Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
129
अध्याय 129 / 232

Adhyaya 129

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अध्याय १२९

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे भृकुटेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टाविंशत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १२९ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन् महीपाल ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम् ।अन्येषां चैव तीर्थानां परात्परतरं महत्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe bhṛkuṭeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmāṣṭāviṃśatyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 129 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchen mahīpāla brahmatīrthamanuttamam / anyeṣāṃ caiva tīrthānāṃ parātparataraṃ mahat

हिन्दी अर्थ

जीव निकाय उत्पन्न हुये--वे सब पुलह की सन्‍्तति हैं। उस वेवस्वत मन्वन्तर में महर्षि क्रतु को ही कोई संतति नहीं थी ।न तो कोई पुत्र था, न पोन्न अपने तेज (बल ब्रह्मचयं) को समेट कर वे अपने आप में अवस्थित थे, भर्थात् नेष्ठिक ब्रह्मचारी थे ।६४-६६। अब तृतीय प्रजापति अन्रि के बंश का वर्णन कर रहा हूँ। उनकी + एतदधंस्थाने3पाठ:--प्रायोवल्योयः परिक्रास्तों मयाक्रोश वज्यान्वय इति ख. ग. घ. हू पुस्तकेषु ।

English

The worlds, the heaven are named * Santanikas * where the shining deities of the Devas well-known as 'Vairajas* stay.

अध्याय १२९

श्लोक 2

तत्र तीर्थे सुरश्रेष्ठो ब्रह्मा लोकपितामहः ।चतुर्णामपि वर्णानां नर्मदातटमाश्रितः

tatra tīrthe suraśreṣṭho brahmā lokapitāmahaḥ / caturṇāmapi varṇānāṃ narmadātaṭamāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

आत्रेयवं शक्रत्तासां भर्ता नाम्ता प्रभाकर: । भद्रायां जनपामास सोम पुत्र यशस्विनम्

English

Even at the outset then, the lord Brahma, endowed with Yoga and penance, had created Devas after practising the eternal Yoga.

अध्याय १२९

श्लोक 3

वाचिकं मानसं पापं कर्मजं यत्पुराकृतम् ।तत्क्षालयति देवेशो दर्शनाद् एव पातकम्

vācikaṃ mānasaṃ pāpaṃ karmajaṃ yatpurākṛtam / tatkṣālayati deveśo darśanād eva pātakam

हिन्दी अर्थ

स्वभत्रिना हते सुर्ये पतमाने दिवो महीम् । तमोभिभृुते लोके5स्मिन्प्रभा येन प्रवरतिता १७१ स्वस्ति ते5स्त्विति चोक्तः स पतन्निह दिवाकरः ब्रह्मषेंबंचनात्तस्य न पपात दिवो महीम् १७२ अन्निश्रेष्ठानि गोत्राणि यश्चथकार महातपाः । यज्ञेव्वत्रिघनश्चेव सुरयंश्व प्रवतितः (? ) ७३ सता स्वजनयत्पुत्रानात्मतुल्याननामकान् । दश तास्वेब महता तपसा भावितप्रभाः स्वस्त्यात्रया इति रख्याता ऋषयो वेदपारगाः । तेषां विख्यातयशसो ब्रह्मिष्ठों सुमहोजसौ १७५ दत्तात्रेयस्तस्य ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुज: यवीयसी सुता तस्यामबला ब्रह्मवादिनी ॥॥

English

They are well known as Adidevas (the primordial Devas). They have great splendour and energy. They are the bestowers of all desires. They are worthy of being worshipped by Devas, Danavas and human beings.

अध्याय १२९

श्लोक 4

श्रुतिस्मृत्युदितान्येव तत्र स्नात्वा द्विजर्षभाः ।प्रायश्चित्तानि कुर्वन्ति तेषां वासस्त्रिविष्टपे

śrutismṛtyuditānyeva tatra snātvā dvijarṣabhāḥ / prāyaścittāni kurvanti teṣāṃ vāsastriviṣṭape

हिन्दी अर्थ

अन्राप्युदाहरन्तीम श्लोक पौराणिका: पुरा

English

There are seven groups of those Devas. They are worshipped by aJl the three worlds. Three of them are Arnurtis (devoid of forms) and four of them have splendid forms.

