Matsya Purana· Matsya Purāṇa
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अध्याय 22 / 176

Adhyaya 22

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अध्याय २२

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण २२ कस्मिन्काले च तच्छ्राद्धम् अनन्तफलदं भवेत् कस्मिन्वासरभागे तु श्राद्धकृच्छ्राद्धमाचरेत् तीर्थेषु केषु च कृतं श्राद्धं बहुफलं भवेत्

matsya-purāṇa 22 kasminkāle ca tacchrāddham anantaphaladaṃ bhavet kasminvāsarabhāge tu śrāddhakṛcchrāddhamācaret tīrtheṣu keṣu ca kṛtaṃ śrāddhaṃ bahuphalaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

शौनकजी कहते हैं शतानीक ! गुरुसे संजीविनी- विद्या प्राप्त करके विप्रवर कच तत्काल ही महर्षि शुक्राचार्यका पेट फाड़कर ठीक उसी तरह निकल आया, जैसे दिन बीतनेपर पूर्णिमाकी संध्याके समय हिमालय पर्वतके श्वेत शिखरको भेदकर चन्द्रमा प्रकट हो जाते हैं। मूर्तिमान् वेदराशिके तुल्य शुक्राचार्यको भूमिपर पड़ा देख कचने भी अपने मरे हुए गुरुको (संजीविनी )-विद्याको प्राप्त कर लेनेपर गुरुको प्रणाम कर वह इस प्रकार बोला--'जो लोग निधियोंके भी निधि, श्रेष्ठ लोगोंको भी वरदान देनेवाले, मस्तकपर हिमालय पर्वतके समान श्वेत केशधारी पूजनीय गुरुदेवका (उनसे विद्या प्राप्त करके भी) आदर नहीं करते, वे प्रतिष्ठारहित

English

myriads of images of Ssiva is an exceedingly sacred place. It is also known as Jam.'idagni tirtha. It is there that the river Godavari has become ruptured through the fear of Pratika Hisi. It is both Dew as well as Pitii tiitha and is also known under the name of Apsaroynga. Tliere the performance of siiaddha, Agniliotra and charity is held millions of times more sacred. Sahasrali/iga, Raghaveslvaia the river Indraphensi where India had His downfall and where He after destroying the demon Namuchi went to Heaven by the practice of penances, are the places wdiero the performance of draddha by men bears everlasting fruit. Pufikara, Saligrama, so also Somaparia, the home of VaitJwfinara are Sacred tirthas.— 49-01.

अध्याय २२

श्लोक 2

अपराह्णे तु सम्प्राप्ते अभिजिद्रौहिणोदये यत्किंचिद्दीयते तत्र तदक्षयमुदाहृतम्

aparāhṇe tu samprāpte abhijidrauhiṇodaye yatkiṃciddīyate tatra tadakṣayamudāhṛtam

हिन्दी अर्थ

होकर पापपूर्ण लोकों-नरकोंमें जाते हैं'॥ ५७--५९॥ शौनकजी कहते हैं-शतानीक! विद्वान् शुक्राचार्य मदिरापानसे ठगे गये थे और उस अत्यन्त भयानक परिस्थितिको पहुँच गये थे, जिसमें तनिक भी चेत नहीं रह जाता। मदिरासे मोहित होनेके कारण ही वे उस

English

Sarasvata, Swaini, the river Malandara, Jrilandliara, Mount Lohadanda, Kauiiiki river, the river Cliandrikri, the river Vaidarhha, Vaira, the river Payosni, Prahgmuklia river, the Kaveri, Chitrakuta, Vindhyachala, Kuhjjiblira, the hanks of tlie IJrvarfi river, Sarnsarairiochana, Rinamochana, Attahiisa Gaiitamcsvara, Vasistlm, Ihuita, Ihahinvarta, Knrfavarta, Hava, Pindaraka, afikhcdliara, Gliantesvara, Ailvakeslvara, Nilkesvara, Dharani- dhara, Rfimtirtha, Asva, Vedasira, Anghavati river, Vasnprada, Chaglanda, Badari, Oana, ifayant, Vijaya4akra tirtha, Sripati, Raivata, iarada, Bhadrakalevora, Vaiknntlia, Bhimerfvara, MahAdeva, Matrigralia, Kara- vlrapnra, Knserfaya, Ganrisikhara, Nakulesia, Kardamala, Dincji, Pnndarlka- pnra, Godavari tho abode of Tirthesfvara, are the places where by performing iJraddha one gives complete satisfaction to the Piris and paves the way for tlie attainment of final beatitude.— 62-78.

अध्याय २२

श्लोक 3

तीर्थानि यानि शस्तानि पितॄणां वल्लभानि च नामतस्तानि वक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः

tīrthāni yāni śastāni pitṝṇāṃ vallabhāni ca nāmatastāni vakṣyāmi saṃkṣepeṇa dvijottamāḥ

हिन्दी अर्थ

समय अपने मनके अनुकूल चलनेवाले प्रिय शिष्य ब्रा्मणकुमार कचको भी पी गये थे। यह सब देख और सोचकर वे महानुभाव कविपुत्र शुक्र कुपित हो उठे। मदिरा-पानके प्रति उनके मनमें क्रोध और घृणाका भाव जाग उठा और उन्होंने ब्राह्मणोंका हित करनेकी इच्छासे स्वयं इस प्रकार घोषणा की शुक्र उवाच शुक्राचार्यने कहा--आजसे (इस जगत्का) जो यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि- कोई भी मन्दबुद्धि ब्राह्मण अज्ञानसे भी मदिरापान करेगा, न्मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः । वह धर्मसे भ्रष्ट हो ब्रह्महत्याके पापका भागी होगा तथा

English

I have onnmeratrd to you tlie names of the Tirthas very briefly. Even Brihaspati cannot adequately describe their glory what to say of a man. — 79.

अध्याय २२

श्लोक 4

पितृतीर्थं गया नाम सर्वतीर्थवरं शुभम् यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव पितामहः

pitṛtīrthaṃ gayā nāma sarvatīrthavaraṃ śubham yatrāste devadeveśaḥ svayameva pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

इहलोक और परलोक-दोनोंमें निन्दित होगा । धर्मशास्त्रोंमे ब्राह्मण-धर्मकी जो सीमा निर्धारित की गयी है, उसीमें मेरे द्वारा स्थापित की हुई यह मर्यादा भी रहे और सम्पूर्ण लोकमें मान्य हो। साधु पुरुष, ब्राह्मण, गुरुओंके समीप अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्या- दस्मिँल्लोके गर्हितः स्यात् परे च

English

Satya tirtha (observance of truth), Dayft tirtha performance of charity), Iidriyanigraha (control of passions) should be considered as tirthas even by those who cannot leave their homes for purposes of pilgrimage— 80.

अध्याय २२

श्लोक 5

तत्रैषा पितृभिर्गीता गाथा भागमभीप्सुभिः

tatraiṣā pitṛbhirgītā gāthā bhāgamabhīpsubhiḥ

हिन्दी अर्थ

मया चेमां विप्रधर्मोक्तसीमां मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके। अध्ययन करनेवाले शिष्य, देवता और समस्त जगत्के सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां मनुष्य मेरी बाँधी हुई इस मर्यादाको अच्छी तरह देवा हैत्याश्चोपश्ृण्वन्तु सर्वे ॥ ६३ सुन लें

English

iraddha performed at these place is millions of times more sacred. One should therefore perform slniddha with devotion and according to the rules laid down, at these holy places.— 81.

अध्याय २२

श्लोक 6

एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येको ऽपि गयां व्रजेत् यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्

eṣṭavyā bahavaḥ putrā yadyeko 'pi gayāṃ vrajet yajeta vāśvamedhena nīlaṃ vā vṛṣamutsṛjet

हिन्दी अर्थ

शौनक उवाच शौनकजी कहते हैं-एऐसा कहकर तपस्याकी इतीदमुक्त्वा स महाप्रभाव- निधियोंकी निधि, अप्रमेय शक्तिशाली महानुभाव

English

The three morning muhurtas are called safigava, the three mnbdrtas in the midday and afternoon are uttama, the evening muhurta which should bo avoided, or A-Addha is Raksasi. There are fifteen muhflitas in the day and the 8th of them is called the kntnpa. — 82-84.

अध्याय २२

श्लोक 7

तथा वाराणसी पुण्या पितॄणां वल्लभा सदा यत्राविमुक्तसांनिध्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्

tathā vārāṇasī puṇyā pitṝṇāṃ vallabhā sadā yatrāvimuktasāṃnidhyaṃ bhuktimuktiphalapradam

हिन्दी अर्थ

लीक कमी निधिरप्रमेय:। शुक्राचार्यने, देवने जिनकी बुद्धिको मोहित कर दिया तान् अ ज्र टी जज था, उन दानवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा द समाहूय नचाऽभ्युनाच॥ ३४ जुक्राचार्यने कहा--'दानवो! तुम सब (बड़े) आचक्षे वो दानवा बालिशाः स्थ मूर्ख हो। में तुम्हें बताये देता हूँ (महात्मा) कच मुझसे

English

Aote-> Muhurta - A period of 48 minutes.

अध्याय २२

श्लोक 8

पितॄणां वल्लभं तद्वत् पुण्यं च विमलेश्वरम् पितृतीर्थं प्रयागं तु सर्वकामफलप्रदम्

pitṝṇāṃ vallabhaṃ tadvat puṇyaṃ ca vimaleśvaram pitṛtīrthaṃ prayāgaṃ tu sarvakāmaphalapradam

हिन्दी अर्थ

शिष्यः कचो वत्स्यति मत्समीपे। संजीवनी-विद्या पाकर सिद्ध हो गया है। इसका प्रभाव संजीवनीं प्राप्य विद्यां मयायं मेरे ही समान है। यह ब्राह्मण ब्रह्मस्वरूप है तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः॥ ६५ शौनकजी कहते हैं-कचने (इस प्रकार) एक शौनक उवाच हजार वर्षोतक गुरुके समीप रहकर अपना ब्रत पूरा कर गुरोरुष्य सकाशे च दशबर्षशतानि सः। लिया। तब (गुरुसे) घर जानेकी अनुमति मिल जानेपर

English

THE MATSYA PVRANAM.

