Narasimha Purana· Nṛsiṁha Purāṇa
23
अध्याय 23 / 68

Adhyaya 23

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पूर्ण अध्याय पाठ42 श्लोक

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अध्याय २३

श्लोक 1

॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे सोमवंशानुकीर्तनं नाम द्वाविंशो ऽध्यायः ॥ नर्प् २२ ॥ प्रथमं तावत् स्वायंभुवं मन्वन्तरं तत्स्वरूपं कथितम् ।सर्गादौ स्वारोचिषो नाम द्वितीयो मनुः

|| iti śrīnarasiṃhapurāṇe somavaṃśānukīrtanaṃ nāma dvāviṃśo 'dhyāyaḥ || narp 22 || prathamaṃ tāvat svāyaṃbhuvaṃ manvantaraṃ tatsvarūpaṃ kathitam | sargādau svārociṣo nāma dvitīyo manuḥ

हिन्दी अर्थ

न शक्यस्तपसा द्रष्ट त्वया नारायणो विभुः। मादृशैरपि नो दृश्यः केशवः क्लेशनाशनः चिशान्ते प्रलये लोकान् निनीय कमलेक्षणः

English

Visnu. Anyone who reads daily this description of royal dynasty and makes his forefathers (Pitaras), to listen in course of Sraddha (a rite to remember), the things, offered by him to his ancestors becomes undepleting. O Brahmin, I have made you to listen to this episode pertaining to the dynasty of the kings of Candravamsa. Now, listen to the fourteen Manvantaras which I am going to tell you.

अध्याय २३

श्लोक 2

तस्मिन् स्वारोचिषे मन्वन्तरे विपश्चिन् नाम देवेन्द्रः ।पारावताः सतुषिता देवाः

tasmin svārociṣe manvantare vipaścin nāma devendraḥ | pārāvatāḥ satuṣitā devāḥ

हिन्दी अर्थ

इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति महातपस्वी राजा इक्ष्वाकु ग्रीष्म ऋतुमें पञ्चाग्रिके बीच स्थित होकर तपस्या करते थे, वर्षाके समय खुले मैदानमें रहते और शीतकालमें सरोवरके जलमें खडे होकर तप करते थे। इस प्रकार समस्त इन्द्रियोंको

English

Thus the twenty-second chapter on 'About Candravamsa' in Sri Nrsimha Purana approaches the end.

अध्याय २३

श्लोक 3

ऊर्जस्तम्बः सुप्राणो दन्तो निरृषभो वरीयान् ईश्वरः सोमः सप्तर्षयश् चैवं किंपुरुषाद्याः स्वारोचिषस्य मनोः पुत्रा राजानो भवन्ति

ūrjastambaḥ suprāṇo danto nirṛṣabho varīyān īśvaraḥ somaḥ saptarṣayaś caivaṃ kiṃpuruṣādyāḥ svārociṣasya manoḥ putrā rājāno bhavanti

हिन्दी अर्थ

मनमें निरुद्ध करके, मनको भगवान् विष्णुमें लीन कर द्वादशाक्षर-मन्त्रका जप करते और वायु पीकर रहते हुए उन महात्मा राजाके समक्ष लोक-पितामह भगवान् ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन चार मुखोंवाले पद्मयोनिं ब्रह्माजीको आया देख राजाने उन्हें भक्तिभावसे प्रणाम एवं उनकी स्तुति करके संतुष्ट किया॥ २६--३० ॥

English

Descriptions of fourteen Manvantaras

अध्याय २३

श्लोक 4

ःतृतीय उत्तमो नाम मनुः ।ःसुधामानः सत्याः शिवाः प्रतर्दना वंशवर्तिनश् च देवाः ।ःपञ्चैते द्वादशगणाः

ḥtṛtīya uttamo nāma manuḥ | ḥsudhāmānaḥ satyāḥ śivāḥ pratardanā vaṃśavartinaś ca devāḥ | ḥpañcaite dvādaśagaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

(राजा बोले ) 'संसारकी सृष्टि करनेवाले तथा वेद-शास्त्रोंके मर्मज्ञ, चार मुखोंवाले महात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीको नमस्कार है।' इस प्रकार स्तुति की जानेपर जगत्स्रष्टा ब्रह्माजीने राज्य त्यागकर तपस्यामें लगे हुए. उन शान्त एवं महान् सुखी श्रेष्ठ नरेशसे कहा

English

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अध्याय २३

श्लोक 5

तेषां सुशान्तिर् इन्द्रः

teṣāṃ suśāntir indraḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी बोले--राजन्! समस्त विश्वको प्रकाशित करनेवाले तुम्हारे पितामह सूर्य तथा पिता मनु भी सदा ही सभी मुनियोंके मान्य हैं। तुम्हारे पिता और पितामहने भी पूर्वकालमें तीव्र तपस्या को थी। (उन्हींके समान आज तुम भी तप कर रहे हो।) महामते नृपश्रेष्ठ! सारा राज्य-भोग छोड़कर किसलिये यह घोर तप कर रहे हो? इसका कारण बताओ

