Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
142
अध्याय 142 / 232

Adhyaya 142

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अध्याय १४२

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे तापेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकचत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महाराज रुक्मिणीतीर्थमुत्तमम् ।यत्रैव स्नानमात्रेण रूपवान्सुभगो भवेत्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe tāpeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikacatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 142 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahārāja rukmiṇītīrthamuttamam / yatraiva snānamātreṇa rūpavānsubhago bhavet

हिन्दी अर्थ

अन्न दे, उन सबों का नामोच्चारण कर के वस्त्र के लिए सूत्रदान करे ।!६। देवताओं के लिए खण्डन, पेषण ओर उल्लेखन--इनका एक बार का विधान है, और पितरों के लिए तीन बार कहा गया है ।२०। हाथ से एक पवित्र लेकर सभो पितरों को अलग-अलग से बस्त्रदान के मन्त्रद्वारा पिण्डों के ऊपर देकर दर्शन करने का कल्याण प्राप्त किया जाता है २१ सभो श्राठंकाथों में घत, तिल-युक्त पिण्डों का निर्वषत भूमि पर करना अन्नेनाड्िश् पुष्पैश्व भक्ष्येश्वेव प्रथग्विधेः । पृथडमातामहानां तु केचिदिच्छन्ति मानवाः २४ त्रीन्पिण्डानानृपृष्येण साइगुष्ठान्युष्टिव्धेनान् । जान्वन्तराभ्यां यत्नेन पिण्डान्द्याद्यथाक्रमसू

English

The devotee should sit facing the south and spread the Darbha grass once for the Pinzas. The tips of the Darbhas should be pointing to the south-east. The procedure shall be mentioned as follows:

अध्याय १४२

श्लोक 2

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तृतीयायां विशेषतः ।स्नानं समाचरेत् तत्र न चेह जायते पुनः

aṣṭamyāṃ ca caturdaśyāṃ tṛtīyāyāṃ viśeṣataḥ / snānaṃ samācaret tatra na ceha jāyate punaḥ

हिन्दी अर्थ

सव्योत्तराभ्यां पाणिम्यां धर्में भन्‍त्रे च पर्यंयः । नमो व पितरः शुष्मै सदा होवमतन्द्रितः २६

English

A learned man should always perform Sraddha with concentration of mind. He shall neither be dejected nor angry. His mind should not be distracted or diverted elsewhere.

अध्याय १४२

श्लोक 3

यः स्नात्वा रुक्मिणीतीर्थे दानं दद्यात्तु कांचनम् ।तत्तीर्थस्य प्रभावेन शोकं नाप्नोति मानवः

yaḥ snātvā rukmiṇītīrthe dānaṃ dadyāttu kāṃcanam / tattīrthasya prabhāvena śokaṃ nāpnoti mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

सव्योत्तराभ्यां पाणिस्यां धर्में सवंमतत्द्रित:। उलखलस्य लेखायामुदपात्राच्च सेवनस् क्षौमसूत्र नव॑ दह्याच्छोणं कार्पासिकं तथा। पत्रो्ण पितृसुत्रं च कौशेयं परिवर्जयेत्

English

(The following Mantra is to be repeated.) "I annihilate everything that has impurity in it. All Asuras and Danavas have been killed by me. All Raksasas, Yaksas, groups of Pisacas and all Yatudhanas (demons) have been killed by me." 2

अध्याय १४२

श्लोक 4

युधिष्ठिर उवाच: तीर्थस्यास्य कथं जातो महिमेदृङ्मुनीश्वर ।रूपसौभाग्यदं येन तीर्थम् एतद् ब्रवीहि मे

yudhiṣṭhira uvāca: tīrthasyāsya kathaṃ jāto mahimedṛṅmunīśvara / rūpasaubhāgyadaṃ yena tīrtham etad bravīhi me

हिन्दी अर्थ

व येत्तदर्शां यज्ञे यदप्यहतवस्त्रजाम् । न प्रीणन्ति तथतानि दातुराष्यायतो भवेत्

English

All Asuras avoid him who offers food to Piters by repeating this Mantra. Raksasas avoid the place where this Mantra is recited.

अध्याय १४२

श्लोक 5

मार्कण्डेय उवाच: कथयामि यथावृत्तमितिहासं पुरातनम् ।कथितं पूर्वतो वृद्धैः पारम्पर्येण भारत

mārkaṇḍeya uvāca: kathayāmi yathāvṛttamitihāsaṃ purātanam / kathitaṃ pūrvato vṛddhaiḥ pāramparyeṇa bhārata

हिन्दी अर्थ

. ्- छ खा पिन ५ है नप्«ज -+ अिज----+--ह.---++---3००७०७०००००००-०. ४४७घनाक यत्न पूर्वक पितरों के जल से पिता पितामह प्रपितामह एवं पुराने पितरों का आवाहन कर पिण्डों को नीचे रखे । कुछ लोग अन्न, जल, पुष्प, भिन्न-भिन्न प्रकार के भक्ष्य आदि पदार्थों से मातामह (नाना आदि मातृवक्ष के पितरों को) आदि के लिए पिण्डदान का अलग विधान मानते हैं ।२२-२४। क्रमशः अंगूठे समेत पुष्टिवृद्धि करने वाले तीन पिण्डों को घुटने को पृथ्वो पर टेक कर "नामों वः पितरः शुष्म” ऐसा मन्त्र उच्चारण करके

English

There issome lacuna. Bd. 3.11.79-80 state that formerly Praja- pati assumed the form of a horse and his hair fell on the ground and became Kusa grass.

अध्याय १४२

श्लोक 6

तं ते ऽहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानसः ।नगरं कुण्डिनं नाम भीष्मकः परिपाति हि

taṃ te 'haṃ sampravakṣyāmi śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ / nagaraṃ kuṇḍinaṃ nāma bhīṣmakaḥ paripāti hi

हिन्दी अर्थ

बाएँ हाथ से प्रदान करे । सवंदा इसी प्रकार सावधान चित्त होकर करना चाहिए । तदनन्तर सावधान होकर द “नमो वः पितरः सौम्य:” ऐसा मन्त्रोच्चारण करते हुए दक्षिण दिशा में प्रथम पिण्डदान करे ।२५-२७। तदुपरान्त वाएं, दाहिने हाथों से बिना आलस्य किये उलखल में परिष्कृत तन्दुल (चावल) जलपात्र से जल, (?) नवीन क्षौम" सूत्र कपास का सूत शोणसूत (लालरंग का सूत ?) पितरों के उद्देश्य से दान करे किन्तु ऊन, पत्ते या रेशम

English

Quoted in Srdddha Tattva, Verses of the same import and textual similarity are quoted by Apararka but he adds the Vedic mantra Apahatdff (Vaj. Samhita II. 29) here.

अध्याय १४२

श्लोक 7

हस्त्यश्वरथसम्पन्नो धनाढ्यो ऽति प्रतापवान् ।स्त्रीसहस्रस्य मध्यस्थः कुरुते राज्यमुत्तमम्

hastyaśvarathasampanno dhanāḍhyo 'ti pratāpavān / strīsahasrasya madhyasthaḥ kurute rājyamuttamam

हिन्दी अर्थ

का सूत पितरों के उद्देश्य से नहीं देना चाहिए ।२८-२६। इसी प्रकार यज्ञ में वस्त्र के अंचल भाग को, भले ही वह नवीन वस्त्र का हो, भी वॉजित रखना चाहिए । ये उपर्युक्त निषिद्ध वस्तुएँ पितरों को प्रसन्न नहीं करतीं, अतः इनके देनेवाले भी सन्तुष्ट नहों होते । पितृकारय में तरिककुद, एवं अजूजन को श्रेष्ठ बतलाया गया है। इसी प्रकार काले तिल से निकला हुआ जो तेल है वह भी प्रदवस्त है ।३०-३१। चन्दन, अगुरु (अगर) तमाल, उशीर, पद्मक (पह्माख) धूप, गुग्गुल, श्रेष्ठ तुरुष्क' का धृप, दवेत पुष्प--ये सब बस्तुएँ पितृकायं में श्रेष्ठ हैं । पद्म, उत्पल

English

ABrahmana should always perform Sraddha accord¬ ing to this procedure. The manes ( Pitamahas ) will grant whatever is desired in the mind (by him).

अध्याय १४२

श्लोक 8

तस्य भार्या महादेवी प्राणेभ्यो ऽपि गरीयसी ।तस्यामुत्पादयामास पुत्रमेकं च रुक्मकम्

tasya bhāryā mahādevī prāṇebhyo 'pi garīyasī / tasyāmutpādayāmāsa putramekaṃ ca rukmakam

हिन्दी अर्थ

१. अलसी के अथवा पाठ की खाल से बना हुआ सूत । ३. लोबान का धूप । यह एक वृक्ष का सुगंधित गोंद है ।

English

If Sraddha is always performed assiduously, Pit** become delighted in mind and Raksasas become dejected.

अध्याय १४२

श्लोक 9

द्वितीया तनया जज्ञे रुक्मिणी नाम नामतः ।तदाशरीरिणी वाचा राजानं तमुवाच ह

dvitīyā tanayā jajñe rukmiṇī nāma nāmataḥ / tadāśarīriṇī vācā rājānaṃ tamuvāca ha

हिन्दी अर्थ

दर द वायुपुराणम् जपासुमनसो भण्डीरूपकामकुरण्डकाः । पुष्पाणि वर्जनीयानि श्राद्धक्मंणि नित्यशः

English

Sudras should always avoid the following in Srad- dha: Ksiracdiu 1 (trees yielding white juice?), trees called Balvaja (Eluesine Indica, a species of coarse grass not liked by cattle) and other kinds of grasses such as Varana, Lava, Lava-varsa.

अध्याय १४२

श्लोक 10

चतुर्भुजाय दातव्या कन्येयं भुवि भीष्मक ।एवं तद्वचनं श्रुत्वा जहर्ष प्रियया सह

caturbhujāya dātavyā kanyeyaṃ bhuvi bhīṣmaka / evaṃ tadvacanaṃ śrutvā jaharṣa priyayā saha

हिन्दी अर्थ

पूर्व कीतितवाउश्रेष्ठो बभुवाथ प्रजापति: । तस्य बाला निपतिता भूुमौ चाइ5काशमार्गतः १३४० तस्मान्मेध्या: सदा काशाः श्राउ्धकमंणि पू्जिताः । विण्डनिर्बप्ण तेषु कतंव्यं भूतिसिच्छता ॥॥४ १ प्रजापुष्टिद्युतिः कीतिः प्रशाकान्तिसमस्विता । भवन्ति रुचिरा नित्य॑ विपाप्मानो्घवर्जिताः ४२ सकुदेवा55सतरेहर्भान्पिडार्थ दक्षिणामुखः । प्रागदक्षिणाग्रनियतों विधि चाप्यनुवक्ष्यति ४ ३

English

They shall avoid applying collyrium, oil and unguents as well as wearing garlands. Their rites should be performed with Kasas which grow again (when cut). All the benefits accrue (to them thereby).

अध्याय १४२

श्लोक 11

ब्राह्मणैः सह विद्वद्भिः प्रविष्टः सूतिकागृहम् ।स्वस्तिकं वाचयित्वास्याश्चक्रे नामेति रुक्मिणी

brāhmaṇaiḥ saha vidvadbhiḥ praviṣṭaḥ sūtikāgṛham / svastikaṃ vācayitvāsyāścakre nāmeti rukmiṇī

हिन्दी अर्थ

एवं अस्यान्य जितनी सुगन्धित वस्तुएं हैं-वे सब भी शुभ हैं । जपा, भण्डीर, रूपकाम एवं कुरण्डक के पुष्पों को श्राद्धकमं में सबंदा वजित रखने चाहिए । कल्याण की कामसा करनेवाले व्यक्ति को, निर्गेन्ध अथवा अति तीक्षण गन्‍्ध वाले पुष्पों को श्राद्धकर्म में वर्जित रखना चाहिए । श्राद्धकर्म में यजमान को चाहिए कि वह दक्षिणाभिमुख होकर विधिपु्वक आमन्त्रित उत्तराभिमुख बंठे हुए जितेन्द्रिय ब्राह्मणों की पूजा करे ।३२-३४॥। तदनन्‍्तर उनके सामने यत्नपूर्वक पिण्डों कौ और कुशों को दे, इस विधि से अपने पितामहों की पूजा करे । पृष्पों से संयुक्त, सरल सीधी हरी पिज्जलियाँ (?) वहाँ रखे, पितरों के तीथे से संयुक्त उसके रत्निमात्र दान देने से पितर लोग संतुष्टि लाभ करते हैं ।३७-३८। मूल के समीप में तीते वर्ण की, पत्थर आदि के टुकड़ों से , रहित सावाँ, और नीवार-ये दो वस्तुएं भी पितृकाय॑ में दुष्प्राय कही गई हैं। पूवेकाल में इसकी कथा इस

English

Kas'a (grass) and the regrown Kas'a (grass) are (like) peacocks tail and its regrowth 2. (So) Pitrs are Devas and Devas are Pitrs.

अध्याय १४२

श्लोक 12

यतः सुवर्णतिलको जन्मना सह भारत ।ततः सा रुक्मिणीनाम ब्राह्मणैः कीर्तिता तदा

yataḥ suvarṇatilako janmanā saha bhārata / tataḥ sā rukmiṇīnāma brāhmaṇaiḥ kīrtitā tadā

हिन्दी अर्थ

प्रकार कही जाती है । प्रजापति के केश आकाशमार्ग से पृथ्वी पर जो गिरे वे काश" के रूप में परिणत हुए ! यही कारण है कि श्राद्धादि कार्यों में काश सर्वदा परम पवित्र मानी गई है। विभव की इच्छा करनेवाले व्यक्ति उन पर पिण्डदान करें ।३९-४ है। पिण्डदान करने से प्रजा (सन्तति) की पुष्टि, शरीर की कान्ति, यश, बुद्धि, शोभा, आदि की वद्धि होती है, पाप रहित होने से शरीर अत्यन्त मनोहर हो जाता है । श्राद्धकर्म में दक्षिणा भिमुख

English

This is the Mantra intended for flowers, incense, scents etc. Pulling (the vessel of materials of worship) towards the south assiduously for the sake of Homa, he (performer of Sraddha) should repeat the mantra "Svadha unto Soma, thePitrman (having Pitrs). Obeisance to Angiras". He should perform the Homa of non-heavenly or the worldly type for the purpose of the fructification of the holy rite.

