Matsya Purana· Matsya Purāṇa
173
अध्याय 173 / 176

Adhyaya 173

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अध्याय १७३

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १७३ ततो ऽभयं विष्णुवचः श्रुत्वा दैत्याश्च दानवाः उद्योगं विपुलं चक्रुर् युद्धाय विजयाय च

matsya-purāṇa 173 tato 'bhayaṃ viṣṇuvacaḥ śrutvā daityāśca dānavāḥ udyogaṃ vipulaṃ cakrur yuddhāya vijayāya ca

हिन्दी अर्थ

अभावात् त्रिपलादूर्थ्वं शक्तितः कारयेद् बुध: ॥ अश्वाष्टकेन संयुक्तं चतुर्भिरथ वाजिभिः।

English

Matsya said: — The demons liearing those fcarful words of Visnu made great preparations, and left no stone unturned to gain the battle. At that time, the demon Maya took his seat in an imposing golden chariot, measuring 1,200 cubits, gliding on four liuge wheels, its extensive yoke jingling with little bells and covered with the tigerskin, with birds worked out in precious stones, full of various weapons, rumbling like the thunder of clouds, decorated with lofty turrets touching the sky, teeming with clubs, plaited with gold, streaming the golden banner shining like

अध्याय १७३

श्लोक 2

मयस्तु काञ्चनमयं त्रिनल्वायतमक्षयम् चतुश्चक्रं सुविपुलं सुकल्पितमहायुगम्

mayastu kāñcanamayaṃ trinalvāyatamakṣayam catuścakraṃ suvipulaṃ sukalpitamahāyugam

हिन्दी अर्थ

पुण्यकालमथावाप्य पूर्ववत् स्नापितो द्विजैः मत्स्यभगवान्ने कहा---अब इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ पुण्यप्रद एवं महापातकोंके विनाशक अश्वरथ नामक महादानका वर्णन कर रहा हुँ। इस दानमें भी पुण्य पर्वदिन आनेपर तुलापुरुष-दानकी तरह यजमान पुण्याहवाचन कर लोकपालोंका आवाहन करे तथा

English

the Sun, and the Mount Mandar&chala, painted black like the snake and tiger spots, drawn by gigantic bears, the breaker of tlie enemy's chariots. Seated in sucli a majestic chariot the valiant demon looked like the sun rising on Mandanlchala. — 1-8.

अध्याय १७३

श्लोक 3

किङ्किणीजालनिर्घोषं द्वीपिचर्मपरिष्कृतम् रुचिरं रत्नजालैश्च हेमजालैश्च शोभितम्

kiṅkiṇījālanirghoṣaṃ dvīpicarmapariṣkṛtam ruciraṃ ratnajālaiśca hemajālaiśca śobhitam

हिन्दी अर्थ

आदिको इकट्ठा करे। फिर (कम धन हो तो एककुण्डी होम आदिका विधान कर) वेदीपर कृष्णमृग-चर्मको फैलाकर उसके ऊपर रखी हुई तिलोंकी राशिपर स्वर्णमय रथको स्थापना करे। वह रथ सात या चार घोड़ोंसे युक्त हो। उसमें चार चक्के होने चाहिए और उसे जुआसे सम्पन्न तथा इन्द्रनील मणिके कलश और ध्वजासे सुशोभित करना चाहिए। उसपर पद्मरागमणिके दलसे युक्त आठों लोकपालोंकी मूर्ति रेशमी वस्त्रसे सुशोभित,

English

TarakAsura seated himself in a lofty chariot of gold, looking likfe a mountain and making terrible noise, having its motion unimpeded, which was plaited with Iron, having wheels of the same metal, dispelling dark- ness by their glitter, rumbling like the clouds, decorated with inaJIMve net work of iron over the windows, full of clubs, spears, nooses, axes etc., all made of iron, yoked by a thousand asses, and shining like another mountain Maiidara from a distance. — 9-13.