English

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अध्याय २३

श्लोक 6

वन्द्याः सप्तर्षयो ऽभवन् ।अत्र परशुचित्राद्या मनोः सुताः

vandyāḥ saptarṣayo 'bhavan | atra paraśucitrādyā manoḥ sutāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके इस प्रकार पूछनेपर राजाने उनको प्रणाम करके कहा--' ब्रह्मन्! मैं तपोबलसे शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् मधुसूदनका प्रत्यक्ष दर्शन करनेकी इच्छा लेकर ही ऐसा तप कर रहा हूँ।' राजाके यों कहनेपर कमलजन्मा ब्रह्माजीने हँसते हुए-से उनसे कहा

English

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अध्याय २३

श्लोक 7

चतुर्थस् तामसो नाम मनुः ।तत्र मन्वन्तरे सुराः पराः सत्या सुधियश् च सप्तविंशतिका गणाः

caturthas tāmaso nāma manuḥ | tatra manvantare surāḥ parāḥ satyā sudhiyaś ca saptaviṃśatikā gaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

“राजन्! सर्वत्र व्यापक भगवान् नारायणका दर्शन तुम केवल तपस्यासे नहीं कर सकोगे। (औरोंकी तो बात ही क्या है,) हमारे-जैसे लोगोंको भी वलेशनाशन भगवान् केशवका दर्शन नहीं हो पाता। महामते! मैं तुम्हें एक पुरातन पवित्र कथा सुनाता हूँ, सुनो--प्रलयकी रातमें कमललोचन भगवान् विष्णुने समस्त लोकोंको

English

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अध्याय २३

श्लोक 8

तत्र भृशुण्डी नाम देवेन्द्रः ।हिरण्यरोमा देवश्रीर् ऊर्ध्वबाहुर् देवबाहुः सुधामा ह पर्जन्यो मुनिर् इत्य् एते सप्तर्षयः

tatra bhṛśuṇḍī nāma devendraḥ | hiraṇyaromā devaśrīr ūrdhvabāhur devabāhuḥ sudhāmā ha parjanyo munir ity ete saptarṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

सनन्दनादयैर्मुनिभिः स्तूयमानो महामते अनन्तभोगपर्यड्के भिन्नाञ्जननिभं हरिम् ४१

English

Suta said- The first is Svayambhuva Manvantara. Its introductions had already been given earlier. Svarocisa named second Manu had been born in the initial phase of the creation. At that Svarocisa Manvantara, there was Vipasxit named Indra, the king of gods. The gods of that phase were Parvata and Tusita. The Saptarsi at that Manvantara were Suprana, Danta

अध्याय २३

श्लोक 9

ज्योतिर्धामा पृथुः काश्यो ऽग्निर् धनक इत्य् एते तामसस्य मनोः पुत्रा राजानः

jyotirdhāmā pṛthuḥ kāśyo 'gnir dhanaka ity ete tāmasasya manoḥ putrā rājānaḥ

हिन्दी अर्थ

कुन्देन्दुसदृशाकारमनन्तं च महामते। सहस्त्रफणमध्यस्थैर्मणिभिर्दीस्तिमत्तरम् कौतूहलेन तं द्रष्टुं नारायणमनामयम्

English

Nirfsabha, Isvara and Soma. Similarly, Kimpurusa etc. named sons of Svarocisa Manu were the kings on the earth.

अध्याय २३

श्लोक 10

पञ्चमो नाम रैवतो मनुः ।ःतस्यान्तरे ऽमिता निरता वैकुण्ठाः सुमेधस इत्य् एते देवगणाश् चतुर्दशका गणाः ।ःअसुरान्तको नाम देवेन्द्रः ।ःसप्तकाद्या मनोः सुता राजानो वै बभूवुः

pañcamo nāma raivato manuḥ | ḥtasyāntare 'mitā niratā vaikuṇṭhāḥ sumedhasa ity ete devagaṇāś caturdaśakā gaṇāḥ | ḥasurāntako nāma devendraḥ | ḥsaptakādyā manoḥ sutā rājāno vai babhūvuḥ

हिन्दी अर्थ

तद्रूपं वासुदेवस्य द्रष्टुं तेपे महत्तपः। ततो मामन्तरिक्षस्था वागुवाचाशरीरिणी वृथा किं बिलश्यते ब्रह्मन् साम्प्रतं कुरु मे वचः न दृश्यो भगवान् विष्णुस्तपसा महतापि ते

English

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अध्याय २३

श्लोक 11

शान्तः शान्तभयो विद्वांस् तपस्वी मेधावी सुतपाः सप्तर्षयो ऽभवन्

śāntaḥ śāntabhayo vidvāṃs tapasvī medhāvī sutapāḥ saptarṣayo 'bhavan

हिन्दी अर्थ

शुद्धस्फटिकसंकाशनागपर्यङ्कशायिनम् अपनेमें लीन कर लिया और सनन्दन आदि मुनियोंसे अपनी स्तुति सुनते हुए वे 'अनन्त' नामक शेषनागकी शय्यापर योगनिद्राका आश्रय ले सो गये। राजन्! उन सोये हुए भगवानूकी नाभिसे प्रकाशमान एक बहुत बड़ा