अध्याय १४२

श्लोक 13

ततः सा कालपर्यायादष्टवर्षा व्यजायत ।पूर्वोक्तं चैव तद्वाक्यमशरीरिण्युदीरितम्

tataḥ sā kālaparyāyādaṣṭavarṣā vyajāyata / pūrvoktaṃ caiva tadvākyamaśarīriṇyudīritam

हिन्दी अर्थ

होकर केवल एक बार पिण्डदान के लिए बुझों की पृथ्वी पर बिछाये, पू्वे दक्षिण की ओर अग्नभाग करके उस विधि को सम्पन्न करे, जो बतलायी जायगी ।४२-४३॥ बुद्धिमान् पुरुष कभी दीन, क्रुद्ध अथवा अन्यमनस्क होकर १, कृश की तरह एक तृण । इसका पुष्प श्वेत वर्ण का होता है ।

English

Homa is to be performed after placing Samit (sacrificial twig) within. The devotee should keep the mind perfectly pure and keep the holy fire scrupulously pure, repeat¬ ing the Mantra, "Svadha unto Agni, the bearer of Kavya. Obeis¬ ance to Angiras. Svadha and obeisance unto Yama and Angiras".

अध्याय १४२

श्लोक 14

स्मृत्वा स्मृत्वाथ नृपतिश्चिन्तयामास भूपतिः ।कस्मै देया मया बाला भविता कश्चतुर्भुजः

smṛtvā smṛtvātha nṛpatiścintayāmāsa bhūpatiḥ / kasmai deyā mayā bālā bhavitā kaścaturbhujaḥ

हिन्दी अर्थ

न दीनो वा5पि वा क़ुद्धो न चेवान्यमना नरः । एकाग्रमाधाय सनः श्राद्ध कुर्यात्सदा बुध: ४४

English

These are the Mantras in order intended for Homas. Homas shall be performed everyday from the southern direction to Agni and to Soma in the middle 3. In between these two Homas, a Homa should be performed to Vivasvan (the Sun or his son Yama?). Upacaras (ways of render-

अध्याय १४२

श्लोक 15

एतस्मिन्नन्तरे तावद्रैवतात्पर्वतोत्तमात् ।मुख्यश्चेदिपतिस्तत्र दमघोषः समागतः

etasminnantare tāvadraivatātparvatottamāt / mukhyaścedipatistatra damaghoṣaḥ samāgataḥ

हिन्दी अर्थ

भूतति शिवां हि भ्रुवसिच्छमानः ज्षिपेद्द्धिजातिदिशमुत्तरां गतः ४६ (+ अन्नप्राकारान्नाशुचिः साधु वोक्षन्नचेवान्नं संस्पृशंश्रापि दह्यात् । पवित्रपाणिश्र भवेत्तया हि सहन्नकृत्तत्य फल समश्रुते )

English

barhatia 'a peacock' is rather inapplicable. Hence barhi (n) 'fire; husa grass' may be the probable reading.

अध्याय १४२

श्लोक 16

प्रविष्टो राजसदनं यत्र राजा स भीष्मकः ।तं दृष्ट्वा चागतं गेहे पूजयामास भूपतिः

praviṣṭo rājasadanaṃ yatra rājā sa bhīṣmakaḥ / taṃ dṛṣṭvā cāgataṃ gehe pūjayāmāsa bhūpatiḥ

हिन्दी अर्थ

अनेन विधिना नित्य॑ श्राद्ध कुर्यादृद्रिज: सदा । मनसा काइलक्षितं यद्यत्तत्तदद्युः पिता महाः ३४६

English

uttaratafr 'to the north' in Bd. P. ibid V. 95.

अध्याय १४२

श्लोक 17

आसनं विपुलं दत्त्वा सभां गत्वा निवेशितः ।कुशलं तव राजेन्द्र दमघोष श्रियायुत

āsanaṃ vipulaṃ dattvā sabhāṃ gatvā niveśitaḥ / kuśalaṃ tava rājendra damaghoṣa śriyāyuta

हिन्दी अर्थ

श्राद्ध न करे, सर्वदा एकाग्र चित्त होकर श्राद्ध करना चाहिए ।४४।॥ (वह मन में ऐसी भावना करे कि) जो कुछ भी अपवित्र अथवा अनियमित वस्तुएं हैं, मैं उन सब को निवारित कर रहा हूँ, सभी विष्न डालनेवाले असुर एवं दानवों को भी मैं मार चुका । सब राक्षस, यक्ष. पिशाच एवं यातुधानों के समूह मुझसे मारे जा चुके हैं नाएच सर्वे ।” इस मन्त्रह्दारा संयतात्मा धीर यजमान उस बेदी को (कुश द्वारा) एक बार लिखकर कल्याणदायिनी विभूति की इच्छा करता हुआ उत्तर दिशा में जाकर उसे (कुश को) फेंक दे । इस प्रकार की विधि से जो व्यक्ति पितृकाय॑ में अन्नदान करता है उसके श्राद्धकार्यों में अघुर गण वर्जित हो जाते हैं। जिस देश में यह मन्त्र पढ़ा जाता है, उस देश को राक्षस लोग छोड़ देते हैं ।४६-४७। भशुति व्यक्ति श्राद्धकार्यों में अन्न प्रदान करना तो दूर

English

If they are performed with Mantras, they have the same benefit as a horse-sacrifice. All holy rites mentioned above shall be assiduously performed.

अध्याय १४२

श्लोक 18

पुण्याहमद्य संजातमहं त्वद्दर्शनोत्सुकः ।कन्या मदीया राजेन्द्र ह्यष्टवर्षा व्यजायत

puṇyāhamadya saṃjātamahaṃ tvaddarśanotsukaḥ / kanyā madīyā rājendra hyaṣṭavarṣā vyajāyata

हिन्दी अर्थ

रहा दिये जानेवाले अन्न का दर्शन अथवा स्पशे तक न करे, पवित्र पाणि होकर जो अन्नदान करता है, वह दान का सहस्न गुना अधिक फल प्राप्त करता है ।४८। सबंदा इसी विधि से ब्राह्मण श्राद्धकर्म सम्पन्न करे, ऐसा करने से जो कुछ भी मनोगत अभिलाषाएं होती हैं. उन सब॑ को पितामह गण पूर्ण करते हैं। ऐसी विधियों से श्रा्धकर्म सम्पन्न करने से पितर लोग हृदय ते प्रसन्न होते हैं और राक्षस लोग निरादूत और बहिष्कृत होते हैं। अतः नित्य

English

In the blazing fire plenty of ghee must be offered. Particularly Homa must be performed in a smokeless fire with curly leaping flames, for the fructification of the holy rite.

अध्याय १४२

श्लोक 19

चतुर्भुजाय दातव्या वागुवाचाशरीरिणी ।भीष्मकस्य वचः श्रुत्वा दमघोषो ऽब्रवीद् इदम्

caturbhujāya dātavyā vāguvācāśarīriṇī / bhīṣmakasya vacaḥ śrutvā damaghoṣo 'bravīd idam

हिन्दी अर्थ

प्रयललपूर्वक उपर्यक्त विधि से श्राद्धकम सम्पन्न करना चाहिए। श्राउकर्म में शूद्र, क्षीरचाशु (१?) बल्वज तड, नास्त्ययं इलोकः क. पुस्तके । +घनुश्चिह्नान्तगंतग्रन्थः क. पुस्तके नास्ति ।

English

We have heard that if a Yajamdna performs Homa in a weakly burning smoking fire, he becomes blind and issueless.

अध्याय १४२

श्लोक 20

चतुर्भुजो मम सुतस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।तस्येयं दीयतां कन्या शिशुपालस्य भीष्मक

caturbhujo mama sutastriṣu lokeṣu viśrutaḥ / tasyeyaṃ dīyatāṃ kanyā śiśupālasya bhīṣmaka

हिन्दी अर्थ

अज्जनाभ्यव्जनागन्यामानृप्रलयनं (? )तथा । काशेः पुनर्भेवेः कार्य स्वमेव फल भवेत् ३५२ काशाः पुनभंवा ये च बहँणा उपबहणा: । अथ ते पितरो देवा देव।शभ्य पितरः पुनः ५३

English

If there is deficiency of fuel, if the flames are scattered all round and dried up or if the flames are defiled by smoke, the fire is not conducive to good results.

अध्याय १४२

श्लोक 21

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दमघोषस्य भूमिप ।भीष्मकेन ततो दत्ता शिशुपालाय रुक्मिणी

tasya tadvacanaṃ śrutvā damaghoṣasya bhūmipa / bhīṣmakena tato dattā śiśupālāya rukmiṇī

हिन्दी अर्थ

अग्नये कव्यवाहाय स्वधा अड्धिरसे नमः सोसाय वे पितृमते स्वधा अछ्गिरसे नमः ॥। यमाय चेवाडिगरसे स्वधा नम इति बुबन् द ५६

English

If the fire emits bad odour, if the flames are bluish or particularly black, or if the fire makes the ground crack, know that there is failure (in the holy rite).

अध्याय १४२

श्लोक 22

प्रारब्धं मङ्गलं तत्र भीष्मकेण युधिष्ठिर ।दिक्षु देशान्तरेष्वेव ये वसन्ति स्वगोत्रजाः

prārabdhaṃ maṅgalaṃ tatra bhīṣmakeṇa yudhiṣṭhira / dikṣu deśāntareṣveva ye vasanti svagotrajāḥ

हिन्दी अर्थ

एतयोरन्तरं नित्य जुहुयाह विवस्वते । उपाचारं स्वधकार तथवोल्लेेखनं च यत् ४८ होमजप्ये नमस्कार: प्रोक्षणं च विशेषतः । अज्जनाभ्यञ्जने चेव पिण्डसंबपन तथा

English

The resplendent fire with a single globular flame, yel¬ lowish (golden) in colour, produced by the ghee, is conducive to the fructification of the rite. The flame shall be smooth and curling clockwise.

अध्याय १४२

श्लोक 23

निमन्त्रितास्तु ते सर्वे समाजग्मुर् यथाक्रमम् ।ततो यादववंशस्य तिलकौ बलकेशवौ

nimantritāstu te sarve samājagmur yathākramam / tato yādavavaṃśasya tilakau balakeśavau

हिन्दी अर्थ

वारण, लव, लववर्ष,--ये तथा अन्यान्य तृणों को भ्राद्धकर्म में वजित रखना चाहिए ४६-५१॥ अज्जन, अभ्य- वजन, गन्धमानृप्रलयन (?) ये सब भी वर्जित हैं। पुनः उत्पन्न हुये काशों से सभी कार्यों को सम्पन्न करना चाहिए--इससे सभी फलों की प्राप्ति होती है ।५२। जो पुतः उत्पन्न होनेवाले काश तृण हैं वे तथा वहंण और उपवहंण -ये भी उत्ती प्रकार श्राद्धकम में उपयोगी हैं। 'अथ ते पितरो देवा देवाइच पितरः पुनः” अर्थात् पितरगण देवस्वरूप हैं, और देवगण ही पितरस्वरूप हैं। यह पुष्प सुगंधित द्रव्य, धृपादि के दान के समय का कहा गया है। हवन के लिये रखी गई सामग्री क्रो दक्षिणदिशा में खींचकर यत्नपूर्वंक अस्वग्ये अथवा लौकिक विधियों से कमंसिद्धि के लिये हवन करे समिध को भीतर रखकर हवन करना चाहिए अग्नि की उपासना करनेवाला यजमान प्रयत्नपूर्वक्क समाहित चित्त हो मनोयोग पूर्वक हवन करे ॥५३-२५। 'अग्नये कव्यवाहाय स्वधा

English

(That fire) is perpetually honoured and worshipped by both men and women. Thereby, the everlasting pitrs become honoured and worshipped. They give everlasting benefits.

अध्याय १४२

श्लोक 24

निमन्त्रितौ समायातौ कुण्डिनं भीष्मकस्य तु ।भीष्मकेण यथान्यायं पूजितौ तौ यदूत्तमौ

nimantritau samāyātau kuṇḍinaṃ bhīṣmakasya tu / bhīṣmakeṇa yathānyāyaṃ pūjitau tau yadūttamau

हिन्दी अर्थ

अंगिरसे नमः सोमाय वे पितृमते स्वधा अज्िर्से नमः । यमाय चैवाज़िरसे स्वधानम: ।” अर्थात् पितरों के उद्देश्य से ही जानेवाली वस्तुओं को उन तक वाहन करनेवाले कव्यवाह अजद्धिरा को नमस्कार है, स्वधा है, पितृमान सोम अज््िरा को नमस्कार है, स्वधा है, यम अज्िरा को नमस्कार है, स्वधा है। ये हवन करने के मन्त्र हैं। इन मन्त्रों के क्रम से नित्य दक्षिण दिशा से अग्नि के तदनन्तर सोम के इन दिलों के

English

The different benefits of the various kinds of vessels that I have mentioned as regards the Sraddha rite, O excellent Brahmanas, are also true in regard to the holy rites of nativity. With regard to the Samits also, the same should be known. The devotee keeps the mind pure and says 'I am performing the rite in fire\ Then, after being permitted by excellent Brahmanas, saying Do 55, he should perform the Homa in the fire, accompa¬ nied by his wife and sons.

अध्याय १४२

श्लोक 25

ततः प्रदोषसमये रुक्मिणी काममोहिनी ।सखीभिः सहिता याता पूर्बहिश्चाम्बिकार्चने

tataḥ pradoṣasamaye rukmiṇī kāmamohinī / sakhībhiḥ sahitā yātā pūrbahiścāmbikārcane

हिन्दी अर्थ

मध्य भाग्य में विवस्वान् (यम) के उद्देश्य से हवन करे ।५६-५७ १। उपचार, स्वधाकार, उललेखन, हवन, जप, नमस्कार, प्रोक्षण, अडजन, अभ्यड्जन, पिण्डनिर्वपनन--ये सब कार्य-कलाप मन्त्रोच्चा रण पूर्वक करने पर अश्वमेध यज्ञ का फल प्रदान करनेवाले स्मरण किये गये हैं । जैसी विधि के साथ भ्राउक्रियाएँ बताई गयी हैं, अचिष्मान्विण्डितशिख: सर्पिष्काध्चनसंभव:ः । स्निग्धः प्रदक्षिणश्चेव वह्लिः स्थात्कायंसिद्धये.

