अध्याय १२७
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे अयोनिप्रभवतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षड्विंशत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १२७ मार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र अग्नितीर्थमनुत्तमम् ।तत्र स्नात्वा तु पक्षादौ मुच्यते सर्वकिल्बिषैः
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe ayoniprabhavatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaḍviṃśatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 127 mārkaṇḍeya uvāca: tato gacchet tu rājendra agnitīrthamanuttamam / tatra snātvā tu pakṣādau mucyate sarvakilbiṣaiḥ
हिन्दी अर्थ
यथार्थंतः बलवान थी, सत्य बुद्धि था, शरीर दुढ़ था, सबंदा राक्षसों से ही युक्त रहता था, स्वभाव से ही वह परम दारुण, एवं क्र था, बहुत जोर से रव (शब्द) करने के कारण वह रावण नाम से विख्यात था पूर्व जन्म में वह हिरण्यकशिपु नाम से देत्यों का राजा था वह राक्षसराज चारों युगों तक राज्य करता रहा भोर राक्षसों के राजाओं में बह तेरहवाँ था (?) उसके राज्य काल की अवधि संख्या जाननेवाले पण्डितों ने पाँच करोड़ इकसठ नियत (?) बतलाया है। साठ लाख वर्षों तक वह रावण देवताओं और ऋषियों
English
"Who are these Pitrs? What are their names? How were they born? How did they attain Pitr-hood?