English

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अध्याय २३

श्लोक 12

ःषष्ठश् चाक्षुषो नाम मनुः ।ःपुरुशतद्युम्नप्रमुखास् तस्य सुता राजानः ।ःसुशान्ता आप्याः प्रसूता भव्याः प्रथिताश् च महानुभावाः लेखाद्याः पञ्चैते ह्य् अष्टका गणास् तत्र देवाः

ḥṣaṣṭhaś cākṣuṣo nāma manuḥ | ḥpuruśatadyumnapramukhās tasya sutā rājānaḥ | ḥsuśāntā āpyāḥ prasūtā bhavyāḥ prathitāś ca mahānubhāvāḥ lekhādyāḥ pañcaite hy aṣṭakā gaṇās tatra devāḥ

हिन्दी अर्थ

कमल उत्पन्न हुआ। पूर्वकालमें उस प्रकाशमान कमलपर सर्वप्रथम मुझ वेदवेत्ता ब्रह्मका ही आविर्भाव हुआ। तत्पश्चात नीचेकी ओर दृष्टि करके मैंने खानसे काटकर निकाले हुए कोयलेके समान श्यामवर्णवाले भगवान् विष्णुको शेषनागकी शय्यापर सोते देखा। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति अलसीके 'फूलकी भाँति सुन्दर जान पड़ती थी, दिव्य रलोंके आभरणोंसे उनके श्रीविग्रहकी विचित्र शोभा हो रही थी और उनका मस्तक मुकुटसे शोभायमान था॥ ३७--४२॥

English

The third Manu was renowned by the name 'Uttama'. During their regime, five gods- Sudhama, Satya, Siva, Pratardana and (or were existed. In each commune of these five gods, there were five persons in each. The name of Indra to these five gods was Susanti. The Saptarsi of those times were known as Vandya. Manu's sons Parasuta and Citra etc. were the kings on the earth

अध्याय २३

श्लोक 13

तेषाम् इन्द्रो मनोजवः ।मेधाः सुमेधा विरजा हविष्मान् उत्तमो मतिमान् नाम्ना सहिष्णुश् चैते सप्तर्षयः

teṣām indro manojavaḥ | medhāḥ sumedhā virajā haviṣmān uttamo matimān nāmnā sahiṣṇuś caite saptarṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

"महामते! उस समय मैंने उन अनन्तदेव शेषनागका भी दर्शन किया, जिनका आकार कुन्द और चन्द्रमाके समान श्वेत था तथा जो हजारों फणोंकी मणियोंसे अत्यन्त देदीप्यमान हो रहे थे। नृपश्रेष्ठ! क्षणभर ही वहाँ उन्हें देखकर मैं फिर उनका दर्शन न पा सका, इससे

English

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अध्याय २३

श्लोक 14

सप्तमो वैवस्वतो मनुः सांप्रतं वर्तते ।तस्य पुत्रा इक्ष्वाकुप्रभृतयः क्षत्रिया भूभुजः

saptamo vaivasvato manuḥ sāṃprataṃ vartate | tasya putrā ikṣvākuprabhṛtayaḥ kṣatriyā bhūbhujaḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान् नारायणका दर्शनं करनेके लिये कमलनालका सहारा ले वहाँसे नीचे उतरा; परंतु राजेन्द्र! उस समय जलके भीतर बहुत खोजनेपर भी मैं उन लक्ष्मीपतिका पुनः दर्शन न पा सका। तब मैं फिर उसी कमलका आश्रय ले वासुदेवके उसी रूपका चिन्तन करता हुआ उनके दर्शनके लिये बड़ी भारी तपस्या करने लगा! तत्पश्चात् अन्तरिक्षके भीतरसे किसी अव्यक्त शरीरवाली वाणीने मुझसे कहा ॥ ४३--४७॥

English

The name of fourth Manu was Tam as a. In the Manvantara concerned, there were the commune of gods known as Para, Satya and Sudhi. Each commune consisted of twenty gods. The name of Indra, the king of these gods was Bhus'undl. At that phase of time, the Saptarsi were- Hiranyaroma Udhravabahu, Devabahu, Sudhama, Parjanya and Muni. The sons of Tamasa Manu i.e. Jyotirdhama, Prthu, Kas ya, Agni and Dhanaka were kings on this

अध्याय २३

श्लोक 15

आदित्यविश्ववसुरुद्राद्या देवाः पुरंदरो ऽत्र देवेन्द्रः

ādityaviśvavasurudrādyā devāḥ puraṃdaro 'tra devendraḥ

हिन्दी अर्थ

“ब्रह्मन्। क्यों व्यर्थ. क्लेश उठा रहे हो? इस समय मेरी बात मानो। बहुत बड़ी तपस्यासे भी तुम्हें भगवान् विष्णुका दर्शन नहीं हो सकेगा। यदि यहाँ शुद्ध स्फटिक- मणिके समान श्वेत नाग-शय्यापर शयन करनेवाले भगवान् विष्णुका दर्शन करना चाहते हो तो उनके आज्ञानुसार सृष्टि करो। महामते! तुमने 'शाङ्ग' धनुष धारण करनेवाले उन भगवानूका, जो अञ्जन-पुञ्जके समान श्याम सुषमासे युक्त

