अध्याय ५३
श्लोक 1
इति श्रीवामनपुराणे द्विपञ्चाशो ऽध्यायः ________________________________________________________________________ पुलस्त्य उवाच ।कालिन्दीसलिले स्नात्वा पूजयित्वा त्रिविक्रमम् ।उपोष्य रजनीमेकां लिङ्गभेदं गिरिं ययौ
iti śrīvāmanapurāṇe dvipañcāśo 'dhyāyaḥ ________________________________________________________________________ pulastya uvāca / kālindīsalile snātvā pūjayitvā trivikramam / upoṣya rajanīmekāṃ liṅgabhedaṃ giriṃ yayau
हिन्दी अर्थ
बाद वे राजा शीधघ्रतासे उठे। उन्होंने उन दोनों ब्राह्मणों तथा अपने भतीजेके लिये रथ दे दिये वे रथोंपर चढ़कर शीघ्रतासे क्रमशः पृथ्वीपर खोज करने लगे। (इस क्रममें) उन लोगोंने बदरिकाश्रमे जाकर तपस्या करनेसे दुबले और धूल-मिट्टीसे भरे, जटा धारण किये हुए, जोर-जोरसे साँस ले रहे एक
English
After worshipping them, the king mountain then bade farewell to those hermits by offering tasty fruits and roots.