English

The following trees are equally sacrifice-worthy: Palasa (Bd. P.), Plaksa, Nyagrodha, Asvattha, Vikankata, Udumbara, Bilva and Candana.

अध्याय १४२

श्लोक 26

सापश्यत् तत्र देवेशं गोपवेषधरं हरिम् ।तं दृष्ट्वा मोहमापन्ना कामेन कलुषीकृता

sāpaśyat tatra deveśaṃ gopaveṣadharaṃ harim / taṃ dṛṣṭvā mohamāpannā kāmena kaluṣīkṛtā

हिन्दी अर्थ

पव्ित्रं वा द्विजश्रेष्ठ शुद्धंये जन्मकर्मंसु । पात्रेषु फलमुद्दिष्टं यन्‍्मया श्राद्धकर्मणि ६८ तदेव कृत्स्नं विज्ञेयं समित्सु च यथाक्रमम् । कृत्वा समाहित चित्तमग्नये व करोम्यहम्

English

The following trees are particularly recommended for the purpose of Samits (sacrificial twigs): Sarala, Devadaru, Sala and Khadira.

अध्याय १४२

श्लोक 27

केशवो ऽपि च तां दृष्ट्वा संकर्षणम् उवाच ह ।स्त्रीरत्नप्रवरं तात हर्तव्यमिति मे मतिः

keśavo 'pi ca tāṃ dṛṣṭvā saṃkarṣaṇam uvāca ha / strīratnapravaraṃ tāta hartavyamiti me matiḥ

हिन्दी अर्थ

बैसी ही प्रयत्नपृर्थक करनी चाहिए । अग्नि में विशेषतया खूब प्रज्वलित हो जाने पर अधिक हवि डालनी चाहिए, कर्मसिद्धि के लिये दहकती हुई निर्धम अग्नि में हवि डालनी चाहिए १५-६१॥ जो यजमाब धृमयुक्त अथवा विना प्रज्वलित अग्नि में हवन करता है वह भन्धा एवं पुत्रविहोन होता है--ऐसा हमने सुना है ।६३॥। थोड़े इन्धनोंवाली रूखी, चारों ओर से चिनगारियोंवाली, ज्वालाओं और धूम से व्याप्त अग्नि सिद्धि " के लिये नहीं है ।६३। जो अग्नि दुर्गन्धियों से भरी, नीली, विशेषतया काली है और जिसके प्रज्त॒ लित होने पर प्रथ्वी फट जाय, उसमें हवन करने से पराभव जानना चाहिए ।६४। किरणों से सुशोभित, ज्वालाओं को एक पिण्डरूप में प्रकट करमनेवाली, घत और सुवर्ण से उत्पन्न होनेवाली (पीली) स्निग्ध और प्रदक्षिणा करती हुई--सी भग्नि सिद्धि देनेवाली है ।६५॥। यह अग्नि इस लोक में नर-नारी--दोनों समुदायों से सदा से प्रचलित पूजा प्र'प्त करती

English

Rural thorny trees are also sacrifice-worthy. Some of them are honoured for the purpose of Samits in accordance with the words of Pitrs.

अध्याय १४२

श्लोक 28

केशवस्य वचः श्रुत्वा संकर्षण उवाच ह ।गच्छ कृष्ण महाबाहो स्त्रीरत्नं चाशु गृह्यताम्

keśavasya vacaḥ śrutvā saṃkarṣaṇa uvāca ha / gaccha kṛṣṇa mahābāho strīratnaṃ cāśu gṛhyatām

हिन्दी अर्थ

है । उनके हारा पूजित होकर पितरगण अक्षय एवं अनन्त तुष्टि प्राप्त करते हैं । श्राद्धकम में स्थाली, उदुम्बर के पात्र (गूलर के पत्तों से बने हुये पात्र) उदुम्बर के फल औश उसी को समिधा ये वस्तुएँ विशेष पवित्र एवं पुण्यप्रद मानी गयी हैं। है द्विजश्रेष्ठ ! श्राद्धकर्म में जिन-जिन पात्रों में जो-जो फल मैंने बतलाये हैं वे सब जातकमं में शुद्धि के अवसर पर भी पवित्र एवं फलदायी होते हैं। समिधा के लिये भी क्रमशः यही नियम

English

Even as I recount, listen to the fruit of the holy rite to those who perform Homa with the Samits of the Kalkaleya (pomegranate) tree.

अध्याय १४२

श्लोक 29

अहं च तव मार्गेण ह्यागमिष्यामि पृष्ठतः ।दानवानां च सर्वेषां कुर्वंश्च कदनं महत्

ahaṃ ca tava mārgeṇa hyāgamiṣyāmi pṛṣṭhataḥ / dānavānāṃ ca sarveṣāṃ kurvaṃśca kadanaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

जानना चाहिए। श्राढ्वकर्ता चित्त को सावधान करके ब्राह्मणों से यह निवेदन करे कि मैं अग्नि में पितरों के उद्देश्य से हवन कर रहा हूँ । श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा 'करो” ऐसी आजा प्राप्त हो जाने पर अपनी पत्नी ओर पुत्रों को साथ लेकर अग्नि में हवन करे ।६६-७०। समान (?) प्लक्ष (पाकड़) न्‍्यग्रोध, (वरगद) अधश्वृत्य (पीपल ) समानप्लक्षन्यग्रोधप्लक्षाश्वत्थविकड्धूता: । उदुम्बरास्तथा बिल्वचन्दना यज्ञियाश्च ते ७१ सरलो देवदारुश्व शालभ्र खदिरस्तथा । समिवर्थ प्रशस्ताः स्युरेते ब॒क्षा विशेषतः (७२ ग्रास्या: कष्टकिनश्चैव यज्ञिया येन केन च । पूजिताः समिदर्थे तु पित्णां बचने तथा

English

The Aloe wood is to be desired by all. It has the same benefit as that of a horse-sacrifice. The following trees should be avoided-Slesmataka, Naktamala, Kapittha, Salmali, Nlpa, Vibhltaka and the creepers also. Similarly the trees on which birds reside must be avoided. Those trees which are consi¬ dered unworthy of sacrifice should also be avoided.

अध्याय १४२

श्लोक 30

संकर्षणमतं प्राप्य केशवः केशिसूदनः ।ययौ कन्यां गृहीत्वा तु रथमारोप्य सत्वरम्

saṃkarṣaṇamataṃ prāpya keśavaḥ keśisūdanaḥ / yayau kanyāṃ gṛhītvā tu rathamāropya satvaram

हिन्दी अर्थ

आयसं सर्वकामीयमश्वमेधफलं हि तत् । श्लेष्मान्तको नक्तमालः कपित्थ: शाल्मलिस्तथा

English

In the course of the sacrificial rite, the word Svadha is used at the end of the Mantra pertaining to Pitrs and Svaha is used in the case of Devas.

अध्याय १४२

श्लोक 31

निर्गतः सहसा राजन्वेगेनैवानिलो यथा ।हाहाकारस् तदा जातो भीष्मकस्य पुरे महान्

nirgataḥ sahasā rājanvegenaivānilo yathā / hāhākāras tadā jāto bhīṣmakasya pure mahān

हिन्दी अर्थ

अयज्ञियाः स्पृता ये च वुक्षांश्चेव वजयेत् स्वधेति चेब मन्त्रान्ते पित॒र्णां वचन तथा। स्वाहेति चेव देवानां यज्ञकमंण्युदाहृतम् ७७

English

Brhaspati declared (in reply) that as per (injunctions of) the Atharva Veda, Devas are Pitrs but there are also other Pitrs.

अध्याय १४२

श्लोक 32

निर्गता दानवाः क्रुद्धा वेला इव महोदधेः ।गर्जन्तः सायुधाः सर्वे धावन्तो रथवर्त्मनि

nirgatā dānavāḥ kruddhā velā iva mahodadheḥ / garjantaḥ sāyudhāḥ sarve dhāvanto rathavartmani

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्‍्ते श्राद्धकल्पो नाम पश्चसप्ततितमोड्ध्यायः ।॥७५।॥।

English

One should especially worship Pitrs before Devas. (People) in the world do worship Pitrs before Devas.

अध्याय १४२

श्लोक 33

बलदेवं ततः प्राप्ता रथमार्गानुगामिनम् ।तेषां युद्धं बलस्यासीत् सर्वलोकक्षयंकरम्

baladevaṃ tataḥ prāptā rathamārgānugāminam / teṣāṃ yuddhaṃ balasyāsīt sarvalokakṣayaṃkaram

हिन्दी अर्थ

विकंकत, उदुम्बर (गूलर) बिल्व, चन्दन-े वृक्ष यज्ञ कार्य के लिये उपयोगी हैं। सरल, देवदारु, शाल, खदिर- विशेषतया ये वक्ष भी यज्ञ की समिधा के लिये प्रशस्त माने गये हैं।७१-७२। ग्रामों में उत्पन्न होनेवाले कण्टकी के वक्ष भी यज्ञ के कार्यों में यत्र कुत्र समिधा के लिये पूजित-व्यवहार में आते हैं-ऐसी पितरों की आज्ञा है ।७३॥। कल्कल की समिधाओं द्वारा जो अग्नि में हवत करता है, उसके इस कर्म से जो फलप्राप्ति होती हैं, उसे में बतला रहा हूँ, सुनिये ।७४॥ आयस की समिधा सभी मनोरथों को पूर्ण करनेवाली तथा अश्वमेध यज्ञ का फल देनेवाली है। श्लेष्मान्तक, नक्तमाल, कपित्थ, (कथा) शाल्मलि (सेमर) नीप (कदम्ब, बिभीतक (बहेड़ा) बल्लियाँ तथा वे वृक्ष, जिनपर पक्षियों का निवास हो, यज्ञ काय में वर्जित रखने चाहिए। इनके अतिरिक्त वे अन्यान्य वृक्ष जो यज्ञकाय में निषिड्ध माने गये हैं, वरजित रखने चाहिए । पितरों के उद्देश्य से पढ़े जानेवाले मंत्रों के

English

Daksa had a daughter famous in the world by the name of Visva. O knower of Dharma, she was given duly and righteously to Dharma. It is well-known that her sons are the noble-souled Visvedevas.

अध्याय १४२

श्लोक 34

यथा तारामये पूर्वं सङ्ग्रामे लोकविश्रुते ।गदाहस्तो महाबाहुस् त्रैलोक्ये ऽप्रतिमो बलः

yathā tārāmaye pūrvaṃ saṅgrāme lokaviśrute / gadāhasto mahābāhus trailokye 'pratimo balaḥ

हिन्दी अर्थ

अन्त में स्वधा का और देवताओं के यज्ञों में उनके उद्देश्य से पढ़े जानेवाले मंत्रों के भन्‍्त में स्वाहा का उच्चारण करना चाहिए--ऐसा नियम बतलाया गया है

English

They were very famous throughout the three worlds. They were revered by all the people in the world. On the

अध्याय १४२

श्लोक 35

हलेनाकृष्य सहसा गदापातैरपातयत् ।अशक्यो दानवैर्हन्तुं बलभद्रो महाबलः

halenākṛṣya sahasā gadāpātairapātayat / aśakyo dānavairhantuṃ balabhadro mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीवायमहापराण में श्राद्धकल्प वामक पचह॒त्तरवाँ अध्याय समाप्त ॥95॥॥ घट्सप्ततितमोअध्याय4 है

English

The delighted Pitrs spoke to them with a pure (frank) m; n d—"We are delighted. Request for a boon. What desire (of yours) shall we fulfil?"

अध्याय १४२

श्लोक 36

बभञ्ज दानवान्सर्वांस्तस्थौ गिरिरिवाचलः ।तं दृष्ट्वा च बलं क्रुद्धं दुर्धर्षं त्रिदशैरपि

babhañja dānavānsarvāṃstasthau giririvācalaḥ / taṃ dṛṣṭvā ca balaṃ kruddhaṃ durdharṣaṃ tridaśairapi

हिन्दी अर्थ

देवाश्व पितरश्चेव तेभ्पोषन्ये पितरस्तथा । आथवंणविधिद्धोंव प्रत्युवाच बृहस्पतिः ऐ

English

When this was mentioned by Pitrs, Brahma, the creator of the three worlds, the lord of the subjects, spoke to theVisvas (Visvedevas).

अध्याय १४२

श्लोक 37

भीष्मपुत्रो महातेजा रुक्मीनाम् महयशाः ।नराणामतिशूराणाम् अक्षौहिण्या समन्वितः

bhīṣmaputro mahātejā rukmīnām mahayaśāḥ / narāṇāmatiśūrāṇām akṣauhiṇyā samanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

पुजयेच्च पितस्पूर्व देवांश्वापि विशेषतः । देवेभ्योडपि पितन्‍न्पुरवंमर्चेयन्तोह यत्नत । दक्षस्थ दुहिता ख्याता लोके विश्वेति नामतः विधिना सा तु धमन्ञ दत्ता धर्माय धमंतः ॥ तस्याः पुत्रा महात्मानों विश्वे देवा इति श्रुति

English

"(Even) Mahadeva of great brilliance, has been scorched by them by means of the great penance. I am well- delighted by that penance. What desire of yours shall I ful¬ fil?"

अध्याय १४२

श्लोक 38

बलभद्रमतिक्रम्य ततो युद्धे निराकरोत् ।तद्युद्धं वञ्चयित्वा तु रथमार्गेण सत्वरम्

balabhadramatikramya tato yuddhe nirākarot / tadyuddhaṃ vañcayitvā tu rathamārgeṇa satvaram

हिन्दी अर्थ

प्रव्यातास्त्रिषु लोकेषु सबंलोकतमस्कृताः । समस्तास्ते महात्मानश्चेरुरुप्रं महत्तपः

English

Thus urged by Brahma, the creator of the world, all of them simultaneously spoke to Brahma, the creator of the worlds.