English

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अध्याय २३

श्लोक 16

वशिष्ठः कश्यपो ऽत्रिर् जमदग्निर् गौतमविश्वामित्रभरद्वाजाः सप्तर्षयो भवन्ति

vaśiṣṭhaḥ kaśyapo 'trir jamadagnir gautamaviśvāmitrabharadvājāḥ saptarṣayo bhavanti

हिन्दी अर्थ

स्थित देखा है, उसीका आलस्यरहित होकर भजन-ध्यान करो, तब उन माधवको देख सकोगे ॥ ४८--५०/२॥ “राजन्! उस आकाशवाणीद्वारा इस प्रकार प्रेरित हो मैंने निरन्तर की जानेवाली तीव्र तपस्याका अनुष्ठान

English

The ninth prospective Manu will be Daksasavarni. His sons Dhrti, Kirti, Dlpti, Ketu, Pancahasta, Niramaya and Prthusrava etc. will be the kings of this earth. The gods will be in that Manvantara as Maricigarbha, Sudharma and Havisman and Adbhuta will be their kings. The Saptarsi will be Savana, Krtiman, Havya, Vasu, Medhatithi, and Jyotisman (and Satya).

अध्याय २३

श्लोक 17

ःभविष्याणि मन्वन्तराणि कथ्यन्ते ।ःतद् यथा आदित्यात् संज्ञायां जातो यो मनुः पूर्वोक्तश् छायायाम् उत्पन्नो मनुर् द्वितीयः स तु ।ःपूर्वजस्य सावर्णस्य मन्वन्तरं सावर्णिकम् अष्टमं शृणु

ḥbhaviṣyāṇi manvantarāṇi kathyante | ḥtad yathā ādityāt saṃjñāyāṃ jāto yo manuḥ pūrvoktaś chāyāyām utpanno manur dvitīyaḥ sa tu | ḥpūrvajasya sāvarṇasya manvantaraṃ sāvarṇikam aṣṭamaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

सृष्टवान् लोकभूतानां सृष्टि सृष्ठा स्थितस्य च। आविर्बभूव मनसि विश्वकर्मा प्रजापति: लब्ध्वा मुक्ति च पश्यामि अविकारक्रियासुखम्। तदहं ते प्रवक्ष्यामि हितं नृपवरेश्वर

English

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अध्याय २३

श्लोक 18

मनुः सावर्णो अष्टमो भविता तत्र सुतपाद्या देवगणास् तेषां बलिर् इन्द्रो भविता

manuḥ sāvarṇo aṣṭamo bhavitā tatra sutapādyā devagaṇās teṣāṃ balir indro bhavitā

हिन्दी अर्थ

प्रजानां पालनं धर्मस्तपञ्चैव महीभृताम् तत्राराधय देवेशं बाह्यार्थेरखिलैः शुभैः

English

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अध्याय २३

श्लोक 19

दीप्तिमान् गालवो नाम कृपद्रौणिव्यासर्ष्यशृङ्गाश् च सप्तर्षयो भवितारः ।विराजोर्वरीयनिर्मोकाद्याः सावर्णस्य मनोः सुता राजानो भविष्यन्ति

dīptimān gālavo nāma kṛpadrauṇivyāsarṣyaśṛṅgāś ca saptarṣayo bhavitāraḥ | virājorvarīyanirmokādyāḥ sāvarṇasya manoḥ sutā rājāno bhaviṣyanti

हिन्दी अर्थ

नारायणमनन्ताख्ये शयानं क्रतुभिर्यजन्। निष्कामो नृपशार्दूल प्रजा धर्मेण पालय प्रसादाद्वासुदेवस्य मुक्तिस्ते भविता नृप। इत्युक्त्वा तं जगामाथ ब्रह्मलोकं पितामहः

English

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अध्याय २३

श्लोक 20

नवमो दक्षसावर्णिर् मनुर् भविता ।धृतिः कीर्तिर् दीप्तिः केतुः पञ्चहस्तो निरामयः पृथुश्रवाद्या दक्षसावर्णा राजानो ऽस्य मनोः पुत्राः

navamo dakṣasāvarṇir manur bhavitā | dhṛtiḥ kīrtir dīptiḥ ketuḥ pañcahasto nirāmayaḥ pṛthuśravādyā dakṣasāvarṇā rājāno 'sya manoḥ putrāḥ

हिन्दी अर्थ

इक्ष्वाकुश्चन्तयज्ञास्ते पद्मयोनिवचो द्विज। आविर्बभूव पुरतो विमानं तन्महीभूतः ब्रह्मदत्तं द्विजयुतं माधवानन्तयोः शुभम्। तं दृष्टा परया भक्त्या नत्वा च पुरुषोत्तमम्

English

The tenth will Brahma Savarni. Viruddha etc. will be gods and Santi will be their Indra. The Saptarsi will be Havisman, Sukrti, Satya, Tapomurti, Nabhaga, Pratimoka and

अध्याय २३

श्लोक 21

मरीचिगर्भाः सुधर्माणो हविष्मन्तस् तत्र देवताः ।तेषां इन्द्रो ऽद्भुतः

marīcigarbhāḥ sudharmāṇo haviṣmantas tatra devatāḥ | teṣāṃ indro 'dbhutaḥ

हिन्दी अर्थ

लाजा विनिक्षिपद्भिश्च नीतो राजा स्वकं गृहम्। स्वमन्दिरे विशाले तु विमानं वैष्णवं शुभम् इक्ष्वाकुकी तपस्या और ब्रह्माजीद्वारा विष्णुप्रतिमाकी प्राप्ति

