अध्याय १४२
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे तापेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकचत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महाराज रुक्मिणीतीर्थमुत्तमम् ।यत्रैव स्नानमात्रेण रूपवान्सुभगो भवेत्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe tāpeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikacatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 142 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahārāja rukmiṇītīrthamuttamam / yatraiva snānamātreṇa rūpavānsubhago bhavet
हिन्दी अर्थ
अन्न दे, उन सबों का नामोच्चारण कर के वस्त्र के लिए सूत्रदान करे ।!६। देवताओं के लिए खण्डन, पेषण ओर उल्लेखन--इनका एक बार का विधान है, और पितरों के लिए तीन बार कहा गया है ।२०। हाथ से एक पवित्र लेकर सभो पितरों को अलग-अलग से बस्त्रदान के मन्त्रद्वारा पिण्डों के ऊपर देकर दर्शन करने का कल्याण प्राप्त किया जाता है २१ सभो श्राठंकाथों में घत, तिल-युक्त पिण्डों का निर्वषत भूमि पर करना अन्नेनाड्िश् पुष्पैश्व भक्ष्येश्वेव प्रथग्विधेः । पृथडमातामहानां तु केचिदिच्छन्ति मानवाः २४ त्रीन्पिण्डानानृपृष्येण साइगुष्ठान्युष्टिव्धेनान् । जान्वन्तराभ्यां यत्नेन पिण्डान्द्याद्यथाक्रमसू
English
The devotee should sit facing the south and spread the Darbha grass once for the Pinzas. The tips of the Darbhas should be pointing to the south-east. The procedure shall be mentioned as follows: