Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
122
अध्याय 122 / 232

Adhyaya 122

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अध्याय १२२

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे सोमतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकविंशत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १२२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल कोहनस्वेति विश्रुतम् ।सर्वपापहरं पुण्यं तीर्थं मृत्युविनाशनम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe somatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikaviṃśatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 122 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla kohanasveti viśrutam / sarvapāpaharaṃ puṇyaṃ tīrthaṃ mṛtyuvināśanam

हिन्दी अर्थ

हैं। कुष्माण्ड के कुल में उत्पन्न होने वाले इन कुलीनों का वर्णन किया गया। इन्हीं के कुन में उत्पन्न होनेवाले अन्याश्य पिल्चाचों को जानना चाहिए इनके पूत्र पौन्नादि की संख्या अनन्त है. सब अति वीभत्स आकृतिवाले तथा निन्दय कर्म करनेवाले ये, अतः उन पिश्याचों के लक्षण बतला रहा हूँ, सुनिये !२६३-२६६।

English

They are born again and again among human beings for the purpose of achieving their object. Thus the origin of the race of ascetics has been recounted.

अध्याय १२२

श्लोक 2

पुरा तत्र द्विजः कश्चिद्वेदवेदाङ्गपारगः ।पत्नीपुत्रसुहृद्वर्गैः स्वकर्मनिरतो ऽवसत्

purā tatra dvijaḥ kaścidvedavedāṅgapāragaḥ / patnīputrasuhṛdvargaiḥ svakarmanirato 'vasat

हिन्दी अर्थ

२. संख्या अठारह हो जाती है, अतः इन नामों में से कोई विशेषण है। पर प्रम,.णाभाव से हमने अनुषाद यथातथ्य कर दिया है । ६२५ वायुपुराणम््

English

The meritorious story of Suras, Asuras, Gan¬ dharvas, Apsaras-s, Yaksas, Raksasas, Pisacas, Suparnas, ser¬ pents, birds, pythons, peacocks, all medicinal herbs, worms, germs, insects, insignificant creatures born in water, animals and glorious Brahmanas, is conducive to longevity and wealth. It is pleasing and beneficial. It is meritorious. It must be heard always and retained by one who is devoid of malice and jealousy.

अध्याय १२२

श्लोक 3

युधिष्ठिर उवाच: ब्राह्मणस्य तु यत्कर्म उत्पत्तिः क्षत्रियस्य तु ।वैश्यस्यापि च शूद्रस्य तत्सर्वं कथयस्व मे

yudhiṣṭhira uvāca: brāhmaṇasya tu yatkarma utpattiḥ kṣatriyasya tu / vaiśyasyāpi ca śūdrasya tatsarvaṃ kathayasva me

हिन्दी अर्थ

सर्वाद्धकेशा वृत्ताख्या दंष्ट्रिणो नखिनस्तथा । तियंडगाः पुरुषादाश्च पिशाचास्ते ह्धोमुखाः

English

He who regularly reads this story of the race (of ascetics) of noble souls in the assembly of Brahmanas and physi¬ cians will attain children, abundant wealth and prosperity and the glorious goal after death.

अध्याय १२२

श्लोक 4

धर्मस्यार्हस्य कामस्य मोक्षस्य च परं विधिम् ।निखिलं ज्ञातुम् इच्छामि नान्यो वेत्ता मतिर्मम

dharmasyārhasya kāmasya mokṣasya ca paraṃ vidhim / nikhilaṃ jñātum icchāmi nānyo vettā matirmama

हिन्दी अर्थ

अकेशका ह्यरोमाणस्त्वग्वसाश्रमंबाससः । कृष्माण्डिका: पिशाचास्ते तिलभक्षा: सदामिषा: वक़ाड़ुहस्तपादाश्च वक़्शीलागतास्तथा । ज्ञेया वक़्पिशाचास्ते वक़गा:ः कामरूपिण: २६६ लस्बोदरास्तुण्डनाशा हृस्वक्ायशिरोमुजा:। नितुन्दका: पिशाचास्ते तिलभक्षा: प्रियअवा:

English

Thus when the entire mobile and immobile crea¬ tions had been created and established by the noblc-souled Kasyapa, he the chief Prajapati, crowned (the chiefs of them)

अध्याय १२२

श्लोक 5

मार्कण्डेय उवाच: उत्पत्तिकारणं ब्रह्मा देवदेवः प्रकीर्तितः ।प्रथमं सर्वभूतानां चराचरजगद्गुरुः

mārkaṇḍeya uvāca: utpattikāraṇaṃ brahmā devadevaḥ prakīrtitaḥ / prathamaṃ sarvabhūtānāṃ carācarajagadguruḥ

हिन्दी अर्थ

वामनाकतयश्चेब वाचाला: प्लुतगामिनः । पिशाचानकंम्कास्ते वक्षवासावनप्रियाः १२७१

English

He made Prahlada, the delighter of Diti, the king of Daityas: Narayana the king of Sadhyas; and the Bull- bannered lord (Siva) the king of Rudras.