अध्याय २२

श्लोक 9

वटेश्वरस्तु भगवान् माधवेन समन्वितः योगनिद्राशयस्तद्वत् सदा वसति केशवः

vaṭeśvarastu bhagavān mādhavena samanvitaḥ yoganidrāśayastadvat sadā vasati keśavaḥ

हिन्दी अर्थ

अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम्॥ ६६ उसने देवलोकमें जानेका विचार किया इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना शौनक उवाच शौनकजी कहते हैं-जब कचका व्रत समाप्त हो गया और गुरु (शुक्राचार्य)-ने उसे जानेकी आज्ञा दे दी,

English

Ill the noon the movement of the aim becomes slow therefore it is beat to perform dr&ddha at that time. —85.

अध्याय २२

श्लोक 10

दशाश्वमेधिकं पुण्यं गङ्गाद्वारं तथैव च नन्दाथ ललिता तद्वत् तीर्थं मायापुरी शुभा

daśāśvamedhikaṃ puṇyaṃ gaṅgādvāraṃ tathaiva ca nandātha lalitā tadvat tīrthaṃ māyāpurī śubhā

हिन्दी अर्थ

तब वह देवलोक जानेको उद्यत हुआ। उस समय प्रस्थितं त्रिदशावास देवयानीदमब्रवीत्॥ १ देवयानीने उससे इस प्रकार कहा-- भ्राजसे विद्यया चैव तपसा च दमेन च

English

The hour of midday, a vessel of rhinoceros* horn, a Nepal blanket, silver, Darblnlr grass, sesamuin, kine, and a daughter's son, are the eight essentials of a rfniddha. Kutsit is another synonym of Papa (sin)..lul the eight things ennmueratod above consume (tfipa) all sin 'kn), therefore they are known ris kutupns. -—80-87.

अध्याय २२

श्लोक 11

तथा मित्रपदं नाम ततः केदारमुत्तमम् गङ्गासागरमित्याहुः सर्वतीर्थमयं शुभम्

tathā mitrapadaṃ nāma tataḥ kedāramuttamam gaṅgāsāgaramityāhuḥ sarvatīrthamayaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

ऋषिर्यथाङ्गिरा मान्यः पितुर्मम महायशाः । तथा मान्यश्च पूज्यश्च मम भूयो बृहस्पतिः व्रतस्थे नियमोपेते यथा वर्ताम्यहं त्वयि पूज्यो मान्यश्च भगवान् यथा मम पिता तव। तथा त्वमनवद्याङ्गि पूजनीयतमा मता

English

The nine mnhurtas after the kiitupa muhurla are known as SvadhS.— 88.

अध्याय २२

श्लोक 12

तीर्थं ब्रह्मसरस्तद्वच् छतद्रुसलिले ह्रदे तीर्थं तु नैमिषं नाम सर्वतीर्थफलप्रदम्

tīrthaṃ brahmasarastadvac chatadrusalile hrade tīrthaṃ tu naimiṣaṃ nāma sarvatīrthaphalapradam

हिन्दी अर्थ

त्वं भद्रे धर्मतः पूज्या गुरुपुत्री सदा मम देवयानि तथैव त्वं नैवं मां वक्तुमहसि

English

Kuifa and black sesainum were produced from tlio htuly of Visnu, that is why they are neoes'arily employed in the pert'a-inaijoe of rfi ildha. Tlie devas have also.sai«l tliat a Iiandfnl of ivafo'- mixed wifi Nrsaninin and oUcred by the renidenfs of a samod phiec by lioldl.ig Knst:* in one hand, is also n kind 'd iiaddiin. iO

अध्याय २२

श्लोक 13

गङ्गोद्भेदस्तु गोमत्यां यत्रोद्भूतः सनातनः तथा यज्ञवराहस्तु देवदेवश्च शूलभृत्

gaṅgodbhedastu gomatyāṃ yatrodbhūtaḥ sanātanaḥ tathā yajñavarāhastu devadevaśca śūlabhṛt

हिन्दी अर्थ

न मामर्हसि धर्मज्ञ त्यक्तुं भक्तामनागसाम् तत्राहमुषितो भद्रे कुक्षौ काव्यस्य भामिनि भगिनी धर्मतो मे त्वं मैवं वोचः शुभानने। सुखेनाध्युषितो भद्रे न मन्युर्विद्यते मम

English

Sraddlia slionld l)e performed with -.ne hand only but IVonaiia with both hands. — 91.

अध्याय २२

श्लोक 14

यत्र तत्काञ्चनं द्वारम् अष्टादशभुजो हरः नेमिस्तु हरिचक्रस्य शीर्णा यत्राभवत्पुरा

yatra tatkāñcanaṃ dvāram aṣṭādaśabhujo haraḥ nemistu haricakrasya śīrṇā yatrābhavatpurā

हिन्दी अर्थ

देवयानी बोली महर्षि अङ्गिराके पौत्र! तुम सदाचार, उत्तम कुल, विद्या, तपस्या तथा इन्द्रियसंयम आदिसे बड़ी प्रकार मेरे पिताजीके लिये माननीय हैं, उसी प्रकार

English

Suta said that the performanee of sidddha in a holy place gives long life and washes off all siu, this has been said by the foi d Matsya —92.

अध्याय २२

श्लोक 15

तदेतन्नैमिषारण्यं सर्वतीर्थनिषेवितम् देवदेवस्य तत्रापि वाराहस्य तु दर्शनम्

tadetannaimiṣāraṇyaṃ sarvatīrthaniṣevitam devadevasya tatrāpi vārāhasya tu darśanam

हिन्दी अर्थ

हैं। तपोधन! ऐसा जानकर मैं जो कहती हूँ, उसपर विचार करो तुम जब व्रत और नियमोंके पालनमें लगे थे, उन दिनों मैंने तुम्हारे साथ जो बर्ताव किया है, (आशा है,) उसे तुम भूले नहीं होगे। अब तुम व्रत समाप्त करके अपनी अभीष्ट विद्या प्राप्त कर चुके हो। मैं तुमसे प्रेम करती हूँ; तुम मुझे स्वीकार करो; अतः बैदिक मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक विधिवत् मेरा पाणिग्रहण करो ॥ २--५॥ कचने कहा--निर्दोष अङ्गोंवाली देवयानी! जैसे

English

One should recite it at thejinn -of sr'ddha one who reads it or beans it becomes wealthy, emiseqnently the residonts »>f a Irdy plane slionld recite'it to dispel nil their *-\\]<. 01

अध्याय २२

श्लोक 16

यः प्रयाति स पूतात्मा नारायणपदं व्रजेत् कृतशौचं महापुण्यं सर्वपापनिषूदनम्

yaḥ prayāti sa pūtātmā nārāyaṇapadaṃ vrajet kṛtaśaucaṃ mahāpuṇyaṃ sarvapāpaniṣūdanam

हिन्दी अर्थ

हैं, वैसे ही तुम हो; बल्कि उनसे भी बढ़कर मेरी पूजनीया हो। भद्रे! महात्मा भार्गवको तुम प्राणोंसे भी अधिक प्यारी हो। गुरुपुत्री होनेके कारण धर्मकी दृष्टिसे मेरी सदा पूजनीया हो। देवयानी! जैसे मेरे गुरुदेव तुम्हारे पिता शुक्राचार्य सदा मेरे माननीय हैं, उसी प्रकार तुम हो; अतः तुम्हें मुझसे ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए॥ ६--८॥

English

This sJraddlia mahatniya is ihedispelloi of all sins ami it is venerated by!iva, Brahma and the God sun. — 94.

अध्याय २२

श्लोक 17

यत्रास्ते नारसिंहस्तु स्वयमेव जनार्दनः तीर्थमिक्षुमती नाम पितॄणां वल्लभं सदा

yatrāste nārasiṃhastu svayameva janārdanaḥ tīrthamikṣumatī nāma pitṝṇāṃ vallabhaṃ sadā

हिन्दी अर्थ

देवयानी बोली--द्विजोत्तम ! तुम मेरे गुरुके पुत्र हो, मेरे पिताके नहीं; (अतः मेरे भाई नहीं लगते, पर) बार-बार मार डालते थे, तबसे लेकर आजतक तुम्हारे प्रति मेरा जो प्रेम रहा है, उसे तुम्हीं स्मरण करो। तुम्हे मेरे सौहार्द और अनुराग तथा मेरी उत्तम भक्तिका परिचय मिल चुका है। तुम धर्मके ज्ञाता भी हो। मैं मेरा त्याग करना (कदापि) उचित नहीं है

English

Here ends the twenty-siuv)nd chapter eanraeraHn the fi iwcd tlrlkas for

अध्याय २२

श्लोक 18

संगमे यत्र तिष्ठन्ति गङ्गायाः पितरः सदा कुरुक्षेत्रं महापुण्यं सर्वतीर्थसमन्वितम्

saṃgame yatra tiṣṭhanti gaṅgāyāḥ pitaraḥ sadā kurukṣetraṃ mahāpuṇyaṃ sarvatīrthasamanvitam

हिन्दी अर्थ

कचने कहा--उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली सुन्दरि ! तुम मुझे ऐसे कार्यमे प्रवृत्त कर रही हो, जो कदापि उचित नहीं है। शुभे! तुम मुझपर प्रसन्न हो जाओ। तुम मेरे लिये गुरुसे भी बढ़कर श्रेष्ठ हो विशाल नेत्र तथा चन्द्रमाके समान मुखवाली भामिनि! शुक्राचार्यके जिस उदरमें तुम रह चुकी हो, उसीमें मैं भी रहा हूँ। इसलिये भद्रे! धर्मकी दृष्टिसे तुम मेरी बहन हो; अतः शुभानने ! मुझसे ऐसी बात न कहो। कल्याणि! मैं तुम्हारे यहाँ बड़े सुखसे रहा

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 19

तथा च सरयूः पुण्या सर्वदेवनमस्कृता इरावती नदी तद्वत् पितृतीर्थाधिवासिनी

tathā ca sarayūḥ puṇyā sarvadevanamaskṛtā irāvatī nadī tadvat pitṛtīrthādhivāsinī

हिन्दी अर्थ

हूँ। तुम्हारे प्रति मेरे मनमें तनिक भी रोष नहीं है। अविरोधेन धर्मस्य स्मर्तव्योऽस्मि कथान्तरे हैत्यैरईहतस्त्वं यद्धर्तुबुद्धया त्वं रक्षितो मया

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 20

यमुना देविका काली चन्द्रभागा दृषद्वती नदी वेणुमती पुण्या परा वेत्रवती तथा

yamunā devikā kālī candrabhāgā dṛṣadvatī nadī veṇumatī puṇyā parā vetravatī tathā

