Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
141
अध्याय 141 / 232

Adhyaya 141

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अध्याय १४१

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे नन्दाह्रदतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम चत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४१ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन् महीपाल तापेश्वरमनुत्तमम् ।यत्र सा हरिणी सिद्धा व्याधभीता नरेश्वर

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe nandāhradatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma catvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 141 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchen mahīpāla tāpeśvaramanuttamam / yatra sā hariṇī siddhā vyādhabhītā nareśvara

हिन्दी अर्थ

सौभाग्यमुत्तमं लोके मधुके समुदाहृतम् ।) फह्युपात्रें च कुर्वाणः सं्वस्कामानवाप्नुयातू ..

English

In the sacrifice, the thread taken even from a freshly woven cloth shall be avoided. These do not please Pitrs. Those who give cannot flourish (?).

अध्याय १४१

श्लोक 2

जले प्रक्षिप्य गात्राणि ह्यन्तरिक्षं गता तु सा ।व्याधो विस्मितचित्तस्तु तां मृगीमवलोक्य च

jale prakṣipya gātrāṇi hyantarikṣaṃ gatā tu sā / vyādho vismitacittastu tāṃ mṛgīmavalokya ca

हिन्दी अर्थ

परा द्यतिरथो कर्तः प्राकाश्यं च विशेषतः बिल्वें लक्ष्मीस्तथा मेंधा नित्यमायुष्यमेव च १४ एतेष्वेव सुपात्रेषु ये चेवा55ग्रयर्ण द्युः। सकृदप्यत्र यज्ञानां सर्वेषां फलसुच्यते.. ६ पितृभ्यों यस्तु माल्यानि सुगन्धीनि च सर्वंशः । सदा दल्याच्छिया युक्तः स विभाति दिवाकरः

English

The collyrium obtained from the Trikuta mountain, they say, is always excellent. So also is the oil extracted from black gingclly seeds.

अध्याय १४१

श्लोक 3

विमुच्य सशरं चापं प्रारेभे तप उत्तमम् ।दिव्यं वर्षसहस्रं तु व्याधेनाचरितं तपः

vimucya saśaraṃ cāpaṃ prārebhe tapa uttamam / divyaṃ varṣasahasraṃ tu vyādhenācaritaṃ tapaḥ

हिन्दी अर्थ

धपं गन्धगुणोपेतं कान्‍तं पितृपरायणम् । लभते स्त्रीष्वपत्यानि इह चासुत्र चोभयोः: ॥।

English

Sandal, Agaru (fragrant aloe wood), Tamala, Usira (fragrant root of the plant Andropogon Muricatus ), lotus, fragrant incense, gum resin and (white) Turuska—all these are excellent articles (for use in Sraddha).

अध्याय १४१

श्लोक 4

अतीते तु ततः काले परितुष्टो महेश्वरः ।वरं ब्रूहि महाव्याध यत्ते मनसि रोचते

atīte tu tataḥ kāle parituṣṭo maheśvaraḥ / varaṃ brūhi mahāvyādha yatte manasi rocate

हिन्दी अर्थ

दीप॑ पितृभ्यः प्रयतः सदा वस्तु प्रयच्छति । स लोकेड्प्रतिभं चक्षु;ः सदा च लभते शुभम् 0१० तेजसा यशसा चंव कान्त्या चेब बलेन च। भुवि प्रकाशों भवति अआआजते च॒ त्रिविष्टपे ७ ््््ि अप्सरोभिः परिवतो विमानाग्रे स मोदते द . के फ्तों से निर्मित पात्र में क्त बलिकर्म इस लोक में उत्तम सौभाग्य प्रदात करता कहा जाता हैं। फल्गु" (कठ्मर) के पत्तों से बने हुए पात्र में श्राद्ध करने से सभी मनोरथ सफल होते हैं, एवं परमकान्ति तया प्रकाश की प्राप्ति श्राद्धकर्ता को होती है। विल्ब के पात्र से लक्ष्मी, धारणाशक्ति, तथा दीर्षायु की प्राप्ति होती है

English

White flowers are the most excellent. So also the red and blue lotuses. All other flowers can be used if they are frag¬ rant.

