अध्याय ३७
श्लोक 1
॥ इति श्रीनरसिंहपुराणे हरेः प्रादुर्भावानुक्रमणे षट्त्रिंशो ऽध्यायः ॥ नर्प् ३६ ॥ नानात्वाद् अवताराणाम् अच्युतस्य महात्मनः न शक्यं विस्तराद् वक्तुं तान् ब्रवीमि समासतः
|| iti śrīnarasiṃhapurāṇe hareḥ prādurbhāvānukramaṇe ṣaṭtriṃśo 'dhyāyaḥ || narp 36 || nānātvād avatārāṇām acyutasya mahātmanaḥ na śakyaṃ vistarād vaktuṃ tān bravīmi samāsataḥ
हिन्दी अर्थ
प्रसन्न हूँ, अब तुम अपने शुभ कैलासशिखरको जाओ। तुमने मेरी स्तुति की है, अतः तुम्हारी प्रसन्नताके लिये मैं हिरण्यकशिपुका वध करूँगा। देवताओ! अब तुम भी जाओ और कुछ कालतक प्रतीक्षा करो। जब इस 'हिरण्यकशिपुके प्रह्लद नामक बुद्धिमान् विष्णुभक्त पुत्र होगा और जिस समय यह हैत्य प्रह्णादसे द्रोह करेगा, उस समय वरोंसे रक्षित होकर देवताओं और दानवोंसे भी नहीं जीते जा सकनेवाले इस असुरका मैं अवश्य वध
English
Incarnation of Matsya and killing of Madhu and Kaitabha demons