अध्याय १३
श्लोक 1
॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे यमीयमसंवादो नाम द्वादशो ऽध्याय ॥ नर्प् १२ ॥ विचित्रेयं कथा तात वैदिकी मे त्वयेरिता अन्याः पुण्याश् च मे ब्रूहि कथाः पापप्रणाशिनीः
|| iti śrīnarasiṃhapurāṇe yamīyamasaṃvādo nāma dvādaśo 'dhyāya || narp 12 || vicitreyaṃ kathā tāta vaidikī me tvayeritā anyāḥ puṇyāś ca me brūhi kathāḥ pāpapraṇāśinīḥ
हिन्दी अर्थ
भृगुनन्दन परशुरामजीका दर्शन किया; फिर पूर्ववत् पितरोंके लिये तर्पण करके चलते-चलते एक वनमें प्रवेश किया, जो पापोंका नाश करनेवाला था॥ २--५॥ वहाँ एक पर्वतसे बहुत बड़ी धारा गिरती थी, जो निश्शेष पापराशिका विनाश करनेवाली थी। उसके जलको लेकर ब्राह्मणने भक्तिपूर्वक भगवान् नृसिंहके मस्तकपर चढ़ाया। इससे उसी समय उसका शरीर विशुद्ध हो गया। फिर विन्ध्याचल पर्वतपर स्थित होकर भक्तों और
English
Power of chastity and conversation with a