Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
143
अध्याय 143 / 232

Adhyaya 143

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अध्याय १४३

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे रुक्मिणीतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम द्विचत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४३ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महाराज योजनेश्वरम् उत्तमम् ।यत्र सिद्धौ पुरा कल्पे नरनारायणावृषी

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe rukmiṇītīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma dvicatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 143 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahārāja yojaneśvaram uttamam / yatra siddhau purā kalpe naranārāyaṇāvṛṣī

हिन्दी अर्थ

श्राद्धादि कर्मों का अनुष्ठान करते हैं, उस पवित्र तीर्थ को पाप विनाशक समझना चाहिए, वहाँ पर किये गये श्राद्ध को अक्षय फलदायी कहा गया है, इसी प्रकार जप, हवन एवं तपस्या के बारे में भी कहा गया है । अजतुंग नामक कल्याणदायी पविन्रतीथ में स्बंदा पितरों का तपंण करना चाहिए, जहाँ पर पर्वों के अवसर पर देवताओं की छाया दिखलाई पड़ती है । समस्त पृथ्वी मण्डल में इस पवित्र तीथें का दान अक्षय

English

There is no doubt in this that the sacrifices performed at the holy centres called Dasasvamedhika and Pancasvame- dhika yield the benefits as indicated (in their names, viz. fruits of ten horse-sacrifices and of five horse-sacrifices).

अध्याय १४३

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तपस्तप्त्वा सङ्ग्रामे देवदानवैः ।जयं प्राप्तौ महात्मानौ नरनारायणावुभौ

tatra tīrthe tapastaptvā saṅgrāme devadānavaiḥ / jayaṃ prāptau mahātmānau naranārāyaṇāvubhau

हिन्दी अर्थ

बतलाया जाता है पाण्डव गण यहीं पर रोगमुक्त हुये थे ।४७-४८। सभी प्रकार के पाप पूर्ण कर्मों से विरक्त रहने- वाले योगेश्वरों द्वारा सुसेवित उस परमपवित्र तीर्थ में जो लोग श्राद्ध करते हैं, उसका फल बतला रहा हूँ । उस परम पवित्र तीथे॑ में साक्षात् पूजित होकर पितरगण सर्वदा प्रसन्न रहते हैं, इस लोक में जो इन्द्रियों को स्ववश रखनेवाला है वह मृत्यु के बाद स्वर्ग में आनर्द का अनुभव करता है /४६-५०। परम पवित्र शिव नाम का एक हद है, वहीं पर दिव्यगुण थुक्त व्याससर एवं ब्रह्मसर नामक दो सरोवरों को भी स्थिति है उज्जन्त नामक पुण्यप्रद पर्वत भी वहीं हैं, जिसमें बड़े-बड़े योगीश्वर लोग निवास करते हैं। महात्मा वसिष्ट का पुण्य आश्रम भी वहीं है ।११-५२। इन्हीं तीर्थों के मध्यभाग में ऋक यजु, सामवेद का शिर स्वरूप (?) कापोत अथवा पुष्प (?) नामक तीर्थ की रचता भगवान् ब्रह्मा ने की है, जो पाँचवे वेद के नाम से विख्यात है। इन पावत्र

English

The holy centre named Hayasiras is famous as granter of boon immediately. Sraddha performed there yields everlasting benefits. The devotee rejoices in heaven.

अध्याय १४३

श्लोक 3

पुनस्त्रेतायुगे प्राप्ते तौ देवौ रामलक्ष्मणौ ।तत्र तीर्थे पुनः स्नात्वा रावणो दुर्जयो हतः

punastretāyuge prāpte tau devau rāmalakṣmaṇau / tatra tīrthe punaḥ snātvā rāvaṇo durjayo hataḥ

हिन्दी अर्थ

तीर्थों की यात्रा कर ब्राह्मण सनातन अग्ति की भी भाँति तेजस्वी होकर पाप मुक्त हो जाता है, इसमें श्राद्ध का अनन्त माहात्म्य वर्णित किया गया है जप, हवन एवं तपस्या के लिए भी अनन्त फल कहा गया है

English

Sraddha is said to be everlasting. So also are Japas, Homas and penances.