अध्याय १२२

श्लोक 6

द्विजातयो मुखाज्जाताः क्षत्रिया बाहुयन्त्रतः ।ऊरुप्रदेशाद् वैश्यास्तु शूद्राः पादेष्वथाभवन्

dvijātayo mukhājjātāḥ kṣatriyā bāhuyantrataḥ / ūrupradeśād vaiśyāstu śūdrāḥ pādeṣvathābhavan

हिन्दी अर्थ

धमनीमन्तकाः शुष्का: श्मश्ुलाश्ची रवाससः । उपदीराः पिशाचाश्च श्मशानायतनास्तथा विष्टब्धाक्षा महाजिद्ना लेलिहाना ह्यलूखला:। हस्त्युष्ट्स्यूलशिरसो विरता बद्धपिण्डका:

English

He directed Vipracitti to be the king of Danavas. He ordered Varuna to be the king of waters. He made Vaisravana (Kubera) the lord of Yaksas, Raksasas and the wealth of (worldly) kings.

अध्याय १२२

श्लोक 7

ततस्त्वन्ये पृथग्वर्णाः पृथग्धर्मान् समाचरन् ।पर्यायेण समुत्पन्ना ह्यनुलोमविलोमतः

tatastvanye pṛthagvarṇāḥ pṛthagdharmān samācaran / paryāyeṇa samutpannā hyanulomavilomataḥ

हिन्दी अर्थ

पिश्नाचों के सभी अंगों में केश होते हैं, भाँखें गोली होती हैं, बड़े-बड़े दाँत तथा नख होते हैं, अंग्र ठेढ़े-मेढ़े रहले हैं, मनुष्य का भक्षण करते हैं, उनके मुख नीचे की ओर झुके रहते हैं। कुष्मांडिक कहलानेवाले पिशाचगण बिना केशों के होते हैं, शरीर पर रोम भी नहीं रहते, चमड़े, चर्वी, आदि को वस्त्र के स्थान पर लपेटे रहते हैं, वे सवंदा मास तथा तिल का भाहर करनेवाले हैं।२६७-२६८। बक्र नामक पिशाचों के सभी अंग हाथ पर

English

He coronated Yama, the son of Vivasvan (the Sun), in

अध्याय १२२

श्लोक 8

तेषां धर्मं प्रवक्ष्यामि श्रुतिस्मृत्यर्थचोदितम् ।येन सम्यक्कृतेनैव सर्वे यान्ति परां गतिम्

teṣāṃ dharmaṃ pravakṣyāmi śrutismṛtyarthacoditam / yena samyakkṛtenaiva sarve yānti parāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

सब टेढ़े होते हैं, वे चलते समय भी टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलते हैं, सबंदा टेढ़े बने रहते हैं, इच्छानुसार स्वरूप घारण करते हैं तथा वक्रगामी हैं।२६६। नितुन्दक नामक पिलज्ञाच लंबे पेटवाले, ऊँची उठी हुई नासिकावाले, छोटे शरीर वाले शिर और छोटे हाथवाले, तिल भक्षण करनेवाले तथा सुन्दर कानवाले हैं। अनक॑ मर्क (7) नामक पिशाच गण बौने के समान आक्ृतिवाले, बहुत बोलनेवाले, उछल-उछल कर चलनेवाले, वर्षों पर निवास करने, तथा बुक्षों पर आहार पसन्द करनेवाले हैं। पांशु कहे जानेवालें विशाचगण ऊषध्वें बाहुधारी होते हैं, उनके रोम ऊपर की ओर उठे हुए रहते हैं, उनके आवास स्थान भी ऊपर की ओर उढे हुये होते हैं, वे अपने अंगों से धूल गरिराये चलते हैं। उपवीर नामक पिशाचगण अपनी धमनियों को जाननेवाले, सूखे हुए, मूछ दाढ़ी रखे हुये, चीर घारणकरनेवाले तथा इमशानों में निवास करनेवाले होते

English

He made Himavan the ruler of mountains; ocean, of the rivers; and Citraratha the ruler of Gandharvas.

अध्याय १२२

श्लोक 9

गतिर्ध्यानं विना भक्तैर् ब्राह्मणैः प्राप्यते नृप ।अध्यापयन्यतो वेदान्वेदं वापि यथाविधि

gatirdhyānaṃ vinā bhaktair brāhmaṇaiḥ prāpyate nṛpa / adhyāpayanyato vedānvedaṃ vāpi yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

हैं। उलूखल नामक पिशाचगरण निश्चल आँखों वाले, लंबी जीभवाले, सवंदा जीभ से होंठ चाटनेवाले, हाथी भौर ऊंट की तरह मोटे शिरवाले, विरत तथा समूह बाँधकर चलनेवाले होते हैं ॥३७०-२७४। वे कुम्मपात्र नाम से विख्यात पिशाच हैं, जो बिना देखे हुये अन्न का भोजन करते हैं ये बहुत सूक्ष्म आकृतिवाले, सारे शरीर पर रोमावली युक्त, पीलेवर्ण तथा कहीं पर दिखाई पड़नेवाले और क हीं पर न दिखाई पड़नेवाले होते हैं । वे

English

He crowned Uccaissravas as the king of horses, tiger as the king of deer and cows, and bulls the lords of quadrupeds.