अध्याय १४१

श्लोक 5

व्याध उवाच: यदि तुष्टो ऽसि देवेश यदि देयो वरो मम ।तव पार्श्वे महादेव वासो मे प्रतिदीयताम्

vyādha uvāca: yadi tuṣṭo 'si deveśa yadi deyo varo mama / tava pārśve mahādeva vāso me pratidīyatām

हिन्दी अर्थ

वेणु (वेण) के पात्र में श्राद्ध करनेवाले के खेत, बगीचे और जलाशयों में मेष नित्य वृष्टि करता है। इन उपयंकत पान्नों में जो लोग श्राद्ध के अवसर पर पितरों को एक बार भी बलि देते हैं वे सम्पूर्ण यज्ञों का फल प्राप्त करते हैं । जो व्यक्ति पितरों को भक्तिपुवंक सुन्दर पुष्प, माला सुगन्धित द्रव्य आदि नित्य देता है वह श्री सम्पन्न होऋर सूर्य के समान तेजस्थी होकर शोभा पाता है ५-७ ग्रुग्युल आदि से धूप द्रव्यों को मधु और

English

The flowers China Rose, Bhantfira, Upakama and Kur- andaka should, always be avoided in the Sraddha rite.

अध्याय १४१

श्लोक 6

ईश्वर उवाच: एवं भवतु ते व्याध यस्त्वया काङ्क्षितो वरः ।दैवदेवो महादेव इत्युक्त्वान्तरधीयत ।गते चादर्शनं देवे स्थापयित्वा महेश्वरम्

īśvara uvāca: evaṃ bhavatu te vyādha yastvayā kāṅkṣito varaḥ / daivadevo mahādeva ityuktvāntaradhīyata / gate cādarśanaṃ deve sthāpayitvā maheśvaram

हिन्दी अर्थ

घत के समेत जो पितरों के उद्देश्य से समपित करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करना हैं। पितरों के उद्देश्य से जो मनोहर सुगंधियुक्त घूप दान करता है बह अपनी स्त्री में इस लोक तथा परलोक में उत्तम सन्‍्तान प्राप्त करता है। अतः बिना आलस्‍स्य किये नित्य पितरों को धुपदान करना चाहिए । जो व्यक्ति प्रयलपूर्वक सबेदा पितरों के उद्देश्य से दीपदान करता है। वह लोक में परम सुन्दर अनृपम नेत्र प्राप्त करता है ।५-१७। अपने तेज, यश, कान्ति, तथा बल से पृथ्वीतल में विश्यात होता है और अच्तकाल

English

Odourless flowers and flowers of obnoxious odour should be avoided at that time by one who seeks prosperity.

अध्याय १४१

श्लोक 7

पूजयित्वा विधानेन गतो व्याधस्ततो दिवम् ।तदाप्रभृति तत्तीर्थं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्

pūjayitvā vidhānena gato vyādhastato divam / tadāprabhṛti tattīrthaṃ triṣu lokeṣu viśrutam

हिन्दी अर्थ

१, कदूमर । इसके पेड़ बहुत बड़े-बड़े होते हैं । इस पर फल नहीं आते । इसकी डालियों से फल पैदा होते हैं, इसके पत्ते गूलर के पत्तों से बड़े होते हैं। पत्तों के स्पश करने से हाथों में खुजली होने लगती हैं। पत्तों से दूध निकलता है ।

English

The Brahmanas invited on that occasion should inva¬ riably face the north while sitting. The performer of the Sraddha should duly face the south.