अध्याय १४३

श्लोक 4

पुनः पार्थ कलौ प्राप्ते तौ देवौ बलकेशवौ ।वसुदेवकुले जातौ दुष्करं कर्म चक्रतुः

punaḥ pārtha kalau prāpte tau devau balakeśavau / vasudevakule jātau duṣkaraṃ karma cakratuḥ

हिन्दी अर्थ

पुण्डरीक नामक महातीथ्थ॑ में श्राद्ध का पुण्डरीक (कमल) के समान मनोहर फल होता है ब्रह्मतीर्थ नामक महातीथे में अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं ।५५। सिन्धुतागर सम्भेद तथा पंचनद तीथ में अक्षय फल की प्राप्ति होती सिन्धुसागरसंभेदे तथा पश्चनदेक्षयम् । कीरकात्मा ततः पुण्यों मण्डवायां च पर्वते

English

One should always propitiate the Pitrsin the auspicious holy centre of Ajatunga. There the shadow of the heaven-dwel¬ lers is always seen on Parvan days. Whatever is given here becomes everlasting in the world. The Pantfavas became free from ailment here.

अध्याय १४३

श्लोक 5

नरकं कालनेमिं च कंसं चाणूरमुष्टिकौ ।शिशुपालं जरासंधं जघ्नतुर् बलकेशवौ

narakaṃ kālanemiṃ ca kaṃsaṃ cāṇūramuṣṭikau / śiśupālaṃ jarāsaṃdhaṃ jaghnatur balakeśavau

हिन्दी अर्थ

देयं सप्तरदे श्राद्ध मानसे च विशेषतः महाकटे च बन्दे च गिरो त्रिककुदे तथा ५७

English

It is always resorted to by masters of Yogas free from all sins. I shall mention the benefit of performance of Sraddha there.

अध्याय १४३

श्लोक 6

ततस्तत्र रिपून्संख्ये भीष्मद्रोणपुरःसरान् ।कर्णदुर्योधनादींश्च निहनिष्यति स प्रभुः

tatastatra ripūnsaṃkhye bhīṣmadroṇapuraḥsarān / karṇaduryodhanādīṃśca nihaniṣyati sa prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

जातवेद:शिला तत्र साक्षादसने: सनातनी । श्राद्धानि चार्निका्यं चर तत्र कुर्यात्सदाइक्षयम् संश्रयित्वेकमेकेन सायाक्न प्रति नित्यशः तस्मिन्देयं सदा श्राद्ध पितृणासक्षयाथिना ६०

English

Pitrs worshipped there always become delighted. He who keeps his sense-organs under control in this world shall rejoice after death in heaven.

अध्याय १४३

श्लोक 7

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे तत्र युध्यन्ति ते क्षणम् ।भीमार्जुननिमित्तेन शिष्यौ कृत्वा परस्परम्

dharmakṣetre kurukṣetre tatra yudhyanti te kṣaṇam / bhīmārjunanimittena śiṣyau kṛtvā parasparam

हिन्दी अर्थ

दृश्यन्ते काना यूपाः संचिष्ये(दृष्टे ) भास्करोदये । कृत्वा प्रदक्षिण तांस्तु गच्छन्त्यन्तहिता दिवम् ॥।

English

The lake named Siva is the most excellent. Vyasa- saras and the divine lake Brahma-saras there are also holy.

अध्याय १४३

श्लोक 8

तत्र तीर्थे पुनर्गत्वा तपः कृत्वा सुदुष्करम् ।पूजयित्वा द्विजान्भक्त्या यास्येते द्वारकां पुनः

tatra tīrthe punargatvā tapaḥ kṛtvā suduṣkaram / pūjayitvā dvijānbhaktyā yāsyete dvārakāṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

कीत्यंते च तिलानदत्त्वा पित्॒णां वे सदाक्षयम् ११६४ है, कीरकात्मा नामक पुण्य तीथे भी है, प्बंत पर अवस्थित पण्डवा तीर्थ में भी अक्षय फल होती है । सप्तरद तीथ में विशेषतया मानसतं!थ में श्राद्धऊम अवश्य करना चाहिए। महाकूट, बन्द एवं त्रिककुद पव॑त पर भी श्राद्धक्मं करना चाहिए ।५६-४७। महावेदी में सन्ध्या के अवसर पर महान आश्चरययं दिखाई पड़ता है, किन्तु वह अश्रद्धा रखनेवाले नास्तिकों को नहीं प्राप्त होती, केवल ब्रतपरायण श्रद्धालु ही को प्राप्ति होती है वहाँ पर जःतवेद

English

The mountain Ujjanta 1 of the noble soul Vasistha is also holy. Centres called Kapota, Puspasahvaya, (and those named after the Vedas) Rg, Yajus, Samanand (Atharva-) Siras have been created by god Brahma. After the creation of these the fifth Veda, viz. Puranas have been narrated by him.

