Matsya Purana· Matsya Purāṇa
79
अध्याय 79 / 176

Adhyaya 79

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अध्याय ७९

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ७९ अथातः सम्प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम् सर्वकामप्रदां रम्यां नाम्ना मन्दारसप्तमीम्

matsya-purāṇa 79 athātaḥ sampravakṣyāmi sarvapāpapraṇāśinīm sarvakāmapradāṃ ramyāṃ nāmnā mandārasaptamīm

हिन्दी अर्थ

स्वप्रमेवं स राजषिर्दृष्रा देवेन्द्रविक्रमः । प्रत्यूषकाले विधिवत् स्नातः स प्रयतेन्द्रियः कृतकृत्यो यथाकामं पूजयित्चा जनार्दनम्। ददर्शात्रिं मुनिं राजा प्रत्यक्षं तपसां निधिम्

English

iivasaid:— 1 now relate to yon about the Mandra Saptamt, the giver of all desires, tlie most excellent, and the destroyer of all sins. — 1,

अध्याय ७९

श्लोक 2

माघस्यामलपक्षे तु पञ्चम्यां लघुभुङ्नरः दन्तकाष्ठं ततः कृत्वा षष्ठीमुपवसेद्बुधः

māghasyāmalapakṣe tu pañcamyāṃ laghubhuṅnaraḥ dantakāṣṭhaṃ tataḥ kṛtvā ṣaṣṭhīmupavasedbudhaḥ

हिन्दी अर्थ

स्वप्नं तु देवदेवस्य न्यवेदयत धार्मिकः। ततः शुश्राव वचनं देवतानां समीरितम् एवमेतन्महीपाल नात्र कार्या विचारणा। एवं प्रसादं सम्प्राप्य देवदेवाञ्जनार्दनात् कृतदेवार्चनो राजा तथा हुतहुताशनः।

English

The devotee should take some light food on the fifth day of the bright fortnight in the month of Milgha, and, having arisen from his bed in the morning and brushing his teeth and bathing, should keep fast on that day ow,, on the §athi day. — 2.

अध्याय ७९

श्लोक 3

विप्रान् सम्पूजयित्वा तु मन्दारं प्राशयेन्निशि ततः प्रभात उत्थाय कृत्वा स्नानं पुनर्द्विजान्

viprān sampūjayitvā tu mandāraṃ prāśayenniśi tataḥ prabhāta utthāya kṛtvā snānaṃ punardvijān

हिन्दी अर्थ

सुनकर वे 'एवमस्तु-एऐसा ही होगा '--ऐसा कहकर वहाँसे चले गये। तत्पश्चात् राजा पुरूरवा वहाँ एक मासतक भगवान् जनार्दनकी पूजा करते हुए सुखपूर्वक निवास करते रहे। वे सदा गन्धर्वो एवं अप्सराओंके प्रेमपात्र बने रहे। वे लोग राजाके निर्लोभ कर्मसे परम संतुष्ट थे। राजन्! उस मासके बीचमें ही राजा पुरूरवाने हजारों रलोंसे चित्रित उस आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ वे एक मासतक केवल जल पीकर तबतक निवास

English

That day lie should iionor a few Bralimanas and feed them with delicious food at night. MandAra* prarfaim should be offerredto the Deva. On the following morning, that is, tlie saptarni daj", he should feed the Bralimanas again, according to his means, after his morning ablutions. Then procure eight Mandara (lowers and prepare a golden imago of the Sun carrying a lotus in his hand and place it in a copper-vessel containing sesaimim, and prepare also an eigiit-petalled lotus and invoke the God Sun, thus. He should offer one mandura flower on each petal. — 3-5.

अध्याय ७९

श्लोक 4

भोजयेच्छक्तितः कृत्वा मन्दारकुसुमाष्टकम् सौवर्णं पुरुषं तद्वत् पद्महस्तं सुशोभनम्

bhojayecchaktitaḥ kṛtvā mandārakusumāṣṭakam sauvarṇaṃ puruṣaṃ tadvat padmahastaṃ suśobhanam