अध्याय १७३

श्लोक 4

ईहामृगगणाकीर्णं पक्षिपङ्क्तिविराजितम् दिव्यास्त्रतूणीरधरं पयोधरविनादितम्

īhāmṛgagaṇākīrṇaṃ pakṣipaṅktivirājitam divyāstratūṇīradharaṃ payodharavināditam

हिन्दी अर्थ

जलसे भरे हुए चार कलश तथा अठारह धान्य हों और उसके ऊपर चँदोवा तना हो। उसे पुष्प-माला, ईख और 'फलसे संयुक्त तथा पुरुषसे समन्वित होना चाहिए। जो पुरुष जिस देवताका भक्त हो, वह उसीके नामका उच्चारण कर अधिवासन करे। छत्र, चमर, रेशमी वस्त्र, जूते, पादुका तथा अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार साथ शय्या आदिका दान करना चाहिए। बुद्धिमान् पुरुषको अर्थाभावमें तीन पल सोनेसे अधिक तौलका उसी प्रकार आठ, चार अथवा दो अश्वॉसे युक्त तथा स्वर्णमय सिंहध्वजसे समन्वित रथका दान करना चाहिए। घोड़ेपर सवार दोनों अश्विनीकुमारोंको उसके चक्ररक्षकके रूपमें स्थापित करना चाहिए। इस प्रकार

English

The demon Virochana came furious with anger, armed with a club, looking like the Mount Achala in that army. The demon Jla'agriva came in his own chariot, with a following of thousands of demonsand chariots. The demon Vanlha, immensely extensive in bidk, with his bow drawn measuring thousand kiskus, came to the field like a mountain pushing on his chariot. TIio demon Khara came cliarged with great conceit and wrath, his lips and eyes throbbing. — 14-17.

अध्याय १७३

श्लोक 5

स्वक्षं रथवरोदारं सूपस्थं गगनोपमम् गदापरिघसम्पूर्णं मूर्तिमन्तमिवार्णवम्

svakṣaṃ rathavarodāraṃ sūpasthaṃ gaganopamam gadāparighasampūrṇaṃ mūrtimantamivārṇavam

हिन्दी अर्थ

पुण्यकाल आनेपर ब्राह्मणोंद्वारा पूर्ववत् स्नान कराया हुआ यजमान श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पॉंकी माला धारणकर अञ्जलिम पुष्प लिये हुए (उस रथकी) तीन बार प्रदक्षिणाकर दान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे १०६६ मत्स्यपुराण

English

The valiant demon Tvasta, riding on a chariot drawn by eight ele- phants, went round the army to see that all the phalanxes of the demons were ready. Viprachitti's son, the demon 6veta, also came with his white earrings, Arista, the son of Bali, came armed with rocks, and began to use them as missiles. — 18-20.

अध्याय १७३

श्लोक 6

हेमकेयूरवलयं स्वर्णमण्डलकूबरम् सपताकध्वजोपेतं सादित्यमिव मन्दरम्

hemakeyūravalayaṃ svarṇamaṇḍalakūbaram sapatākadhvajopetaṃ sādityamiva mandaram

हिन्दी अर्थ

नमो नमः पापविनाशनाय “पापसमूहके लिये दावाग्निस्वरूप देव! आप पापोंके विश्वात्मने वेदतुरङ्गमाय। विनाशक, विश्वात्मा, वेदरूपी घोड़ोंसे युक्त, तेजोंके धाम्नामधीशाय दिवाकराय अधीश्वर और सूर्यरूप हैं, आपको बारम्बार नमस्कार पापौघदावानल देहि शान्तिम्॥ १२ है। आप मुझे शान्ति प्रदान कीजिये। चूँकि आप ही वस्वष्टकादित्यमरुद्गणानां आठों वसुओं, आदित्यगण और मरुद्गणोंके भरण- त्वमेव धाता परमं निधानम्। पोषण करनेवाले और परम निधान हैं, अत: आपकी यतस्ततो मे हृदयं प्रयातु कृपासे पापसमूहके नष्ट हो जानेसे मेरा हृदय धर्मकी धर्मैकतानत्वमघौघनाशात् ॥ १३ एकतानताको प्राप्त हो। इस प्रकार जो मनुष्य इस

