Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
144
अध्याय 144 / 232

Adhyaya 144

3 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय १४४

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे योजनेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम त्रिचत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४४ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महाराज द्वादशीतीर्थमुत्तमम् ।क्षरन्ति सर्वदानानि जपहोमबलिक्रियाः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe yojaneśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma tricatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 144 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahārāja dvādaśītīrthamuttamam / kṣaranti sarvadānāni japahomabalikriyāḥ

हिन्दी अर्थ

अच्छोदक नाम सरो यत्राच्छोदा समुच्छिता । मत्स्ययोनो पुनर्जाता नियोगाह्वारणेन तु सिद्धस्तु सेविता नित्य॑ दृश्यते नाकृतात्मभिः अनिवर्तनं तु नन्‍्दायां वेचां प्रागुत्ते (? )दिशि

English

Vairapi, but cirdpi 'garments* in'Bd. P. V. 2 3 61 i<

अध्याय १४४

श्लोक 2

न क्षीयते तु राजेन्द्र चक्रतीर्थे तु यत्कृतम् ।यद्भूतं यद्भविष्यच्च तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम्

na kṣīyate tu rājendra cakratīrthe tu yatkṛtam / yadbhūtaṃ yadbhaviṣyacca tīrthamāhātmyamuttamam

हिन्दी अर्थ

सिद्धक्षेत्र तु वे जुष्टं यत्प्राप्य न निवर्तते । महालये पद न्‍्यस्तं महादेवेन धीमता (८० देवालये तपस्तप्त्वा एकपादेन ईश्वरः । नीहारश्न युगं दिव्यमुमातुड्रे स्थितं जलम् ८१ उमातुज्धे भृगोस्तुड्ढे ब्रह्मतुड्नो महालये। काद्रवत्यां च शाण्डिल्यां गुहायां वामनस्य च ८रे

English

Lake Manas-sarovar situated in Kailasa

अध्याय १४४

श्लोक 3

कथितं तन्मया सर्वं पृथग्भावेन भारत

kathitaṃ tanmayā sarvaṃ pṛthagbhāvena bhārata

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचर्य यजन्ते वे गुरुभक्ताः शतं समा: । एक्मादीनि सदयस्तां स्नात्वा प्राप्नोति सत्फलम् पद ढ को वह उत्पन्न करेगी ।७४-७५। वहाँ पर अच्छोदक नामक सरोवर है, जिसमें अच्छोदा नदी के रूप में वह प्रादर्भूत हुईै। पुनः वारण के नियोगवश वह मत्स्य योनि में उत्पन्न हुई। उसका जहाँ पर पविन्र आसन है, वहाँ पुण्यकर्त्ता जन स्वेदा निवास करते हैं। उस पवित्र स्थान पर एक बार का दिया हुआ श्राद्ध भक्षग्न माना गया है। उम्र अच्छोदा में श्राद्धदान करने से योग एवं समाधि की एक साथ उद्भावना होती है ।७६-७७। कुबेरतुज्ध

English

The (land) all over Kuruksetra* is especially an ex¬ cellent holy place of Sanatkumara, the noble-souled lord of the Yogic cult. It is glorified as yielding ever-lasting benefit if Pitrs are offered gingelly seeds (there).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 144
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.