अध्याय ४१
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ४१ कतरस्त्वेतयोः पूर्वं देवानामेति सात्म्यताम् उभयोर्धावतो राजन् सूर्यचन्द्रमसोरिव
matsya-purāṇa 41 katarastvetayoḥ pūrvaṃ devānāmeti sātmyatām ubhayordhāvato rājan sūryacandramasoriva
हिन्दी अर्थ
उस समय हैत्यगण मारे गये । अवशिष्ट हैत्यगण शुक्राचार्यके शापसे अभिभूत होनेके कारण जब सब ओरसे निराधार हो गये, साथ ही देवताओंने उन्हें खदेड़ना आरम्भ किया, तब वे विवश होकर रसातलमें प्रविष्ट हो गये । इस प्रकार देवगण दानवोंको बड़ी कठिनाईसे उद्यमहीन अर्थात् युद्धविमुख कर पाये। तभीसे शुक्राचार्यके नैमित्तिक शापके कारण धर्मका विशेषरूपसे हास हो जानेपर धर्मकी पुनः स्थापना
English
After garlanding the warders and patting sandal paste on them, the Aohftrya priest should ask the warders (tlie DrArapAla priests) by say- ing patbadbram" to chant the Veda. — 27.