Vamana Purana· Vāmana Purāṇa
27
अध्याय 27 / 95

Adhyaya 27

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अध्याय २७

श्लोक 1

इति श्रीवामनपुराणे षड्विंशो ऽध्यायः ________________________________________________________________________ पुलस्त्य उवाच ।समागतान् सुरान् दृष्ट्वा नन्दिराख्यातवान् विभोः ।अथोत्थाय हरिं भक्त्या परिष्वज्य न्यपीडयत्

iti śrīvāmanapurāṇe ṣaḍviṃśo 'dhyāyaḥ ________________________________________________________________________ pulastya uvāca / samāgatān surān dṛṣṭvā nandirākhyātavān vibhoḥ / athotthāya hariṃ bhaktyā pariṣvajya nyapīḍayat

हिन्दी अर्थ

उसके पश्चात् तीनों लोकोंमें विख्यात पारिप्लव नामक तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करनेके पश्चात् वेदों- सहित ब्रह्माका दर्शन करनेसे अथर्ववेदका ज्ञान प्राप्त कर निर्मल स्वर्गको प्राप्त करता है। कौशिकी-संगम तीर्थमें जाकर स्त्रान कर मनुष्य परम पदको प्राप्त करता है। समस्त पापोंसे मुक्त करनेवाले धरणीके तीर्थमें जाकर स्नान करनेसे क्षमाशील मनुष्य परम पदकी प्राप्ति करता है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे पृथ्वीपर मनुष्यद्वारा किये गये

English

Grant of boon to Aditi by lord

अध्याय २७

श्लोक 2

ब्रह्मणां शिरसा नत्वा समाभाष्य शतक्रतुम् ।आलोक्यान्यान् सुरगणान् संभावयत् स शङ्करः

brahmaṇāṃ śirasā natvā samābhāṣya śatakratum / ālokyānyān suragaṇān saṃbhāvayat sa śaṅkaraḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त अपराध क्षमा कर दिये जाते हैं उसके बाद दक्षाश्रममें जाकर दक्षेश्वर शिंवका दर्शन करनेसे मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। द्विजोत्तमो! तदनन्तर शालूकिनी तीर्थमें जाकर ख़ान करनेके उपरान्त भक्तिपूर्वक हरसे संयुक्त हरिका पूजन

English

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अध्याय २७

श्लोक 3

गणाश्च जय देवेति वीरभद्रपुरोगमाः ।शैवाः पाशुपताद्याश्च विविशुर्मन्दरालम्

gaṇāśca jaya deveti vīrabhadrapurogamāḥ / śaivāḥ pāśupatādyāśca viviśurmandarālam

हिन्दी अर्थ

कर मनुष्य समस्त पापोंसे रहित इच्छाके अनुकूल लोकोंको प्राप्त करता है। सर्पिर्दधि नामवाले नागोंके उत्तम तीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य नाग-भयसे मुक्त हो जाता है । विप्रश्रेष्ठी! तदनन्तर रन्तुक नामक द्वारपालके 'पास जाय। वहाँ एक रात्रि निवास करे तथा कल्याणकारी (उस) श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करनेके बाद दूसरे दिन प्रयत्नपूर्वक (निष्ठाके साथ मन लगाकर) द्वारपालका पूजन करे एवं ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर उन्हें

English

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अध्याय २७

श्लोक 4

ततस्तस्मान्महाशैलं कैलासं सह दैवतैः ।जगाम भगवान् शर्वः कर्तुं वैवाहिकं विधिम्

tatastasmānmahāśailaṃ kailāsaṃ saha daivataiḥ / jagāma bhagavān śarvaḥ kartuṃ vaivāhikaṃ vidhim

हिन्दी अर्थ

प्रणाम कर इस प्रकार क्षमा-प्रार्थना करे--'हे यक्षेत्र ॥ तुम्हारी कृपासे मनुष्य पापोंसे मुक्त हो जाता है। मैं अपनी अभीष्ट सिद्धिको प्राप्त करूँ (मेरी मनःकामना पूर्ण हो) ।' इस प्रकार यक्षेनद्रको प्रसन्न करनेके पश्चात् पञ्चनद तीर्थमें जाना चाहिए। जहाँ भगवान् रुद्रने दानवोंके लिये भयंकर पाँच नदोंका निर्माण किया है, उस स्थानपर समस्त संसारमें प्रसिद्ध पञ्चनद तीर्थ है;॥ २१--२७॥

English

Lomaharsana said- The psalm so offered and chanted by the learned Dvija Kasyapa had accessed to lord Narayana, he was pleased and said in syllables intertwined with tenderness- O great gods! you ask any desired thing. May you all enjoy welfare, I will give the desire wish to you all.

अध्याय २७

श्लोक 5

ततस्तस्मिन् महाशैले देवमातादितिः शुभा ।सुरभिः सुरसा चान्याश्चक्रर्मण्डनमाकुलाः

tatastasmin mahāśaile devamātāditiḥ śubhā / surabhiḥ surasā cānyāścakrarmaṇḍanamākulāḥ

हिन्दी अर्थ

क्योंकि करोड़ों तीर्थोंको एकत्र (स्थापित) कर भगवान् वहाँ स्थित हैं, अतः उसे त्रैलोक्य-प्रसिद्ध तस्मिन् तीर्थे नरः स्त्रात्वा दृष्ट्रा कोटीश्वरं हरम्। पञ्चयज्ञानवाप्नोति नित्यं श्रद्धासमन्वितः

English

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अध्याय २७

श्लोक 6

महास्थिशेखरी चारुरोचनालिकलो हरः ।सिंहाजिनी चालिनीलभुजङ्गकृतकुण्डलः

mahāsthiśekharī cārurocanālikalo haraḥ / siṃhājinī cālinīlabhujaṅgakṛtakuṇḍalaḥ

हिन्दी अर्थ

तत्रैव वामनो देवः सर्वदेवैः प्रतिष्ठितः। तत्रापि च नरः स्नात्वा ह्यग्निष्टोमफलं लभेत् वाराहं तीर्थमाख्यातं विष्णुना परिकीर्तितम्। तस्मिन् स्त्रात्वा श्रद्दधानः प्राप्नोति परमं पदम्

English

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अध्याय २७

श्लोक 7

महाहिरत्नवलयो हारकेयूरनूपुरः ।समुन्नातजटाभारो वृषभस्थो विराजते

mahāhiratnavalayo hārakeyūranūpuraḥ / samunnātajaṭābhāro vṛṣabhastho virājate

हिन्दी अर्थ

राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः सोमलोकमवाप्नोति तत्रैव रमते चिरम्

English

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अध्याय २७

श्लोक 8

तस्याग्रतो गणाः स्वैः स्वैरारूढा यान्ति वाहनैः ।देवाश्च पृष्ठतो जग्मुर्हुताशनपुरोगमाः

tasyāgrato gaṇāḥ svaiḥ svairārūḍhā yānti vāhanaiḥ / devāśca pṛṣṭhato jagmurhutāśanapurogamāḥ

हिन्दी अर्थ

एकहंसे नरः स्त्रात्वा गोसहस्त्रफलं लभेत् कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ततो मुञ्जवटं नाम महादेवस्य धीमतः

English

Kasyapa replied- O great god! We all have determined to ask on your pleasure that you please appear from the womb of Aditi as she desired and become her sqn as also Indra could see you as his younger brother.

