhujaṃgamās tvadabhidhāsyati mayyabhayaṃkarāḥ

हिन्दी अर्थ

उदकूपूर्वे तु शाले दण्डाख्ये यत्र तद् भवेत्॥ १० और उत्तरकी ही दो शालाएँ हों, उसे ' दण्ड' कहते हैं। रावणादिके ऐसे चतुःशाल, त्रिशाल आदि भवनोंका उल्लेख वाल्मीकीय रामायण, सुन्दरकाण्ड, राजतरङ्गिणी ३। १२, मृच्छूकटिकनाटक ३।७ तथा बृहत्संहिता अ० ५३ आदिमें आता है। शिल्परत्र, समराङ्गण, काश्यपशिल्पादिमें इनकी रचनाका विस्तृत विधान है।

English

Asoka died............ 232 B.C.

अध्याय १५८

श्लोक 19

भगवति स्थिरभक्तजनाश्रये प्रतिगतो भवतीचरणाश्रयम् करणजातमिहास्तु ममाचलं नुतिलवाप्तिफलाशयहेतुतः प्रशममेहि ममात्मजवत्सले तव नमो ऽस्तु जगत्त्रयसंश्रये त्वयि ममास्तु मतिः सततं शिवे शरणगो ऽस्मि नतो ऽस्मि नमो ऽस्तु ते

bhagavati sthirabhaktajanāśraye pratigato bhavatīcaraṇāśrayam karaṇajātamihāstu mamācalaṃ nutilavāptiphalāśayahetutaḥ praśamamehi mamātmajavatsale tava namo 'stu jagattrayasaṃśraye tvayi mamāstu matiḥ satataṃ śive śaraṇago 'smi nato 'smi namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

अकालमृत्युभयदं परचक्रभयावहम्। धनाख्यं पूर्वयाम्याभ्यां शालाभ्यां यद् शालकम् तच्छस्त्रभयदं नृणां पराभवभयावहम्। चुल्ली पूर्वापराभ्यां तु सा भवेन्मृत्युसूचनी बैधव्यदायकं स्त्रीणामनेकभयकारकम्। कार्यमुत्तरयाम्याभ्यां शालाभ्यां भयदं नृणाम्

English

(4) Suyasas

अध्याय १५८

श्लोक 20

प्रसन्ना तु ततो देवी वीरकस्येति संस्तुता प्रविवेश शुभं भर्तुर् भवनं भूधरात्मजा

prasannā tu tato devī vīrakasyeti saṃstutā praviveśa śubhaṃ bhartur bhavanaṃ bhūdharātmajā

हिन्दी अर्थ

पञ्चप्रकारं ततत् प्रोक्तमुत्तमादिविभेदतः। अष्टोत्तरं हस्तशतं विस्तरश्चोत्तमो मतः चतुर्ष्वन्येषु विस्तारो हीयते चाष्टभिः करे: । चतुर्थाशाधिकं हैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते

English

(5) Dasaratha

अध्याय १५८

श्लोक 21

अथ रुद्रो महागौरीं गौरीं दृष्ट्वा तु सुन्दरीम् चित्तव्यामोहनाकारां करीन्द्रोन्मत्तगामिनीम्

atha rudro mahāgaurīṃ gaurīṃ dṛṣṭvā tu sundarīm cittavyāmohanākārāṃ karīndronmattagāminīm

हिन्दी अर्थ

त्र्यंशेन चाधिकं हैर्ध्यं पञ्चस्वपि निगद्यते। सेनापतेः प्रवक्ष्यामि तथा भवनपञ्चकम् पञ्चस्वेतेषु हैर्घ्यं च षंड्भागेनाधिकं भवेत् चतुश्चतुर्भिहीना स्यात् करषष्टिः प्रविस्तरे

English

(6) Sangata

अध्याय १५८

श्लोक 22

पूर्णचन्द्राननां तन्वीं नितम्बोरुघनस्तनीम् मध्ये क्षामां तथाक्षीणलावण्यामृतवर्षिणीम्

pūrṇacandrānanāṃ tanvīṃ nitamborughanastanīm madhye kṣāmāṃ tathākṣīṇalāvaṇyāmṛtavarṣiṇīm

हिन्दी अर्थ

अष्टांशेनाधिकं हैर्घ्यं पञ्चस्वपि निगद्यते। सामन्तामात्यलोकानां वक्ष्ये भवनपञ्चकम् वह अकालमृत्यु तथा शत्रुपक्षसे भय उत्पन्न करनेवाला होता है। जो पूर्व और दक्षिणकी शालाओंसे युक्त द्विशाल भवन हो, उसे ' धन' कहते हैं। वह मनुष्योंके लिये शस्त्र तथा पराजयका भय उत्पन्न करनेवाला होता

