Matsya Purana· Matsya Purāṇa
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अध्याय 30 / 176

Adhyaya 30

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पूर्ण अध्याय पाठ37 श्लोक

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अध्याय ३०

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ३० अथ दीर्घेण कालेन देवयानी नृपोत्तम वनं तदैव निर्याता क्रीडार्थं वरवर्णिनी

matsya-purāṇa 30 atha dīrgheṇa kālena devayānī nṛpottama vanaṃ tadaiva niryātā krīḍārthaṃ varavarṇinī

हिन्दी अर्थ

देवोंद्वारा सुशोभित थे। गन्धर्व और अप्सराएँ भी नित्य आकर उनकी शोभा बढ़ाती थीं। राजर्षि कार्तवीर्यके महत्त्वको देखकर नारदनामक गन्धर्वने उनके यज्ञमें ऐसी गाथा गायी थी-- भावी क्षत्रिय नरेश निश्चय ही यज्ञ, दान, तप, पराक्रम और शास्त्रज्ञानके द्वारा कार्तवीर्यकी समकक्षताको नहीं प्राप्त होंगे।' योगी अर्जुन रथपर आरूढ़ हो हाथमें खङ्ग, चक्र और धनुष धारण करके सातों द्वीपोंमें भ्रमण करता हुआ चोरों-डाकुओंपर कड़ी दृष्टि रखता था। राजा अर्जुन पचासी हजार वर्षोतक भूतलपर शासन करके समस्त रत्रोंसे परिपूर्ण हो चक्रवर्ती सम्राट् बना रहा। राजा अर्जुन ही अपने योगबलसे पशुओंका पालक था, वही खेतोंका भी रक्षक था और वही समयानुसार

English

aunaka.said: 0 king! Long after that, DevayAni again went to

अध्याय ३०

श्लोक 2

तेन दासीसहस्रेण सार्धं शर्मिष्ठया तदा तमेव देशं सम्प्राप्ता यथाकामं चचार सा

tena dāsīsahasreṇa sārdhaṃ śarmiṣṭhayā tadā tameva deśaṃ samprāptā yathākāmaṃ cacāra sā

हिन्दी अर्थ

मेघ बनकर वृष्टि भी करता था। प्रत्यञ्चाके आघातसे कठोर हुई त्वचाओंवाली अपनी सहस्नों भुजाओंसे वह उसी प्रकार शोभा पाता था, जिस प्रकार सहस्रों किरणोंसे युक्त शारदीय सूर्य शोभित होते हैं एष नागं मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः । कर्कोटकसुतं जित्वा पुर्या तत्र न्यवेशयत्

English

amuse herself in the same forest in the company of larmi§th& and a thousand maids. Whilst she, along with her compani(3nB was thus amusing herself thereby drinking wine and eating various victuals and fruits, King • Yayfiti, also chanced to visit the same forest with the object of enjoying a shoot, and, feeling thirsty whilst he was in search of water, he saw DevayAnl and Sarmitha along with other women folk drinking. Among them he marked DevayAnt, the beautiful, who, wearing lovely orna- raetits, was sitting, attended by 8nrmisth& and other maids. Then

अध्याय ३०

श्लोक 3

ताभिः सखीभिः सहिता सर्वाभिर्मुदिता भृशम् क्रीडन्त्यो ऽभिरताः सर्वाः पिबन्त्यो मधु माधवम्

tābhiḥ sakhībhiḥ sahitā sarvābhirmuditā bhṛśam krīḍantyo 'bhiratāḥ sarvāḥ pibantyo madhu mādhavam

हिन्दी अर्थ

एष वेगं समुद्रस्य प्रावृट्काले भजेत वै। क्रीडन्नेव सुर्रोद्धभिन्नः प्रतिस्त्रोतो महीपति: एको बाहुसहस्त्रेण वगाहे स महार्णवः। करोत्युद्वृत्तवेगां तु नर्मदां प्रावृडुद्धताम् करोत्यालोडयन्नेव दोःसहस्त्रेण सागरम्। मन्दरक्षोभचकिता ह्यामृतोत्पादशङ्किताः

English

« King YayAl! said: *' Two of you ai'e charming teauties boi izoned by two " <d)ouaand. women. I request you to please tell me your names and *clan.'*— Wr, '

अध्याय ३०

श्लोक 4

खादन्त्यो विविधान्भक्ष्यान् फलानि विविधानि च पुनश्च नाहुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया

khādantyo vividhānbhakṣyān phalāni vividhāni ca punaśca nāhuṣo rājā mṛgalipsuryadṛcchayā

हिन्दी अर्थ

लङ्कायां मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात् यस्माद् वनं प्रदग्धं वै विश्रुतं मम हैहय। तस्मात् ते दुष्करं कर्म कृतमन्यो हरिष्यति

English

DevayAnI i-eplied: — " King! Hear what I say. I am the daughter of the Sage lukra who is preceptor of the Asuras and she is my maid-in-chief, arinithA, the daughter of Vfiaparvan, the mighty king of the Danavas. She always accompanies me wherever I go."— 9-10.