अध्याय १४१

श्लोक 8

व्याधानुतापसंजातं तापेश्वरमिति श्रुतम् ।तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा सम्पूजयति शङ्करम्

vyādhānutāpasaṃjātaṃ tāpeśvaramiti śrutam / tatra tīrthe tu yaḥ snātvā sampūjayati śaṅkaram

हिन्दी अर्थ

गन्धपुष्पाणि घृपांश्र दह्यादाज्याहुती श्र बे । फलयुलनमस्कारे: पित॒णां प्रयतः शुचिः १२ श्राउ्धकाले तु सततं वायुभुता: पितामहा: । आविशन्ति द्विजान्दृष्ट्वा' तस्मादेतद्रववीमि ते १३ सव्पोत्तराभ्यां पाणिभ्यां कुर्यादुलल्‍्लेखनं द्विज: । मोक्षणं च तथा कुर्याच्छाद्धकमंण्यतन्द्रितः १६ दर्भानिपण्डांस्तथा भक्ष्यान्पुष्पाणि विविधानि च। गन्धदानसलंका रमेकेक निवंपेद्बुधः

English

He should face them and offer the Darbhas and the

अध्याय १४१

श्लोक 9

शिवलोकमवाप्नोति मामुवाच महेश्वरः ।ये स्नाता नर्मदातोये तीर्थे तापेश्वरे नराः

śivalokamavāpnoti māmuvāca maheśvaraḥ / ye snātā narmadātoye tīrthe tāpeśvare narāḥ

हिन्दी अर्थ

खण्डन पेषणं चेव तथवोल्लेखनं तथा । सक्लदेव हि देवानां पित॒णां त्रिभिरुच्यते

English

The following objects are said to be essential (in a

अध्याय १४१

श्लोक 10

तापत्रयविमुक्तास्ते नात्र कार्या विचारणा ।अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तृतीयायां विशेषतः

tāpatrayavimuktāste nātra kāryā vicāraṇā / aṣṭamyāṃ ca caturdaśyāṃ tṛtīyāyāṃ viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

में स्वगे में शोभा पाता है वहाँ पर अप्सराओं से घिरा हुआ, विमान पर अवस्थित हो आनश्द का अनुभव करता है। जितेन्द्रिय एवं पवित्र हो पितरों को गन्‍्ध, पुष्प धूप, धुत, आहुति, फल, मूल एवं नमस्कार अधपित करना चाहिए, पितरों को प्रथमतः तृप्त करके उसके बाद अपनी द्षाक्ति के अनुसार अन्न सम्पत्ति से से ब्राह्मणों को पूजा करनी चाहिए। सबंदा श्राद्ध के अवसर पर पितामहगण (पितृगण) वायुरूप घारण कर उनको देखकर, उन्हीं में आविष्ट हो जाते हैं-- इसी लिये में ततपश्चात् उनके भोजन कराने की बात कह रहा हूँ । वस्त्र, अन्न, विशेषदान, भक्ष्य, पेय, गौ, अश्व तथा ग्रामादि का दान देकर उत्तम ब्राह्मणों को पूजा करनी चाहिए द्विजों के सत्कृत होने पर पितरगण प्रसन्न होते हैं। अतः अन्न द्वारा ब्राह्मणों की विधिवत् पूजा करनी चाहिए ।११-१५। विद्वान् ब्राह्मण सर्वप्रथम श्राद्धकर्म में विना आलस्य के बायें और दाहिने हाथों से

English

This (story) has been narrated by the excellent Praja- pati. 1 His hairs fell down through the path of the sky on the earth. Hence the KaSa grasses are holy. They are always honoured in the Sraddha rite. The Pinzas are to be offered on them by one who wishes prosperity,

अध्याय १४१

श्लोक 11

स्नानं समाचरेन् नित्यं सर्वपातकशान्तये

snānaṃ samācaren nityaṃ sarvapātakaśāntaye

हिन्दी अर्थ

उल्लेख करे और उसी प्रकार प्रोक्षण ( सिंचन) करे । तदुपरान्त कुश, पिण्ड, विविध प्रकार के भक्ष्य, पुष्प, गन्धदान, अलंकार आदि वस्तुओं में से एक-एक का निरवंपन करे श्राद्धकमं में ब्राह्मण को चाहिए कि भली तरह उपस्थित ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करके वेश्वदेव कर्म के उपरान्त अभ्यज् (तैलमर्दन) कुश, एवं पिञज्जल () इन तीनों से विधिवत् क्रियाएँ सम्पन्न कर ।१६-१८, फिर अपसब्य होकर पितरों के उद्देश्य से उत्तम

English

Those who do so become free from sins and defects.. Their children become nourished with splendour, fame and refulgence.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 141
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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