अध्याय ५६
श्लोक 1
॥ इत्य् श्रीनरसिंहपुराणे शुक्रवरप्रदानो नाम पञ्चपञ्चाशो ऽध्यायः ॥ नर्प् ५५ ॥ सांप्रतं देवदेवस्य नरसिंह् अस्य शार्ङ्गिणः श्रोतुम् इच्छामि सकलं प्रतिष्ठायाः परं विधिम्
|| ity śrīnarasiṃhapurāṇe śukravarapradāno nāma pañcapañcāśo 'dhyāyaḥ || narp 55 || sāṃprataṃ devadevasya narasiṃh asya śārṅgiṇaḥ śrotum icchāmi sakalaṃ pratiṣṭhāyāḥ paraṃ vidhim
हिन्दी अर्थ
संयममें रखकर परस्त्रीका त्याग करे और अपनी ही स्त्रीमें अनुरक्त रहे। यञ्ञ-कालमें शीघ्रतापूर्वक ब्राह्मणोंका धनसे सम्मान करे तथा आलस्य छोड़कर प्रतिदिन यज्ञ, अध्ययन और दान करता रहे। श्राद्ध-काल प्राप्त होनेपर पितृ-श्राद्ध अवश्य करे और नित्यप्रति भगवान् श्रीनृसिंहदेवका पूजन करे। अपने धर्मका पालन करनेवाले वैश्यके लिये यही कर्तव्य कर्म बतलाया गया है। पूर्वोक्त कर्मका पालन करनेवाला वैश्य निःसंदेह स्वर्गलोकका
English
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