अध्याय ३०

श्लोक 5

तमेव देशं सम्प्राप्तो जललिप्सुः प्रतर्षितः ददर्श देवयानीं च शर्मिष्ठां ताश्च योषितः

tameva deśaṃ samprāpto jalalipsuḥ pratarṣitaḥ dadarśa devayānīṃ ca śarmiṣṭhāṃ tāśca yoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

मनुष्योँमें महान् तेजस्वी अर्जुनने कर्कोटक नागके पुत्रको जीतकर अपनी माहिष्मती पुरीमें बाँध रखा था। भूपाल अर्जुन वर्षा-ऋतुमें प्रवाह के सम्मुख सुखपूर्वक क्रीडा करते हुए ही समुद्रके वेगको रोक देता था ।ललनाओंके साथ जलविहार करते समय उसके गलेसे टूटकर गिरी हुई मालाओंको धारण करनेवाली तथा लहररूपी भ्रुकुटियोंके व्याजसे भयभीत-सी हुई नर्मदा चकित होकर उसके निकट आ जाती थी। वह अकेला ही अपनी सहस्त्र भुजाओंसे अगाध समुद्रको विलोडित कर देता था एवं वर्षाकालमें वेगसे बहती हुई नर्मदाको और भी उद्धत वेगवाली बना देता था । उसकी हजारों भुजाओंद्वारा विलोडन करनेसे महासागरके

English

YayAti, who was astonised to hear that, enquired how that daughter of the king of the Asuras came to be her maid-in-chief. — 11.

अध्याय ३०

श्लोक 6

पिबन्त्यो ललनास्ताश्च दिव्याभरणभूषिताः उपविष्टां च ददृशे देवयानीं शुचिस्मिताम्

pibantyo lalanāstāśca divyābharaṇabhūṣitāḥ upaviṣṭāṃ ca dadṛśe devayānīṃ śucismitām

हिन्दी अर्थ

निश्चेष्ट हो जाते थे। अपनी सहस्त्र भुजाओंसे महासागरका विलोडन करते समय वह समुद्रकी उठती हुई विशाल लहरोंके मध्य आयी हुई मछलियों और बड़े-बड़ेतिमिङ्गिलोंके चूर्णसे उसे व्याप्त कर देता था तथा वायुके झकोरेसे उठे हुए फेनसमूहसे फेनिल और भँवरोंके चपेटसे दुःसह बना देता था । उस समय पूर्वकालमें मन्दराचलके मन्थनके विक्षोभसे चकित एवं पुनः अमृतोत्पादनकी आशङ्कसे सशङ्कित-से हुए बड़े-बड़े नागोंके मस्तक इस प्रकार निश्चल हो जाते

English

DevayAnI said; — " Do not be astonished. All this has been ordained by BrabmA. Yon look like a king from your bearing and sweet and dig- nified speech. Tell me your name and parentage." — 12-13.

अध्याय ३०

श्लोक 7

रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराङ्गनाम् शर्मिष्ठया सेव्यमानां पादसंवाहनादिभिः

rūpeṇāpratimāṃ tāsāṃ strīṇāṃ madhye varāṅganām śarmiṣṭhayā sevyamānāṃ pādasaṃvāhanādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

थे, जैसे सायंकाल वायुके स्थगित हो जानेपर केलेके पत्ते प्रशान्त हो जाते हैं। इसी प्रकार अर्जुनने एक बार लंकामें जाकर अपने पाँच बाणोंद्वारा सेनासहित रावणको मोहित कर दिया और उसे बलपूर्वक जीतकर अपने धनुषकी प्रत्यञ्चामें बाँध लिया, फिर माहिष्मती पुरीमें लाकर उसे बंदी बना लिया। यह सुनकर महर्षि पुलस्त्यने माहिष्मतीपुरीमें जाकर अर्जुनको अनेकों प्रकारसे समझा-बुझाकर प्रसन्न किया। पुलस्त्य-पौत्र राक्षसराज रावणको बन्धनमुक्त कर दिया। उसको हजारों भुजाओंद्वारा धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचनेपर ऐसा भयंकर शब्द होता था, मानो प्रलयकालीन सहस्रो बादलोंकी घटाके मध्य वञ्रकी गड्गड़ाहट हो रही हो; परंतु विधिका

English

YayAti said; — " I have studied all the Vedas after leading a student's life, and I am King YayAti, the son of King Nalniha."— 14.

