Matsya Purana· Matsya Purāṇa
35
अध्याय 35 / 176

Adhyaya 35

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अध्याय ३५

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ३५ एवं स नाहुषो राजा ययातिः पुत्रमीप्सितम् राज्ये ऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थो ऽभवन्मुनिः

matsya-purāṇa 35 evaṃ sa nāhuṣo rājā yayātiḥ putramīpsitam rājye 'bhiṣicya mudito vānaprastho 'bhavanmuniḥ

हिन्दी अर्थ

दृष््रासुरगणा देवान् प्रगृहीतायुधान् पुन: । उत्पेतुः सहसा ते वै संत्रस्तास्तान् वचोऽब्रुवन् अनाचार्या वयं देवास्त्यक्तशस्त्रास्त्ववस्थिताः। चीरकृष्णाजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः

English

unaka.— Thus King YaySti, making over his Empire to his son, Puru, turned an anchoi-ite; and living on fruits, passed a number of days in that forest and afterwards went to Iteaven, where Iio began to pass his days in happiness. iScnneti.'nc after, Indra hurled liim to the earth, but ho managed to gain liis footing on flie celestial soil.and.again rose to heaven oirin/j to his being in tonob ivitli tiie Kings, Astaka, Jic. It is said that Yayati returned to houvru Innn tiio fijoiaincnt in company of the Kings A%(aka, ibi Vasumai and I'ratarvlana. — 1-5.

अध्याय ३५

श्लोक 2

उषित्वा वनवासं स ब्राह्मणैः सह संश्रितः फलमूलाशनो दान्तो यथा स्वर्गमितो गतः

uṣitvā vanavāsaṃ sa brāhmaṇaiḥ saha saṃśritaḥ phalamūlāśano dānto yathā svargamito gataḥ

हिन्दी अर्थ

रणे विजेतुं देवांश्च न शक्ष्यामः कथञ्चन। अयुद्धेन प्रपत्स्यामः शरणं काव्यमातरम् हो गये। युद्ध बंद हो जानेपर शुक्राचार्यने असुरोंसे कहा-- “दानवो! तुमलोग अपने अभिमान आदि कुप्रवृत्तियोंका त्याग कर तपस्यामें लग जाओ और कुछ कालतक उपासना करो; क्योंकि काल ही अभीष्ट कार्यका साधक होता है। इस प्रकार तुमलोग मेरे पिताजीके आश्रममें निवास करते हुए मेरे लौटनेकी प्रतीक्षा करो।' असुरोंको ऐसी शिक्षा देकर शुक्राचार्य महादेवजीके पास जा पहुँचे (और उनसे निवेदन करने लगे)

English

atanika. — "Sage! tell us in di-tail Uow Yayili Yas hurled down to the earth and how he again wctit to heaven. King \ayAli was powerful like Indra, radiant like tlifSiin, and wa> tlie promoter of the Kurnclan. (.) Sage! I am eager to hear the story oi id- ci ltslial and niundauo glory."—

अध्याय ३५

श्लोक 3

स गतः स्वर्गवासं तु न्यवसन्मुदितः सुखी कालस्य नातिमहतः पुनः शक्रेण पातितः

sa gataḥ svargavāsaṃ tu nyavasanmuditaḥ sukhī kālasya nātimahataḥ punaḥ śakreṇa pātitaḥ

हिन्दी अर्थ

शुक्राचार्यने कहा--' देव! मैं देवताओंके पराभव तथा असुरोंकी विजयके लिये आपसे उन मन्त्रोंको जानना चाहता हूँ, जो बृहस्पतिके पास नहीं हैं।' ऐसा कहे जानेपर महादेवजीने कहा--' भार्गव ! तुम्हारा कल्याण हो। इसके लिये तुम्हें कठोर व्रतका पालन करना

English

aunaka.— " Hear \'ou all thf '..acred histoiy of Yayiiti which is the dispeller of all sins Hear it with atteniion, I am going to relate it to you."-in.