English

The demon Kiiora came with his fresh energj and looked like the sun in the midst of dark clouds. And so did many other demons, wearing armours. The demon Laraba, fully bedecked with hanging pendants, shone forth like the Sun, through the mist in his army. Rahu also came biting his lips, gnashing his teeth and with eyes disturbed with anger. — 21-23.

अध्याय १७३

श्लोक 7

गजेन्द्राभोगवपुषं क्वचित्केसरिवर्चसम् युक्तमृक्षसहस्रेण समृद्धाम्बुदनादितम्

gajendrābhogavapuṣaṃ kvacitkesarivarcasam yuktamṛkṣasahasreṇa samṛddhāmbudanāditam

हिन्दी अर्थ

इति शारा बर । लोकमें भव-भय-नाशक इस तुरगरथ-प्रदान नामक सर कलुषपटलैसिमुक्तदेह: महादानको करता है उसका शरीर पापसमूहसे मुक्त हो परममुपैति पदं पिनाकपाणे:॥ १४ जाता है और वह पिनाकपाणिके परम पदको प्राप्त देदीप्यमानवपुषा अंजितप्रधावः करता है तथा सिद्धाङ्गनाओके नेत्ररूपी भ्रमरोंद्वारा पान माक्रम्य मण्डलमखण्डितचण्डभानोः । किये जाते हुए मुखकमलवाला वह अपने देदीप्यमान सिद्धाङ्गनानयनषट्पदपीयमान- शरीरद्वारा पूर्णरूपसे तपनेवाले सूर्यके विजितप्रभाववाले वक्त्राम्बुजोऽम्बुजभवेन चिरं सहास्ते॥ ९५ मण्डलको पारकर ब्रह्माके साथ चिरकालतक निवास

English

Rahu stood before all the demons smiling and many other demons came riding on horses, several others came riding on elephants. — 24.

अध्याय १७३

श्लोक 8

दीप्तमाकाशगं दिव्यं रथं पररथारुजम् अध्यतिष्ठद्रणाकाङ्क्षी मेरुं दीप्त इवांशुमान्

dīptamākāśagaṃ divyaṃ rathaṃ pararathārujam adhyatiṣṭhadraṇākāṅkṣī meruṃ dīpta ivāṃśumān

हिन्दी अर्थ

इति पठति शृणोति वा य इत्थं करता है। जो प्राणी इस लोकमें सुवर्णतुरगरथ नामक कनकतुरगरथप्रदानमस्मिन् । महादानकी विधिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह कभी न स नरकपुरं व्रजेत् कदाचि- भी नरक-लोकमें नहीं जाता, अपितु नरकासुरके शत्रु ज्ररकरिपोर्भवनं प्रयाति भूयः॥ १६ भगवान् विष्णुके लोकको जाता है'॥ ९--१६॥

English

Many came riding on the lions, sheep, bears, mules, camels, boars, several ferocious looking demons came on foot. At that time, the demons with only one or half a leg, in their eagerness for war, began to dance and began to terrify the Devas, shewing their hands and holding clubs, pari- ghas, stones, musalas and other terrible weapons in their hands. Several roared like happy lions, and came waving their arras with glee.— 27.

अध्याय १७३

श्लोक 9

तारमुत्क्रोशविस्तारं सर्वं हेममयं रथम् शैलाकारमसंबाधं नीलाञ्जनचयोपमम्

tāramutkrośavistāraṃ sarvaṃ hemamayaṃ ratham śailākāramasaṃbādhaṃ nīlāñjanacayopamam

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हिरण्याश्वरथप्रदानविधिर्नामैकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णनप्रसङ्गमें हिरण्याश्वरथ-प्रदान-विधि नामक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Those demons armed with clubs, Pas a, Prasa, Parigha, Tomara, Ankusla, Patti4a, Sataghnls, SatadhA,ras, GandasJaclas, iron Parighas, discus, etc., began to cheer up their own armies. — 28-30.

