Matsya Purana· Matsya Purāṇa
36
अध्याय 36 / 176

Adhyaya 36

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अध्याय ३६

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ३६ स्वर्गतस्तु स राजेन्द्रो न्यवसद्देवसद्मनि पूजितस्त्रिदशैः साध्यैर् मरुद्भिर्वसुभिस्तथा

matsya-purāṇa 36 svargatastu sa rājendro nyavasaddevasadmani pūjitastridaśaiḥ sādhyair marudbhirvasubhistathā

हिन्दी अर्थ

यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोऽपि वा। तेन सत्येन जीवस्व यदि सत्यं वदाम्यहम् ततोऽभिव्याहते तस्य देवी स जीविता तदा एवं प्रत्याहृता तेन देवी सा भृगुणा तदा। मिषतां देवतानां हि तदद्भुतमिवाभवत्

English

aunaka.— That king, on reaching heaven, was venerated by Sfidhyas,. Maratgan/is, Vasus and the Devas. Afterwards, on account of his virtue, he went to Brahmaloka, where he resided for a long number of years. Once upon a time that sacred King Yayfiti chanced to go to the region of Indra, when the latter asked him. — 1-3.

अध्याय ३६

श्लोक 2

देवलोकाद् ब्रह्मलोकं संचरन्पुण्यकृद्वशी अवसत्पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः

devalokād brahmalokaṃ saṃcaranpuṇyakṛdvaśī avasatpṛthivīpālo dīrghakālamiti śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

दृष्टा चेन्द्रो नालभत शर्म काव्यभयात् पुनः। प्रजागरे ततश्चेन्द्रो जयन्तीमिदमब्रवीत् पापको देखकर गम्भीर चिन्तामें पड़ गये। फिर उस देवीके क्रूर विचारको जानकर उस आपत्तिसे उद्धार पानेके लिये उन्होंने अपने सुदर्शन चक्रका ध्यान किया। अस्त्रके आ जानेपर शीघ्र ही कार्य-सम्पादन करनेमें

English

Indra. — " King! tell me plainly what yon said to your son, Puru (who taking your old age roamed about the world', et the time of his coronation?" — 4.

अध्याय ३६

श्लोक 3

स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययातिः शक्रमागतः कथान्ते तत्र शक्रेण पृष्टः स पृथिवीपतिः

sa kadācinnṛpaśreṣṭho yayātiḥ śakramāgataḥ kathānte tatra śakreṇa pṛṣṭaḥ sa pṛthivīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

निपुण एवं भयभीत विष्णु क्रुद्ध हो उठे और तुरंत ही उन्होंने अपना अस्त्र लेकर (पापसे) डरते-डरते उसके सिरको काट गिराया। इधर ऐश्वर्यशाली भृगु उस भयंकर स्त्री-वधको देख कुपित हो गये और वे उस भार्या-वधको निमित्त बनाकर भगवान् विष्णुको शाप देते हुए बोले- “विष्णो! चूँकि ' स्त्री अवध्य होती है'—इस धर्मको जानते हुए भी तुमने मेरी भार्याका प्राण हरण किया है, अतः तुम मृत्युलोकमें सात बार मानव-योनिमें जन्म धारण करोगे।' उसी शापके कारण धर्मका हास हो जानेपर भगवान् विष्णु लोकके कल्याणके लिये मृत्युलोकमें पुनः-पुनः मानव- योनिमें अवतीर्ण होते हैं

English

Yay&ti. — " After making over charge of my realm, with the approval and advice of my ministers, and the people Prakfiti) to Purn, 1 told him;

अध्याय ३६

श्लोक 4

यदा स पूरुस्तव रूपेण राजञ् जरां गृहीत्वा प्रचचार लोके तदा राज्यं सम्प्रदायैव तस्मै त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम्

yadā sa pūrustava rūpeṇa rājañ jarāṃ gṛhītvā pracacāra loke tadā rājyaṃ sampradāyaiva tasmai tvayā kimuktaḥ kathayeha satyam

हिन्दी अर्थ

भगवान् विष्णुको ऐसा शाप देकर भृगुने फिर तुरंत ही (ख्यातिके) उस सिरको उठा लिया और उसे देवीके शरीरके निकट लाकर तथा उस शरीरसे जोड़कर इस प्रकार कहा--'देवि! यह तुम विष्णुद्वारा मार डाली गयी हो, अब मैं तुम्हें पुनः जिलाये देता हूँ।' यों कहकर उसके शरीरको सिरसे जोड़कर कहा--“जी उठो'। पुनः वे प्रतिज्ञा करते हुए बोले--' यदि मैं सम्पूर्ण धर्मोको जानता हूँ तथा मेरे द्वारा सम्पूर्ण धर्मोका आचरण भी किया गया हो अथवा यदि