English

(7) Sdlisuka

अध्याय १५८

श्लोक 23

सर्वाभरणपूर्वाङ्गीं मदो मन्देन कारिणीम् सकामः शङ्कितो दीनो रौद्रो वीरो भयानकः

sarvābharaṇapūrvāṅgīṃ mado mandena kāriṇīm sakāmaḥ śaṅkito dīno raudro vīro bhayānakaḥ

हिन्दी अर्थ

है। इसी प्रकार केवल पूर्व तथा पश्चिमकी ओर बना हुआ 'चुल्ली' नामक द्विशालभवन मृत्युसूचक है। वह स्त्रियोंको विधवा करनेवाला तथा अनेकों प्रकारका भय उत्पन्न करनेवाला होता है। केवल उत्तर एवं दक्षिणकी शालाओंसे युक्त द्विशाल भवन मनुष्योंके लिये भयदायक होता है। अतः ऐसे भवनको नहीं बनवाना चाहिए। बुद्धिमानोंको सदा सिद्धार्थ और वज्रसे २ भिन्न द्विशालभवन बनवाना चाहिए अब मैं राजभवनके विषयमें वर्णन कर रहा हूँ। वह उत्तम आदि भेदसे पाँच प्रकारका कहा गया है। एक सौ आठ हाथके विस्तारवाला राजभवन उत्तम माना गया है। अन्य चार प्रकारके भवनोंमें विस्तार क्रमश: आठ-

English

(8) Somasarman (0) Satadhanva

अध्याय १५८

श्लोक 24

करुणाहास्यबीभत्सकिंचित्किंचिद्धरो ऽभवत् जिघांसुर्देववाक्येन भैरवं कृतवान्वपुः

karuṇāhāsyabībhatsakiṃcitkiṃciddharo 'bhavat jighāṃsurdevavākyena bhairavaṃ kṛtavānvapuḥ

हिन्दी अर्थ

आठ हाथ कम होता जाता है; किंतु पाँचों प्रकारके भवनोंमें लम्बाई विस्तारके चतुर्थांशसे अधिक होती है। अब मैं युवराजके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ। उसमें उत्तम भवनकी चौड़ाई अस्सी हाथकी होती है। अन्य चारकी चौड़ाई क्रमश: छ:-छ: हाथ कम होती जाती है। इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईसे एक तिहाई अधिक कही गयी है । इसी प्रकार अब मैं सेनापतिके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हुँ। उसके उत्तम

English

(10) Bfihadratha

अध्याय १५८

श्लोक 25

सा चापि भैरवी जाता देवस्य प्रतिरूपिणी तस्या रूपसहस्राणि ददर्श गिरिगोचरः

sā cāpi bhairavī jātā devasya pratirūpiṇī tasyā rūpasahasrāṇi dadarśa girigocaraḥ

हिन्दी अर्थ

भवनकी चौड़ाई चौंसठ हाथकी मानी गयी है। अन्य चार भवनोंकी चौड़ाई क्रमशः छ:-छ: हाथ कम होती जाती है। इन पाँचोंकी लम्बाई चौड़ाईके घष्ठांशसे अधिक होनी चाहिए। अब मैं मन्त्रियोंके भी पाँच प्रकारके भवन बतला रहा हूँ । उनमें उत्तम भवनका विस्तार साठ हाथ होता है तथा अन्य चार क्रमशः चार-चार हाथ कम चौड़े होते हैं। इन पाँचोंकी लम्बाई चौड़ाईके अष्टांशसे अधिक कही गयी है। अब मैं सामन्त, छोटे राजा और अमात्य (छोटे मन्त्री) लोगोंके पाँच प्रकारके भवनोंको बतलाता हूँ। इनमें उत्तम भवनकी चौड़ाई अड़तालीस हाथको होनी चाहिए तथा अन्य चारोंकी चौड़ाई क्रमशः चार-चार हाथ कम कही गयी है। इन पाँचों भवनोंकी

English

B.a. 224 B.C. 216 B.O. 206 B.C. 199 B.C.... 101-185 B.C.

अध्याय १५८

श्लोक 26

ग्रस्ते सहस्ररूपाणां तारारूपे प्रदर्शिते पार्वत्या चाथ निःशङ्कः शंकरो वाभवत्ततः

graste sahasrarūpāṇāṃ tārārūpe pradarśite pārvatyā cātha niḥśaṅkaḥ śaṃkaro vābhavattataḥ

हिन्दी अर्थ

चतुर्थांशाधिकं हैर्घ्यं पञ्चस्वेतेषु शस्यते॥ २२ लम्बाई चौड़ाईकी अपेक्षा सवाया अधिक कही गयी है १. एक प्रकारका स्तम्भ जिसमें ८ पहल या कोण होते हैं।

English

TBB MATByA DBABAM.