अध्याय १७३

श्लोक 10

कार्ष्णायसमयं दिव्यं लोहेषाबद्धकूबरम् तिमिरोद्गारिकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम्

kārṣṇāyasamayaṃ divyaṃ loheṣābaddhakūbaram timirodgārikiraṇaṃ garjantamiva toyadam

हिन्दी अर्थ

हेमहस्तिरथ-दानकी विधि मत्स्य उवाच मत्स्यभगवानूने कहा--अब इसके बाद मैं मङ्गलमय अथातः सम्प्रवक्ष्यामि हेमहस्तिरथं शुभम्। सुवर्णनिर्मित हस्तिरथ नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ, यस्य प्रदानाद् भुवनं वैष्णवं याति मानवः॥ ९ जिसे प्रदान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है। पूर्वकथित तुलापुरुष-दानकी तरह किसी पुण्य तिथिके आनेपर बुद्धिमान्

English

Thus the demon army, full of conceit and perseverance, looked furious like clouds, and assembled before the Devas. The thousands of the infuriated demons looked shining like the wind, fire, mountain, water and clouds, and became mad for war. — 31-32.

अध्याय १७३

श्लोक 11

लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम् आयसैः परिघैः पूर्णं क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः

lohajālena mahatā sagavākṣeṇa daṃśitam āyasaiḥ parighaiḥ pūrṇaṃ kṣepaṇīyaiśca mudgaraiḥ

हिन्दी अर्थ

पुण्या तुलाउ Fs आदान त यजमानको ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराकर लोकपालोंका विप्रबाचनकं कुर्याल्लोकेशावाहर्न बुधः। आवाहन करना चाहिए; फिर उसी प्रकार ऋत्विज्, मण्डप, ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २ पूजन-सामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिको इकट्ठा

English

Here ends the one hundred nnd seventy-third chapter in the Tdrdkamaya battle.

अध्याय १७३

श्लोक 12

प्रासैः पाशैश्च विततैर् असंयुक्तैश्च कण्टकैः शोभितं त्रासयानैश्च तोमरैश्च परश्वधैः

prāsaiḥ pāśaiśca vitatair asaṃyuktaiśca kaṇṭakaiḥ śobhitaṃ trāsayānaiśca tomaraiśca paraśvadhaiḥ

हिन्दी अर्थ

कुर्यात् पुष्परथाकारं काञ्जनं मणिमण्डितम् लोकपालाष्टकोपेतं ब्रह्मार्कशिवसंयुतम्। मध्ये नारायणोपेतं लक्ष्मीपुष्टिसमन्वितम् दीपिकोपानहच्छत्रदर्पणं पादुकान्वितम्

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 13

उद्यन्तं द्विषतां हेतोर् द्वितीयमिव मन्दरम् युक्तं खरसहस्रेण सो ऽध्यारोहद्रथोत्तमम्

udyantaṃ dviṣatāṃ hetor dvitīyamiva mandaram yuktaṃ kharasahasreṇa so 'dhyārohadrathottamam

हिन्दी अर्थ

चतुर्भिहैममातङ्गैर्मुक्तादामविभूषितैः स्वरूपतः गजाभ्यां च युक्तं कृत्वा निवेदयेत् नमो नमः शङ्करपद्मजार्क- लोकेशविद्याधरवासुदेवैः ।

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 14

विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः

virocanastu saṃkruddho gadāpāṇiravasthitaḥ pramukhe tasya sainyasya dīptaśṛṅga ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

त्वं सेव्यसे वेदपुराणयज्ञै- स्तेजोमयस्यन्दन पाहि तस्मात् चामीकरेभरथ माधव सम्प्रदानात् इत्थं प्रणम्य कनकेभरथप्रदानं यः कारयेत् सकलपापविमुक्तदेहः ।

