Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
112
अध्याय 112 / 232

Adhyaya 112

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अध्याय ११२

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे स्कन्दतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकादशोत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ११२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र तीर्थमाङ्गिरसस्य तु ।उत्तरे नर्मदाकूले सर्वपापविनाशनम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe skandatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikādaśottaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 112 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra tīrthamāṅgirasasya tu / uttare narmadākūle sarvapāpavināśanam

हिन्दी अर्थ

प्रमुख देवगणों ने इन अप्सराओों को स्वरूप की अतिशयता प्रदानकर निमित किया है ।६७-५८। इन सब में महाभाग्यशा लिनी सुर-तारी तिलोत्तमा परम सुन्दरी कही जाती है। स्वरूप एवं यौवन से सुसमृद्ध लोकविस्यात शुभा:। वह्नयोत्यमृताल़ेदा भवश्च रुचयस्तथा। भेरवा: शोभयन्तयरच गणा हांते चतु्दंश/ इति--ख., घ. पुस्तकयों:। » घनुद्िचित्वान्सगंतग्रन्थ: क. पुस्तके नास्ति ।

English

They were—Raktakarna, Mahajihva, Ak§aya and Upaharinl. Brahmaraksasas were born of their families on the earth.

अध्याय ११२

श्लोक 2

पुरासीदङ्गिरानाम ब्राह्मणो वेदपारगः ।पुत्रहेतोर् युगस्यादौ चचार विपुलं तपः

purāsīdaṅgirānāma brāhmaṇo vedapāragaḥ / putrahetor yugasyādau cacāra vipulaṃ tapaḥ

हिन्दी अर्थ

६१० “वायुपुराणम्ः.

English

Generally they are found on the Slesmataka (Cardya Myxia) trees. They live there. Thus Raksasas have been enumerated. Understand Yaksas.

अध्याय ११२

श्लोक 3

नित्यं त्रिषवणस्नायी जपन्देवं सनातनम् ।पूजयंश्च महादेवं कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः

nityaṃ triṣavaṇasnāyī japandevaṃ sanātanam / pūjayaṃśca mahādevaṃ kṛcchracāndrāyaṇādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

तथा यमस्य दुहिता रूपयौवनशालिनी । वरहेमनिभा हेमा देवनारी सुलोचना "देश इत्येते बहुसाहर भास्वरा ह्वाप्सरोगणा: । देवतानामृषीणां च पत्न्यस्ता मातरश्व ह ६२ सुगन्धाश्रम्पवर्णाश्व सर्वाश्याप्सरसः समा: । संप्रयोगे तु कान्तेन माद्यन्ति सदिरां बिना॥। । वयोयवीयसो चेव तृतीयाउरुन्धतो स्घृता । देवरुख्यो(? )सुयंजन्म तस्मिन्नारदपवंतो )

English

Yaksa loved the Apsaras Kratusthali other¬ wise known as Pancasthula (stout in five limbs). Brooding over her and desirous of securing her, he wandered in the parks of Nandana, Vaibhraja, Surabhi and Caitraratha. In the park of Nandana, he saw her seated along with Apsaras-s.

अध्याय ११२

श्लोक 4

द्वादशाब्दे ततः पूर्णे तुतोष परमेश्वरः ।वरेण छन्दयामास द्विजम् आङ्गिरसं वरम्

dvādaśābde tataḥ pūrṇe tutoṣa parameśvaraḥ / vareṇa chandayāmāsa dvijam āṅgirasaṃ varam

हिन्दी अर्थ

देवनारी प्रभावती ब्रह्मा के अग्निकुण्ड से उत्पन्न कही जाती है। परमकान्तियुक्त सुर-नारी वेदवती बुद्धिमान् चतुर्मूख ब्रह्मा जी के वेदी तल से उत्न्न हुई स्वरूप एवं यौवन से दोनों सुसम्पन्न हेमानामक सुन्दरी जिसके शरीर की आभा तपाये हुये सुवर्ण के समान मनोहर थी, एवं जिसकी आँखें अति सुन्दर थीं, यम की पुत्री थी । इस प्रकार कौ अनेक सहस्न तेजस्विनी अप्सरःओं के समृह हुये, जो विविध देवताओं एवं ऋषियों की

English

He did not know of any means of acquiring her despite his pondering, because he was defiled (ugly) in form and defiled and corrupt in his activities.

अध्याय ११२

श्लोक 5

वव्रे स तु महादेवं पुत्रं पुत्रवतां वरम् ।वेदविद्याव्रतस्नातं सर्वशास्त्रविशारदम्

vavre sa tu mahādevaṃ putraṃ putravatāṃ varam / vedavidyāvratasnātaṃ sarvaśāstraviśāradam

हिन्दी अर्थ

नी एवं माता हुईं ये सभो अप्सरायें एक समान चम्पा के पृष्प की भाँति गौरवर्ण कौ एवं सुगन्धित शरीर वालौ थीं, बिना मद्यपान किये ही ये अपने प्रियतम के सहवास में मदोन्मत्त की भाँति हो जाती हैं। इनके स्पश करने से प्रियजन सन्तुष्ट होकर आनन्द से विभोर हो उठते हैं '५६-६३। प्राचीनकाल में नारद नामक पवत पर प्रजापति ब्रह्मा का वीर्य स्खलित हुआ, जिससे वहाँ नारद और पर्वत ताम के दो ऋषि उत्पन्न हुये ' इन दोनों भाइयों की छोटी बहिन अरुन्धती के नाम से स्मरण को जाती है, जो ब्रह्मा की तीसरी सनन्‍्ततति के रूप में उत्पन्न हुई ।६४१।""“ उसी पव॑त पर देवरुख्य (१) सुर्यं नारद और पवेत पर इन सब का जन्म हुआ था । विनता के अरुण और गरुड़ नामक दो पुत्र हुये इन दोनों की सहोदरा छत्तीस छोदी बहिनें भी कही जाती हैं। गायत्री आदि छनन्‍्द, पंख से उड़नेवाले समस्त पक्षीगण, विभिन्न दिद्याओं में सन्तिहित सभी हृव्यवाहगण--

English

He thought, "All living beings are afraid and disgus¬ ted with me who am noxious and hurtful. So how shall I secure this lady of beautiful limbs?'*.