English

Uttama, Bhurisena etc. sons of Brahmasavarni will be the kings on the

अध्याय २३

श्लोक 22

सवनः कृतिमान् हव्यो वसुमेधातिथिर् ज्योतिष्मान् इत्य् एते सप्तर्षयः

savanaḥ kṛtimān havyo vasumedhātithir jyotiṣmān ity ete saptarṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

त्यागकर इस जगत्के प्राणियोंकी सृष्टि की। सृष्टि करके स्थित होनेपर मेरे हृदयमें प्रजापति विश्वकर्माका प्राकट्य हुआ। उन्होंने 'अनन्त' नामक शेषनाग और भगवान् विष्णुकी दो चमकीली प्रतिमाएँ बनायीं। नरेश्वर! मैंने पहले जलके भीतर शेष-शय्यापर जिस रूपमें देख चुका था, उसी रूपमें भगवान् श्रीहरिंकी वह प्रतिमा बनायी गयी थी। तब मैं उन श्रीहरिके उस श्रीविग्रहकी भक्तिपूर्वक पूजा करके और उन्हींके प्रसादसे श्रेष्ठ तपरूप परम

English

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अध्याय २३

श्लोक 23

दशमो ब्रह्मसावर्णिर् मनुर् भविता ।ःविरुद्धादयस् तत्र देवाः ।ःतेषां शान्तिर् इन्द्रः ।ःहविष्मान् सुकृतिः सत्यस् तपोमूर्तिर् नाभागः प्रतिमोकः सप्तकेतुर् इत्य् एते सप्तर्षयः

daśamo brahmasāvarṇir manur bhavitā | ḥviruddhādayas tatra devāḥ | ḥteṣāṃ śāntir indraḥ | ḥhaviṣmān sukṛtiḥ satyas tapomūrtir nābhāgaḥ pratimokaḥ saptaketur ity ete saptarṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तम ज्ञान प्रास करके विकाररहिंत नित्यानन्दमय मोक्ष- सुखका अनुभव करने लगा॥ ५१-५४१/॥

English

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अध्याय २३

श्लोक 24

सुक्षेत्र उत्तमो भूरिषेणादयो ब्रह्मसावर्णिपुत्रा राजानो भविष्यन्ति

sukṣetra uttamo bhūriṣeṇādayo brahmasāvarṇiputrā rājāno bhaviṣyanti

हिन्दी अर्थ

“राजराजेश्वर! इस समय मैं तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ, सुनो-राजन्! इस घोर तपस्याको छोड़कर अब अपनी पुरीको लौट जाओ। प्रजाओंका पालन करना हीं राजाओंका धर्म तथा तप है। मैं सिद्धो और ब्राह्मणॉंसहित उस विमानको, जिसपर भगवानूकी प्रतिमा है, तुम्हारे पास भेजूँगा। उसीमें तुम सुन्दर बाह्य उपचारोंद्वारा उन देवेश्वरकी आराधना करो। नृपश्रेष्ठ! तुम यज्ञोद्वारा अनन्त' नामक शेषनागकी शय्यापर शयन करनेवाले भगवान्

English

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अध्याय २३

श्लोक 25

एकादशे मन्वन्तरे धर्मसावर्णिको मनुः

ekādaśe manvantare dharmasāvarṇiko manuḥ

हिन्दी अर्थ

नारायणका निष्कामभावसे यञ्ञोँद्वारा आराधन करते हुए धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। नृप! भगवान् वासुदेवकी कृपासे अवश्य ही तुम्हारी मुक्ति हो जायगी।'' राजासे यों कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी अपने धामको चले द्विज! ब्रह्माजीके चले जानेपर राजा इक्ष्वाकु उनकी बातोंपर विचार ही कर रहे थे, तबतक उनके समक्ष वह विष्णु और अनन्तकी प्रतिमाओंका शुभ विमान, जिसे ब्रह्माजीने दिया था, सिद्ध ब्राह्मणोंसहित प्रकट हो

English

Dharmasavami will be Manu in the eleventh Manvantara. The commune of gods at that time will be Simha, Savana etc. And Divaspati will be their Indra.

अध्याय २३

श्लोक 26

सिंहसवनादयो देवगणाः ।तेषां दिवस्पतिर् इन्द्रः

siṃhasavanādayo devagaṇāḥ | teṣāṃ divaspatir indraḥ

हिन्दी अर्थ

गया। उन भगवान् पुरुषोत्तमका दर्शन करके उन्होंने बड़ी भक्तिके साथ उन्हें प्रणाम किया तथा साथमें आये हुए ऋषियों एवं ब्राह्मणोंको भी नमस्कार करके वे उस विमानको लेकर अपनी पुरीको गये। वहाँ नगरके सभी शोभायमान स्त्री-पुरुषोंने राजाका दर्शन किया और लावा छीटते हुए वे उन्हें राजभवनमें ले गये। राजाने अपने विशाल मन्दिरमें उस सुन्दर चैष्णव- विमानको स्थापित किया और साथ आये हुए उन

English

Nirutsaha, Dhrtiman and Rucya will be Saptarsi. Citrasena and Vicitra etc. sons of Manu will be kings on this earth.