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 15

युक्तं रथसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः

yuktaṃ rathasahasreṇa hayagrīvastu dānavaḥ syandanaṃ vāhayāmāsa sapatnānīkamardanaḥ

हिन्दी अर्थ

करे। इस महादानमें भी यजमानको उपवास रखकर ब्राह्मणोंके साथ भोजन करनेका विधान है। उसे मणियोंसे सुशोभित पुष्परथके आकारका सुवर्णमय रथ, जो विचित्र तोरणों और चार पहियोंसे युक्त हो, बनवाना चाहिए। उस रथको कृष्णमृगचर्मके ऊपर रखे गये एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिए। वह रथ आठों लोकपाल, ब्रह्मा, सूर्य और शिवकी प्रतिमाओंसे युक्त हो। उसके मध्य-भागमें लक्ष्मीसहित विष्णुभगवान्की भी मूर्ति

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 16

व्यायतं किष्कुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन्महत् वराहः प्रमुखे तस्थौ सप्ररोह इवाचलः

vyāyataṃ kiṣkusāhasraṃ dhanurvisphārayanmahat varāhaḥ pramukhe tasthau sapraroha ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

होनी चाहिए। उसे अठारह प्रकारके अन्न, पात्र, आसन, चन्दन, दीपक, जूता, छत्र, दर्पण और पादुकासे भी युक्त होना चाहिए। उसके ध्वजपर गरुड तथा जुआके अग्रभागपर विनायकको स्थापित करना चाहिए। वह नाना प्रकारके फलोंसे युक्त हो और उसके ऊपर चँदोवा तना हो। वह पँचरंगे रेशमी वस्त्र, विकसित पुष्पों, चार माङ्गलिक कलशोंके साथ आठ गौओं तथा मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित चार सुवर्णके हाथियोंसे सम्पन्न हो। पुनः दो जीवित हाथियोंको रथमें जोतकर दान करना चाहिए

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 17

खरस्तु विक्षरन्दर्पान् नेत्राभ्यां रोषजं जलम् स्फुरद्दन्तोष्ठनयनः सङ्ग्रामं सो ऽभ्यकाङ्क्षत

kharastu vikṣarandarpān netrābhyāṃ roṣajaṃ jalam sphuraddantoṣṭhanayanaḥ saṅgrāmaṃ so 'bhyakāṅkṣata

हिन्दी अर्थ

अपनी शक्तिके अनुसार उस रथको पाँच पलसे ऊपर एक भार सोनेतकका बनवाना चाहिए। इस प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मणद्वारा माङ्गलिक शब्दोंके उच्चारणके साथ स्नान कराया गया यजमान अञ्जलिमें फूल लेकर तीन बार करे तथा निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण कर ब्राह्मणोंको दान दे-तेजोमय स्यन्दन! शङ्कर, ब्रह्मा, सूर्य, लोकपाल, विद्याधर, वासुदेव, वेद, पुराण और यज्ञ तुम्हारी सेवा करते हैं, अतः तुम मेरी रक्षा करो। तुम्हे

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 18

त्वष्टा त्वष्टगजं घोरं यानमास्थाय दानवः व्यूहितुं दानवव्यूहं परिचक्राम वीर्यवान्

tvaṣṭā tvaṣṭagajaṃ ghoraṃ yānamāsthāya dānavaḥ vyūhituṃ dānavavyūhaṃ paricakrāma vīryavān

