अध्याय २९
श्लोक 1
॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे शांतनुचरितं नामाष्टविंशो ऽध्यायः ॥ नर्प् २८ ॥ शंतनयोर् योजनगन्धायां विचित्रवीर्यः ।स तु हस्तिनापुरे स्थित्वा प्रजाः स्वधर्मेण पालयन् देवांश् च यागैः पितृंश् च श्राद्धैः संतर्प्य संजातपुत्रो दिवम् आरुरोह
|| iti śrīnarasiṃhapurāṇe śāṃtanucaritaṃ nāmāṣṭaviṃśo 'dhyāyaḥ || narp 28 || śaṃtanayor yojanagandhāyāṃ vicitravīryaḥ | sa tu hastināpure sthitvā prajāḥ svadharmeṇa pālayan devāṃś ca yāgaiḥ pitṛṃś ca śrāddhaiḥ saṃtarpya saṃjātaputro divam āruroha
हिन्दी अर्थ
उसके नेत्रॉमें आनन्दके आँसू भरे थे, शरीरके रोएँ खड़े हो गये थे। वह भगवानूके सामने उच्चस्वरसे “हे त्रिभुवननाथ!' यों कहता हुआ दण्डवत्-प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर पड़ गया। उस समय उसकी भौहें काँप रही थीं। दण्डकी भाँति प्रणाम करके जगद्गुरु भगवान्को ओर एकटक दृष्टि लगाये वह आनन्दातिरेकसे चारों ओर लोट-पोट होकर देरतक रोता रहा। नारद, सनन्दन,
English
A description of the generation of Santanu