Narada Purana· Nārada Purāṇa
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अध्याय 67 / 167

Book 1 - Adhyaya 68

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अध्याय ६७

श्लोक 1

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे देवपूजानिरूपणं नाम सप्तषष्टित्तमो ऽध्यायः श्रीसनत्कुमार उवाच ।अथ वक्ष्ये गणेशस्य मन्त्रान्सर्वेष्टदायकान् ।यान्समाराध्य विप्रेन्द्र साधको भुक्तिमुक्तिमान्

iti śrībṛhannāradīyapurāṇe pūrvabhāge bṛhadupākhyāne tṛtīyapāde devapūjānirūpaṇaṃ nāma saptaṣaṣṭittamo 'dhyāyaḥ śrīsanatkumāra uvāca / atha vakṣye gaṇeśasya mantrānsarveṣṭadāyakān / yānsamārādhya viprendra sādhako bhuktimuktimān

हिन्दी अर्थ

करे। इस प्रकार किये हुए कर्म भी बन्धनकारक नहीं होते। मन्त्रानुष्ठानजनित एक ही कर्म फलदायक होता है। दीक्षित पुरुष जिन-जिन लोकोंके भोगोंकी इच्छा करता है, मन्त्राराधनकी सामर्थ्यसे वह उन

English

should be changed to

अध्याय ६७

श्लोक 2

अव्ययो विष्णुवनिता शंभुस्त्री मीनकेतनः ।स्मृतिर्मांसेंदुमन्वाढ्या सा पुनश्चन्द्रशेखरा

avyayo viṣṇuvanitā śaṃbhustrī mīnaketanaḥ / smṛtirmāṃseṃdumanvāḍhyā sā punaścandraśekharā

हिन्दी अर्थ

सबका उपभोग करके मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य दीक्षा ग्रहण करके नित्य और नैमित्तिक कर्मोका पालन नहीं करता, उसे कुछ कालतक पिशाचयोनिमें रहना पड़ता है। अत: दीक्षित पुरुष

English

From vene $5 to 68 only single lines i.e. 2 quarters* are taken

अध्याय ६७

श्लोक 3

ङेंतो गणपतिस्तोयं भुजङ्गो वरदेति च ।सर्वान्ते जनमुञ्चार्य ततो मे वशमानय

ṅeṃto gaṇapatistoyaṃ bhujaṅgo varadeti ca / sarvānte janamuñcārya tato me vaśamānaya

हिन्दी अर्थ

नित्य-नैमित्तिक आदि कर्म अवश्य करे। नित्य- नैमित्तिक आचारका पालन करनेवाले मनुष्यको उसकी दरीक्षामें त्रुट न आनेके कारण तत्काल मोक्ष प्राप्त होता है। दीक्षाके द्वारा गुरुके स्वरूपमें

English

The reading WRt' should be read as

अध्याय ६७

श्लोक 4

वह्निः प्रियान्तो मन्त्रो ऽयष्टाविंशतिवर्णवान् ।गणको ऽस्य मुनिश्छन्दो गायत्री वियुदादिका

vahniḥ priyānto mantro 'yaṣṭāviṃśativarṇavān / gaṇako 'sya muniśchando gāyatrī viyudādikā

हिन्दी अर्थ

स्थित होकर भगवान् शिव सबपर अनुग्रह करते हैं। जो लोक-परलोकके स्वार्थमें आसक्त होकर कृत्रिम गुरुभक्तिका प्रदर्शन करता है, वह सब कुछ करनेपर भी विफलताको ही प्राप्त होता है

English

should be as

अध्याय ६७

श्लोक 5

गणेशो देवता बीजं षष्टशक्तिस्तदादिका ।श्रीमन्महागणपतिप्रीतये विनियोगकः

gaṇeśo devatā bījaṃ ṣaṣṭaśaktistadādikā / śrīmanmahāgaṇapatiprītaye viniyogakaḥ

हिन्दी अर्थ

और उसे पग-पगपर प्रायश्चित्तका भागी होना पड़ता है। जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा गुरुभक्तिमें तत्पर है, उसे प्रायश्चित्त नहीं प्रात्त होता और पग- पगपर सिद्धि लाभ होता है। यदि शिष्य गुरुभक्तिसे

English

The reading should be corrected as and vz

अध्याय ६७

श्लोक 6

ऋषिं शिरसि वक्रे तु छन्दश्च हृदि देवताम् ।गुह्ये बीजं पदोः शक्तिं न्यसेत्साधकसत्तमः

ṛṣiṃ śirasi vakre tu chandaśca hṛdi devatām / guhye bījaṃ padoḥ śaktiṃ nyasetsādhakasattamaḥ

हिन्दी अर्थ

सम्पन्न और सर्वस्व समर्पण करनेवाला हो तो उसके प्रति मिथ्या मन्त्रका प्रयोग करनेवाला गुरु प्रायश्वित्तका भागी होता है। (पूर्व० ६३ अध्याय)

English

'wlfd* should be read as It is strange (hat the

अध्याय ६७

श्लोक 7

षड्दीर्घाढ्येन बीजेन यं च बीजादिना पुनः ।षडङ्गानि न्यसेदस्य जातियुक्तानि मन्त्रवित्

ṣaḍdīrghāḍhyena bījena yaṃ ca bījādinā punaḥ / ṣaḍaṅgāni nyasedasya jātiyuktāni mantravit

हिन्दी अर्थ

इस “तृतीय पाद' में अधिकांश सकाम अनुष्ठानोंका प्रसड्ग है। इसमें देवताओंके तथा भगवान्के विभिन्न

English

The reading Z should be emended as and

अध्याय ६७

श्लोक 8

शैवी षडङ्गमुद्राय न्यस्तव्या हि षडङ्गके ।गामाद्यं चैव भूर्लोकं नाभ्यन्तं पादयोर्न्यसेत्

śaivī ṣaḍaṅgamudrāya nyastavyā hi ṣaḍaṅgake / gāmādyaṃ caiva bhūrlokaṃ nābhyantaṃ pādayornyaset

हिन्दी अर्थ

स्वरूपोंके ध्यान-पूजनका निरूपण है तथा आराधनकी सुन्दर-सुन्दर विधियाँ बतलायी गयी हैं। उन विधियोंके अनुसार श्रद्धा-विश्वासपूर्वक अनुष्ठान करनेसे उल्लिखित फल अवश्य मिलता है। जैसे विविध तापोंकी निवृत्ति तथा इृष्ट पदार्थोंकी प्राप्तिक लिये अन्यान्य आधिभौतिक साधन हैं, वैसे ही ये आधिहैविक साधन भी हैं एवं ये भौतिक साधनोंकी अपेक्षा अधिक निर्दोष तथा सहज हैं और प्रतिबन्धकका नाश करके नवीन प्रारब्धके निर्माणमें

English

According to Vuhamihira the colour or complexion corres*

अध्याय ६७

श्लोक 9

गीमाद्यं च भुवर्लोकं कण्ठान्तं नाभितो न्यसेत् ।स्वर्लोकं चैव गूमाद्यं कण्ठदिमस्तकावधि

gīmādyaṃ ca bhuvarlokaṃ kaṇṭhāntaṃ nābhito nyaset / svarlokaṃ caiva gūmādyaṃ kaṇṭhadimastakāvadhi

हिन्दी अर्थ

हेतु होनेके कारण ये उनकी अपेक्षा अधिक लाभप्रद हैं ही। और स्वयं भगवान्का तो सकाम आराधन करनेपर (यदि वे उचित समझें तो कामनाकी पूर्ति करके अथवा पूर्ति न करके भी) अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा अन्तमें अपनी प्राप्ति करा देते हैं, इस दृष्टिसे इस प्रसज्ञकी निश्चय ही बड़ी उपादेयता है।

English

Suppose the fuit decanAte of Me$a rises. Then the hnt ones of the 12 houses will represent in order the head, the right eye, right ear, right nostril, right cheek, right jaw, mouth, left jaw, left cheek, left nostril, left ear and the left eye.

अध्याय ६७

श्लोक 10

व्यापकं मूलमन्त्रेण न्यासो ऽयं भुवनाभिधः ।मूलमन्त्रं समुञ्चार्य मातृकावर्णमीरयेत्

vyāpakaṃ mūlamantreṇa nyāso 'yaṃ bhuvanābhidhaḥ / mūlamantraṃ samuñcārya mātṛkāvarṇamīrayet

हिन्दी अर्थ

उत्तम आचार्य एवं शिष्यके लक्षण

English

The reading should be rectified as Similarly

अध्याय ६७

श्लोक 11

तदन्ते ऽपि च मूलं स्यान्नम्ॐऽतं मातृकास्थले ।क्षान्तं विन्यस्य मूलेन व्यापकं रचयेत्सुधीः

tadante 'pi ca mūlaṃ syānnamoṃ'taṃ mātṛkāsthale / kṣāntaṃ vinyasya mūlena vyāpakaṃ racayetsudhīḥ

हिन्दी अर्थ

न कहते हैं-अब मैं जीवोंके मन्त्रोंक लिंगभेद

English

The reading should be corrected into

अध्याय ६७

श्लोक 12

वर्णन्या सो ऽयमाख्यातः पदन्यासस्तथोच्यते ।पञ्चत्रिबाणवह्नीन्दुचन्द्राक्षिनिगमैः क्रमात्

varṇanyā so 'yamākhyātaḥ padanyāsastathocyate / pañcatribāṇavahnīnducandrākṣinigamaiḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