अध्याय १२९

श्लोक 5

ये पुनः शास्त्रमुत्सृज्य कामलोभप्रपीडिताः ।प्रायश्चित्तं वदिष्यन्ति ते वै निरयगामिनः

ye punaḥ śāstramutsṛjya kāmalobhaprapīḍitāḥ / prāyaścittaṃ vadiṣyanti te vai nirayagāminaḥ

हिन्दी अर्थ

अन्नेः पुत्र महात्मानं शान्तात्मानमकल्मषम् । दत्तात्रेयं तनुं विष्णो: पुराणज्ञाः प्रचक्षते ७७ दस स्त्रियाँ थी, जो सब परम सुन्दरी एवं पतिन्नता थीं। घृताची नामक अप्सरा में भद्राश्व को दस सन्ततियाँ उत्पन्न हुई । जिनके नाम थे, भद्वा, सूद्रा, अलदा, सलदा बेला, खला-ये सात तथा आठवीं गोचपला के नाम से विख्यात हुई। मानरसा नवीं और रत्नकूटा द।वीं सन्‍्तति थी। इन सब्रों का स्वामी एवं अत्रि के वंश में उत्पन्न होनेवालों का गोत्रकर्ता प्रभाकर नाम से विख्यात था, उसने भद्गा में परम यशस्वी पुत्र सोम को उत्पन्न

English

The three sets which have conceptual forms (Bkava murlis) are stationed above. The four Suksmamurlis (having subtle forms) are stationed beneath them.

अध्याय १२९

श्लोक 6

स्नात्वादौ पातकी ब्रह्मन्नत्वा तु कीर्तयेद् अघम् ।तस्य तन्नश्यते क्षिप्रं तमः सूर्योदये यथा

snātvādau pātakī brahmannatvā tu kīrtayed agham / tasya tannaśyate kṣipraṃ tamaḥ sūryodaye yathā

हिन्दी अर्थ

किया ।६७ ७०। एकबार राहु द्वारा आहत होकर जब सूर्य आकाश से पृथ्वी की ओर गिरने लगे और यह समस्त भूलोक अन्वकार में आच्छन्न हो गया उस समय जिसने प्रकाश दान किया वह यही सोम थे आकाश मण्डल से इस पृथ्वी तल पर गिरते हुये दिवाकर को मह॒षि ने कहा कि तुम्हारा कल्याण हो । उनके इस आशीवंचन से वे आकाश से पृथ्वी पर नहीं गिरे। महातपस्वी अन्नि ने जिन श्रेष्ठ गोत्रों का प्रवत्तंन

English

Thereafter, the (common) Devas are stationed and then the earth. This is the situation of the series of worlds. They (the groups of Devas) are stationed in this world The clouds take their origin from them, rain-showers are due to them and, thanks to rain-showers, the worlds (and people) are created again.

अध्याय १२९

श्लोक 7

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत् पितृदेवताः ।अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य स लभेत् फलमुत्तमम्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet pitṛdevatāḥ / agniṣṭomasya yajñasya sa labhet phalamuttamam

हिन्दी अर्थ

किया, ( उन्हें बता रहा हूँ ) देवताओं द्वारा जो प्रवरतित होना है--ऐसे यक्षों में ? (वे भाग प्राप्त करते हैं ) (?) उन दसों स्त्रियों में उसने अपने ही समान दस पुत्रों को उत्पन्न किया, जिनके नाम नहीं ये । इन दसों स्त्रियों में उत्पन्न होनेवाले वे दस पुत्र गण अपनी महान् तपस्या के कारण परम कान्तिमान् थे, वेदों के पारगामी विद्वान थे, कल्याण दायी, भत्रि वंशोत्त्पन्न ऋषियों के रूप में विख्यात थे । उनके परम विख्यात यशस्वी, ब्रह्मवादी, महातैजस्वी दो पुत्र उत्पन्न हुये, जिनमें ज्येष्ठ दत्तात्रेय थे और दुर्वासा उनके अनुज थे । उसमें एक कनिष्ठ अबला नामक ब्रह्मवादिनी पुत्री थी। प्राचीन काल से पुराणों के जाननेवाले इस गौरव गाथा का गान करते आये हैं कि अत्रि के निष्पाप, शास्तक्षित्त, महात्मा पुत्र दत्तात्रेय भगवान् विष्णु के स्वरूप

English

Since they develop and strengthen the moon and the food-grains and make them flourish by means of Yogic power