अध्याय १४२

श्लोक 39

केशवो ऽपि तदा देवो रुक्मिण्या सहितो ययौ ।विन्ध्यं तु लङ्घयित्वाग्रे त्रैलोक्यगुरुरव्ययः

keśavo 'pi tadā devo rukmiṇyā sahito yayau / vindhyaṃ tu laṅghayitvāgre trailokyagururavyayaḥ

हिन्दी अर्थ

हिमवच्छिखरे रम्ये देवगन्धर्वसेविते । सर्वाप्सरोभिश्ररित देवगन्धवेसे वितम् ३५ शुद्धेन मनसा प्रीताः पितरस्तानथाबुवन् । वरं वृणीध्व॑ प्रीताः सम के काम करवामहे ६ एवमुक्‍्तं तु पितृभिस्तदा त्रेलोक्यभावनः॥ प्रजानामधिपो ब्रह्मा विश्वानितोदमन्नवीत् ७ सूत ने कहा--ऋषि वृन्द ! वृहस्पतिजी ने अथव्व वेद के अनुसार यह विधि बतलाई है कि जो दवगण पितरों के नाम से विख्यात हैं, उनके अतिरिक्त अन्य भी पितरगण हैं। पितरों की विशेष तथा पहले और देवताओं की बाद में पूजा करनी चाहिए । इस लोक में ऐसी प्रथा है कि यत्न पूर्वक देवताओं से भी प्रथम पितरों की पूजा लोग करते हैं ।१-२। है घर्मज्ञ, प्राचीनकाल में दक्ष की एक विश्वा नाम की पुत्री थी,

English

"May we have a share in Sraddha. This is the boon desired by us". Then Brahma spoke to them who were worshipped in the heaven.

अध्याय १४२

श्लोक 40

नर्मदातटमापेदे यत्र सिद्धः पुरा पुनः ।अजेयो येन संजातस्तीर्थस्यास्य प्रभावतः

narmadātaṭamāpede yatra siddhaḥ purā punaḥ / ajeyo yena saṃjātastīrthasyāsya prabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

जो लोक प्रसिद्ध थी, विधि एवं घमर्म पृवंक उसे दक्ष ने घर्म को समपित की थी। उससे उत्पन्न होनेवाले महात्मा पुत्रमण विश्वेदेवा के नाम से प्रसिद्ध ह॒ये--ऐसा सुना जाता है।रे। वे विश्वेदेवागण सभी लोगों के नमस्करणीय एवं त्रेलोक्य विख्यात हैं। सब के सब उन महात्मा विश्वेदेवों ने देवताओं और गन्धर्वों से सुसेवित हिमवान के मनोहर शिखर पर सम्पूर्ण अप्सराओं देवताओं और गन्धर्वों द्वारा पालन किये गये परम कठोर

English

"What you desire will take place". Pitrs said "So be it", and continued, "There is no doubt about it. What¬ ever is performed here shall be for you too along with us. In the Sraddha intended by men for us, you will get the priority in being seated. We are telling you the truth. They will worship you at the outset by means of garlands, scents and food offerings.

अध्याय १४२

श्लोक 41

एतस्मात् कारणात् तात योधनीपुरम् उच्यते ।रुक्मो ऽपि दानवेन्द्रो ऽसौ प्राप्तः

etasmāt kāraṇāt tāta yodhanīpuram ucyate / rukmo 'pi dānavendro 'sau prāptaḥ

हिन्दी अर्थ

तप को किया । उनके उस महान् तप से परम प्रसन्न होकर पितर गण शुद्ध मन से बोले, विश्वेदेवणण ! हम आप लोगों से परम प्रसन्न हैं. वरदान माँगिये, हम आपके कोन-से मनोरथ पूर्ण करें। पितरों के ऐसा कहने पर त्रैलोक्य की उत्पक्ति करनेवाले प्रजापति ब्रह्मा ने विश्वेदेवों से यह कहा । द्पफ ..वायूपुराणम्

English

Everything will be offered to you first and then to us. Our ritualistic farewell will occur first and the Devatas (i.e. you) will be ritualistically dismissed later.

अध्याय १४२

श्लोक 42

प्रत्युवाचाच्युतं क्रुद्धस् तिष्ठ तिष्ठेति मा व्रज ।अद्य त्वां निशितैर्बाणैर्नेष्यामि यमसादनम्

pratyuvācācyutaṃ kruddhas tiṣṭha tiṣṭheti mā vraja / adya tvāṃ niśitairbāṇairneṣyāmi yamasādanam

हिन्दी अर्थ

महातेजा महादेवस्तपसा तेस्‍्तु तापितः। तपसा तेन सुप्रीतः क॑ काम विदधामि वः द ८ एवमुक्तास्तदा विश्वे ब्रह्मणा लोककतृ णा। ऊचुस्ते सहिता: सर्वे ब्रह्मार्ण लोकभाविनम् ६ श्राद्धेडस्माक भवेदंशो होषे नः काइक्षितों बरः। प्रत्युवाच ततो ब्रह्मा तानवे त्रिदिवपृजितानू

English

The protection of Sraddha and (according) of hospitality—these are the two ceremonial acts to be performed in the rite oi Sraddha offered to Pitrs and Devatas and Bhutas. If it is done duly according to injunctions, everything shall be all right."

अध्याय १४२

श्लोक 43

एवं परस्परं वीरौ जगर्जतुरुभावपि ।तयोर्युद्धमभूद्घोरं तारकाग्निजसन्निभम्

evaṃ parasparaṃ vīrau jagarjaturubhāvapi / tayoryuddhamabhūdghoraṃ tārakāgnijasannibham

हिन्दी अर्थ

भविष्यत्येवमेवेति काइक्षितों वो वरस्तु यः पितृभिस्तु तथेत्युक्त्वा एकमेतन्न संशयः प्रदाता चेति युष्माकमस्माकं दास्यते ततः । विसर्जनमथास्माक पूर्व पश्चात्तु देवता:

English

After granting them the boon thus, lord Brahma, the

अध्याय १४२

श्लोक 44

चिक्षेप शरजालानि केशवं प्रति दानवः ।नानुचिन्त्य शरांस् तस्य केशवः केशिसूदनः

cikṣepa śarajālāni keśavaṃ prati dānavaḥ / nānucintya śarāṃs tasya keśavaḥ keśisūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

रक्षणं चेव भ्राद्धस्य आतिथ्यं च विधिद्यम् । भूतानां देवतानां च पितुणां श्राद्धक्म णि ॥

English

Five great Yajnas have been prescribed in the Vedas. A Man shall always perform these five Mahayajnas.

अध्याय १४२

श्लोक 45

ततो विष्णुः स्वयं क्रुद्धश्चक्रं गृह्य सुदर्शनम् ।सम्प्रहरत्यमुं यावद्रुक्मिण्यात्र निवारितः

tato viṣṇuḥ svayaṃ kruddhaścakraṃ gṛhya sudarśanam / sampraharatyamuṃ yāvadrukmiṇyātra nivāritaḥ

हिन्दी अर्थ

एवं दत्त्वा वर तेषां ब्रह्मा पितृगणः सह। भुतानुग्रहकृद्देवः संचचार यथासुखभ् १६ ॒॒॑ ... !/ह ॒॒॒/98क्‍खस्॒त कक फकरकर+---न्‍++ै

English

(Listen to) and understand where the performers (of those five Yajnas) go and where their abode is. They attain the abode of Brahman that is fearless, devoid of egotism, free from sorrow, strainless and free from pain. It yields all desires.

अध्याय १४२

श्लोक 46

त्वां न जानाति देवेशं चतुर्बाहुं जनार्दनम् ।दर्शयस्व स्वकं रूपं दयां कृत्वा ममोपरि

tvāṃ na jānāti deveśaṃ caturbāhuṃ janārdanam / darśayasva svakaṃ rūpaṃ dayāṃ kṛtvā mamopari

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म ने कहा:--उन लोगो की (आप लोगों की) इस परम कठोर तपस्या से महातेजस्वी महादेव जी पर माँ प्रसन्न हो गये हैं, हम भी बहुत प्रसन्न हैं, बोलिये, आपके किस मनोरथ को पूर्ण करे। लोक के रचथिता भगवान् ब्रह्मा के ऐसा कहने पर सब विश्वेदेवणण एक साथ ही लोकेश ब्रह्मा से बोले, हम लोगों की आकाइक्षा यह है कि श्राद्ध में हम लोगों को अंश मिले । विश्वेदेवों के ऐसा कहने पर ब्रह्मा

English

These five Yajnas are to be performed by a Sudra also, but without reciting the Mantras. He who eats (enjoys) other¬ wise (without performing them), eats debts everyday.

अध्याय १४२

श्लोक 47

एवमुक्तस्तु रुक्मिण्या दर्शयामास भारत ।देवा दृष्ट्वापि तद्रूपं स्तुवन्त्याकाशसंस्थिताः ।दिव्यं चक्षुस् तदा देवो ददौ रुक्मस्य भारत

evamuktastu rukmiṇyā darśayāmāsa bhārata / devā dṛṣṭvāpi tadrūpaṃ stuvantyākāśasaṃsthitāḥ / divyaṃ cakṣus tadā devo dadau rukmasya bhārata

हिन्दी अर्थ

ने उन स्वगंपूजित विश्वेदेवों से कहा, आप लोग जो वर चाहते हैं, वह सफल होगा । अनन्तर पितरों ने विश्वेदेवों से कहा, प्रह्माजी ने जंसा आप लोगों के लिये कहा है, वह सत्य होगा इसमें सन्देह नहीं ।॥५०११। इस लोक में जो कुछ भी हम लोगों के लियें किया जाता है, उन सब में हमारे साथ तुम लोग रहोगे । हम लोगों के लिये जानेवाले मनुष्यों द्वारा विहित श्राद्ध कम में तुम लोगों का आगे आसन होगा- यह सच कह रहे हैं ।! २। मनुष्य लोग उस श्राद्ध कर्म में विविध प्रकार के कुतपों, मालाओं से सुगंधित द्रव्यों तथा अन्नादि भक्षणीय वस्तुओं से तुम लोगों को प्रथम पू्जित करेंगे । इसी प्रकार जो कुछ भी वस्तुएँदी जायंगी, वह तुम लोगों को पहिले और हम लोगों को बाद में दी जायेगी । विसर्जन में हम लोगों का प्रथम स्थान रहेगा, देवता (आप लोग) गण हम लोगों के पश्चात् विसरजित किये जायँंगे ।१३-१४॥ समस्त भूतों, देवताओं और पितरों के

English

He who cooks for himself is a sinful soul and he eats debts. Hence a sensible man shall perform the five great Yajnas.

अध्याय १४२

श्लोक 48

रुक्म उवाच: यन्मया पापनिष्ठेन मन्दभाग्येन केशव ।सायकैराहतं वक्षस्तत्सर्वं क्षन्तुमर्हसि

rukma uvāca: yanmayā pāpaniṣṭhena mandabhāgyena keśava / sāyakairāhataṃ vakṣastatsarvaṃ kṣantumarhasi

हिन्दी अर्थ

उद्देश्य से किये जानेवाले श्राद्धकर्म में श्राद्ध की सर्वतोभावेन रक्षा और आतिथ्य सत्कार-ये दो विधान हैं । इन दोनों के भली भाँति सम्पन्न हो जाने पर श्राद्ध को सुचारु रूप से सम्पन्न समझना चाहिए। हम लोगों ने जो बातें तुम लोगों से कही हैं-ये सब सत्य होंगी। पितरगणों के साथ सभी जीवों के ऊपर अनुग्रह करते वाले भगवान् ब्रह्मा विश्वेदेवों को इस प्रकार वरदान देकर आनन्द पूर्वक अपने अभीष्ट स्थान

English

The oblation should be made well announced. It shall be scattered by throwing it far above. Small oblations shall at first be offered on the horns of cows (?)

अध्याय १४२

श्लोक 49

पूर्वं दत्ता स्वयं देव जानकी जनकेन वै ।मया प्रदत्ता देवेश रुक्मिणी तव केशव

pūrvaṃ dattā svayaṃ deva jānakī janakena vai / mayā pradattā deveśa rukmiṇī tava keśava

हिन्दी अर्थ

बेदे पन्च महायज्ञा नराणां समुदाहृता:। एतान्पच्च महायज्ञान्निबपेत्सततं नरः १७ यत्र यास्यन्ति दातारः संस्थान वे निबोधत । निर्भयं निरहंकारं निःशोक निव्यंथकलमम् ॥ ब्रह्मस्थानमवाप्नोति सर्वकामपुरस्कृतम् शुद्रेणापि प्रकरतंव्याः पंचेते मन्‍्त्रवजिताः । अनोउन्यथा तु यो भुडक्ते स ऋण नित्यमश्नुते (१ ऋण च भुडक्ते पापात्मा यः पचेदात्मकारणात् । तस्मात्िवंतंयेत्पन्च महायज्ञान्सदा बुधः २०

English

The Pintfa cannot be offered as Naivedya to Pitrs. They should be duly fed by offering palatable foods and edibles. I am emphatically mentioning this as the procedure laid down in the Vedas.

अध्याय १४२

श्लोक 50

उद्वाहय यथान्यायं विधिदृष्टेन कर्मणा ।रुक्मस्य वचनं श्रुत्वा ततस्तुष्टो जगद्गुरुः

udvāhaya yathānyāyaṃ vidhidṛṣṭena karmaṇā / rukmasya vacanaṃ śrutvā tatastuṣṭo jagadguruḥ

हिन्दी अर्थ

नेवेद्य केचिदिच्छन्ति जीवत्यपि प्रयत्नतः । उदकपुर्व बलि कुर्यादुदकुंभं तथव च

English

These groups of Pitrs are noble souls and lords of Devas. Some preceptors wish that Brahmanas should be worshipped first everyday, and then the Pin4a should be offered. (But) Brhaspati* says to those who are experts in matters of Dharma (practice of rituals), that he (the per¬ former of Sraddha) should offer the Pintfa first and then feed

अध्याय १४२

श्लोक 51

बभाषे देवदेवेशो रुक्मिणं भीष्मकात्मजम् ।गच्छ स्वकं पुरं मा भैः कुरु राज्यमकण्टकम्

babhāṣe devadeveśo rukmiṇaṃ bhīṣmakātmajam / gaccha svakaṃ puraṃ mā bhaiḥ kuru rājyamakaṇṭakam

हिन्दी अर्थ

देवदेवा महात्मानों होतेडपि पितरो ह्ात । इच्छन्ति केचिदाचार्याः पश्चात्पिण्डनिवेदनम् २४ पूजन चेव विप्राणां पूर्वमेव हि नित्यशः । तद्दिधर्मार्थकुशलानित्युवाच बृहस्पतिः २५ को चले गये ।१५-१६। वेद में मनुष्यों के लिये पाँच महायज्ञों की चर्चा की गयी है--इन पाँचों यहायज्ञों का मनुष्य सर्वदा अनुष्ठान करे । इन (पाँचों महायज्ञों! के देनेवाले (अनुष्ठान करनेवाले) जिस स्थान को जाते हैं, उसे सुनिये । भय रहित, अहंकार से सबंदा विहीन शोक रहित, परिश्रम को दूर करनेवाले, सभी मनोरथों को पुररूत करने वाले ब्रह्म के स्थान को वे प्राप्त करते हैं। ये पाँचों महायज्ञ- केवल मंत्रोच्चारण को छोड़कर --

English

Hence he (the performer ofSraddha), remaining pure and devotedly attached to Yogins, should offer the Pindas to Yogins. This shall be the Havi offering directly to Pitrs.