अध्याय २७

श्लोक 9

वैनतेयं समारूढः सह लक्ष्म्या जनार्दनः ।प्रयाति देवपार्श्वस्थो हंसेन च पितामहः

vainateyaṃ samārūḍhaḥ saha lakṣmyā janārdanaḥ / prayāti devapārśvastho haṃsena ca pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

उपोष्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुयात्। तत्रैव च महाग्राही यक्षिणी लोकविश्रुता पुष्करं च ततो गत्वा अभ्यर्च्य पितृदेवताः

English

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अध्याय २७

श्लोक 10

गजाधिरूढो देवेन्द्रश्छत्रं शुक्लपटं विभुः ।धारयामास विततं शच्या सह सहस्रदृक्

gajādhirūḍho devendraśchatraṃ śuklapaṭaṃ vibhuḥ / dhārayāmāsa vitataṃ śacyā saha sahasradṛk

हिन्दी अर्थ

कृतकृत्यो भवेद् राजा अश्वमेधं च विन्दति कन्यादानं च यस्तत्र कार्तिक्यां वै करिष्यति। प्रसन्ना देवतास्तस्य दास्यन्त्यभिमतं फलम्

English

Aditi, the mother of all gods, also begged that lord to see him as her son commensurate with the desire of her husband

अध्याय २७

श्लोक 11

यमुना सरितां श्रेष्ठा बालव्यजनमुत्तमम् ।श्वेतं प्रगृह्य हस्तेन कच्छपे संस्थिता ययौ

yamunā saritāṃ śreṣṭhā bālavyajanamuttamam / śvetaṃ pragṛhya hastena kacchape saṃsthitā yayau

हिन्दी अर्थ

कुरुक्षेत्रके सात प्रसिद्ध वनों, नौ नदियों एवं सम्पूर्ण तीर्थोंका माहात्म्य कोटितीर्थं कहा जाता है। मनुष्य श्रद्धापूर्वक उस तीर्थमें स्नान कर तथा कोटीश्वर हरका दर्शन कर पाँच प्रकारके (महा) यज्ञोंके अनुष्ठानका फल प्राप्त करता है। उसी स्थानपर सब देवताओंने भगवान् वामनदेवकी स्थापना

English

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अध्याय २७

श्लोक 12

हंसकुन्दन्दुसंकाशं बालव्याजनमुत्तमम् ।सरस्वती सरिच्छ्रेष्ठा गजारूढा समादधे

haṃsakundandusaṃkāśaṃ bālavyājanamuttamam / sarasvatī saricchreṣṭhā gajārūḍhā samādadhe

हिन्दी अर्थ

की है। वहाँ भी स्त्रान करनेसे मनुष्यको अग्निष्टोम यज्ञका फल प्राप्त होता है। श्रद्धावान् जितेन्द्रिय मनुष्य अश्विनीकुमारोंके तीर्थमें जाकर रूपवान् और यशस्वी होता है विष्णुद्दारा वर्णित वाराह नामक विख्यात तीर्थ है। श्रद्धालु पुरुष उसमें स्नान कर परमपदको प्राप्त करता है। विप्रेन्द्रो! उसके बाद श्रेष्ठ सोमतीर्थमें जाना चाहिए, जहाँ चन्द्रमा पूर्वकालमें तपस्या कर व्याधिसे मुक्त हुए

English

The gods said- O Mahes'vara! Please, be a defender, donor, survivor and shelter always for the supreme welfare of us.

अध्याय २७

श्लोक 13

ऋतवः षट् समादाय कुसुमं गन्धसंयुतम् ।पञ्चवर्णं महेशानं जग्मुस्ते कामचारिणः

ṛtavaḥ ṣaṭ samādāya kusumaṃ gandhasaṃyutam / pañcavarṇaṃ maheśānaṃ jagmuste kāmacāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

थे। उस शुभ तीर्थमें स्नान कर सोमेश्वर भगवानका दर्शन करनेसे मनुष्य राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त करता है तथा व्याधियों और सभी दोषोंसे मुक्त होकर सोमलोकमें जाता एवं चिरकालतक वहाँ सानन्द विहार करता वहींपर भूतेश्वर एवं ज्चालामालेश्वर नामक लिङ्ग है। उन दोनों लिङ्गोंकी पूजा करनेसे (मनुष्य) पुनर्जन्म नहीं पाता। एकहंस (सरोवर)-में स्नान कर मनुष्य हजारों गौओंके दानका फल प्राप्त करता है।

English

Lord Vi$nu then said to those gods and Kas'yapa- "irrespective of the number of your enemies, those shall not stay even for a moment before me."

अध्याय २७

श्लोक 14

मत्तमैरावणनिभं गजमारुह्य वेगवान् ।अनुलेपनमादाय ययौ तत्र पृथूदकः

mattamairāvaṇanibhaṃ gajamāruhya vegavān / anulepanamādāya yayau tatra pṛthūdakaḥ

हिन्दी अर्थ

“कृतशौच' नामक तीर्थमें जाकर मनोयोगपूर्वक तीर्थकी सेवा करनेवाला द्विजोत्तम ' पुण्डरीक ' यज्ञविशेषके फलको प्राप्त करता है तथा उसकी शुद्धि हो जाती है (--वह पवित्र हो जाता है)। उसके बाद बुद्धिमान् महादेवके मुझवट नामक तीर्थमें एक रात्रि निवास करके मनुष्य गाणपत्य (गणनायकके पदको) प्राप्त करता है। वहीं विश्वप्रसिद्ध महाग्राही यक्षिणी है। वहाँ जाकर स्नान करनेके बाद यक्षिणीको प्रसन्न कर उपवास करनेसे

English

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अध्याय २७

श्लोक 15

गन्धर्वास्तुम्बरुमुखा गायन्तो मधुरस्वरम् ।अनुजग्मुर्महादेवं वादयन्तश् च किन्नराः

gandharvāstumbarumukhā gāyanto madhurasvaram / anujagmurmahādevaṃ vādayantaś ca kinnarāḥ

हिन्दी अर्थ

महान् पातकोंका नाश होता है ॥ ३६--४० ॥ पुण्यकी वृद्धि करनेवाले कुरक्षेत्रके उस विख्यात द्वारकी प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। फिर पुष्करमें जाकर पितृदेवोंकी अर्चना करे। उस तीर्थका

English

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अध्याय २७

श्लोक 16

नृत्यन्त्यो ऽप्सरश्चैव स्तुवन्तो मुनयश्च तम् ।गन्धर्वा यान्ति देवेशं त्रिनेत्रं शूलपाणिनम्

nṛtyantyo 'psaraścaiva stuvanto munayaśca tam / gandharvā yānti deveśaṃ trinetraṃ śūlapāṇinam

हिन्दी अर्थ

वहाँ (जाकर) मनुष्य सफल-मनोरथ हो जाता है और राजाको अश्वमेध-यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है। कार्तिकी पूर्णिमाको जो मनुष्य वहाँ कन्यादान करेगा, उसके ऊपर विघ्नं करोति पापानां दुर्गतिं च प्रयच्छति

English

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अध्याय २७

श्लोक 17

एकादश तथा कोट्यो रुद्राणां तत्र वै ययुः ।द्वादशैवादितेयानामष्टौ कोट्यो वसुनपि

ekādaśa tathā koṭyo rudrāṇāṃ tatra vai yayuḥ / dvādaśaivāditeyānāmaṣṭau koṭyo vasunapi