हिन्दी अर्थ

यदि मां धर्मकामार्था प्रत्याख्यास्यसि धर्मतः। गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः काममेवं शपस्व माम्

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 21

पितॄणां वल्लभा ह्य् एताः श्राद्धे कोटिगुणा मताः जम्बूमार्गं महापुण्यं यत्र मार्गो हि लक्ष्यते

pitṝṇāṃ vallabhā hy etāḥ śrāddhe koṭiguṇā matāḥ jambūmārgaṃ mahāpuṇyaṃ yatra mārgo hi lakṣyate

हिन्दी अर्थ

आर्ष धर्म ब्रुवाणोऽहं देवयानि यथा त्वया। शप्तुं नाहोऽस्मि कल्याणि कामतोऽद्य च धर्मतः तस्माद् भवत्या यः कामो न तथा सम्भविष्यति। ऋषिपुत्रो न ते कश्चिज्जातु पाणिं ग्रहीष्यति फलिष्यति न मे विद्या त्वह्चश्चेति तत् तथा।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 22

अद्यापि पितृतीर्थं तत् सर्वकामफलप्रदम् नीलकुण्डमिति ख्यातं पितृतीर्थं द्विजोत्तमाः

adyāpi pitṛtīrthaṃ tat sarvakāmaphalapradam nīlakuṇḍamiti khyātaṃ pitṛtīrthaṃ dvijottamāḥ

हिन्दी अर्थ

एवमुक्त्वा नृपश्रेष्ठ देवयानीं कचस्तदा। तमागतमभिप्रेक्ष्य देवाः सेन्द्रपुरोगमाः।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 24

वंशोद्भेदं हरोद्भेदं गङ्गोद्भेदं महाफलम् भद्रेश्वरं विष्णुपदं नर्मदाद्वारमेव च

vaṃśodbhedaṃ harodbhedaṃ gaṅgodbhedaṃ mahāphalam bhadreśvaraṃ viṣṇupadaṃ narmadādvārameva ca

हिन्दी अर्थ

त्वं कचास्मद्द्रितं कर्म कृतवान् महदद्भुतम्। अब मैं जाऊँगा, इसलिये तुम्हारी आज्ञा चाहता हूँ; आशीर्वाद दो कि मार्गमें मेरा मङ्गल हो। धर्मकी अनुकूलता रखते हुए बातचीतके प्रसङ्गमें कभी मेरा भी स्मरण कर लेना और सदा सावधान एवं सजग रहकर मेरे गुरुदेव (अपने पिता शुक्राचार्य) की सेवामें लगी रहना ॥१२--१५ ३ ॥

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 25

गयापिण्डप्रदानेन समान्याहुर्महर्षयः एतानि पितृतीर्थानि सर्वपापहराणि च

gayāpiṇḍapradānena samānyāhurmaharṣayaḥ etāni pitṛtīrthāni sarvapāpaharāṇi ca

हिन्दी अर्थ

देवयानी बोली--कच ! हैत्योंद्वारा बार-बार तुम्हारे मारे जानेपर मैंने पति-बुद्धिसे ही तुम्हारी रक्षा की है (अर्थात् पिताद्वारा जीवनदान दिलाया है, इसीलिये) मैंने धर्मानुकूल कामके लिये तुमसे प्रार्थना की है। यदि तुम मुझे ठुकरा दोगे तो यह संजीविनी-विद्या तुम्हारे कोई काम न आयेगी

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 26

स्मरणादपि लोकानां किम् उ श्राद्धकृतां नृणाम् ॐकारं पितृतीर्थं च कावेरी कपिलोदकम्

smaraṇādapi lokānāṃ kim u śrāddhakṛtāṃ nṛṇām oṃkāraṃ pitṛtīrthaṃ ca kāverī kapilodakam

हिन्दी अर्थ

'कचने कहा--देवयानी! गुरुपुत्री समझकर ही मैंने तुम्हारे अनुरोधको टाल दिया है, तुममें कोई दोष देखकर नहीं । गुरुजी भी इसे जानते-मानते हैं । स्वेच्छासे मुझे शाप भी दे दो। बहन! मैं आर्ष-धर्मकी बात कर रहा था। इस दशामें तुम्हारे द्वारा शाप पानेके योग्य नहीं था। तुमने मुझे धर्मके अनुसार नहीं, कामके वशीभूत होकर आज शाप दिया है, इसलिये तुम्हारे मनमें जो कामना है, वह पूरी नहीं होगी। कोई भी ऋषिपुत्र (ब्राह्मणकुमार) कभी तुम्हारा पाणिग्रहण नहीं करेगा। तुमने जो मुझे यह कहा कि तुम्हारी विद्या सफल नहीं होगी, सो ठीक है; किंतु मैं जिसे यह पढ़ा दूँगा, उसकी विद्या तो सफल होगी ही

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 27

सम्भेदश् चण्डवेगायास् तथैवामरकण्टकम् कुरुक्षेत्राच्छतगुणं तस्मिन्स्नानादिकं भवेत्

sambhedaś caṇḍavegāyās tathaivāmarakaṇṭakam kurukṣetrācchataguṇaṃ tasminsnānādikaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

शौनकजी कहते हैं नृपश्रेष्ठ शतानीक ! द्विजश्रेष्ठ कच देवयानीसे ऐसा कहकर तत्काल बड़ी उतावलीके साथ इन्द्रलोकको चला गया। उसे आया देख इन्द्रादि ले आगे बढ़कर बड़ी प्रसन्नतासे कचसे इस प्रकार बोले

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 28

शुक्रतीर्थं च विख्यातं तीर्थं सोमेश्वरं परम् सर्वव्याधिहरं पुण्यं शतकोटिफलाधिकम्

śukratīrthaṃ ca vikhyātaṃ tīrthaṃ someśvaraṃ param sarvavyādhiharaṃ puṇyaṃ śatakoṭiphalādhikam

हिन्दी अर्थ

यह बड़ा अद्भुत कार्य किया है, अतः तुम्हारे यशका कभी लोप नहीं होगा और तुम यज्ञमें भाग पानेके अधिकारी होओगे इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते षड्विंशोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक छब्बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 29

श्राद्धे दाने तथा होमे स्वाध्याये जलसंनिधौ कायावरोहणं नाम तथा चर्मण्वती नदी

śrāddhe dāne tathā home svādhyāye jalasaṃnidhau kāyāvarohaṇaṃ nāma tathā carmaṇvatī nadī

हिन्दी अर्थ

कालस्त्वद्विक्रमस्याद्य जहि शत्रून् पुरंदर॥ तत्र वासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 30

गोमती वरणा तद्वत् तीर्थमौशनसं परम् भैरवं भृगुतुङ्गं च गौरीतीर्थमनुत्तमम्

gomatī varaṇā tadvat tīrthamauśanasaṃ param bhairavaṃ bhṛgutuṅgaṃ ca gaurītīrthamanuttamam

हिन्दी अर्थ

देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते॥ देवयान्युवाच देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप मृतसंजीविनी-विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कचसे उस विद्याको पढ़कर कृतार्थ हो गये। फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा- “पुरंदर! अब आपके लिये पराक्रम करनेका समय आ

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 31

तीर्थं वैनायकं नाम भद्रेश्वरमतः परम् तथा पापहरं नाम पुण्याथ तपती नदी

tīrthaṃ vaināyakaṃ nāma bhadreśvaramataḥ param tathā pāpaharaṃ nāma puṇyātha tapatī nadī

हिन्दी अर्थ

गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये।' संगठित होकर आये हुए देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्र "बहुत अच्छा' कहकर भूलोकमें आये। वहीं एक वनमें उन्होंने बहुत-सी स्त्रियोंको देखा । वह वन चैत्ररथ नामक देवोद्यानके समान मनोहर था। उसमें वे कन्याएँ जलक्रीडा कर रही थीं। इन्द्रने वायुका रूप धारण करके उनके सारे कपड़े परस्पर मिला दिये। तब वे सभी कन्याएँ एक साथ जलसे निकलकर अपने-अपने अनेक

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 32

मूलतापी पयोष्णी च पयोष्णीसंगमस्तथा महाबोधिः पाटला च नागतीर्थमवन्तिका

mūlatāpī payoṣṇī ca payoṣṇīsaṃgamastathā mahābodhiḥ pāṭalā ca nāgatīrthamavantikā

हिन्दी अर्थ

प्रकारके वस्त्र, जो निकट ही रखे हुए थे, लेने लगीं। उस सम्मिश्रणमें शर्मिष्ठाने देवयानीका वस्त्र ले लिया। शर्मिष्ठा वृषपर्वाकी पुत्री थी। दोनोंके वस्त्र मिल गये हैं, इस बातका उसे पता न था। राजेन्द्र! वस्त्रोंकी उस अदला-बदलीको लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा-दोनोंमें वहाँ परस्पर बड़ा भारी विरोध खड़ा हो गया देवयानी बोली--अरी दानवकी बेटी ! मेरी शिष्या

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 33

तथा वेणा नदी पुण्या महाशालं तथैव च महारुद्रं महालिङ्गं दशार्णा च नदी शुभा

tathā veṇā nadī puṇyā mahāśālaṃ tathaiva ca mahārudraṃ mahāliṅgaṃ daśārṇā ca nadī śubhā

हिन्दी अर्थ

होकर तू मेरा वस्त्र कैसे ले रही है? तू सञ्जनोंके उत्तम आचारसे शून्य है, अतः तेरा भला न होगा शर्मिष्ठाने कहा--अरी ! मेरे पिता बैठे हों या सो रहे हों, उस समय तेरा पिता विनयशील सेवकके समान नीचे खड़ा होकर बार-बार वन्दीजनोंकी भाँति उनकी स्तुति करता है। तू भिखमंगेकी बेटी है, तेरा बाप स्तुति करता और दान

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 34

शतरुद्रा शताह्वा च तथा विश्वपदं परम् अङ्गारवाहिका तद्वन् नदौ तौ शोणघर्घरौ

śatarudrā śatāhvā ca tathā viśvapadaṃ param aṅgāravāhikā tadvan nadau tau śoṇaghargharau

