Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
146
अध्याय 146 / 232

Adhyaya 146

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अध्याय १४६

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे शिवतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४६ मार्कण्डेय उवाच: अस्माहकं ततो गच्छेत् पितृतीर्थमनुत्तमम् ।प्रेतत्वाद्यत्र मुच्यन्ते पिण्डेनैकेन पूर्वजाः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe śivatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma pañcacatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 146 mārkaṇḍeya uvāca: asmāhakaṃ tato gacchet pitṛtīrthamanuttamam / pretatvādyatra mucyante piṇḍenaikena pūrvajāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रत्यक्ष दृश्यते धर्मस्तीथंयारमेनयोड्ध योर यो: । देवदारुवने चापि चारयेस्तं निदर्शनम् ६ १ विधतानि तु पापानि दृश्यन्ते सुकृतात्मनाम् । भागी रथ्यां प्रयागे च नित्यभक्षयमुच्यते ६२ काजड्जरे दशार्णायां नेमिषे कुरुजाड्रले । वाराणस्यां नगर्या तु देय क्राद्धं तु यत्नतः जा सकते हैं । बहीं पर पापों को नष्ट करनेवाली कुमार धारा का दर्शन होता है वहाँ यान (वाहन) एवं आसन का लाभ करते हुये शीघज्ष ही देखा जाता है ।६४-८५। शलकीति नामक पवित्र तोथं में स्तात करके मनुष्य अपने सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करता है। सभी प्राणियों से अदृश्य होकर वह॒ देवताओं की तरह पृथ्वी पर विचरण करता है ।८६। काश्यप का परम प्रसिद्ध कालसवि नामक महान् तीर्थ सुना गया है, अक्षय श्राद्ध के इच्छुक

English

(Yamuna) is Yama's sister and the daughter of Mar- tanda (the Sun-god). It is holy. Sraddha performed there is everlasting. It'was so glorified by Pitrs formerly.

अध्याय १४६

श्लोक 2

युधिष्ठिर उवाच: अस्माहकस्य माहात्म्यं कथयस्व ममानघ ।स्नानदानेन यत्पुण्यं तथा पिण्डोदकेन च

yudhiṣṭhira uvāca: asmāhakasya māhātmyaṃ kathayasva mamānagha / snānadānena yatpuṇyaṃ tathā piṇḍodakena ca

हिन्दी अर्थ

मनुष्यों को वहां नित्य श्राद्धवात करना चाहिए शाज्षप्राम के चारों ओर किया गया श्राद्व कर्म अक्षय रूप पै प्राष्त होता है, किन्तु पापात्माओं को वह परम पवित्र तीथ॑ प्रत्यक्ष होने पर भी आँखों से नहीं दिखाई पड़ता

English

One taking ablutions in the lake Brahmanuga be¬ comes a Brahmana immediately. Sraddha, Japas, Homas and penances performed there are everlasting.

अध्याय १४६

श्लोक 3

श्रीमार्कण्डेय उवाच: पुरा कल्पे नृपश्रेष्ठ ऋषिदेवसमागमे ।प्रश्नः पृष्टो मया तात यथा त्वमनुपृच्छसि

śrīmārkaṇḍeya uvāca: purā kalpe nṛpaśreṣṭha ṛṣidevasamāgame / praśnaḥ pṛṣṭo mayā tāta yathā tvamanupṛcchasi