हिन्दी अर्थ

बारम्बार नमस्कार है। रथाधिरूढ़ स्वामिन्! विष्णुभगवानूका जो पद परमगुह्यतम, आनन्दका हेतु और गुण एवं रूपसे परे है तथा एकमात्र योगरूप मानसिक दृष्टिवाले मुनिगण जिसका समाधिकालमें दर्शन करते हैं वह आप ही हैं। माधव! चूँकि आप ही भवसागरमें डूबनेवालोंके लिये आनन्दके पात्र, सत्यस्वरूप तथा यज्ञोंमें पानपात्र हैं, इसलिये आप इस सुवर्णमय हस्तिरथके दानसे. मेरे पापपुझोंको नष्टकर मुझपर कृपा कीजियें।' जो मनुष्य इस प्रकार प्रणाम करके स्वर्णमय हस्तिरथका दान. करता है उसका शरीर समस्त पापोंसे मुक्त hrs जाता है

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 19

विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखे स्थितः

vipracittisutaḥ śvetaḥ śvetakuṇḍalabhūṣaṇaḥ śvetaśailapratīkāśo yuddhāyābhimukhe sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

और वह शङ्करजीके विद्याधर, देवगण प्राणनोत्यसौ पदमतीन्द्ियमिन्दुमौलेः॥ ९५ सेवित इन्द्रियातीत लोकको प्राप्तकरता है। वहोभूर्व

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 20

अरिष्टो बलिपुत्रश्च वरिष्ठो ऽद्रिशिलायुधः युद्धायाभिमुखस्तस्थौ धराधरविकम्पनः

ariṣṭo baliputraśca variṣṭho 'driśilāyudhaḥ yuddhāyābhimukhastasthau dharādharavikampanaḥ

हिन्दी अर्थ

कृतदुरितवितानप्रज्चलद्वह्विजाल- व्यतिकरकृतदाहोद्वेगभाजोऽपि बन्धून् । जन्मके किये गये दुष्कर्म-रूप वितानसे आच्छादित प्रज्वलित अग्निको ज्चालाओंके संयोगसे उत्पन्न हुए दाहके उद्ठेगसे युक्त बन्धुओं, पितरों, पुत्रों तथा सम्पूर्ण बान्धवोंको इस हस्तिरथके दानसे विष्णुभगवान्के शाश्वत 'कृतगजरथदानाच्छाश्वतं सद्य विष्णोः॥ १६ लोकमें ले जाता है

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 21

किशोरस्त्वतिसंहर्षात् किशोर इति चोदितः सबला दानवाश्चैव संनह्यन्ते यथाक्रमम्

kiśorastvatisaṃharṣāt kiśora iti coditaḥ sabalā dānavāścaiva saṃnahyante yathākramam

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हेमहस्तिरथप्रदानविधिर्नाम द््यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन-प्रसङ्गमें हेमहस्तिरथ-प्रदान-विधि नामक दो सौ बयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 22

अभवद्दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः लम्बस्तु नवमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः

abhavaddaityasainyasya madhye ravirivoditaḥ lambastu navameghābhaḥ pralambāmbarabhūṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

पञ्चलाङ्गल (हल) प्रदानकी विधि अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्। पुण्यां तिथिमथासाद्य युगादिग्रहणादिकाम्। भूमिदानं नरो दद्यात् पञ्चलाङ्गलकान्वितम्॥

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 23

दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान् स्वर्भानुरास्ययोधी तु दशनोष्ठेक्षणायुधः

daityavyūhagato bhāti sanīhāra ivāṃśumān svarbhānurāsyayodhī tu daśanoṣṭhekṣaṇāyudhaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वोपकरणैर्युक्तानन्यान् पञ्च च काञ्चनान् रूप्यपादाग्रतिलकान् रक्तकौशेयभूषणान्।

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 24

हसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे स महाग्रहः अन्ये हयगतास्तत्र गजस्कन्धगताः परे

hasaṃstiṣṭhati daityānāṃ pramukhe sa mahāgrahaḥ anye hayagatāstatra gajaskandhagatāḥ pare