अध्याय १४२

श्लोक 52

केशवस्य वचः श्रुत्वा रुक्मो दानवपुंगवः ।तं प्रणम्य जगन्नाथं जगाम भवनं पितुः

keśavasya vacaḥ śrutvā rukmo dānavapuṃgavaḥ / taṃ praṇamya jagannāthaṃ jagāma bhavanaṃ pituḥ

हिन्दी अर्थ

शूद्रों को भी करने चाहिए इन के बिना जो भोजन करता है वह नित्य ऋण का भक्षण करता है ।१७-१६। जो केवल अपने लिये भोजन बनाता हैं वह पापात्मा है और ऋण का भोजन करता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुष को इन पाँचों महायज्ञों का सर्वदा अनुष्ठान करना चाहिए । २०। कुछ लोग पितरों के जीवित रहते समय भी नैवेध करने की इच्छा करते है। तदनन्तर उसके लिये जल दान पूृवंक बलि देनी चाहिए, जल का कलश

English

If a single Yogin be in the scat of priority among thousands of Brahmanas, he will enable the Yajamana and the Brahmanas partaking of the food, cross (the ocean of worldly existence) like a boat in water.

अध्याय १४२

श्लोक 53

गते रुक्मे तदा कृष्णः समामन्त्र्य द्विजोत्तमान् ।मरीचिमत्र्यङ्गिरसं पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्

gate rukme tadā kṛṣṇaḥ samāmantrya dvijottamān / marīcimatryaṅgirasaṃ pulastyaṃ pulahaṃ kratum

हिन्दी अर्थ

भी देनी चाहिए ।२'। ऊँचे से भी ऊँचे स्थाम पर से भली प्रकार विहिंत बलि देनी चाहिए सूक्ष्म (स्वल्प) मात्रा में बलि को लेकर सींगोंवाले गोंओं के ऊपर छोड़नी चाहिए ।६२। जीवित पितरों के लिये पिण्डदान नहीं है। उन्हे केवल विधिपूर्वक सुन्दर पसन्द आनेवाले अन्नों एवं अन्यान्य भक्ष्य भोज्य पदार्थों को खिलाना चाहिए । यह वेदों से सम्मत विधान है, अत इसे यत्नपूर्वक बतला रहा है । २३ ये पितरगण देवताओं के देवता एवं परम महात्मा हैं कुछ आचार्य लोग श्राउ्धकर्म में सर्व प्रथम ब्राह्मणों का पूजन तदतन्तर पिण्डदान के विधान की इच्छा करते हैं ।२४॥ इस प्रक्रिया के मानने वाले धर्मा्थ में कुशल आचार्यों से बृहस्पति कहते हैं। महात्मा पितरगण परम योग/म्यास परायण, योग सम्भव एवं योगिराट् हैं, ये लोग चन्द्रमा को भी सस्तुष्ट करने

English

Where the wicked are accepted and honoured and where the good are disrespected, a terrible punishment meted out by the Devas befalls them immediately.

अध्याय १४२

श्लोक 54

वसिष्ठं च महाभागमित्येते सप्त मानसाः ।इत्येते ब्राह्मणाः सप्त पुराणे निश्चयं गताः

vasiṣṭhaṃ ca mahābhāgamityete sapta mānasāḥ / ityete brāhmaṇāḥ sapta purāṇe niścayaṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

दद्ै० वायुपुराणभ्

English

If a pious (Brahmana) who has come as a guest is left out and a foolish one is fed, the householder forgoes his prior holy rites and perishes (i.e. despite his merit in a previous birth he is faced with ruin).

अध्याय १४२

श्लोक 55

क्षमावन्तः प्रजावन्तो महर्षिभिर् अलंकृताः ।इत्येवं ब्रह्मपुत्राश्च सत्यवन्तो महामते

kṣamāvantaḥ prajāvanto maharṣibhir alaṃkṛtāḥ / ityevaṃ brahmaputrāśca satyavanto mahāmate

हिन्दी अर्थ

असर्ता प्रग्रहो यत्र सतां चेव विमानना । दण्डो देवकृतस्तन्न सद्यः पतति दारुणः २६ हित्वा5डगर्म॑ सधर्माणं बालिशं यत्र भोजयेत् । आदिकर्म समुत्सृज्य दाता तत्न विनश्यति ३० उत्तमां द्युतिमान्विच्छन्गोषु नित्य॑ प्रयच्छति । प्रज्ञा पूजां यशः कोति गोषु नित्य॑ प्रयच्छति ४३२ प्रार्थयन्दी्घमायुश्व॒ वायसे भयः प्रयच्छति । सौकुमायंमथान्विच्छन्कुक्कुटेम्यः प्रयच्छति ॥३२३े एव्मेतत्समुदिष्ट पिण्डनिवंपणात्फलम् । आकाश शमयेद्वाईपि स्थितोधप्सु दक्षिणामुखः ॥

English

He who seeks enjoyment (of worldly pleasures) should assiduously consign the Pinda to the sacred fire. 1 Pie who seeks progeny shall give the middle Pinda to his wife but after per¬ forming all the intervening rites and mantras.

अध्याय १४२

श्लोक 56

नर्मदातटमाश्रित्य निवसन्ति जितेन्द्रियाः ।तपःस्वाध्यायनिरता जपहोमपरायणाः

narmadātaṭamāśritya nivasanti jitendriyāḥ / tapaḥsvādhyāyaniratā japahomaparāyaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

पितुंणां स्थानमाकाशं दक्षिणा चंब दिग्भवेत्

English

Pie who wishes for excellent refulgence always offers it (the Pinda) to cows. So also he who wishes for intellect, honour, fame and renown, offers it always to cows.

अध्याय १४२

श्लोक 57

निमन्त्रितास्तु राजेन्द्र केशवेन महात्मना ।श्राद्धं कृत्वा यथान्यायं ब्रह्मोक्तविधिना ततः

nimantritāstu rājendra keśavena mahātmanā / śrāddhaṃ kṛtvā yathānyāyaṃ brahmoktavidhinā tataḥ

हिन्दी अर्थ

वाले हैं, अत, सर्वप्रथम इन्हें पिण्डदान करना चाहिए, पश्चात् ग्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए । इसी लिये पितरों में श्रद्धा एवं भक्ति रखनेवाले व्यक्ति पकित्र होकर उन परम योगी पितरों को सर्वप्रथम पिण्डदान दें यह पिण्डदान ही पितरों के लिये साक्षात् अग्नि में हुनी गई हवि के समान है ।२५-२ । श्राद्ध के अवसर पर सहस्नों ब्राह्मणों में से यदि एक भी योगाम्यासी अग्रासन पर बिठाया गया हैं तो वह अकेला ही जल में नाव की तरह यजमान और अन्य भोकक्‍्ता -सब का उद्धार करता है ।२८। जिस स्थान पर असत्पुरुषों का विशेष सम्मान एवं सत्पुरुषों का अपमान होता है, वहाँ अति दारुण देवदण्ड शीघ्र ही गिरता है ।२६९। जिस स्थान पर घर्माचरण में रत रहनेवाले एवं अतिथि रूप में समागत ब्राह्मण को छोड़कर किसी धृते अथवा मूल ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है, वहाँ वह दाता अपने पूर्व जन्म के भोग्य कर्मों के रहते हुये भी विनाश को प्राप्त होता है

English

He who seeks long life gives it to crows. One desirous of comeliness offers (oblations) to the fowl.

अध्याय १४२

श्लोक 58

हरिस्तान्पूजयामास सप्तब्रह्मर्षिपुंगवान् ।प्रददौ द्वादश ग्रामांस्तेभ्यस्तत्र जनार्दनः

haristānpūjayāmāsa saptabrahmarṣipuṃgavān / pradadau dvādaśa grāmāṃstebhyastatra janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

भोग की इच्छा करनेवाला प्रयत्न पूर्वक सर्वदा अग्ति में पिण्डदान करे सन्‍्तति का अभिलाषी स्त्रियों को सबंदा पिण्ड दें, किन्तु ऐसे समय भी पिण्डदात की अन्य क्रियाएँ उससे पूर्व ही कर लेनी चाहिए ।३१॥ उत्तम काह्ति की अभिलाषा करनेवाला नित्य गौओं को पिण्डदान करता है, इसी प्रकार उत्तम बुद्धि, पुजा, (सम्मान) यश, कीति की अभिलाषों भी नित्य गौंओं को पिण्ड देता है ।३२। दीर्घायु की प्राथंना करनेबाला नित्य भ्रति कोओं के

English

Thus the benefit of offering Pindas has been recounted. Or the devotee shall stand facing the south and pacify the sky (scatter the oblations in the sky) 2. The abode of Pitrs is the sky and their quarter is the south.

अध्याय १४२

श्लोक 59

यावच्चन्द्रश्च सूर्यश्च यावत्तिष्ठति मेदिनी ।तावद्दानं मया दत्तं परिपन्थी न कश्चन

yāvaccandraśca sūryaśca yāvattiṣṭhati medinī / tāvaddānaṃ mayā dattaṃ paripanthī na kaścana

हिन्दी अर्थ

लिये बलिदान करता है । सुकुमारता का इच्छुक व्यक्ति मुर्गों को नित्य बलिदान देता है ।१३॥ पिण्डदान के फल का वर्णन कर चुका। अथवा जल में दक्षिणाभिमुख स्थित होकर आकाश को बलि दे क्योंकि पितरों का स्थान आकाश और दिल्ला दक्षिण मानी गयी है ।३४। बाह्यण लोग श्राद्धकर्म में एक पिण्डोद्धार की प्रक्रिया ( बेवस्वताय सोमाय हुत्वा पिण्ड निवेद्य सः। उदकानयन कृत्वा पश्चाद्विप्रांश्व॒ भोजयेत् ॥

English

(Defective) Further, Brahmanas mention one procedure of lifting up the Pinda. After being permitted by Brahmanas who say %et it be taken up dry"

अध्याय १४२

श्लोक 60

मद्दत्तं पालयिष्यन्ते ये नृपा गतकल्मषाः ।तेभ्यः स्वस्ति करिष्यामि दास्यामि परमां गतिम्

maddattaṃ pālayiṣyante ye nṛpā gatakalmaṣāḥ / tebhyaḥ svasti kariṣyāmi dāsyāmi paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

स्निग्धभंक्षये: सुगन्धेश्व तपंयेत रसस्तथा । एकाग्र: पर्युपासीत प्रयतः प्रारुजलिःस्थितः ॥

English

Verses 31-34 prescribe the disposal of Pindas and the benefits accru¬ ing from it. Cf. Mbh. Anuiasana 1 25.38-40, BM. 150-52 for similar views.

अध्याय १४२

श्लोक 61

यावद्धि यान्ति लोकेषु महाभूतानि पञ्च च ।तावत्ते दिवि मोदन्ते मद्दत्तपरिपालकाः

yāvaddhi yānti lokeṣu mahābhūtāni pañca ca / tāvatte divi modante maddattaparipālakāḥ

हिन्दी अर्थ

तत्पर: भ्रदधानश्र कामानाप्नोति मानव: ॥३ ७ अक्षुद्रत्वं कृतज्ञत्वं दाक्षिण्यं सत्कृतं च यत् । ततो यज्ञ च दान॑ च प्रयच्छन्ति पितामहाः १३४० आगे बतलाते हैं, उन विप्रों की पिण्डों का उद्धार कीजिये,--ऐसी आज्ञा (?) प्राप्त हो जाने पर यह विधि करनी चाहिए पुष्प, फल भक्ष्य, अन्न इन सब के अग्रभाग को नॉश्वकर सर्वप्रथम अग्नि में हवन कर देना चाहिए। पिण्डदान करनेवाले व्यक्ति दक्षिण ओर मुख करके विविध खांद्य सामग्रियाँ, अन्न, पीने की सामग्रियाँ अत्युत्तम फल--इन सब वस्तुओं को अग्नि में हवन करने के उपरान्त पिण्डदान करे ।३५-३७। वैवस्वत (यम)

English

'or scatter them in the water' (in Bd. P.) for 'Slhitau' hereof be

अध्याय १४२

श्लोक 62

यस्तु लोपयते मूढो दत्तं वः पृथिवीतले ।नरके तस्य वासः स्याद् यावदाभूतसम्प्लवम्

yastu lopayate mūḍho dattaṃ vaḥ pṛthivītale / narake tasya vāsaḥ syād yāvadābhūtasamplavam

हिन्दी अर्थ

और सोभ को पिण्ड निवेदन करने के उपरान्त जलानयन कर लेने पर पीछे ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। उन्हें विविध खाद्य पदार्थों- एवं अन्नादि द्वारा अपनी दाक्ति भर वस्तुओं का क्रश: भोजन कराना चाहिए । चिकने खाद्य पदार्थ, सुगंधित खाद्य पदार्थ से सन्तुष्ट करके विविध रसों द्वारा तृप्त करे । तदनन्तर अकेले एकान्तबित होकर हाथ जोड़े हुये उनकी विधिवत् पूजा करे। इस श्राद्धकर्म में तत्पर एवं श्रद्धा रखने

English

The upper layer or the tip of flowers, fruits, edibles and cooked food shall be taken up and offered as oblation in the sacred fire.