हिन्दी अर्थ

सा ददर्श स्त्रियं चैकां सपुत्रां पापदेशजाम्। त्तामुवाच तदा यक्षी आहत्य निशि दुन्दुभिम् यदा सूर्यस्य ग्रहणं कालेन भविता क्कचित्। सन्निहत्यां तदा स्त्रात्वा पूता स्वर्ग गमिष्यसि

English

O great gods! killing the demons, I will manage the oblation of offering for gods and their meal, the foremost oblation of yajna and Kavya for the Manes. O great gods! Go back now to the same route from which you have

अध्याय २७

श्लोक 18

सप्तषष्टिस्तथा कोट्यो गणानामृषिसत्तम ।चतुर्विशत् तथा जग्मुरृषीणामूर्ध्वरेतसाम्

saptaṣaṣṭistathā koṭyo gaṇānāmṛṣisattama / caturviśat tathā jagmurṛṣīṇāmūrdhvaretasām

हिन्दी अर्थ

कपिल नामक महायक्ष स्वयं द्वारपालके रूपमें स्थित हैं, जो पापियोंके मार्गमें विघ्न उपस्थित कर उनकी दुर्गति करते हैं (जिससे वे पापाचरण न करें तथा धर्मकी मर्यादा स्थित रहे)। 'उदूखलमेखला' नामक उनकी महायक्षी पल्ली दुन्दुभि बजाकर वहाँ नित्य भ्रमण करती रहती है॥ ४१--४५॥

English

mm: sif^i fop chvymyMHi

अध्याय २७

श्लोक 19

असंख्यातानि यूथानि यक्षकिन्नररक्षसाम् ।अनुजग्मुर्महेशानं विवाहाय समाकुलाः

asaṃkhyātāni yūthāni yakṣakinnararakṣasām / anujagmurmaheśānaṃ vivāhāya samākulāḥ

हिन्दी अर्थ

उस यक्षीने पापवाले देशमें उत्पन्न पुत्रके साथ एक रात्रिमें स्त्रीको देखनेके बाद दुन्दुभि बजाकर उससे कहा- युगन्धरमें दही खाकर तथा अच्युतस्थलमें निवास करेके बाद भूतालयमें स्नान कर तुम पुत्रके साथ निवास करना चाहती हो। मैंने दिनमें यह बात तुमसे कही है। रात्रिमें मै अवश्य तुमको खा जाऊँगी । उसकी यह बात सुननेके बाद यक्षिणीको प्रणाम कर उसने दीन वाणीमें उससे कहा --' है भामिनि ! मेरे ऊपर दया करो।' फिर उस यक्षिणीने

English

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अध्याय २७

श्लोक 20

ततः क्षणेन देवेशः क्ष्माधराधिपतेस्तलम् ।संप्राप्तास्त्वागमन् शैलाः कुञ्जरस्थाः समन्ततः

tataḥ kṣaṇena deveśaḥ kṣmādharādhipatestalam / saṃprāptāstvāgaman śailāḥ kuñjarasthāḥ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

उससे कृपापूर्वक कहा--जब किसी समय सूर्य-ग्रहण होगा, उस समय सान्निहत्य (सरोबर)-में स्नान करके पवित्र होकर तुम स्वर्ग चली जाओगी कुरुक्षेत्रके तीर्थोके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन

English

Lomaharsana said- All gods including Kas'yapa and Aditi worshipped lord Vi§nu happily, bowed their head with sheer respect and returned to the asrama of Kas'yapa which was situated at the east from there. They thus reached Kuruksetra at the as'rama of Kasyapa, congratulated Aditi, engaged her in penance and thus, she observed strict penance for ten thousand years.

अध्याय २७

श्लोक 21

ततो ननाम भगवांस्त्रिनेत्रः स्थावराधिपम् ।शैलाः प्रणेमुरीशानं ततो ऽसौ मुदितो ऽभवत्

tato nanāma bhagavāṃstrinetraḥ sthāvarādhipam / śailāḥ praṇemurīśānaṃ tato 'sau mudito 'bhavat

हिन्दी अर्थ

ततो रामहृदं गच्छेत् तीर्थसेवी द्विजोत्तमः। यत्र रामेण विप्रेण तरसा दीप्ततेजसा 'लोमहर्षणने कहा-- इसके बाद तीर्थका सेवन करनेवाले उत्तम द्विजको रामकुण्ड नामक स्थानमें जान चाहिए, जहाँ उद्दीप्त तेजस्वी विप्र-वीर राम (परशुराम) - ने बलपूर्वक क्षत्रियोंका संहारकर पाँच कुण्डोंको

English

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अध्याय २७

श्लोक 22

समं सुरैः पार्षदैश्च विवेश वृषकेतनः ।नन्दिना दर्शिते मार्गे शैलराजपुरं महत्

samaṃ suraiḥ pārṣadaiśca viveśa vṛṣaketanaḥ / nandinā darśite mārge śailarājapuraṃ mahat

हिन्दी अर्थ

कि परशुरामने उन (कुण्डों)-को रक्तसे भरकर उससे अपने पितरों एवं प्रपितामहोंका तर्पण किया था द्विजोत्तमो! उसके बाद उन प्रसन्न पितरोंने परशुरामे कहा था कि महाबाहु भार्गव राम! परशुराम! विभो तुम्हारी इस पितृभक्ति और पराक्रमसे हम सब तुम्हा ऊपर प्रसन्न हैं

English

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अध्याय २७

श्लोक 23

जीमूतकेतुरायात इत्येवं नगरस्त्रियः ।निजं कर्म परित्यज्य दर्शनव्यापृताभवन्

jīmūtaketurāyāta ityevaṃ nagarastriyaḥ / nijaṃ karma parityajya darśanavyāpṛtābhavan

हिन्दी अर्थ

ततश्च पापान्मुच्येयं युष्माकं तेजसा ह्यहम्। हृदाश्चैते तीर्थभूता भवेयुर्भुवि विश्रुताः ततश्च पापान्मुक्तस्त्वं पातितास्ते स्वकर्मभिः । हृदाश्च तव तीर्थत्वं गमिष्यन्ति न संशयः

English

tjengrossforr to Meuajumi ifr^i

अध्याय २७

श्लोक 24

माल्यार्द्धमन्या चादाय करेणैकेन भामिनी ।केशपाशं द्वितीयेन शङ्कराभिमुखी गता

mālyārddhamanyā cādāya kareṇaikena bhāminī / keśapāśaṃ dvitīyena śaṅkarābhimukhī gatā

हिन्दी अर्थ

ईप्सितान् मानसान् कामानूस्वर्गवासं च शाश्चतम्। एवं दत्त्वा वरान् विप्रा रामस्य पितरस्तदा स्त्रात्वा हृदेषु रामस्य ब्रह्मचारी शुचिक्रतः। राममभ्यर्च्य श्रद्धावान् विन्देद् बहु सुवर्णकम्

English

prra TOfoftHlfa: ■yfdl^T: TO dM^HIII ^11 VRUii ^rcnt ffojj yumi TOETOTOTtfI TMlfdHwWl'dW^fMUlH.II ^11

अध्याय २७

श्लोक 25

अन्यालक्तकरागाढ्यं पादं कृत्वाकुलेक्षणा ।अनलक्तकमेकं हि हरं द्रष्टुमुपागता

anyālaktakarāgāḍhyaṃ pādaṃ kṛtvākulekṣaṇā / analaktakamekaṃ hi haraṃ draṣṭumupāgatā