अध्याय १५८

श्लोक 27

दृष्ट्वा जगन्मयीं तां तु रराम सुरतप्रियः विरहोत्कण्ठितां भार्यां प्राप्य भूयो हिमात्मजाम्

dṛṣṭvā jaganmayīṃ tāṃ tu rarāma suratapriyaḥ virahotkaṇṭhitāṃ bhāryāṃ prāpya bhūyo himātmajām

हिन्दी अर्थ

२. जिस द्विशालमें केवल दक्षिण और पश्चिमकी ओर भवन हों (बृहत्संहिता ५३। ३९) । शिल्पिनां कञ्चुकीनां च वेश्यानां गृहपञ्जकम्। अष्टाविंशत् कराणां तु विहीनं विस्तरे क्रमात् द्विगुणं हैर्घ्यमेवोक्तं मध्यमेष्वेवमेव तत्। दूतीकर्मान्तिकादीनां वक्ष्ये भवनपञ्जकम्

English

Pusyamitra the cominander-in-cbief will. uproot BrihadratUa and will rule the kingdom as king 36 years.— 27. x\fter him Vasujycstha will be tho king for seven j'cars. After him Vasumitra will be for ten ycare. — 28.

अध्याय १५८

श्लोक 28

यावद्वर्षसहस्रान्तम् उभयो रहसिस्थयोः नानाकरणबद्धोत्था क्रीडासीत् संतता तयोः

yāvadvarṣasahasrāntam ubhayo rahasisthayoḥ nānākaraṇabaddhotthā krīḍāsīt saṃtatā tayoḥ

हिन्दी अर्थ

चतुर्थांशाधिकं हैर्घ्यं विस्तारो द्वादशैव तु। अर्धार्धकरहानिः स्याद् विस्तारात् पञ्चशः क्रमात् हैवज्ञगुरुवैद्यानां सभास्तारपुरोधसाम्। तेषामपि प्रवक्ष्यामि तथा भवनपञ्जकम्

English

Notc.—Our text omits Aguimitra who Yas tho immediate succosyor of Pusyamitra and who reigned for 8 years, us in the Vdyu P,

अध्याय १५८

श्लोक 29

द्वारस्थो वीरको देवान् हरदर्शनकाङ्क्षिणः व्यसर्जयत् स्वकान्येव गृहाण्यादरपूर्वकम्

dvārastho vīrako devān haradarśanakāṅkṣiṇaḥ vyasarjayat svakānyeva gṛhāṇyādarapūrvakam

हिन्दी अर्थ

पञ्चस्वेतेषु हैर्घ्यं च षड्भागेनाधिकं भवेत् द्वात्रिशतः कराणां तु चतुर्भिहीयते क्रमात् अधिकं हैर्ध्यमित्याहुर्ब्राह्मणादेः प्रशस्यते। सेनापतेर्नृपस्यापि गृहयोरन्तरेण तु

English

Then liis son Aiitaka will be (reign) for 2 yeary. Tlica Puliiulaka will (reign) for 3 years. — 20. Then Vajrainitra will bo the king for 9 years; tlion Saniabliaga will reign for 32 years; then after him his son Devabliunii will reign for 10 years. These leu petty kings will enjoy this earth for full 112 years; and then the earth will go to the Kanvas. — 30-32.

अध्याय १५८

श्लोक 30

नास्त्यत्रावसरो देवा देव्या सह वृषाकपिः निभृतः क्रीडतीत्युक्ता ययुस्ते च यथागतम्

nāstyatrāvasaro devā devyā saha vṛṣākapiḥ nibhṛtaḥ krīḍatītyuktā yayuste ca yathāgatam

हिन्दी अर्थ

नृपवासगृहं कार्य भाण्डागारं तथैव च। सेनापतेर्गृहस्यापि चातुर्वर्ण्यस्य चान्तरे। वासाय च गृहं कार्य राजपूज्येषु सर्वदा

English

Aotc.— The Purana enumerates only 8 kings while there ought to l>o ton. This omission is supplied l>y tho names of Agnimitra and Ohosavasu vs gi vi u in the Visnu Purana. Tho ten kings, therefore, are the following *

अध्याय १५८

श्लोक 31

गते वर्षसहस्रे तु देवास्त्वरितमानसाः ज्वलनं चोदयामासुर् ज्ञातुं शंकरचेष्टितम्

gate varṣasahasre tu devāstvaritamānasāḥ jvalanaṃ codayāmāsur jñātuṃ śaṃkaraceṣṭitam

हिन्दी अर्थ

तथा हइस्तशतादर्धं गदितं वनवासिनाम् सेनापतेर्नृपस्यापि सप्तत्या सहितेऽन्विते। चतुर्दशहृते व्यासे शालान्यासः प्रकीर्तितः विप्रस्य महती शाला न है्घ्य॑ परतो भवेत्।

English

(1) Pusyamiiru ... 185 li.f. (."ie years).

