अध्याय ४६
श्लोक 1
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने द्वितीयपादे षट्चत्वारिंशत्तमो ऽध्यायः सनन्दन उवाच एतदध्यात्ममानाढ्यं वचः केशिध्वजस्य सः ।खाण्डिक्यो ऽमृतवच्छ्रत्वा पुनराह तमीरयन्
iti śrībṛhannāradīyapurāṇe pūrvabhāge bṛhadupākhyāne dvitīyapāde ṣaṭcatvāriṃśattamo 'dhyāyaḥ sanandana uvāca etadadhyātmamānāḍhyaṃ vacaḥ keśidhvajasya saḥ / khāṇḍikyo 'mṛtavacchratvā punarāha tamīrayan
हिन्दी अर्थ
ग्रामात्! (गाँवसे पूर्व) इत्यादि उदाहरण समझने चाहिए। ९.उदाहरण--“वृक्ष॑ प्रति परि अनु वा विद्योतते विद्युत् (वृक्षकी ओर बिजली चमकती है)। यहाँ वृक्षके प्रकाशित होनेसे बिजलीकी चमकका ज्ञान होता है, अत: वृक्ष लक्षण है। किसीके मतमें विद्युत्का विद्योतन ही लक्षण है, इसे व्यक्त करनेवाले प्रति, परि अथवा अनु किसीके भी योगमें द्वितीया ही होगी। १०.' भक्तो विष्णुं प्रति, परि, अनु वा।' (यह श्रीविष्णुका भक्त है)। यहाँ 'इत्थंभूत'
English
On hearing these words of Keidhvaja that consisted of an estimate of spiritual topics and that was like nertor, Khandikya spoke again, urging him.