English

' You will be the sovereign of the country lying between the Ganges and the Yamuna. Your other brothers will be under yon and rnling over the lands bordering on your kingdom'." At the same time, the following piece of advice was also given to Jiiin.Man devoid of anger is superior to one full of it; man with forbearance is superior to one who is bereft of it; as man is superior to non-hninan beings, so a learned man is superior to an illiterate fool. One who shows forgiveness to another who abuses?>im in angei', eon.sumes that angry being, and gets all hi.s virtue. One should not utter such a harsh word as may csuise pain to another. One should not accept anything from a low caste man. One should not use a speech that would grieve others. A harsh speaker, whose words pierce others like nails, should be considered a low creature, who goes to hell. A man should always win the admiration of high class people, and should always be defended by them at his back, should bear their criticism, obey their advice, and lea4 & Harsh words penetrate a man like arrows

अध्याय ३६

श्लोक 5

प्रकृत्यनुमते पूरुं राज्ये कृत्वेदमब्रुवम् गङ्गायमुनयोर्मध्ये कृत्स्नो ऽयं विषयस्तव मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरो ऽन्ते ऽधिपास्तव

prakṛtyanumate pūruṃ rājye kṛtvedamabruvam gaṅgāyamunayormadhye kṛtsno 'yaṃ viṣayastava madhye pṛthivyāstvaṃ rājā bhrātaro 'nte 'dhipāstava

हिन्दी अर्थ

में सत्यवादी होऊँ तो उस सत्यके प्रभावसे तुम जीवित हो जाओ।' तत्पश्चात् देवीके शरीरका शीतल जलसे प्रोक्षण करके उन्होंने पुन: कहा--“ जीवित हो जाओ!' भृगुके यों कहते ही देवी तुरंत जीवित होकर उठ बैठी। उस देवीको सोकर उठी हुईकी भाँति जीवित देखकर सभी प्राणी 'ठीक है, ठीक है '--ऐसा कहने लगे। उनका वह साधुवाद सभी दिशाओंमें गूँज उठा। इस प्रकार महर्षि भुगुने सभी कर दिया, यह एक अद्भुत-सी बात हुई

English

and cause grief; they should therefore be avoided by sensible men. In the three worlds there is nothing superior to friendship, charity and sweet speech; consequently one should always be gentle in his speech and should show obedience to high class men and not curse any one." — 5-13.

अध्याय ३६

श्लोक 6

अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्टस् तथा तितिक्षुर् अतितिक्षोर् विशिष्टः अमानुषेभ्यो मानुषश्च प्रधानो विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः

akrodhanaḥ krodhanebhyo viśiṣṭas tathā titikṣur atitikṣor viśiṣṭaḥ amānuṣebhyo mānuṣaśca pradhāno vidvāṃstathaivāviduṣaḥ pradhānaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार व्यवस्थित चित्तवाले भृगुद्वारा अपनी पल्रीको जीवित किया हुआ देखकर इन्द्रको शुक्राचार्यके भयसे शान्ति नहीं मिल पा रही थी। वे रातभर जागते ही रहते। अन्तमें बुद्धिमान् इन्द्र बहुत कुछ सोच- विचारकर अपनी कन्या जयन्तीसे यह वचन बोले-

English

Here ends the thirty-sixth chapter, dealing with the adoice given by Yaydti to his son Puru at the laUer's coronation.

अध्याय ३६

श्लोक 7

आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन् मन्युमेव तितिक्षति आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति

ākruśyamāno nākrośen manyumeva titikṣati ākroṣṭāraṃ nirdahati sukṛtaṃ cāsya vindati

हिन्दी अर्थ

यह कथा वाल्मीकीय रामायण १। २४। २१-२५, योगवासिष्ठ १। १। ६१-६५ तथा भविष्यपुराण ४। ६३। १-१३ में एष काव्यो ह्यमित्राय व्रतं चरति दारुणम्। तेनाहं व्याकुलः पुत्रि कृतो मतिमता भृशम् काव्यमाराधयस्वैनं यथा तुष्येत स द्विजः। गच्छ त्वं तस्य दत्तासि प्रयत्नं कुरु मत्कृते

English

TEE MATSYA PURAEAU.

अध्याय ३६

श्लोक 8

नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परम् अभ्याददीत ययास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेद्रुशतीं पापलौल्याम्

nāruntudaḥ syānna nṛśaṃsavādī na hīnataḥ param abhyādadīta yayāsya vācā para udvijeta na tāṃ vadedruśatīṃ pāpalaulyām

हिन्दी अर्थ

दृष्टा च तं पात्यमानं देवी काव्यमवस्थितम्। पित्रा यथोक्तं वाक्यं सा काव्ये कृतवती तदा

English

TEE MATSYA PURAEAU.