अध्याय १४३

श्लोक 9

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेद् बलकेशवौ ।तेन देवो जगद्धाता पूजितस्त्रिगुणात्मवान्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayed balakeśavau / tena devo jagaddhātā pūjitastriguṇātmavān

हिन्दी अर्थ

नामक अग्नि की सनातन काल से चली आनेवाली एक शिला है, उस पर श्राद्धादि एवं अग्निहोत्रादि कार्य सबंदा करने चाहिए, क्योंकि उनका अक्षय फल होता है ।५८-५९। पितरों को अक्षयरूप में श्राद्ध देते के इच्छुक व्यक्ति को इन तीर्थों में सबंदा सायंकाल के समय श्राद्ध करना चाहिए। यहाँ पर कतात्मा (पुण्यात्मा) और अक्वतात्मा (पापात्मा) जन मालम पड़ जाते हैं। वहाँ स्वरग्यमार्ग प्रद नामक शीघ्र वर प्रदान करनेवाला

English

After going there a Brahmana becomes free from sin like the eternal Fire-god Agni. Sraddha, Japas, Homas and penances are of endless benefits.

अध्याय १४३

श्लोक 10

उपवासी नरो भूत्वा यस्तु कुर्यात् प्रजागरम् ।मुच्यते सर्वपापेभ्यो गायंस्तस्य शुभां कथाम्

upavāsī naro bhūtvā yastu kuryāt prajāgaram / mucyate sarvapāpebhyo gāyaṃstasya śubhāṃ kathām

हिन्दी अर्थ

सरो१२ है ।६०-६१। जिसमें अपने पारस्परिक बेर भावों में छोड़कर सप्तषिगण स्वगंगामी हुए थे आज भी उनके बिगत वरभाव के चिह्न वहाँ दिखाई पड़ते हैं। उस उत्तम तीथ में स्नान कर मनुष्य स्बगलोक को प्राप्त करता है ।६२। वहीं पर नन्दिकेश्वर एवं सिद्धगणों द्वारा सुसेवित प्रसिद्ध आयतन (स्थान) है। वहाँ नन्दिकेश्वर की जो मूर्ति है, वह दुराचारियों को नहीं दिखाई पड़ती ।६३। भास्कर के उदय होने के अवसर पर वहाँ सुबर्ण के यूप (यज्ञ के खंभे) दिखलाई पड़ते हैं । उनकी प्रदक्षिणा करके लोग अन्तहित होकर स्वर्गलोक को चले जाते हैं । योगपरायण महात्मा सनत्कुमार का पुष्यप्रद कुरुक्षेत्र सभी क्षेत्रों में श्रेष्ठ माना गया है । ऐसा कहा जाता

English

In Aparanta as per HD. IV. 815. If identified with Ujjayanta, it is Mt. Girnar—De 211; but it is not associated with Vasistha but with Datta and Neminatha. Hence identification in HD probable.

अध्याय १४३

श्लोक 11

यावतस्तत्र तीर्थे तु वृक्षान् पश्यन्ति मानवाः ।ब्रह्महत्यादिकं पापं तावद् एषां प्रणश्यति

yāvatastatra tīrthe tu vṛkṣān paśyanti mānavāḥ / brahmahatyādikaṃ pāpaṃ tāvad eṣāṃ praṇaśyati

हिन्दी अर्थ

एतदघंस्थाने5्यं पाठ: ख. पुस्तके-- तस्मिन्देशे तथा श्राद्धे पितृ णामज्ञक्षयाथिना म्' इति ।

English

In the great holy centre Pundarika, one attains the benefit (as sweet and fragrant) as lotus. One gets the fruit of a horse-sacrifice in the great holy centre of Brahma Tirtha (by performing Sraddha there).