हिन्दी अर्थ

उस पवित्र तीथ्थ में अशिष्ट लोगों का,जाना वर्जित है, केवल शिष्टजन ही उम्में प्रवेश पा सकते हैं। बहाँ के पुण्य सरोवर में निवास करनेवाला नागराज केवल सत्पुरुषों द्वारा दिये गये पिण्डों का भक्षण करता है, और असध्पुरुषों द्वारा दिये गये पिण्डों का भक्षण नहीं करता । वह अपने साथ रहनेवाले असंख्य प्रचण्ड सर्पों समेत भी उस पापात्मा के अन्न का भक्षण करने में अशक्त रह जाता है! इन उपय॑क्त दोनों पवित्र तीर्थों में चर्म को प्रत्यक्ष देखा जाता है, देवदारु वन में भी यह निदर्शंक पाया जाता है, सुक्ृती जनों के पाप तो यहाँ दूर होते दिखाई पड़ते हैं। भागीरथी और प्रयाग में भी श्राद्ध का अक्षय फल कहा गया है ।58-६ २। कालंजर, दवाणं, नेमिष कुरजाडूल, तथा वाराणसी नगरी--इन पवित्र तीर्थों में मनुष्य को प्रयत्न करके श्राद्धकर्मे सम्पन्न करता चाहिए । वाराणसी नगरी में योगेश्वर झंकर का नित्य निवास रहता है, अतः उसमें पिण्डदान करने से अक्षय फल की

English

Vasistha of great penance performed penance standing still like a stump. Even to-day trees are seen there studded with gems.

अध्याय १४६

श्लोक 4

एकत्र सागराः सप्त सप्रयागाः सपुष्कराः ।नास्य साम्यं लभन्ते ते नात्र कार्या विचारणा

ekatra sāgarāḥ sapta saprayāgāḥ sapuṣkarāḥ / nāsya sāmyaṃ labhante te nātra kāryā vicāraṇā

हिन्दी अर्थ

प्राप्ति होती है इन पवित्र तीर्थों में पिण्डदान करके मनुष्य पवित्रात्मा हो जाता है, उसका श्राद्ध अनन्त फल दायी होता है। इसी प्रकार जप, हवन एवं अन्यान्य सत्कर्मों का भी अयक्षफल वहाँ होता है । लोहित्य बंतरणी, एबं

English

The famous sacred place in Haryana—the country round Thaneswar. Some of the holy places, e.g. Vyasa-tlrtha or Dvaipayana Hrada are in this area. Sarasvati flowed through it.

अध्याय १४६

श्लोक 5

सोमनाथं तु विख्यातं यत्सोमेन प्रतिष्ठितम् ।तत्र सोमग्रहे पुण्यं तत्पुण्यं लभते नरः

somanāthaṃ tu vikhyātaṃ yatsomena pratiṣṭhitam / tatra somagrahe puṇyaṃ tatpuṇyaṃ labhate naraḥ

हिन्दी अर्थ

सकृदेव समुद्रान्ते दृश्यते पृण्यकर्तभिः । गडगायां धर्मप्रष्ठे च सरसि ब्रह्मणस्तथा ख्यापितं धर्मसवेस्त्रं लोकस्यपास्य निदर्शनम् । एवं पच्च॒वन पुष्य पुण्यकृज्ठि निषेवितम् ॥।

English

The spot in the sandy desert in Sirhind district where Sarasvati

अध्याय १४६

श्लोक 6

मासान्ते पितरो नृणां वीक्षन्ते सन्ततिं स्वकाम् ।कश्चिद् अस्मत्कुले ऽस्माकं पिण्डमत्र प्रदास्यति

māsānte pitaro nṛṇāṃ vīkṣante santatiṃ svakām / kaścid asmatkule 'smākaṃ piṇḍamatra pradāsyati

हिन्दी अर्थ

तुलामानस्तथा चाप: शास्त्रेश्न विविधेस्तथा । उन्‍्मज्जन्ति तथा लग्ने ये बे पापकृतो जना: ॥

English

The source of the river Sarasvatl in the hills of Sirmur in the Siwalik range of the Himalayas.