अध्याय १५८

श्लोक 32

प्रविश्य जालरन्ध्रेण शुकरूपी हुताशनः ददृशे शयने शर्वं रतं गिरिजया सह

praviśya jālarandhreṇa śukarūpī hutāśanaḥ dadṛśe śayane śarvaṃ rataṃ girijayā saha

हिन्दी अर्थ

अब शिल्पकार, कंचुकी और वेश्याओंके पाँच प्रकारके भवनोंको सुनिये। इन सभी भवनोंकी चौड़ाई अट्टाईस हाथ कही गयी है। अन्य चारों भवनोंकी चौडाईमें क्रमश: दो-दो हाथकी न्यूनता होती है। लम्बाई चौड़ाईसे दुगुनी कही गयी है॥ १४-२३ ३ ॥

English

(2) Agnimitra

अध्याय १५८

श्लोक 33

ददृशे तं च देवेशो हुताशं शुकरूपिणम् तमुवाच महादेवः किंचित्कोपसमन्वितः

dadṛśe taṃ ca deveśo hutāśaṃ śukarūpiṇam tamuvāca mahādevaḥ kiṃcitkopasamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

अब मैं दूती-कर्म करनेवालों तथा परिवारके अन्य लोगोंके पाँच प्रकारके भवनोंको बतला रहा हूँ। उनकी चौड़ाई बारह हाथकी तथा लम्बाई उससे सवाया अधिक होती है। शेष चार गृहोंकी चौड़ाई क्रमशः आधा-आधा हाथ न्यून होती है। अब मैं ज्योतिषी, गुरु, वैद्य, सभापति और पुरोहित-इन सभीके पाँच प्रकारके भवनोंका वर्णन कर रहा हूँ। उनके उत्तम भवनकी चौड़ाई चालीस हाथकी होती है। शेषकी क्रमसे चार-चार हाथकी कम होती है। इन पाँचों भवनोंकी लम्बाई चौड़ाईके षष्ठांशससे अधिक होती है। अब फिर साधारणतया चारों वर्णोके लिये पाँच प्रकारके गृहोंका वर्णन करता हूँ। उनमें ब्राह्मणके घरकी चौड़ाई बत्तीस हाथकी होनी चाहिए। अन्य जातियोंके

English

no!!.('. years). (3).SiijyCvSt.ha or Vasujj'stha

अध्याय १५८

श्लोक 34

निषिक्तमर्धं देव्यां मे शुक्रस्य शुकविग्रह लज्जया विरतिस्थायां त्वमर्धं पिब पावक

niṣiktamardhaṃ devyāṃ me śukrasya śukavigraha lajjayā viratisthāyāṃ tvamardhaṃ piba pāvaka

हिन्दी अर्थ

लिये क्रमशः चार-चार हाथकी कमी होनी चाहिए। (अर्थात् ब्राह्मणके उत्तम गृहकी चौड़ाई बत्तीस हाथ, क्षत्रियके घरकी अट्टाईस हाथ, वैश्यके घरकी चौबीस हाथ तथा सत्-शूद्रके घरकी बीस हाथ और असत्-शूद्रके घरकी सोलह हाथ होनी चाहिए।) किंतु सोलह हाथसे कमकी चौड़ाई अन्त्यजोंके लिये है। ब्राह्मणके घरकी लम्बाई चौड़ाईसे दशांश, क्षत्रियके घरकी अष्टमांश, वैश्यके घरकी तिहाई और शूद्रके घरकी चौथाई भाग अधिक होनी

English

l;.C. (7 jears).