हिन्दी अर्थ

बंशमूलं समासाद्य तीर्थसेवी सुसंयतः। स्ववंशसिद्धये विप्राः स्त्रात्वा वै वंशमूलके कायशोधनमासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। शरीरशुद्िमाप्नोति स्त्रातस्तस्मिन् न संशयः

English

O great hermits! The forest in which Aditi observed the penance later-on address as Aditivana after her name. It was indeed divine forest which fulfilled the desire of Aditi. O great hermits! Aditi who saw that her sons were humiliated by demons, noticed their weakness, worried for their success, had observed silence, lived on air and chanted psalms for the pleasure of lord Visnu, the

अध्याय २७

श्लोक 26

एकेनाक्ष्णाञ्जितेनैव श्रुत्वा भीममुपागतम् ।साञ्जनां च प्रगृह्यान्या शलाकां सुष्ठु धावति

ekenākṣṇāñjitenaiva śrutvā bhīmamupāgatam / sāñjanāṃ ca pragṛhyānyā śalākāṃ suṣṭhu dhāvati

हिन्दी अर्थ

यावन्न प्राप्नुवन्तीह तीर्थ तत्कायशोधनम् कुरुक्षेत्रके तीर्थोके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन

English

great shelter, gracious to the devotees, the sovereign god, the creator, protector and destroyer of the universe.

अध्याय २७

श्लोक 27

अन्या सरसनं वासः पाणिनादाय सुन्दरी ।उन्मत्तेवागमन्नग्ना हरदर्शनलालासा

anyā sarasanaṃ vāsaḥ pāṇinādāya sundarī / unmattevāgamannagnā haradarśanalālāsā

हिन्दी अर्थ

माँगो। क्या चाहते हो? पितरोंके इस प्रकार कहनेपर प्रभावशालियोंमें श्रेष्ठ रामने आकाशमें स्थित पितरोंसे हाथ जोड़कर कहा --यदि आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तथा मुझपर आप सबकी दया है तो आप पितरोंके प्रसादसे मैं पुनः तपसे पूर्ण हो जाऊँ। रोषसे अभिभूत होकर मैंने जो क्षत्रियोंका विनाश किया है, आपके तेजद्वारा मैं उस पापसे मुक्त हो जाऊँ एवं ये कुण्ड संसारमें विख्यात तीर्थस्वरूप हो जायँ

English

TO: froifTOTTTRT TO:

अध्याय २७

श्लोक 28

अन्यातिक्रान्तमीशानं श्रुत्वा स्तनभरालसा ।अनिन्दत रुषा बाला यौवनं स्वं कृशोदरी

anyātikrāntamīśānaṃ śrutvā stanabharālasā / anindata ruṣā bālā yauvanaṃ svaṃ kṛśodarī

हिन्दी अर्थ

परशुरामके इस प्रकारके मङ्गलमय वचन कहनेपर उनके परम प्रसन्न पितरोंने हर्षपूर्वक उनसे कहा -- “पुत्र! पितृभक्तिसे तुम्हारा तप विशेषरूपसे बढे । क्रोधसे अभिभूत होनेके कारण तुमने क्षत्रियोंका जो विनाश किया है उस पापसे तुम मुक्त हो; क्योंकि ये क्षत्रिय अपने कर्मसे ही मारे गये हैं। तुम्हारे ये कुण्ड निःसंदेह तीर्थके गुणोंको प्राप्त करेंगे। जो इन कुण्डोंमें स्नान कर अपने पितरोंका तर्पण करेंगे, उन्हें (उनके) पितृगण

English

Aditi recited- I salute the god who remove the pains caused by Krtya, I salute god who wears a Puskara garland. O supreme god! You render the best to the devotees. You are welfare in yourself and the foremost creator of this universe. I salute you.

अध्याय २७

श्लोक 29

इत्थं स नगरस्त्रीणां क्षोभं संजनयन् हरः ।जगाम वृषभारूढो दिव्यं श्वशुरमन्दिरम्

itthaṃ sa nagarastrīṇāṃ kṣobhaṃ saṃjanayan haraḥ / jagāma vṛṣabhārūḍho divyaṃ śvaśuramandiram

हिन्दी अर्थ

मनकी इच्छाके अनुसार वर देंगे, उनकी मनोऽभिलषित कामनाएँ पूर्ण करेंगे एवं उन्हें स्वर्गमें शाश्वत निवास प्रदान करेंगे।' विप्रो! इस प्रकार वर देकर परशुरामके पितर उनसे अनुमति लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहीं अन्तर्हित हो गये। इस प्रकार महात्मा परशुरामके ये रामहद परम पवित्र हैं

English

Salute to lotus-eyed god, salute to god having lotus on navel. Salute to the originator of Brahma and salute to

अध्याय २७

श्लोक 30

ततः प्रविष्टं प्रसमीक्ष्य शंभुं शैलेन्द्रवेश्मन्यबला ब्रुवन्ति ।स्थाने तपो दुश्चरमम्बिकायाश्चीर्णं महानेष सुरस्तु शंभुः

tataḥ praviṣṭaṃ prasamīkṣya śaṃbhuṃ śailendraveśmanyabalā bruvanti / sthāne tapo duścaramambikāyāścīrṇaṃ mahāneṣa surastu śaṃbhuḥ

हिन्दी अर्थ

श्रद्धालु पवित्रकर्मा व्यक्ति ब्रह्मचर्यपूर्वक परशुरामजीके हदोंमें स्नान करनेके बाद परशुरामका अर्चन कर प्रचुर सुवर्ण प्राप्त करता है। ब्राह्मणो! तीर्थसेवी जितेन्द्रिय मनुष्य वंशमूलक नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे अपने वंशकी सिद्धि प्राप्त करता है। तीनों लोकोंमें विख्यात कायशोधन नामक तीर्थमें 'जाकर उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको निस्संदेह शरीरकी शुद्धि प्राप्त होती है और वह शुद्धदेही मनुष्य उस स्थानको

English

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अध्याय २७

श्लोक 31

स एष येनाङ्गमानङ्गतां कृतं कन्दर्पनाम्नः कुसुमायुधस्य ।क्रतोः क्षयी दक्षविनाशकर्ता भगाक्षिहा शूलधरः पिनाकी

sa eṣa yenāṅgamānaṅgatāṃ kṛtaṃ kandarpanāmnaḥ kusumāyudhasya / kratoḥ kṣayī dakṣavināśakartā bhagākṣihā śūladharaḥ pinākī

हिन्दी अर्थ

जाता है, जहाँसे वह पुन: नहीं लौटता (जन्म-मरणके चक्करमें नहीं पड़ता) । तीर्थपरायण सिद्ध पुरुष तीर्थामें 'तबतक भ्रमण करते रहते हैं, जबतक वे उस कायशोधन नामक तीर्थमें नहीं पहुँचते॥ १५--१८॥ तस्मिस्तीर्थ च संप्लाव्य कायं संयतमानस: । परं पदमवाप्नोति यस्मान्नावर्तते पुनः

English

Salute to the husband of Lak§ml, the suppressor of senses, visible to ascetics, holder of discus in hand, the Kanakareta holding lotus and sword in hands.

