Matsya Purana· Matsya Purāṇa
87
अध्याय 87 / 176

Adhyaya 87

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अध्याय ८७

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ८७ अतः परं प्रवक्ष्यामि तिलशैलं विधानतः यत्प्रदानान्नरो याति विष्णुलोकं सनातनम्

matsya-purāṇa 87 ataḥ paraṃ pravakṣyāmi tilaśailaṃ vidhānataḥ yatpradānānnaro yāti viṣṇulokaṃ sanātanam

हिन्दी अर्थ

सर्वेषामुत्तरे मेरुरलोकालोकस्तु दक्षिणे एवं पुष्करमध्ये तु यदा भवति भास्करः पञ्चाशच्च सहस्त्राणि तथान्यान्यधिकानि च

English

Now I proceed to explain to you about the giving away of the mount of sesaraam, by the virtue of which the devotee goes to the realm of Viiu.— 1.

अध्याय ८७

श्लोक 2

उत्तमो दशभिर् द्रोणैर् मध्यमः पञ्चभिः स्मृतः त्रिभिः कनिष्ठो विप्रेन्द्र तिलशैलः प्रकीर्तितः

uttamo daśabhir droṇair madhyamaḥ pañcabhiḥ smṛtaḥ tribhiḥ kaniṣṭho viprendra tilaśailaḥ prakīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

मौहूर्तिकी गतिहाोंषा सूर्यस्य तु विधीयते। एतेन क्रमयोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम् परिगच्छति सूर्योऽसौ मासं काष्ठामुदग्दिनात्।

English

The seaamum mount of 160 seers (10 drdnas) is the first l>est, of 80 seers (5 drdnas) second best, and of 48 seers (3 drdnas) is the last. — 2.

अध्याय ८७

श्लोक 3

पूर्ववच्चापरान्सर्वान् विष्कम्भानभितो गिरीन् दानमन्त्रान् प्रवक्ष्यामि यथावन्मुनिपुंगव

pūrvavaccāparānsarvān viṣkambhānabhito girīn dānamantrān pravakṣyāmi yathāvanmunipuṃgava

हिन्दी अर्थ

इसी प्रकार जब सूर्य मध्याहकालमें यमराजकी संयमनी- पुरीमें पहुँचते हैं, तब वरुणकी सुखानगरीमें उगते हुए और महेन्द्रकी वस्वौकसारा (अमरावती) पुरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा विभावरी पुरीमें आधी रात होती है। जब दोपहरके समय सूर्य वरुणकी सुखानगरीमें पहुँचते हैं, तब चन्द्रदेवकी पुरी विभावरीमें उदय होते हैं। जब सूर्य महेन्द्रकी अमरावतीपुरीमें उदय होते हैं तब वरुणकी सुखानगरीमें अस्त होते (दीखते) हैं और संयमनीपुरीमें आधी रात होती है। इस प्रकार सूर्य अलातचक्र (जलती बनेठी)-की भाँति बड़ी शीघ्रतासे चक्कर लगाते हैं

English

The four corner iiiounts (viskambha) should be located as before, and 1 am now telling you the iiiautra to lie recited at the time of ulTering, 0 NArada. — 3.

अध्याय ८७

श्लोक 4

यस्मान्मधुवधे विष्णोर् देहस्वेदसमुद्भवाः तिलाः कुशाश्च माषाश्च तस्माच्छान्त्यै भवत्विह

yasmānmadhuvadhe viṣṇor dehasvedasamudbhavāḥ tilāḥ kuśāśca māṣāśca tasmācchāntyai bhavatviha

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार स्वयं भ्रमण करते हुए सूर्य नक्षत्रोंको भी भ्रमण कराते हैं। वे चारों दक्षिणान्त पार्श्व भागोंमें चलते रहते हैं। उदय और अस्तके समय वे पुनः-पुनः उदय और अस्त होते रहते हैं और पूर्वाह्न एवं अपराहमें दो-दो देवपुरियोंमें तथा मध्याहके समय एक पुरीमें पहुँचते हैं। इस प्रकार सूर्य उदय होकर अपनी बढ़ती हुई तेजस्विनी किरणोंसे दोपहरके समय तपते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे हासको प्राप्त होती हुई उन्हीं

English

' Sesaiuum, kuiia and iiiAsa were proiliiced from tlie sweat of Viu, at the time of His killing the demon, Madhu; therefore, mount of sesamnni grant me happiness. In Flavya and Kavj'a, (in the Deva as well as in Pitfi worship), snsamum is eonsidered to be the best, therefore, 0 mount of sesamum, I salute yon.' — 4-;'.