अध्याय २३

श्लोक 27

निर्मोहस् तत्त्वदर्शी निकंपो निरुत्साहो धृतिमान् रुच्य इत्य् एते सप्तर्षयः ।चित्रसेनविचित्राद्या धर्मसावर्णिपुत्रा भूभृतो भविष्यन्ति

nirmohas tattvadarśī nikaṃpo nirutsāho dhṛtimān rucya ity ete saptarṣayaḥ | citrasenavicitrādyā dharmasāvarṇiputrā bhūbhṛto bhaviṣyanti

हिन्दी अर्थ

पौराः कर्पूरश्रीखण्डं कुङ्कुमाद्यगुरुं तथा पुष्पाणि विष्णुयोग्यानि ददुरानीय भूपतेः

English

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अध्याय २३

श्लोक 28

रुद्रसावर्णिर् भविता द्वादशो मनुः

rudrasāvarṇir bhavitā dvādaśo manuḥ

हिन्दी अर्थ

गीतैः कोलाहलैः शब्हैः शङ्कवादित्रनादितैः। प्रेक्षणैरपि शास्त्रोक्त: प्रीतैश्च निशिजागरैः कारयामास सुचिरमुत्सवं परमं हरेः। यागैश्च तोषयित्वा तं सर्वदेवमयं हरिम्

English

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अध्याय २३

श्लोक 29

कृतधामा तत्रेन्द्रो हरिता रोहिताः सुमनसः सुकर्माणः सुतपाश् च देवाः

kṛtadhāmā tatrendro haritā rohitāḥ sumanasaḥ sukarmāṇaḥ sutapāś ca devāḥ

हिन्दी अर्थ

निष्क्रामो दानधर्मैश्च परं ज्ञानमवासवान्। यजन् यज्ञं महीं रक्षन् स कुर्वन् केशवार्चनम् ध्यायन् वै केवलं ब्रहम प्राप्तवान् वैष्णवं पदम्

English

Manu in the twelfth Manvantara will Rudrasavarni. In the phase of that twelfth Manvantara, Krtadhama will be Indra and Harlta, Rohita, Sumana, Sukarma and Sutapa will be the gods. Saptarsi will be Tapasvl, Carutapa, Tapomurti, Taporati, Tapodhrti, Jyoti and Tapa. The sons of Rudrasavarni Devavana and Devasrestha etc. will be the kings on the earth.

अध्याय २३

श्लोक 30

तपस्वी चारुतपास् तपोमूर्तिस् तपोरतिस् तपोधृतिर् ज्योतिस् तप इत्य् एते सप्तर्षयः

tapasvī cārutapās tapomūrtis taporatis tapodhṛtir jyotis tapa ity ete saptarṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणोंद्वारा पूजित भगवान् विष्णुको वे आराधना करने 'लगे। उनकी सुन्दरी रानियाँ चन्दन घिसकर और सुगन्धित फूलोंका हार गूँथकर अर्पण करती थीं, इससे राजाको बड़ी प्रसन्नता होती थी। इसी प्रकार नगर- श्रीविष्णुके योग्य पुष्प ला-लाकर राजाको अर्पित करते थे

English

TUKVM 'bRldfa Rd:l dTUT:

अध्याय २३

श्लोक 31

देववान् देवश्रेष्ठाद्यास् तस्य मनोः सुता भूपाला भविष्यन्ति

devavān devaśreṣṭhādyās tasya manoḥ sutā bhūpālā bhaviṣyanti

हिन्दी अर्थ

राजा तीनों संध्याओंमें विमानपर विराजमान भगवान् श्रीहरिंकी क्रमशः गन्ध-पुष्प आदि उपचारोंद्वारा बड़ी भक्तिसे पूजा करते थे। श्रीविष्णुके नामोंका जप, उनके स्तोत्रोंका पाठ, उनके गुणोंका गान और शङ्ख आदि वाद्योंका शब्द करते-कराते थे। शास्त्रोक्त विधिसे प्रेमपूर्वक सजायी हुई भगवान्की झाँकियों तथा रात्रिमें जागरण आदिके द्वारा वे सदा ही देरतक भगवत्सम्बन्धी उत्सव कराया करते थे। निष्कामभावसे किये गये यज्ञ,

English

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अध्याय २३

श्लोक 32

ःत्रयोदशो रुचिर् नाम मनुः ।ःस्रग्वी बाणः सुधर्मा प्रभृतयो देवगणाः ।ःतेषाम् इन्द्र ऋषभो नाम भविता

ḥtrayodaśo rucir nāma manuḥ | ḥsragvī bāṇaḥ sudharmā prabhṛtayo devagaṇāḥ | ḥteṣām indra ṛṣabho nāma bhavitā

