अध्याय ११
श्लोक 1
॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे मार्कण्डेयचरित्रे दशमो ऽध्याय ॥ नर्प् १० ॥ प्रणिपत्य जगन्नाथं चराचरगुरुं हरिम् मार्कण्डेयो ऽभितुष्टाव भोगपर्यङ्कशायिनम्
|| iti śrīnarasiṃhapurāṇe mārkaṇḍeyacaritre daśamo 'dhyāya || narp 10 || praṇipatya jagannāthaṃ carācaraguruṃ harim mārkaṇḍeyo 'bhituṣṭāva bhogaparyaṅkaśāyinam
हिन्दी अर्थ
आनेपर इस भक्तिसे तुम्हारी मुक्ति भी अवश्य ही हो जायगी। तुम्हारे कहे हुए इस स्तोत्रका जो लोग नित्य प्राततकाल और संध्याके समय पाठ करेंगे, वे मुझमें सुदृढ़ भक्ति रखते हुए मेरे लोकमें आनन्दपूर्वक रहेंगे। भुगुश्रेष्ठ! मैं दान्त (स्ववश) होनेपर भी भक्तोंके वशमें रहता हूँ; अतः तुम जहाँ-जहाँ रहकर मेरा स्मरण करोगे, वहाँ- वहाँ मैं पहुँच जाऊँगा
English
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