अध्याय १२२

श्लोक 10

कुलजां रूपसम्पन्नां सर्वलक्षणलक्षिताम् ।उद्वाहयेत्ततः पत्नीं गुरुणानुमते तदा

kulajāṃ rūpasampannāṃ sarvalakṣaṇalakṣitām / udvāhayettataḥ patnīṃ guruṇānumate tadā

हिन्दी अर्थ

निपुण नामक पिशाचगण हैं, जो इस भूलोंक में अकेले पाने पर मनुष्यों में आविष्ट होते हैं, उनके मुख कानों आयुक्तांश्च विशन्‍्तीह निपुणास्ते पिशाचकाः । आकर्णदारितास्थाश्च लम्बश्रूस्थुलनासिकाः

English

He made Garufla the most excellent among flying be¬ ings, the lord of all birds. He made Maruta the lord of scents and unembodied beings.

अध्याय १२२

श्लोक 11

ततः स्मार्तं विवाहाग्निं श्रौतं वा पूजयेत् क्रमात् ।प्रतिग्रहधनो भूत्वा दम्भलोभविवर्जितः

tataḥ smārtaṃ vivāhāgniṃ śrautaṃ vā pūjayet kramāt / pratigrahadhano bhūtvā dambhalobhavivarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

शन्यागा राश्षयाः स्थलाः पिशाचा: पुरणास्तु ते । हस्तपादाक्वान्तगणा ह्ृस्वका: क्षितिदृष्टयः ॥ बालादास्ते पिशाचा वे सुतिकागृहसेविनः

English

He made Vayu, the most excellent among strong be¬ ings, the lord of sound, sky and strength. He made Sesa, the lord of allfanged (reptiles), and Vasuki the lord of serpents.

अध्याय १२२

श्लोक 12

पञ्चयज्ञविधानानि कारयेद्वै यथाविधि ।वनं गच्छेत् ततः पश्चाद्द्वितीयाश्रमसेवनात्

pañcayajñavidhānāni kārayedvai yathāvidhi / vanaṃ gacchet tataḥ paścāddvitīyāśramasevanāt

हिन्दी अर्थ

पृष्ठतःपाणिपादाश्च हस्वका वातरंहसः । पिशितादाः पिशाचास्ते सइप्रामे रुघिराशिन: ७२७८ नग्नका ह्यनिकेताश्च लम्बकेशाश्च पिण्डकाः । पिशाचा: स्कन्दिनस्ते वे अन्या उच्छेषणाशिनः ७ घोडश जातयस्तेषां पिशाचानां प्रकीतिताः (२७६ एवंविधान्विशाचांस्तु दीनान्दुष्ट्वाइनुकम्पया । तेभ्यो ब्रह्मा बरं प्राद्मत्कारुण्यादल्पचेतस: ॥ अन्तर्धानं प्रजास्तेषां कामरूपत्वमेव च ११२८०

English

He made Taksaka, the lord of vipers, serpents and reptiles. He crowned Parjanya, one of the Adityas, as the lord of oceans, rivers, clouds and rains.

अध्याय १२२

श्लोक 13

पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य सर्वसङ्गविवर्जितः ।इष्टांल्लोकानवाप्नोति न चेह जायते पुनः

putreṣu bhāryāṃ nikṣipya sarvasaṅgavivarjitaḥ / iṣṭāṃllokānavāpnoti na ceha jāyate punaḥ

हिन्दी अर्थ

विध्वस्तानि च यानि स्युरनाचारोषितानि च। असंस्पृष्टोपलिप्तानि संस्कारबंजितानि च॒

English

He crowned Kamadeva the king of all groups of Apsaras-s.

अध्याय १२२

श्लोक 14

क्षत्रियस्तु स्थितो राज्ये पालयित्वा वसुंधराम् ।शश्वद्धर्ममनाश्चैव प्राप्नोति परमां गतिम्

kṣatriyastu sthito rājye pālayitvā vasuṃdharām / śaśvaddharmamanāścaiva prāpnoti paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

राजमार्गोपरथ्याश्च निष्कुटाश्चत्वराणि च। द्वाराण्यट्रालकाश्चेव निमंमान्संक्रमांततथा. तक फले हुये रहते हैं, भौंहे लंबी होती हैं, और नाक मोदी होती हैं। वे पुरण नामक-पिश्ाचगण हैं, जो शु्य भवनों में निवास करते हैं, उनके शरीर होते हैं, उनके हाथ और पर बहुत छोटे-छोटे होते हैं और भांख पृथ्वी १र लगी रहती हैं, ये पिशाचगण बालकों का भक्षण करनेवाले हैं और सबंदा सूतिका गृहो का संवन करते हैं ।१७५-२७७. मांस भक्षण करनेवाले पिशाचों के द्वाथ और पर पीछे की ओर होते हैं, कद के छोटे होते

English

Verses 1-20 enumerate the heads of different categories of creation. Here one is reminded of the Vibhutiyoga (BG.X).

