Matsya Purana· Matsya Purāṇa
63
अध्याय 63 / 176

Adhyaya 63

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पूर्ण अध्याय पाठ29 श्लोक

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अध्याय ६३

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ६३ अथान्यामपि वक्ष्यामि तृतीयां पापनाशिनीम् रसकल्याणिनीमेतां पुराकल्पविदो विदुः

matsya-purāṇa 63 athānyāmapi vakṣyāmi tṛtīyāṃ pāpanāśinīm rasakalyāṇinīmetāṃ purākalpavido viduḥ

हिन्दी अर्थ

सप्तवाराभिजसेन करसम्पुटयोजितम्। अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे। मृत्तिके हर मे पापं यन्मया दुष्कृतं कृतम् मृत्तिके ब्रह्मदत्तासि कश्यपेनाभिमन्त्रिता। आरुह्य मम गात्राणि सर्व पापं प्रचोदय

English

The Lord iSiva said I shall now describe to you another Tritlyfi ordinance that washes off all the sins and is known as " Rasakaly&ninl tritiyA " by knowera of ancient rituals. In observing it the devotee shoul(| bathe in cow's milk and sesumum on the third day of the bright fortnig. in the month of MAgha. Tbe Goddess should be bathed with honey the juice of sugarcane. The right hand side of the Goddess should be worshipped first and the left baud side afterwards, with the following mantras: — 1-3.

अध्याय ६३

श्लोक 2

माघमासे तु सम्प्राप्ते तृतीयां शुक्लपक्षतः प्रातर्गव्येन पयसा तिलैः स्नानं समाचरेत्

māghamāse tu samprāpte tṛtīyāṃ śuklapakṣataḥ prātargavyena payasā tilaiḥ snānaṃ samācaret

हिन्दी अर्थ

मृत्तिके देहि नः पुष्टिं सर्वं त्वयि प्रतिष्ठितम्। विधान है। कुएँ आदिसे निकाले हुए अथवा बिना निकाले हुए नदी-तालाब आदिके जलसे स्रान करना चाहिए। मन्त्रवेत्ता विद्वान् पुरुषको मूलमन्त्रद्वरा उस जलमें तीर्थको कल्पना करनी चाहिए। '३ नमो

English

The feet and the aukle should be worshipped* after recitiog (i) efwiA ** 1 saluti the Goddess Lalitd," the legs and the knees, after pronouiiciog (3) Sdntyai namat

अध्याय ६३

श्लोक 3

स्नापयेन्मधुना देवीं तथैवेक्षुरसेन च गन्धोदकेन तु पुनर् लेपयेत्कुङ्कुमेन तु दक्षिणाङ्गानि सम्पूज्य ततो वामानि पूजयेत्

snāpayenmadhunā devīṃ tathaivekṣurasena ca gandhodakena tu punar lepayetkuṅkumena tu dakṣiṇāṅgāni sampūjya tato vāmāni pūjayet

हिन्दी अर्थ

नारायणाय '--यह मूलमन्त्र कहा गया है। मनुष्य पहले हाथमें कुश लिये हुए विधिपूर्वक आचमन कर ले, फिर जितेन्द्रिय एवं शुद्ध भावसे अपने चारों ओर चार हाथका चौकोर मण्डल बनाकर उसमें तीर्थकी कल्पना कर इन (वक्ष्यमाण) मन्त्रोद्वारा गङ्गाजीका आवाहन करे--'देवि! तुम भगवान् विष्णुके चरणोंसे प्रकट हुई हो, वैष्णवी कही जाती हो और विष्णु ही तुम्हारे देवता हैं, अतः तुम जन्मसे लेकर मरणान्ततक होनेवाले पापसे हमारी रक्षा करो। जह्कुनन्दिनी ! वायुदेवने स्वर्गलोक, मृत्युलोक और अन्तरिक्षलोक-इन तीनों लोकोंमें जिन साढ़े तीन करोड़ तीर्थोको बतलाया है, वे सभी तुम्हारे भीतर निवास करते हैं। देवोंमें तुम नन्दिनी और नलिनी नामसे