अध्याय १४२

श्लोक 63

स्वदत्ता परदत्ता वा पालनीया वसुंधरा ।यस्य यस्य यदा भूमिस् तस्य तस्य तदा फलम्

svadattā paradattā vā pālanīyā vasuṃdharā / yasya yasya yadā bhūmis tasya tasya tadā phalam

हिन्दी अर्थ

वाला मनुष्य अपने सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करता है ।३८-३६। पितामहगण उसे अक्षुद्रता (महत्त्व) कृतज्ञता चतुरता, सत्कार, यज्ञ, दान आदि की शक्ति देते हैं। ऋषि वुन्द ! अब इसके उपरान्त ब्राह्मणों के भोजन कर लेने पर जो जो क्रियाएँ श्राद्धकर्म में होती हैं, उन्हें में बतला रहा हूँ, सुनिये ४०-४१। सबसे पहले पितरों में भक्ति रखनेवाला भूमि का सिंचन एवं उसका परिष्कार करके विधान के अनुसार धनुदिच्वान्तगंतग्रश्यः क. पुस्तके नास्ति ।

English

After consigning the edibles, cooked food, beverage and the excellent fruits to the fire, he should face the south and offer the Pindas.

अध्याय १४२

श्लोक 64

स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुंधराम् ।स विष्ठायां कृमिर्भूत्वा पितृभिः सह मज्जति

svadattāṃ paradattāṃ vā yo hareta vasuṃdharām / sa viṣṭhāyāṃ kṛmirbhūtvā pitṛbhiḥ saha majjati

हिन्दी अर्थ

फेरे वायुपुराणम्

English

He shall propitiate (them) with oily edibles, sweet scents and juices. With concentration and purity of mind, he should serve them standing (there) with palms joined in reverence. A man devoted to them and full of faith, obtains the desires.

अध्याय १४२

श्लोक 65

अन्यायेन हृता भूमिरन्यायेन च हारिता ।हर्ता हारयिता चैव विष्ठायां जायते कृमिः

anyāyena hṛtā bhūmiranyāyena ca hāritā / hartā hārayitā caiva viṣṭhāyāṃ jāyate kṛmiḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते श्राद्ध कल्पो नाम षट्सप्ततितमोअध्याय: सक्ृदर्भ्याचताः प्रीता भवन्ति पितरोब्ययाः । योगात्मानों महात्मानों विपाप्मानो महौजसः

English

The grandfathers (manes) bestow the (following) qualities on him: the state of not being mean and low (non¬ pettiness), gratefulness, chivalry, hospitality and the (ability for performance of) sacrifices and religious gifts.

अध्याय १४२

श्लोक 66

षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गे तिष्ठति भूमिदः ।आच्छेत्ता चानुमन्ता च तान्येव नरके वसेत्

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi svarge tiṣṭhati bhūmidaḥ / ācchettā cānumantā ca tānyeva narake vaset

हिन्दी अर्थ

प्रेत्य च स्वगलाभाय कार्वेश्वर्य सुविस्तरम् । येषां चाप्यनुगृह्न्ति मोक्षप्राप्तिक्रमेण तु २

English

Henceforth I shall recount the Saumya* (belonging to Soma) procedure after the Brahmanas have taken food, in order. Listen to it, even as I recount it.

अध्याय १४२

श्लोक 67

यानीह दत्तानि पुरा नरेन्द्रैर् दानानि धर्मार्थयशस्कराणि ।निर्माल्यरूपप्रतिमानि तानि को नाम साधुः पुनराददाति

yānīha dattāni purā narendrair dānāni dharmārthayaśaskarāṇi / nirmālyarūpapratimāni tāni ko nāma sādhuḥ punarādadāti

हिन्दी अर्थ

तानि वक्ष्याम्यहूं सोस्‍्या: सरांसि सरितस्तथा। तीर्थानि चेव पुण्यानि देशाअशेलांस्तथा55श्रमान् विफिरण करे। तदनन्तर ब्राह्मणों से स्वधा वाचन करा के प्रचुर दक्षिण प्राप्त उत्तम ब्राह्मणों का विधिवत सत्कार कर शेष अन्न को आाज्ञा प्राप्त कर, हाथ जोड़, मन एवं इन्द्रियों को स्ववश रब कुछ दूर तक उनको पहुँचा कर विसर्जन करे

English

The devotee attached to Pitrs should sprinkle the ground and scrub it at the outset. Then he should scatter (auspicious materials) in accordance with the injunctions. He shall request the excellent Brahmanas to chant the Svadha mantra and offer them plenty of Daksinas. He shall get the permission from them (as to what should be done with) the remnants of the food. With palms joined in reverence, he shall follow them after honouring them duly. He should then bid farewell.

अध्याय १४२

श्लोक 68

एवं तान्पूजयित्वा तु सम्यङ् न्यायेन पाण्डव ।रुक्मिण्या विधिवत्पाणिं जग्राह मधुसूदनः

evaṃ tānpūjayitvā tu samyaṅ nyāyena pāṇḍava / rukmiṇyā vidhivatpāṇiṃ jagrāha madhusūdanaḥ

हिन्दी अर्थ

छहस्पति जी बोले:--सौम्यगण ! ये पितरगण केवल एक बार पूजा प्राप्त कर लेने पर परम प्रसन्न हो जाते हैं, ये कभी नष्ट होनेवाले नहीं हैं, योगी हैं, महात्मा हैं, पाप रहित हैं, महान् तेजस्वी हैं

English

Pitfs worshipped even once become delighted. They are imperishable Yogic souls. They are noble souls of great power and free from sins and evils.

अध्याय १४२

श्लोक 69

मुशली च ततः सर्वाञ्जित्वा दानवपुंगवान् ।स्वस्थानम् अगमत् तत्र कृत्वा कार्यं सुशोभनम्

muśalī ca tataḥ sarvāñjitvā dānavapuṃgavān / svasthānam agamat tatra kṛtvā kāryaṃ suśobhanam

हिन्दी अर्थ

अब मैं इस जन्म के उपरान्त स्वर्ग लाभ करानेवाले, विस्तृत मनोरथ एवं एश्बय को देनेवाले, मोक्ष प्राप्ति के सहायक उन सरोवरों, सरिताओं, पुण्यप्रद तीथों, देशों एवं पव॑तों का वर्णन कर रहा हें, जिन पर (पितरगण ) १. विघ्तों को दूर करने के लिये फेंकी गयी गई एवेत सरसों आदि बस्तुएँ।

English

O gentle ones, I shall recount the holy lakes, rivers, sacred spots, places of pilgrimage, mountains and hermitages for performing Sraddha, at which Pitrs bless him (the performer) with fulfilment of desire for profuse riches (in this world), attainment of heaven after death and liberation from Samsara in due course.

अध्याय १४२

श्लोक 70

प्रयातौ द्वारवत्यां तौ कृष्णसंकर्षणावुभौ ।गच्छमानं तु तं दृष्ट्वा केशवं क्लेशनाशनम्

prayātau dvāravatyāṃ tau kṛṣṇasaṃkarṣaṇāvubhau / gacchamānaṃ tu taṃ dṛṣṭvā keśavaṃ kleśanāśanam

हिन्दी अर्थ

पुण्यो यस्त्रिषु लोकेध्वमरकण्टकपबवंतः । पर्वृतप्रवरः पुण्यः सिद्धचारणसेवितः ४ यत्र वर्षसहल्लाणि प्रयुतान्यबंदानि च्। लपः सुदृश्चर तेपे भगवानड्रिराः पुरा ३५

English

The mountain Amarakantaka 2 is the holiest and the most excellent in the three worlds. It is a sacred mountain resorted to by Siddhas and Caranas. Formerly, holy lord Angiras performed very severe penance (difficult for others to do) on it, for thousands of years, say, millions and crores of years.

अध्याय १४२

श्लोक 71

ब्राह्मणाः सत्यवन्तश्च निर्गताः शंसितव्रताः ।आगच्छमानांस् तौ वीक्ष्य रथमार्गेण ब्राह्मणान्

brāhmaṇāḥ satyavantaśca nirgatāḥ śaṃsitavratāḥ / āgacchamānāṃs tau vīkṣya rathamārgeṇa brāhmaṇān

हिन्दी अर्थ

तेजसा यशसा चेव भ्राजते स नगोत्तमः । शुद्धमाल्यबतो नित्य॑ बह्िः संबर्तकों यथा ७ दुष्टवान्स्वर्गसोपान भगवानड्िराः पुरा । अग्निहोत्रे महातेजाः प्रस्तराथथंकुशोत्तमान्

English

As long as the earth holds (lasts), the god of death,

अध्याय १४२

श्लोक 72

मुहूर्तं तत्र विश्रम्य केशवो वाक्यम् अब्रवीत् ।किमागमनकार्यं वो ब्रूत सर्वं द्विजोत्तमाः

muhūrtaṃ tatra viśramya keśavo vākyam abravīt / kimāgamanakāryaṃ vo brūta sarvaṃ dvijottamāḥ

हिन्दी अर्थ

तेषु दर्भषु पिण्डास्योइसरकण्टकपवंते । दणद्यात्सकृदपि प्राज्ञस्तस्य वक्ष्यामि यत्फलम्

English

Due to their association with the founders of faith or with some great persons or events certain places have been regarded holy by all peoples of the world, e.g. Mecca by Muslims, Jerusalem by Christians, Bodha Gaya by Buddhists. These holy places have a deep psychological effect on religious-minded persons. Sraddha is to be performed in one's own house. But as K.P. II. 22.17 states, holy places arc the common property of all and not of a particular person. A list of such holy places is recommended in different Puranas like KP. II. 20-32-36, Mt, P. Ch. 22, Bd. 3.13. There is some divergence in the lists but there is a great deal of overlapping as a number of holy places like Prayaga, Varanasi, Gaya, Puskara are deeply respected by all Hindus.

अध्याय १४२

श्लोक 73

कुर्वाणाः स्वीयकर्माणि मम कृत्यं तु तिष्ठते ।देवस्य वचनं श्रुत्वा मुनयो वाक्यम् अब्रुवन्

kurvāṇāḥ svīyakarmāṇi mama kṛtyaṃ tu tiṣṭhate / devasya vacanaṃ śrutvā munayo vākyam abruvan

हिन्दी अर्थ

तन्न ज्वालारसः पुण्यो दृश्यतेष्यापि सर्वंशः सशल्यानां च सत्त्वानां विशल्यकरणी नदी ३१२ प्रादगक्षिणा तु सावर्ता वापी सा पर्व॑तोत्तमे । कलिडगदेशपार्श्ा्थे पितुर्णां प्रीतिवर्धनम् सिद्धक्षेत्रमूषिश्रेष्ठा यदुक्‍त परम भुवि । संमतो देवदेत्यानां श्लोकमप्युशना जगो ३१४

English

That excellent mountain shines with brilliance and renown, just as Samvartaka fire (Fire at the time of the annihila¬ tion of the world) blazes on the peak of mount Malyavan.

अध्याय १४२

श्लोक 74

कल्पकोटिसहस्रेण सत्यभावात्तु वन्दितः ।दुष्प्राप्यो ऽसि मनुष्याणां प्राप्तः किं त्यजसे हि नः

kalpakoṭisahasreṇa satyabhāvāttu vanditaḥ / duṣprāpyo 'si manuṣyāṇāṃ prāptaḥ kiṃ tyajase hi naḥ

हिन्दी अर्थ

अनुग्रह करते हैं। जो तीनों लोकों में पुण्यप्रद है वह अमरकण्टक सभी पर्वतों में श्रेष्ठ, पुण्यदायी तथा सिद्ध और चारणों द्वारा सेवित है ।२-४॥ जिन पर सहस्रों क्या करोड़ों अरबों बरस तक प्राचीनकाल में भगवान् अंगिरा ने परम कठोर तपस्या की थी ।५॥ जहाँ पर मृत्यु की भी गति नहीं है, असुर एवं राक्षसों से भी भय नहीं है तथा जब तक भूमि स्थित रहेगी तब तक लक्ष्मी का अभाव नहीं रहेगा, वह उत्तम नगराज अपने परभ तेज

English

The Kusa (growing there) is famous as soft, sweet¬ smelling, pleasing to the eyes and golden-coloured. They are well known as 'calm and quiet' Darbhas. Drinking the waters* of Narmada to the south of it, the holy lord Angiras of great brilliance formerly performed Agnihotra after spreading those excellent Kusas round the altar and he saw the steps leading to the heaven.

अध्याय १४२

श्लोक 75

ब्राह्मणानां वचः श्रुत्वा भगवान् इदम् अब्रवीत् ।मथुरायां द्वारवत्यां योधनीपुर एव च

brāhmaṇānāṃ vacaḥ śrutvā bhagavān idam abravīt / mathurāyāṃ dvāravatyāṃ yodhanīpura eva ca

हिन्दी अर्थ

एवं यश से सुशोभित है । उसके परम उच्च शिखर के वक्षों पर खिले हुये पुष्यों से उसकी शोभा संवर्तक अग्नि की तरह है ।६-७। इस पर्वेतराज पर उगनेवाले कुश अति मृदु, सुगन्धित सुर्वेण के समान कान्तिवाले, देखने में मनोहर तथा शान्ति उत्पन्न करनेवाले प्रसिद्ध हैं। प्राचीतकाल में महान् तेजस्वी भगवान् अंगिरा ने अग्नि होतर में पृथ्वी पर बिछाने के लिये इन उत्तम कुझों का उपयोग किया था, दक्षिण भाग में नमंदा के जल का पान किया था, जिसके फल स्वरूप उन्हें स्वर्ग के सोपान दिखाई पड़े थे। जो बुद्धिमान् व्यक्ति पवित्र अमरकण्टक पर्वत पर. उन्हीं कुशों पर एक बार भी पिण्डदान करता है, उसके फल को बतला रहा हूँ । उसका किया हुआ वह श्राद्ध पितरों को परम प्रसन्न करनेवाला एवं अक्षय फलप्रदायी है। सबंदा इस पवित्र क्षेत्र को प्राप्त हो कर वे अन्तहित हो जाते हैं ।5-१ १। आज भी उस पवित्र पव॑त पर ज्वाला सरोवर (?) सम्पूर्ण रूप में दिखाई पड़ता

English

I shall recount the benefit attained by that intelligent man who offers Pindas even once, on the Darbhas on the mountain Amarakantaka.