पाश-समुदायका उच्छेद करनेके लिये अभीष्ट मन्त्र तीन प्रकारके होते हैं--स्त्री, पुरुष और सिद्धि प्रदान करनेवाली दीक्षा-विधिका वर्णन नपुंसक। स्त्री-मन्त्र वे हैं जिनके अन्तमें दो 'ठ' करूँगा, जो मन्त्रोंको शक्ति प्रदान करनेवाली है।। अर्थात् 'स्वाहा' लगे हों। जिनके अन्तमें 'हुम्” दीक्षा दिव्यभावकों देती है और पापोंका क्षय और 'फद' हैं वे पुरुष-मन्त्र कहे गये हैं। जिनके

English

The reading should be emended as

अध्याय ६७

श्लोक 13

विभक्तैर्मूलगायत्र्या हृदन्तैरष्टभिः पदैः ।भालदेशे मुखे कण्ठे हृदि नाभ्यूरुजानुषु

vibhaktairmūlagāyatryā hṛdantairaṣṭabhiḥ padaiḥ / bhāladeśe mukhe kaṇṭhe hṛdi nābhyūrujānuṣu

हिन्दी अर्थ

करती है। इसीलिये सम्पूर्ण आगमोंके विद्वानोंने अन्तमें "नमः ' लगा होता है, वे मन्त्र नपुंसक हैं। उसे दीक्षा कहा है। मननका अर्थ है सर्वज्ञता और इस प्रकार मन्त्रोंकी जातियाँ बतायी गयी हैं। त्राणका अर्थ है संसारी जीवपर अनुग्रह करना। सभी मन्त्रोंके देवता पुरुष हैं और सभी विद्याओंकी इस मनन और त्राणधर्मसे युक्त होनेके कारण स्त्री देवता मानी गयी है। वे त्रिविध मन्त्र छः

English

The reading Ip: should be read as Ip9.

अध्याय ६७

श्लोक 14

पादयोश्चैव विन्यस्य मूलने व्यापकं चरेत् ।वदेत्तत्पुरुषायान्ते विद्महेति पदं ततः

pādayoścaiva vinyasya mūlane vyāpakaṃ caret / vadettatpuruṣāyānte vidmaheti padaṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

तथापि अल्पायु मनुष्यके लिये यह विचारणीय है कि अपने जीवनको क्या सांसारिक भोगपदार्थोंकी प्राप्तिके प्रयथत और उनके उपभोगमें लगाना ही इष्ट है? मनुष्य-जीवन क्षणभंगुर है और वह है केवल भगवत्प्राप्तिक लिये ही। संसारके भोग तो प्रत्येक योनिमें ही प्रारब्धानुसार प्राप्त होते हैं और उनका उपभोग भी जीव करता ही है। मनुष्य-जीवन भी यदि उन्हीं क्षणभंगुर, नाशवानू, दुःखयोनि और जीवको जन्म-मरणके चक्रमें डालनेवाले

English

The reading Is corrupt and may be corrected

अध्याय ६७

श्लोक 15

वक्रतुण्डाय शब्दान्ते धीमहीति समीरयेत् ।तन्नो दन्तिः प्रचोवर्णा दयादिति वदेत्पुनः

vakratuṇḍāya śabdānte dhīmahīti samīrayet / tanno dantiḥ pracovarṇā dayāditi vadetpunaḥ

हिन्दी अर्थ

भोगपदार्थोंके लिये सकाम उपासनामें ही लगा दिया जाय तो यह बुद्धिमानीका कार्य नहीं है। जो कृपामय भगवान् परम दुर्लभ मोक्षको या स्वयं अपने-आपको देनेके लिये प्रस्तुत हैं, उनसे दुःखपरिणामी और अनित्य भोग माँगना भगवानके तत्त्वको और भक्तिके महत्त्को न समझना ही है। जो पुरुष किसी वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छासे भगवान्को भजता है, उसका ध्येय वह वस्तु है, भगवान् नहीं है। वह वस्तु साध्य है और भगवान् तथा उनकी

English

Ihe reading should be emended as

अध्याय ६७

श्लोक 16

एषोक्ता मूलगायत्री सर्वसिद्धिप्रदायिनी ।एवं न्यासविधिं कृत्वा ध्यायेदेवं हृदंबुजे

eṣoktā mūlagāyatrī sarvasiddhipradāyinī / evaṃ nyāsavidhiṃ kṛtvā dhyāyedevaṃ hṛdaṃbuje

हिन्दी अर्थ

भक्ति साधन है। यदि किसी मड्रलकारी कारणवश ही उसके अभीष्टकी प्राप्तिमें देर होगी तो वह भगवान्की भक्तिको छोड़ दे सकता है। अतएव सकाम भावसे की हुई उपासना एक प्रकारसे काम्य वस्तुकी ही उपासना है, भगवान्की नहीं। इस बातको भलीभाँति समझ लेना चाहिए और अपनी रुचिके अनुसार भगवान्की उपासना इस प्रसड्रमें आयी हुई पद्धतिके अनुकूल अवश्य करनी चाहिए, पर वह करनी चाहिए--निष्काम प्रेमभावसे

English

The reading fdfTlsilvw: should be corrected as fWrtt'T*!#:.

अध्याय ६७

श्लोक 17

उद्यन्मार्तण्डसदृशं लोकस्थित्यन्तकारणम् ।सशक्तिकं भूषिताङ्गं दन्त चक्राद्युदायुधम्

udyanmārtaṇḍasadṛśaṃ lokasthityantakāraṇam / saśaktikaṃ bhūṣitāṅgaṃ danta cakrādyudāyudham

हिन्दी अर्थ

केवल भगवान्की प्रसन्नतांके लिये ही। इसीमें मनुष्य-जन्मकी सार्थकता है।

English

is grammatkally wrong. The author intends probably to convey tlte idea

अध्याय ६७

श्लोक 18

एवं ध्यात्वा चतुश्चत्वारिंशत्साहस्रसंयुतम् ।चतुर्लक्षं जपेन्मन्त्रं अष्टद्रव्यैर्दशांशतः

evaṃ dhyātvā catuścatvāriṃśatsāhasrasaṃyutam / caturlakṣaṃ japenmantraṃ aṣṭadravyairdaśāṃśataḥ

हिन्दी अर्थ

इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि सकाम अनुष्ठानका फल प्रतिबन्धककी प्रबलता और सरलताके अनुसार विलम्बसे या शीघ्र होता है। एक आदमीको किसी अमुक वस्तुकी या स्थितिकी आवश्यकता है। वह उसके लिये सकाम उपासना करता है। यदि उस वस्तु या स्थितिकी प्राप्तिमें बाधक पूर्वजन्मका कर्म बहुत अधिक प्रबल होता है तो एक ही अनुष्ठानसे अभीष्ट फल नहीं मिलता। बार-बार अनुष्ठान करने पड़ते हैं। आजकलके सकामी पुरुषमें

English

I'he printed text gives T'Idl:' which can mean only 'defeated*. It may be some other word standing for some number. It must be fiRT. which would give the number 24. The word may yield the number 27 which is the number of stars, or 12 which is the number of Rais.

अध्याय ६७

श्लोक 19

जुहुयाद्विधिवन्मन्त्री संस्कृते हव्यवाहने ।इक्षवः सक्तवो मोचाफलानि चिपिटास्तिलाः

juhuyādvidhivanmantrī saṃskṛte havyavāhane / ikṣavaḥ saktavo mocāphalāni cipiṭāstilāḥ

हिन्दी अर्थ

इतना धैर्य नहीं हो सकता और फलत: वह देवतामें ही अविश्वास कर बैठता है तथा उसकी अवज्ञा करने लगता है, इससे लाभके बदले उसकी उलटी हानि हो जाती है। फिर सकाम साधना वही सफल होती है जिसमें विधिका पूरा- पूरा साड्रोपाड़ पालन हुआ हो तथा कर्म, देवता और फलनमें पूर्ण श्रद्धा हो। विधि और श्रद्धाके अभावमें भी फल नहीं होता और आजके युगके मनुष्योंमें अधिकांश ऐसे हैं जो मनमाना फल तो तुरंत चाहते हैं, पर श्रद्धा और विधिकी

English

After subtracting the planet's longitude from its highest exal¬

अध्याय ६७

श्लोक 20

मोदका नारिकेलानि लाजा द्रव्याष्टकं स्मृतम् ।पीठमाधारशक्त्यादिपरतत्वान्तमर्चयेत्

modakā nārikelāni lājā dravyāṣṭakaṃ smṛtam / pīṭhamādhāraśaktyādiparatatvāntamarcayet

हिन्दी अर्थ

आवश्यकता नहीं समझते। अत: उनको भी उक्त फल नहीं मिलता। इन सब दृष्टियोंसे भी सकामभावमें देवतामें, देवाराधनमें अश्रद्धातक होनेकी सम्भावना रहती है, फिर यदि कहीं कुछ फल मिलता भी है तो वह अनित्य, क्षणभंगुर और दुःख देनेवाला ही होता है। अतएव बुद्धिमान् पुरुषको सकाम भावका सर्वथा त्याग ही करना चाहिए ।--सम्पादक

English

The text invariably gives (Moon) for amt The reading

अध्याय ६७

श्लोक 21

षट्कोणान्तस्त्रिकोणं च बहिरष्टदलं लिखेत् ।भूपुरं तद्बहिः कृत्वा गमेशं तत्र पूजयेत्

ṣaṭkoṇāntastrikoṇaṃ ca bahiraṣṭadalaṃ likhet / bhūpuraṃ tadbahiḥ kṛtvā gameśaṃ tatra pūjayet

हिन्दी अर्थ

शान्ति, वश्य, स्तम्भन, द्वेष, उच्चाटन और मारण--ये छः: कर्म हैं। (मन्त्रमहोदधि)

English

The reading WtWnTTO: b utterly corrupt It should ht read somewhat as

अध्याय ६७

श्लोक 22

तीव्राख्या ज्वालिनी नन्दा भोगदा कामरूपाणी ।अग्रा तेजोवती सत्या नवमी विध्ननाशिनी

tīvrākhyā jvālinī nandā bhogadā kāmarūpāṇī / agrā tejovatī satyā navamī vidhnanāśinī

हिन्दी अर्थ

(रां) और स्वाहाका प्रयोग हो, वे मन्त्र आग्रेय (अग्निसम्बन्धी) कहे गये हैं। मुने! जो मन्त्र भुगुबीज (सं) और पीयूष-बीज (वं)-से युक्त हैं, वे सौम्य (सोमसम्बन्धी) कहे गये हैं। इस

English

The reading nWI: OTT: I b corrupt.

