Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
113
अध्याय 113 / 232

Adhyaya 113

3 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय ११३

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे ऽग्निरसतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम द्वादशाधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय ११३ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र कोटितीर्थमनुत्तमम् ।ऋषिकोटिर्गता तत्र परां सिद्धिमुपागता

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe 'gnirasatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma dvādaśādhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 113 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra koṭitīrthamanuttamam / ṛṣikoṭirgatā tatra parāṃ siddhimupāgatā

हिन्दी अर्थ

हैं ।६५-६८। सुनिये । उनमें से प्रधान ताग जो थे, वे शेष, वासुकि, तक्षक, सकर्णी, जम्भ, अड्जन, वामन, ऐराबत, महापञ्न, कम्बल, अध्वतर, ऐलपत्र शंख, कर्कोटक, घनंजय, महाकर्ण, महानील, धुतराष्ट्र, बलाहक, कुमार, पुष्पदन्त, सुमुख, दुर्मुल, शिलीमुख, दब्षिमुखल, कालीय. शालि-पिण्डक, विव्दुपाद, पुण्डरीोक, आपूरण,

English

On seeing him who regained his form suddenly after saying this, all the Apsaras-s were furious, perplexed and frightened and they fled.

अध्याय ११३

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा भोजयेद् ब्राह्मणाञ्छुचिः ।एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā bhojayed brāhmaṇāñchuciḥ / ekasminbhojite vipre koṭirbhavati bhojitā

हिन्दी अर्थ

से प्रसिद्ध हैं। कद्दू के पुत्रों का वर्णन तो मैं कर चुका अब खशा के पुत्रों का विवरण सुनिये ।६६-७४। खा ने दो पुत्रों को उत्पन्न किया, जो दो के दोनों पुरुषादक (मनुष्य का भक्षण करनेवाले) थे । पश्चिम संख्या में ज्येष्ठ, और पूर्व संख्या में मनुजों की उत्पत्ति हुई सर्वत्रथम खज्चा ने विलोहित विकर्णं नामक पूत्र को उत्पन्न किया, जो चतुर्भुज, चतुष्पाद, द्विमूर्धा, द्विघागति (दो प्रकार से चलने वाला) सर्वाज्ध केश (सभी अंगों में केश संयुक्त) स्थुलाज़ (मोटे अंगों वाला) तुद्भनास (ऊंची नासिका वाला) महोदर, स्थूलशोष, महाकर्ण, मुज्जकेश्न (मूंज की तरह पीले वर्ण के केक्षोंवाला) मनोरथ, हस्त्योष्ठ (हाथी के समान ओंठ बाला, दीर्घजंघ, अदवर्दष्ट्र, (घोड़ों के समान दाढ़ों वाला) महाहनु (लम्बी दाढ़ी वाला) रक्तजिद्न, जटाक्ष, स्थ॒लास्य, (मोटे मुखवाला) दीर्घेनासिक, ग्रुह्मक (बुरा शब्द करनेवाला) शझितिकर्ण (काले या चिंतकबरे रंग के कानों वाला)

English

Kratusthali followed the Apsaras-s who were fleeing. But the son consoled her with his words. He took her to the middle ofGandharvas and Apsaras-s and returned.

अध्याय ११३

श्लोक 3

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत् पितृदेवताः ।पूजिते तु महादेवे वाजपेयफलं लभेत्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet pitṛdevatāḥ / pūjite tu mahādeve vājapeyaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

महानन्द एवं महामुख था । इस प्रकार के अति भयानक पुत्र को खद्या ने उत्पन्न किया ।७५-७६। इसके उपरान्त इसके सहोदर छोटे भाई को भी खशा ने उत्पन्न किया । जो त्रिजीर्ष (तीन झिरोंबाला) त्रिपाद, तरिहस्त, क्ृष्ण-

English

On seeing the birth of Yaksa, the group of Apsaras-s spoke to Kratusthali—"You are the mother of Yaksas".

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 113
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.