अध्याय ३०

श्लोक 8

द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां द्वे कन्ये परिवारिते गोत्रे च नामनी चैव द्वयोः पृच्छाम्यतो ह्य् अहम्

dvābhyāṃ kanyāsahasrābhyāṃ dve kanye parivārite gotre ca nāmanī caiva dvayoḥ pṛcchāmyato hy aham

हिन्दी अर्थ

पराक्रम धन्य है जो भृगुकुलोत्पन्न परशुरामजीने उसकी हजारों भुजाओंको हेमतालके वनकी भाँति काटकर छिन्न- भिन्न कर दिया। इसका कारण यह है कि एक बार सामर्थ्यशाली महर्षि आपव (वसिष्ठ)-ने क्रुद्ध होकर अर्जुनको शाप देते हुए कहा था--' हैहय! चूँकि तुमने मेरे लोकप्रसिद्ध वनको जलाकर भस्म कर दिया है, इसलिये तुम्हारे द्वारा किये गये इस दुष्कर कर्मका फल कोई दूसरा

English

DevayAnI said: — ''King! What for have you come here — to drink water or to enjoy a shoot? " — 15,

अध्याय ३०

श्लोक 9

आख्यास्याम्यहम् आदत्स्व वचनं मे नराधिप शुको नामासुरगुरुः सुतां जानीहि तस्य माम्

ākhyāsyāmyaham ādatsva vacanaṃ me narādhipa śuko nāmāsuraguruḥ sutāṃ jānīhi tasya mām

हिन्दी अर्थ

आप शब्द वरुणका वाचक है। उनके पुत्र मैत्रावारुणिके होनेसे यहाँ महर्षि वसिष्ठ ही महाभारत, हरिवंश, देवीभागवत तथा उसके व्याख्याताओंके अनुसार आपव' नामसे निर्दिष्ट हैं । कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो महाबलाः

English

YayAti said In course of my slioot I have happened to come to this spot to satisfy my thirst and am ready to obey your commands."— 16.

अध्याय ३०

श्लोक 10

इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वणः

iyaṃ ca me sakhī dāsī yatrāhaṃ tatra gāminī duhitā dānavendrasya śarmiṣṭhā vṛṣaparvaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टः क्रोष्ट्रस्तथैव च। जयध्वजश्च वैकर्ता अवन्तिश्च विशांपते तेषां पञ्च कुलाः ख्याता हैहयानां महात्मनाम् । वीतिहोत्राश्च शार्याता भोजाश्चावन्तयस्तथा

English

DevayAnI said: — "Friend! I am at your disposal with iSarmisthA and ray retinue of maids, he my lord."— 17.

अध्याय ३०

श्लोक 11

कथं तु ते सखी दासी कन्येयं वरवर्णिनी असुरेन्द्रसुता सुभूः परं कौतूहलं हि मे

kathaṃ tu te sakhī dāsī kanyeyaṃ varavarṇinī asurendrasutā subhūḥ paraṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

कुण्डिकेराश्च विक्रान्तास्तालजङ्कास्तथैव च। दुर्जयस्तस्य पुत्रस्तु बभूवामित्रकर्शनः सद्भावेन महाप्राज्ञः प्रजा धर्मेण पालयन्। कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्त्रवान्

English

YayAti said: — " Lady! You are the daughter of Siikra, who is a BrAhmapa, and consequently you cannot be wedded by a Katriya sove- reign."—18,

अध्याय ३०

श्लोक 12

सर्वमेव नरव्याघ्र विधानमनुवर्तते विधिना विहितं ज्ञात्वा मा विचित्रं मनः कृथाः

sarvameva naravyāghra vidhānamanuvartate vidhinā vihitaṃ jñātvā mā vicitraṃ manaḥ kṛthāḥ

हिन्दी अर्थ

यस्तस्य कीर्तयेन्नाम कल्यमुत्थाय मानवः कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह धीमतः। यथावत् स्विष्टपूतात्मा स्वर्गलोके महीयते

English

DevayAnI said: — " King! the rjice of the Ksatriyas has been created by HrahrnA and is supported by him. 0, son of Nahuba! you are a sage; and also the son of a sage; by all means marry me." — 19.

अध्याय ३०

श्लोक 13

राजवद्रूपवेषौ ते ब्राह्मीं वाचं बिभर्षि च किंनामा त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शंस मे

rājavadrūpaveṣau te brāhmīṃ vācaṃ bibharṣi ca kiṃnāmā tvaṃ kutaścāsi kasya putraśca śaṃsa me

हिन्दी अर्थ

हरण कर लेगा भृगुकुलमें उत्पन्न एक तपस्वी एवं बलवान् ब्राह्मण पहले तुम्हारी सहस्रों भुजाओंको काटकर फिर तुम्हारा वध कर देगा'॥ २९--४३॥ सूतजी कहते हैं--ऋषियो! इस प्रकार उस शापके कारण परशुरामजी उसकी मृत्युके कारण तो अवश्य हुए, परंतु पूर्वकालमें उस राजर्षिने स्वयं ही ऐसे वरका वरण किया था। राजन्! सहस्त्रार्जुनके पुत्र तो एक सौ हुए, परंतु उनमें पाँच महारथी थे। उनके अतिरिक्त शूरसेन, शूर, धृष्ट, क्रोष्टु, जयध्वज, वैकर्ता और

English

YayAti said " 0, Lady I Tliougli all the four castes have sprung from one and the same body of Brahma, yet their duties and rules of life are entirely different from one another, and a BrAhmana k superior to all."— 20.

अध्याय ३०

श्लोक 14

ब्रह्मचर्येण वेदो मे कृत्स्नः श्रुतिपथं गतः राजाहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विश्रुतः

brahmacaryeṇa vedo me kṛtsnaḥ śrutipathaṃ gataḥ rājāhaṃ rājaputraśca yayātiriti viśrutaḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मात्मा और महान् पराक्रमशाली थे। जयध्वजका पुत्र महाबली तालजङ्घ हुआ। उसके एक सौ पुत्र हुए जो तालजङ्कके नामसे विख्यात हुए। हैहयवंशी इन महात्मा नरेशोंका कुल विभक्त होकर पाँच भागोंमें विख्यात हुआ। उनके नाम हैं-वीतिहोत्र, शार्यात, भोज, आवन्ति तथा पराक्रमी कुण्डिकेर। ये ही तालजड्डके भी नामसे प्रसिद्ध थे। वीतिहोत्रका पुत्र प्रतापी आनर्त (गुजरातका शासक) हुआ। उसका पुत्र दुर्जेय हुआ जो शत्रुओंका

English

DevayAnI said " 0, son of Nahu§a I this hand of mine has not been touched by any other pereon and you have once grasped it. I there- fore choose you to be my partner in life. Who else can take my band? You took me by the hand, because you are the son of a sage or because you * are a sage yourself."— 21-22.

अध्याय ३०

श्लोक 15

केन चार्थेन नृपते ह्य् एनं देशं समागतः जिघृक्षुर्वारि यत्किंचिद् अथवा मृगलिप्सया

kena cārthena nṛpate hy enaṃ deśaṃ samāgataḥ jighṛkṣurvāri yatkiṃcid athavā mṛgalipsayā

हिन्दी अर्थ

नन्दन राजा अर्जुन सद्भावना एवं धर्मपूर्वक प्रजाओंका पालन करता था। उसने अपने धनुषके बलसे सागरपर्यन्त पृथ्वीपर विजय पायी थी। जो मानव प्रातःकाल उठकर उसका नाम स्मरण करता है उसके धनका नाश नहीं होता और यदि नष्ट हो गया है तो पुनः प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य कार्तवीर्य अर्जुनके जन्म-वृत्तान्तको कहता है उसका आत्मा यथार्थरूपसे पवित्र हो जाता है और वह स्वर्गलोकमें प्रशंसित होता है ॥ ४४--५२॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे सहस्त्रार्जुनचरिते त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

English

TayAtt said: — " The sages of hoary lore have said that a BrAliraapa is more formidable than the mouth of an angry venomous 'serpent and the raging fire."— 23.

अध्याय ३०

श्लोक 16

मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थम् इहागतः बहुधाप्यनुयुक्तो ऽस्मि त्वम् अनुज्ञातुमर्हसि

mṛgalipsurahaṃ bhadre pānīyārtham ihāgataḥ bahudhāpyanuyukto 'smi tvam anujñātumarhasi

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें सहस्रार्जुनचरित नामक तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ कार्तवीर्यका आदित्यके तेजसे सम्पन्न होकर वृक्षोंको जलाना, महर्षि आपवद्वारा कार्तवीर्यको शाप और क्रोष्टुके वंशका वर्णन

English

* JDe'siiydnl «aid " 0, RIpssihI one! How doyou.(leficjrvll)(? umna to bo nmro formi<lal)le timu an aniy venomous snuHg and ihh raging five?'* — 24.. * '

अध्याय ३०

श्लोक 17

द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह त्वदधीनास्मि भद्रं ते सखे भर्ता च मे भव

dvābhyāṃ kanyāsahasrābhyāṃ dāsyā śarmiṣṭhayā saha tvadadhīnāsmi bhadraṃ te sakhe bhartā ca me bhava

हिन्दी अर्थ

कार्तवीर्येण विक्रम्य सूत प्रब्रूहि तत्त्वतः आदित्यो द्विजरूपेण कार्तवीर्यमुपस्थितः। तृप्तिमेकां प्रयच्छस्व आदित्योऽहं नरेश्वर ३ भगवन् केन तृसिस्ते भवत्येव दिवाकर। कीदूशं भोजनं दद्मि श्रुत्वा तु विदधाम्यहम्

English

Yayrifi sniil }iv /he bile of a poisonous serpent and by the blow of a weap<)ii only one life is lost, bn! by i lie anger of a Braliinami the whole realm -and country is devastated; this is my reason for having' described a B«;ihnjjma as such, and I fluM'i'fiue cannot accept you in marriage without your father's cnnseut. "2r»-2(».

अध्याय ३०

श्लोक 18

विद्ध्यौशनसि भद्रं ते न त्वदर्हो ऽस्मि भामिनि अविवाह्याः स्म राजानो देवयानि पितुस्तव

viddhyauśanasi bhadraṃ te na tvadarho 'smi bhāmini avivāhyāḥ sma rājāno devayāni pitustava

हिन्दी अर्थ

निर्दग्धुं तपतां श्रेष्ठ तेन त्वां प्रणमाम्यहम् शुष्कान् भस्मीकरिष्यन्ति तेन तृसतिर्नराधिप

English

Devay uii said: — " King! When my father gives me away to you of Ilia own accord, ynii will then in-et'pt me as yours. Yon cannot beg, 1 know; and consequently 1 have aceepted \\n\ as my l'»ial; now there is no question of receiving on your part,"- 27.