अध्याय १२२

श्लोक 15

वैश्यधर्मो न सन्देहः कृषिगोरक्षणे रतः ।सत्यशौचसमोपेतो गच्छते स्वर्गमुत्तमम्

vaiśyadharmo na sandehaḥ kṛṣigorakṣaṇe rataḥ / satyaśaucasamopeto gacchate svargamuttamam

हिन्दी अर्थ

है, वायु के समान वेगवान् होते है, ये संग्राम भूमि में जाकर रक्त का आहार करते हैं। स्कन्दी कहे जानेवाले पिशाचगण नग्न रहते हैं, उनके रहने का कोई नियत स्थान नहीं रहता, केश लंबे होते हैं, पिण्डाकार दिखाई पड़ते हैं, इनके अतिरिक्त अन्य पिशाचगण उच्छेषणाशी (जूठा खानेवाले) होते हैं। इन पिश्ञाचों की सोलह (?) जातियों का वर्णन किया जा चुका ।२७८-२७६। इस प्रकार अपनी प्रजाओं में विभिन्न आकृति एवं गुण

English

The Prajapati crowned Sudhaman, the famous son of Rajas, as the king in the eastern quarter.

अध्याय १२२

श्लोक 16

न शूद्रस्य पृथग्धर्मो विहितः परमेष्ठिना ।न मन्त्रो न च संस्कारो न विद्यापरिसेवनम्

na śūdrasya pṛthagdharmo vihitaḥ parameṣṭhinā / na mantro na ca saṃskāro na vidyāparisevanam

हिन्दी अर्थ

दोषवाले इन पिश्माचों को अल्पबुद्धियुक्त एवं दीन अवस्था में देख ब्रह्मा ने अनुग्रपृवंक भर्न्तघान होने, तथा इच्छानुसार विविध स्वरूप घारण करने का वरदान दिया। ये पिशाचगण दोनों सन्ध्याओों (प्रातः: एवं सायमृ) के अवसर पर विचरण करते हैं, उनकी जीविका एवं रहने के स्थानों को बतला रहा हूँ। जो भवन टूटे फूटे रहते हैं, थोड़े आदमी निवास करते हैं, विध्वस्त हो जाते हैं, अत्याचारों समेत निवास किया जाता है, असंस्क्ृत अथवा विना लिपे पुते रहते हैं, स्पर्श नहीं किये जाते उनमें ये निवास करते हैं ।२८००२८२॥ इसके अतिरिक्त

English

In the western quarter, he crowned the noble-souled Ketuman, the unerring son of Rajas, the king.

अध्याय १२२

श्लोक 17

न शब्दविद्यासमयो देवताभ्यर्चनानि च ।यथा जातेन सततं वर्तितव्यमहर्निशम्

na śabdavidyāsamayo devatābhyarcanāni ca / yathā jātena satataṃ vartitavyamaharniśam

हिन्दी अर्थ

राजमार्ग, (सड़क) ग़लियाँ घर के समीप के उपवन, चबूतरे या भोराहे, द्वारदेश निर्मम अट्टालक, एकास्त

English

He made Vaivasvata Manu the lord of human beings. The entire earth consisting of seven continents along with the towns therein, is being ruled righteously by them in their res¬ pective areas.

अध्याय १२२

श्लोक 18

स धर्मः सर्ववर्णानां पुरा सृष्टः स्वयम्भुवा ।मन्त्रसंस्कारसम्पन्नास्त्रयो वर्णा द्विजातयः

sa dharmaḥ sarvavarṇānāṃ purā sṛṣṭaḥ svayambhuvā / mantrasaṃskārasampannāstrayo varṇā dvijātayaḥ

हिन्दी अर्थ

इदमर्ध नास्ति क, पुस्तके । अधामिका जनास्ते वे आजीबा विहिताः सुरे: । यर्णाश्रमा: संकरिका: कारुशिल्पिजनास्तथा

English

They had been crowned formerly by Brahma in the Svayambhuva Manvantara. Only those who become Manu are consecrated as kings.

अध्याय १२२

श्लोक 19

तेषां मतमनादृत्य यदि वर्तेत कामतः ।स मृतो जायते श्वा वै गतिरूर्ध्वा न विद्यते

teṣāṃ matamanādṛtya yadi varteta kāmataḥ / sa mṛto jāyate śvā vai gatirūrdhvā na vidyate

हिन्दी अर्थ

आरभत्ते क्रिया यास्तु पिशाचास्तन्न देवता: रद

English

In the Manvantaras that have passed, these kings (had ruled and) passed away. When the Manvantaras occur again, others will be crowned again. All the kings, past and future, are proclaimed as Lords of Manvantaras.

अध्याय १२२

श्लोक 20

न तेषां प्रेषणं नित्यं तेषां मतमनुस्मरन् ।यशोभागी स्वधर्मस्थः स्वर्गभागी स जायते

na teṣāṃ preṣaṇaṃ nityaṃ teṣāṃ matamanusmaran / yaśobhāgī svadharmasthaḥ svargabhāgī sa jāyate

हिन्दी अर्थ

पिशाचानामनुज्ञाय ब्रह्म सोषधिपतिदंदौ २८८ द्विपिनश्च सुतास्तस्य व्यालेयाश्वाउइइमसिषाशिनः । ऋषायाश्चापि कात्स्न्येन प्रजासगं निबोधत ।।

English

Prthu was crowned by these excellent men at the time of Rajasuya. The valorous king was made so in accordance with the injunctions of the Vedas.