अध्याय ३५

श्लोक 4

विवशः प्रच्युतः स्वर्गाद् अप्राप्तो मेदिनीतलम् स्थितश्चासीद् अन्तरिक्षे स तदेति श्रुतं मया

vivaśaḥ pracyutaḥ svargād aprāpto medinītalam sthitaścāsīd antarikṣe sa tadeti śrutaṃ mayā

हिन्दी अर्थ

करके कनीके धुएँका पान करोगे, तब कहीं तुम्हें उन महादेवजीकी आज्ञा शिरोधार्य कर उनके चरणोंका स्पर्श किया और कहा--' देव ठीक है, मैं वैसा ही करूँगा। प्रभो ! मैं आजसे ही आपके आदेशानुसार व्रतपालनमें लग रहा हूँ।' इस प्रकार महादेवजीसे विदा होकर शुक्राचार्य धूमको उत्पन्न करनेवाले कुण्डधार यक्षके निकट गये और असुरोंके हितार्थ मन्त्रप्रा्िके लिये ब्रह्मचर्यपूर्वक महेश्वरके आश्रममें निवास करने लगे। तदनन्तर जब देवताओंको यह ज्ञात हुआ कि असुरांद्वारा राज्य छोड़नेमें ऐसी कूटनीति

English

King Yayati, after putting his sou on the throne, went to the forest as an anchorite, in other word.s, he made over his vast dominions to Puru and put his otiior sons, Yadu, &c., to discharge the various offices of the state, after doing which he passed a great number of days in the forest, living on fruits and herbs. Hy suVxlning his mind and conquering his anger he regularly performed agniliotra and offered libations to the Deities and the manes of ancestors, according to the rules prescribed for anchorites. He entertained his guests by offering them the jungle fruits and ate what he could get by picking np gleanings of Ijarvest (Siloncblia-vritti). Thus he passed a thousand years. Tlien be lived only on water for three years and kept up his vow of silence. Afterwards he wanned himself with the

अध्याय ३५

श्लोक 5

तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतिः राज्ञा वसुमता सार्धम् अष्टकेन च वीर्यवान् प्रतर्दनेन शिबिना समेत्य किल संसदि

tata eva punaścāpi gataḥ svargamiti śrutiḥ rājñā vasumatā sārdham aṣṭakena ca vīryavān pratardanena śibinā sametya kila saṃsadi

हिन्दी अर्थ

और यह छिद्र था, तब वे अमर्षसे भर गये; फिर तो वे संगठित हो कवच धारणकर हथियारोंसे सुसज्जित हो बृहस्पतिजीको आगे करके असुरोंपर टूट पड़े इस प्रकार पुनः देवताओंको आयुध धारण करके आक्रमण करते देख असुरगण सहसा भयभीत होकर उठ खड़े हुए और देवताओंसे बोले ' देवगण! हमलोगोंने शस्त्रास्त्र रख दिया है, आपलोगोंद्वारा हमें अभयदान मिल

English

Ohapteb xxxvl.

अध्याय ३५

श्लोक 6

कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः कथमिन्द्रेण भगवन् पातितो मेदिनीतले

karmaṇā kena sa divaṃ punaḥ prāpto mahīpatiḥ kathamindreṇa bhagavan pātito medinītale

हिन्दी अर्थ

चुका है, मेरे गुरुदेव इस समय ब्रतमें स्थित हैं--ऐसी परिस्थितिमें अभय-दान देकर भी आपलोग हमारा वध करनेकी इच्छासे क्यों आये हैं इस समय हमलोग बिना गुरुके हैं, शस्त्रास्त्रोंका परित्याग करके निहत्थे खड़े हैं, तपस्वियोंकी भाँति चीर और काला मृगचर्म धारण किये हुए हैं, निष्क्रिय और परिग्रहरहित हैं। ऐसी दशामें हम किसी प्रकार भी युद्धमें आप देवताओंको जीतनेमें समर्थ नहीं हैं, अतः बिना युद्ध किये ही काव्यकी माताकी शरणमें जा रहे हैं। एवमुक्त्वासुरान्योऽन्यं शरणं काव्यमातरम्। प्रापद्यन्त ततो भीतास्तेभ्योऽदादभयं तु सा

English

heat of fire around him, and for aiz months he practised penance by standing on one leg only. The glory of the king's ascerticism went up to heaven from the earth. — 11-17.

अध्याय ३५

श्लोक 7

सर्वमेतद् अशेषेण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः कथ्यमानं त्वया विप्र देवर्षिगणसंनिधौ

sarvametad aśeṣeṇa śrotumicchāmi tattvataḥ kathyamānaṃ tvayā vipra devarṣigaṇasaṃnidhau

हिन्दी अर्थ

तथा चाभ्युपपन्नांस्तान् दृष्टा देवास्ततोऽसुरान्। अभिजग्मुः प्रसह्मैतानविचार्य बलाबलम् ततस्तान् बाध्यमानांस्तु देवैर्दृष्ट्रासुरांस्तदा। देवी क्रुद्धाब्रवीद् देवाननिन्द्रान् व: करोम्यहम्

English

Here ends the thirty-fifth chapter, dealing with the forest life of Yaydti.