अध्याय ३०

श्लोक 19

संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रं ब्रह्मणि संश्रितम् ऋषिश्च ऋषिपुत्रश्च नाहुषाद्य भजस्व माम्

saṃsṛṣṭaṃ brahmaṇā kṣatraṃ kṣatraṃ brahmaṇi saṃśritam ṛṣiśca ṛṣiputraśca nāhuṣādya bhajasva mām

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा--सूतजी ! कार्तवीर्यने बलपूर्वक महात्मा आपवके उस वनको किस कारण जलाया था? अभी-अभी हम लोगोंने सुना है कि वे राजर्षि कार्तवीर्य प्रजाओंके रक्षक थे तो फिर रक्षक होकर उन्होंने महर्षिके तपोबनको कैसे जला दिया ? सूतजी कहते हैं-ऋषियो! एक बार सूर्य ब्राह्मणका रूप धारण करके कार्तवीर्यके निकट पहुँचे

English

niinal<a sni<l, — After tlmt, the nnr-e. deputed by Devavinii, went and explained all that to.'ukin..nkra m iuMiring liiat went to tin* king, and both of them were pleased t** nn each other. 2S-:-'lt.

अध्याय ३०

श्लोक 20

एकदेहोद्भवा वर्णाश् चत्वारो ऽपि वरानने पृथग्धर्माः पृथक्छौचास् तेषां वै ब्राह्मणो वरः

ekadehodbhavā varṇāś catvāro 'pi varānane pṛthagdharmāḥ pṛthakchaucās teṣāṃ vai brāhmaṇo varaḥ

हिन्दी अर्थ

बार तृप्ति प्रदान कोजिये' राजाने पूछा भगवन्! किस पदार्थसे आपकी तृप्ति होगी ? दिवाकर! मैं आपको किस प्रकारका भोजन प्रदान करूँ? आपकी बात सुनकर मैं उसी प्रकारका विधान करूँगा

English

The king, seeing.nkra. alnled him v. ith fnldiMl hands; and tlio latter also spoke to him rnihily an 1 soeetly. -

अध्याय ३०

श्लोक 21

पाणिग्रहो नाहुषायं न पुंभिः सेवितः पुरा त्वं पाणिमग्रहीदग्रे वृणोमि त्वामहं ततः

pāṇigraho nāhuṣāyaṃ na puṃbhiḥ sevitaḥ purā tvaṃ pāṇimagrahīdagre vṛṇomi tvāmahaṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

अर्थात् वृक्ष आदिको आहाररूपमें प्रदान कीजिये। मैं उसीसे तृप्त होऊँगा। राजन्! वही मेरे लिये सर्वश्रेष्ठ तृप्ति होगी कार्तवीर्यने कहा--तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ सूर्य! ये समस्त वृक्ष मेरे तेज और बलद्वारा जलाये नहीं जा सकते; अतः में आपको प्रणाम करता हूँ सूर्य बोले--नरेश्वर! मैं आपपर प्रसन्न हूँ, इसलिये मैं आपको ऐसे अक्षय एवं सर्वतोमुखी बाण दे रहा हूँ, जो मेरे तेजसे युक्त होनेके कारण चलाये जानेपर स्वयं जल उठेंगे और मेरे तेजसे परिपूर्ण हुए वे सारे वृक्षोंको

English

Devayani s.iid to her I'aiher tljai the Vay'-li had t>nee grasped

अध्याय ३०

श्लोक 22

कथं तु मे मनस्विन्याः पाणिमन्यः पुमान्स्पृशेत् गृहीतमृषिपुत्रेण स्वयं वाप्यृषिणा त्वया

kathaṃ tu me manasvinyāḥ pāṇimanyaḥ pumānspṛśet gṛhītamṛṣiputreṇa svayaṃ vāpyṛṣiṇā tvayā

हिन्दी अर्थ

सुखा देंगे; फिर सूख जानेपर उन्हें जलाकर भस्म कर देंगे। उससे मेरी तृप्ति हो जायगी सूतजी कहते हैं-ऋषियो ! तदनन्तर सूर्यने कार्तवीर्य अर्जुनको अपने बाण प्रदान कर दिये। तब अर्जुनने सम्मुख आये हुए समस्त वृक्षों, ग्रामों, आश्रमों, घोषों, नगरों, तपोवनों तथा रमणीय वनों एवं उपवनोंको जलाकर

English

lier hand, when slie wn in g'v.it iilll ol.' an 1 In* -di 'uld, ihei-efore *deilicate her to him, and that she won! I 'na*-iy n.» mm *X' * piMig him. *U.