English

the thighs, after reciting (8) W 'w: ".Sriyai naraah,"— 4,

अध्याय ६३

श्लोक 4

ललितायै नमो देव्याः पादौ गुल्फौ ततो ऽर्चयेत् जङ्घां जानुं तथा शान्त्यै तथैवोरुं श्रियै नमः

lalitāyai namo devyāḥ pādau gulphau tato 'rcayet jaṅghāṃ jānuṃ tathā śāntyai tathaivoruṃ śriyai namaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रसिद्ध हो। इसके अतिरिक्त दक्षा, पृथ्वी, विहगा, विश्वकाया, अमृता, शिवा, विद्याधरी, सुप्रशान्ता, ये भी तुम्हारे ही नाम हैं।' स्रानके समय इन पुण्यमय नामोंका कीर्तन करना चाहिए, इससे त्रिपथगामिनी गङ्गा वहाँ उपस्थित हो जाती हैं॥ १--८॥

English

The waist, after reciting (4) W, ** Madftlasftyai namah," the stomhob, aftei

अध्याय ६३

श्लोक 5

मदालसायै तु कटिम् अमलायै तथोदरम् स्तनौ मदनवासिन्यै कुमुदायै च कन्दराम्

madālasāyai tu kaṭim amalāyai tathodaram stanau madanavāsinyai kumudāyai ca kandarām

हिन्दी अर्थ

हाथोंको सम्पुटित करके सात बार इन नामोंका जप करनेके पश्चात् तीन, चार, पाँच अथवा सात बार जलको अपने मस्तकपर छिड्क ले। तत्पश्चात् विधिपूर्वक पृथ्वीको आमन्त्रित करके पहले शरीरमें मिट्टी लगाकर स्नान करना चाहिए। ( आमन्त्रण-मन्त्र इस प्रकार है) "मृत्तिके! तुम अग्निचयन, उख संभरणादिके समय अश्वके द्वारा शुद्ध को जाती हो, तुम (शिवके) रथ और वामन- अवतारमें भगवान् विष्णुके पैरद्वारा भी आक्रान्त होकर शुद्ध हुई हो, सारा धन तुम्हारे ही भीतर वर्तमान है, इसलिये मेरे द्वारा जो कुछ भी पाप घटित हुए हैं, उन सभीको हर लो। मृत्तिके! शतबाहु भगवान् विष्णुने श्यामवर्णका वराहरूप धारण कर तुम्हारा पातालसे उद्धार

English

reoitlng (5) wsrt 'w: ** Amaldyai namah," the breasts, after reciting (6) Mad-

अध्याय ६३

श्लोक 6

भुजं भुजाग्रं माधव्यै कमलायै मुखस्मिते भूललाटं च रुद्राण्यै शंकरायै तथालकान्

bhujaṃ bhujāgraṃ mādhavyai kamalāyai mukhasmite bhūlalāṭaṃ ca rudrāṇyai śaṃkarāyai tathālakān

हिन्दी अर्थ

किया है, पुनः महर्षि कश्यपद्वारा आमन्त्रित होकर तुम ब्राह्मणोंको प्रदान की गयी हो, अतः मेरे आङ्गोंपर आरूढ़ होकर मेरे सारे पापोंको दूर कर दो। मृत्तिके! विश्वके सारे पदार्थ तो तुम्हारे भीतर ही स्थित हैं, अत: तुम हमें पुष्टि प्रदान करो। नमस्ते सर्वलोकानां प्रभवारणि सुत्रते ॥ १२ सुव्रते! तुम समस्त जीवोंकी उत्पत्तिके लिये अरणिस्वरूपा हो,

English

avAsinyai namal/' the shoulders, after reciting (7) 51 KumudAyai nainah.*-5.

अध्याय ६३

श्लोक 7

मुकुटं विश्ववासिन्यै शिरः कान्त्यै तथार्चयेत् मदनायै ललाटं तु मोहनायै पुनर्भ्रुवौ

mukuṭaṃ viśvavāsinyai śiraḥ kāntyai tathārcayet madanāyai lalāṭaṃ tu mohanāyai punarbhruvau

हिन्दी अर्थ

ये दो मन्त्र तैत्तिरीयारण्यक १०। १। ३-२४ में भी प्राप्त हैं। उनपर सायणका भाष्य बहुत सुन्दर है। ततस्तु तर्पणं कुर्यात् त्रैलोक्याप्यायनाय वै। ब्रह्माणं तर्पयेत्पूर्वं विष्णुं रुद्रं प्रजापतिम् देवा यक्षास्तथा नागा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः। क्रूराः सर्पाः सुपर्णाश्च तरवो जम्बुकाः खगाः

English

Th6 ariDS and the hands, after reciting (8) aiv® *' MAdhavyal namati," the month and the faeep after reoitlng (9) **KaaialAyai uamah," the brows and the forehead,