अध्याय १५८

श्लोक 35

यस्मात्तु त्वत्कृतो विघ्नस् तस्मात्त्वय्युपपद्यते इत्युक्तः प्राञ्जलिर्वह्निर् अपिबद्वीर्यमाहितम्

yasmāttu tvatkṛto vighnas tasmāttvayyupapadyate ityuktaḥ prāñjalirvahnir apibadvīryamāhitam

हिन्दी अर्थ

चाहिए। यही विधि श्रेष्ठ मानी गयी है। सेनापति और राजाके गृहोंके बीचमें राजाके रहनेका गृह बनाना चाहिए। उसी स्थानपर भाण्डागार भी रहना चाहिए। सेनापतिके तथा चारों वर्णोके गृहोंके मध्य भागमें सर्वदा राजाके पूज्य लोगोंके निवासार्थ गृह बनवाना चाहिए। इसके अतिरिक्त विभिन्न जातियोंके लिये एवं वनेचरोंके लिये शयन करनेका घर पचास हाथका बनवाना चाहिए। सेनापति और राजाके गृहके परिमाणमें सत्तरका योग करके चौदहका भाग देनेपर व्यासमें शालाका न्यास कहा गया है। उसमें पैंतीस हाथपर बरामदेका स्थान कहा गया है। छत्तीस हाथ सात अङ्गुल लम्बी ब्राह्मणकी बड़ी शाला होनी चाहिए। उसी प्रकार दस अङ्गुल अधिक क्षत्रियकी

English

(4) Va.'aumitra ... l.'!4 B.<'. (,1>.vear.s).

अध्याय १५८

श्लोक 36

तेनापूर्यत तान्देवांस् तत्तत्कायविभेदतः विपाट्य जठरं तेषां वीर्यं माहेश्वरं ततः

tenāpūryata tāndevāṃs tattatkāyavibhedataḥ vipāṭya jaṭharaṃ teṣāṃ vīryaṃ māheśvaraṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

दशाङ्गलाधिका तद्वत् क्षत्रियस्य विधीयते॥ ३५ शाला होनी चाहिए॥ २४--३५॥ पञ्चत्रिंशत्करा वैश्ये ह्यङ्कलानि त्रयोदश । तावत्करेव शूद्रस्य युता पञ्चदशाङ्गुलैः

English

{u) AnUUa

अध्याय १५८

श्लोक 37

निष्क्रान्ते तप्तहेमाभं विततं शंकराश्रमे तस्मिन्सरो महज्जातं विमलं बहुयोजनम्

niṣkrānte taptahemābhaṃ vitataṃ śaṃkarāśrame tasminsaro mahajjātaṃ vimalaṃ bahuyojanam

हिन्दी अर्थ

शालायास्तु त्रिभागेन यस्याग्रे वीथिका भवेत्। सोष्णीषं नाम तद्वास्तु पश्चाच्छेयोच्छुयं भवेत् पार्श्चयोर्वीथिका यत्र सावष्टम्भं तदुच्यते। समन्ताद्वीथिका यत्र सुस्थितं तदिहोच्यते प्रथमो भूमिकोच्छाय उपरिष्टात् प्रहीयते।

English

!!.('. (2 years'. (C) Pulindaka

अध्याय १५८

श्लोक 38

प्रोत्फुल्लहेमकमलं नानाविहगनादितम् तच्छ्रुत्वा तु ततो देवी हेमद्रुममहाजलम्

protphullahemakamalaṃ nānāvihaganāditam tacchrutvā tu tato devī hemadrumamahājalam

हिन्दी अर्थ

पक्केष्टका भवेद् भित्तिः षोडशांशेन विस्तरात्। दारवैरपि कल्प्या स्यात् तथा मृन्मयभित्तिका

English

I!.C. (3 years).

अध्याय १५८

श्लोक 39

जगाम कौतुकाविष्टा तत्सरः कनकाम्बुजम् तत्र कृत्वा जलक्रीडां तदब्जकृतशेखरा

jagāma kautukāviṣṭā tatsaraḥ kanakāmbujam tatra kṛtvā jalakrīḍāṃ tadabjakṛtaśekharā

हिन्दी अर्थ

द्वारशाखासु बाहुल्यमुच्छायकरसम्मितैः होनी चाहिए। उतने ही हाथ तथा पंद्रह अङ्गुल शूद्रकी शालाका परिमाण है। शालाकी लम्बाईके तीन भागपर यदि सामनेको ओर गली बनी हो तो वह 'सोष्णीष' नामक वास्तु है। पीछेकी ओर गली हो तो वह ' श्रेयोच्छूय ' कहलाता है। यदि दोनों पार्श्वोमें वीथिका हो तो वह 'सावष्टम्भ' तथा चारों ओर वीथिका हो तो 'सुस्थित' नामक वास्तु कहा जाता है। ये चारों प्रकारकी वीथियाँ चारों वर्णोके लिये मङ्गलदायी हैं। शालाके विस्तारका

English

(7) Ghosavasu (8) Vajramitra

अध्याय १५८

श्लोक 40

उपविष्टा ततस्तस्य तीरे देवी सखीयुता पातुकामा च तत्तोयं स्वादु निर्मलपङ्कजम्

upaviṣṭā tatastasya tīre devī sakhīyutā pātukāmā ca tattoyaṃ svādu nirmalapaṅkajam