अध्याय ३०

श्लोक 23

क्रुद्धादाशीविषात् सर्पाज् ज्वलनात्सर्वतोमुखात् दुराधर्षतरो विप्रः पुरुषेण विजानता

kruddhādāśīviṣāt sarpāj jvalanātsarvatomukhāt durādharṣataro vipraḥ puruṣeṇa vijānatā

हिन्दी अर्थ

राखका ढेर बना दिया। इस प्रकार पूर्व दिशाको जलाकर फिर समूची दक्षिण दिशाको भी भस्म कर दिया। उस निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिर्हता घोरेण तेजसा॥ ११ भयंकर तेजसे पृथ्वी वृक्षों एवं तृणोंसे रहित होकर नष्ट- यहाँ आदित्य सूर्य हैं, पर हरिवंशपु० १। ३३ आदिके अनुसार अग्निदेव ही ब्राह्मणवेषमें आये थे।

English

iiikra then said t i V.iy ni, that ho had lie.*n c*ii )sen by lier daughter before, whom lie 'dmn'd im.eept as \i\< after willingly made

अध्याय ३०

श्लोक 24

कथमाशीविषात् सर्पाज् ज्वलनात् सर्वतोमुखात् दुराधर्षतरो विप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ

kathamāśīviṣāt sarpāj jvalanāt sarvatomukhāt durādharṣataro vipra ityāttha puruṣarṣabha

हिन्दी अर्थ

एतस्मिन्नेव काले तु आपवो जलमास्थितः। दशवर्षसहस्त्राणि तत्रास्ते स महान् ऋषिः सोऽपश्यदाश्रमं दग्धमर्जुनेन महामुनिः

English

over to him liy hej' f'Ui.'er. -.h2

अध्याय ३०

श्लोक 25

दशेदाशीविषस्त्वेकं शस्त्रेणैकश्च वध्यते हन्ति विप्रः सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः

daśedāśīviṣastvekaṃ śastreṇaikaśca vadhyate hanti vipraḥ sarāṣṭrāṇi purāṇyapi hi kopitaḥ

हिन्दी अर्थ

क्रोधाच्छशाप राजर्षि कीर्तितं वो यथा मया। क्रोष्टोः शृणुत राजर्घेर्वशमुत्तमपौरुषम् यस्यान्ववाये सम्भूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वहः। क्रोष्टरोरेवाभवत् पुत्रो वृजिनीवान् महारथः चित्रश्चित्ररथश्चास्य पुत्रः कर्मभिरन्वितः

English

Yayali said " IVli.'.i!i i\a! Ijysneli de<-.i,s. \ mar, I will (commit a sin; I tht'n-fore l>e.*eaeh y.,ii to jarsy (-iT die.'•in of I'realing a cunfusion of castes liy snrdi intHnuan ia je." -- od.

अध्याय ३०

श्लोक 26

दुराधर्षतरो विप्रस् तस्माद्भीरु मतो मम अतो ऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम्

durādharṣataro vipras tasmādbhīru mato mama ato 'dattāṃ ca pitrā tvāṃ bhadre na vivahāmyaham

हिन्दी अर्थ

अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतस्तस्मिन् पुराभवत्। शशबिन्दोस्तु पुत्राणां शतानामभवच्छतम् पृथुश्रवाः पृथुयशाः पृथुधर्मा पृथुञ्जयः। पृथुकीर्तिः पृथुमना राजानः शशबिन्दव:

English

luk ra »Said: — " I *-hall fiee yon fiMm all sin.s. Accept this gift chosen by her. Yh>u will beetnne laml.dilo by this marriage; I free you from the future sin; marry this amiable Hevuyaid, aecording |ij law and have every enjwment mj hm' c • sjsmy; lids Sarinif.ha, the daughter of Vjisaparvan, will attend (mi \mn, and you.-Iniulvl never invite her to your I.)ed.*'-:U-3I).

अध्याय ३०

श्लोक 27

दत्तां वहस्व पित्रा मां त्वं हि राजन्वृतो मया अयाचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः

dattāṃ vahasva pitrā māṃ tvaṃ hi rājanvṛto mayā ayācato bhayaṃ nāsti dattāṃ ca pratigṛhṇataḥ

हिन्दी अर्थ

शंसन्ति च पुराणज्ञाः पृथुश्रवसमुत्तमम्। अन्तरस्य सुयज्ञस्य सुयज्ञस्तनयोऽभवत् उशना तु सुयज्ञस्य यो रक्षेत् पृथिवीमिमाम्। आजहाराश्वमेधानां शतमुत्तमधार्मिकः मरुत्तस्तस्य तनयो राजर्षीणामनुत्तमः

English

fanr.ka said; — On liearing ti.nse w >rds of tlm S(;er 3nkra tliat king circumambulated the latter, and witlj his pn-missiou entered his city with great rejoicing.s.— 37.

अध्याय ३०

श्लोक 28

त्वरितं देवयान्याथ प्रेषिता पितुरात्मनः सर्वं निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम्

tvaritaṃ devayānyātha preṣitā piturātmanaḥ sarvaṃ nivedayāmāsa dhātrī tasmai yathātatham

हिन्दी अर्थ

तेजस्वी और तपस्याके धनी थे, दस हजार वर्षोसे जलके भीतर बैठकर तप कर रहे थे, व्रत पूर्ण होनेपर बाहर निकले तो उन महामुनिने अर्जुनद्वारा अपने आश्रमको जलाया हुआ देखा। तब उन्होंने क्रुद्ध होकर राजर्षि अर्जुनको उक्त शाप दे दिया, जैसा कि मैंने अभी आप लोगोंको बतलाया है

English

Here ends the thirtieth ohnpfer descrihing the marringe of Yayiti with Decayaut.