अध्याय २७

श्लोक 32

नमो नमः शङ्कर शूलपाणे मृगारिचर्माम्बर कालशत्रो ।महाहिहाराङ्कितकुण्डलाय नमो नमः पार्वतिवल्लभाय

namo namaḥ śaṅkara śūlapāṇe mṛgāricarmāmbara kālaśatro / mahāhihārāṅkitakuṇḍalāya namo namaḥ pārvativallabhāya

हिन्दी अर्थ

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रास्तीर्थ त्रैलोक्यविश्रुतम्। लोका यत्रोद्धृताः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना "लोकोद्धारं समासाद्य तीर्थस्मरणतत्परः। स्नात्वा तीर्थवरे तस्मिन् लोकान् पश्यति शाश्चतान्

English

fofoira feyluKi ito ggwPiul ii 9o

अध्याय २७

श्लोक 33

इत्थं संस्तूयमानः सुरापतिविधृतेनातपत्रेण शंभुः सिद्धैर्वन्द्यः सयक्षैरहिकृतवलयी चारुभस्मोपलिफ्तः ।अग्रस्थेनाग्रजेन प्रमुदितमनसा विष्णुना चानुगेन वैवाहीं मङ्गलाढ्यां हुतवहमुदितामारुरोहाथ वेदीम्

itthaṃ saṃstūyamānaḥ surāpatividhṛtenātapatreṇa śaṃbhuḥ siddhairvandyaḥ sayakṣairahikṛtavalayī cārubhasmopaliphtaḥ / agrasthenāgrajena pramuditamanasā viṣṇunā cānugena vaivāhīṃ maṅgalāḍhyāṃ hutavahamuditāmārurohātha vedīm

हिन्दी अर्थ

चत्र विष्णुः स्थितो नित्यं शिवो देवः सनातनः। तौ देवौ प्रणिपातेन प्रसाद्य मुक्तिमाप्नुयात् तत्र स्त्रातस्य सांनिध्यं सदा देवी प्रयच्छति

English

Salute to Atmajnana yajna, a topic for Yogis’ meditation, Yogi, Nirguna, peculiar, Hari and

अध्याय २७

श्लोक 34

आयाते त्रिपुरान्तके सहचरैः सार्धं च स्पतर्षिभिर्व्यग्रो ऽभूद् गिरिराजवेश्मनिजनः काल्याः समालङ्कृतौ ।व्याकुल्यं समुपागताश्च गिरयः पूजादिना देवताः प्रायोव्याकुलिता भवन्ति सुहृदः कन्याविवाहोत्सुकाः

āyāte tripurāntake sahacaraiḥ sārdhaṃ ca spatarṣibhirvyagro 'bhūd girirājaveśmanijanaḥ kālyāḥ samālaṅkṛtau / vyākulyaṃ samupāgatāśca girayaḥ pūjādinā devatāḥ prāyovyākulitā bhavanti suhṛdaḥ kanyāvivāhotsukāḥ

हिन्दी अर्थ

'कपिलाहृदमासाद्य तीर्थ त्रैलोक्यविश्रुतम्। तत्र स्त्रात्वार्चयित्वा च हैवतानि पितृंस्तथा तत्र स्थितं महादेवं कापिलं वपुरास्थितम्

English

vjihrHfdBrl TOT Wlti ^ pfo

अध्याय २७

श्लोक 35

प्रसाध्य देवीं गिरिजां ततः स्त्रयो दुकूलशुक्लाभिवृताङ्गयष्चिकाम् ।भ्रात्रा सुनाबेन तदोत्सवे कृते सा शङ्कराभ्याशमथोपपादिता

prasādhya devīṃ girijāṃ tataḥ strayo dukūlaśuklābhivṛtāṅgayaṣcikām / bhrātrā sunābena tadotsave kṛte sā śaṅkarābhyāśamathopapāditā

हिन्दी अर्थ

दृष्टा मुक्तिमवाप्नोति ऋषिभिः पूजितं शिवम्। सूर्यतीर्थं समासाद्य स्त्रात्वा नियतमानसः ol देवानृपवासपरायणः। सूर्यलोकं च गच्छति

English

TO: TOP^ ifo? ^Tlffutll ? ^||

अध्याय २७

श्लोक 36

ततः शुभे हर्म्यतले हिरण्मये स्थिताः सुराः संकरकालिचेष्टितम् ।पस्यन्ति देवो ऽपि समं कुशाङ्ग्या लोकानुजुष्टं पदमाससाद

tataḥ śubhe harmyatale hiraṇmaye sthitāḥ surāḥ saṃkarakāliceṣṭitam / pasyanti devo 'pi samaṃ kuśāṅgyā lokānujuṣṭaṃ padamāsasāda

हिन्दी अर्थ

सहस्रकिरणं देवं भानुं त्रैलोक्यविश्रुतम्। दृष्टा मुक्तिमवाप्नोति नरो ज्ञानसमन्वितः भवानीवनमासाद्य तीर्थसेवी यथाक्रमम्। तत्राभिषेकं कुर्वाणो गोसहस्त्रफलं लभेत्

English

Salute to the holder of Saniga bow in whom this universe existed yet invisible and who is so micro and formidable in his features.

अध्याय २७

श्लोक 37

यत्र क्रीडा विचित्राः सकुसुमतरवो वारिणो बिन्दुपातैर्गन्धाढ्यैर्गन्धचूर्णैः प्रविरलमवनौ गुण्डितौ गुण्डिकायाम् ।मुक्तादामैः प्रकामं हरगिरितनया क्रीडनार्थं तदाघ्यनत् पश्चात्सिन्दूरपुञ्जैरविरतविततैश् चक्रतुः क्ष्मां सुरक्ताम्

yatra krīḍā vicitrāḥ sakusumataravo vāriṇo bindupātairgandhāḍhyairgandhacūrṇaiḥ praviralamavanau guṇḍitau guṇḍikāyām / muktādāmaiḥ prakāmaṃ haragiritanayā krīḍanārthaṃ tadāghyanat paścātsindūrapuñjairaviratavitataiś cakratuḥ kṣmāṃ suraktām

हिन्दी अर्थ

उद्रारात् सुरभिर्जाता सा च पातालमाश्रिता तस्याः सुरभयो जाताः तनया लोकमातरः। 'ताभिस्तत्सकलं व्याप्तं पातालं सुनिरन्तरम्

English

3 1 nyy-til w< fo TsRri tot:i

अध्याय २७

श्लोक 38

एवं क्रीडां हरः कृत्वा समं च गिरिकन्यया ।आगच्छद् दक्षिणां वेदिमृषिभिः सेवितां दृढाम्

evaṃ krīḍāṃ haraḥ kṛtvā samaṃ ca girikanyayā / āgacchad dakṣiṇāṃ vedimṛṣibhiḥ sevitāṃ dṛḍhām

हिन्दी अर्थ

आहूता ब्रह्मणा ताश्च विभ्रान्ता विवरेण हि मनको नियन्त्रित करनेवाला मनुष्य उस तीर्थमॅ शरीरको धोकर (प्रक्षालित कर) उस परम पदको ग्राप्त करता है, जहाँसे उसे पुनः परावर्तित नहीं होना पड्ता। विप्रवरो! उसके बाद तीनों लोकोंमें विख्यात

English

cTT^ TOTTOTOTOTTTOTOT TOT TO: I

अध्याय २७

श्लोक 39

अथाजगाम हिमवान् शुक्ललाम्बरधरः शुचिः ।पवित्रपाणिरादाय मधुपर्कमथोज्ज्वलम्

athājagāma himavān śuklalāmbaradharaḥ śuciḥ / pavitrapāṇirādāya madhuparkamathojjvalam