अध्याय १२२

श्लोक 21

एवं गुणगणाकीर्णो ऽवसद्विप्रः स भारत ।हनस्वेति हनस्वेति शृणोति वाक्यमीदृशम्

evaṃ guṇagaṇākīrṇo 'vasadvipraḥ sa bhārata / hanasveti hanasveti śṛṇoti vākyamīdṛśam

हिन्दी अर्थ

तस्य दुहितरः पतन्च तासां नामानि से शणु

English

The lord of Prajas, Kasyapa, procreated these sons, for the purpose of the continuity of the progeny. Thereafter, desirous of his own lineage, he performed a severe penance. He contemplated—"May sons, the founders of the lineage, be born to me".

अध्याय १२२

श्लोक 22

ततो निरीक्षते चोर्ध्वम् अधश्चैव दिशो दश ।वेपमानः स भीतश्च प्रस्खलंश्च पदे पदे

tato nirīkṣate cordhvam adhaścaiva diśo daśa / vepamānaḥ sa bhītaśca praskhalaṃśca pade pade

हिन्दी अर्थ

सहस्रदन्‍्ता मकराः पाठीनास्तिमिरोहिताः । इत्येवमार्दिहि गण मैनो विस्तीणं उच्यते १२९२ आवास, पथ, नदियाँ, तीर्थ, देवी देवताओं के कल्पित निवास वक्ष और महापथ (श्मशान मार्ग) इन स्थानों में सवंत्र पिशाचगण निवास करते हैं । जो अधामिक जन हैं वर्णाश्रम की मर्यादा से वहिभत हैं वर्णसंकर हैं, कारोगरी या शिल्पकर्म करनेवाले हैं देवताओं ने उनको ही इन पिशाचों की आजीविका बनाई है। चोरी, विश्वासघात, अमृत ?) तुल्य जीवों एवं इनके अतिरिक्त अन्यान्य कुत्सित उपायों द्वारा उपाजित घन से नो

English

As Kasyapa, the noble soul, contemplated, two power¬ ful sons born of Brahma's part were born to him.

अध्याय १२२

श्लोक 23

शृङ्खलायुधहस्तैश्च पाशैश्चैव सुदारुणैः ।वेष्टितं महिषारूढं नरं पश्यति मन्मुखम्

śṛṅkhalāyudhahastaiśca pāśaiścaiva sudāruṇaiḥ / veṣṭitaṃ mahiṣārūḍhaṃ naraṃ paśyati manmukham

हिन्दी अर्थ

क्रियाएं सम्पन्न की जाती हैं, उनमें देवुता पिज्ञाच होते हैं ।२८३-२८६। मधु, मांस, भात, दही. तिलचण, मदिरा, आसव, धूप, हरिद्रा, खिचड़ी तेल, मोधा. गुण और भात (एक में) काले वस्त्र, क्षप और पृष्प--इन सब सामग्रियों समेत पर्वों की सधियों के अवसर पर पिशाचों की बलि देनी चाहिए । ऐसौ आज्ञा ब्रद्मा ने उन पिशाचों को दी ओर शझूलपाणि महेश्बर को उन सभी भूतों एवम् पिशाचों का स्वामी नियत

English

They were Vatsara and Asita. Both of them were pro¬ pounders of Brahman. Nidhruva and Raibhya of great fame were born of Vatsara.

अध्याय १२२

श्लोक 24

कृष्णांजनचयप्रख्यं कृष्णाम्बरविभूषितम् ।रक्ताक्षमायतभुजं सर्वलक्षणलक्षितम्

kṛṣṇāṃjanacayaprakhyaṃ kṛṣṇāmbaravibhūṣitam / raktākṣamāyatabhujaṃ sarvalakṣaṇalakṣitam

हिन्दी अर्थ

किया ।२८७-२८७। सुन्दरी दंष्ट्रा ने व्याप्नों और सिहों को पुत्रहूप में उत्पन्न किया । इनके अतिरिक्त चीते, अन्य प्रकार के बाध और शेर तथा अन्य न्य मांसभक्षी वन्य पशुओं को उसने उत्पन्न किया । अब इसके उपरान्त ऋषा की सम्पूर्ण प्रजाओं का विस्तार क्रम सुनिये । उसकौ पाँच कन्याएँ थीं, जिनके नाम मैं बतला रहा हैं, सुनिये । मीना, माता, वृत्ता, परिवत्ता तथा अनुवृत्ता--ये पाँच उनकी कन्याएँ थीं, इसके पृत्रादिकों का वर्णन सुनिये सहस्न दाँतवाले मकर, पाठीन (जलजन्तु) तिमि, (मछली विशेष) रोहित, (रोह)--ये सब मीवनों के भेद मीना की सस्तानों में कहे गये हैं ।२०६-२६२। इसके अतिरिक्त छोटे और बड़े, चार प्रकार के ग्राह, निष्क

English

The Raibhyas should be known as the (descendants) of Raibhya. Understand (those) of Nidhruva. Gyavana begot Sumcdhas of Sukanya.