अध्याय १४६

श्लोक 7

प्रपितामहास्तथादित्याः श्रुतिरेषा सनातनी ।एवं ब्रुवन्ति देवाश्च ऋषयः सतपोधनाः

prapitāmahāstathādityāḥ śrutireṣā sanātanī / evaṃ bruvanti devāśca ṛṣayaḥ satapodhanāḥ

हिन्दी अर्थ

मुण्डपृष्ठ पद न्यस्तं महादेवेन धीमता । बहुन्देवयुगांस्तप्त्वा तपस्तीत्रं सुदुश्चरम् १०२ अल्पेनाप्यत्र कालेन नरो धर्मपरायणः । पाप्पानसुत्सजत्याश जीर्णत्वचमिवोरग: ॥ सिद्धानां प्रीतिजननेः पापानां च भयंकरे:। लेलिहानमंहाभोगे रक्षितं तु दिवानिशम्

English

There a weighing balance that indicates piety and impiety, is seen. People who get themselves weighed by Brah- manas in it derive excellent fruits.

अध्याय १४६

श्लोक 8

सकृत्पिण्डोदकेनैव शृणु पार्थिव यत्फलम् ।द्वादशाब्दानि राजेन्द्र योगं भुक्त्वा सुशोभनम्

sakṛtpiṇḍodakenaiva śṛṇu pārthiva yatphalam / dvādaśābdāni rājendra yogaṃ bhuktvā suśobhanam

हिन्दी अर्थ

स्वर्ण वेदी में भी श्राद्धकमे के यही फल कहे गये हैं ।8३-६४५। पुण्यकर्म परायणों ने समुद्रान्त में केवल एक श्राद्ध करने का विधान देखा है ! गज्भा, धर्मपृष्ठ, ब्रह्मसरोवर, गया, गृध्रकट, प्रभृति तीर्थों में श्राद्धधान का महान फल है। भरत के पवित्र, पुण्यप्रद आश्रम में जो अरण्य है, वह परम पुण्यदायी कहा है, उसके चारों ओर पाँच योजन तक बरफ गिरता है। उस पवित्र अरण्य मे माँस नेत्रधारी मनुष्य को भी मतंग ऋषि का आश्रम - दिखाई पड़ता

English

The daughter of Pitrs, the great Yogini, is famous by the name of Gandhakali. It is she who will give birth to the great Yogin, the noble souled Vyasa, who will divide the single Veda into four, who will be an intelligent great sage, the great scion of the family of Parasara and who is a fourth part of Brahma.

अध्याय १४६

श्लोक 9

युगे युगे महाराज अस्माहके पितामहाः ।सर्वदा ह्यवलोकन्त आगच्छन्तं स्वगोत्रजम्

yuge yuge mahārāja asmāhake pitāmahāḥ / sarvadā hyavalokanta āgacchantaṃ svagotrajam

हिन्दी अर्थ

है ।६६-६८। यह परम पवित्र तीथं घममं स्वेस्व के रूप में प्रसिद्ध किया गया है, एवं इस लोक का धर्म निदर्शंक है। इसी प्रकार पतच्चवन नामक पुण्यप्रद तीर्थ भी पुण्यात्माओं द्वारा सुसेवित है। उस पत्चवन तीथे ने पाण्डु- विश्ञाला नामक तीर्थ धर्म का प्रत्यक्ष निदशंन है।६। जो पाप करनेवाले मनुष्य होते हैं, वे वहाँ तुलामान चाप ओर विविध शस्त्रों समेत लग्न आने पर डुबकी लगाते हैं। तृतीय में पद, निस्वर पावमण्डल (?) महाह्ृद तथा कौछिकी में दिया गया श्राद्ध महाफल देनेवाला होता है ।!००-१०१। परम बुद्धिमान महादेव ने मुण्डपृष्ठ में अपता पदन्‍्यास किया था, अनेक देव युगों तक परम कठोर एवं दुर्गम तपस्या उन्होंने वहाँ की थी । धर्म में आस्था रखनेवाला मनुष्य बहुत थोड़े समय में ही वहाँ अपने समस्त पापकर्मों को सर्प की कुचल की भाँति छोड़ देता है।१०२-१०३। वह परम पुनीत तीर्थ सिद्ध जनों के प्रीतिकारी, पापात्माओं के लिये परम भयंहर एवं

English

There is the lake Acchodaka 1 from which she origina¬ ted as the river Acchoda. Again she (Gandhakali) was born of the womb of a fish at the instance of Varana 2.