हिन्दी अर्थ

लेता है। मैं उनकी बेटी हूँ, जिनकी स्तुति की जाती है, जो सुताहं स्तूयमानस्य ददतो न तु गृह्णतः॥ १० दूसरोंको दान देते हैं और स्वयं किसीसे कुछ भी नहीं लेते! जैसे इन्द्रे वनका नाम नन्दन है, वैसे वरुणका उद्यान चैत्ररथ है।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 35

कालिका च नदी पुण्या वितस्ता च नदी तथा एतानि पितृतीर्थानि शस्यन्ते स्नानदानयोः

kālikā ca nadī puṇyā vitastā ca nadī tathā etāni pitṛtīrthāni śasyante snānadānayoḥ

हिन्दी अर्थ

लप्स्यसे प्रतियोद्धारं न च त्वां गणयाम्यहम् सा विस्मयं देवयानीं गतां सक्तां च वाससि। शर्मिष्ठा प्राक्षिपत् कूपे ततः स्वपुरमाविशत्

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 36

श्राद्धमेतेषु यद्दत्तं तदनन्तफलं स्मृतम् द्रोणी वाटनदी धारा सरित्क्षीरनदी तथा

śrāddhameteṣu yaddattaṃ tadanantaphalaṃ smṛtam droṇī vāṭanadī dhārā saritkṣīranadī tathā

हिन्दी अर्थ

हतेयमिति विज्ञाय शर्मिष्ठा पापनिश्चया। अनवेक्ष्य ययौ तस्मात् क्रोधवेगपरायणा नाहुषिः प्रेक्षमाणो हि स निपाते गतोदके । ददर्श कन्यां तां तत्र दीप्तामय्िशिखामिव का त्वं चारुमुखी श्यामा सुमृष्टमणिकुण्डला। दीर्घ ध्यायसि चात्यर्थं कस्माच्छ्वसिषि चातुरा

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 37

गोकर्णं गजकर्णं च तथा च पुरुषोत्तमः द्वारका कृष्णतीर्थं च तथार्बुदसरस्वती

gokarṇaṃ gajakarṇaṃ ca tathā ca puruṣottamaḥ dvārakā kṛṣṇatīrthaṃ ca tathārbudasarasvatī

हिन्दी अर्थ

देवयान्युवाच योऽसौ देवैर्हतान् हैत्यानुत्थापयति विद्यया। तस्य शुक्रस्य कन्याहं त्वं मां नूनं न बुध्यसे अरी भिक्षुकि! तू खाली हाथ है, तेरे पास कोई अस्त्र-शस्त्र भी नहीं है। और देख ले, मेरे पास हथियार है। इसलिये तू मेरे ऊपर व्यर्थ ही क्रोध कर रही है। यदि लड़ना ही चाहती है तो इधरसे भी डटकर सामना करनेवाली मुझ-जैसी योद्ध्री

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 38

नदी मणिमती नाम तथा च गिरिकर्णिका धूतपापं तथा तीर्थं समुद्रो दक्षिणस्तथा

nadī maṇimatī nāma tathā ca girikarṇikā dhūtapāpaṃ tathā tīrthaṃ samudro dakṣiṇastathā

हिन्दी अर्थ

तुझे मिल जायगी । मैं तुझे कुछ भी नहीं गिनती ॥९--११॥ शौनकजी कहते हैं- शतानीक ! यह सुनकर देवयानी आश्चर्यचकित हो गयी और शर्मिष्ठाके शरीरसे अपने वस्त्रको खींचने लगी । यह देख शर्मिष्ठाने उसे कुएँमें ढकेल दिया और अब वह (डूबकर) मर गयी होगी-एऐसा समझकर पापमय विचारवाली शर्मिष्ठा नगरको लौट आयी। वह क्रोधके आवेशमें थी, अतः देवयानीकी ओर देखे बिना घर लौट गयी। तदनन्तर नहुषपुत्र ययाति उस स्थानपर आये। उनके रथके वाहन तथा अन्य घोड़े भी थक गये थे। वे भी थकावरसे चूर हो गये थे। वे एक हिंसक पशुको पकड्नेके लिये उसके पीछे-पीछे आये थे और प्याससे कष्ट पा रहे थे। ययाति उस जलशून्य कूपको देखने लगे। वहाँ उन्हें अग्रिशिखाके समान

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 39

एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते तीर्थं मेघकरं नाम स्वयमेव जनार्दनः

eteṣu pitṛtīrtheṣu śrāddhamānantyamaśnute tīrthaṃ meghakaraṃ nāma svayameva janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

तेजस्विनी एक कन्या दिखायी दी, जो देवाङ्गनाके समान मधुर वचनोंद्वारा शान्तभावसे उसे आश्वासन दिया और

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 40

यत्र शार्ङ्गधरो विष्णुर् मेखलायामवस्थितः तथा मन्दोदरीतीर्थं तीर्थं चम्पा नदी शुभा

yatra śārṅgadharo viṣṇur mekhalāyāmavasthitaḥ tathā mandodarītīrthaṃ tīrthaṃ campā nadī śubhā

हिन्दी अर्थ

है। तुम्हारी अवस्था भी अभी बहुत अधिक नहीं दीखती। तुम्हारे कानोंके मणिमय कुण्डल अत्यन्त सुन्दर और चमकीले हैं। तुम किसी अत्यन्त घोर चिन्तामें पड़ी हो। आतुर होकर लम्बी साँस क्यों ले रही हो तृण और लताओंसे ढके हुए इस कुएँमें कैसे गिर पड़ी? तुम किसकी पुत्री हो? सब ठीक-ठीक बताओ' देवयानी बोली--जो देवताओंद्वारा मारे गये हैत्योंको अपनी विद्याके बलसे जिलाया करते हैं, उन्हीं शुक्राचार्यकी मैं पुत्री हूँ। निश्चय ही आप मुझे पहचानते नहीं हैं। महाराज! लाल नख और अङ्गुलियाँसे युक्त यह मेरा

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 41

तथा सामलनाथश्च महाशालनदी तथा चक्रवाकं चर्मकोटं तथा जन्मेश्वरं महत्

tathā sāmalanāthaśca mahāśālanadī tathā cakravākaṃ carmakoṭaṃ tathā janmeśvaraṃ mahat

हिन्दी अर्थ

दाहिना हाथ है। इसे पकड़कर आप इस कुएँसे मेरा उद्धार कीजिये। मैं जानती हूँ, आप उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए नरेश हैं। मुझे यह भी ज्ञात है कि आप परम शान्त स्वभाववाले, पराक्रमी तथा यशस्वी वीर हैं। इसलिये इस कुएँमें गिरी हुई मुझ अबलाका आप यहाँसे उद्धार कीजिये

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 42

अर्जुनं त्रिपुरं चैव सिद्धेश्वरमतः परम् श्रीशैलं शांकरं तीर्थं नारसिंहमतः परम्

arjunaṃ tripuraṃ caiva siddheśvaramataḥ param śrīśailaṃ śāṃkaraṃ tīrthaṃ nārasiṃhamataḥ param

हिन्दी अर्थ

शौनकजी कहते हैं-शतानीक ! तदनन्तर नहुषपुत्र राजा ययातिने देवयानीको ब्राह्मण-कन्या जानकर उसका दाहिना हाथ अपने हाथमें ले उसे उस कुएँसे बाहर निकाला इस प्रकार वेगपूर्वक उसे कुएँसे बाहर निकालकर राजा ययाति सुन्दरी देवयानीकी अनुमति लेकर अपने गते तु नाहुषे तस्मिन् देवयान्यप्यनिन्दिता। उवाच शोकसंतप्ता घूणिकामागतां पुनः

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 43

महेन्द्रं च तथा पुण्यम् अथ श्रीरङ्गसंज्ञितम् एतेष्वपि सदा श्राद्धम् अनन्तफलदं स्मृतम्

mahendraṃ ca tathā puṇyam atha śrīraṅgasaṃjñitam eteṣvapi sadā śrāddham anantaphaladaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

देवयान्युवाच त्वरितं घूर्णिके गच्छ सर्वमाचक्ष्व मे पितुः। नेदानीं तु प्रवेक्ष्यामि नगरं वृषपर्वणः सा तु वै त्वरितं गत्वा घूर्णिकासुरमन्दिरम्। दृष्टा काव्यमुवाचेदं कम्पमाना विचेतना

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 44

दर्शनादपि चैतानि सद्यः पापहराणि वै तुङ्गभद्रा नदी पुण्या तथा भीमरथी सरित्

darśanādapi caitāni sadyaḥ pāpaharāṇi vai tuṅgabhadrā nadī puṇyā tathā bhīmarathī sarit

हिन्दी अर्थ

आचख्यौ च महाभागा देवयानी वने हता। शर्मिष्ठया महाप्राज्ञ दुहित्रा वृषपर्वणः श्रुत्वा दुहितरं काव्यस्तदा शर्मिष्ठया हताम्। त्वरया निर्ययौ दुःखान्मार्गमाणः सुतां वने दृष्टा दुहितरं काव्यो देवयानीं ततो बने। बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य दुःखितो वाक्यमब्रवीत्

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 45

भीमेश्वरं कृष्णवेणा कावेरी कुड्मला नदी नदी गोदावरी नाम त्रिसंध्या तीर्थमुत्तमम्

bhīmeśvaraṃ kṛṣṇaveṇā kāverī kuḍmalā nadī nadī godāvarī nāma trisaṃdhyā tīrthamuttamam

हिन्दी अर्थ

देवयान्युवाच निष्कृतिर्वास्तु वा मास्तु शृणुष्वावहितो मम। शर्मिष्ठया यदुक्तास्मि दुहित्रा वृषपर्वणः सत्यं किलैतत् सा प्राह हैत्यानामस्मि गायना। एवं हि मे कथयति शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 46

तीर्थं त्रैयम्बकं नाम सर्वतीर्थनमस्कृतम् यत्रास्ते भगवानीशः स्वयमेव त्रिलोचनः

tīrthaṃ traiyambakaṃ nāma sarvatīrthanamaskṛtam yatrāste bhagavānīśaḥ svayameva trilocanaḥ

हिन्दी अर्थ

यद्यहं स्तुवतस्तात दुहिता प्रतिगृह्ूतः। प्रसादयिष्ये शर्मिष्ठामित्युक्ता हि सखी मया नगरको चले गये। नहुषनन्दन ययातिके चले जानेपर सती-साध्वी देवयानी शोकसे संतप्त हो अपने सामने आयी हुई धाय घूर्णिकासे बोली देवयानीने कहा--घूर्णिके ! तुम तुरंत वेगपूर्वक यहाँसे जाओ और शीघ्र मेरे पिताजीसे सब वृत्तान्त कह दो। अब मैं (राजा) वृषपर्वाके नगरमें प्रवेश नहीं करूँगी- उस नगरमें पैर नहीं रखूँगी