अध्याय ६७

श्लोक 23

सर्वादिशक्तिकमलासनाय हृदयान्तिकः ।पीठमन्त्रो ऽयमेतेन दद्यादासनमुत्तमम्

sarvādiśaktikamalāsanāya hṛdayāntikaḥ / pīṭhamantro 'yametena dadyādāsanamuttamam

हिन्दी अर्थ

प्रकार मनीषी पुरुषोंको सभी मन्त्र अग्नीषोमात्मक जानने चाहिए। जब श्वास पिड़ला नाड़ीमें स्थित हो अर्थात् दाहिनी साँस चलती हो तो आग्रेय

English

The reading would mean the 3rd, ascendant and

अध्याय ६७

श्लोक 24

तत्रावाह्य गणाधीशं मध्ये सम्पूज्य यत्नतः ।विकोणबाह्ये पूर्वादिचतुर्दिक्षअवर्चयेत्क्रमात्

tatrāvāhya gaṇādhīśaṃ madhye sampūjya yatnataḥ / vikoṇabāhye pūrvādicaturdikṣaavarcayetkramāt

हिन्दी अर्थ

स्थित हो अर्थात् बायीं साँस चलती हो तो सोम- सम्बन्धी मन्त्र जागरूक होते हैं। जब इडा और पिड़ला दोनों नाड़ियोंमें साँस चलती हो अर्थात् बायाँ और दाहिना दोनों स्वर समानभावसे चलते

English

should be read as '' as

अध्याय ६७

श्लोक 25

श्रियं श्रियः पतिं चैव गौरीं गौरी पतिं तथा ।रतिं रतिपतिं पाश्चान्महीपूर्व च पोत्रिणम्

śriyaṃ śriyaḥ patiṃ caiva gaurīṃ gaurī patiṃ tathā / ratiṃ ratipatiṃ pāścānmahīpūrva ca potriṇam

हिन्दी अर्थ

हों तो सभी मन्त्र जाग्रत् होते हैं। यदि मन्त्रके सोते समय उसका जप किया जाय तो वह अनर्थरूप फल देनेवाला है। प्रत्येक मन्त्रका उच्चारण करते समय उनका श्वास रोककर

English

As usual the readings are corrupt: Instead of putting «l4lfU: the editor of the Puriu has given us the reading 9WW:. sSlmilarly

अध्याय ६७

श्लोक 26

क्रमादिल्ववटाश्वत्थप्रियगूनामधोर्ऽचयेत् ।रमा पद्मद्वयकरा शङ्खचक्रधरो हरिः

kramādilvavaṭāśvatthapriyagūnāmadhor'cayet / ramā padmadvayakarā śaṅkhacakradharo hariḥ

हिन्दी अर्थ

उच्चारण न करे। अनुलोमक्रममें बिन्दु ( अनुस्वार) - युक्त और विलोमक्रममें विसर्गसंयुक्त मन्त्रोंका उच्चारण करे। यदि जपा हुआ मन्त्र देवताको जाग्रतू कर सका तो वह शीघ्र सिद्धि देनेवाला

English

should be read as and VPTT as vit.

अध्याय ६७

श्लोक 27

गौरी पाशाङ्कुशधरा टङ्कशूलधरो हरः ।रतिः पद्मकरा पुष्पबाणचापधरः स्मरः

gaurī pāśāṅkuśadharā ṭaṅkaśūladharo haraḥ / ratiḥ padmakarā puṣpabāṇacāpadharaḥ smaraḥ

हिन्दी अर्थ

होता है और उस मालासे जपा हुआ दुष्ट मन्त्र भी सिद्ध होता है। क्रूर कर्ममें आग्रेय मन्त्रका उपयोग होता है और सोमसम्बन्धी मन्त्र सौम्य फल देनेवाले होते हैं। शान्त, ज्ञान और अत्यन्त रौद्र--

English

ir iz should be read as

अध्याय ६७

श्लोक 28

शूकव्रीह्यग्रहस्ता भूः पोत्री चक्रगदाधरः ।देवाग्रे पूजयेल्लक्ष्मीसहितं तु विनायकम्

śūkavrīhyagrahastā bhūḥ potrī cakragadādharaḥ / devāgre pūjayellakṣmīsahitaṃ tu vināyakam

हिन्दी अर्थ

ये मन्त्रोंकी तीन जातियाँ हैं। शान्तिजातिसमन्वित शान्त मन्त्र भी 'हुंफद्” यह पल्लव जोड़नेसे रौद्र भाव धारण कर लेता है।

English

should be read as and Htiivntl) as

अध्याय ६७

श्लोक 29

पूजयेत्षट्सु कोणेषु ह्यामोदाद्यान्प्रियायुतान् ।आमोदं सिद्धिसंयुक्तमग्रतः परिपीजयेत्

pūjayetṣaṭsu koṇeṣu hyāmodādyānpriyāyutān / āmodaṃ siddhisaṃyuktamagrataḥ paripījayet

हिन्दी अर्थ

छिन्नता आदि दोषोंसे युक्त मन्त्र साधककी रक्षा नहीं कर पाते। छिल्न, रुद्ध, शक्तिहीन, पराड्मुख, कर्णहीन, नेत्रहीन, कीलित, स्तम्भित, दग्ध, त्रस्त,

English

is unintelligible. should be read as T99[ifltr:

अध्याय ६७

श्लोक 30

प्रमोदं चाग्निकोणे तु समृद्धिसहितं यजेत् ।ईशकोणे यजेत्कीर्तिसंयुतं सुमुखं तथा

pramodaṃ cāgnikoṇe tu samṛddhisahitaṃ yajet / īśakoṇe yajetkīrtisaṃyutaṃ sumukhaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

मन्द, कूट, निरंशक, सत्त्वहीन, केकर, बीजहीन,

English

The reading «nrr .. may have to be read as Vff: ftrTRff.

अध्याय ६७

श्लोक 31

वारुणे मदनावत्या संयुतं दुर्मुखं यजेत् ।यजेन्नैरृत्यकोणे तु विघ्नं मदद्रवायुतम्

vāruṇe madanāvatyā saṃyutaṃ durmukhaṃ yajet / yajennairṛtyakoṇe tu vighnaṃ madadravāyutam

हिन्दी अर्थ

अतिनि:सख्रेह तथा पीड़ित--ये (४९) मन्त्रके दोष बताये गये हैं। अब मैं इनके लक्षण बतलाता हूँ। जिस मन्त्रके आदि, मध्य और अन्तमें संयुक्त,

English

should be read as

अध्याय ६७

श्लोक 32

द्राविण्या विघ्नकर्तारं वायुकोणे समर्चयेत् ।पाशाङ्कुशाभयकरांस्तरुणार्कसमप्रभान्

drāviṇyā vighnakartāraṃ vāyukoṇe samarcayet / pāśāṅkuśābhayakarāṃstaruṇārkasamaprabhān

हिन्दी अर्थ

अग्नरिबीज (रं)-का प्रयोग हो, वह मन्त्र 'छिन्न' कहलाता है। जिसके आदि, मध्य और अन्तमें दो बार भूमिबीज (लं)-का उच्चारण होता हो उस मन्त्रको 'रुद्ध/ जानना चाहिए। वह बड़े

English

The reading fAw; toHw: possibly stands siat Here

अध्याय ६७

श्लोक 33

कपोलविगलद्दानगन्धलुब्धा लिशोभितान् ।षट्कोणोभयपार्श्वे तु शङ्खपद्मनिभौ क्रमात्

kapolavigaladdānagandhalubdhā liśobhitān / ṣaṭkoṇobhayapārśve tu śaṅkhapadmanibhau kramāt

हिन्दी अर्थ

क्लेशसे सिद्धिदायक होता है। प्रणव और कवच (हुं) ये तीन बार जिस मन्त्रमें आये हों वह लक्ष्मीयुक्त होता है। ऐसी लक्ष्मीसे हीन जो मन्त्र है उसे 'शक्तिहीन” जानना चाहिए। वह दीर्घकालके

English

Here too the readings are very bad: The eKpreuion irTTP

अध्याय ६७

श्लोक 34

सहितौ निजशक्तिभ्यां ध्यात्वा पूर्ववदर्चयेत् ।केशरेषु षडङ्गानि पत्रेष्वष्टौ तु मातरः

sahitau nijaśaktibhyāṃ dhyātvā pūrvavadarcayet / keśareṣu ṣaḍaṅgāni patreṣvaṣṭau tu mātaraḥ