हिन्दी अर्थ

दान तथा धर्माचरणांद्वारा उन सर्वदेवमय भगवान् विष्णुको संतुष्ट करके राजाने परम उत्तम ज्ञान प्राप्त कर लिया। यज्ञोंका अनुष्ठान, पृथ्वीका पालन और भगवान् केशवका पूजन करते हुए राजाने पितृगणोंकी तृ्िके निमित्त श्राद्ध आदि कर्म करनेके लिये पुत्रोंको उत्पन्न किया और केवल ब्रह्मका चिन्तन करते हुए ध्यानके द्वारा ही शरीरका त्यागकर भगवान् विष्णुके धामको प्राप्त कर लिया। इस प्रकार राजा इक्ष्वाकु अनन्त दुःखोंसे

English

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अध्याय २३

श्लोक 33

निश्चितो ऽग्नितेजा वपुष्मान् धृष्टो वारुणिर् हविष्मान् नहुषो भव्य इति सप्तर्षयः ।सुधर्मा देवानीकादयस् तस्य मनोः पुत्राः पृथ्वीश्वरा भविष्यन्ति

niścito 'gnitejā vapuṣmān dhṛṣṭo vāruṇir haviṣmān nahuṣo bhavya iti saptarṣayaḥ | sudharmā devānīkādayas tasya manoḥ putrāḥ pṛthvīśvarā bhaviṣyanti

हिन्दी अर्थ

पूर्ण संसारका त्याग करके अज, अशोक, अमल, विशुद्ध, शान्त एवं सच्चिदानन्दमय विष्णुपदको प्राप्त हो जगाम तद्विष्णुपदं हि राजा॥ ७२ गये

English

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अध्याय २३

श्लोक 34

ःभौमश् चतुर्दशो मनुर् भविता ।ःसुरुचिस् तत्रेन्द्रः ।ःचक्षुष्मन्तः पवित्राः कनिष्ठाभा देवगणाः

ḥbhaumaś caturdaśo manur bhavitā | ḥsurucis tatrendraḥ | ḥcakṣuṣmantaḥ pavitrāḥ kaniṣṭhābhā devagaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीनरसिंहपुराणे इक्ष्वाकु चरिते पञ्चविशोऽ ध्यायः इक्ष्वाकुकी संततिका वर्णन

English

The name of the thirteenth Manu will be Ruci. Sragvi, Vana and Sudharma will be the communes of gods and Rsabha will be their Indra. The Saptarsi will be Nis'cita, Agniteja, Vapusman, Dhrsta, Havis man and Bhavyamurti Nahusa. The sons of Ruci, the Manu; Sudharma and Devanlka etc. will be the kings on the earth.

अध्याय २३

श्लोक 35

अग्निबाहुशुचिशुक्रमाधवशिवाभीमजितश्वासा इत्य् एते सप्तर्षयः ।उरुगंभीरब्रह्माद्यास् तस्य मनोः सुताः राजनः

agnibāhuśuciśukramādhavaśivābhīmajitaśvāsā ity ete saptarṣayaḥ | urugaṃbhīrabrahmādyās tasya manoḥ sutāḥ rājanaḥ

हिन्दी अर्थ

इक्ष्वाकोविकुक्षिनामपुत्रः। स तु सिद्धे पितरि महर्षिभिरभिषिक्तो धर्मेण पृथिवी पालयन् देवानिष्टा स्वपुत्रं राज्ये सुबाहुमभिषिच्य दिवमारुरोह।

English

^Rddi^Ri^sbmydR'idm'lurddii'diyi

अध्याय २३

श्लोक 36

एवं ते चतुर्दश मन्वन्तराणि कथितानि ।राजानश् च यैर् इयं वसुधा पाल्यते

evaṃ te caturdaśa manvantarāṇi kathitāni | rājānaś ca yair iyaṃ vasudhā pālyate

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी धर्मेण पालयित्वा भक्ति परां नारायणे पितामहवत् कृत्वा क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैरयज्ञश्वरं निष्कामेन मनसेष्टा नित्यं निरञ्जनं निर्विकल्प परं परमाराध्य स्वर्गलोकं गतः

English

p^r ^ TMWifui cbfarnfti TMRVtf ^fTJT cTW TTR^II^II

अध्याय २३

श्लोक 37

मनुः सप्तर्षयो देवा भूपालाश् च मनोः सुताः मन्वन्तरे भवन्त्य् एते शक्राश् चैवाधिकारिणः

manuḥ saptarṣayo devā bhūpālāś ca manoḥ sutāḥ manvantare bhavanty ete śakrāś caivādhikāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्रोऽभवत्। स चाभिषिक्तो महर्षिभिर्निसर्गादेव विष्णुभक्तोऽनन्तशयनमच्युतं भक्त्याऽऽराधयन् यस्यैष शलोको गीयते।

English

Bhauma will be the fourteenth Manu. Suruci will be Indra and the communes of gods will be Caksusman, Pavitra and Kaustubha. Agnibahu, Suci, Sukra, Madhava, Siva, Abhiman and Jltasvasa will be Saptarsi and the sons of Manu Bhima i.e. Uru, Gambhlra and Brahma etc. will be the kings on the earth. Thus, I have told you all about the fourteen Manvantaras and the names of the sons of fourteen Manus who will then be the kings on the earth who look after the interests of this earth.