हिन्दी अर्थ

करते रहे, जबतक फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथि नहीँ आ गयी। राजा पुरूरवाने फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी पूर्णिमा तिथिको रातमें स्वप्नमें उन्हीं देवाधिदेव भगवान् विष्णुद्वारा कहे जाते हुए इस प्रकारके मङ्गलमय शब्दोंको सुना--' राजन्! इस रात्रिके व्यतीत हो जानेपर अत्रिसे तुम्हारी भेंट होगी और उनसे मिलकर तुम कृतकृत्य हो जाओगे। देवराजके समान पराक्रमी राजर्षि पुरूरवाको जब इस प्रकारका स्वप्र दीख पड़ा, तब उन्होंने प्रातःकाल उठकर इन्द्रियोंको संयत रखते हुए विधिपूर्वक स्नान किया और इच्छानुसार भगवान् जनार्दनकी पूजा की। तत्पश्चात् उन्हें तपोधन महर्षि अत्रिका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुआ, जिससे वे कृतकृत्य हो गये। तब धर्मात्मा राजाने

English

He should then salute the Sun and put some flowers and uncooked rice on the lotus leaf, in' the Eastern <lirection by saying ' fihfiskarya- namah* in the South-East by saying ' SflryAya naipah * in the South, by saying * Arkaya nainah. ' in the South-West, by saying " Aryarane naraah,'* in the West by saying;—** Veda dhainne namah,*' in the North-West direction by saying " Chanda Bhjiuave namah,'* in the North by saying "Puisne narnah,'' in. the North-East by saying ' Anandflya namah.*—6-7.

अध्याय ७९

श्लोक 5

पद्मं कृष्णतिलैः कृत्वा ताम्रपात्रे ऽष्टपत्त्रकम् हैममन्दारकुसुमैर् भास्करायेति पूर्वतः

padmaṃ kṛṣṇatilaiḥ kṛtvā tāmrapātre 'ṣṭapattrakam haimamandārakusumair bhāskarāyeti pūrvataḥ

हिन्दी अर्थ

महर्षि अत्रिसे देवाधिदेव भगवानृद्वारा दिखाये गये स्वप्नके वृत्तान्तको कह सुनाया। उसी समय उन्होंने “महीपाल! यह ऐसा ही होगा, इसमें तुम्हें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।' इस प्रकार देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी कृपा प्राप्तकर राजाने देवार्चन किया और अग्निमें आहुतियाँ डालीं। इस तरह

English

The devotee should place the image trf the Male Parana on the peri- carp of the lotus, and after saying ' SarvStmane namah,* white cloth should be put on the imago, and eatables, flowera and fruits should be offered. — 8.

अध्याय ७९

श्लोक 6

नमस्कारेण तद्वच्च सूर्यायेत्यानले दले दक्षिणे तद्वदर्काय तथार्यम्णे च नैरृते

namaskāreṇa tadvacca sūryāyetyānale dale dakṣiṇe tadvadarkāya tathāryamṇe ca nairṛte

हिन्दी अर्थ

भगवान् केशवके वरदानसे उनकी सारी कामनाएँ पूरी सर्वान् कामानवाप्तोऽसौ वरदानेन केशवात्॥ ४८ हो गयीं इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोशे ऐलाश्रमवर्णनं नाम विंशत्यधिकशतत्तमोऽध्यायः

English

Then all these things should be given away to a Br&hmaa versed in the Vedas. He himself should take his meals, but then oil and salt should

अध्याय ७९

श्लोक 7

पश्चिमे वेदधाम्ने च वायव्ये चण्डभानवे पूष्णेत्युत्तरतः पूज्यम् आनन्दायेत्यतः परम्

paścime vedadhāmne ca vāyavye caṇḍabhānave pūṣṇetyuttarataḥ pūjyam ānandāyetyataḥ param

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोशवर्णनमें ऐलाश्रमवर्णन नामक एक सौ बीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय

English

* Mandftra is the neme given to several species of plants, vfs., Oalotropls gigantea, Brythrina indioa, and thorn-apple.

अध्याय ७९

श्लोक 8

कर्णिकायां च पुरुषं सर्वात्मन इति न्यसेत् शुक्लवस्त्रैः समावेष्ट्य भक्ष्यैर्माल्यफलादिभिः

karṇikāyāṃ ca puruṣaṃ sarvātmana iti nyaset śuklavastraiḥ samāveṣṭya bhakṣyairmālyaphalādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

कैलास पर्वतका वर्णन, गड्धाकी सात धाराओंका वृत्तान्त तथा जम्बूद्रीपका विवरण अप्सरोऽनुगतो राजा मोदते ह्यलकाधिपः । कैलासपादसम्भूतं पुण्यं शीतजलं शुभम् तस्मात् प्रभवते दिव्या नदी ह्यच्छोदिका शुभा

English

be avoided. He should observe the vovr of silence while eating, and take bis meals facing the Eest.—O.