अध्याय ३०

श्लोक 29

श्रुत्वैव च स राजानं दर्शयामास भार्गवः दृष्ट्वैवम् आगतं विप्रं ययातिः पृथिवीपतिः

śrutvaiva ca sa rājānaṃ darśayāmāsa bhārgavaḥ dṛṣṭvaivam āgataṃ vipraṃ yayātiḥ pṛthivīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

ऋषियो! (अब) आपलोग राजर्षि क्रोष्टके उस उत्तम बल-पौरुषसे सम्पन्न वंशका वर्णन सुनिये, जिस वंशमें वृष्णिवंशावतंस भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) अवतीर्ण हुए थे । क्रोष्टुके पुत्र महारथी वृजिनीवान् हुए। वृजिनीवान्के स्वाह (पद्मपुराणमें स्वाति) नामक महाबली पुत्र उत्पन्न हुआ। राजन्! वक्ताओंमें श्रेष्ठ रुषज्ञे स्वाहके पुत्ररूपमें पैदा हुए। रुषङ्गुने संतानकी इच्छासे सौम्य स्वभाववाले पुत्रकी कामना को। तब उनके सत्कर्मॉसे समन्वित एवं चित्र-विचित्र रथसे युक्त चित्ररथ नामक पुत्र हुआ। चित्ररथके एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ जो शशबिन्दु नामसे विख्यात था। वह आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। वह यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाला था। पूर्वकालमें इस

English

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अध्याय ३०

श्लोक 30

ववन्दे ब्राह्मणं काव्यं प्राञ्जलिः प्रणतः स्थितः तं चाप्यभ्यवदत्काव्यः साम्ना परमवल्गुना

vavande brāhmaṇaṃ kāvyaṃ prāñjaliḥ praṇataḥ sthitaḥ taṃ cāpyabhyavadatkāvyaḥ sāmnā paramavalgunā

हिन्दी अर्थ

शशबिन्दुके विषयमें वंशानुक्रमणिकारूप यह श्लोक गाया जाता रहा है कि शशबिन्दुके सौ पुत्र हुए। उनमें भी प्रत्येकके सौ-सौ पुत्र हुए। वे सभी प्रचुर धन- सम्पत्ति एवं तेजसे परिपूर्ण, सौन्दर्यशाली एवं बुद्धिमान् थे। उन पुत्रोंके नामके अग्रभागमें 'पृथु” शब्दसे संयुक्त छः महाबली पुत्र हुए। उनके पूरे नाम इस प्रकार हैं-पृथुश्रवा, पृथुयशा, पृथुधर्मा, पृथुंजय, पृथुकीर्ति और पृथुमना। ये शशबिन्दुके वंशमें उत्पन्न हुए राजा थे।

English

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अध्याय ३०

श्लोक 31

राजायं नाहुषस्तात दुर्गमे पाणिमग्रहीत् नमस्ते देहि मामस्मै लोके नान्यं पतिं वृणे

rājāyaṃ nāhuṣastāta durgame pāṇimagrahīt namaste dehi māmasmai loke nānyaṃ patiṃ vṛṇe

हिन्दी अर्थ

पुराणोंके ज्ञाता विद्वानूलोग इनमें सबसे ज्येष्ठ पृथुश्रवाकी विशेष प्रशंसा करते हैं । उत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले पृथुश्रवाका पुत्र सुयज्ञ हुआ। सुयज्ञका पुत्र उशना हुआ, जो सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा था। उसने इस पृथ्वीकी रक्षा करते हुए सौ अश्वुमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उशनाका पुत्र तितिक्षुं हुआ जो शत्रुओंको संतप्त कर देनेवाला था। राजर्षियोंमें सर्वश्रेष्ठ मरुत्त तितिक्षुके पुत्र हुए। मरुत्तका पुत्र वीरवर कम्बलबर्हिष था। कम्बलबर्हिषका पुत्र विद्वान् रुक्मकवच हुआ। रुक्मकवचने अपने अनेकों प्रकारके बाणोंके प्रहारसे धनुर्धारी एवं कवचसे सुसज्जित शत्रुओंको मारकर इस पृथ्वीको प्राप्त किया था।

English

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अध्याय ३०

श्लोक 32

वृतो ऽनया पतिर्वीर सुतया त्वं ममेष्टया गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज

vṛto 'nayā patirvīra sutayā tvaṃ mameṣṭayā gṛhāṇemāṃ mayā dattāṃ mahiṣīṃ nahuṣātmaja

हिन्दी अर्थ

१. भागवत ९। २३। ३१ तथा विष्णुपुराण ४। १२। २ में 'रुशङ्गु' एवं पद्म० १। १३। ४ में 'कुशङ्ग' पाठ है। २. अन्यत्र शिमेयु, रुचक या शितपु पाठ भी मिलता है।