अध्याय १४६

श्लोक 10

भविष्यति किम् अस्माकम् अमावास्याप्यमाहके ।स्नानं दानं च ये कुर्युः पित्ःणां तिलतर्पणम्

bhaviṣyati kim asmākam amāvāsyāpyamāhake / snānaṃ dānaṃ ca ye kuryuḥ pitḥṇāṃ tilatarpaṇam

हिन्दी अर्थ

अपनी विशाल दाढ़ों को लपलपाने वाले महान् सर्पों से रात दिन सुरक्षित है। उस मुण्डपृष्ठ तीर्थ के उत्तर

English

The place where she has a holy hermitage, is resorted to by meritorious persons. Sraddha offered there once, is said to be everlasting. If Sraddha is offered there even once, it causes the attainment of Yoga and Samadhi (Trance).

अध्याय १४६

श्लोक 11

ते सर्वपापनिर्मुक्ताः सर्वान्कामांल्लभति वै ।जलमध्ये ऽत्र भूपाल अग्नितीर्थं च तिष्ठति

te sarvapāpanirmuktāḥ sarvānkāmāṃllabhati vai / jalamadhye 'tra bhūpāla agnitīrthaṃ ca tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

नाम्ता कनकनन्दीति तीर्थ त्ेलोक्यविश्वुतम् । उदीच्यां मुण्डपृष्ठस्य देवषिगणसेवितम् ॥। तन्न स्नात्वा दिवं यान्ति कामचारा विहंगमाः १०५ दत्त चापि तथा श्राद्धमक्षयं समुदाहृतम् । ऋणेस्त्रिभिस्तदा स्नात्वा निक्षिणोति नरोत्तमः

English

He who offers Sraddha in Kuberatunga, Vyamocca and Vyasatlrtha is a holy Brahmana. The Sraddha yields ever¬ lasting benefits.

अध्याय १४६

श्लोक 12

दर्शनात् तस्य तीर्थस्य पापराशिर्विलीयते ।स्नानमात्रेण राजेन्द्र ब्रह्महत्यां व्यपोहति

darśanāt tasya tīrthasya pāparāśirvilīyate / snānamātreṇa rājendra brahmahatyāṃ vyapohati

हिन्दी अर्थ

तीरे तु सरसस्तत्र देवस्थाइड्यतनं महत् । आरुह्म तज्जपंस्तन्न सिड्धो याति दिवं ततः

English

In the north-eastern quarter there is Nandavedl. It is resorted to by Siddhas for ever. It is not visible to non-self- possessed souls. (Those who perform Sraddha there) do not return (i.e. they attain liberation from Samsara).

अध्याय १४६

श्लोक 13

शुक्लाम्बरधरो नित्यं नियतः स जितेन्द्रियः ।एककालं तु भुञ्जानो मासं तीर्थस्य सन्निधौ

śuklāmbaradharo nityaṃ niyataḥ sa jitendriyaḥ / ekakālaṃ tu bhuñjāno māsaṃ tīrthasya sannidhau

हिन्दी अर्थ

तस्मिन्निवंतंयेज्छाडं यथाशक्ति यथाबलम् । कामान्स लभते दिव्यान्मोक्षोपायं च नित्यशः सानसे सरसि श्रेष्ठे दृश्यते महदद्भुतम् । दिवश्च्च्युता महाभागा ह्यन्तरिक्षे विराजते ११० गड़ा त्रिपथगा देवी सोमपाद्वाच्युता भुवि । आकाशे दृश्यते तत्र तोरणं सुर्यंसंतिभम् ११११

English

In the holy centre Mahalaya, 3 the intelligent Maha- deva had imprinted his foot. It is a Siddhaksetra resorted to (by Siddhas). People who go there do not return (i.e. attain Moksa).