हिन्दी अर्थ

बाद फल देता है। जहाँ आदिमें कामबीज, (क्लीं), मध्यमें मायाबीज (हीं) और अन्तमें अंकुश बीज (क्रों) हो, वह मन्त्र 'पराड्मुख' जानना चाहिए। वह साधकोंको चिरकालमें सिद्धि देनेवाला होता

English

The irotsfPITW b to be changed to

अध्याय ६७

श्लोक 35

इन्द्राद्यानपि वज्ज्रादीन्पूजयेद्धरणीगृहे ।एवमाराध्य विघ्नेशं साधयेत्स्वमनोरथान्

indrādyānapi vajjrādīnpūjayeddharaṇīgṛhe / evamārādhya vighneśaṃ sādhayetsvamanorathān

हिन्दी अर्थ

है। यदि आदि, मध्य और अन्तमें सकार देखा जाय, तो वह मन्त्र 'बधिर” (कर्णहीन) कहा गया है। वह बहुत कष्ट उठानेपर थोड़ा फल देनेवाला है। यदि पश्चाक्षर-मन्त्र हो, किंतु उसमें

English

should be read as

अध्याय ६७

श्लोक 36

चतुश्चत्वारिंशताढ्यं चतुः शतमतन्द्रितः ।तर्पयेदंबुभिः शुद्धैर्गजास्यं दिनशः सुधीः

catuścatvāriṃśatāḍhyaṃ catuḥ śatamatandritaḥ / tarpayedaṃbubhiḥ śuddhairgajāsyaṃ dinaśaḥ sudhīḥ

हिन्दी अर्थ

रेफ, मकार और अनुस्वार न हो तो उसे 'नेत्रहीन' जानना चाहिए। वह क्लेश उठानेपर भी सिद्धिदायक नहीं होता। आदि, मध्य और अन्तमें हंस (सं),

English

The expression may have to be read as

अध्याय ६७

श्लोक 37

पद्मैस्तु वशयेद्भूपांस्तत्पत्नीश्चोत्पलैस्तथा ।कुमुदैर्मन्त्रिणो ऽश्वत्थसमिद्भिर्वाडवाञ्शुभैः

padmaistu vaśayedbhūpāṃstatpatnīścotpalaistathā / kumudairmantriṇo 'śvatthasamidbhirvāḍavāñśubhaiḥ

हिन्दी अर्थ

और चन्द्रविन्दु या सकार, फकार अथवा हुं हो तथा जिसमें मा, प्रा और नमामि पद न हो वह

English

W should be read as fracT.

अध्याय ६७

श्लोक 38

उदुंम्बरोत्थैर्नृपतीन्वैश्यान्प्लक्षसमुद्भवैः ।वटोद्भवैः समिद्भिश्च वशयेदन्तिमान्बुधः

uduṃmbarotthairnṛpatīnvaiśyānplakṣasamudbhavaiḥ / vaṭodbhavaiḥ samidbhiśca vaśayedantimānbudhaḥ

हिन्दी अर्थ

और अन्तमें भी वे दोनों पद न हों तथा जिसमें फट् और लकार न हों, वह मन्त्र 'स्तम्भित' माना गया है, जो सिद्धिमें रुकावट डालनेवाला है। जिस मन्त्रके अन्तमें अग्नि (रं) बीज वायु

English

should be read as 4#

अध्याय ६७

श्लोक 39

आज्येन श्रियमाप्नोति स्वर्णाप्तिर्मधुना भवेत् ।गोदुग्धेन गवां लाभो दध्ना सर्वसमृद्धिमान्

ājyena śriyamāpnoti svarṇāptirmadhunā bhavet / godugdhena gavāṃ lābho dadhnā sarvasamṛddhimān

हिन्दी अर्थ

(य) बीजके साथ हो तथा जो सात अक्षरोंसे

English

It b strange that the author has omitted Sign Mina (Pisces) while giving the effects of the various natal Sns.

अध्याय ६७

श्लोक 40

अन्नाप्तिरन्नहोमेन समिद्भिर्वेतसां जलम् ।वासांसि लभते हुत्वा कुसुंभकुसुमैः शुभैः

annāptirannahomena samidbhirvetasāṃ jalam / vāsāṃsi labhate hutvā kusuṃbhakusumaiḥ śubhaiḥ

हिन्दी अर्थ

युक्त दिखायी देता हो वह “दग्ध' संज्ञक मन्त्र है। जिसमें दो, तीन, छः: या आठ अक्षरोंके साथ अस्त्र (फट) दिखायी दे, उस मन्त्रको “त्रस्त' जानना चाहिए। जिसके मुखभागमें प्रणवरहित

English

{aU is to be changed to to

अध्याय ६७

श्लोक 41

अथ सर्वेष्टदं वक्ष्ये चतुरावृत्तितर्पणम् ।मूलेनादौ चतुर्वारं प्रत्येकं च प्रतर्पयेत्

atha sarveṣṭadaṃ vakṣye caturāvṛttitarpaṇam / mūlenādau caturvāraṃ pratyekaṃ ca pratarpayet

हिन्दी अर्थ

हकार अथवा शक्ति हो, वही मन्त्र 'भीत” कहा गया है। जिसके आदि, मध्य और अन्तमें चार 'म' हों, वह मन्त्र 'मलिन” माना गया है। वह अत्यन्त क्लेशसे सिद्धिदायक होता है। जिस मन्त्रके

English

The reading may stand for In that case

अध्याय ६७

श्लोक 42

पूर्वमन्त्राक्षरैर्मन्त्रैः स्वाहान्तैश्च चतुश्चतुः ।मूलमन्त्रैश्चतुर्वारपूर्वकं संप्रतर्प्य च

pūrvamantrākṣarairmantraiḥ svāhāntaiśca catuścatuḥ / mūlamantraiścaturvārapūrvakaṃ saṃpratarpya ca

हिन्दी अर्थ

मध्यभागमें द अक्षर और अन्तमें दो क्रोध (हुं हुं) बीज हों और उनके साथ अस्त्र (फट) भी हो, तो वह मन्त्र 'तिरस्कृत'” कहा गया है। जिसके अन्तमें '(म” और “य' तथा 'हृदय” हो और

English

The reading, WWWl makes no sense.

अध्याय ६७

श्लोक 43

मिथुनादींस्ततः पश्चात्पूर्ववत्संप्रतर्पयेत् ।देवेन सहितां शक्तिं शक्त्या च सहितं तु तम्

mithunādīṃstataḥ paścātpūrvavatsaṃpratarpayet / devena sahitāṃ śaktiṃ śaktyā ca sahitaṃ tu tam

हिन्दी अर्थ

मध्यमें वषट् एवं वौषट् हो वह मन्त्र 'भेदित' कहा गया है। उसे त्याग देना चाहिए; क्योंकि वह बड़े क्लेशसे फल देनेवाला होता है। जो तीन अक्षरसे युक्त तथा हंसहीन है, उस मन्त्रको 'सुषुप्त'

English

should be taken as and vnVTlf as

अध्याय ६७

श्लोक 44

एवञ्च षड्विंशतिधा मिथुनानि भवन्ति हि ।स्वनामाद्यर्णबीजानि तानि सन्तर्पयेत्क्रमात्

evañca ṣaḍviṃśatidhā mithunāni bhavanti hi / svanāmādyarṇabījāni tāni santarpayetkramāt

हिन्दी अर्थ

कहा गया है। जो विद्या अथवा मन्त्र सतरह अक्षरोंसे युक्त हो तथा जिसके आदियमें पाँच बार फटका प्रयोग हुआ हो उसे “मदोन्मत्त' माना गया है। जिसके मध्य भागमें फटका प्रयोग हो उस

English

Thus pairs arise in twenty-six ways; he should satisfy them in order with seed-syllables beginning with their own names.

अध्याय ६७

श्लोक 45

भवेत्संभूय सचतुश्चत्वारिंशञ्चतुः शतम् ।एवं संतप्य तत्पश्चात्पूर्ववत्सोपचारकैः

bhavetsaṃbhūya sacatuścatvāriṃśañcatuḥ śatam / evaṃ saṃtapya tatpaścātpūrvavatsopacārakaiḥ

हिन्दी अर्थ

अस्त्र (फट)-का प्रयोग हो वह 'हतवीर्य” कहा जाता है। मन्त्रके आदि, मध्य और अन्तमें चार अस्त्र (फट)-का प्रयोग हो तो उसे ' भ्रान्त' जानना चाहिए। जो मन्त्र अठारह अथवा बीस

English

Together they are four hundred and forty-four. Having thus satisfied them, he then does it as before with the services,

अध्याय ६७

श्लोक 46

सर्वाभीष्टं च संप्रार्थ्य प्रणम्योद्वासयेत्सुधीः ।भाद्रकृष्णचतुर्थ्यादिप्रतिमासमतन्द्रितः

sarvābhīṣṭaṃ ca saṃprārthya praṇamyodvāsayetsudhīḥ / bhādrakṛṣṇacaturthyādipratimāsamatandritaḥ

हिन्दी अर्थ

अक्षरवाला होकर कामबीज (क्लीं)-से युक्त होकर साथ ही उसमें हृदय, लेख और अंकुशके भी बीज हों तो उसे “प्रध्वस्त' कहा गया है। सात

English

prays for all desires, bows, and dismisses them. Each month from the fourth of the dark half of Bhadrapada, unwearied,

अध्याय ६७

श्लोक 47

आरभ्यार्के दयं मन्त्री यावच्चन्द्रोदयो भवेत् ।तावन्नोपविशेद्भूमौ जितवाक्क्रियामानसः

ārabhyārke dayaṃ mantrī yāvaccandrodayo bhavet / tāvannopaviśedbhūmau jitavākkriyāmānasaḥ

हिन्दी अर्थ

अक्षरोंका मन्त्र 'वृद्ध' कहा गया है। प्रणवसहित नवार्ण-मन्त्रको 'निस्त्रिश' कहते हैं। जिसके अन्तमें हृदय (नमः) कहा गया हो, मध्यमें शिरोमन्त्र

English

the mantra-knower, from sunrise until moonrise, should not sit on the ground, controlling his speech, acts and mind.