हिन्दी अर्थ

सोलहवाँ भाग तथा चार हाथ-यह पहले खण्डकी ऊँचाईका मान है। अधिक ऊँचा करनेसे हानि होती है। उसके बाद अन्य सभी खण्डोंकी ऊँचाई बारहवें भागके बराबर रखनी चाहिए। यदि पक्की ईटोंकी दीवाल बनायी जा रही हो तो गृहकी चौड़ाईके सोलहवें भागके परिमाणके बराबर मोटाई होनी चाहिए। बह दीवाल लकड़ी तथा मिट्टीसे भी बनायी जा सकती है । सभी वास्तुओंमें भीतरके मानके अनुसार लम्बाई-चौड़ाईका मान श्रेष्ठ माना गया है। गृहके

English

n('. (Uyo ir.s).

अध्याय १५८

श्लोक 41

अपश्यत्कृत्तिकाः स्नाताः षडर्कद्युतिसंनिभाः पद्मपत्रे तु तद्वारि गृहीत्वोपस्थिता गृहम्

apaśyatkṛttikāḥ snātāḥ ṣaḍarkadyutisaṃnibhāḥ padmapatre tu tadvāri gṛhītvopasthitā gṛham

हिन्दी अर्थ

व्याससे पचास अङ्कुल विस्तार तथा अठारह अङ्गुल वेधसे युक्त द्वारकी चौड़ाई रखनी चाहिए और उसकी ऊँचाई चौड़ाईसे दुगुनी होनी चाहिए। जितनी ऊँचाई द्वारकी हो उतनी ही दरवाजेमें लगी हुई शाखाओंकी भी होनी चाहिए। ऊँचाई जितने हाथोंकी हो उतने ही अङ्गुल उन शाखाओंकी मोटाई होनी चाहिए-यही सभी वास्तुविद्याके ज्ञाताओंने बताया है। द्वारके ऊपरका कलश (बुर्ज) तथा नीचेकी देहली (चौखट)-ये दोनों शाखाओंसे आधे अधिक मोटे हों, अर्थात् इन्हें शाखाओंसे ड्योढ़ा मोटा रखना चाहिए

English

(U) niiLigavala or Samaldia'i .. 107 li.C.

अध्याय १५८

श्लोक 42

हर्षादुवाच पश्यामि पद्मपत्रे स्थितं पयः ततस्ता ऊचुरखिलं कृत्तिका हिमशैलजाम्

harṣāduvāca paśyāmi padmapatre sthitaṃ payaḥ tatastā ūcurakhilaṃ kṛttikā himaśailajām

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वास्तुविद्यासु गृहमाननिर्णयो नाम चतुःपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वास्तुप्रकरणमें गृह-मान-निर्णय नामक दो सौ चौवनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

(10) Devabhiili or Devabliumi

अध्याय १५८

श्लोक 43

दास्यामो यदि ते गर्भः सम्भूतो यो भविष्यति सो ऽस्माकमपि पुत्रः स्याद् अस्मन्नाम्ना च वर्तताम् भवेल्लोकेषु विख्यातः सर्वेष्वपि शुभानने

dāsyāmo yadi te garbhaḥ sambhūto yo bhaviṣyati so 'smākamapi putraḥ syād asmannāmnā ca vartatām bhavellokeṣu vikhyātaḥ sarveṣvapi śubhānane

हिन्दी अर्थ

वास्तुविषयक वेधका विवरण सूत उवाच सूतजी कहते हैं--ऋषियो! अब मैं स्तम्भके स्वभवनोच्छायं De चा अपने गृहकी ऊँचाईके मानको सात

English

n.C. (10.\t'ars). Asashialed in C5 11. C,

अध्याय १५८

श्लोक 44

इत्युक्तोवाच गिरिजा कथं मद्गात्रसंभवः सर्वैरवयवैर्युक्तो भवतीभ्यः सुतो भवेत्

ityuktovāca girijā kathaṃ madgātrasaṃbhavaḥ sarvairavayavairyukto bhavatībhyaḥ suto bhavet

हिन्दी अर्थ

कृत्वा स्वंभवनोन्छाय सदा सप्तगुणं युधेः! १ गुणाकर उसके अस्सीवें भागके बराबर खम्भेकी मोटाई अशीत्यंशः पृथुत्वे स्यादग्रे नवगुणे सति । रखें। उसकी मोटाईमें नौसे गुणा कर अस्सीवें भागके

English

Tot:il... I'id y(-ars.