English

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अध्याय ३०

श्लोक 33

अधर्मो मां स्पृशेदेवं पापम् अस्याश्च भार्गव वर्णसंकरतो ब्रह्मन्न् इति त्वां प्रवृणोम्यहम्

adharmo māṃ spṛśedevaṃ pāpam asyāśca bhārgava varṇasaṃkarato brahmann iti tvāṃ pravṛṇomyaham

हिन्दी अर्थ

अश्वमेधे ददौ राजा ब्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम्। यज्ञे तु रुक्मकवचः कदाचित् परवीरहा रुक्मेषुरभवद् राजा पृथुरुक्मस्तदाश्रयः नर्मदां नृप एकाकी केवलं वृत्तिकामतः

English

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अध्याय ३०

श्लोक 34

अधर्मात्त्वां विमुञ्चामि वरं वरय चेप्सितम् अस्मिन्विवाहे त्वं श्लाघ्यो रहः पापं नुदामि ते

adharmāttvāṃ vimuñcāmi varaṃ varaya cepsitam asminvivāhe tvaṃ ślāghyo rahaḥ pāpaṃ nudāmi te

हिन्दी अर्थ

अपुत्रो न्यवसद् राजा भार्यामन्यां न विन्दति। तस्यासीद् विजयो युद्धे तत्र कन्यामवाप्य सः 'लोमपादान्मनुः पुत्रो ज्ञातिस्तस्य तु चात्मजः

English

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अध्याय ३०

श्लोक 35

वहस्व भार्यां धर्मेण देवयानीं शुचिस्मिताम् अनया सह सम्प्रीतिम् अतुलां समवाप्नुहि

vahasva bhāryāṃ dharmeṇa devayānīṃ śucismitām anayā saha samprītim atulāṃ samavāpnuhi

हिन्दी अर्थ

धृष्टस्य पुत्रो धर्मात्मा निर्वृतिः परवीरहा शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले राजा रुक्मकवचने एक बार बड़े (भारी) अश्वमेध-यज्ञमें ब्राह्मणोंको प्रचुर दक्षिणा प्रदान की थी॥ १४--२७॥ इन (राजा रुक्मकवच)-के रुक्मेषु, प॒थुरुक्म, ज्यामघ, परिघ और हरिनामक पाँच पुत्र हुए, जो महान् पराक्रमी एवं श्रेष्ठ धनुर्धर थे । पिता रुक्मकवचने इनमेंसे परिघ और हरि--इन दोनांको विदेह देशके राज-पदपर नियुक्त कर

English

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अध्याय ३०

श्लोक 36

इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी संपूज्या सततं राजन् न चैनां शयने ह्वय

iyaṃ cāpi kumārī te śarmiṣṭhā vārṣaparvaṇī saṃpūjyā satataṃ rājan na caināṃ śayane hvaya

हिन्दी अर्थ

दिया। रुक्मेषु प्रधान राजा हुआ और पृथुरुक्म उसका आश्रित बन गया। उन लोगोंने ज्यामघको राज्यसे निकाल दिया । वहाँ एकत्र ब्राह्मणद्वारा समझाये-बुझाये जानेपर वह प्रशान्त-चित्त होकर वानप्रस्थीरूपसे आश्रमोंमें स्थिररूपसे रहने लगा। कुछ दिनोंके पश्चात् वह (एक ब्राह्मणको शिक्षासे) ध्वजायुक्त रथपर सवार हो हाथमें धनुष धारणकर दूसरे देशकी ओर चल पड़ा वह केवल जीविकोपार्जनकी कामनासे अकेले ही नर्मदातटपर जा पहुँचा । वहाँ दूसरोंद्वारा

English

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अध्याय ३०

श्लोक 37

एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम् जगाम स्वपुरं हृष्टः सो ऽनुज्ञातो महात्मना

evamukto yayātistu śukraṃ kṛtvā pradakṣiṇam jagāma svapuraṃ hṛṣṭaḥ so 'nujñāto mahātmanā

हिन्दी अर्थ

उपभुक्त ऋक्षवान् गिरि (शतपुरा पर्वत-श्रेणी)-पर जाकर निश्चितरूपसे निवास करने लगा। ज्यामघकी सती-साध्वी पल्ली शैव्या प्रौढ़ा हो गयी थी। (उसके गर्भसे) कोई पुत्र न उत्पन्न हुआ। इस प्रकार यद्यपि राजा ज्यामघ पुत्रहीन अवस्थामें ही जीवन यापन कर रहे थे, तथापि उन्होंने दूसरी पल्ली नहीं स्वीकार की । एक बार किसी युद्धमें राजा ज्यामघकी विजय हुई । वहाँ उन्हें (विवाहार्थ) एक कन्या प्राप्त हुई। (पर) उसे लाकर पत्नीको देते हुए राजाने उससे भयपूर्वक कहा--' शुचिस्मिते ! यह (मेरी स्त्री नहीं, ) तुम्हारी स्नुषा (पुत्रवधू) है ।' इस प्रकार कहे जानेपर उसने राजासे पूछा-'यह किसको सुषा है ?'

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 30
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.