अध्याय १२२

श्लोक 25

दृष्ट्वा तं तु समायान्तं निरीक्ष्यात्मानमात्मना ।जपञ्जाप्यं च परमं शतरुद्रीयसंस्तवम्

dṛṣṭvā taṃ tu samāyāntaṃ nirīkṣyātmānamātmanā / japañjāpyaṃ ca paramaṃ śatarudrīyasaṃstavam

हिन्दी अर्थ

प्राह्श्वतुविधा ज्ञेया तथाइनुज्येष्ठका अपि । निष्कांश्च शिशुमारांश्व मीना व्यजनयत्प्रजा:

English

Nidhruva's wife 1 was the mother of Kundapayins. Brahniistha (Devala in Bd.P.) was born of Ekaparna and Asita.

अध्याय १२२

श्लोक 26

ततः प्रोवाच भगवान्यमः संयमनो महान् ।शृणु वाक्यमतो ब्रह्मन्यमो ऽहं सर्वजन्तुषु

tataḥ provāca bhagavānyamaḥ saṃyamano mahān / śṛṇu vākyamato brahmanyamo 'haṃ sarvajantuṣu

हिन्दी अर्थ

वृत्ता कूमंविकाराणि नेकानि जलचारिणाम् । तथा शद्भुविकाराणि जनयामास नेकशः (२६४ गण्डूकानां विकाराणि अनुवृत्ता व्यजायत । ऐणेयानां बिकाराणि शस्बूकानां तथंव च २६५ तथा शुक्तिविकाराणि वराटककृतानि च ॥ तथा शद्भूविकाराणि परिवत्ता व्यजायत कालक्टविकाराणि जलौकविहितानि च। इत्येष हि ऋषेबंशः पत्च शाखाः प्रकीतिता: २६७ तियंग्घेतुकमाद्याहुबहुलं (? ) वंशविस्तरम् । संस्वेदजविकाराणि यथा येभ्यो भवन्ति ह २९८

English

On hearing (i.e. paying heed to) the words of Sandilya, Devala became excessively famous. Nidhruvas, Sandilyas and Raibhyas all these three formed the Kas- yapa Gotra later 2.

अध्याय १२२

श्लोक 27

संहरस्व महाभाग रुद्रजाप्यं सुदुर्भिदम् ।येनाहं कालपाशैस्त्वां संयमामि गतव्यथः

saṃharasva mahābhāga rudrajāpyaṃ sudurbhidam / yenāhaṃ kālapāśaistvāṃ saṃyamāmi gatavyathaḥ

हिन्दी अर्थ

स्वस्तिपिकशरीरेम्यो जायन्त्युत्पादका द्विजा:। मनुष्या: स्वेदमलजा उशना नाम जन्तवः

English

Vara (Vajri i.e. Indra in Bd. P.) and other Devas are the progeny of Devala. These subjects function in Dvapara Yuga that remains (i.e. occurs) after eleven cycles of the sets of four Yugas have passed.

अध्याय १२२

श्लोक 28

तच्छ्रुत्वा निष्ठुरं वाक्यं यमस्य मुखनिर्गतम् ।महाभयसमोपेतो ब्राह्मणः प्रपलायितः

tacchrutvā niṣṭhuraṃ vākyaṃ yamasya mukhanirgatam / mahābhayasamopeto brāhmaṇaḥ prapalāyitaḥ

हिन्दी अर्थ

+ तथा शिरसि चेले व यूकाः संस्वेदजा: स्मृता: । चन्द्रादित्याग्नितप्तायां पृश्चिव्यां संभवन्ति ये॥ तृणमेधप्रसिक्ताया: स्मता: संस्वेदजन्तव: । नानापिपीलिकगणाः कीटका बद्धपादका: ॥३० १ शबद्भगेपलविकाराणि कीलकाचारकाणि च । इत्येबमादिबहुलाः स्वेदजा: पाथिवा गणा:. और शिशुमार--इन सबको मीना (माता) ने उत्पन्न किया । बत्ता ने जल में विचरण करनेवाले सभी प्रकार के कच्छपों (कछओं) को तथा सभी प्रकार के शंखों को अगणित संख्या में उत्पन्न किया । अनुवृत्ता ने मेढ़कों के सभी भेदों एवं उपभेदों को तथा ऐणेय (१) और सम्बूक़ (घोधां) के सभी भेदोपभेदों को उत्पन्न किया । परिवृत्ता ने शुक्ति (सुतुही), वराठिका (कौड़ी) तथा शह्भु के सभी भेदोपभेद को उत्पन्न किया इनके अतिरिक्त

English

Carisyanta (Nairisyanta in Bd. P.) was the son of Manasa and his son was Dama. Manasa who was well-known as Tfnabindu, was his heir and successor.