हिन्दी अर्थ

लोकोद्धार नामके तीर्थमें जाना चाहिए, जहाँ सर्वसमर्थ विष्णुने समस्त लोकोंका उद्धार किया था। तीर्थका स्मरण करनेमें तत्पर मनुष्य लोकोद्धार नामके तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे शाश्वत लोकोंका दर्शन प्राप्त करता है। वहाँ विष्णु एवं सनातनदेव शिव --ये दोनों ही स्थित हैं। उन दोनों देवोंको प्रणामद्वारा प्रसन्न कर फिर मुक्तिका फल प्राप्त करे। तदनन्तर अनुत्तम शालग्राम एवं श्रीतीर्थमें जाना चाहिए। वहाँ स्नान

English

TOST: : fosftr ftpi 4 <m: xjfoi

अध्याय २७

श्लोक 40

उपविष्टस्त्रिनेत्रस्तु शाक्रीं दिशमपश्यत ।सप्तर्षिकांश्च शैलन्द्रः सूपविष्टो ऽवलोकयन्

upaviṣṭastrinetrastu śākrīṃ diśamapaśyata / saptarṣikāṃśca śailandraḥ sūpaviṣṭo 'valokayan

हिन्दी अर्थ

'करनेवालोंको भगवती (लक्ष्मी) अपने निकट निवास प्रदान करती हैं फिर त्रैलोक्यप्रसिद्ध कपिलाहृद नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेके पश्चात् देवता तथा पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको सहस्र कपिला गायोंके दानका फल प्राप्त होता है। वहाँपर स्थित ऋषियोंसे पूजित

English

Salute to Vidhata (creator) invisible to the people materialistic but visible at heart, to the people not attached to worldly affairs, who spreads light outside and always invisible, who is seen apparent in the light, the god in whom this whole world is existed, who is the creator of this universe and who himself rules over this world. Frequent salute to the foremost Prajapati, the supreme administrator of Pitrganas and the god Krsna who is the ruler of all gods.

अध्याय २७

श्लोक 41

सुखासीनास्य शर्वस्य कृताञ्ज०लिपुटो गिरिः ।प्रोवाच वचनं श्रीमान् धर्मसाधनमात्मनः

sukhāsīnāsya śarvasya kṛtāñja0lipuṭo giriḥ / provāca vacanaṃ śrīmān dharmasādhanamātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

कापिल शरीरधारी महादेव शिवका दर्शन कणेसे मुक्तिकी प्राप्ति होती है। स्थिर अन्तःकरणवाला एवं उपवास-परायण व्यक्ति सूर्यतीर्थमें जाकर स्नान करनेके बाद पितरोंका अर्चन करनेसे अग्निष्टोम-यज्ञका फल ग्राप्त करता है एवं सूर्यलोकको जाता है

English

Salute to the god who holds mace in his hand, who is detached to the intended and given-up trend of deeds and who render with the fruit of heaven emancipation.

अध्याय २७

श्लोक 42

हिमवानुवाच ।मत्पुत्रीं भगवन् कालीं पौत्रीं च पुलहाग्रजे ।पितॄणामपि दौहित्रीं प्रतीच्छेमां मयोद्यताम्

himavānuvāca / matputrīṃ bhagavan kālīṃ pautrīṃ ca pulahāgraje / pitṝṇāmapi dauhitrīṃ pratīcchemāṃ mayodyatām

हिन्दी अर्थ

तीनों लोकोंमें विख्यात हजारों किरणोंवाले सूर्यदेव भगवानका दर्शन करनेसे मनुष्य ज्ञानसे युक्त होकर मुक्तिको प्राप्त करता है। तीर्थसेवन करनेवाला मनुष्य क्रमानुसार भवानीवनमें जाकर वहाँ (भवानीका) अभिषेक करनेसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त करता है। प्राचीन कालमें अमृत-पान करते हुए ब्रह्माके उद्गार (डकार)- से सुरभिकी उत्पत्ति हुई और वह पाताल लोकमें चली गयी। उस सुरभिसे लोकमाताएँ (सुरभिकी पुत्रियाँ)

English

Salute to that sacrosanct Harimedha supreme soul who destroys all evils when duly remembered by devotees.

अध्याय २७

श्लोक 43

पुलस्त्य उवाच ।इत्येवमुक्त्वा शैलेन्द्रो हस्तं हस्तेन योजयन् ।प्रादात् प्रतीच्छ भगवन् इदमुच्चैरुदीरयन्

pulastya uvāca / ityevamuktvā śailendro hastaṃ hastena yojayan / prādāt pratīccha bhagavan idamuccairudīrayan

हिन्दी अर्थ

(गायें) उत्पन्न हुई। उनसे समस्त पाताल लोक व्याप्त हो गया पितामहके यज्ञ करते समय दक्षिणाके लिये लायी गयी एवं ब्रह्माके द्वारा बुलायी ये गायें विवरके कारण

English

w fcroj RRifR ygRterqji 3 c

अध्याय २७

श्लोक 44

हि उवाच ।न मे ऽस्ति माता न पिता तथैव न ज्ञातयो वापि च बानधवाश्च ।निराश्रयो ऽहं किरिशृङ्गवासी सुतां प्रतीच्छासि तवाद्रिराज

hi uvāca / na me 'sti mātā na pitā tathaiva na jñātayo vāpi ca bānadhavāśca / nirāśrayo 'haṃ kiriśṛṅgavāsī sutāṃ pratīcchāsi tavādrirāja

हिन्दी अर्थ

यं दृष्टा सकलान् कामान् प्राप्नोति संयतेन्द्रियः देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम्

English

I salute that yajna form, yajna established, yajna Purusa, Isvara, lord Visnu.

अध्याय २७

श्लोक 45

इत्येवमुक्त्वा वरदो ऽवपीडयत् करं करेणाद्रिकुमारिकायाः ।सा चापि संस्पर्शमवाप्य शंभोः परां मुदं लब्धवती सुरर्षे

ityevamuktvā varado 'vapīḍayat karaṃ kareṇādrikumārikāyāḥ / sā cāpi saṃsparśamavāpya śaṃbhoḥ parāṃ mudaṃ labdhavatī surarṣe

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मावर्ते नरः स्त्रात्वा ब्रह्मज्ञानसमन्वितः। भवते नात्र संदेहः प्राणान् मुञ्चति स्वेच्छया यक्षस्य च प्रसादेन लभते कामिकं फलम्

English

I salute the god duly praised in all the Vedas by the scholars (known to the Vedas), who is the aim of learned persons, who is known to the Vedas and everlasting.

अध्याय २७

श्लोक 46

तथाधिरूढो वरदो ऽथ वेदिं सहाद्रिपुत्र्या मधुपर्कमश्नन ।दत्त्वा च लाजान् कलमस्य शुक्लांस्ततो विरिञ्चो गिरिजामुवाच

tathādhirūḍho varado 'tha vediṃ sahādriputryā madhuparkamaśnana / dattvā ca lājān kalamasya śuklāṃstato viriñco girijāmuvāca

हिन्दी अर्थ

तततो गच्छेत विप्रेन्द्रा ब्रह्मावर्त्त मुनिस्तुतम्। ब्रह्मावर्ते नरः स्त्रात्वा ब्रह्म चाप्नोति निश्चितम् तत्र संनिहिता नित्यं पितरो हैवतैः सह

English

Salute to that supreme soul from whom this world has been originated, will finally merge and who is the cause of the origin and existence of the world.

