Matsya Purana· Matsya Purāṇa
86
अध्याय 86 / 176

Adhyaya 86

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अध्याय ८६

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ८६ अथ पापहरं वक्ष्ये सुवर्णाचलमुत्तमम् यस्य प्रदानाद्भवनं वैरिञ्चं याति मानवः

matsya-purāṇa 86 atha pāpaharaṃ vakṣye suvarṇācalamuttamam yasya pradānādbhavanaṃ vairiñcaṃ yāti mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

काष्ठागतस्य सूर्यस्य गतिस्तत्र निबोधत। दक्षिणोपक्रमे सूर्यः क्षिसेषुरिव सर्पति मध्यगश्रामरावत्यां यदा भवति भास्करः उसका आधा भाग मेरुपर्वतके उत्तरोत्तर फैला हुआ है और मेरुपर्वतके मध्यभागमें बह चारों ओर एक करोड़ योजन विस्तारवाली कही जाती है। इसी तरह पृथ्वीके अर्धभागका विस्तार नवासी लाख, पचास हजार योजन

English

... 602 „

अध्याय ८६

श्लोक 2

उत्तमः पलसाहस्रो मध्यमः पञ्चभिः शतैः तदर्धेनाधमस्तद्वद् अल्पवित्तो ऽपि शक्तितः दद्यादेकपलादूर्ध्वं यथाशक्त्या विमत्सरः

uttamaḥ palasāhasro madhyamaḥ pañcabhiḥ śataiḥ tadardhenādhamastadvad alpavitto 'pi śaktitaḥ dadyādekapalādūrdhvaṃ yathāśaktyā vimatsaraḥ

हिन्दी अर्थ

बतलाया जाता है। अब योजनके परिमाणसे पृथ्वीके समूचे विस्तारको सुनिये । इसका विस्तार चारों दिशाओंमें तीन करोड़ योजन माना गया है। यही सातों द्वीपों और समुद्रोंसे घिरी हुई पृथ्वीका विस्तार है। पृथ्वीका आन्तरिक मण्डल बाह्य मण्डलसे तिगुना अधिक है। इस प्रकार उसका परिमाण ग्यारह करोड़ सैंतीस लाख योजन माना गया है। यही पृथ्वीके आन्तरिक मण्डलकी गणना की गयी है। आकाश-मण्डलमें जितने तारागणोंकी स्थिति

English

' Pradyota family

अध्याय ८६

श्लोक 3

धान्यपर्वतवत्सर्वं विदध्यान्मुनिपुंगव विष्कम्भशैलास्तद्वच्च ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादयेत्

dhānyaparvatavatsarvaṃ vidadhyānmunipuṃgava viṣkambhaśailāstadvacca ṛtvigbhyaḥ pratipādayet

हिन्दी अर्थ

है, उतना ही समग्र पृथ्वीमण्डलका विस्तार माना गया है। इस प्रकार पृथ्वीमण्डलके परिमाणके बराबर आकाशमण्डल भी है अब ज्योतिर्गणके प्रचारकी बात सुनिये। मेरुपर्वतकी पूर्व दिशामें मानसोत्तर पर्वतके शिखरपर वस्वौकसारा नामकी महेन्द्रकी पुण्यमयी नगरी है, जो सुवर्णसे सुसञ्जित है। पुनः मेरुकी दक्षिण दिशामें मानसपर्वतके पृष्ठभागपर संयमनी पुरी है, जिसमें सूर्यके पुत्र यमराज निवास करते हैं। पुनः मेरुकी पश्चिम दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर बुद्धिमान् वरुणकी सुखा नामकी रमणीय पुरी है। मेरुकी उत्तर दिशामें मानसपर्वतके शिखरपर महेन्द्रपुरीके समान चन्द्रदेबकी विभावरी पुरी है। उसी मानसोत्तर पर्वतके पृष्ठभागकी चारों दिशाओंमें

English

... 132 „

अध्याय ८६

श्लोक 4

नमस्ते ब्रह्मबीजाय ब्रह्मगर्भाय ते नमः यस्मादनन्तफलदस् तस्मात्पाहि शिलोच्चय

namaste brahmabījāya brahmagarbhāya te namaḥ yasmādanantaphaladas tasmātpāhi śiloccaya

हिन्दी अर्थ

लोकपालगण धर्मकी व्यवस्था और लोकोंकी रक्षा करनेके लिये स्थित हैं। दक्षिणायनके समय सूर्य उन लोकपालोंसे ऊपर होकर भ्रमण करते हैं दक्षिण दिशाका आश्रय लेनेपर सूर्यकी जैसी गति होती है, उसे सुनिये। दक्षिणायनकालमें सूर्य छोड़े गये बाणकी तरह शीघ्रगतिसे चलते हैं। वे ज्योतिश्चक्रको सदा साथ लिये रहते हैं। (इस प्रकार भ्रमण करते हुए)

English

Sisnndga „

अध्याय ८६

श्लोक 5

यस्मादग्नेरपत्यं त्वं यस्मात्पुण्यं जगत्पते हेमपर्वतरूपेण तस्मात्पाहि नगोत्तम

yasmādagnerapatyaṃ tvaṃ yasmātpuṇyaṃ jagatpate hemaparvatarūpeṇa tasmātpāhi nagottama

हिन्दी अर्थ

जिस समय सूर्य अमरावती पुरीमें पहुँचते हैं, उस समय वे गगनमण्डलके मध्यभागमें रहते हैं अर्थात् मध्याह्न होता है। उसी समय वे यमराजकी संयमनीपुरीमें उदित होते हुए और विभावरी नगरीमें अस्त होते हुए दीखते हैं तथा सुखा नगरीमें आधी रात होती है। महेन्द्रस्यामरावत्यामुद्गच्छति दिवाकरः

English

„ Thi however does not tally with the statement that 1050 or 1015 years elapsed between Nanda and the Great War. There is a difference of more than two hundred years.

अध्याय ८६

श्लोक 6

अनेन विधिना यस्तु दद्यात्कनकपर्वतम् स याति परमं ब्रह्मलोकमानन्दकारकम् तत्र कल्पशतं तिष्ठेत् ततो याति परां गतिम्

anena vidhinā yastu dadyātkanakaparvatam sa yāti paramaṃ brahmalokamānandakārakam tatra kalpaśataṃ tiṣṭhet tato yāti parāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

पूर्वाह्णे चापराह्ने च द्वौ द्वौ देवालयौ तु सः उदितो वर्धमानाभिर्मध्याह्ले तपसे रविः

English

If, however, we take the figures from Mr. Pargiter's dynasties of the Kali age, as given below, we find that from Somadi to Ripunjaya, there were 22 kings who reigned for 920 years. The Pradyotas after Ripunjaya were 5 kings who reigned for 138 years. The Sisunagas who came after the Pradyotas were 10 kings and reigned for 330 years, the text however says that the reign of the SiSuuagas was for 360 years. Adding up the above-mentioned three figures, viz., 920 plus 138 plus 330, (or 360) we get the sum 1388 years or 1418. Thus, 1388 or 1418 years was the interval between the installation of Mahfipadraa Nanda and the birth of Parikit or the Great War. Adding 422 B.C. the year of the installation of Mahapadma Nanda, ice come to the figures 1810 or 1840 B.G. as the date of the Mdhdbhdrata War. Thus there is difference between 1810 B.C. or 1840 and 1472 B.C. of 388 years or 418.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 86
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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