अध्याय ४०
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ४० चरन्गृहस्थः कथमेति देवान् कथं भिक्षुः कथम् आचार्यकर्मा वानप्रस्थः सत्पथे संनिविष्टो बहून्यस्मिन् सम्प्रति वेदयन्ति
matsya-purāṇa 40 carangṛhasthaḥ kathameti devān kathaṃ bhikṣuḥ katham ācāryakarmā vānaprasthaḥ satpathe saṃniviṣṭo bahūnyasmin samprati vedayanti
हिन्दी अर्थ
नहीं किया, इसलिये मेरे प्रति किये हुए उस अपमानके कारण तुमलोग पराभवको प्राप्त हुए हो।' शुक्राचार्यके यों कहनेपर प्रह्मदकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये। तब वे गद्गद वाणीद्वारा उनसे प्रार्थना करते हुए बोले--' भृगुनन्दन! आप हमलोगोंका परित्याग न करें। भार्गव! हमलोग आपके आश्रित, त्वय्यदृष्टे वयं तेन देवाचार्येण मोहिता: । भक्तानहसि वै ज्ञातुं तपोदीर्घण चक्षुषा
English
Tlie gnrtas or pii sh nlo bo feven in jnunbc'r, and the circles should be tlirec inches (j'arva". u*. j.i Ijcloiit, Flags and buntings