अध्याय ३५

श्लोक 8

देवराजसमो ह्य् आसीद् ययातिः पृथिवीपतिः वर्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः

devarājasamo hy āsīd yayātiḥ pṛthivīpatiḥ vardhanaḥ kuruvaṃśasya vibhāvasusamadyutiḥ

हिन्दी अर्थ

तस्तम्भ देवी बलवद् योगयुक्ता तपोधना ततस्तं स्तम्भितं दृष्टा इन्द्रं देवाश्च मूकवत्। प्राद्रवन्त ततो भीता इन्द्रं दृष्ट्रा वशीकृतम् गतेषु सुरसंघेषु शक्रं विष्णुरभाषत।

English

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अध्याय ३५

श्लोक 9

तस्य विस्तीर्णयशसः सत्यकीर्तेर् महात्मनः श्रोतुमिच्छामि देवेश दिवि चेह च सर्वशः

tasya vistīrṇayaśasaḥ satyakīrter mahātmanaḥ śrotumicchāmi deveśa divi ceha ca sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरंदर: । विष्णुना रक्षितं दृष्टा देवी क्रुद्धा वचोऽब्रवीत् एषा त्वां विष्णुना सार्ध दहामि मघवन् बलात्। मिषतां सर्वभूतानां दृश्यतां मे तपोबलम्

English

Here ends the thirty-fifth chapter, dealing with the forest life of Yaydti.

अध्याय ३५

श्लोक 10

हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तमां कथाम् दिवि चेह च पुण्यार्थां सर्वपापप्रणाशिनीम्

hanta te kathayiṣyāmi yayāteruttamāṃ kathām divi ceha ca puṇyārthāṃ sarvapāpapraṇāśinīm

हिन्दी अर्थ

भयाभिभूतौ तौ देवाविन्द्रविष्णू बभूवतुः। कथं मुच्येव सहितौ विष्णुरिन्द्रमभाषत ततः समीक्ष्य विष्णुस्तां स्त्रीवधे कृच्छुमास्थितः। अभिध्याय ततश्चक्रमापदुद्धरणे तु तत्

English

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अध्याय ३५

श्लोक 11

ययातिर्नाहुषो राजा पूरुं पुत्रं कनीयसम् राज्ये ऽभिषिच्य मुदितः प्रवव्राज वनं तदा

yayātirnāhuṣo rājā pūruṃ putraṃ kanīyasam rājye 'bhiṣicya muditaḥ pravavrāja vanaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

वहाँ हमलोग इस विषम संकटके समयको तबतक व्यतीत करेंगे, जबतक हमारे गुरुदेव लौटकर आ नहीं जाते। गुरुदेव शुक्राचार्यके वापस आ जानेपर हमलोग कवच और शस्त्रास्त्रसे लैस होकर आपलोगोंके साथ युद्ध करेंगे।' इस प्रकार भयभीत हुए असुरगण परस्पर परामर्श करके शुक्राचार्यकी माताकी शरणमें चले गये। तब उन्होंने असुरोंको अभयदान देते हुए कहा-- दानवो! मत डरो, मत डरो, भय छोड़ दो। मेरे निकट रहते हुए तुमलोगोंको

English

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अध्याय ३५

श्लोक 12

अन्तेषु स विनिक्षिप्य पुत्रान् यदुपुरोगमान् फलमूलाशनो राजा वने ऽसौ न्यवसच्चिरम्

anteṣu sa vinikṣipya putrān yadupurogamān phalamūlāśano rājā vane 'sau nyavasacciram

हिन्दी अर्थ

किसी प्रकारका भय नहीं प्राप्त हो सकता' तत्पश्चात् शुक्रमाताद्वारा असुरोंको सुरक्षित देखकर है--ऐसा) विचार न करके बलपूर्वक उनपर धावा बोल दिया। उस समय देवताओंद्वारा उन असुरोंको पीड़ित किया जाता हुआ देखकर (शुक्रमाता ख्याति) देवी क्रुद्ध होकर देवताओंसे बोलीं--'मैं अभी-अभी तुमलोगोंको

English

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अध्याय ३५

श्लोक 13

स जितात्मा जितक्रोधस् तर्पयन् पितृदेवताः अग्नींश्च विधिवज्जुह्वन् वानप्रस्थविधानतः

sa jitātmā jitakrodhas tarpayan pitṛdevatāḥ agnīṃśca vidhivajjuhvan vānaprasthavidhānataḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्र-रहित कर देती हूँ।' उस समय उन तपस्विनी एवं योगिनी देवीने सभी सामग्रियोंको एकत्र करके अभिचार- दिया । अपने स्वामी इन्द्रको स्तम्भित हुआ देखकर देवगण मूक-से हो गये और इन्द्रको असुरोंके वशीभूत हुआ देखकर वहाँसे भाग खड़े हुए। देवगणके भाग जानेपर भगवान् विष्णुने इन्द्रसे कहा--' सुरश्रेष्ठ ! तुम्हारा कल्याण