अध्याय २७

श्लोक 47

कालि पस्यस्व वदनं भर्तुः शशधरप्रभम् ।समदृष्टिः स्थिरा भूत्वा कुरुष्वाग्नेः प्रदक्षिणम्

kāli pasyasva vadanaṃ bhartuḥ śaśadharaprabham / samadṛṣṭiḥ sthirā bhūtvā kuruṣvāgneḥ pradakṣiṇam

हिन्दी अर्थ

तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः। अश्वमेधमवाप्नोति पितृन् प्रीणाति शाश्चतान् ततोऽम्बुवनं धर्मज्ञ समासाद्य यथाक्रमम्। कामेश्वरस्य तीर्थ तु स्त्रात्वा श्रद्धासमन्वितः

English

■RiRrsnFRiy*4 wgiFs RRi mgHJ i 3 *u

अध्याय २७

श्लोक 48

ततो ऽम्बिका हरमुखे दृष्टे शैत्यमुपागता ।यथार्करश्मिसंतप्ता प्राप्य वृष्टिमिवावनिः

tato 'mbikā haramukhe dṛṣṭe śaityamupāgatā / yathārkaraśmisaṃtaptā prāpya vṛṣṭimivāvaniḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो ब्रह्मावाप्तिर्भवेद् श्रुवम्। मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्त्रातस्य भक्तितः पुनाति दर्शनादेव दण्डकं च द्विजोत्तमाः

English

I salute that Upendra under whose control the movable and immovable Abrahmastamba (world) is so extended.

अध्याय २७

श्लोक 49

भूयः प्राह विभोर्वक्त्रमीक्षस्वेति पितामहः ।लज्जया सापि दृष्टेति शनैर्ब्रह्माणमब्रवीत्

bhūyaḥ prāha vibhorvaktramīkṣasveti pitāmahaḥ / lajjayā sāpi dṛṣṭeti śanairbrahmāṇamabravīt

हिन्दी अर्थ

केशानभ्युक्ष्य वै तस्मिन् पूतो भवति पापतः। तत्र तीर्थवरं चान्यत् स्वानुलोमायनं महत् स्वानुलोमायने तीर्थे विप्रास्त्रैलोक्यविश्रुते

English

fspg fonj cf RRlfR U-dTRfdHJI ? ? II

अध्याय २७

श्लोक 50

समं गिरिजया तेन हुताशस्त्रिःप्रदक्षिणम् ।कृतो लाजाश्च हविषा समं क्षिप्ता हुताशने

samaṃ girijayā tena hutāśastriḥpradakṣiṇam / kṛto lājāśca haviṣā samaṃ kṣiptā hutāśane

हिन्दी अर्थ

कुरुक्षेत्रके तीर्थोके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन भटकने लगीं। उस विवरके द्वारपर स्वयं गणपति भगवान् स्थित हैं । जितेन्द्रिय मनुष्य उनका दर्शन करके समस्त कामनाओंको प्राप्त करता है। मुक्तिके आश्रयस्वरूप देवीके संगिनीतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको

English

I salute that ruler of the universe and Prajapati Visnu who provides with maintenance this entire world and who has existed in the form of water.

अध्याय २७

श्लोक 51

ततो हराङ्घ्रिर्मालिन्या गृहीतो हायकारणात् ।किं याचसि च दास्यामि मुञ्चस्वेति हरो ऽब्रवीत्

tato harāṅghrirmālinyā gṛhīto hāyakāraṇāt / kiṃ yācasi ca dāsyāmi muñcasveti haro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

सुन्दर रूपकी प्राप्ति होती है तथा वह स्ानकर्ता पुरुष पुत्र-पौत्रसमन्वित होकर अनन्त ऐश्वर्यको प्राप्त करता है और विपुल भोगोंका उपभोग कर परम पदको प्राप्त करता है ब्रह्मावर्त नामक तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य निःसंदेह ब्रह्मज्ञानी हो जाता है एवं वह निज इच्छाके अनुसार अपने प्राणोंका परित्याग करता है। है विप्रश्रेष्ठी! संगिनीतीर्थके बाद द्वारपाल रन्तुकके तीर्थमें जाय। उन महात्मा यक्षेन्द्रका

English

cfRtSTJTRR trfffTT *T:|

अध्याय २७

श्लोक 52

मालिनी शङ्करं प्राह मत्सख्या देहि शङ्कर ।सौभाग्यं निजगोत्रीयं ततो मोक्षमवाप्स्यसि

mālinī śaṅkaraṃ prāha matsakhyā dehi śaṅkara / saubhāgyaṃ nijagotrīyaṃ tato mokṣamavāpsyasi

हिन्दी अर्थ

तीर्थ सरस्वती नदीमें है। वहाँ स्नान करके उपवास- ब्रतमें निरत परमज्ञानी व्यक्ति यक्षके प्रसादसे इच्छित फल प्राप्त करता है। है विप्रवरो! फिर मुनियोंद्वारा प्रशंसा-प्राप्त ब्रह्मावर्त तीर्थमें जाना चाहिए । ब्रह्मावर्त्तमें स्नान करनेसे मनुष्य निश्चय ही ब्रह्मको प्राप्त करता है

English

TTf^rar Tf R Rim^ ll 3311

अध्याय २७

श्लोक 53

अथोवाच महादेवो दत्तं मालिनि मुञ्च माम् ।सौभाग्यं निजगोत्रीयं यो ऽस्यास्तं शृणु वच्मि ते

athovāca mahādevo dattaṃ mālini muñca mām / saubhāgyaṃ nijagotrīyaṃ yo 'syāstaṃ śṛṇu vacmi te

हिन्दी अर्थ

हे विप्रश्रेष्ठो! उसके बाद श्रेष्ठ सुतीर्थक नामके स्थानपर जाना चाहिए। उस स्थानमें देवताओंके साथ पितृगण नित्य स्थित रहते हैं। पितरों एवं देवोंकी अर्चनामें लगा रहनेवाला व्यक्ति वहाँ स्रानकर अश्वमेध- यज्ञका फल प्राप्त करता है तथा शाश्वत पितरोंको प्रसन्न करता है। धर्मज्ञ! उसके बाद क्रमानुसार कामेश्वर तीर्थके अम्बुवनमें जाकर श्रद्धापूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य सभी व्याधियोसे छूटकर निश्चय ही ब्रह्मकी

English

I salute the Upendra in the form of sun who shelters the tangible dark monster of the night.

अध्याय २७

श्लोक 54

यो ऽसौ पीताम्बरधरः शङ्खधृक् मधुसूदनः ।एतदीयो हि सौभाग्यो दत्तो ऽस्मद्गोत्रमेव हि

yo 'sau pītāmbaradharaḥ śaṅkhadhṛk madhusūdanaḥ / etadīyo hi saubhāgyo datto 'smadgotrameva hi

हिन्दी अर्थ

प्राप्ति करता है। उसी स्थानमें स्थित मातृतीर्थमें भक्तिपूर्वक त्रान करनेसे मनुष्यकी प्रजा (संतति)-की नित्य वृद्धि होती है तथा उसे अनन्त लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। उसके बाद नियत आहार करनेवाला एवं जितेन्द्रिय व्यक्ति शीतवन नामक तीर्थमें जाय। है महाविप्रो! वहाँ दण्डक नामक एक महान् तीर्थ है; वह अत्यन्त दुर्लभ है। द्विजोत्तमो! वह दण्डक नामका महान् तीर्थ दर्शनमात्रसे मनुष्यको पवित्र कर देता है ॥ ४०--४५॥

English

Whose sun and moon eyes watch all good and bad activities of organisms executed throughout the three-worlds, I salute that