अध्याय १२९

श्लोक 8

तत्र तीर्थे तु यद् दानं ब्रह्मोद्दिश्य प्रयच्छति ।तदक्षयफलं सर्वमित्येवं शङ्करो ऽब्रवीत्

tatra tīrthe tu yad dānaṃ brahmoddiśya prayacchati / tadakṣayaphalaṃ sarvamityevaṃ śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

तस्य गोन्रान्वये जाताभ्रत्वार:ः प्रथिता भुवि श्यामाश्व मुदुगलाश्चव बलारकगविष्ठिराः ॥॥

English

They are as speedy as mind. Svadhd constitutes their diet. They have every requisite they desire. They are devoid of greed, delusion and fear. They are certainly devoid of sorrow.

अध्याय १२९

श्लोक 9

गायत्रीसारमात्रो ऽपि तत्र यः क्रियते जपः ।ऋग्यजुःसामसहितः स भवेन्नात्र संशयः

gāyatrīsāramātro 'pi tatra yaḥ kriyate japaḥ / ṛgyajuḥsāmasahitaḥ sa bhavennātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

पुरा देवासुरे तस्मिन्सडग्रामे तारकामये । अनावृष्टया हते लोके व्यग्रे शक्ते सुर: सह ॥। अन्नौषध मुलफलमोषधीश्र प्रवर्तघन् तास्तेन जीवयामास कारुण्यादोषधेन तु

English

After giving up Yoga, they have attained the worlds beautiful and pleasant to look at. They become divine, merit¬ orious and sinless noble souls.

अध्याय १२९

श्लोक 10

तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या त्यजेद्देहं सुदुस्त्यजम् ।अनिवर्तिका गतिस्तस्य ब्रह्मलोकान् न संशयः

tatra tīrthe tu yo bhaktyā tyajeddehaṃ sudustyajam / anivartikā gatistasya brahmalokān na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

काला पराशराज्जज्ञे कृष्णद्वपायनं प्रभम् । दपायनादरण्यां वे शुको जज्ञे गुणान्वितः ॥८ड॑

English

At the end of a thousand Yugas, they become expoun¬ ders of Brahman. Regaining the Yogic power once again., they attain salvation in a bodiless state.

अध्याय १२९

श्लोक 11

यावदस्थीनि तिष्ठन्ति ब्रह्मतीर्थे च देहिनाम् ।तावद् वर्षसहस्राणि देवलोके महीयते

yāvadasthīni tiṣṭhanti brahmatīrthe ca dehinām / tāvad varṣasahasrāṇi devaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

कन्या कीतिमतो चव योगमाता दृढब्ता । जननी ब्रह्मदत्तस्य पत्नी सात्वगुहस्य च 0७४८६ श्वेता: कृष्णाभ्च गौराश्य श्यामा धम्राः समुलिका: ऊष्मपा द्वारकाश्चेव नीलाश्चंव पराशराः ॥ पाराशराणामष्टो ते पक्षा: प्रोक्ता महात्मनाम् क्‍ हैं--ऐसा पुराणज्ञ लोग कहते हैं ।७१-७७। उनके गोत्र में उत्पन्न होनेवाले चार वश पृथ्वी पर विख्याति प्राप्त कर चुके हैं। उनके नाम हैं, श्याम, मुदूगल, बलारक और गविष्ठिर । महान तेजस्वी मनुष्यों के ये चार वंश गोत्र कर्ता हैं। कश्यप से नारद, पर्वत तथा अरुन्धती की उत्पत्ति हुई। है पण्डित गण ! अरुन्धती में उत्पन्न होने वाली सन्‍्ततियों का विवरण सुनिये । नारद ने अरुन्धती को वसिष्ठ को समर्पित किया । नारद महान् तेजस्वी

English

They forsake both the manifestand unmanifest (bodies) by means of their great Yogic power and perish (vanish) like a meteor or like the fading flash of lightning in the sky.