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 47

श्राद्धमेतेषु सर्वेषु कोटिकोटिगुणं भवेत् स्मरणादपि पापानि नश्यन्ति शतधा द्विजाः

śrāddhameteṣu sarveṣu koṭikoṭiguṇaṃ bhavet smaraṇādapi pāpāni naśyanti śatadhā dvijāḥ

हिन्दी अर्थ

शौनकजी कहते हैं- शतानीक! देवयानीकी बात सुनकर घूर्णिका तुरंत असुरराजके महलमें गयी और वहाँ शुक्राचार्यको देखकर काँपती हुई उसने सम्भ्रमपूर्ण चित्तसे वह बात बतला दी। उसने कहा-- महाप्राज्ञ! वृषपर्वाको पुत्री शर्मिष्ठाके द्वारा देवयानी वनमें मार डाली (मृततुल्य कर दी) गयी है।' अपनी पुत्रीको शर्मिष्ठाद्वारा मृततुल्य को गयी सुनकर शुक्राचार्य बड़ी उतावलीके साथ निकले और दु:खी होकर उसे वनमें ढूँढने लगे।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 48

श्रीपर्णी ताम्रपर्णी च जया तीर्थमनुत्तमम् तथा मत्स्यनदी पुण्या शिवधारं तथैव च

śrīparṇī tāmraparṇī ca jayā tīrthamanuttamam tathā matsyanadī puṇyā śivadhāraṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वनमें अपनी बेटी देवयानीको देखकर शुक्रा चार्यने दोनों भुजाओंसे उठाकर उसे हृदयसे लगा लिया और दुःखी होकर कहा-'बेटी! सब लोग अपने ही दोष और गुणोंसे-अशुभ या शुभ कर्मासे दु:ख एवं सुखमें पड़ते हैं । मालूम होता है, तुमसे कोई बुरा कर्म बन गया था, जिसका तुमने इस रूपें प्रायश्चित्त किया है'॥ २६--३० ॥ देवयानी बोली पिताजी ! मुझे अपने कर्मोके फलसे

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 49

भद्रतीर्थं च विख्यातं पम्पातीर्थं च शाश्वतम् पुण्यं रामेश्वरं तद्वद् एलापुरमलं पुरम्

bhadratīrthaṃ ca vikhyātaṃ pampātīrthaṃ ca śāśvatam puṇyaṃ rāmeśvaraṃ tadvad elāpuramalaṃ puram

हिन्दी अर्थ

निस्तार हो या न हो, आप मेरी बात ध्यान देकर सुनिये। वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने आज मुझसे जो कुछ कहा है, क्या यह सच है? वह कहती है-मैं भारोंकी तरह हैत्योंके गुण गाया करती हूँ। वृषपर्वाकी लाडली शर्मिष्ठा क्रोधसे लाल आँखें करके आज मुझसे इस प्रकार अत्यन्त तीखे और कठोर वचन कह रही थी। 'देवयानी! तू स्तुति करनेवाले, नित्य भीख माँगनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी है और मैं तो उन महाराजकी पुत्री हूँ, जिनकी तुम्हारे पिता स्तुति करते

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 50

अङ्गभूतं च विख्यातम् आमर्दकम् अलम्भुषम् आम्रातकेश्वरं तद्वद् एकाम्भकमतः परम्

aṅgabhūtaṃ ca vikhyātam āmardakam alambhuṣam āmrātakeśvaraṃ tadvad ekāmbhakamataḥ param

हिन्दी अर्थ

हैं, जो स्वयं दान देते हैं और लेते (किसीसे) एक अधेला भी नहीं हैं।' वृषपर्वाकी बेटी शर्मिष्ठाने आज मुझसे ऐसी बात कही है । कहते समय उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। वह भारी घमंडसे भरी हुई थी। तात! यदि सचमुच मैं स्तुति करनेवाले और दान लेनेवालेकी बेटी हूँ तो मैं शर्मिष्ठाको अपनी सेवाओंद्वारा प्रसन्न करूँगी । यह बात मैंने अपनी सखीसे कह दी थी। (मेरे ऐसा कहनेपर भी अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई शर्मिष्ठे उस निर्जन वनमें मुझे पकड़कर कुएँमें ढकेल दिया। उसके बाद वह अपने घर चली गयी) ॥ ३१--३५॥

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 51

गोवर्धनं हरिश्चन्द्रं कृपुचन्द्रं पृथूदकम् सहस्राक्षं हिरण्याक्षं तथा च कदली नदी

govardhanaṃ hariścandraṃ kṛpucandraṃ pṛthūdakam sahasrākṣaṃ hiraṇyākṣaṃ tathā ca kadalī nadī

हिन्दी अर्थ

अतस्त्वं स्तूयमानस्य दुहिता देवयान्यसि वृषपर्वैव तद् वेद शक्रो राजा च नाहुषः।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 52

रामाधिवासस्तत्रापि तथा सौमित्रिसंगमः इन्द्रकीलं महानादं तथा च प्रियमेलकम्

rāmādhivāsastatrāpi tathā saumitrisaṃgamaḥ indrakīlaṃ mahānādaṃ tathā ca priyamelakam

हिन्दी अर्थ

शुक्राचार्यने कहा--देवयानी ! तू स्तुति करनेवाले, भीख माँगनेवाले या दान लेनेवालेकी बेटी नहीं है। तू उस पवित्र ब्राह्मणकी पुत्री है, जो किसीकी स्तुति नहीं करता और जिसकी सब लोग स्तुति करते हैं। इस बातको वृषपर्वा, देवराज इन्द्र तथा राजा ययाति जानते हैं। निर्द्न्द्र अचिन्त्यं ब्रह्म नि्न्द्वमैश्वरं हि बलं मम॥ ३७ अचित्त्य ब्रह्म ही मेरा ऐश्वर्ययुक्त बल है

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 53

एतान्यपि सदा श्राद्धे प्रशस्तान्यधिकानि तु एतेषु सर्वदेवानां सांनिध्यं दृश्यते यतः

etānyapi sadā śrāddhe praśastānyadhikāni tu eteṣu sarvadevānāṃ sāṃnidhyaṃ dṛśyate yataḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते सम्तविंशोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययातिचरित नामक सत्ताईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 54

दानमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशताधिकम् बाहुदा च नदीपुण्या तथा सिद्धवनं शुभम्

dānameteṣu sarveṣu dattaṃ koṭiśatādhikam bāhudā ca nadīpuṇyā tathā siddhavanaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

शुक्राचार्यद्वारा देवयानीको समझाना और देवयानीका असंतोष देवयानि विजानीहि तेन सर्वमिदं जितम् यः समुत्पतितं कोपं क्षमयैव निरस्यति। यथोरगस्त्वचं जीर्णा स वै पुरुष उच्यते

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 55

तीर्थं पाशुपतं नाम नदी पार्वतिका शुभा श्राद्धमेतेषु सर्वेषु दत्तं कोटिशतोत्तरम्

tīrthaṃ pāśupataṃ nāma nadī pārvatikā śubhā śrāddhameteṣu sarveṣu dattaṃ koṭiśatottaram

हिन्दी अर्थ

यस्तु भावयते धर्म योऽतिमात्रं तितिक्षति। यस्य तप्तो न तपति भृशं सोऽर्थस्य भाजनम् शुक्राचार्यने कहा--बेटी देवयानी ! तुम इसे निश्चय जानो, जो मनुष्य सदा दूसरोंके कठोर वचन (दूसरोंद्वारा को हुई अपनी निन्दा)-को सह लेता है, उसने मानो इस सम्पूर्ण जगतूपर विजय प्राप्त कर ली। जो उभरे

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 56

तथैव पितृतीर्थं तु यत्र गोदावरी नदी युता लिङ्गसहस्रेण सर्वान्तरजलावहा

tathaiva pitṛtīrthaṃ tu yatra godāvarī nadī yutā liṅgasahasreṇa sarvāntarajalāvahā

हिन्दी अर्थ

हुए क्रोधको घोड़ेके समान वशमें कर लेता है, वही सत्पुरुषोंद्वारा सच्चा सारथि कहा गया है; जो केवल बागडोर या लगाम पकड़कर लटकता रहता है, वह नहीं। देवयानी! जो उत्पन्न हुए क्रोधको अक्रोध (क्षमाभाव)-द्वारा मनसे निकाल देता है, समझ लो, उसने सम्पूर्ण जगतूको जीत लिया। जैसे साँप पुरानी केंचुल छोड़ता है, उसी प्रकार जो मनुष्य उभड्नेवाले क्रोधको वहीं क्षमाद्वारा त्याग देता है, वही श्रेष्ठ पुरुष कहा गया है। जो श्रद्धापूर्वक धर्माचरण करता है, कड़ी- से-कड़ी निन्दा सह लेता है और दूसरेके सतानेपर भी दुःखी नहीं होता, वही सब पुरुषार्थोका सुदृढ़ पात्र है। एक व्यक्ति, जो सौ वर्षांतक प्रत्येक मासमें अश्वमेधयज्ञ

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 57

जामदग्न्यस्य तत्तीर्थं क्रमादायातमुत्तमम् प्रतीकस्य भयाद्भिन्नं यत्र गोदावरी नदी

jāmadagnyasya tattīrthaṃ kramādāyātamuttamam pratīkasya bhayādbhinnaṃ yatra godāvarī nadī

हिन्दी अर्थ

करता जाता है और दूसरा जो किसीपर भी क्रोध नहीं करता, उन दोनोंमें क्रोध न करनेवाला ही श्रेष्ठ है। अबोध बालक और बालिकाएँ अज्ञानवश आपसमें जो वैर-विरोध करते हैं, उसका अनुकरण समझदार मनुष्योंको नहीं करना चाहिए; क्योंकि वे नादान बालक दूसरोंके

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 58

तत्तीर्थं हव्यकव्यानाम् अप्सरोयुगसंज्ञितम् श्राद्धाग्निकार्यदानेषु तथा कोटिशताधिकम्

tattīrthaṃ havyakavyānām apsaroyugasaṃjñitam śrāddhāgnikāryadāneṣu tathā koṭiśatādhikam