अध्याय १५८

श्लोक 45

ततस्तां कृत्तिका ऊचुर् विधास्यामो ऽस्य वै वयम् उत्तमान्युत्तमाङ्गानि यद्येवं तु भविष्यति

tatastāṃ kṛttikā ūcur vidhāsyāmo 'sya vai vayam uttamānyuttamāṅgāni yadyevaṃ tu bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

रुचकश्चतुरः स्यात् तु अष्टास्त्रो वज्र उच्यते॥ २ बराबर खम्भेका मूलभाग रखना चाहिए। चार कोणवाला द्विवत्रः षोडशास्त्रस्तु द्वात्रिंशास्त्र: प्रलीनक: । स्तम्भ 'रुचक', आठ कोणवाला “वज्र', सोलह कोणवाला “द्विवज़' तथा बत्तीस कोणवाला ' प्रलीनक' कहा जाता

English

[The aggregate of the rcigii.s is, however, 120 years and not 112; but all the Puranas agree in giving 112 years as the duration of Sunga dynasty. This di.screpaney might be explained by umitting Aguimitra from the list. lie i:>cr]iai)s never reigned as a king apail from his father Pu§yamitra who, tliougli de facia king, jdways styled himsof iSeiiApati or Commander-in-chief, and so Aguinii Ira's name is not mentioned by the Matsya Puraiia, There is nmcli uncertainly about his reign as i)ointed out by Mr. Pargiter, Or may it be that Agnimitra was ])ractica]]y a king during the life-time of his father on certain parts of the vast empire? And the verse " tat-suto ' gnimitr-astau bhavisyati samA nripah " may be read as "tat-siito' agnimitrastu bhavisyati sama nripah.'* According to this calculation the Suiiga dynasty would ai)poar to have come to an end not

अध्याय १५८

श्लोक 46

उक्ता वै शैलजा प्राह भवत्वेवमनिन्दिताः ततस्ता हर्षसम्पूर्णाः पद्मपत्रस्थितं पयः

uktā vai śailajā prāha bhavatvevamaninditāḥ tatastā harṣasampūrṇāḥ padmapatrasthitaṃ payaḥ

हिन्दी अर्थ

मध्यप्रदेशे यः स्तम्भो वृत्तो वृत्त इति स्मृतः॥ ३ है। मध्य प्रदेशमें जो खम्भा वृत्ताकार रहता है, उसे एते पञ्च महास्तम्भाः प्रशस्ताः सर्ववास्तुषु। 'वृत्त' कहा गया है। ये पाँच प्रकारके स्तम्भ सभी पद्मवल्लीलताकुम्भपत्रदर्पणरूषिताः ॥ ४ प्रकारके वास्तु-कार्यमें प्रशंसनीय कहे गये हैं। ये सभी

English

in 05 B. C. but in 73 The ilatsya Jhirana verse 32 is rather inaccurate.

अध्याय १५८

श्लोक 47

तस्यै ददुस्तया चापि तत्पीतं क्रमशो जलम् पीते तु सलिले तस्मिंस् ततस्तस्मिन्सरोवरे

tasyai dadustayā cāpi tatpītaṃ kramaśo jalam pīte tu salile tasmiṃs tatastasminsarovare

हिन्दी अर्थ

नवमांशेन स्तम्भ पद्म, वल्ली, लता, कुम्भ, पत्र एवं दर्पणसे चित्रित हतेप्मत्य. लतरमाहिाः आकाराला रहने चाहिए। इन कमलों तथा कुम्भोंमें स्तम्भके नवें स्तम्भतुल्या तुला प्रोक्ता हीना चोपतुला ततः॥ ५ अंशके बराबर अन्तर रहना चाहिए। स्तम्भके बराबर त्रिभागेनेह सर्वत्र चतुभागेन वा पुनः। ऊँचाईको 'तुला' तथा उससे न्यूनको 'उपतुला' कहते हीनं हीनं चतुर्थांशात् तथा सर्वासु भूमिषु॥ ६ हैं। मानके तृतीय या चतुर्थ भागसे हीन जो तुला है, वही सर्वेषा 'उपतुला' है। यह उपतुला सभी भूमियोंमें रहती है। वासगेहानि सर्वेषां प्रविशेद् दक्षिणेन तु। सभी चास-गृहोमें दाहिनी ओर प्रवेशद्वार रखना चाहिए। द्वाराणि तु प्रवक्ष्यामि प्रशस्तानीह यानि तु॥ ७ अब मैं गृहके जो प्रशस्तद्वार हैं, उन्हें बतला रहा हूँ! पूर्वेणेन्द्रं जयन्तं च द्वारं सर्वत्र शस्यते। पूर्व दिशामें इन्द्र और जयन्तद्वार सभी गृहोंमे श्रेष्ठ माने याम्यं च वितथं चैव दक्षिणेन विदुर्बुधाः॥ ८ गये हैं । बुद्धिमान् लोग दक्षिण द्वारोंमें याम्य और वितथको श्रेष्ठ मानते हैं। पश्चिम द्वारोंमें पुष्पदन्त और वरुण पश्चिमे पुष्पदन्तं च वारुणं च प्रशस्यते। प्रशंसित हैं। उत्तर द्वारोंमें भल्लाट तथा सौम्य शुभदायक