अध्याय १२९

श्लोक 12

अवतीर्णस्ततो लोके ब्रह्मज्ञो जायते कुले ।उत्तमः सर्ववर्णानां देवानामिव देवता

avatīrṇastato loke brahmajño jāyate kule / uttamaḥ sarvavarṇānāṃ devānāmiva devatā

हिन्दी अर्थ

एवं नैष्ठिक ब्रह्मचयं ब्रत परायण थें। प्राचीन काल में दक्ष के शाप के कारण जब देवताओं और अबसुरों में विख्यात तारकामय नामक संग्राम छिड़ा था, और अतावुष्टि के कारण समस्त लोक ध्वस्त हो गया था ओर

English

By abandoning all the bodies (and other adjuncts) by means of their great Yogic power, they attain the state of namelessness like rivers merging into the ocean.

अध्याय १२९

श्लोक 13

विद्यास्थानानि सर्वाणि वेत्ति वेदाङ्गपारगः ।जायते पूजितो लोके राजभिः स न संशयः

vidyāsthānāni sarvāṇi vetti vedāṅgapāragaḥ / jāyate pūjito loke rājabhiḥ sa na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

रक्षा की थी ।७५-८१। उस समय उन्होंने अन्न, औषधि मूल फल, आदि की रचना की, और अति करुणा वश उन्हीं औषधियों द्वारा प्रजाव्ग को जीवित रखा था । द्विजवुन्द ! वसिष्ठ ने अरुन्धती में शक्ति को उत्पन्न किया । अदृश्यन्ती (?) ने शक्ति के संयोग से पराशर को जन्म दिया। काली ने पराशर के संयोग से परम ऐश्वर्ये शाली कृष्ण द्वेपाथन कौ उत्पन्न किया द्वैवायन के संयोग से अरणी में परम गुणवान शुक की उत्पत्ति हुई । पीवरी में शुक के ये छः पुत्र उत्पन्न हुये, भूरिश्रवा, प्रभु, शंभु, कृष्ण और पाँचवें गौर ।५२-८५। कौतिमती नामक कन्या भी उत्पन्न हुई जो योग/भ्यास में सवंदा निरत रहनेवाली तथा दुढ़ब़्त परायण थी। वह ब्रह्मदत्त की माता और सात्त्वगुद् की स्त्री हुई। इवेत, कृष्ण, गौर, द्याम धूम्र समूलिक, ऊष्मपान करनेवाले दारक तथा

English

Engaged everyday in holy rites and the worship of preceptors, Pitrs develop their Yogic power and satisfyall (make them flourish).

अध्याय १२९

श्लोक 14

पुत्रपौत्रसमोपेतः सर्वव्याधिविवर्जितः ।जीवेद्वर्षशतं साग्रं ब्रह्मतीर्थप्रभावतः

putrapautrasamopetaḥ sarvavyādhivivarjitaḥ / jīvedvarṣaśataṃ sāgraṃ brahmatīrthaprabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

मित्रावरुणयोश्चेव कुण्डिनो ये परिश्रुता: । एकार्षेयास्यथंवान्ये वसिष्ठा नाम विश्वुताः ॥

English

Propitiated in Sraddha, Pitrs nourish Soma (the Moon) making use of their Yogic power whereby the three worlds sustain their lives. Hcncc Sraddhas must always be offered to Yogins 1 with (special efforts). Indeed, the mainstay of Pilfs is Yoga and from (thanks to) Yoga the Moon functions.

अध्याय १२९

श्लोक 15

एतत्पुण्यं पापहरं तीर्थं ज्ञानवतां वरम् ।ये पश्यन्ति महात्मानो ह्यमृतत्वं प्रयान्ति ते

etatpuṇyaṃ pāpaharaṃ tīrthaṃ jñānavatāṃ varam / ye paśyanti mahātmāno hyamṛtatvaṃ prayānti te

हिन्दी अर्थ

एते पक्षा वसिष्ठानां स्मृता एकादशव तु ६० इत्येते ब्रह्मण: पुत्रा मानसा ह्मुष्ठ विश्वुता:। अातरः सुमहाभागा येषां बंशाः प्रतिष्ठिताः ६१ त्रोल्लोकान्धारयन्ती मान्देवषिगणसंकुलान् । तेषां पुत्राश्न पोन्नाश्च शतशो5थ सहस्नशः ॥॥ इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते उपोद्धातपाद ऋषिवंशानुकीतंन ताम सप्ततितमोउ्ष्याय: ।॥७०॥॥

English

One may feed thousands of Brahmanas or as many as do come, but listen that one knower of Yogas, if delighted, deserves all (propitiating a Yogin is as fruitful as feeding thousands of Brahmanas).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 129
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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