हिन्दी अर्थ

नैतत् प्राज्ञस्तु कुर्वीत विदुस्ते न बलाबलम्॥ ७ बलाबलको नहीं जानते ॥१--७॥ वेदाहं तात बालापि कार्याणां तु गतागतम्। क्रोधे चैवातिवादे वा कार्यस्यापि बलाबले असत्संकीर्णवृत्तेषु वासो मम न रोचते

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 59

तथा सहस्रलिङ्गं च राघवेश्वरमुत्तमम् सेन्द्रफेना नदी पुण्या यत्रेन्द्रः पतितः पुरा

tathā sahasraliṅgaṃ ca rāghaveśvaramuttamam sendraphenā nadī puṇyā yatrendraḥ patitaḥ purā

हिन्दी अर्थ

न तेषु निवसेत् प्राज्ञः श्रेयोऽर्थी पापबुद्द्रिषु न ह्यतो दुष्करं मन्ये तात लोकेष्वपि त्रिषु।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 60

निहत्य नमुचिं शक्रस् तपसा स्वर्गमाप्तवान् तत्र दत्तं नरैः श्राद्धम् अनन्तफलदं भवेत्

nihatya namuciṃ śakras tapasā svargamāptavān tatra dattaṃ naraiḥ śrāddham anantaphaladaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

देवयानी बोली--पिताजी ! यद्यपि में अभी (नादान) बालिका हूँ, फिर भी धर्म-अधर्मका अन्तर समझती हूँ। क्षमा और निन्दाकी सबलता और निर्बलताका भी मुझे ज्ञान है; परंतु जो शिष्य होकर भी शिष्योचित बर्ताव नहीं करता, अपना हित चाहनेवाले गुरुको उसकी धृष्टता क्षमा नहीं करनी चाहिए इसलिये इन संकीर्ण आचार-विचारवाले दानवोंके बीच निवास करना अब मुझे अच्छा नहीं लगता। जो पुरुष दूसरोंके सदाचार और कुलकी निन्दा करते हैं, उन पापपूर्ण विचारवाले मनुष्योंमें कल्याणकी इच्छावाले विद्वान् पुरुषको नहीं रहना चाहिए। जो लोग आचार, व्यवहार अथवा कुलीनताकी प्रशंसा करते हों, उन साधु पुरुषाँमें ही निवास करना चाहिए और वही निवास श्रेष्ठ

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 61

तीर्थं तु पुष्करं नाम शालग्रामं तथैव च सोमपानं च विख्यातं यत्र वैश्वानरालयम्

tīrthaṃ tu puṣkaraṃ nāma śālagrāmaṃ tathaiva ca somapānaṃ ca vikhyātaṃ yatra vaiśvānarālayam

हिन्दी अर्थ

कहा जाता है । तात! वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने जो अत्यन्त भयंकर दुर्वचन कहा है, वह मेरे हृदयको ठीक उसी तरह मथ रहा है, जैसे अग्नि प्रकट करनेकी इच्छावाला पुरुष अरणीकाष्ठका मन्थन करता है। इससे बढ़कर महान् दु:खको बात मैं तीनों लोकोंमें और कुछ नहीं मानती, जो स्वयं श्रीहीन होकर शत्रुओंकी चमकती हुई (सातिशय) लक्ष्मीको उपासना करता है (उस दु:खी मनुष्यका तो मर

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 62

तीर्थं सारस्वतं नाम स्वामितीर्थं तथैव च मलंदरा नदी पुण्या कौशिकी चन्द्रिका तथा

tīrthaṃ sārasvataṃ nāma svāmitīrthaṃ tathaiva ca malaṃdarā nadī puṇyā kauśikī candrikā tathā

हिन्दी अर्थ

यः सपत्नश्रियं दीप्तां हीनश्रीः पर्युपासते॥ १३ जाना ही अच्छा है।) इति श्रीमत्स्ये महापुराणे ययातिचरितेऽष्टाविंशोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें ययातिचरितविषयक अट्टाईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 63

वैदर्भा वाथ वैरा च पयोष्णी प्राङ्मुखा परा कावेरी चोत्तरा पुण्या तथा जालंधरो गिरिः

vaidarbhā vātha vairā ca payoṣṇī prāṅmukhā parā kāverī cottarā puṇyā tathā jālaṃdharo giriḥ

हिन्दी अर्थ

शुक्राचार्यका वृषपर्वाको फटकारना तथा उसे छोड़कर जानेके लिये उद्यत होना और वृषपर्वाके आदेशसे शर्मिष्ठाका देवयानीकी दासी बनकर शुक्राचार्य तथा देवयानीको संतुष्ट करना ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 64

एतेषु श्राद्धतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमश्नुते लोहदण्डं तथा तीर्थं चित्रकूटस्तथैव च

eteṣu śrāddhatīrtheṣu śrāddhamānantyamaśnute lohadaṇḍaṃ tathā tīrthaṃ citrakūṭastathaiva ca

हिन्दी अर्थ

नाधर्मश्चरितो राजन् सद्यः फलति गौरिव। शनैरावर्त्यमानस्तु मूलान्यपि निकृन्तति शौनकजी कहते हैं- शतानीक! देवयानीकी बात सुनकर भृगुश्रेष्ठ शुक्राचार्य बड़े क्रोधमें भरकर वृषपर्वाके समीप गये। वह राजसिंहासनपर बैठा हुआ था । शुक्राचार्यजीने बिना कुछ सोचे-विचारे उससे इस प्रकार कहना आरम्भ किया--' राजन्! जो (लोकमें) अधर्म किया जाता है, उसका फल तुरंत नहीं मिलता जैसे गायकी सेवा करनेपर धीरे- धीरे कुछ कालके बाद वह ब्याती और दूध देती है अथवा धरतीको जोत-बोकर बीज डालनेसे कुछ कालके बाद

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 65

विन्ध्ययोगश्च गङ्गायास् तथा नदीतटं शुभम् कुब्जाभ्रं तु तथा तीर्थम् उर्वशीपुलिनं तथा

vindhyayogaśca gaṅgāyās tathā nadītaṭaṃ śubham kubjābhraṃ tu tathā tīrtham urvaśīpulinaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

पौधा उगता और यथासमय फल देता है, उसी प्रकार किया जानेवाला अधर्म धीरे-धीरे जड़ काट देता है। यदि वह (पापसे उपार्जित द्रव्यका) दुष्परिणाम न अपने ऊपर दिखायी देता है, न पुत्रों अथवा नाती-पोतोंपर ही तो वह इसत्रिवर्गका त्रिवर्गमतिवर्तते॥ ३ अतिक्रमण करके आगेकी पीढ़ियोंपर अवश्य प्रकट होता है।

English

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अध्याय २२

श्लोक 66

संसारमोचनं तीर्थं तथैव ऋणमोचनम् एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धम् आनन्त्यमश्नुते

saṃsāramocanaṃ tīrthaṃ tathaiva ṛṇamocanam eteṣu pitṛtīrtheṣu śrāddham ānantyamaśnute

हिन्दी अर्थ

फलत्येवं ध्रुवं पापं गुरुभुक्तमिवादरे। यदा घातयसे विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषुं मद्गृहे रतम्। वधादनईतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम अद्येवमभिजानामि हैत्यं मिथ्याप्रलापिनम्।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 67

अट्टहासं तथा तीर्थं गौतमेश्वरमेव च तथा वसिष्ठतीर्थं नु हारीतं तु ततः परम्

aṭṭahāsaṃ tathā tīrthaṃ gautameśvarameva ca tathā vasiṣṭhatīrthaṃ nu hārītaṃ tu tataḥ param

हिन्दी अर्थ

यतस्त्वमात्मनोदीर्णा दुहितां किमुपेक्षसे त्वयि सत्यं च धर्मश्च तत् प्रसीदतु मां भवान्

English

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अध्याय २२

श्लोक 68

ब्रह्मावर्तं कुशावर्तं हयतीर्थं तथैव च पिण्डारकं च विख्यातं शङ्खोद्धारं तथैव च

brahmāvartaṃ kuśāvartaṃ hayatīrthaṃ tathaiva ca piṇḍārakaṃ ca vikhyātaṃ śaṅkhoddhāraṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

प्रसाद्यतां देवयानीं जीवितं यत्र मे स्थितम्। योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः यत्किंचिदस्ति द्रविणं हैत्येन्द्राणां महासुर। जैसे खाया हुआ गरिष्ठ अन्न तुरंत नहीं तो कुछ देर बाद अवश्य ही पेटमें उपद्रव करता है, उसी प्रकार किया हुआ पाप भी निश्चय ही अपना फल देता है। राजन्! अङ्गिराका पौत्र कच विशुद्ध ब्राह्मण है। वह स्वभावसे

English

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अध्याय २२

श्लोक 69

घण्टेश्वरं बिल्वकं च नीलपर्वतमेव च तथा च धरणीतीर्थं रामतीर्थं तथैव च

ghaṇṭeśvaraṃ bilvakaṃ ca nīlaparvatameva ca tathā ca dharaṇītīrthaṃ rāmatīrthaṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

ही निष्पाप और धर्मज्ञ है तथा उन दिनों मेरे घरमें रहकर निरन्तर मेरी सेवामें संलग्न था, परंतु तुमने उसका बार-बार वध करवाया था। वृषपर्वन्! ध्यान देकर मेरी यह बात सुन लो, तुम्हारे द्वारा पहले वधके अयोग्य ब्रा्मणका वध किया गया है और अब मेरी पुत्री देवयानीका भी वध करनेके लिये उसे कुएँमें ढकेला गया है। इन दोनों हत्याओंके कारण मैं तुमको और तुम्हारे भाई-बन्धुओंको त्याग दूँगा। राजन् ! तुम्हारे राज्यमें

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 70

अश्वतीर्थं च विख्यातम् अनन्तं श्राद्धदानयोः तीर्थं वेदशिरो नाम तथैवौघवती नदी

aśvatīrthaṃ ca vikhyātam anantaṃ śrāddhadānayoḥ tīrthaṃ vedaśiro nāma tathaivaughavatī nadī