अध्याय ६३

श्लोक 8

नेत्रे चन्द्रार्धधारिण्यै तुष्ट्यै च वदनं पुनः उत्कण्ठिन्यै नमः कण्ठम् अमृतायै नमः स्तनौ

netre candrārdhadhāriṇyai tuṣṭyai ca vadanaṃ punaḥ utkaṇṭhinyai namaḥ kaṇṭham amṛtāyai namaḥ stanau

हिन्दी अर्थ

वाय्वाधारा जलाधारास्तथैवाकाशगामिनः। निराधाराश्च ये जीवाः पापे धर्मे रताश्च ये कृतोपवीती देवेभ्यो निवीती च भवेत् ततः

English

a( reoitlng (10) " BudrAyai namafi," the locks of hair, after reciting (ll)

अध्याय ६३

श्लोक 9

रम्भायै वामकुक्षिं च विशोकायै नमः कटिम् हृदयं मन्मथाधिष्ण्यै पाटलायै तथोदरम्

rambhāyai vāmakukṣiṃ ca viśokāyai namaḥ kaṭim hṛdayaṃ manmathādhiṣṇyai pāṭalāyai tathodaram

हिन्दी अर्थ

मनुष्यांस्तर्पयेद् भक्त्या ब्रह्मपुत्रानृषींस्तथा। सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः देवब्रह्मऋषीन् सर्वास्तर्पयेदक्षतोदकैः सुकालिनो बर्हिषदस्तथा चैवाज्यपाः पुनः। संतर्प्याः पितरो भक्त्या सतिलोदकचन्दनैः

English

**SankarAyai oamaji."— 6.

अध्याय ६३

श्लोक 10

कटिं सुरतवासिन्यै तथोरुं चम्पकप्रिये जानुजङ्घे नमो गौर्यै गायत्र्यै घुटिके नमः

kaṭiṃ suratavāsinyai tathoruṃ campakapriye jānujaṅghe namo gauryai gāyatryai ghuṭike namaḥ

हिन्दी अर्थ

यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च। वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च वृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वै नमः। दर्भपाणिस्तु विधिना पितृन् संतर्पयेद् बुधः

English

The Coronet, after saying (12) ** YisvayAsinyai namaO," the head, after

अध्याय ६३

श्लोक 11

धराधरायै पादौ तु विश्वकायै नमः शिरः नमो भवान्यै कामिन्यै कामदेव्यै जगत्प्रिये

dharādharāyai pādau tu viśvakāyai namaḥ śiraḥ namo bhavānyai kāminyai kāmadevyai jagatpriye

हिन्दी अर्थ

तुम्हें नमस्कार है।' इस प्रकार मिट्टी लगाकर स्त्रान करनेके पश्चात् विधिपूर्वक आचमन करे। पुनः जलसे बाहर निकलकर दो श्वेत रंगके शुद्ध वस्त्र धारण करे। तत्पश्चात् त्रिलोकीको तृप्त करनेके लिये इस प्रकार तर्पण करना चाहिए। उस समय उपवीती होकर (जनेऊको जैसे पहनते हैं, बायें कंधेपर तथा दाहिने हाथके नीचे कर) सर्वप्रथम देवतर्पण करते हुए इन पक्षिगण तथा जो जीव वायु एवं जलके आधारपर जीवित रहनेवाले हैं, आकाशचारी हैं, निराधार हैं और जो जीव पाप एवं धर्में लगे हुए हैं, उन सबकी तृ्तिके लिये मैं यह जल दे रहा हूँ।” तदनन्तर निवीती

English

reciting (18) aaart ** EAntyai namah," tho left forehead, after reciting (14)

अध्याय ६३

श्लोक 12

आनन्दायै सुनन्दायै सुभद्रायै नमो नमः एवं सम्पूज्य विधिवद् द्विजदाम्पत्यम् अर्चयेत् भोजयित्वान्नपानेन मधुरेण विमत्सरः

ānandāyai sunandāyai subhadrāyai namo namaḥ evaṃ sampūjya vidhivad dvijadāmpatyam arcayet bhojayitvānnapānena madhureṇa vimatsaraḥ

हिन्दी अर्थ

हो जाय (जनेऊको मालाकार कर लें) ॥९--१७॥ फिर भक्तिपूर्वक मनुष्यों तथा ब्रह्मपुत्र ऋषियोंके तर्पणका विधान है--'सनक, सनन्दन, तीसरे सनातन, दिये हुए जलसे सदा तृप्त हो जायँ।' तत्पश्चात् मरीचि,