अध्याय १२२

श्लोक 29

तस्य मार्गे गताः सर्वे यमेन सह किंकराः ।तिष्ठ तिष्ठेति तं विप्रमूचुस्ते सो ऽप्यधावत

tasya mārge gatāḥ sarve yamena saha kiṃkarāḥ / tiṣṭha tiṣṭheti taṃ vipramūcuste so 'pyadhāvata

हिन्दी अर्थ

कालकूट ओर जलौका (जोक) के सभी भेदों को भी उसने उत्पन्न किया / यह क्ूषि के बंश का वर्णन किया जा चुका, जिसकी उपर्युक्त पाँच शाखायें कही गई हैं । इन निरथेक योनि में उत्पन्न होनेवाले जन्तुओं का वंश विस्तार बहुत कहा जाता है स्वेद से उत्पन्न होनेवाले जीवों के भेदोपभेदों को चर्चा कर रहा हूँ, जो जिनके स्वेद से जिस प्रकार उत्पन्न होते हैं है द्विजगण ! इन स्वेदज जस्तुओं के उत्पादक मनुष्य हैं ये स्वेदज जन्तु

English

In the beginning of the third Treta Yuga, he became the king. His daughter Idavida was unrivalled in her beauty. The saintly king gave her to Pulastya.

अध्याय १२२

श्लोक 30

त्वरमाणः परिश्रान्तो हा हतो ऽहं दुरात्मभिः ।रक्ष रक्ष महादेव शरणागतवत्सल

tvaramāṇaḥ pariśrānto hā hato 'haṃ durātmabhiḥ / rakṣa rakṣa mahādeva śaraṇāgatavatsala

हिन्दी अर्थ

स्वस्तिपिक (?) शरीरों से उत्पन्न होते हैं। स्वेद और मल से उत्पन्न होनेवाले जन्तुगण उशना नाम से प्रसिद्ध हैं ।२६८-२६६। शिर के बालों में तथा वस्त्र में स्वेद से उत्पन्न होनेवाले जन्तु यूका नाम से स्मरण किये जाते हैं । चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि से तपी हुई पृथ्वी में जो जन्तु उत्पन्न होते हैं, बादलों की वृष्टि से भीगे हुए तृथों में जो जन्तु उत्पन्न होते हैं, वे स्वेदज जन्तु कहे जाते हैं। विविध प्रकार के चींटीं जाति के जन्तु एवं कीट, जो श्रेणी बद्ध होकर चलते हैं, शंख और रत्नों के विविध प्रकार के जीव एवं कील का चारक (?) तथा इनके अतिरिक्त अन्यान्य बहुतेरे जन्तु पाथिव (पृथ्वी के) स्वेदज कहे जाते हैं ।३००-३०२। धाम (धूप) आदि से तपे हुए

English

The sage Visravas was born of Idavida. He had four wives who made the family of Pulastya flourish.

अध्याय १२२

श्लोक 31

एवमुक्त्वापतद्भूमौ लिङ्गमालिङ्ग्य भारत ।गतसत्त्वः स विप्रेन्द्रः समाश्रित्य सुरेश्वरम्

evamuktvāpatadbhūmau liṅgamāliṅgya bhārata / gatasattvaḥ sa viprendraḥ samāśritya sureśvaram

हिन्दी अर्थ

१. आनन्दाश्रम की श्रति में मीना पाठ यहाँ पर भी है, जो अशुद्ध प्रतीत होता है, क्योंकि पाँचों कन्याओं में मोना के बाद माता का नाम आता है।

English

Brhaspati, the preceptor of the Devas, had a famous daughter named Devavarnini. He (Visravas) married that girl.

अध्याय १२२

श्लोक 32

तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ देवदेवो महेश्वरः ।को हनिष्यति माभैस्त्वं हुङ्कारमकरोत्तदा

taṃ dṛṣṭvā patitaṃ bhūmau devadevo maheśvaraḥ / ko haniṣyati mābhaistvaṃ huṅkāramakarottadā

हिन्दी अर्थ

ध्रेप् वायुपुराणम तथा घर्मादितप्ताभ्यस्त्वद्भ्यों वृष्टिभ्य एवं च। नका मृगशरीरेभ्यो जायन्ते जन्तवस्त्विसि

English

He (Visravas) married Puspotkata and Vaka, the daughters of Malyavan as well as Kaikasi, the daughter of Malin. Listen to their progeny.

अध्याय १२२

श्लोक 33

तेन ते किंकराः सर्वे यमेन सह भारत ।हुङ्कारेण गताः सर्वे मेघा वातहता यथा

tena te kiṃkarāḥ sarve yamena saha bhārata / huṅkāreṇa gatāḥ sarve meghā vātahatā yathā

हिन्दी अर्थ

मीनकाः पिप्पला दंशास्तथा तित्तिरपुत्रिका: नीलचित्राश्च जायन्ते ह्ालका बहुविस्तराः

English

Devavarnini gave birth to his eldest son Vaisravana who had divine fate and saintly learning, (but) had the form of a Raksasa and the strength of an Asura.