हिन्दी अर्थ

और तुम्हारे साथ मैं एक क्षण भी नहीं ठहर सकूँगा। हैत्यराज! आज मैं तुम-जैसे मिथ्याप्रलापी हैत्यको भलीभाँति समझ सका हूँ। तुम अपनी पुत्रीके उद्धत स्वभावकी उपेक्षा क्यों कर रहे हो?'॥ १--७॥ अनुचित या मिथ्या भाषण नहीं किया। आपमें धर्म और सत्य सदा प्रतिष्ठित हैं। अतः आप हमलोगोंपर कृपा करके प्रसन्न होइये! भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर चले जाते हैं तो मैं (तुरन्त) समुद्रमें प्रवेश कर जाऊँगा; क्योंकि हमारे लिये फिर दूसरी कोई गति नहीं है

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 71

तीर्थं वसुप्रदं नाम छागलाण्डं तथैव च एतेषु श्राद्धदातारः प्रयान्ति परमं पदम्

tīrthaṃ vasupradaṃ nāma chāgalāṇḍaṃ tathaiva ca eteṣu śrāddhadātāraḥ prayānti paramaṃ padam

हिन्दी अर्थ

शुक्राचार्यने कहा असुरो! तुम लोग समुद्रमें घुस जाओ अथवा चारों दिशाओंमें भाग जाओ, मैं अपनी पुत्रीके प्रति किया गया अप्रिय बर्ताव नहीं सह सकता; क्योंकि वह मुझे अत्यन्त प्रिय है। तुम देवयानीको प्रसन्न करो; क्योंकि उसीमें मेरे प्राण बसते हैं। उसके प्रसन्न हो जानेपर इन्द्रके पुरोहित बृहस्पतिकी भाँति मैं तुम्हारे योगक्षेमका वहन करता रहूँगा

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 72

तथाच बदरीतीर्थं गणतीर्थं तथैव च जयन्तं विजयं चैव शक्रतीर्थं तथैव च

tathāca badarītīrthaṃ gaṇatīrthaṃ tathaiva ca jayantaṃ vijayaṃ caiva śakratīrthaṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

वृषपर्वा बोले भृगुनन्दन! असुरेश्वरोके पास इस भूतलपर जो कुछ भी सम्पत्ति तथा हाथी-घोड़े आदि पशुधन है, उसके और मेरे भी आप ही स्वामी हें शुक्राचार्यने कहा--महान् असुर! हैत्यराजोंका जो कुछ भी धन-वैभव है, यदि उसका स्वामी मैं ही तस्येश्वरोऽस्मि यद्येतद् देवयानी प्रसाद्यताम्॥ १३ हूँ तो उसके द्वारा इस देवयानीको प्रसन्न करो

English

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अध्याय २२

श्लोक 73

श्रीपतेश्च तथा तीर्थं तीर्थं रैवतकं तथा तथैव शारदातीर्थं भद्रकालेश्वरं तथा

śrīpateśca tathā tīrthaṃ tīrthaṃ raivatakaṃ tathā tathaiva śāradātīrthaṃ bhadrakāleśvaraṃ tathā

हिन्दी अर्थ

२२१५४ मत्स्यपुराण ी शुक्राचार्य तुरंत ही राजा वृषपर्वाके साथ अपनी पुत्री

English

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अध्याय २२

श्लोक 74

वैकुण्ठतीर्थं च परं भीमेश्वरमथापि वा एतेषु श्राद्धदातारः प्रयान्ति परमां गतिम्

vaikuṇṭhatīrthaṃ ca paraṃ bhīmeśvaramathāpi vā eteṣu śrāddhadātāraḥ prayānti paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

ततस्तु त्वारः शुक्रस्तेत ना हस सती देवयानीके पास पहुँचे और उससे बोले--' सुभगे ! तुम्हारी उवाच चैनां सुभगे प्रतिपन्नं वचस्तव॥ १४ बात पूरी हो गयी' देवयान्युवाच तब देवयानीने कहा--तात भार्गव ! ' आप राजाके यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव धनके स्वामी हैं” मैं इस बातको आपके कहनेसे नहीं ४ मानूँगी। राजा स्वयं कहें तो हमें विश्वास होगा

English

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अध्याय २२

श्लोक 75

तीर्थं मातृगृहं नाम करवीरपुरं तथा कुशेशयं च विख्यातं गौरीशिखरमेव च

tīrthaṃ mātṛgṛhaṃ nāma karavīrapuraṃ tathā kuśeśayaṃ ca vikhyātaṃ gaurīśikharameva ca

हिन्दी अर्थ

नाभिजानामि तत्तेऽहं राजा वदतु मां स्वयम्॥ १५ र हिता ह ह १) वृषपर्वा बोले-पवित्र मुसकानवाली देवयानी! तुम जिस वस्तुको पाना चाहती हो, वह यदि अत्यन्त यं काममभिजानासि देवयानि शुचिस्मिते। दुर्लभ हो तो भी मैं उसे तुम्हें अवश्य दूँगा (यह तुम तत्तेऽहं सम्प्रदास्यामि यद्यपि स्यात् सुदुर्लभम्॥ १६ विश्वास करो) ॥ १६॥ =

English

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अध्याय २२

श्लोक 76

नकुलेशस्य तीर्थं च कर्दमालं तथैव च दिण्डिपुण्यकरं तद्वत् पुण्डरीकपुरं तथा

nakuleśasya tīrthaṃ ca kardamālaṃ tathaiva ca diṇḍipuṇyakaraṃ tadvat puṇḍarīkapuraṃ tathā

हिन्दी अर्थ

देवयान्युवाच देवयानीने कहा-- मैं चाहती हूँ, शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओंके साथ मेरी दासी बनकर रहे और पिताजी जहाँ मेरा विवाह करें, वहाँ भी वह मेरे साथ जाय अनुयास्यति मां तत्र यत्र दास्यति मे पिता॥ १७ यह सुनकर वृषपर्वाने धायसे कहा- धातरि! तुम वृषपर्वोचाच उठो, जाओ और शर्मिष्ठाको (यहाँ) शीघ्र बुला लाओ उत्तिष्ठ धात्रि गच्छ त्वं शर्मिष्ठा शीध्रमानय। एवं देवयानीकी जिस वस्तुकी कामना हो, उसे वह पूर्ण यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम्॥ १८ करे शनक उवाच शौनकजी कहते हैं--तब धायने शर्मिष्ठाके पास ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठामिदमब्रवीत्। जाकर कहा--' भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने जाति- उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह॥ १९ भाइयोंको सुख पहुँचाओ। a sa राजकुमारी ! आज अं सो कावित कॉम स काटा पलमा शुक्राचार्य देवयानीके कहनेसे अपने शिष्यों-यजमानोंको

English

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अध्याय २२

श्लोक 77

सप्तगोदावरीतीर्थं सर्वतीर्थेश्वरेश्वरम् तत्र श्राद्धं प्रदातव्यम् अनन्तफलमीप्सुभिः

saptagodāvarītīrthaṃ sarvatīrtheśvareśvaram tatra śrāddhaṃ pradātavyam anantaphalamīpsubhiḥ

हिन्दी अर्थ

त्याग रहे हैं । अत: देवयानीकी जो कामना हो, वह तुम्हे दासी त्वमभिजातासि देवयान्याः सुशोभने॥ २० पूर्ण करनी चाहिए। सुशोभने! तुम देवयानीकी दासी त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान् देवयान्या प्रचोदितः। बनायी गयी हो'॥ १९-२० ३॥ क चा शर्मिष्ठा बोली--यदि इस प्रकार देवयानीके लिये स्मिडोवाच ही शुक्राचार्यजी मुझे बुला रहे हैं तो देवयानी जो कुछ यं च कामयते कामं करवाण्यहमद्य तम्। चाहती हैं, वह सब आजसे मैं करूँगी। मेरे अपराधसे न

English

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अध्याय २२

श्लोक 78

एष तूद्देशतः प्रोक्तस् तीर्थानां संग्रहो मया वागीशो ऽपि न शक्नोति विस्तरात् किम् उ मानुषः

eṣa tūddeśataḥ proktas tīrthānāṃ saṃgraho mayā vāgīśo 'pi na śaknoti vistarāt kim u mānuṣaḥ

हिन्दी अर्थ

मा गान्मन्युवशं शुक्रो देवयानी च मत्कृते॥ २१ ns bd nas i ही। मेरे कारण शौनक उवाच शौनकजी कहते हैं शतानीक ! तदनन्तर पिताकी आज्ञासे राजकुमारी शर्मिष्ठा शिविकापर आरूढ़ हो तुरन्त ततः कन्यासहस्रेण वृता शिविकया तदा। राजधानीसे बाहर निकली। उस समय वह एक सहस्र पितुर्निदेशात् त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात्॥ २२ कन्याओंसे घिरी हुई थी जिवाने शर्मिष्ठा बोली--देवयानी ! मैं एक सहस्त्र दासियोंके साथ तुम्हारी दासी बनकर सेवा करूँगी और तुम्हारे पिता अहं कन्यासहस्रेण दासी ते परिचारिका। जहाँ भी तुम्हारा ब्याह करेंगे, निश्चय ही वहाँ तुम्हारे साथ रुवं त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता॥ २३ चलूँगी

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 79

सत्यं तीर्थं दया तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रहः वर्णाश्रमाणां गेहे ऽपि तीर्थं तु समुदाहृतम्

satyaṃ tīrthaṃ dayā tīrthaṃ tīrthamindriyanigrahaḥ varṇāśramāṇāṃ gehe 'pi tīrthaṃ tu samudāhṛtam

हिन्दी अर्थ

दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये। येन केनचिदार्त्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत्। अनुयास्याम्यहं तत्र यत्र दास्यति ते पिता

English

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अध्याय २२

श्लोक 80

एतत्तीर्थेषु यच्छ्राद्धं तत्कोटिगुणमिष्यते यस्मात्तस्मात्प्रयत्नेन तीर्थे श्राद्धं समाचरेत्

etattīrtheṣu yacchrāddhaṃ tatkoṭiguṇamiṣyate yasmāttasmātprayatnena tīrthe śrāddhaṃ samācaret

हिन्दी अर्थ

देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत् देवयानीने कहा--अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बडे बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं, फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी ? शर्मिष्ठा बोली--जिस-किसी उपायसे भी सम्भव हो, अपने विपदूग्रस्त जाति-भाइयोंको सुख पहुँचाना चाहिए । (इसलिये) तुम्हारे पिता जहाँ तुम्हें देंगे, वहाँ भी मैं तुम्हारे साथ चलूँगी

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 81

प्रातःकालो मुहूर्तांस् त्रीन् संगवस् तावदेव तु मध्याह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याद् अपराह्णस्ततः परम्

prātaḥkālo muhūrtāṃs trīn saṃgavas tāvadeva tu madhyāhnastrimuhūrtaḥ syād aparāhṇastataḥ param