अध्याय ७९

श्लोक 9

एवमभ्यर्च्य तत्सर्वं दद्याद्वेदविदे पुनः भुञ्जीतातैललवणं वाग्यतः प्राङ्मुखो गृही

evamabhyarcya tatsarvaṃ dadyādvedavide punaḥ bhuñjītātailalavaṇaṃ vāgyataḥ prāṅmukho gṛhī

हिन्दी अर्थ

यक्षसेनापतिः शूरो गुह्यकैः परिवारितः। पुण्या मन्दाकिनी नाम नदी ह्यच्छोदिका शुभा सूतजी कहते हैं--ऋषियो! उस आश्रमकी उत्तर दिशामें हिमालय पर्वतके पृष्ठ-भागके मध्यमें कैलास नामक पर्वत स्थित है। उसपर त्रिपुरासुरके संहारक शंकरजी निवास करते हैं। उसके शिखर नाना प्रकारके

English

This ordinance should be observed, according to the prescribed rites for a year, on the seventh day of a fortnight, earh month, without giving way to miserliness.— 10.

अध्याय ७९

श्लोक 10

अनेन विधिना सर्वं सप्तम्यां मासि मासि च कुर्यात्संवत्सरं यावद् वित्तशाठ्यविवर्जितः

anena vidhinā sarvaṃ saptamyāṃ māsi māsi ca kuryātsaṃvatsaraṃ yāvad vittaśāṭhyavivarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

रत्नोंसे सुशोभित हैं तथा उनपर कल्पवृक्ष शोभा पा रहे हैं। उस पर्वतपर श्रीमान् कुबेर गुह्यकोंके साथ निवास करते हैं। इस प्रकार अलकापुरीके अधीश्वर राजा कुबेर अप्सराओंद्वारा अनुगमन किये जाते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं। कैलासके पाद (उपत्यका)-से एक मन्दोदक नामक सरोवर प्रकट हुआ है, जिसका जल बड़ा पवित्र, निर्मल एवं शीतल है। उसका जल दहीके समान उज्ज्वल है। उसी सरोवरसे मङ्गलमयी दिव्य मन्दाकिनी नदी प्रवाहित होती है। वहाँ उस नदीके तटपर नन्दन नामक दिव्य एवं महान् वन है। कैलासकी पूर्वोत्तर दिशामें चन्द्रप्रभ नामक पर्वत है, जो रत्न-सदूश चमकदार है। वह सभी प्रकारकी धातुओंसे विभूषित तथा अनेकों प्रकारकी

English

On the conclusion of the ordinance, the lotus of gold should be given away after being placed on a pitcher of water. One wishing to acquire prosperity, should give away a cow in addition to it.— 11.

अध्याय ७९

श्लोक 11

एतदेव व्रतान्ते तु निधाय कलशोपरि गोभिर्विभवतः सार्धं दातव्यं भूतिमिच्छता

etadeva vratānte tu nidhāya kalaśopari gobhirvibhavataḥ sārdhaṃ dātavyaṃ bhūtimicchatā

हिन्दी अर्थ

सुगन्धसे सुवासित दिव्य सुबेल पर्वततक फैला हुआ है। उसके निकट अच्छोद (अच्छावत) नामसे विख्यात एक दिव्य सरोवर है, उससे अच्छोदिका (अच्छोदा) नामकी कल्याणमयी दिव्य नदी उद्भूत हुई है। उस नदीके तटपर चैत्ररथ नामक दिव्य एवं सुन्दर महान् बन है। उस पर्वतपर शूरवीर यक्ष-सेनापति मणिभद्र गुह्यकोंसे घिरे हुए अपने अनुयायियोंके साथ निवास करते हैं। पुण्यमयी मन्दाकिनी तथा कल्याणकारिणी अच्छोदा-ये दोनों नदियाँ

English

The following prayer should then he oilered * I salute Mandditindtha and Manddirabhavana, 0 Lord Sun! see me through this wordly ocean of troubles.' —12.