अध्याय ८७

श्लोक 5

हव्ये कव्ये च यस्माच्च तिला एवाभिरक्षणम् भवादुद्धर शैलेन्द्र तिलाचल नमो ऽस्तु ते

havye kavye ca yasmācca tilā evābhirakṣaṇam bhavāduddhara śailendra tilācala namo 'stu te

हिन्दी अर्थ

किरणोंके साथ अस्त हो जाते हैं। सूर्यके इसी उदय और अस्तसे पूर्व और पश्चिम दिशाका ज्ञान होता है। यों तो सूर्य जैसे पूर्व दिशामें तपते हैं, उसी तरह पश्चिम तथा पार्श्वभाग (उत्तर और दक्षिण)-में भी प्रकाश फैलाते हैं, परंतु उन दिशाओंमें जहाँ सूर्यका उदय दीखता है, वही उदय-स्थान कहलाता है तथा जिस दिशामें सूर्य अदृश्य हो जाते हैं, उसे अस्त-स्थान कहते हैं। मेरुपर्वत सभी पर्वतोंसे उत्तर तथा लोकालोक पर्वत दक्षिण दिशामें स्थित है, इसलिये सूर्यके बहुत दूर हो जाने तथा पृथ्वीकी छायासे आवृत होनेके कारण उनकी किरणें अवरुद्ध हो जाती हैं, इसी कारण सूर्य रातमें नहीं दीख पड्ते। इस प्रकार एक लाख किरणॉसे सुशोभित सूर्य

English

One who tints gives away the mount of.sesamum, attains similarity with Vi§nu, and is never born in this world. — 6.

अध्याय ८७

श्लोक 6

इत्यामन्त्र्य च यो दद्यात् तिलाचलमनुत्तमम् स वैष्णवं पदं याति पुनरावृत्तिदुर्लभम्

ityāmantrya ca yo dadyāt tilācalamanuttamam sa vaiṣṇavaṃ padaṃ yāti punarāvṛttidurlabham

हिन्दी अर्थ

जब पुष्करद्वीपके मध्यभागमें पहुँचते हैं, तब वहाँ ऊँचाईपर स्थित होनेके कारण दीख पड़ते हैं। सूर्य एक मुहूर्त (दो घड़ी)-में पृथ्वीके तीसवें भागतक पहुँच जाते हैं । उनकी गतिका प्रमाण योजनोंके हजारोंकी गणनामें सुनिये। सूर्यकी एक मुहूर्तकी गतिका परिमाण एकतीस लाख पचास हजार योजनसे भी अधिक बतलाया जाता है

English

He gets long life, children and grand children and goes to heaven, where he is honoured by the Devas, Pitfis, Gandbarvas, &c. —7.

अध्याय ८७

श्लोक 7

दीर्घायुष्यं समाप्नोति पुत्रपौत्रैश्च मोदते पितृभिर्देवगन्धर्वैः पूज्यमानो दिवं व्रजेत्

dīrghāyuṣyaṃ samāpnoti putrapautraiśca modate pitṛbhirdevagandharvaiḥ pūjyamāno divaṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

इसी क्रमसे जब सूर्य दक्षिण दिशामें जाते हैं तब (वहाँ छः: महीनेतक भ्रमण करनेके पश्चात् पुनः) सातवें मासमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। मध्येन पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ ४४ दक्षिणायनके समय सूर्य पुष्करद्वीपके मध्यमे भ्रमण करते हैं। सर्वतो दक्षिणस्यां तु काष्ठायां तन्निबोधत

English

Here ends the eight y~seventh chapter desaibing the mount of eeaamum.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 87
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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