अध्याय ६७

श्लोक 48

ततश्चन्द्रोदये मन्त्री पूजयेद्गणनायकम् ।पूर्वोक्तविधिना सम्यङ्नानापुष्पोपहारकैः

tataścandrodaye mantrī pūjayedgaṇanāyakam / pūrvoktavidhinā samyaṅnānāpuṣpopahārakaiḥ

हिन्दी अर्थ

(स्वाहा)- का उच्चारण होता हो और अन्तमें

English

Then at moonrise the mantra-knower should worship the leader of the hosts by the rule stated before, with various flowers and offerings.

अध्याय ६७

श्लोक 49

एकविंशतिसंख्याकान्मोदकांश्च निवेदयेत् ।तदग्रे प्रजपेन्मन्त्रमष्टोत्तरसहस्रकम्

ekaviṃśatisaṃkhyākānmodakāṃśca nivedayet / tadagre prajapenmantramaṣṭottarasahasrakam

हिन्दी अर्थ

शक्ति अक्षरोंसे हीन हो, उस मन्त्रको 'निर्बीज' माना गया है। जिसके आदि, मध्य और अन्तमें छ: बार फटका प्रयोग देखा जाता हो, वह मन्त्र 'सिद्धिहीन' होता है। पाँच अक्षरके मन्त्रको 'मन्द!

English

He should offer twenty-one sweets; before him he should chant the mantra a thousand and eight times.

अध्याय ६७

श्लोक 50

ततः कर्पूरकाश्मीररक्तपुष्पैः सचन्दनैः ।अर्ध्यं दद्यात्तु मूलान्ते ङेंते गणपतिं ततः

tataḥ karpūrakāśmīraraktapuṣpaiḥ sacandanaiḥ / ardhyaṃ dadyāttu mūlānte ṅeṃte gaṇapatiṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

और एकाक्षर मन्त्रको “कूट” कहते हैं। उसीको “निरंशक” भी कहा गया है। दो अक्षरका मन्त्र 'सत्त्वहीन', चार अक्षरका मन्त्र 'केकर” और छः: या साढ़े सात अक्षरका मन्त्र 'बीजहीन” कहा

English

Then with camphor, saffron, red flowers and sandal he should give the offering of arghya, to the root mantra ending in "ye" (dative): to Ganapati.

अध्याय ६७

श्लोक 51

इदमर्ध्यं कल्पयामि हृदन्तोर्ऽध्यमनुर्मतः ।स्तुत्वा नत्वा विसृज्याथ यजेच्चन्द्रमसं पुनः

idamardhyaṃ kalpayāmi hṛdantor'dhyamanurmataḥ / stutvā natvā visṛjyātha yajeccandramasaṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

गया है। साढ़े बारह अक्षरके मन्त्रको 'धूमित' माना गया है। वह निन्दित है। साढ़े तीन बीजसे युक्त बीस, तीस तथा इक्कौस अक्षरका मन्त्र 'आलिज्लित” कहा गया है। जिसमें दन्तस्थानीय

English

"I prepare this arghya" — ending with the heart, the arghya is approved. Having praised, bowed and dismissed, he should again worship the Moon.

अध्याय ६७

श्लोक 52

अर्ध्यं दद्याञ्चतुर्वारं पूजयित्वा गुरुं ततः ।निवेदितेषु विप्राय दद्यादर्धांश्च मोदकान्

ardhyaṃ dadyāñcaturvāraṃ pūjayitvā guruṃ tataḥ / nivediteṣu viprāya dadyādardhāṃśca modakān

हिन्दी अर्थ

अक्षर हों वह मन्त्र 'मोहित' बताया गया है। चौबीस या सत्ताईस अक्षरके मन्त्रको 'क्षुधार्त' जानना चाहिए। वह मन्त्र सिद्धिसे रहित होता है। ग्यारह, पच्चीस, अथवा तेईस अक्षरका मन्त्र 'दृप्त'

English

Having given arghya four times and worshipped the teacher, from the offered sweets he should give half to a Brahmin.

अध्याय ६७

श्लोक 53

स्वयमर्द्धान्प्रभुञ्जीत ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।एवं व्रतं यः कुरुते सम्यक्संवत्सरावधि

svayamarddhānprabhuñjīta brahmacārī jitendriyaḥ / evaṃ vrataṃ yaḥ kurute samyaksaṃvatsarāvadhi

हिन्दी अर्थ

कहलाता है। छब्बीस, छत्तीस तथा उनतीस अक्षरके

English

The celibate, master of senses, should himself eat the half. The man who observes this vow properly for a year

अध्याय ६७

श्लोक 54

पुत्रान्पौत्रान्सुखं वित्तमारोग्यं लभते नरः ।सूर्योदयादशक्तश्चेदस्तमारभ्य मन्त्रवित्

putrānpautrānsukhaṃ vittamārogyaṃ labhate naraḥ / sūryodayādaśaktaścedastamārabhya mantravit

हिन्दी अर्थ

इकतीस अक्षरका मन्त्र “अत्यन्त क्रूर'ं (और “अकिक्कुद्ध') जानना चाहिए, वह सम्पूर्ण कर्मोमें निन्दित माना गया है। चालीस अक्षरसे लेकर तिरसठ अक्षरोंतकका जो मन्त्र है, उसे “ब्रीडित'

English

gains sons, grandsons, happiness, wealth and health. If unable from sunrise, the mantra-knower should keep the vow from sunset

अध्याय ६७

श्लोक 55

चन्द्रोदयान्तं पूर्वोक्तविधिना व्रतमाचरेत् ।एवं कृते ऽपि पूर्वोक्तं फलमाप्नोति निश्चितम्

candrodayāntaṃ pūrvoktavidhinā vratamācaret / evaṃ kṛte 'pi pūrvoktaṃ phalamāpnoti niścitam

हिन्दी अर्थ

(लज्जित) समझना चाहिए। वह सब कार्योंकी सिद्धिमें समर्थ नहीं होता। पैंसठ अक्षरके मन्त्रोंको 'शान्तमानस” जानना चाहिए। मुनीश्वर! पैंसठ अक्षरोंसे लेकर निन्यानबे अक्षरोंतकके जो मन्त्र

English

until moonrise by the rule given before; doing so he certainly gains the fruit stated.

अध्याय ६७

श्लोक 56

गणिशप्रतिमां दन्तिदन्तेन कपिनापि वा ।गजभग्रेन निंबेन सितार्केंणाथवा पुनः

gaṇiśapratimāṃ dantidantena kapināpi vā / gajabhagrena niṃbena sitārkeṃṇāthavā punaḥ

हिन्दी अर्थ

हैं, उन्हें 'स्थानशभ्रष्ट' जानना चाहिए। तेरह या पंद्रह अक्षरोंके जो मन्त्र हैं, उन्हें सर्वतन्त्र-विशारद विद्वानोंने 'विकल' कहा है। सौ, डेढ़ सौ, दो सौ, दो सौ इक्यानबे अथवा तीन सौ अक्षरोंके जो

English

Having made an image of Ganesha from elephant tusk, or monkey (wood), elephant-tusk, neem or white arka,

अध्याय ६७

श्लोक 57

कृत्वा तस्यां समावाह्य प्राणस्थापनपूर्वकम् ।अभ्यर्च्य विधिवन्मन्त्री राहुग्रस्ते निशाकरे

kṛtvā tasyāṃ samāvāhya prāṇasthāpanapūrvakam / abhyarcya vidhivanmantrī rāhugraste niśākare

हिन्दी अर्थ

'ससार्ण:! पाठ माननेपर यह अर्थ होगा--'जो 'स” अक्षरसे युक्त हो।'

English

and having invoked him in it with the infusing of life, he worships it by rule when the Moon is seized by Rahu (eclipse),

अध्याय ६७

श्लोक 58

स्पृष्ट्रा चैव निरहारस्तां शिखायां समुद्वहन् ।द्यूते विवादे समरे व्यवहारे जयं लभेत्

spṛṣṭrā caiva nirahārastāṃ śikhāyāṃ samudvahan / dyūte vivāde samare vyavahāre jayaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

चार सौसे लेकर एक हजार अक्षरतकके मन्त्र प्रयोगमें ' अत्यन्त वृद्ध' माने गये हैं । उन्हें शिथिल कहा गया है। जिनमें एक हजारसे भी अधिक अक्षर हों, उन मन्त्रोंको 'पीडित' बताया गया है।

English

and touches it fasting, holding it by the top-knot: he gains victory in gambling, dispute, battle and lawsuit.

अध्याय ६७

श्लोक 59

बीजं वराहो बिन्द्धाढ्यौ मन्विन्द्वान्नौ कलौ ततः ।स्मृतिर्मांसेंदुमन्वाग्रा कर्णोच्छिष्टगणे वदेत्

bījaṃ varāho binddhāḍhyau manvindvānnau kalau tataḥ / smṛtirmāṃseṃdumanvāgrā karṇocchiṣṭagaṇe vadet

हिन्दी अर्थ

उनसे अधिक अक्षरवाले मन्त्रोंको स्तोत्ररूप माना गया है। इस प्रकारके मन्त्र दोषयुक्त कहे गये हैं। अब मैं 'छिन्न” आदि दोषोंसे दूषित मन्त्रोंका साधन बताता हूँ। जो योनिमुद्रासनसे बैठकर

English

The seed "Varaha" with bindu, then ... "Smriti", "mamsa", "indu", ... one should say in the group of ear-leavings (Ganesha).