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवानने कहा--अब इसके बाद मैं महापातकनाशी अतिश्रेष्ठ पञ्चलाङ्गल नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ । युगादि तिथियों तथा सूर्यग्रहण आदिके अवसरपर मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार पाँच हलोंसे युक्त, फसलसे सुशोभित ग्राम, खेट, खर्वट, दान करना चाहिए विचक्षण पुरुष साखूकी लकड़ीके पाँच तथा सुवर्णके बने हुए अन्य पाँच हलोंको सभी सामग्रियोंसे युक्त करे। वे हल पाँच पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकके बनवाने चाहिए। साथ ही दस

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 25

सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहर्क्षेषु चापरे केचित्खरोष्ट्रयातारः केचिच्छ्वापदवाहनाः

siṃhavyāghragatāścānye varāharkṣeṣu cāpare kecitkharoṣṭrayātāraḥ kecicchvāpadavāhanāḥ

हिन्दी अर्थ

वृषभोंको, जो उत्तम लक्षणोंसे युक्त तथा भार ढोनेमें समर्थ हों, जिनकी सींगें सुवर्णसे, पूँछ मोतीसे और खुर चाँदीसे विभूषित हों, जिनके सिरपर तिलक लगा हो, जो लाल रेशमी वस्त्रसे सुशोभित तथा पुष्पमाला और चन्दनसे युक्त हों, शालामें अधिवासित कराये। फिर पर्जन्य, आदित्य और रुद्रके लिये खीरकी चरु तैयार करे और गुरु उसे एक ही कुण्डमें उनके लिये निवेदित करे। उसी प्रकार पलाशकी समिधा, घृत तथा

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 26

पत्तिनस्त्वपरे दैत्या भीषणा विकृताननाः एकपादार्धपादाश्च ननृतुर्युद्धकाङ्क्षिणः

pattinastvapare daityā bhīṣaṇā vikṛtānanāḥ ekapādārdhapādāśca nanṛturyuddhakāṅkṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

काले तिलका हवन करे । बुद्धिमान् यजमान तुलापुरुष- दानकी भाँति लोकपालोंका आवाहन करे। तदनन्तर शुक्ल वस्त्र एवं पुष्पमाला धारण कर बुद्धिमान् पुरुष माङ्गलिक शब्दोंके साथ द्विजदम्पतिको बुलाकर सोनेकी शय्यां सोपस्करां दद्याद् धेनुमेकां पयस्विनीम् यस्माद् देवगणाः सर्वे स्थावराणि चराणि च

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 27

आस्फोटयन्तो बहवः क्ष्वेडन्तश्च तथा परे हृष्टशार्दूलनिर्घोषा नेदुर्दानवपुंगवाः

āsphoṭayanto bahavaḥ kṣveḍantaśca tathā pare hṛṣṭaśārdūlanirghoṣā nedurdānavapuṃgavāḥ

हिन्दी अर्थ

दानान्यन्यानि मे भक्तिर्धर्म एवं दृढा भवेत्। दण्डेन सप्तहस्तेन त्रिंशददण्डं निवर्तनम् विधिनानेन तस्याशु क्षीयते पापसंहतिः

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 28

ते गदापरिघैरुग्रैः शिलामुसलपाणयः बाहुभिः परिघाकारैस् तर्जयन्ति स्म देवताः

te gadāparighairugraiḥ śilāmusalapāṇayaḥ bāhubhiḥ parighākārais tarjayanti sma devatāḥ

हिन्दी अर्थ

भवनस्थानमात्रं वा सोऽपि पापैः प्रमुच्यते भासां पतेर्दुहितुरङ्गजरोमकाणि। तावन्ति शङ्करपुरे ससमा हि तिष्ठेद् भूमिप्रदानमिह यः कुरुते मनुष्यः तस्मादघौघपटलक्षयकारि भूमे-

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 29

पाशैः प्रासैश्च परिघैस् तोमराङ्कुशपट्टिशैः चिक्रीडुस्ते शतघ्नीभिः शतधारैश्च मुद्गरैः

pāśaiḥ prāsaiśca parighais tomarāṅkuśapaṭṭiśaiḥ cikrīḍuste śataghnībhiḥ śatadhāraiśca mudgaraiḥ