अध्याय ७९

श्लोक 12

नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च त्वं रवे तारयस्वास्मान् संसारभयसागरात्

namo mandāranāthāya mandārabhavanāya ca tvaṃ rave tārayasvāsmān saṃsārabhayasāgarāt

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी-मण्डलके मध्यभागसे प्रवाहित होती हुई महासागरमें मिली हैं॥ १-९ ड ॥ कैलासके दक्षिण-पूर्व दिशामें लाल वर्णवाला हेमशृङ्ग कैलासदक्षिणे प्राच्यां शिवं सर्वौषधिं गिरिम्॥ १० नामक एक विशाल पर्वत है। वह दिव्य सुवेल पर्वततक

English

One who observes tliis Mand&ra Saptami fast in this way is freed from all sins and goes to heaven where he resides for a kalpa. This ordinance is like a torch that dispels all the sins like pitched darkness. One who keeps it up gets his desires fulfilled. One who reads or listens about this ordinance becomes freed from all sins. — 13-15.

अध्याय ७९

श्लोक 13

अनेन विधिना यस्तु कुर्यान्मन्दारसप्तमीम् विपाप्मा स सुखी मर्त्यः कल्पं च दिवि मोदते

anena vidhinā yastu kuryānmandārasaptamīm vipāpmā sa sukhī martyaḥ kalpaṃ ca divi modate

हिन्दी अर्थ

तस्य पादे महद् दिव्यं मानसं सिद्धसेवितम् तस्मात् प्रभवते पुण्या सरयूर्लोकपावनी। यस्यास्तीरे वनं दिव्यं वैभ्राजं नाम विश्रुतम्

English

Here ends the eeoenly-ninih chapter dealing with Manddra Saptami

अध्याय ७९

श्लोक 14

इमामघौघपटलभीषणध्वान्तदीपिकाम् गच्छन्प्रगृह्य संसारे सर्वार्थांश्च लभेन्नरः

imāmaghaughapaṭalabhīṣaṇadhvāntadīpikām gacchanpragṛhya saṃsāre sarvārthāṃśca labhennaraḥ

हिन्दी अर्थ

भवस्य दयितः श्रीमान् पर्वतो हैमसंनिभः। शातकोौम्भमयैर्दिव्यैः शिलाजालैः समाचितः फैला हुआ है। उसकी कान्ति सूर्यके समान है। वह मङ्गलप्रद पर्वत सभी प्रकारकी ओषधियोंसे सम्पन्न तथा मैनशिल नामक धातुसे परिपूर्ण है। उसके पाद-प्रान्तमें एक विशाल दिव्य सरोवर है, जिसका नाम लोहित है। वह पुण्यमय लौहित्य (ब्रह्मपुत्र) नामक महान् नदका उद्गमस्थान है। उस नदके तटपर विशोक नामक एक दिव्य एवं विस्तृत वन है। उस पर्वतपर मणिधर नामक यक्ष इन्द्रियोंको वशमें करके परम धार्मिक एवं सौम्य-

English

Here ends the eeoenly-ninih chapter dealing with Manddra Saptami

अध्याय ७९

श्लोक 15

मन्दारसप्तमीम् एताम् ईप्सितार्थफलप्रदाम् यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते

mandārasaptamīm etām īpsitārthaphalapradām yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi sarvapāpaiḥ pramucyate

हिन्दी अर्थ

स्वभाववाले गुह्यकोंके साथ निवास करता है। कैलासकी पश्चिमोत्तर दिशामें ककुद्मान् नामक पर्वत है, जिसपर सभी प्रकारको ओषधियाँ सुलभ हैं। वह अञ्जन-जैसा काला तथा तीन शिखरोंसे सुशोभित है। उस ककुद्मान् पर्वतपर भगवान् रुद्रके गण ककुद्मी (नन्दिकेश्वर)-की उत्पत्ति हुई है। वहीं समस्त धातुओंसे सम्पन्न वैद्युत नामक अत्यन्त महान् पर्वत है, जो त्रिककुद् पर्वततक विस्तृत है। उसके पाद-प्रान्तमें सिद्धोंद्वारा सेवित एक महान् दिव्य

English

Here ends the eeoenly-ninih chapter dealing with Manddra Saptami

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 79
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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गणना पद्धति:

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