अध्याय १४३

श्लोक 12

प्रातरुत्थाय ये केचित् पश्यन्ति बलकेशवौ ।तेनैव सदृशाः सर्वे देवदेवेन चक्रिणा

prātarutthāya ye kecit paśyanti balakeśavau / tenaiva sadṛśāḥ sarve devadevena cakriṇā

हिन्दी अर्थ

ओजसे चाक्षय श्रार्ड धर्मराजनिवेशने । श्राद्ध दत्तमसावस्यां विधिना व् यथाक़मम ३६५ पुनः संनिहितानां वे कुरुक्षेत्रे विशिववः । अचंयेद्रा वित॒स्तत्र सत्पुत्रस्त्वनूणों भवेत् ६६ विनशने सरस्वत्यां प्लक्षप्रश्रवण तथा। व्यासतोर्थे सरस्वत्यां त्रिप्लक्षे च विशेषतः ६७ देयमोक्ड7रपवने भ्राद्धमक्षयमिच्छता । सर्वतश्चेव गड्ायां मैनाके च नगोत्तमे ६८ यथुनाप्र भवे चेत्र सब्रेपापे: प्रमुच्यते । अत्युष्णाश्रातिशीताश्व आपस्तत्र निदर्शनम् ३६६ यमस्य भगिती पुण्या मातंण्डदुहिता तथा। तत्नाक्षयं तदा श्राद्ध पितृभिः पूर्वकीतितस् (4७०

English

In the confluence of the Sindhu river and the ocean and in Pafcanada, the benefit is everlasting. Klrakatma 1 (in Bd. P. Viraja) and Mandava on the mountain are sacred spots (?)

अध्याय १४३

श्लोक 13

ते पूज्यास्ते नमस्कार्यास्तेषां जन्म सुजीवितम् ।ये नमन्ति जगत्पूज्यं देवं नारायणं हरिम्

te pūjyāste namaskāryāsteṣāṃ janma sujīvitam / ye namanti jagatpūjyaṃ devaṃ nārāyaṇaṃ harim

हिन्दी अर्थ

तुला तु दृश्यते यत्र धर्माधमंप्रदर्शिनी । यथा बे तुलितं विग्रेस्तीर्थानां फलमुत्तमम् ॥७२रे वित्॒णां दुहिता योगा गन्धकालीति विश्रुता । चतुर्थो ब्रह्मणश्रांशः पराशरकुलोइहः ७४ व्यत्य त्वेक चतुर्था सु वेद धीमान्महाघुनि:। महायोग॑ महात्मातं यो व्यास जनयिष्यति

English

Sraddha has to be performed in the holy centre Saptahrada and particularly in Manasa. 2 On the mountains of Mahakuta, Vanda and Trikakuda also (Sraddha should be performed).

अध्याय १४३

श्लोक 14

तत्र तीर्थे तु यद्दानं स्नानं देवार्चनं नृप ।क्रियते तत्फलं सर्वमक्षयायोपकल्पते

tatra tīrthe tu yaddānaṃ snānaṃ devārcanaṃ nṛpa / kriyate tatphalaṃ sarvamakṣayāyopakalpate

हिन्दी अर्थ

'+++ मत भा पा पा गान का++++++++०५०५+ धान ना माना». पक न मा परम इन रा नी कि 2४०५४५3५५५५४५५५००५५०५५+५५५०.आ७ पक ...५०++ ५३५५ नासा न न पक 8४४६३ आन न ०१५५-००» पा न-++-+-44७-9४७७५५+५ 2 गा -3 3.3. +भ.3.3न+-+-+++-++3+ आग +4 मम +-+न-+म ननननया+क++-+++4: ८-4.8048५५५-२०३७७७-----०-४४६७--३२-८--६७७....--०२७-०-२०२०-७----२५६३२३२०३५-कन+व-ननवतनीयन-ीी-ऊ३3+०मक हैं कि वहाँ पर तिलों का दान करके पितरों को सबंदा के लिये अक्षय तृप्ति दी जाती है ।६४। घमराज युधिष्ठिर के निवास स्थान पर किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायी एवं कीति देनेवाला है। अभावास्या के अवसर पर विधिपू्वेक ऋ्रमानुसार किया गया श्राद्ध तथोक्त फलदायी होता । बिशेषतथा कुरुक्षेत्र के समीप निवास करनेवालों के लिये तो वह परम पवित्र है। सत्पुत्र अपने पितरों की वहाँ पूजा करके ऋण रहित हो जाता

English

In MahavedI (Mahanadi in Bd. P.) a great miracle is seen. It does not appear to one who has no faith (but).it does appear to a person who is firm in his religious vows.