अध्याय ११२

श्लोक 6

देवानां मन्त्रिणं राजन् सर्वलोकेषु पूजितम् ।ब्रह्मलक्ष्म्याः सदावासम् अक्षयं चाव्ययं सुतम्

devānāṃ mantriṇaṃ rājan sarvalokeṣu pūjitam / brahmalakṣmyāḥ sadāvāsam akṣayaṃ cāvyayaṃ sutam

हिन्दी अर्थ

ये सब भी विनता ही के गर्भ से प्रादुंभूत हुए । कद्रू ने चलने वाले एवं न चलनेवाले सहख्रों नागों को उत्पन्न किया । उन महात्मा आकाशण्णगमी, अनेक शिरोंवाले मांगों में से प्रायः कुछ के नामों को मैं बतला रहा

English

He thought of a plan and hastened to put it into ac¬ tion. The Guhyaka (Yaksa) assumed the honoured form of a Gandharva. Then he seized Kratusthali from the midst of (other) Apsaras-s.

अध्याय ११२

श्लोक 7

तथाभिलषितः पुत्रः सर्वविद्याविशारदः ।भविष्यति न सन्देहश्चैवमुक्त्वा ययौ हरः

tathābhilaṣitaḥ putraḥ sarvavidyāviśāradaḥ / bhaviṣyati na sandehaścaivamuktvā yayau haraḥ

हिन्दी अर्थ

घनुदिचद्धान्तगंतग्रन्थ: क. पुस्तके नास्ति । तेषां प्रधाननागाश्व शेषवासुकितक्षका: । सकर्णी रश्च जम्भश्न अठजनो वामनस्तथां ६६ ऐरावतमहापद्यो कम्बलाध्वतराबुभो । ऐलपन्रश्न शद्भूश्ष ककोटकधनंजयो. .

English

Knowing him to be beautiful in form, she followed him with emotional attachment. Even as he was being observed by the group of Apsaras-s, he was embraced by her.

अध्याय ११२

श्लोक 8

वरैर् अङ्गिरसश्चापि बृहस्पतिरजायत ।यथाभिलषितः पुत्रो वेदवेदाङ्गपारगः

varair aṅgirasaścāpi bṛhaspatirajāyata / yathābhilaṣitaḥ putro vedavedāṅgapāragaḥ

हिन्दी अर्थ

महाकर्णो महानीलो धुतराष्ट्रबलाहकौो । कुमारः पुष्पदन्तश्र सुमुखो दुर्मुलस्तथा.....

English

When he achieved his cause (i.e. desired object), a son of full-fledged sense-organs and height was born to him imme¬ diately. New-born though he was, he (as if) blazed in his glory.

अध्याय ११२

श्लोक 9

जाते पुत्रेऽङ्गिरास् तत्र स्थापयामास शङ्करम् ।हृष्टतुष्टमना भूत्वा जगामोत्तरपर्वतम्

jāte putre'ṅgirās tatra sthāpayāmāsa śaṅkaram / hṛṣṭatuṣṭamanā bhūtvā jagāmottaraparvatam

हिन्दी अर्थ

शिलीमुखो दधिमुख: कालीयः शालिपिण्डक: । बिन्दुपादः पुण्डरीकों नागश्वापुरणस्तथा नहुषः खररोमा च मणिरित्येवमादयः । काद्रवेया सया ख्याताः खशायास्तु निनोधव.. ७४ द

English

He spoke to his father—"I am a king. I am Nabhi" The father replied, "Since you are born, there is no fear"

अध्याय ११२

श्लोक 10

तत्र चाङ्गिरसे तीर्थे यः स्नात्वा पूजयेच्छिवम् ।सर्वपापविनिर्मुक्तो रुद्रलोकं स गच्छति

tatra cāṅgirase tīrthe yaḥ snātvā pūjayecchivam / sarvapāpavinirmukto rudralokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

बिलोहित॑ विकर्ण च पुर्वे साउजनयत्सुतम् । चतुर्भुजं चतुष्पादं ह्िसुर्धानं द्िधागतिमू॒.

English

When the son emulated his mother in beauty and father in valour, Yaksa was overjoyed and due to that exultation regained his original form. Big Yaksas and Raksasas regain their own form while dying, when asleep, angry or frightened and when extremely delighted.

अध्याय ११२

श्लोक 11

अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात् ।इच्छते यश्च यं कामं स तं लभति मानवः

aputro labhate putramadhano dhanamāpnuyāt / icchate yaśca yaṃ kāmaṃ sa taṃ labhati mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वाड्भकेशं स्थलाड़्र” तुडगनासं महोदरम् । स्थलशीर्ष महाकर्ण मुझजकेशं सनोरथमू.. गुहाकं शितिकर्ण च महानन्द महामुखम् । एवंविधं खशा पुत्र विजज्ञे साइतिभीषणम्

English

Then that Guhyaka smilingly spoke to the Apsaras— "O lady of beautiful hips and excellent complexion, come to my house along with your son."

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 112
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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