हिन्दी अर्थ

जंजीर, अंगूठी, रेशमी वस्त्र, सुवर्णके कङ्कण एवं मणियोंद्वारा उनकी पूजा करे तथा सामग्रियोंसहित शय्या और एक दूध देनेवाली गायका भी दान करे॥ १--१०॥ हलोंके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्नोंको रखना चाहिए। फिर अञ्जलिमें फूल लेकर प्रदक्षिणा करनेके पश्चात् सबका दान कर देना चाहिए। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे-'चूँकि सभी देवगण तथा चराचर जीव भारवाही वृषभोंके अङ्गोंमें निवास करते

English

TUB UAT&YA WHABAM.

अध्याय १७३

श्लोक 30

गण्डशैलैश्च शैलैश्च परिघैश्चोत्तमायसैः चक्रैश्च दैत्यप्रवराश् चक्रुर् आनन्दितं बलम्

gaṇḍaśailaiśca śailaiśca parighaiścottamāyasaiḥ cakraiśca daityapravarāś cakrur ānanditaṃ balam

हिन्दी अर्थ

हैं, अतः मेरी शिवमें भक्ति हो। चूँकि अन्य सभी दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाकी भी समता नहीं कर सकते, अतः धर्ममें मेरी सुद्दढ भक्ति हो।' सात (मतान्तरसे दस) हाथोंके दण्डके मापसे तीस दण्ड मापका एक निवर्तन होता है और उसके तिहाई अंशसे न्यूनको गोचर्म कहते हैं--ऐसा मान प्रजापतिने बतलाया है। जो बुद्धिमान् पुरुष इस मानके अनुसार एक सौ निवर्तन भूमिको इस विधिसे दान करता है, उसका पापपुञ्ज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। जो उसका आधा भाग या

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अध्याय १७३

श्लोक 31

एतद्दानवसैन्यं तत् सर्वं युद्धमदोत्कटम् देवानभिमुखे तस्थौ मेघानीकमिवोद्धतम्

etaddānavasainyaṃ tat sarvaṃ yuddhamadotkaṭam devānabhimukhe tasthau meghānīkamivoddhatam

हिन्दी अर्थ

करता है, वह भी पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य इस मर्त्यलोकमें भूमि-दान करता है, वह उस भूमिमें हलके मुखके जितने मार्ग बनते हैं तथा सूर्यपुत्रीके अङ्गमें जितने रोएँ हैं, उतने वर्षोतक शंकरपुरीमें निवास करता है तथा गन्धर्व, किन्नर, सुर, असुर और सिंद्धोंके समूहोंद्वारा चँवर डुलाये जाते हुए महान् विमानपर सवार हो पिता, पितामह और बन्धुगणोंके साथ देवनायक होकर शम्भुलोकमें जाता है और वहाँ पूजित होता है।

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अध्याय १७३

श्लोक 32

तदद्भुतं दैत्यसहस्रगाढं वाय्वग्निशैलाम्बुदतोयकल्पम् बलं रणौघाभ्युदये ऽभ्युदीर्णं युयुत्सयोन्मत्तम् इवाबभासे

tadadbhutaṃ daityasahasragāḍhaṃ vāyvagniśailāmbudatoyakalpam balaṃ raṇaughābhyudaye 'bhyudīrṇaṃ yuyutsayonmattam ivābabhāse

हिन्दी अर्थ

मनुष्य इस गौ, भूमि, हल और वृषभोंका दान करनेसे नष्ट हुए इन्द्रत्वको भी प्राप्त कर लेता है, अतः ऐश्वर्य एवं समृद्धिके लिये पापपुञ्जके परदेको नष्ट करनेवाले दानं विधेयमिति भूतिभवोद्भवाय॥ १९ भूमिदानको अवश्य करना चाहिए इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने पञ्चलाङ्गलप्रदानविधिर्नाम त््यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 173
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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