English

" MadanAyai namah," the brows, after reciting (15) wn; " MohanAyai namah."— 7

अध्याय ६३

श्लोक 13

जलपूरितं तथा कुम्भं शुक्लाम्बरयुगद्वयम् दत्त्वा सुवर्णकमलं गन्धमाल्यैः समर्चयेत्

jalapūritaṃ tathā kumbhaṃ śuklāmbarayugadvayam dattvā suvarṇakamalaṃ gandhamālyaiḥ samarcayet

हिन्दी अर्थ

भृगु और नारद-इन सभी देवर्षियों और ब्रह्मर्षियोंका अक्षत और जलसे तर्पण करनेका विधान है। तदनन्तर अपसव्य होकर (जनेऊको दाहिने कंधेपर रखकर) और बायें घुटनेको भूमिपर टेककर अग्निष्वात्त, सौम्य, हविष्मान्, ऊष्मप, सुकाली, बर्हिषद् तथा अन्य आज्यप नामक पितरोंको भक्तिपूर्वक तिल, जल, चन्दन आदिसे तृप्त करना चाहिए। पुनः बुद्धिमान् मनुष्य हाथमें कुश लेकर यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्षय, औदुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त-इन चौदह दिव्य पितरोंका विधिपूर्वक तर्पण करके इन्हें नमस्कार करे। तत्पश्चात् अपने पिता आदि तथा नाना आदिके नाम और गोत्रका उच्चारण कर भक्तिपूर्वक

English

Tho eyes, after reciting (10) w " ChandrArdhadhArifiyai naiuah," the

अध्याय ६३

श्लोक 14

प्रीयतामत्र कुमुदा गृह्णीयाल्लवणव्रतम् अनेन विधिना देवी मासि मासि सदार्चयेत्

prīyatāmatra kumudā gṛhṇīyāllavaṇavratam anena vidhinā devī māsi māsi sadārcayet

हिन्दी अर्थ

विधानके साथ तर्पण करनेके पश्चात् इस मन्त्रका उच्चारण करे-'जो लोग इस जन्ममें मेरे भाई-बन्धु रहे हों या इनके अतिरिक्त कुटुम्बमें पैदा हुए हों अथवा जन्मान्तरमें भाई-बन्धु रहे हों तथा जो कोई भी मुझसे जलकी इच्छा ३५४ मत्स्यपुराण

English

month, after reotUng (17) 9 ** Tu$tyai namali,'' the throat, after reciting (18)

अध्याय ६३

श्लोक 15

लवणं वर्जयेन्माघे फाल्गुने च गुडं पुनः तैलं राजिं तथा चैत्रे वर्ज्यं च मधु माधवे

lavaṇaṃ varjayenmāghe phālgune ca guḍaṃ punaḥ tailaṃ rājiṃ tathā caitre varjyaṃ ca madhu mādhave

हिन्दी अर्थ

ततश्चाचम्य विधिवदालिखेत् पदामग्रतः। तदुपरान्त विधिपूर्वक आचमनकर अपने सामनेकी भूमिपर कमलका चित्र बनाकर अक्षत, पुष्प आदिसे अक्षताभिः सपुष्पाभिः सजलारुणचन्दनम्। सूर्यकी पूजा करे और प्रयत्नपूर्वक सूर्यके नामोंका कीर्तन अर्घ्यं दद्यात् प्रयत्नेन सूर्यनामानि कीर्तयेत्॥ २७ करते हुए लाल चन्दनमिश्रित जलसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करे। पुनः इस प्रकार प्रार्थना करे--' सूर्यदेव! आप विष्णुरूप हैं, आपको नमस्कार है। विष्णुके मुखस्वरूप सहस्त्ररश्मये नित्यं नमस्ते सर्वतेजसे॥ २८ आपको प्रणाम है। सहस्रकिरणधारी एवं समस्त तेजोंके धामको नित्य अभिवादन है। सर्वेश्वर! दिव्य चन्दनसे नमस्ते रुद्रवपुषे नमस्ते सर्ववत्सल। विभूषित देव! आप रुद्र (शिव)-रूप हैं। आप सम्पूर्ण जगत्स्वामिन् नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूषित ॥ २९ जीवोंके कल्याणकारक तथा उनके प्रति पुत्रवत् प्रेमभाव रखनेवाले हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। पद्मासन! पद्मासन नमस्तेऽस्तु कुण्डलाङ्गदभूषित। आप सदा कुण्डल और बाजूबंदसे सुसज्जित रहते हैं