अध्याय ६७

श्लोक 60

बकः सदीर्घपवनो महायक्षाय यं बलिः ।बलिमन्त्रो ऽयमाख्यातो न चेद्वर्णो ऽखिलेष्टदः

bakaḥ sadīrghapavano mahāyakṣāya yaṃ baliḥ / balimantro 'yamākhyāto na cedvarṇo 'khileṣṭadaḥ

हिन्दी अर्थ

एकाग्रचित्त हो जिस किसी भी मन्त्रका जप करता है, उसे सब प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। बायें पैरकी एडीको गुदाके सहारे रखकर दाहिने पैरकी एड़ीको ध्वज (लिजझ्ग)-के ऊपर

English

"Baka" with long "va", for the great Yaksha, "yam" — the offering. This is called the offering-mantra; otherwise a syllable does not grant all desires.

अध्याय ६७

श्लोक 61

प्रणवो भुवनेशानीस्वबीजान्ते नवार्णकः ।हस्तीति च पिशाचीति लिखेञ्चैवाग्रिंसुंदरी

praṇavo bhuvaneśānīsvabījānte navārṇakaḥ / hastīti ca piśācīti likheñcaivāgriṃsuṃdarī

हिन्दी अर्थ

रखे तो इस प्रकार योनिमुद्राबन्ध नामक उत्तम

English

Om, the seed of Bhuvaneshani, ending in his own seed: nine syllables. "Hasti", "Pishachi" he should write, and "Agni-sundari".

अध्याय ६७

श्लोक 62

नवार्णो ऽयं समुद्दिष्टो भजतां सर्वसिद्धिदः ।पदैः सर्वण मन्त्रेण पञ्चाङ्गानि प्रकल्पयेत्

navārṇo 'yaṃ samuddiṣṭo bhajatāṃ sarvasiddhidaḥ / padaiḥ sarvaṇa mantreṇa pañcāṅgāni prakalpayet

हिन्दी अर्थ

आचार्य और शिष्यके लक्षण जो कुलपरम्पराके क्रमसे प्राप्त हुआ हो, नित्य मन्त्र-जपके अनुष्ठानमें तत्पर हो, गुरुकी आज्ञाके पालनमें अनुरक्त हो तथा अभिषेकयुक्त

English

This nine-syllable mantra is declared giving all success to worshippers. With the words and the whole mantra, he should make the five limbs.

अध्याय ६७

श्लोक 63

अन्यत्सर्वं समानं स्यात्पूर्वमन्त्रेण नारद ।अथाभिधास्ये विधिवद्वक्रतुण्डमनुत्तमम्

anyatsarvaṃ samānaṃ syātpūrvamantreṇa nārada / athābhidhāsye vidhivadvakratuṇḍamanuttamam

हिन्दी अर्थ

तन्त्रके तात्त्विक अर्थका ज्ञाता तथा निग्रहानुग्रहमें समर्थ हो; किसीसे किसी वस्तुकी अपेक्षा न

English

Everything else is the same as with the previous mantra, O Narada. Now I shall tell by rule the unsurpassed Vakratunda.

अध्याय ६७

श्लोक 64

तोयं विधिर्वह्नियुक्तकर्णेन्द्वाढ्यो हरिस्तथा ।सदीर्घो दारको वायुर्वर्मान्तो ऽयं रसार्णकः

toyaṃ vidhirvahniyuktakarṇendvāḍhyo haristathā / sadīrgho dārako vāyurvarmānto 'yaṃ rasārṇakaḥ

हिन्दी अर्थ

बोलनेवाला, विद्वान, तत्त्व निकालनेमें चतुर, विनयी हो; किसी-न-किसी आश्रमकी मर्यादामें स्थित, ध्यानपरायण, संशय-निवारण करनेवाला, परम बुद्धिमान् और नित्य सत्कर्मोके अनुष्टानमें

English

(Vakratunda mantra in coded seed-syllables: "toya", "vahni", "karna", "indu", "Hari", "dirgha", "darika", "vayu", "varma".)

अध्याय ६७

श्लोक 65

भार्गवो ऽस्य मुनिश्छन्दो ऽनुष्टुब्देवो गणाधिपः ।वक्रतुण्डाभिधो बीजं वं शक्तिः कवचं पुनः

bhārgavo 'sya muniśchando 'nuṣṭubdevo gaṇādhipaḥ / vakratuṇḍābhidho bījaṃ vaṃ śaktiḥ kavacaṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

संलग्न रहनेवाला हो, उसे ही ' आचार्य ' कहा गया है। जो शान्त, विनयशील, शुद्धात्मा, सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे युक्त, शम आदि साधनोंसे सम्पन्न,

English

Its sage is Bhargava, metre Anushtubh, deity Ganadhipa called Vakratunda; the seed "vam" is the power, and the armour again.

अध्याय ६७

श्लोक 66

तारदृन्मध्यगैर्मन्त्रवर्णैश्चन्द्रविभूषितैः ।कृत्वा षडङ्गमन्त्रार्णान्भ्रूमध्ये च गले हृदि

tāradṛnmadhyagairmantravarṇaiścandravibhūṣitaiḥ / kṛtvā ṣaḍaṅgamantrārṇānbhrūmadhye ca gale hṛdi

हिन्दी अर्थ

पानमें शारीरिक शुद्धिसे युक्त, धार्मिक, शुद्धचित्त, सुदृढ़ बत्रत एवं सुस्थिर आचारसे युक्त, कृतज्ञ एवं पापसे डरनेवाला हो, गुरुकी सेवामें जिसका मन लगता हो, ऐसे शील-स्वभावका पुरुष आदर्श

English

With the mantra-syllables with Om in the middle and adorned with the moon, having made the six limbs, on the brow, throat and heart,

अध्याय ६७

श्लोक 67

नामौ लिङ्गे पदे न्यस्याखिलेन व्यापकं चरेत् ।उद्यदर्कद्युतिं हस्तैः पाशाङ्कुशवराभयान्

nāmau liṅge pade nyasyākhilena vyāpakaṃ caret / udyadarkadyutiṃ hastaiḥ pāśāṅkuśavarābhayān

हिन्दी अर्थ

शिष्य हो सकता है; अन्यथा वह गुरुको दुःख देनेवाला होता है। (पूर्व० ६४ अध्याय)

English

he should place the mantra-letters at name, sign and place, and spread them throughout. He should worship the elephant-faced one, bright as the rising sun,

अध्याय ६७

श्लोक 68

दधतं गजवक्त्रं च रक्तभूषांबरं भजेत् ।ध्यात्वैवं प्रजपेत्तर्कलक्षं द्रव्यैर्दशांशतः

dadhataṃ gajavaktraṃ ca raktabhūṣāṃbaraṃ bhajet / dhyātvaivaṃ prajapettarkalakṣaṃ dravyairdaśāṃśataḥ

हिन्दी अर्थ

सनत्कुमारजी कहते हैं--गुरुको चाहिए कि वह शिष्यकी परीक्षा लेकर मन्त्रका शोधन करे। पूर्वसे पश्चिम और दक्षिणसे उत्तर (रंगमें डुबोये हुए) पाँच-पाँच सूत गिरावे (तात्पर्य यह है कि

English

holding noose, goad, boon and protection, in red ornaments and clothes. Having so meditated, he should chant a hundred thousand and tenth part offerings of substances;

अध्याय ६७

श्लोक 69

अष्टभिर्जुहुयात्पीठे तीव्रादिसहितेर्ऽचयेत् ।मूर्तिं मूर्तेन संकल्प्य तस्यामावाह्य पूजयेत्

aṣṭabhirjuhuyātpīṭhe tīvrādisahiter'cayet / mūrtiṃ mūrtena saṃkalpya tasyāmāvāhya pūjayet

हिन्दी अर्थ

पाँच खड़ी रेखाएँ खींचकर उनके ऊपर पाँच पड़ी रेखाएँ खींचे) । इस प्रकार चार-चार कोष्टोंके चार समुदाय बनेंगे। उनमेंसे पहले चौकेके प्रथम कोष्ठमें एक, दूसरेके प्रथममें दो, तीसरेके प्रथममें तीन

English

he should offer eight on the seat, worship with Tivra and the others. Imagining the form in his own form, he should invoke and worship there:

अध्याय ६७

श्लोक 70

षट्कोणेषु षडङ्गानि पत्रेष्वष्टौ तु शक्तयः ।यजेद्विद्यां विधात्रीं च भोगदां विप्रघातिनीम्

ṣaṭkoṇeṣu ṣaḍaṅgāni patreṣvaṣṭau tu śaktayaḥ / yajedvidyāṃ vidhātrīṃ ca bhogadāṃ vipraghātinīm

हिन्दी अर्थ

और चौथेके प्रथममें चार लिखे। (इसी क्रमसे आगेकी संख्याएँ भी लिख ले।) प्रथम कोष्ठमें “अ' लिखकर उसके आग्रेय कोणमें उससे पाँचवाँ अक्षर लिखे। इस प्रकार सभी कोष्ठोंमें क्रमशः

English

in the six corners, the six limbs; on the petals, the eight powers. He should worship Vidya, Vidhatri, Bhogada, Vipraghatini,