अध्याय २३

श्लोक 38

चतुर्दशभिर् एतैस् तु गतैर् मन्वन्तरैर् द्विज सहस्रयुगपर्यन्तः कालो गच्छति वासरः

caturdaśabhir etais tu gatair manvantarair dvija sahasrayugaparyantaḥ kālo gacchati vāsaraḥ

हिन्दी अर्थ

तस्य पुरुकुश्योऽभवद् येन देवा ब्राह्मणाश्च श्रीसूतजी बोले--इक्ष्वाकुके ज्येष्ठ पुत्रका नाम था विकुक्षि। वह अपने पिताके मुक्त हो जानेपर महर्षियोंद्वारा राज्यपदपर अभिषिक्त हुआ और धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करने लगा। राजा विकुक्षिने विमानपर विराजमान

English

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अध्याय २३

श्लोक 39

तावत्प्रमाणा च निशा ततो भवति सत्तम ब्रह्मरूपधरः शेते सर्वात्मा नृहरिः स्वयम्

tāvatpramāṇā ca niśā tato bhavati sattama brahmarūpadharaḥ śete sarvātmā nṛhariḥ svayam

हिन्दी अर्थ

शेषशायी भगवान् विष्णुको आराधना करते हुए अनेक यज्ञाद्वारा देवताओंका भी यजन किया। अन्तमें वे अपने पुत्र सुबाहुको राज्यपर अभिषिक्तकर स्वयं स्वर्गगामी हो गये। अब तेजस्वी राजा सुबाहुके पुत्र उद्योतका यशोगान किया जाता है। उद्योतने सातों द्वीपोंवाली पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया। उन्होंने अपने पितामह राजा इक्ष्वाकुकी ही भाँति भगवान् नारायणमें पराभक्ति करके प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्रार यज्ञपति विष्णुका निष्कामभावसे

English

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अध्याय २३

श्लोक 40

त्रैलोक्यम् अखिलं ग्रस्ता भगवान् आदिकृद् विभुः स्वमायाम् आस्थितो विप्र सर्वरूपी जनार्दनः

trailokyam akhilaṃ grastā bhagavān ādikṛd vibhuḥ svamāyām āsthito vipra sarvarūpī janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

अक्षर, परम, ज्योतिर्मय परमात्मरूपका चिन्तन करते हुए श्रीविष्णु और अनन्तकी आराधना करके वे परमधामको प्रा हुए उनके पुत्र युवनाश्व हुए, युवनाश्वके पुत्र मांधाता। मांधाता स्वभावसे ही भगवान् विष्णुके भक्त थे। महर्षियोंने जब उनका राज्याभिषेक कर दिया, तब शेषशायी भगवान् विष्णुकी भक्तिपूर्वक आराधना तथा

English

The authorities commanding every Manvantara are Manu, Saptarsi, gods, the ruling sons of Manu and Indra. O Brahmin, On expiry of the time limit of these fourteen Manvantaras, the period of one thousand Caturyuga is passed. This period is called a

अध्याय २३

श्लोक 41

अथ प्रबुद्धो भगवान् यथा पूर्वं तथा पुनः युगव्यवस्थां कुरुते सृष्टिं च पुरुषोत्तमः

atha prabuddho bhagavān yathā pūrvaṃ tathā punaḥ yugavyavasthāṃ kurute sṛṣṭiṃ ca puruṣottamaḥ

हिन्दी अर्थ

विविध यज्ञोंद्वारा यजन करते हुए उन्होंने सातौं द्वीपोंसे युक्त पृथ्वीका पालन किया और अन्तमें उनका वैकुण्ठवास हुआ मांधाताके ही विषयमें यह श्लोक अबतक गाया

English

Brahma. O the crown of sages, then there enters there the night for the equal period. God Nrsimha in the form of Brahma, the soul of all creatures sleep all along that period. O Brahmin, god Janardana omnipresent, omniform and the first creator merges the three-worlds with him and then sleeps under cover of his Yogamaya. He again reiterates the process adopted in the prior Kalpa for creation and doing an appropriate arrangement for the eras (Yuga). O Brahmin, I have thus told you about Manu, the gods, the kings, Manu's sons and Rsis. You should deem all these as the outstanding components of the worlds nourisher god Visnu. Thus, the twenty third chapter on 'About the

अध्याय २३

श्लोक 42

एते तवोक्ता मनवो ऽमराश् च पुत्राश् च भूपा मुनयश् च सर्वे विभूतयस् तस्य स्थितौ स्थितस्य तस्यैव सर्वं त्वम् अवेहि विप्र

ete tavoktā manavo 'marāś ca putrāś ca bhūpā munayaś ca sarve vibhūtayas tasya sthitau sthitasya tasyaiva sarvaṃ tvam avehi vipra

हिन्दी अर्थ

“जहाँसे सूर्य उदय होता और जहाँतक जाकर अस्त होता है, वह सब युवनाश्वके पुत्र मांधाताका ही क्षेत्र कहलाता है' मांधाताका पुत्र पुरुकुश्य (या पुरुकुत्स) हुआ, जिसने यज्ञ और दानके द्वारा देवताओं तथा ब्राह्मणोंको संतुष्ट किया था। पुरुकुश्यसे दूषद और

English

Manvantaras' in Sri Nrsimha Purana approaches the end.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_narasiMhapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Narasimha Purana — Chapter 23
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.