English

'Utlmlhinyal namah;* the bteasto, after reoitlng (19) WfA nn: AmritAyai naiiia|u'*> The left abdomen by reoitlng (20) W ** RambhAyai nama,'* the waist, sMlIb* ®W*if (11) mi " YiidkAyai namah," the heart, alter reciting (22) emwfW .h(an- mathAdhiofiyai namab," the stomach, after reciting (8 m: » PitalAyai nainajh''. " S6

अध्याय ६३

श्लोक 16

पानकं ज्येष्ठमासे तु आषाढे चाथ जीरकम् श्रावणे वर्जयेत्क्षीरं दधि भाद्रपदे तथा

pānakaṃ jyeṣṭhamāse tu āṣāḍhe cātha jīrakam śrāvaṇe varjayetkṣīraṃ dadhi bhādrapade tathā

हिन्दी अर्थ

नमस्ते सर्वलोकेश जगत् सर्व विबोधसे॥ ३० आपको अभिवादन है। समस्त लोकोंके अधीश्वर! आप सारे जगत्को उद्बुद्ध करनेवाले हैं, आपको नमस्कार सुकृतं दुष्कृतं चैव सर्व पश्यसि सर्वग। है। सर्वत्र गमन करनेवाले सत्यदेव! आप सम्पूर्ण प्राणियोंके सत्यदेव नमस्तेऽस्तु प्रसीद मम भास्कर॥ ३९ सारे पुण्यों एवं पापोंको देखते रहते हैं, आपको प्रणाम है। भास्कर! मुझपर प्रसन्न हो जाइये । दिवाकर! आपको दिवाकर नमस्तेऽस्तु प्रभाकर नमोऽस्तु ते। अभिवादन है। प्रभाकर! आपको नमस्कार है।' इस प्रकार एवं सूर्य नमस्कृत्य त्रिःकृत्वाथ प्रदक्षिणम् । प्रार्थना करनेके बाद तीन बार प्रदक्षिणा कर सूर्यको म् नमस्कार करे। पुनः ब्राह्मण, गौ और सुवर्णका स्पर्श

English

THE MATSYA PaEANAM. The walatk after reciting (S4) <*daratv&alnyal namai,** the thighs, sfter T®-

अध्याय ६३

श्लोक 17

घृतमाश्वयुजे तद्वद् ऊर्जे वर्ज्यं च माक्षिकम् धान्यकं मार्गशीर्षे तु पौषे वर्ज्या च शर्करा

ghṛtamāśvayuje tadvad ūrje varjyaṃ ca mākṣikam dhānyakaṃ mārgaśīrṣe tu pauṣe varjyā ca śarkarā

हिन्दी अर्थ

द्विजं गां काञ्चनं स्पृष्ट्वा ततश्च स्वगृहं व्रजेत्॥ ३२ करनेके पश्चात् अपने घर जाना चाहिए॥ २७--३२॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे स्त्रानविधिर्नाम द््यधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें स्नानविधि नामक एक सौ दोवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Oitihg (25) Wiftvt " ChaiDpskaprtydjal iiama{i/' the knees and the legs, after reottlng (25)

अध्याय ६३

श्लोक 18

व्रतान्ते करकं पूर्णम् एतेषां मासि मासि च दद्याद्द्विकालवेलायां पूर्णपात्रेण संयुतम्

vratānte karakaṃ pūrṇam eteṣāṃ māsi māsi ca dadyāddvikālavelāyāṃ pūrṇapātreṇa saṃyutam

हिन्दी अर्थ

युधिष्ठिरकी चिन्ता, उनकी महर्षि मार्कण्डेयसे भेंट और महर्षिद्वारा प्रयाग-माहात्म्यका उपक्रम नमस्ते विष्णुरूपाय नमो विष्णुमुखाय वै।

English

Qauryai namah,'* the ankles, after reciting (27) W <*G5jatryai namaji,*'— 10. The feet, after reciting (28) wralw®: *<])har5dhar5yai namaji,'' the head, after re- citing W « VlsvakAryai namah/*

अध्याय ६३

श्लोक 19

लड्डुकाञ्छ्वेतवर्णांश्च संयावमथ पूरिकाः घारिकान् अप्यपूपांश्च पिष्टापूपांश्च मण्डकान्

laḍḍukāñchvetavarṇāṃśca saṃyāvamatha pūrikāḥ ghārikān apyapūpāṃśca piṣṭāpūpāṃśca maṇḍakān

हिन्दी अर्थ

नन्दिकेश्वर उवाच नन्दिकेश्वर बोले-नारदजी! इसके बाद मैं अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रयागस्योपवर्णनम्। प्रयागके माहात्म्यका वर्णन कर रहा हुँ जिसे पूर्वकालमें मार्कण्डेयेन कथितं यत् पुरा पाण्डुसूनवे॥ १ महर्षि मार्कण्डेयने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे कहा था। युधिष्ठिरको राज्य प्राप्त हो गया, इसी बीच कुन्ती- कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः एतस्मिनन्तरे राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:॥२ नन्दन महाराज युधिष्ठिर भाइयोंके शोकसे अत्यन्त दुःखी

English

NamobhavAniyai, KAininyai. KAmadevyai, JagatapriyAlyai, should also be said.— 11.