अध्याय ६७

श्लोक 71

निधिप्रदीपां पापघ्नीं पुण्यां पश्चाच्छशिप्रभाम् ।दलाग्रेषु वक्रतुण्ड एकदंष्ट्रमहोदरौ

nidhipradīpāṃ pāpaghnīṃ puṇyāṃ paścācchaśiprabhām / dalāgreṣu vakratuṇḍa ekadaṃṣṭramahodarau

हिन्दी अर्थ

अक्षरोंकों लिखकर बुद्धिमान् पुरुष मन्त्रका संशोधन करे। साधकके नामका आदि-अक्षर जिस कोष्ठमें

English

Nidhipradipa, Papaghni, Punya, then Shashiprabha. On the petal-tips: Vakratunda, Ekadamshtra, Mahodara,

अध्याय ६७

श्लोक 72

गजास्यलंबोदरकौ विकटौ विध्नराट् तथा ।धूम्रवर्णस्ततो बाह्ये लोकेशान्हेतिसंयुतान्

gajāsyalaṃbodarakau vikaṭau vidhnarāṭ tathā / dhūmravarṇastato bāhye lokeśānhetisaṃyutān

हिन्दी अर्थ

हो, वहाँसे लेकर जहाँ मन्त्रका आदि अक्षर हो उस कोष्ठतक प्रदक्षिणक्रमसे गिनना चाहिए। यदि उसी चौकमें मन्त्रका आदि अक्षर हो, जिसमें नामका आदि-अक्षर है तो वह “सिद्ध चौक'

English

Gajasya, Lambodara, Vikata, Vighnaraja, Dhumravarna; and outside, the guardians of the quarters with their weapons.

अध्याय ६७

श्लोक 73

एवमावरणैरिष्ट्वा पञ्चभिर्गणनायकम् ।साधंयेदखिलान्कामान्वक्रतुण्ड प्रंसादतः

evamāvaraṇairiṣṭvā pañcabhirgaṇanāyakam / sādhaṃyedakhilānkāmānvakratuṇḍa praṃsādataḥ

हिन्दी अर्थ

कहा जायगा। उससे प्रदक्षिणक्रमसे गिननेपर यदि द्वितीय चौकमें मन्त्रका आदि अक्षर हो तो वह 'साध्य' कहा गया है। इसी प्रकार तीसरा चौक 'सुसिद्ध और चौथा चौक 'अरि' नामसे प्रसिद्ध

English

Having thus worshipped the leader of the hosts with five enclosures, the practitioner accomplishes all desires by Vakratunda's grace.

अध्याय ६७

श्लोक 74

लब्ध्वा गुरुमुखान्मन्त्रं दीक्षासंस्कारपूर्वकम् ।ब्रह्मचारी हविष्याशी सत्यवाक् च जितेन्द्रियः

labdhvā gurumukhānmantraṃ dīkṣāsaṃskārapūrvakam / brahmacārī haviṣyāśī satyavāk ca jitendriyaḥ

हिन्दी अर्थ

है। यदि साधकके नामसम्बन्धी और मन्त्रसम्बन्धी आदि अक्षर प्रथम चौकके पहले ही कोष्ठमें पड़े हों तो वह मन्त्र 'सिद्धसिद्ध' माना गया है। यदि

English

Having received the mantra from the teacher's mouth with the rite of initiation, as a celibate, eating havishya, truthful and master of senses,

अध्याय ६७

श्लोक 75

जपेदर्कसहस्रं तु षण्मासं होमसंयुतम् ।दारिद्षं तु पराभूय जायते धनदोपमः

japedarkasahasraṃ tu ṣaṇmāsaṃ homasaṃyutam / dāridṣaṃ tu parābhūya jāyate dhanadopamaḥ

हिन्दी अर्थ

वह 'सिद्धसाध्य' कहा गया है। प्रथमके तृतीय कोष्ठमें हो तो 'सिद्धसुसिद्ध' होगा और चौथेमें हो

English

he should chant a thousand (times) for six months, joined with fire-offerings; overcoming poverty he becomes like Kubera.

अध्याय ६७

श्लोक 76

चतुर्थ्यादि चतुर्थ्यन्तं जपेदयुतमादरात् ।अष्टोत्तरशतं नित्यं हुत्वा प्राग्वत्फलं लभेत्

caturthyādi caturthyantaṃ japedayutamādarāt / aṣṭottaraśataṃ nityaṃ hutvā prāgvatphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

... । साध्यसिद्ध मन्त्र दूनी संख्यामें जप करनेसे सिद्ध होता है। साध्यसाध्य मन्त्र बहुत विलम्बसे सिद्ध होता है। साध्यसुसिद्ध भी द्विगुण जपसे सिद्ध होता है; किंतु साध्यारि मन्त्र बन्धु-बान्धवोंका

English

From the fourth to the next fourth, he should respectfully chant ten thousand; offering a hundred and eight daily he gets the fruit as before.

अध्याय ६७

श्लोक 77

पक्षयोरुभयोर्मन्त्री चतुर्थ्यां जुहुयाच्छतम् ।अपूपैर्वत्सरे स स्यात्समृद्धेः परमं पदम्

pakṣayorubhayormantrī caturthyāṃ juhuyācchatam / apūpairvatsare sa syātsamṛddheḥ paramaṃ padam

हिन्दी अर्थ

हनन करता है। सुसिद्धसिद्ध आधे ही जपसे सिद्ध हो जाता है। सुसिद्धसाध्य द्विगुण जपसे सिद्ध होता है। सुसिद्धसिद्ध मन्त्र प्राप्त होते ही सिद्ध हो जाता है और सुसिद्धारि मन्त्र सारे कुटुम्बका नाश

English

In both fortnights the mantra-knower should offer a hundred on the fourth with cakes; in a year he attains the supreme place of prosperity.

अध्याय ६७

श्लोक 78

अङ्गारकचतुर्थ्यां तु देवमिष्ट्वा विधानतः ।हविषा पा यसान्नेन नैवेद्यं परिकल्पयेत्

aṅgārakacaturthyāṃ tu devamiṣṭvā vidhānataḥ / haviṣā pā yasānnena naivedyaṃ parikalpayet

हिन्दी अर्थ

करता है। अरिसिद्ध पुत्रनाशक है तथा अरिसाध्य कन्याका नाश करनेवाला होता है। अरिसुसिद्ध स्त्रीका नाश करता है और अरि-अरि मन्त्र साधकका ही नाश करनेवाला माना गया है। मुने! यहाँ

English

On a Tuesday fourth, having worshipped the god by rule, he should prepare an offering of havis and milk-rice.

अध्याय ६७

श्लोक 79

ततो गुरुं समभ्यर्न्त्य भोजयेद्विधिवत्सुधीः ।निवेदितेन जुहुयात्सहरस्रं विधिवद्वसौ

tato guruṃ samabhyarntya bhojayedvidhivatsudhīḥ / niveditena juhuyātsaharasraṃ vidhivadvasau

हिन्दी अर्थ

यह अकथह नामक चक्र सबमें प्रधान है; इसलिये यही तुम्हें बताया गया है।

English

Then, having honoured the teacher, the wise man should feed him by rule and offer a thousand oblations of the offered food into the fire by rule.

अध्याय ६७

श्लोक 80

एवं संवत्सरं कृत्वा महतीं श्रियमाप्नुयात् ।अथान्यत्साधनं वक्ष्ये लोकानां हितकाम्यया

evaṃ saṃvatsaraṃ kṛtvā mahatīṃ śriyamāpnuyāt / athānyatsādhanaṃ vakṣye lokānāṃ hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार मन्त्रका भलीभाँति शोधन करके शुद्ध समय और पवित्र स्थानमें गुरु शिष्यको दीक्षा दे। अब दीक्षाका विधान बताया जाता है। प्रातः:काल नित्यकर्म करके पहले गुरुचरणोंकी

English

Having done so for a year, he attains great prosperity. Now I shall tell another practice, out of desire for the good of the world.

अध्याय ६७

श्लोक 81

इष्ट्वा गणेशं पृथुकैः पायसापूपमोदकः ।नानाफलैस्ततोमन्त्री हरिद्रामथ सैन्धवम्

iṣṭvā gaṇeśaṃ pṛthukaiḥ pāyasāpūpamodakaḥ / nānāphalaistatomantrī haridrāmatha saindhavam

हिन्दी अर्थ

संख्यासे आधा जप करनेपर ही सिद्ध हो जायगा। पादुकाको प्रणाम करे। तत्पश्चात् आदरपूर्वक परंतु सिद्धारि मन्त्र कुटुम्बीजनोंका नाश करता वस्त्र आदिके द्वारा भक्तिभावसे सदगुरुकी पूजा मूलमें बतायी हुई रीतिसे कोष्ठक बनाकर उनमें अक्षरोंको लिखनेपर प्रथम कोष्ठकमें 'अ क थ ह' अक्षर आते हैं। इन्हींके नामपर इस चक्रको 'अकथह-चक्र' कहते हैं। इसका रेखाचित्र नीचे दिया जाता है--

English

Having worshipped Ganesha with flattened rice, milk-rice, cakes and sweets, and various fruits, the practitioner

अध्याय ६७

श्लोक 82

वचां निष्कार्द्धभागं च तदर्द्धं वा मनुं जपेत् ।विशोध्य चूर्णं प्रसृतौ गवां मूत्रे विनिक्षिपेत्

vacāṃ niṣkārddhabhāgaṃ ca tadarddhaṃ vā manuṃ japet / viśodhya cūrṇaṃ prasṛtau gavāṃ mūtre vinikṣipet