अध्याय १४२

श्लोक 76

त्रिकालमागमिष्यामि सत्यं सत्यं पुनः पुनः ।एवं ते ब्राह्मणाः श्रुत्वा योधनीपुरमागताः

trikālamāgamiṣyāmi satyaṃ satyaṃ punaḥ punaḥ / evaṃ te brāhmaṇāḥ śrutvā yodhanīpuramāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

हैं, हंड्डीवाले जीवों को रोग मुक्त करनेवाली विशल्य करणी नामक नदी है ।१२। उस पर्वतराज अमरकण्टक के पृष्ठभाग पर पूर्व दक्षिण दिशा में फैली हुई वह् पवित्र बावली है। कलिज्ञंदेव के पाश्वेभाग में पितरों को अति प्रसन्न करनेवाला सिद्धक्षेत्र है, हें ऋषिश्रेष्ठाण ! वह स्थान पृथ्वी तल पर पवित्र कहा जाता है ।

English

That Sraddha becomes everlasting, increasing the pleasure of Pitps. On reaching that holy centre, they vanish for ever.

अध्याय १४२

श्लोक 77

अवतीर्णस्त्रिभागेन प्रादुर्भावे तु माथुरे ।एतत्ते कथितं सर्वं तीर्थस्योत्पत्तिकारणम्

avatīrṇastribhāgena prādurbhāve tu māthure / etatte kathitaṃ sarvaṃ tīrthasyotpattikāraṇam

हिन्दी अर्थ

धन्यास्ते पुरुषा लोके ये प्राप्पामरकण्टकम् । पित॒न्संतपंयिष्यन्ति भ्राद्धे पितृपरायणा: १५ अल्पेन तपसा सिद्धि गभिष्यन्ति न संशय: । सक्रुदेवाचितास्तत्न स्वर्गंसमरकण्टके . बिल्वाध: शिक्षरे युक्ता दिव्य चक्षुः प्रवतंते । अदृश्यं चेव भुतानां देवबच्चरते महीम् (१८ सप्तगोदावरे चेव गोकर्णे च तपोवने । अश्वमेधफलं तत्न स्नात्वा च लभते नरः

English

Even today the holy " Jvalarasa " is seen there every¬ where. The river thereof (called Visalya—a branch of Narmada) makes all living beings free from darts and thorns (sins and miseries).

अध्याय १४२

श्लोक 78

भूतं भव्यं भविष्यच्च वर्तमानं तथापरम् ।यं श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः

bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyacca vartamānaṃ tathāparam / yaṃ śrutvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

धूतपापस्थल प्राप्य पृतः स्नात्वा भवेज्नरः । रुत्रस्तन्न तपस्तेपे देवदेवो महेश्वरः

English

To the south-east of that excellent mountain, there is a tank with a whirlpool in that part contiguous to the land of Kalinga. O excellent sages, there. is that great holy centre Siddhaksetra which increases the delight of Pitrs. It is the greatest on the earth, approved of by both Devas and Daityas. Usanashas sung a verse on it.

अध्याय १४२

श्लोक 79

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेद् बलकेशवौ ।तेन देवो जगद्धाता पूजितस्त्रिगुणात्मवान्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayed balakeśavau / tena devo jagaddhātā pūjitastriguṇātmavān

हिन्दी अर्थ

गोकर्णे बरणितं विप्रेर्नास्तिकानां निदर्शनम् । अन्नाह्मणस्य सावित्री पठतः संप्रणश्यति ॥२ १ देबधिभवने शुद्धभो सिद्धचारणसेविते । आरुह्म तं तु नियसात्ततो यान्ति त्रिविष्टपम॒ दिव्येभ्नरदनवुक्षेश्व॒ पादपेरुपशों भितम् । आपश्रन्दनसंपृक्ता वहन्ति सततं यतः

English

"Blessed are those men in the world who being devoted to Pitrs propitiate them in Sraddha after reaching Amara¬ kantaka.

अध्याय १४२

श्लोक 80

उपवासी नरो भूत्वा यस्तु कुर्यात् प्रदक्षिणम् ।मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा

upavāsī naro bhūtvā yastu kuryāt pradakṣiṇam / mucyate sarvapāpebhyo nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

नद्यास्तस्यास्तु या आपो मृच्छेमाना महोदधो । शद्भृग भवन्ति मुक्ताश्न जायन्ते शद्धमुक्तिका:

English

There is no doubt in this that they will attain Siddhi with very little penance. If they are worshipped even once on Amarakantaka, Pitrs attain Heaven".

अध्याय १४२

श्लोक 81

तत्र तीर्थे तु ये वृक्षास्तान्पश्यन्त्यपि ये नराः ।ते ऽपि पापैः प्रमुच्यन्ते भ्रूणहत्यासमैर् अपि

tatra tīrthe tu ye vṛkṣāstānpaśyantyapi ye narāḥ / te 'pi pāpaiḥ pramucyante bhrūṇahatyāsamair api

हिन्दी अर्थ

कि इस लोक में वे पुरुष घन्य हैं, जो अमरकण्टक पश्बत पर जाकर अपने पितरों में श्रद्धा भाव रखकर भाद्ध में उन को सल्तुष्ट करेंगे। उस पवंतराज अमरकण्टक पर अल्प तपस्या द्वारा ही लोग सिद्धि प्राप्त करते हैं, इसमें सन्देह नहीं है कि एक ही बार पूजित होकर पितरगण वहाँ पर स्वर्ग प्राप्त करते हैं ।१३-१६। परम रमणीय महेन्द्र पव॑त पर इन्द्र द्वारा सेवित एक पुण्यप्रद स्थान है, वहाँ पर आरोहरण करने से पितरगणों को परम प्रसन्नता होती है और श्राद्ध का महान फल होता है ।१७। विल्वाध (?) शिखर पर जाने से दिव्य नेत्र की प्राप्ति होती है, जिससे मनुष्यों से अदृश्य होकर देवताओों की भाँति पृथ्वी पर विचरण करता है।१८। सप्त गोदाबर तथा गोकर्ण नामक तपोवन में स्नान कर मनुष्य अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त करता है ।१६। धृतपाप नामक स्थान 'पर जाकर स्नान करनेवाला मनुष्य परम पवित्र हो जाता है, वहाँ पर देव-देव महेश्वर शंकरजी ने

English

On the beautiful Mahendra 1 mountain, there is a holy centre resorted to by Sakra. If one mounts it, Pitrs are delighted. The Sraddha (if performed) there, yields great fruit.

अध्याय १४२

श्लोक 82

प्रातरुत्थाय ये केचित्पश्यन्ति बलकेशवौ ।तेन ते सदृशाः स्युर् वै देवदेवेन चक्रिणा

prātarutthāya ye kecitpaśyanti balakeśavau / tena te sadṛśāḥ syur vai devadevena cakriṇā

हिन्दी अर्थ

परम कठोर तपदचर्या की थी ।२०। उस ग्रोकर्ण नामक स्थान के विषय में ब्राह्मण लोग नास्तिकों के लिये एक अधान लक्षण यह बतलाते हैं कि जो लोग ब्राह्मण न होकर वहाँ गायत्री का पाठ करते हैं, उसकी साविश्नी नाश को प्राप्त होता है ।२१। सिद्धों भौर चारणों से सेवित देवाष के भवन वाले शिखर पर नियमपूर्वक आरोहण क रने- वाले मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। क्योंकि उस परम रमणीय शिखर प्रदेश में दिव्य चन्दनादि के वृक्ष परम

English

If one practises Yoga on its lower peak named Bilva (Vailata in Bd.P.), one gets divine vision. I-Ie becomes invisible to all living beings and roams over the earth like a Deva.

अध्याय १४२

श्लोक 83

ते पूज्यास्ते नमस्कार्यास् तेषां जन्म सुजीवितम् ।ये नमन्ति जगन्नाथं देवं नारायणं हरिम्

te pūjyāste namaskāryās teṣāṃ janma sujīvitam / ye namanti jagannāthaṃ devaṃ nārāyaṇaṃ harim

हिन्दी अर्थ

शोभा बढ़ाते हैं, और चन्दन मिश्रित जल की शीतल घारा निरंतर प्रवाहित होती है ।२२-२३। उन जल धाराओं से ताम्रपर्णी नामक नदी प्रवाहित होती है, जो उप्त पव॑तराज की मदोध्मत्त एबं खेद से थकी हुई बाला की तरह दाने: शने: दक्षिण के समुद्र में जाकर मिलती है ।२४। उस ताम्रपर्णी कौ जलराशि महासभुद्र में मिलकर शब्भू- पुक्ता और शब्लमुक्तिका के रूप में उत्पन्न होती है ।२५। जो मनुष्य शद्भ॒ औौर मुक्ताओं के समेत उसके जल को उदकानयन कृत्वा शद्धूमोौक्तिकसंयुतम् । आधिभिर्व्याधिभिश्चेव मुक्ता यानत्यमरावतीम्

English

If a man takes his holy ablution in the Saptagodavara 2 and in the penance grove Gokarna 3, he attains the benefit of a horse-sacrifice.

अध्याय १४२

श्लोक 84

तत्र तीर्थे तु यद्दानं स्नानं देवार्चनं नृप ।तत्सर्वमक्षयं तस्य इत्येवं शङ्करो ऽब्रवीत्

tatra tīrthe tu yaddānaṃ snānaṃ devārcanaṃ nṛpa / tatsarvamakṣayaṃ tasya ityevaṃ śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

चन्द्रतीर्थ बरे पुण्ये पृण्यक्ज्धि निष बिते । चन्द्रतीर्थे कुमार्या तु कावेयाँ प्रभवे5क्षये ॥।

English

A man becomes sanctified after taking his holy dip in Dhutapapa. 4 Rudra, Mahesvara, the lord of Devas, performed a penance there.

अध्याय १४२

श्लोक 85

प्रविश्याग्नौ मृतानां च यत्फलं समुदाहृतम् ।तच्छृणुष्व नृपश्रेष्ठ प्रोच्यमानमशेषतः

praviśyāgnau mṛtānāṃ ca yatphalaṃ samudāhṛtam / tacchṛṇuṣva nṛpaśreṣṭha procyamānamaśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

एतद्डि मण्डल सिद्ध यज्ञियं द्विजसत्तमा:। अस्मिस्मुक्त्वा जनो5ड्गानि क्षिप्रं यात्यमरावतीम् कर्माणि स्वप्रयुक्तानि सिध्यन्ति प्रभवात्यये । दुष्प्रसक्तानि पितृष्षु प्रयुक्तानि भवन्त्युत ३ १ पिता दुहिता पुण्या नमंदा सरितां वरा। ततन्न भ्राद्धानि दत्तानि अक्षयाणि भवन्त्युत

English

In the holy place Gokarna, a proof has been cited by Brahmanas for (convincing?) the atheists. If a non-Brahmana recites the Gayatrl mantra, he perishes.

अध्याय १४२

श्लोक 86

विमानेनार्कवर्णेन किंकिणीजालमालिना ।आग्नेये भवते तत्र मोदते कालमीप्सितम्

vimānenārkavarṇena kiṃkiṇījālamālinā / āgneye bhavate tatra modate kālamīpsitam

हिन्दी अर्थ

माठरस्य वने पुण्ये सिद्धचारणसेवितम् । अन्तर्धानं न गच्छन्ति सक्तास्तस्तस्मिन्महागिरोौं

English

Those who regularly ascend the peak, the abode of Devas and sages, resorted to by Siddhas and Caranas, attain heaven.

अध्याय १४२

श्लोक 87

जले चैवा मृतानां तु योधनीपुरमध्यतः ।वसन्ति वारुणे लोके यावदाभूतसम्प्लवम्

jale caivā mṛtānāṃ tu yodhanīpuramadhyataḥ / vasanti vāruṇe loke yāvadābhūtasamplavam

हिन्दी अर्थ

बिन्‍्थ्ये चेव गिरो पुण्ये धर्माधमंनिदर्शनम् । पापधारां न पश्यन्ति धारा पश्यन्ति साधव: तस्यां तु दृश्यते पाप॑ केषांचित्पापकर्मणाम् । स्पष्टठा भवति सा धारा प्रायश: शुभक्ंणामू

English

Since the place is embellished with divine sandal¬ wood and other trees and since the water mixed with the flavour of sandal flows continuously, a river named Tamraparni 5 originates from them. It slowly winds its way to the southern

अध्याय १४२

श्लोक 88

अनाशके मृतानां तु तत्र तीर्थे नराधिप ।अनिवर्तिका गतिर् नृणां नात्र कार्या विचारणा

anāśake mṛtānāṃ tu tatra tīrthe narādhipa / anivartikā gatir nṛṇāṃ nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

लाते हैं, वे समस्त आधि व्याधिओं से मुक्त होकर अमरावती को प्राप्त करते हैं ।२६। चन्दनों से संयुक्त छांखों और मुक्ताओं के दान करने से वहाँ पर लोग अपने पाप करने वाले पितरों का भी उद्धार कर देते हैं-ऐसी श्रति है ।२७। पुण्यात्मा जनों द्वारा सुसेवित चन्द्र नामक पृण्यप्रद तीथ में, कुमारी में, कावेरी में, अक्षय प्रभ्व में, श्रीपबंत के तीथ में, वैक्ृत नामक पर्वत पर, औशिर नामक पर्वत पर्रंत पर भी, जहाँ पर कि पेलाश, खदिर,

English

Although this name is applied to the mountain range from Orissa to Madura, here it is specially applied to the range of hills separating Mahanadi from Ganjam District. It is regarded as the resort of Parasurama.