अध्याय ६३

श्लोक 20

क्षीरं शाकं च दध्यन्नम् इण्डर्यो ऽशोकवर्तिकाः माघादिक्रमशो दद्याद् एतानि करकोपरि

kṣīraṃ śākaṃ ca dadhyannam iṇḍaryo 'śokavartikāḥ māghādikramaśo dadyād etāni karakopari

हिन्दी अर्थ

भ्रातृशोकेन संतप्तश्चिन्तयन् स पुनः पुनः। होकर बारम्बार इस प्रकार चिन्तन करने लगे--'हाय! आसीत् सुयोधनो राजा एकादशचमूपतिः ॥ ३ जो राजा दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाका स्वामी था, वासुदेवं समाश्रित्य पञ्च शेषास्तु पाण्डवाः

English

The Goddess should be worshipped like this, aud then the Brfihmaa and his wife should also be honoured aud feasted with sweet food and drink. — 12. A pitcher, full of water and decorated with a pair of white cloths, along with a golden lotus aud flt)wer-garhind8 and sandal, should be given away in charity to the Bralimana.— 13.

अध्याय ६३

श्लोक 21

कुमुदा माधवी गौरी रम्भा भद्रा जया शिवा उमा रतिः सती तद्वन् मङ्गला रतिलालसा

kumudā mādhavī gaurī rambhā bhadrā jayā śivā umā ratiḥ satī tadvan maṅgalā ratilālasā

हिन्दी अर्थ

हत्वा भीष्मं च द्रोणं च कर्णं चैव महाबलम्। दुर्योधनं च राजानं पुत्रश्नातृसमन्वितम् राजानो निहताः सर्वे ये चान्ये शूरमानिनः। किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा धिक् कष्टमिति संचिन्त्य राजा वैक्लव्यमागतः। निर्विचेष्टो निरुत्साहः किञ्चित् तिष्ठत्यधोमुखः

English

Afterwards, the devotee should say, OKuuiiid/1 Goddess! be pleased and accept this lavapavrata. lu this way, the Goddess should be wor- shipped each month. The Gotldess Kiiinuda becomes pleased with the devotee by the observance of this ordinance. — 14*

अध्याय ६३

श्लोक 22

क्रमान्माघादि सर्वत्र प्रीयतामिति कीर्तयेत् सर्वत्र पञ्चगव्येन प्राशनं समुदाहृतम् उपवासी भवेन्नित्यम् अशक्ते नक्तमिष्यते

kramānmāghādi sarvatra prīyatāmiti kīrtayet sarvatra pañcagavyena prāśanaṃ samudāhṛtam upavāsī bhavennityam aśakte naktamiṣyate

हिन्दी अर्थ

लब्धसंज्ञो यदा राजा चिन्तयन् स पुनः पुनः । कतमो विनियोगो वा नियमं तीर्थमेव च यत्र स्थित्वा नरो याति विष्णुलोकमनुत्तमम्

English

In the month of llagha, salt should not be taken, raw sugar should avoided in Phalguna, nil aud mustard hhouhi be discarded in Chaitra, ihd honey and sweets should be avoided in VaiAiklia. — 15. In the mouth of Jaitha pndilings should be avoided, cumin-seed should be discarded in Asadlia, milk iu iSriivana, curds in hhadrapada. — 16.