अध्याय ३६

श्लोक 9

अरुन्तुदं पुरुषं तीव्रवाचं वाक्कण्टकैर् वितुदन्तं मनुष्यान् विद्याद् अलक्ष्मीकतमं जनानां मुखे निबद्धं निरृतिं वहन्तम्

aruntudaṃ puruṣaṃ tīvravācaṃ vākkaṇṭakair vitudantaṃ manuṣyān vidyād alakṣmīkatamaṃ janānāṃ mukhe nibaddhaṃ nirṛtiṃ vahantam

हिन्दी अर्थ

गात्रसंवाहनैः काले सेवमाना त्वचः सुखैः। ब्रतचर्यानुकूलाभिरुवास बहुलाः समाः पूर्णेऽथवा ब्रते तस्मिन् घोरे वर्षसहस्त्रके। वरेण च्छन्दयामास काव्यं प्रीतो भवस्तदा 'बेटी! ये शुक्राचार्य मेरे शत्रुओंके हितार्थ भीषण व्रतका अनुष्ठान कर रहे हैं। इससे बुद्धिमान् काव्य (उन शुक्राचार्य) - ने मुझे अत्यन्त व्याकुल कर दिया है, अतः तुम उनके पास

English

TEE MATSYA PURAEAU.

अध्याय ३६

श्लोक 10

सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्यात् सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात् सदा सताम् अतिवादांस्तितिक्षेत् सतां वृत्तं पालयन्साधुवृतः

sadbhiḥ purastādabhipūjitaḥ syāt sadbhistathā pṛṣṭhato rakṣitaḥ syāt sadā satām ativādāṃstitikṣet satāṃ vṛttaṃ pālayansādhuvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

जाओ और मेरा कार्य सिद्ध करो वहाँ तुम आलस्यरहित होकर थकावरको दूर करनेवाले तथा उनके मनोऽनुकूल विभिन्न प्रकारके शुभ उपचारोंद्रा शुक्राचार्यकी ऐसी उत्तम आराधना करो, जिससे वे ब्राह्मण प्रसन्न हो जायँ। जाओ, आज मैं तुम्हें शुक्राचार्यको समर्पित कर दे रहा हुँ । तुम मेरे कल्याणके लिये प्रयत्न करो ।' इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्रपुत्री जयन्ती पिताके वचनको अङ्गीकार करके उस स्थानके लिये प्रस्थित हुई, जहाँ बैठकर

English

TEE MATSYA PURAEAU.

अध्याय ३६

श्लोक 11

वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैर् आहतः शोचति वा त्र्यहानि परस्य नो मर्मसु ते पतन्ति तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु

vāksāyakā vadanānniṣpatanti yair āhataḥ śocati vā tryahāni parasya no marmasu te patanti tānpaṇḍito nāvasṛjetpareṣu

हिन्दी अर्थ

शुक्राचार्य भीषण तपका अनुष्ठान कर रहे थे। वहाँ जाकर जयन्तीने शुक्राचार्यको नीचे मुख किये हुए कुण्डधार नामक यक्षद्वारा गिराये गये तथा गिराये जाते हुए कण- धूमका पान करते हुए देखा। उनके निकट जाकर जयन्तीने जब यह लक्ष्य किया कि शुक्राचार्य उस गिराये जाते हुए

English

TEE MATSYA PURAEAU.

अध्याय ३६

श्लोक 12

नास्तीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु किंचन यथा मैत्री च लोकेषु दानं च मधुरा च वाक्

nāstīdṛśaṃ saṃvananaṃ triṣu lokeṣu kiṃcana yathā maitrī ca lokeṣu dānaṃ ca madhurā ca vāk

हिन्दी अर्थ

धूमका पान करते हुए अपने स्वरूपके ध्यानमें शान्तभावसे अवस्थित हैं, उनके शरीरपर विभूति लगी है और वे

English

TEE MATSYA PURAEAU.

अध्याय ३६

श्लोक 13

तस्मात्सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित् पूज्यान्सम्पूजयेद् दद्यान् नाभिशापं कदाचन

tasmātsāntvaṃ sadā vācyaṃ na vācyaṃ paruṣaṃ kvacit pūjyānsampūjayed dadyān nābhiśāpaṃ kadācana

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त दुर्बल हो गये हैं, तब पिताने जैसी सीख दी थी, उसीके अनुसार वह शुक्राचार्यके प्रति व्यवहार करने लगी। मधुर भाषण करनेवाली जयन्ती अनुकूल वचनोंद्वारा शुक्राचार्यकी स्तुति करती थी, समय-समयपर उनके सिर-हाथ-पैर आदि अङ्गोंको दबाकर उनकी सेवा करती थी। इस प्रकार व्रतचर्याके अनुकूल प्रवृत्तियोंद्वारा उनकी सेवा करती हुई वह बहुत वर्षांतक उनके निकट निवास करती रही। एक सहस्र वर्षकी अवधिवाले उस भयंकर धूमत्रतके पूर्ण होनेपर भगवान्

English

TEE MATSYA PURAEAU.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 36
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.