अध्याय १२२

श्लोक 34

तदाप्रभृति तत्तीर्थं कोहनस्वेति विश्रुतम् ।सर्वपापहरं पुण्यं सर्वतीर्थेष्वनुत्तमम्

tadāprabhṛti tattīrthaṃ kohanasveti viśrutam / sarvapāpaharaṃ puṇyaṃ sarvatīrtheṣvanuttamam

हिन्दी अर्थ

जलजा: स्वेदजाश्चेच जायन्ते जन्तवस्त्विमि । काशतोयथ्ज (ज )काः कीटानलदा बषुपादका: ॥ सिहला रोमलाश्चव पिच्छला: परिकीतिता: । इत्येबमादिहि गणो जलज:ः स्वेदजः स्पृत:..

English

He had three feet, a huge body, stout head, a large chin 3, eight fangs, green moustache, pike-like ears and red com¬ plexion. His arms were short and long (i.e. one short, one long). He was yellowish in colour (?) and very terrible to look at. He had the knowledge of the illusory world. He was enlight¬ ened with knowledge.

अध्याय १२२

श्लोक 35

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत् परमेश्वरम् ।अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलमाप्नोत्यनुत्तमम्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram / agniṣṭomasya yajñasya phalamāpnotyanuttamam

हिन्दी अर्थ

मुद्गेम्य पनसेम्यश्च तण्डुलेस्यस्तथेव च । तथा कोटरशुष्केभ्यो निहितेभ्यो भवन्ति हि ३०८ अन्येभ्योषपि च जायन्ते न हि तेभ्यश्चिरं सदा । जन्तवस्तुरगादिभ्यो विषादिभ्यस्तथव च

English

Sumcdhas as per Bd. P. iMn in the text is a tautology. It should be maM-hanum as in

अध्याय १२२

श्लोक 36

तत्र तीर्थे तु राजेन्द्र प्राणत्यागं करोति यः ।न पश्यति यमं देवमित्येवं शङ्करो ऽब्रवीत्

tatra tīrthe tu rājendra prāṇatyāgaṃ karoti yaḥ / na paśyati yamaṃ devamityevaṃ śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

बहुन्यहानि निश्षिप्ते संभवन्ति च गोमये । जायन्ते कृमये विप्रा: काष्ठेभ्यश्च घुणादय: ३१० क़मा द्रुमाणां जायन्ते विविधा नीलसक्षिकाः। तथा शुष्कविकारेम्यः पुत्रिकाः प्रभवन्ति च

English

On seeing such a son assuming a cosmic form, the father himself said—"This is Kubera (ugly-bodied one) ". 1

अध्याय १२२

श्लोक 37

अग्निप्रवेशं यः कुर्याज्जले वा नृपसत्तम ।अग्निलोके वसेत् तावद् यावत् कल्पशतत्रयम्

agnipraveśaṃ yaḥ kuryājjale vā nṛpasattama / agniloke vaset tāvad yāvat kalpaśatatrayam

हिन्दी अर्थ

कालिका शतिकेभ्यश्च सर्पा जाथन्ति सर्वशः। संस्वेदजाश्च जायन्ते वृश्चिकाः शुष्कगोमयात्

English

The word 'Ku' is used to indicate contempt. The body is mentioned by the word Bera. Hence he is called Kubera be¬ cause his body was deformed. Since he was the child of Visravas and he appeared like Visravas, he will be known in the world by the name Vaisravana.

अध्याय १२२

श्लोक 38

एवं वरुणलोके ऽपि वसित्वा कालमीप्सितम् ।इह लोकमनुप्राप्तो महाधनपतिर्भवेत्

evaṃ varuṇaloke 'pi vasitvā kālamīpsitam / iha lokamanuprāpto mahādhanapatirbhavet

हिन्दी अर्थ

जल से वृष्टि से तथा प्रुगों (पशुओं) के शरीरों से ये अनेक जन्तु उत्पन्न होते हैं।मीनक, पिप्पल, दश (डंसे) तित्तिरपुत्रक, नीलचित्र, अलर्क--प्रभृति जन्तुओं की संख्या बहुत अधिक है ।य जन्‍्तु जलज एवं स्वेदज कहे जाते हैं। ये जलज ओर स्वेदज जच्तु काशतोयअझजक (?) तलद, बहुपादक, सिहल, रोमल, पिच्छल आदि नामों से पुकारे जाते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य बहुतेरे भी हैं। घृत से, उड़द से, मूंग से भी ये जन्तु उत्पन्न होते हैं । इसी प्रकार बेल, जामुन, आम, सुपारी आदि फलों से भी ये जन्तु उत्पन्न होते हैं। मूंग, कटहल चाबल, सूखे वक्षों के कोटर एवं बहुत दिनों की रखी हुई वस्तुओं से भी ये कीट उत्पन्न होते हैं ।॥०३-३०८। इनक भतिरिक्त अन्य बहुत पदार्थों से इन कीटों की उत्पत्ति होती है; किन्तु उनसे सबंदा चिरकाल तक नहों उत्पन्न होते हैं । घोड़े आदि पशुओं तथा विष आदि पदार्थों से भी ये क्षुद्र जन्तु उत्पन्न होते हैं। बहुत दिनों से रखे

English

Kubera begot of Rddhi the famous (son) Nalakubara. Kaikasi gave birth to four children Ravana, Kumbhakarna and Vibhlsana (the three sons and) a daughter Surpanakha.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 122
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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