अध्याय ६३

श्लोक 23

पुनर्माघे तु सम्प्राप्ते शर्करां करकोपरि कृत्वा तु काञ्चनीं गौरीं पञ्चरत्नसमन्विताम्

punarmāghe tu samprāpte śarkarāṃ karakopari kṛtvā tu kāñcanīṃ gaurīṃ pañcaratnasamanvitām

हिन्दी अर्थ

कथं पृच्छामि वै कृष्णं येनेदं कारितोऽस्म्यहम्। धृतराष्ट्रं कथं पृच्छे यस्य पुत्रशतं हतम् एवं वैक्लव्यमापन्ने धर्मराजे युधिष्टिरे। रुदन्ति पाण्डवाः सर्वे भ्रातृशोकपरिप्लुताः अचिरेणैव कालेन मार्कण्डेयो महातपाः सम्प्राप्तो ह्यस्तिनपुरं राजद्वारे ह्यतिष्ठत

English

Clarified butter in AiJvina, lioiiey in Karttika, coriander iu Marg- rfirsa, sugar in Pausa. — 17,

अध्याय ६३

श्लोक 24

हैमीमङ्गुष्ठमात्रां च साक्षसूत्रकमण्डलुम् चतुर्भुजामिन्दुयुतां सितनेत्रपटावृताम्

haimīmaṅguṣṭhamātrāṃ ca sākṣasūtrakamaṇḍalum caturbhujāminduyutāṃ sitanetrapaṭāvṛtām

हिन्दी अर्थ

त्वां द्रष्टुकामो मार्कण्डो द्वारि तिष्ठत्यसौ मुनिः । त्वरितो धर्मपुत्रस्तु द्वारमागादतः परम् वह हमलोगोंको अनेकों बार कष्टमें डालकर अपने सभी सहायकोंके साथ कालके गालमें चला गया। श्रीकृष्णका आश्रय लेनेके कारण केवल हम पाँच पाण्डव ही शेष रह गये हैं। गोविन्द! हमलोगोंने भीष्म, द्रोण, महाबली

English

On the completion of the onlifiance, a Kamapdalii, full of water, &c., along with a full vessel, should be given away in charity, each month, in the afternoon. — 18. (1) White balls of sweet (Laddn'j, (2) mohanbhoga, pudding, (3) cake (puri), (4) gharika cake, (5) sweet cake, <G) sweet cake mixed with spices, (7) raapaka, (8) milk, (9> vegetable, (lO)curd rice, (11) indm*! iinartl, (12) and avokavartika Gojha, should be given, one by one, after putting them on the top of the Kamandalu in each month, t.e., in MAgha, white balls of sweet should be given, in the next month mohanbhoga, and so on. — 19-20.

अध्याय ६३

श्लोक 25

तद्वद्गोमिथुनं शुक्लं सुवर्णास्यं सिताम्बरम् सवस्त्रभाजनं दद्याद् भवानी प्रीयतामिति

tadvadgomithunaṃ śuklaṃ suvarṇāsyaṃ sitāmbaram savastrabhājanaṃ dadyād bhavānī prīyatāmiti

हिन्दी अर्थ

कर्ण और पुत्रों एवं भाइयोंसमेत राजा दुर्योधनको मारकर जो अन्य शूर, मानी नरेश थे उन सबका भी संहार कर डाला, ऐसी परिस्थितिमें हमें राज्यसे क्या लेना है, अथवा भोगों एवं जीवनसे ही क्या प्रयोजन है ? “हाय! धिक्कार है, महान् कष्ट आ पड़ा'-एऐसा सोचकर राजा युधिष्टिर व्याकुल नीचे मुख किये बैठे ही रह गये। जब राजा युधिष्ठिरको पुनः चेतना प्राप्त हुई तब वे इस प्रकार सोचने लगे

English

KumudS, Mftdhavl, Gauri, Uainblia, BhadrA, JayA, livA, UmA, Rati Satl, Mangalfi, RatilalasA sliouUl be invoked, turn, by turn each month, Ijeginning with Magha, and say ' prlyatam.* The devotee should offer to the goddess the prAdana with panchagavya, and should observe a fast on eaobr of the prescribed days; if he cannot keep the full fast, he might eat aAmething in the night.~21»22.

अध्याय ६३

श्लोक 26

अनेन विधिना यस्तु रसकल्याणिनीव्रतम् कुर्यात्स सर्वपापेभ्यस् तत्क्षणादेव मुच्यते

anena vidhinā yastu rasakalyāṇinīvratam kuryātsa sarvapāpebhyas tatkṣaṇādeva mucyate

हिन्दी अर्थ

अथवा तीर्थ है, जिसका सेवन करनेसे मैं शीघ्र ही इस महापातकके पापसे मुक्त हो सकूँगा, अथवा जहाँ निवास कर मनुष्य सर्वोत्तम विष्णुलोकको प्राप्त कर सकता है। इसके लिये मैं श्रीकृष्णसे कैसे पूछुँ; क्योंकि उन्होंने ही तो मुझसे ऐसा कर्म करवाया है दादा धृतराष्ट्रसे भी किसी प्रकार नहीं पूछ सकता; क्योंकि उनके सौ पुत्र मार डाले गये हैं।' ऐसा सोचकर धर्मराज युधिष्टिर व्याकुल हो गये। उस समय सभी पाण्डव भ्रातृ-शोकमें निमग्र होकर रुदन