हिन्दी अर्थ

शौनकजी कहते हें --नृपश्रेष्ठ! जब वृषपर्वाकी पुत्रीने दासी होनेकी प्रतिज्ञा कर ली, तब देवयानीने अपने पितासे कहा देवयानी बोली--पिताजी ! अब मैं नगरमें प्रवेश करूँगी द्विजश्रेष्ठ ! अब मुझे विश्वास हो गया कि आपका विज्ञान और आपकी विद्याका बल अमोघ है

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 82

सायाह्नस्त्रिमुहूर्तः स्याच् छ्राद्धं तत्र न कारयेत् राक्षसी नाम सा वेला गर्हिता सर्वकर्मसु

sāyāhnastrimuhūrtaḥ syāc chrāddhaṃ tatra na kārayet rākṣasī nāma sā velā garhitā sarvakarmasu

हिन्दी अर्थ

शौनकजी कहते हैं--शतानीक ! अपनी पुत्री देवयानीके ऐसा कहनेपर महायशस्वी द्विजश्रेष्ठ शुक्राचार्यने समस्त दानवोंसे पूजित एवं प्रसन्न होकर नगरमें प्रवेश इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकोनत्रिंशोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरितवर्णन नामक उन्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 83

अह्नो मुहूर्ता विख्याता दश पञ्च च सर्वदा तत्राष्टमो मुहूर्तो यः स कालः कुतपः स्मृतः

ahno muhūrtā vikhyātā daśa pañca ca sarvadā tatrāṣṭamo muhūrto yaḥ sa kālaḥ kutapaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

सस्ब्रियोंसहित देवयानी और शर्मिष्ठाका वनविहार, राजा ययातिका आगमन, देवयानीके साथ बातचीत तथा विवाह अथ दीर्घेण कालेन देवयानी नुृपोत्तम। वनं तहैव निर्याता क्रीडार्थं वरवर्णिनी

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 84

मध्याह्ने सर्वदा यस्मान् मन्दीभवति भास्करः तस्मादनन्तफलदस् तदारम्भो विशिष्यते

madhyāhne sarvadā yasmān mandībhavati bhāskaraḥ tasmādanantaphaladas tadārambho viśiṣyate

हिन्दी अर्थ

तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा शौनकजी कहते हैं नृपश्रेष्ठ ! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् उत्तम वर्णवाली देवयानी फिर उसी वनमें विहारके लिये गयी। उस समय उसके साथ एक हजार दासियोंसहित शर्मिष्ठा भी सेवामें उपस्थित थी। वनमें उसी प्रदेशमें जाकर वह उन समस्त सखियोंके

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 85

मध्याह्नः खड्गपात्रं च तथा नेपालकम्बलः रूप्यं दर्भास्तिला गावो दौहित्रश्चाष्टमः स्मृतः

madhyāhnaḥ khaḍgapātraṃ ca tathā nepālakambalaḥ rūpyaṃ darbhāstilā gāvo dauhitraścāṣṭamaḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

वे सब वहाँ भाँति-भाँतिके खेल खेलती हुई आनन्दमें मग्र हो गयीं। वे कभी वासन्तिक पुष्पोंके मकरन्दका पान करतीं, कभी नाना प्रकारके भोज्य पदार्थोंका स्वाद लेती और कभी फल खाती थीं। इसी समय पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया॥ ४ हैवेच्छासे नहुषपुत्र राजा ययाति पुनः शिकार खेलनेके लिये

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 86

पापं कुत्सितमित्याहुस् तस्य संतापकारिणः अष्टाव् एते यतस्तस्मात् कुतपा इति विश्रुताः

pāpaṃ kutsitamityāhus tasya saṃtāpakāriṇaḥ aṣṭāv ete yatastasmāt kutapā iti viśrutāḥ

हिन्दी अर्थ

ददर्श देवयानीं च शर्मिष्ठां ताश्च योषित: उपविष्टां च ददूशे देवयानीं शुचिस्मिताम् शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 87

ऊर्ध्वं मुहूर्तात्कुतपाद् यन्मुहूर्तचतुष्टयम् मुहूर्तपञ्चकं चैतत् स्वधाभवनमिष्यते

ūrdhvaṃ muhūrtātkutapād yanmuhūrtacatuṣṭayam muhūrtapañcakaṃ caitat svadhābhavanamiṣyate

हिन्दी अर्थ

देवयान्युवाच आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचनं मे नराधिप। शुक्रो नामासुरगुरुः सुतां जानीहि तस्य माम् देवयान्युवाच सर्वमेव नरव्याघ्र विधानमनुवर्तते। विधिना विहितं ज्ञात्वा मा विचित्रं मनः कृथाः

English

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अध्याय २२

श्लोक 88

विष्णोर् देहसमुद्भूताः कुशाः कृष्णास्तिलास्तथा श्राद्धस्य रक्षणायालम् एतत्प्राहुर्दिवौकसः

viṣṇor dehasamudbhūtāḥ kuśāḥ kṛṣṇāstilāstathā śrāddhasya rakṣaṇāyālam etatprāhurdivaukasaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्नः श्रुतिपथं गतः। राजाहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विक्रुतः केन चार्थेन नृपते ह्येनं देशं समागतः।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 89

तिलोदकाञ्जलिर्देयो जलस्थैस्तीर्थवासिभिः सदर्भहस्तेनैकेन श्राद्धमेवं विशिष्यते

tilodakāñjalirdeyo jalasthaistīrthavāsibhiḥ sadarbhahastenaikena śrāddhamevaṃ viśiṣyate

हिन्दी अर्थ

उसी स्थानपर आ गये। वे परिश्रम करनेके कारण देवयानी, शर्मिष्ठा तथा अन्य युवतियोंको भी देखा। वे सभी पीनेयोग्य रसका पान कर रही थीं। राजाने पवित्र मुसकानवाली देवयानीको वहाँ परम सुन्दर आसनपर बैठी हुई देखा। उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी।

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 90

श्राद्धसाधनकाले तु पाणिनैकेन दीयते तर्पणं तूभयेनैव विधिरेष सदा स्मृतः

śrāddhasādhanakāle tu pāṇinaikena dīyate tarpaṇaṃ tūbhayenaiva vidhireṣa sadā smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

वह सुन्दरी उन स्त्रियोंके मध्यमें बैठी हुई थी और शर्मिष्ठा उसकी चरणसेवा कर रही थी ययातिने पूछा--दो हजार कुमारी सखियोंसे घिरी हुई कन्याओ! मैं आप दोनोंके गोत्र और नाम पूछ रहा हूँ। शुभे! आप दोनों अपना परिचय दें देवयानी बोली--महाराज ! मैं स्वयं परिचय देती हूँ, आप मेरी बात सुनें । असुरोंके जो सुप्रसिद्ध गुरु शुक्राचार्य हैं, मुझे उन्हींकी पुत्री जानिये। यह दानवराज वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठा मेरी सखी और दासी है। मैं विवाह होनेपर

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 91

पुण्यं पवित्रमायुष्यं सर्वपापविनाशनम् पुरा मलये न कथितं तीर्थश्राद्धानुकीर्तनम्

puṇyaṃ pavitramāyuṣyaṃ sarvapāpavināśanam purā malaye na kathitaṃ tīrthaśrāddhānukīrtanam

हिन्दी अर्थ

जहाँ जाऊँगी, वहाँ यह भी साथ जायगी ययाति बोले--सुन्दरि! यह असुरराजकी रूपवती कन्या सुन्दर भौंहोंवाली शर्मिष्ठा आपकी सखी और दासी किस प्रकार हुई? यह बताइये। इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 92

शृणोति यः पठेद्वापि श्रीमान्संजायते नरः

śṛṇoti yaḥ paṭhedvāpi śrīmānsaṃjāyate naraḥ

हिन्दी अर्थ

देवयानी बोली--नर श्रेष्ठ) सब लोग हैवके विधानका ही अनुसरण करते हैं। इसे भी भाग्यका विधान मानकर संतोष कीजिये। इस विषयकी विचित्र घटनाओंको न पूछिये। आपके रूप और वेश राजाके समान हैं और आप विशुद्ध संस्कृत भाषा बोल रहे हैं। मुझे बताइये, आपका क्या नाम है, आप कहाँसे आये हैं और किसके पुत्र हैं ? ययातिने कहा-- मैने ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक सम्पूर्ण वेदका अध्ययन किया है। मैं राजा नहुषका पुत्र हूँ और इस समय स्वयं राजा हूँ। मेरा नाम ययाति है

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 93

श्राद्धकाले च वक्तव्यं तथा तीर्थनिवासिभिः सर्वपापोपशान्त्यर्थम् अलक्ष्मीनाशनं परम्

śrāddhakāle ca vaktavyaṃ tathā tīrthanivāsibhiḥ sarvapāpopaśāntyartham alakṣmīnāśanaṃ param

हिन्दी अर्थ

देवयानीने कहा--महाराज! आप किस कार्यसे वनके इस प्रदेशमें आये हैं? आप जल अथवा कमल लेना चाहते हैं या शिकारकी इच्छासे ही आये हैं ? ययातिने कहा भद्रे! मैं एक हिंसक पशुको मारनेके लिये उसका पीछा कर रहा था, इससे बहुत थक गया हूँ और पानी पीनेके लिये यहाँ आया हूँ, अत: अब

English

Srdddhas,

अध्याय २२

श्लोक 94

इदं पवित्रं यशसो निधानम् इदं महापापहरं च पुंसाम् ब्रह्मार्करुद्रैरपि पूजितं च श्राद्धस्य माहात्म्यमुशन्ति तज्ज्ञाः

idaṃ pavitraṃ yaśaso nidhānam idaṃ mahāpāpaharaṃ ca puṃsām brahmārkarudrairapi pūjitaṃ ca śrāddhasya māhātmyamuśanti tajjñāḥ

हिन्दी अर्थ

त्वमनुज्ञातुमहसि॥ १६ आप मुझे आज्ञा दीजिये + यहाँ किन्हीं श्लोकोंमें देवयानीकी दो हजार और किन्हींमें एक हजार सखियोंका उल्लेख हुआ है । यथावसर दोनों ही ठीक हँ । अविवाह्या: स्म राजानो देवयानि पितुस्तव

English

Srdddhas,

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 22
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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