अध्याय ५८
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ५८ जलाशयगतं विष्णुम् उवाच रविनन्दनः तडागारामकूपानां वापीषु नलिनीषु च
matsya-purāṇa 58 jalāśayagataṃ viṣṇum uvāca ravinandanaḥ taḍāgārāmakūpānāṃ vāpīṣu nalinīṣu ca
हिन्दी अर्थ
प्राप्त करता है। इस प्रकार मनुष्य जिस-जिस वस्तुकी अभिलाषा करता है, उसे वह प्रचुरमात्रामें प्राप्त हो जाती है। जो निष्कामभावसे इसका अनुष्ठान करता है, वह परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ १०६--११८ ॥ और फलकी दृष्टिसे ब्रह्माने कोटिहोमको इस लक्षहोमसे सौ गुना अधिक फलदायक बतलाया है। इसमें भी ग्रहों एवं देवोंके आवाहन, विसर्जन, स्नान तथा दानमें प्रयुक्त होनेवाले होममन्त्र पहलेके ही हैं। केवल कुण्ड, मण्डप
English
Sflta said: — The King Vaivasvata Maim asked the Lord, who was lying in the water in the form of fish, to explain to him when should ihe sacrifioe be performed and what feasts should be employed therein,