English

OHAPTBB LXIV. Again in the month of Magba, sugar should be placed on the Kamapdlu, and, after saying, Goddess be pleased,'* should be given away to a Brbaiaa in charity: — the golden image of Parvati, of the size of an inch, after decorating it with the five gems, rosaiy, sacred thread, Kamaadalu, the figure of the moon with four arms, white eyes and white clothes; a pair of white cows, decorated with gold and covered with white cloth, along with a milking vessel* — 23-25.

अध्याय ६३

श्लोक 27

नवार्बुदसहस्रं तु न दुःखी जायते नरः सुवर्णकमलं गौरि मासि मासि ददन्नरः अग्निष्टोमसहस्रस्य यत्फलं तदवाप्नुयात्

navārbudasahasraṃ tu na duḥkhī jāyate naraḥ suvarṇakamalaṃ gauri māsi māsi dadannaraḥ agniṣṭomasahasrasya yatphalaṃ tadavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

कर रहे थे। उस समय राजा युधिष्ठिरके समीप जो अन्य जो लोग आ गये थे, वे सभी रोते हुए युधिष्ठिरको घेरकर पृथ्वीपर पड़ गये उस समय महर्षि मार्कण्डेय वाराणसीमें निवास कर रहे थे। उन्हें जिस प्रकार युधिष्ठिर दुःखी और व्याकुल हो रो रहे थे, ये सारी बातें (योगबलसे) ज्ञात हो गयीं। तब महातपस्वी मार्कण्डेय थोड़े ही समयमें

English

One who observes this Rasa Kalyanlnt Tritiya ordinance, becomes instantly liberated from sins and never remains grieved for 9000001000 years. One who gives away an image of Parvati, with a golden lotus, each month, gets the benefit of performing a thousand agni§toma sacrifices. -26-27.

अध्याय ६३

श्लोक 28

नारी वा कुरुते या तु कुमारी वा वरानने विधवा या तथा नारी सापि तत्फलमाप्नुयात् सौभाग्यारोग्यसम्पन्ना गौरीलोके महीयते

nārī vā kurute yā tu kumārī vā varānane vidhavā yā tathā nārī sāpi tatphalamāpnuyāt saubhāgyārogyasampannā gaurīloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

हस्तिनापुर जा पहुँचे और राजद्वारपर उपस्थित हुए। उन्हें आया हुआ देखकर द्वारपालने तुरंत राजाको सूचना देते हुए कहा--' महाराज! ये महामुनि मार्कण्डेय आपसे मिलनेके लिये दरवाजेपर खड़े हैं।' यह सुनते ही धर्म-पुत्र युधिष्ठिर युधिष्ठिरने कहा महाभाग! आपका स्वागत है । महामुने! आपका स्वागत है। महामुने! आपका दर्शन करके आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मैंने अपने कुलका उद्धार कर दिया तथा आज मेरे पितर संतुष्ट हो

English

The married woman, or the maid, or the widow who observes this ordinance, derives the same benefit and gets good luck and health, and goes to the realm of Parvati — 28. One who reads or hears this, is liberated from the sins of the Kali Age and goes to the region of Parvatt. One who relates this to others or induces others to observe this vrata, also becomes like the Lord of the Devas and moves about in aerial chariots, — 29.

अध्याय ६३

श्लोक 29

इति पठति शृणोति श्रावयेद्यः प्रसङ्गात् कलिकलुषविमुक्तः पार्वतीलोकमेति मतिमपि च नराणां यो ददाति प्रियार्थं विबुधपतिविमाने नायकः स्यादमोघः

iti paṭhati śṛṇoti śrāvayedyaḥ prasaṅgāt kalikaluṣavimuktaḥ pārvatīlokameti matimapi ca narāṇāṃ yo dadāti priyārthaṃ vibudhapativimāne nāyakaḥ syādamoghaḥ

हिन्दी अर्थ

गये। आपका जो यह (आकस्मिक) दर्शन प्राप्त हुआ, इससे आज मेरा शरीर पवित्र हो गया नन्दिकेश्वर उवाच युधिष्ठिरो महात्मा वै पूजयामास तं मुनिम्

English

Here ends the sixty-third chapter describing Bdsakalyiijtinttritty& vrata.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 63
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.