अध्याय १४२

श्लोक 89

तत्र तीर्थे तु यो दद्यात् कपिलादानमुत्तमम् ।विधानेन तु संयुक्तं शृणु तस्यापि यत्फलम्

tatra tīrthe tu yo dadyāt kapilādānamuttamam / vidhānena tu saṃyuktaṃ śṛṇu tasyāpi yatphalam

हिन्दी अर्थ

बेल, पाकड़, पीपल, विकद्धूत आदि के पेड़ एक ही स्थान पर दिखाई पड़ते हैं, पितरों का लोग उद्धार करते हैं । है द्विजवयंगण ! यह तीर्थों का समूह यज्ञ करने के लिये समुचित तथा सिद्धि देनेवाला है, इनमें अपने अंगों (शरीर) को छोड़ देनेवाला मनुष्य अमरावती को प्राप्त करता है।३८-३०। इन पवित्र तीर्थों में किये गये स्वकर्मों के फल अन्य जन्म में मिलते हैं, एवं पितरों के उद्देश्य से अल्प रूप में भी कठिनाई से किये गये कर्म॑ अच्छी तरह से किये गये कर्मों का फल प्रदान करते हैं। पितरों की कन्या नमंदा समस्त सरिताओं में श्रेष्ठ एवं पुष्य प्रदायिनी है, उसके तट पर किये गये श्राद्धादि कर्म अक्षय फलदायी होते हैं ।११-३२। सिद्धों और चारणों से सुसेवित माठर के पवित्र बन में वे अन्तहित नहीं होते, क्योंकि उस महान् गिरि में उनकी आसक्ति है ।३३। पवित्र विस्ध्य ग्रिरि में धर्मी एवं अधर्मी की पहचान के लिये यह देखा जाता है कि जो पापात्मा हैं वे धारा को

English

A tributary of Gaiiga near Varanasi.

अध्याय १४२

श्लोक 90

यावन्ति तस्या रोमाणि तत्प्रसूतेश्च भारत ।तावन्ति दिवि मोदन्ते सर्वकामैः सुपूजिताः

yāvanti tasyā romāṇi tatprasūteśca bhārata / tāvanti divi modante sarvakāmaiḥ supūjitāḥ

हिन्दी अर्थ

नहीं देख पाते, केवल साधुगण उसका दर्शन करते हैं ।३४॥ उस घारा में किन्हीं पाप करमिियों के पाप दिखाई पड़ते हूँ। प्रायः शुभ कर्म करने वालों को ही वह धारा स्पष्ट दिखाई पड़ती है ।३४॥ कोशला में मतंग

English

The waters of that river in confluence with the great ocean become conchs, pearls and pearl-like conchs. People bringing its waters containing conchs and pearls, become free from mental agonies and physical ailments and go to the heavenly city of Amaravatl.

अध्याय १४२

श्लोक 91

यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वास्तावन्ति वर्षाणि महीयते सः ।स्वर्गाच् च्युतश्चापि ततस्त्रिलोक्यां कुले समुत्पत्स्यति गोमतां सः

yāvanti romāṇi bhavanti dhenvāstāvanti varṣāṇi mahīyate saḥ / svargāc cyutaścāpi tatastrilokyāṃ kule samutpatsyati gomatāṃ saḥ

हिन्दी अर्थ

इृदमर्ध नास्ति ख. ग. घ. ड्. पुस्तकेष । कोशलायां मतहगस्य वापी पापनिषदनी । स्नातास्तस्यां दिवं यान्ति कामचारविहंगमाः

English

According to Sruti (Veda), the charitable gift of sandal, conchs and pearls enables Pitrs to cross (hell) even

अध्याय १४२

श्लोक 92

तत्र तीर्थे तु यो दद्याद् रूप्यं काञ्चनमेव वा ।काञ्चनेन विमानेन विष्णुलोके महीयते

tatra tīrthe tu yo dadyād rūpyaṃ kāñcanameva vā / kāñcanena vimānena viṣṇuloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

कुमारकोशलाताथथ पते पालपञ्जरे । पाण्डुकूले समुद्रान्ते पण्डारकवने तथा

English

So also is the case of Candratlrtha, (Kanya) Kumari, the peiennial source of Kaverl, the holy centres of Silparvata 1, the mountain Vaikrta, and the mountain Osiraparvata where the trees Palasa, Kliadira, Bilva, Plaksa, Asvattha and Vikankata are seen growing in one place. (The people taking ablutions and performing holy rites there attain heaven.) O excellent Brahmanas, this zone of holy centres is sacrifice-worthy and is conducive to great achievements. A person who casts his mortal coil here, quickly reaches the heavenly city of Amaravatl.

अध्याय १४२

श्लोक 93

तस्मिंस्तीर्थे तु यो दद्यात् पादुके वस्त्रम् एव च ।दानस्यास्य प्रभावेन लभते स्वर्गमीप्सितम्

tasmiṃstīrthe tu yo dadyāt pāduke vastram eva ca / dānasyāsya prabhāvena labhate svargamīpsitam

हिन्दी अर्थ

बिसले च विपापे च सत्कृत्य प्रभवेडभयम् । श्रोवृक्षे गृक्नक्टे च जस्बूमा्गें च नित्यशः ३८ पुष्करेष्वक्षयं भाद्धं तपश्चेव महाफलम् । महोदधो प्रभासे च तस्मादेवं विनिद्दिशेत्

English

Holy rites performed by oneself fructify in the subse¬ quent birth. Rites of Pitrs (though) performed with defects become as beneficial as duly performed rites.

अध्याय १४२

श्लोक 94

ऋग्यजुःसामवेदानां पठनाद् यत्फलं भवेत् ।तत्र तीर्थे तु राजेन्द्र गायत्र्या तत्फलं लभेत्

ṛgyajuḥsāmavedānāṃ paṭhanād yatphalaṃ bhavet / tatra tīrthe tu rājendra gāyatryā tatphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

देविकायां वृषो नाम कपः सिद्धनिषेवितः । समुत्पतन्ति तस्या55पो गर्वा शब्देन नित्यशः ४ १ योगेश्वरे: सदा जुष्टः सर्वपापबहिष्कृत: । दद्याच्छाद्धं तु यस्तस्मिस्तस्य वक्ष्यामि यत्फलभ् ३४२ अक्षयं स्बंकामीय श्राद्ध प्रीणाति थे पितुन्। जातवेद: शिला तत्र साक्षादरने: सनातनो ॥४ ३

English

The holy river Narmada, the most excellent of all rivers, is the daughter of Pitrs. Sraddhas offered there, become everlasting (in yielding benefits). In the holy forest of Mathara, resorted to by Siddhas and Caranas, they do not vanish because they are attached to that great mountain.

अध्याय १४२

श्लोक 95

प्रयागे यद्भवेत्पुण्यं गयायां च त्रिपुष्करे ।कुरुक्षेत्रे तु राजेन्द्र राहुग्रस्ते दिवाकरे

prayāge yadbhavetpuṇyaṃ gayāyāṃ ca tripuṣkare / kurukṣetre tu rājendra rāhugraste divākare

हिन्दी अर्थ

वशाश्वमेधिके तीर्थे तीथें पश्चाश्वमेधिके । यथोहिष्ट फल तेषां क़तुनां नान्र संशयः ॥४ ४५ के पापों को दूर करते वाली पापनिषदिती नामक बावली है, उसमें स्तावकर स्वेच्छा से गमन करनेवाले पक्षी गण भी स्वयं प्राप्त करते हैं ।३६। कुमारकोशला तीर्थ में, पालपञ्जर नामक पर्वत पर, समुद्रान्त पाण्डकूल नामक तीर्थ में, पण्डारक नामक वन में, अतिनिमल पाप रहित प्रभव अभय नामक तीथ में सत्कार कर श्रीवृक्ष, ग॒ध्रक्ट, जम्बूमार्गं, परम बुद्धिमान् योगाचार्य गुरुवर असित के असिता नामक पविन्न तीर्थ में नित्य

English

There is a proof (test) for discrimination between the pious and the impious on the holy mountain of Vindhya. Sinners do not see the current (waterfall?) Good men see the current.

अध्याय १४२

श्लोक 96

सोमेश्वरे च यत्पुण्यं सोमस्य ग्रहणे तथा ।तत्फलं लभते तत्र स्नानमात्रान् न संशयः

someśvare ca yatpuṇyaṃ somasya grahaṇe tathā / tatphalaṃ labhate tatra snānamātrān na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

श्राद्ध करने से अनन्त फल की प्राप्ति होती है ।३७-३९। पुष्कर तीर्थ में श्राद्ध का अक्षय फल होता हैं, तपस्या महान् फलदायिनी होती है। महासमुद्र . में प्रभास नामक तीथे में भी ऐसी फल- प्राप्ति होती है, इसी लिये ऐसा कहा गयी है ।४०। देविका में सिद्धों द्वारा सुसेवित वृष नामक एक कप है, जिसका जल नित्यप्रति गौओं के शब्द से ऊपर उछलता है। सभी पापों से बहिष्कृत रहनेवाले योगेश्वरों से

English

The sins of some sinners are seen in its current. Us- Srisailam in Kurnool District in Andhra Pradesh. It is one of the twelve J yotirlingas.

अध्याय १४२

श्लोक 97

द्वादश्यां तु नरः स्नात्वा नमस्कृत्य जनार्दनम् ।उद्धृताः पितरस्तेन अवाप्तं जन्मनः फलम्

dvādaśyāṃ tu naraḥ snātvā namaskṛtya janārdanam / uddhṛtāḥ pitarastena avāptaṃ janmanaḥ phalam

हिन्दी अर्थ

सुसेवित उस कप पर जो श्राद्ध करता है, उसके उस श्राद्ध का फल बतला रहा हूँ, वह श्राद्ध सभी मनोरथों को पूर्ण करनेवाला एवं अक्षय फलदायी है, तथा पितरों को प्रसन्न करता है। ठहाँ पर साक्षात् अग्नि की सनातन काल से प्रतिष्ठित जातवेद नाम शिला है ।४१-४३। वहाँ जो कोई व्यक्ति उस अग्नि में प्रवेश करता है वह स्वगंलोक में आनन्द का अनुभव करता हैं। एवं शान्त अभ्नि होने पर पुनर्जेन्म धारण करता है. उस परम पवित्र तीर्थ में दिया हुआ श्राद्धादि का दान अक्षय फलदायी होता है ।४२। दशाइवमेध तीथ्थ में एवं प्चाइवमेघ तीथ॑ में श्राद्ध करने पर दस एवं पाँच अश्वमेध यज्ञों का फल सचमुच प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए ।४५। हयशिर नामक पवित्र एवं प्रख्यात तीर्थ शीघ्र वरदान देनेवाला है, वहाँ पर श्राद्धकर्म अक्षय फलदायी होता है, एवं श्राद्धकर्ता स्वगे में आनरद का अनुभव करता है ४६!) कुम्भतीर्थ में जाकर लोग

English

In KauSala there is the tank of Matanga named PapanisudinI (Remover of Sins). Even stray birds, flying as they please, go to heaven after bathing (casually) in that tank.

अध्याय १४२

श्लोक 98

संक्रान्तौ च व्यतीपाते द्वादश्यां च विशेषतः ।ब्राह्मणं भोजयेद् एकं कोटिर्भवति भोजिता

saṃkrāntau ca vyatīpāte dvādaśyāṃ ca viśeṣataḥ / brāhmaṇaṃ bhojayed ekaṃ koṭirbhavati bhojitā

हिन्दी अर्थ

भ्रांड कुम्मे विमुचचन्ति ज्ञेवं पापनिषदनम् । श्राद्ध तत्राक्षयं प्रोक्तं जप्पहोमतपांसि च

English

(Ablution) in the Kumarakosala Tirtha on the mountain Palapanjara 1 and on the hanks of Pantfu near the sea, in the Pantfaraka forest, performance of good actions in the Abhaya Prabhava which is pure and sinless, daily visit to Srrvrksa, Grdhrakuta, and Jambumarga and in the holy centre of Asita, the intelligent preceptor of Yoga—performance of Sraddha (at these holy places)—gives everlasting benefits. Sraddha in Puskara 2 is ever-lasting. Penance there yields great fruits and the same is true of the holy centre Prabhasa 8 on the great ocean.

अध्याय १४२

श्लोक 99

पृथिव्यां यानि तीर्थानि ह्यासमुद्राणि पाण्डव ।तानि सर्वाणि तत्रैव द्वादश्यां पाण्डुनन्दन

pṛthivyāṃ yāni tīrthāni hyāsamudrāṇi pāṇḍava / tāni sarvāṇi tatraiva dvādaśyāṃ pāṇḍunandana

हिन्दी अर्थ

अधितास्तेन बे साक्षा:ड्ूबन्ती पितरः सदा । अस्मिल्लोके वशी यः स्यात्प्रेत्य स्थगें स मोदते. प्रायश: प्रवरः पुण्यः शिवों नाम ह्ृदस्तथा । तत्र व्याससरः पुण्य दिव्यं श्रह्मसरस्तथा

English

In Devika 4, there is a well named Vfsa resorted to by Siddhas. Its water always gushes up on hearing the sound of cows and bulls.

अध्याय १४२

श्लोक 100

क्षयं यान्ति च दानानि यज्ञहोमबलिक्रियाः ।न क्षीयते महाराज तत्र तीर्थे तु यत्कृतम्

kṣayaṃ yānti ca dānāni yajñahomabalikriyāḥ / na kṣīyate mahārāja tatra tīrthe tu yatkṛtam

हिन्दी अर्थ

ऋग्यजुःसामशिरसः कापोतः पुष्पसाह्वयः । आख्यातः पत्चमो बेदो सुष्ट्वा होतु षु बरह्मणा

English

It is always resorted to by masters of Yogas who are beyond all sorts of sins. I shall mention the benefit resulting from the performance of Sraddha therein. The Sraddha (there) yields all desires and is ever¬ lasting. It delights Pitjrs. There is a rock of Agni there called Jatavedahsila. He who enters the fire there rejoices in

अध्याय १४२

श्लोक 101

यद्भूतं यद्भविष्यच्च तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् ।कथितं ते मया सर्वं पृथग्भावेन भारत

yadbhūtaṃ yadbhaviṣyacca tīrthamāhātmyamuttamam / kathitaṃ te mayā sarvaṃ pṛthagbhāvena bhārata

हिन्दी अर्थ

गत्वतान्मुच्यते पापादद्विजों वह्तनिः सनातन: । भ्राद्धं चा55नन्त्यमेतेषु जप्यहोमतपांसि च पुण्डरीके महातोथें पुण्डरकिसमं फलम्॥ ब्रह्मतीर्थे महातीर्थें अश्वमेधफलं लभेत् ५५

English

Palamaiijara in Bd.P. near Surparaka or Sopara near Bassein in Thana district of Maharashtra.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 142
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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