English

It says: — 1 5i?f cr?r:

अध्याय १५८

श्लोक 48

विपाट्य देव्याश्च ततो दक्षिणां कुक्षिमुद्गतः निश्चक्रामाद्भुतो बालः सर्वलोकविभासकः

vipāṭya devyāśca tato dakṣiṇāṃ kukṣimudgataḥ niścakrāmādbhuto bālaḥ sarvalokavibhāsakaḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तरेण तु भल्लाटं सौम्यं तु शुभदं भवेत्॥ ९ होते हैं। सभी वास्तुओंमें द्वारवेधको बचाना चाहिए। सेल सड़क या मार्गद्वारा द्वार-वेध होनेपर पूरे कुलका कि जस्तु र भवेत् pe क्षय हो जाता है। वृक्षके द्वारा वेध होनेपर द्वेषकी अधिकता छ चु स च्. सलकुलक्षयः॥ २० होतो है। कीचड़से वेध होनेपर शोक होता है और तरुणा द्वेषबाहुल्यं शोकः पङ्केन जायते। कूपद्वारा वेध होनेपर अवश्य ही सदाके लिये मिरगीका अपस्मारो भवेन्नूनं कूपवेधेन सर्वदा॥ १९ रोग होता है। नाबदान या जलप्रवाहसे वेध होनेपर व्यथा Mess होती है, कीलसे वेध होनेपर अग्निभय होता है, देवतासे व्यथा प्रस्नवणेन स्यात् कीलेनाग्निभयं भवेत्। विद्ध होनेपर विनाश तथा स्तम्भसे विद्ध होनेपर स्त्रीद्वारा

English

w i vrfesir

अध्याय १५८

श्लोक 49

प्रभाकरप्रभाकारः प्रकाशकनकप्रभः गृहीतनिर्मलोदग्रशक्तिशूलः षडाननः

prabhākaraprabhākāraḥ prakāśakanakaprabhaḥ gṛhītanirmalodagraśaktiśūlaḥ ṣaḍānanaḥ

हिन्दी अर्थ

विनाशो देवताविद्धे स्तम्भेन स्त्रीकृतो भवेत्॥ १२ क्लेशकी प्राप्ति होती है अमेध्यावस्करैर्विद्धे गृहिणी बन्धकी भवेत् मानाधिके राजभयं न्यूने तस्करतो भवेत्। द्वारोपरि च यद् द्वारं तदन्तकमुखं स्मृतम्

English

" These ten Kendra hinga will cujfiy (his earth full lOOiuul 200 (tolal 300) years. Tlien it will go to the Sungas." This is evidently a mistake. ouAn ccLXxnt

अध्याय १५८

श्लोक 50

दीप्तो मारयितुं दैत्यान् कुत्सितान्कनकच्छविः एतस्मात्कारणाद्दैवः कुमारश्चापि सो ऽभवत्

dīpto mārayituṃ daityān kutsitānkanakacchaviḥ etasmātkāraṇāddaivaḥ kumāraścāpi so 'bhavat

हिन्दी अर्थ

अध्वनो मध्यदेशे तु अधिको यस्य विस्तरः। ज्रं तु संकटं मध्ये सद्यो भर्तुर्विनाशनम् तथान्यपीडितं द्वारं बहुदोषकरं भवेत्। मूलद्वारात् तथान्यत् तु नाधिकं शोभनं भवेत्

English

The earth coaid not have gone to the Sungas after the Sungas. Kor. did the Sungas reign for 300 years. Instead of " tatah Sang&n gamisyati another reading is " tatah svargam gamisyati " which may refer to the last king, namely, Devabhumi who will go to heaven. This reading is mofe appropriate than ' Sutigiin gamisyati.' Moreover who are these petty kings Ksudrarjanah wiiicli the text mentions. It only mentions 8 kings and not 30, for it does not mention Aguimitra and Gho§avaau. We have therefore adopted Mr. Pargiter's reading: — "Dailaite Sunga-rajiino bhokyant-im&m vasundharfim; Satamphrnam daia dve cha tatah Kanv&n gamisyati." This is in accordance with Visnu punina also which in IV. 24. 11 says: —

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 158
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.