Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
130
अध्याय 130 / 232

Adhyaya 130

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पूर्ण अध्याय पाठ2 श्लोक

अध्याय १३०

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे ब्रह्मतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकोनत्रिंशदधिकशततमो ऽध्यायः॥ र्क्व् अध्याय १३० श्रीमार्कण्डेय उवाच: नर्मदादक्षिणे कूले देवतीर्थमनुत्तमम् ।तत्र देवैः समागत्य तोषितः परमेश्वरः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe brahmatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikonatriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ|| rkv adhyāya 130 śrīmārkaṇḍeya uvāca: narmadādakṣiṇe kūle devatīrthamanuttamam / tatra devaiḥ samāgatya toṣitaḥ parameśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

नील-+ये आठ पराशर गोत्र में उत्पन्न होनेवाले महापुरुषों के गोत्र कर्ता हैं। अब इसके उपरात्त इन्द्रप्रतिम के पुत्रों का विवरण सुनिये । कपिज्जली घुताची में बशिष्ठ के कुशीति (क्रणति) नामक पुत्र उत्पन्न हुआ; जो इन्द्रप्रतिम नाम से प्रसिद्ध है ।८६-८८। पृथु की पुत्री में उनके वसु नामक एक अन्य पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पृत्र उपमन्यु हुआ, जिनके वंश में उत्पन्न होंनेवाले ये उपमन्यु गोत्रीय हैं। मित्रावरुण के वंश में उत्पन्न होनेवाले

English

What is taken in by a thousand invited (ordinary Brahmanas), or by a hundred Sndtakas (Brahmanas initiated into householder's life) or by one master of Yoga saves one from great fear.

अध्याय १३०

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा कामक्रोधविवर्जितः ।स लभेन्नात्र सन्देहो गोसहस्रफलं ध्रुवम्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā kāmakrodhavivarjitaḥ / sa labhennātra sandeho gosahasraphalaṃ dhruvam

हिन्दी अर्थ

जों कुण्डी नाम से विर्यात वशधर हैं, वे एक ही मूल ऋषि के वंशधर हैं और अन्य वशिष्ठ नाम से विख्यात हैं । वशिष्ठ गोत्र में उत्पन्न होनेवालों के ग्यारह गोत्र कर्ता हैं। ये उपर्यूक्त आठ ब्रह्मा के मानस पुत्र रूप में विख्यात हैं और ये सब लोग महाभाग्यशाली हैं, इनके बंद्द आज तक भूमण्डल पर प्रतिष्ठित है ॥ देवताओं तथा ऋषि- बुन्दों से संकुलित इन तीनों लोकों को ये धारण करते हैं । उनके उन पुत्र पौन्नादिकों की संख्या सेकड़ों द्वी नहीं सहस्नों तक है, जिन्होंने सुयं की किरणों की भाँति समस्त पृथ्वी को व्याप्त कर रखा है

English

One Yogin excels a thousand householders, a hundred Vdnaprasthas (Forest-hermits) and a thousand Brahmacarins (celibate students).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 130
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.