हिन्दी अर्थ

तो “सिद्धारि' कहलायेगा। नामाक्षरयुक्त चौकसे दूसरे चौकमें यदि मन्त्रका अक्षर हो, तो पहले जहाँ नामका अक्षर था वहाँके उस कोष्ठसे आरम्भ करके क्रमश: पूर्ववत् गणना करे। द्वितीय चौकके

English

should chant the mantra over turmeric, rock salt, and a half-nishka of vacha, or half of that. Having purified the powder, he should put a handful in cow's urine,

अध्याय ६७

श्लोक 83

सहस्रकृत्वो मनुना मन्त्रयित्वा प्रयत्नतः ।स्नातामृतुदिने शुद्धां शुक्लांबरधरां शुभाम्

sahasrakṛtvo manunā mantrayitvā prayatnataḥ / snātāmṛtudine śuddhāṃ śuklāṃbaradharāṃ śubhām

हिन्दी अर्थ

प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ कोष्ठमें मन्त्राक्षर होनेपर उसकी क्रमश: “साध्यसिद्ध ', 'साध्यसाध्य ',

English

and, having carefully recited the mantra over it a thousand times, on the day of her bath after menses, a pure woman in white clothes,

अध्याय ६७

श्लोक 84

देवस्य पुरतः स्थाप्य पाययेदौषधं सुधीः ।सर्वलक्षणसंपन्नं वन्ध्यापि लभते सुतम्

devasya purataḥ sthāpya pāyayedauṣadhaṃ sudhīḥ / sarvalakṣaṇasaṃpannaṃ vandhyāpi labhate sutam

हिन्दी अर्थ

तीसरे चौकमें मन्त्रका अक्षर हो तो मनीषी पुरुषोंको पूर्वोक्त रीतिसे गणना करनी चाहिए। तृतीय चौकके प्रथम आदि कोष्टोंके अनुसार क्रमश: उस मन्त्रकी

English

placed before the god, the wise man should give her the medicine to drink; even a barren woman obtains a son with all marks.

अध्याय ६७

श्लोक 85

अथान्यत्संप्रवक्ष्यामि रहस्यं परमाद्भुतम् ।गोचर्ममात्रां धरणीमुपलिप्य प्रयत्नतः

athānyatsaṃpravakṣyāmi rahasyaṃ paramādbhutam / gocarmamātrāṃ dharaṇīmupalipya prayatnataḥ

हिन्दी अर्थ

तथा 'सुसिद्ध-अरि' संज्ञा होगी। यदि चौथे चौकमें

English

Now I shall tell another secret, supremely wonderful. Having carefully plastered a space of a cow-hide with cow-dung,

अध्याय ६७

श्लोक 86

विकीर्य धान्यप्रकरैस्तत्र संस्थापयेद्धटम् ।शुद्धोदकेन संपूर्य तस्योपरि निधापयेत्

vikīrya dhānyaprakaraistatra saṃsthāpayeddhaṭam / śuddhodakena saṃpūrya tasyopari nidhāpayet

हिन्दी अर्थ

करे। चतुर्थ चौकके प्रथम आदि कोष्टोंके अनुसार उस यन्त्रकी ' अरिसिद्ध', ' अरिसाध्य', 'अरिसुसिद्ध ' तथा ' अरि-अरि' यह संज्ञा होगी। सिद्धसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त विधिसे उतनी ही संख्यामें जप करनेपर

English

and strewn it with heaps of grain, he should place a pot there. Filling it with pure water, he should set it on top,

अध्याय ६७

श्लोक 87

कपिलाज्येन संपूर्णं शरावं नूतनं शुभम् ।षडष्टाक्षरमन्त्राभ्यां दीपमारोपयेच्छुभम्

kapilājyena saṃpūrṇaṃ śarāvaṃ nūtanaṃ śubham / ṣaḍaṣṭākṣaramantrābhyāṃ dīpamāropayecchubham

हिन्दी अर्थ

सिद्ध हो जायगा। परंतु सिद्धसाध्य मन्त्र दूनी संख्यामें जप करनेसे सिद्ध होगा। सिद्धसुसिद्ध मन्त्र शास्त्रोक्त

English

and on it a new auspicious dish full of ghee of a tawny cow. With the six- and eight-syllable mantras he should light an auspicious lamp.

अध्याय ६७

श्लोक 88

दीपे देवं समावाह्य गन्धपुष्पादिभिर्यजेत् ।स्नातां कुमारीमथवा कुमारं पूजयेत्सुधीः

dīpe devaṃ samāvāhya gandhapuṣpādibhiryajet / snātāṃ kumārīmathavā kumāraṃ pūjayetsudhīḥ

हिन्दी अर्थ

करके उनसे अभीष्ट मन्त्रके लिये प्रार्थना करे।

English

Invoking the god in the lamp, he should worship with perfume, flowers and so on. The wise man should worship a bathed virgin or a boy.

अध्याय ६७

श्लोक 89

दीपस्य पुरतः स्थाप्यध्यात्वा देवं जपेन्मनुम् ।प्रदीपे स्थापिते पश्येद्द्विजरूपं गणेश्वरम्

dīpasya purataḥ sthāpyadhyātvā devaṃ japenmanum / pradīpe sthāpite paśyeddvijarūpaṃ gaṇeśvaram

हिन्दी अर्थ

मण्डल आदि विधान करके शिष्यके साथ पवित्र हो यज्ञमण्डपमें प्रवेश करें। फिर सामान्य अर्घ्य जलसे द्वारका अभिषेक करके अस्त्र-मन्त्रोंसे दिव्य विघ्लोंका निवारण करे; इसके बाद आकाशमें

English

Placing (the child) before the lamp and meditating on the god, he should chant the mantra. When the lamp is set, one sees Ganesha in the form of a Brahmin.

अध्याय ६७

श्लोक 90

पृष्टस्ततः संपदि वा नष्टं चैवाप्यनागतम् ।सकलं प्रवदेदेवं कुमारी वा कुमारकः

pṛṣṭastataḥ saṃpadi vā naṣṭaṃ caivāpyanāgatam / sakalaṃ pravadedevaṃ kumārī vā kumārakaḥ

हिन्दी अर्थ

स्थित विप्लोंका जलसे पूजन करके निराकरण करे। भूमिसम्बन्धी विघ्लोंकी तीन बार ताली बजाकर हटावे, तत्पश्चात् कार्य प्रारम्भ करे। भिन्न-भिन्न रंगोंद्वारा शास्त्रोक्तविधिसे सर्वतोभद्र-

English

Asked then about prosperity, or what is lost or what is to come, the virgin or the boy tells everything.

अध्याय ६७

श्लोक 91

षडक्षरो हृदन्तश्चेद्भवेदष्टाक्षरो मनुः ।अन्ये ऽपि मन्त्रा देवर्षे सन्ति तन्त्रे गणेशितुः

ṣaḍakṣaro hṛdantaścedbhavedaṣṭākṣaro manuḥ / anye 'pi mantrā devarṣe santi tantre gaṇeśituḥ

हिन्दी अर्थ

मण्डलकी रचना करके उसमें बहिमण्डल और उसकी कलाओंका पूजन करे। तत्पश्चात् अस्त्र-

English

The six-syllable mantra, with the heart at the end, becomes the eight-syllable mantra. There are other mantras of Ganesha in the tantra, O divine sage,

अध्याय ६७

श्लोक 92

किन्त्वत्र यन्न साध्यं स्यात्र्रिषु लोकेषु साधकैः ।अष्टविंशरसार्णाभ्यां तन्न पश्येदपि क्वचित्

kintvatra yanna sādhyaṃ syātrriṣu lokeṣu sādhakaiḥ / aṣṭaviṃśarasārṇābhyāṃ tanna paśyedapi kvacit

हिन्दी अर्थ

कलशकी वहाँ विधिपूर्वक स्थापना करके सूर्यकी कलाका यजन करे। विलोममातृकाके मूलका उच्चारण करते हुए शुद्ध जलसे कलशको भरे और उसके भीतर सोमकी कलाओंका

English

but whatever cannot be accomplished by practitioners in the three worlds with the twenty-eight- and the six-syllable ones, one would not see anywhere.

अध्याय ६७

श्लोक 93

एतद्गणेशमन्त्राणां विधानं ते मयोदितम् ।शठेभ्यः परशिष्येभ्यो वञ्चकेभ्यो ऽपि मा वद

etadgaṇeśamantrāṇāṃ vidhānaṃ te mayoditam / śaṭhebhyaḥ paraśiṣyebhyo vañcakebhyo 'pi mā vada

हिन्दी अर्थ

विधिपूर्वक पूजन करे। धूम्रा, अर्चि, ऊष्मा,

English

This procedure for the Ganesha mantras has been told to you by me; do not tell it to rogues, to others' disciples, or to deceivers.

अध्याय ६७

श्लोक 94

एवं यो भजते देवं गणेशंसर्वसिद्धिदम् ।प्राप्येह सकलान्भोगनिन्ते मुक्तिपदं व्रजेत्

evaṃ yo bhajate devaṃ gaṇeśaṃsarvasiddhidam / prāpyeha sakalānbhoganinte muktipadaṃ vrajet

हिन्दी अर्थ

कपिला तथा हव्य-कव्यवाहा--ये अग्रिकी दस कलाएँ कही गयी हैं। अब सूर्यकी बारह कलाएँ बतायी जाती हैं--तपिनी, तापिनी, धुम्रा, मरीचि

English

The one who worships thus the god Ganesha, giver of all success, obtains all enjoyments here and at the end goes to the place of liberation.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_nAradapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Narada Purana — Chapter 67
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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