अध्याय १३२
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे नागेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकत्रिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १३२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र उत्तरे नर्मदातटे ।सर्वपापहरं तीर्थं वाराहं नाम नामतः
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe nāgeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikatriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 132 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchettu rājendra uttare narmadātaṭe / sarvapāpaharaṃ tīrthaṃ vārāhaṃ nāma nāmataḥ
हिन्दी अर्थ
बात सुन कर शंयु ने ब्रह्मश्ञानियों में श्रंष्ठ, सवंदा ब्रत आदि सदनुष्ठानों में प्रवृत्त रहनेवाले सभी प्रकार के ज्ञानियों में श्रेष्ठ अपने पिता बृहस्पति से फिर पूछा--पिता जी ! ऐसी परिस्थिति में सभी भूतों के स्वामी प्रजापति ब्रह्मा किस प्रकार तपस्या में प्रवत्त थे ? पुत्र के ऐसा पूछने पर परम तेजस्वी बृहस्पति ने उससे कहा ।४५-४९। पुत्र ! सब प्रकार की तपस्याओं में योग श्रेष्ठ है। उस समय भगवान् ब्रह्मा ने उसी का आश्रय
English
When that blessed son (Kumara) of Jahnavl (Ganga) was born, the sky was covered (crowded) with aerial cars, as if by birds.