अध्याय २७

श्लोक 55

इत्येवमुक्ते वचने प्रमुमोच वृषध्वजम् ।मालिनी निजगोत्रस्य शुभचारित्रमालिनी

ityevamukte vacane pramumoca vṛṣadhvajam / mālinī nijagotrasya śubhacāritramālinī

हिन्दी अर्थ

उस तीर्थमें केशोंका मुण्डन करानेसे मनुष्य अपने पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँ स्वानुलोमायन. नामका 'एक दूसरा महान् तीर्थ है। है द्विजोमो! वहाँ तीर्थ-सेवन करनेमें तत्पर परमज्ञानी विद्वान् लोग रहते हैं। त्रिलोकविख्यात

English

ftrR UcRild^qlfcdHJ RTJR RR3f HMliR 3Wdlot|qr^||

अध्याय २७

श्लोक 56

यदा हरो हि मालिन्या गृहीतश्चरणे शुभे ।तदा कालीमुखं ब्रह्म ददर्श शशिनो ऽधिकम्

yadā haro hi mālinyā gṛhītaścaraṇe śubhe / tadā kālīmukhaṃ brahma dadarśa śaśino 'dhikam

हिन्दी अर्थ

तत्र स्त्रात्वा भक्तियुक्तस्तदेव लभते फलम् ततो गच्छेत श्रद्धावान् मानुषं लोकविश्रुतम्। दर्शनात् तस्य तीर्थस्य मुक्तो भवति किल्बिषैः

English

I salute that unborn, everlasting creator Visnu, the Sarvesvara about whom all that I have said is true and not untrue.

अध्याय २७

श्लोक 57

तद् दृष्ट्वा क्षोभमगमत् शुक्रच्युतिमवाप च ।तच्छुक्रं बालुकायां च खिलीचक्रे ससाध्वसः

tad dṛṣṭvā kṣobhamagamat śukracyutimavāpa ca / tacchukraṃ bālukāyāṃ ca khilīcakre sasādhvasaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वपापविनिर्मुक्ता भविष्यथ न संशयः। "ततः स्त्राताश्च ते सर्वे शुद्धदेहा दिवं गता: उस तीर्थमें वे प्राणायामोंके द्वारा अपने लोमोंका परित्याग करते हैं और वे पवित्रात्मा विप्रगण परम गतिको प्राप्त करते हैं वहींपर परम प्रसिद्ध दशाश्वमेधिक तीर्थ है। भक्तिपूर्वक उसमें स्नान करनेसे पूर्वोक्त फलकी

English

qgldrHriiy-* ^ fRSJTRf SRT^RI

अध्याय २७

श्लोक 58

ततो ऽब्रवीद्वरो ब्रह्मन् न द्विजान् हन्तुमर्हसि ।अमी महर्षयो धन्या वालखिल्याः पितामह

tato 'bravīdvaro brahman na dvijān hantumarhasi / amī maharṣayo dhanyā vālakhilyāḥ pitāmaha

हिन्दी अर्थ

ही प्राप्ति होती है। फिर श्रद्धालु मनुष्यको लोक-प्रसिद्ध मानुषतीर्थमें जाना चाहिए। उस तीर्थका दर्शन करनेसे ही पापोंसे मुक्ति हो जाती है ॥ ४६--५०॥ पूर्वकालमें व्याधद्वारा बाणसे विद्ध कृष्णमृग (काला हरिण) उस सरोवरमें स्त्रानकर मनुष्यत्वको प्राप्त हुए थे। उसके बाद उन सभी व्याधोंने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे पूछा --द्विजोत्तमो ! हमलोगोंद्वारा बाणसे पीडित मृग

English

O Janardana! by virtue of the truth if actually I have stated true here may he fulfil my all desires.

अध्याय २७

श्लोक 59

ततो महेशवाक्यान्ते समुत्तस्थुस्तपस्विनः ।अष्टाशीतिसहस्राणि वालखिल्या इति स्मृताः

tato maheśavākyānte samuttasthustapasvinaḥ / aṣṭāśītisahasrāṇi vālakhilyā iti smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

इस मार्गसे जाते हुए सरोवरमें निमग्र होकर कहाँ चले गये? उनके पूछनेपर उन्होंने उत्तर दिया --हम द्विजोत्तम वे (कृष्ण) मृग ही थे। इस तीर्थके माहात्म्यसे हम सब मनुष्य बन गये हैं। अतएव मत्सरसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक इस तीर्थमें स्नान करनेसे तुमलोग निःसंदेह समस्त पापोंसे विनिर्मुक्त हो जाओगे। फिर स्त्रान करनेसे शुद्ध-देह होकर वे सभी (व्याध) स्वर्ग चले गये। द्विजोत्तमो! जो श्रद्धापूर्वक मानुष तीर्थक इस माहात्म्यको सुनते हैं, वे

English

O Janardana! by virtue of the truth if actually I have stated true here may he fulfil my all desires.

अध्याय २७

श्लोक 60

ततो विवाहे निर्वृत्ते प्रविष्टः कौतुकं हरः ।रेमे सहोमया रात्रिं प्रभाते पुनरुत्थितः

tato vivāhe nirvṛtte praviṣṭaḥ kautukaṃ haraḥ / reme sahomayā rātriṃ prabhāte punarutthitaḥ

हिन्दी अर्थ

भी परम गतिको प्राप्त करते हैं ॥५१--५६॥ कुरुक्षेत्रके तीर्थोके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन

English

O Janardana! by virtue of the truth if actually I have stated true here may he fulfil my all desires.

अध्याय २७

श्लोक 61

ततो ऽद्रपुत्रीं समवाप्य शंभुः सरैः समं भूतगणैश् च हृष्टः ।संपूजितः पर्वतपार्थिवेन स मन्दरं शीघ्रमुपादजगाम

tato 'draputrīṃ samavāpya śaṃbhuḥ saraiḥ samaṃ bhūtagaṇaiś ca hṛṣṭaḥ / saṃpūjitaḥ parvatapārthivena sa mandaraṃ śīghramupādajagāma

हिन्दी अर्थ

ये प्रयच्छन्ति विप्रेभ्यस्तेषां पापं न विद्यते ये तु श्राद्धं करिष्यन्ति प्राप्य तामापगां नदीम्।

English

O Janardana! by virtue of the truth if actually I have stated true here may he fulfil my all desires.

अध्याय २७

श्लोक 62

ततः सुरान् ब्रह्महरीन्द्रमुख्यान् प्रणम्य संपूज्य यथाविभागम् ।विसर्ज्य भूतैः सहितो महीध्रमध्यावसन्मन्दरमष्टमूर्तिः

tataḥ surān brahmaharīndramukhyān praṇamya saṃpūjya yathāvibhāgam / visarjya bhūtaiḥ sahito mahīdhramadhyāvasanmandaramaṣṭamūrtiḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वकामसंयुक्ता भविष्यन्ति न संशयः लोमहर्षण बोले-- द्विजोत्तमो! मानुषतीर्थके पूर्व दिशामें एक कोसपर द्विजोंसे पूजित 'आपगा' नामकी एक विख्यात नदी है। वहाँ साँवाके चावलको दूधमें सिद्धकर और उसमें घी मिलाकर जो ब्राह्मणको देते हैं,

English

O Janardana! by virtue of the truth if actually I have stated true here may he fulfil my all desires.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/1_sanskr/3_purana/vamp__u.htm | https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_vAmanapurANasaromAhAtmya.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vamana Purana — Chapter 27
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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