Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
145
अध्याय 145 / 232

Adhyaya 145

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पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय १४५

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे द्वादशीतीर्थमहात्म्यवर्णनं नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४५ मार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेद्धरापाल शीवतीर्थमनुत्तमम् ।दर्शनाद्यस्य देवस्य मुच्यते सर्वकिल्बिषैः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe dvādaśītīrthamahātmyavarṇanaṃ nāma catuścatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 145 mārkaṇḍeya uvāca: tato gaccheddharāpāla śīvatīrthamanuttamam / darśanādyasya devasya mucyate sarvakilbiṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

व्यामोच्य एवं व्यासतीर्थ में जो श्राद्धदान करता है, वह पृण्यकर्तता ब्राह्मण है, उसका श्राद्ध अनन्त एवं अक्षय फलदायी है ।७८। उस स्थान से पूर्युएवं उत्तर दिशा की ओर नन्‍दा ताम की वेदी है, जो पुर्जेंजन्म को रोकनेवाली है, अर्थात् वहाँ पर पिण्डदानादि करने से पुर्जंजन्म नहीं होता । सिद्धजन उसका नित्य सेवन करते हैं, किन्तु अकृतात्माजनत (पापीजन) उसे नहीं देख पाते । परम बुद्धिमान महादेव ने नहाँ पर अपना चरणन्यास

English

Sraddha performed in the residence of Dharmaraja is conducive to brilliance and it is never-ending (in yielding bene¬ fit). Sr add ha offered on the New Moon day in accordance with injunctions and in the proper order also yields never-ending benefits.

अध्याय १४५

श्लोक 2

शिवतीर्थे तु यः स्नात्वा जितक्रोधो जितेन्द्रियः ।पूजयेत महादेवं सो ऽग्निष्टोमफलं लभेत्

śivatīrthe tu yaḥ snātvā jitakrodho jitendriyaḥ / pūjayeta mahādevaṃ so 'gniṣṭomaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

किया है, वह सिद्धों का क्षेत्र है, वहाँ पहुंचकर पुनजंन्म नहीं होता । देवी के उस पवित्र आयतन में ईश्वर (महादेव) ने एक चरण पर स्थिर होकर कठोर तपस्या कीथी। वहाँ पर उमातुद्भध में नीहार (बरफ) और जल एक देवयुग से स्थित हैं ।७६-८१। उस उमातुज्ध, भृगुतुद्ध, ब्रह्मतुज़्, महालय, काद्रक्ती, शांडिलीगुफा, वामनगुफा आदि पवित्र तीर्थों की यात्रा कर मनुष्य पविन्रात्मा हो जाता है, इन सब तीर्थों में किया गया श्राद्ध अक्षय फलदायी कहा गया है, जप, हवन, ध्यान, अथवा जो कुछ भी सत्कम यहाँ किये जाते हैं, सब अक्षय फलदायी होते हैं ।5२-८३। वहाँ पर ब्रह्मचयं में निरत रहनेवाले गुरुभक्त विद्यार्थी गण सैकड़ों वर्षो तक यज्ञादि का अनुष्ठान करते रहते हैं। उस पवित्र तोर्थ में स्नान करके ये उपर्यक्त फल श्षीघ्न ही प्राप्त किये

English

Moreover, to those who are near about Kuruksetra it is particularly efficacious. A dutiful son who worships Pitrs there, becomes free from his indebtedness to them.

अध्याय १४५

श्लोक 3

तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या सोपवासो ऽर्चयेच्छिवम् ।अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकाद् असंशयम्

tatra tīrthe tu yo bhaktyā sopavāso 'rcayecchivam / anivartikā gatistasya rudralokād asaṃśayam

हिन्दी अर्थ

कुमारधारा तत्रव दृष्ठा पापप्रणाशनी । यानासन च तत्रेव सद्यः स्थाचत्प्रदृश्यते ८५ शेलकीतिपुराभ्यासे काम्ानाप्नोति पुष्कलान् । अदृश्यः सर्वेभृतानां देववच्चरते महीम् ८६ काश्यपस्य महातीर्थ कालसपिरिति श्रुतम् । तत्र श्राद्धानि देयानि नित्यमक्षयमिच्छता ८७

English

Sraddha should be performed with the repetition of Oriikara by persons who wish for ever-lasting benefit, at the following places: Vinasana, 1 2 on the Sarasvatl river, Plaksa- prasravana 3, Vyasatlrtha on the Sarasvatl and especially at Brahma Ksetra, everywhere on the (banks of) Ganga and on the excellent mountain Mainaka and at the source of Yamuna. One gets absolved of sins (thereby). The proof for the same is the excessively hot and extremely cold water there.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 145
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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