English

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अध्याय ३५

श्लोक 14

अतिथीन् पूजयन्नित्यं वन्येन हविषा विभुः शिलोञ्छवृत्तिमास्थाय शेषान्नकृतभोजनः

atithīn pūjayannityaṃ vanyena haviṣā vibhuḥ śiloñchavṛttimāsthāya śeṣānnakṛtabhojanaḥ

हिन्दी अर्थ

हो। तुम मेरे शरीरमें प्रवेश कर जाओ, मैं तुम्हें यहाँसे अन्यत्र पहुँचा दूँगा।' ऐसा कहे जानेपर इन्द्र भगवान् विष्णुके शरीरमें प्रविष्ट हो गये इस प्रकार भगवान् विष्णुद्वारा इन्द्रको सुरक्षित देखकर (ख्याति) देवी कुपित होकर ऐसा वचन बोली-' मघवन्! यह मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके देखते-देखते विष्णुसहित तुमको बलपूर्वक जलाये देती हूँ। तुम दोनों मेरे तपोबलको देखो ' ॥९४--१००॥ यह सुनकर वे दोनों देवता-इन्द्र और विष्णु भयभीत हो गये। तब विष्णुने इन्द्रसे कहा-'हम दोनों एक साथ किस प्रकार (इस संकटसे) मुक्त हो सकेंगे ?' यह सुनकर इन्द्र बोले--' प्रभो! जबतक यह हम दोनोंको

English

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अध्याय ३५

श्लोक 15

पूर्णं सहस्रं वर्षाणाम् एवंवृत्तिर् अभून्नृपः अम्बुभक्षः स चाब्दांस्त्रीन् आसीन् नियतवाङ्मनाः

pūrṇaṃ sahasraṃ varṣāṇām evaṃvṛttir abhūnnṛpaḥ ambubhakṣaḥ sa cābdāṃstrīn āsīn niyatavāṅmanāḥ

हिन्दी अर्थ

जला नहीं देती है, उसके पूर्व ही आप इसे मार डालिये। मैं तो आपके द्वारा विशेषरूपसे अभिभूत हो चुका हूँ, इसलिये आप ही इसका वध कर दीजिये, अब विलम्ब मत कीजिये।' तब भगवान् विष्णु एक ओर उस देवीकी ततस्तु त्वरया युक्तः शीघ्रकारी भयान्वितः। ज्ञात्वा विष्णुस्ततस्तस्याः क्रूरं देव्याश्रिकीर्षितम् । क्रुद्धः स्वमस्त्रमादाय शिरश्चिच्छेद वै भिया

English

Here ends the thirty-fifth chapter, dealing with the forest life of Yaydti.

अध्याय ३५

श्लोक 16

ततस्तु वायुभक्षो ऽभूत् संवत्सरमतन्द्रितः पञ्चाग्निमध्ये च तपस् तेपे संवत्सरं पुनः

tatastu vāyubhakṣo 'bhūt saṃvatsaramatandritaḥ pañcāgnimadhye ca tapas tepe saṃvatsaraṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

ततोऽभिशस्तो भृगुणा विष्णुर्भार्यावधे तदा यस्मात् ते जानतो धर्ममवध्या स्त्री निषूदिता । तस्मात् त्वं सप्तकृत्वेह मानुषेघूपपत्स्यसि ततस्तेनाभिशापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः। लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह

English

Here ends the thirty-fifth chapter, dealing with the forest life of Yaydti.

अध्याय ३५

श्लोक 17

एकपादस्थितश्चासीत् षण्मासान् अनिलाशनः पुण्यकीर्तिस्ततः स्वर्गं जगामावृत्य रोदसी

ekapādasthitaścāsīt ṣaṇmāsān anilāśanaḥ puṇyakīrtistataḥ svargaṃ jagāmāvṛtya rodasī

हिन्दी अर्थ

अनुव्याहृत्य विष्णुं स तदादाय शिरस्त्वरन्। समानीय ततः कायमसौ गृह्योदमन्रवीत् एषा त्वं विष्णुना देवि हता संजीवयाम्यहम्। ततस्तां योज्य शिरसा अभिजीवेति सोऽब्रवीत्

English

Here ends the thirty-fifth chapter, dealing with the forest life of Yaydti.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 35
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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