अध्याय १४३

श्लोक 15

अग्नेरपत्यं प्रथमं सुवर्णं भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च गावः ।लोकास्त्रयस्तेन भवन्ति दत्ता यः काञ्चनं गां च भुवं च दद्यात्

agnerapatyaṃ prathamaṃ suvarṇaṃ bhūrvaiṣṇavī sūryasutāśca gāvaḥ / lokāstrayastena bhavanti dattā yaḥ kāñcanaṃ gāṃ ca bhuvaṃ ca dadyāt

हिन्दी अर्थ

है ।६२५-६६। विनशन, सरस्वती के प्लक्षअ्रश्नवण, सरस्वती के व्यासतीर्थं, एवं ओंकारपवन में अंक्षय श्राद्ध की इच्छा करनेवाले श्राद्ध करें। गंगा में सवंत्र श्राद्ध करता चाहिए, पर्वतश्रेष्ठ मैताक पर श्राद्ध करने का विधान हैं ।९७-८५५। यमुना प्रभवतीर् में श्राद्ध करके मनुष्य समस्त पापों से निवृत्त हो जाता है। उसके अत्यन्त उष्ण और अत्यन्त शीतल जल ही इस तीथ के प्रमाण स्वरूप हैं। यह परमपवित्र यमुना यम की भगिनी और मार्तण्ड

English

The eternal rock of Agni himself is there. It is called Jatavedahsila. Sraddhas and holy rites in the fire performed there, have never-ending benefits.

अध्याय १४३

श्लोक 16

एतत्ते कथितं सर्वं तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् ।अतीतं च भविष्यच्च वर्तमानं महाबलम्

etatte kathitaṃ sarvaṃ tīrthamāhātmyamuttamam / atītaṃ ca bhaviṣyacca vartamānaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

की पुत्री हैं. उसमें किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायी होता है--ऐसे पूबंकाल से फितरों के वचन हैं ब्रह्मतुद्भ नामक सरोवर में स्नान कर इतर जातिवाले शीघ्र ही ब्राह्मणों की भाँति नष्पाप एबं पुण्यात्मा हो जाते हैं, उसमें श्राद्ध, जप एवं हवनादि करने का अनन्त फल है ।७१। महातपस्वी महू॒थि वसिष्ठ स्थाणुरूप में वहाँ. विचरण करते हैं, और आज भी वहाँ मणियों से चित्रित वक्षों को पक्तियाँ दिखाई पड़ती है। वहां पर धर्म एवं अधर् को दिखानेवाली एक तुला (तराजू) दिखाई पड़ती है. जिस पर तुलकर ब्राह्मणों के कथनावुसार उत्तम

English

Going there everyday in the evening, one who seeks never-ending benefits should always offer Sraddha to Pitrs there. A man of purified mind or otherwise is known in the holy centre called Svargyamargaprada (that which shows the path leading to heaven). It grants boons immediately. Casting off their mutual enmity in it, the Seven Sages went to

अध्याय १४३

श्लोक 17

श्रुत्वा वापि पठित्वेदं श्रावयिपत्वाथ धार्मिकान् ।मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा

śrutvā vāpi paṭhitvedaṃ śrāvayipatvātha dhārmikān / mucyate sarvapāpebhyo nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

फल की प्राप्ति होती है। २-७३। पितरों की योगपरायण कन्या जो गन्धकाली नाम स विख्यात है, वहाँ तिबास करती है। भगवान ब्रह्मा के चतुर्थ अंशस्वरूप, मह॒षि पराशर के कुल में समुत्यन्न परम बुद्धिमान् महामुनि व्यास- देव हैं, जिन्होंने एक वेद का विस्तार कर चार भागों में विभाजन किया है, ऐसे परम योगीश्वर महात्मा व्यासदेव

English

Even today signs of their extinct enmitv

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 143
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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