अध्याय १४६

श्लोक 14

सुवर्णालंकृतानां तु कन्यानां शतदानजम् ।फलमाप्नोति सम्पूर्णं पितृलोके महीयते

suvarṇālaṃkṛtānāṃ tu kanyānāṃ śatadānajam / phalamāpnoti sampūrṇaṃ pitṛloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

पावनो सर्वेभ्नुतानां धर्मज्ञानां विशेषतः चन्द्रभागा च सिन्धुश्न उसे मानससंनिभे ॥

English

(Partially defective) On (the peak called) Umatunga, in the shrine of the goddess (Uma) has performed penance standing on one foot for the period of a divine yuga, without taking any food 4. And the water (also) stood (for that period?).

अध्याय १४६

श्लोक 15

पृथिव्याम् आसमुद्रायां महाभोगपतिर्भवेत् ।धनधान्यसमायुक्तो दाता भवति धार्मिकः

pṛthivyām āsamudrāyāṃ mahābhogapatirbhavet / dhanadhānyasamāyukto dātā bhavati dhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

पर स्नान करके इच्छानुरूप विचरण करनेवाले विहंगम स्वर्ग को प्राप्ति करते हैं ।१०४-१०५। वहाँ पर दिया गया श्राद्ध अक्षय फलदायी कहा गया है। उत्तम मनुष्य उस पुतीत तीथे में स्नान करके तीनों ऋणों से मुक्त होते हैं। सरोवर के तीर पर देव का विशाल मन्दिर है, उस पर आरूढ़ होकर मन्त्र जप करने से »द्ध होता हैं तदनन्तर स्वर्ग की प्राप्ति होती है ।१०६-१०७। उत्तर ओर मानस तीथ की यात्रा करने से परम सिद्धि को प्राप्ति होती है वहाँ जाने से सुरश्रेष्ठ का प्रत्यक्ष दर्शन होता है, जो अत्यन्त आश्चयें का विषय है वहाँ जाकर अपनी शक्ति एवं पराक्रम के अनुसार श्राद्धकर्म सम्पन्न करना चाहिए, जो ऐसा करता है वह दिव्य मनोरथों की प्राप्ति करता है एवं मोक्ष का उपाय सुलभ करता है ।!०८-१०९। परम श्रेष्ठ उस मानस सरोवर में एक महान आएचय दिखाई पड़ता है, वहाँ पर महाभाग्य शालिनी तजिपथयामिनी गड्जा देवी आकाशमाग से च्यूत होकर

English

The same as Omkaranatha or Amaresvara in M.P. _Dc 117

अध्याय १४६

श्लोक 16

उपवासी शुचिर्भूत्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ।अस्माहकं समासाद्य यस्तु प्राणान् परित्यजेत्

upavāsī śucirbhūtvā brahmalokamavāpnuyāt / asmāhakaṃ samāsādya yastu prāṇān parityajet

हिन्दी अर्थ

अन्तरिक्ष में विराजमान हैं वह देवी वहीं पर चन्द्र मण्डल से पृथ्वी तल पर गिरी हैं। वहाँ आक्राशमण्डल में सूय के समान परम तेजोमय तोरण दिखाई पड़ता है। जो सुवर्णमय तथा स्वर्ण के द्वार की भाँति विस्तृत है । वहीं से जीवों की विशेषतय। धर्म के मर्म को जाननेवालों की--उद्धार करनेवाली चन्द्रभागा नामक नदी निकल कर पूर्व के समुद्र में गिरती है ।११०-१११। चन्द्रभागा और सिन्‍्धु ये दोनों नदियाँ मानस सरोवर की भाँति

English

One becomes sanctified by visiting Umatunga, Bhrgutunga, Brahmatunga, Mahalaya, Kadravati, Sandili and Vamana's cave. Sraddha performed there yields ever-lasting benefit. Japa, Homa and meditation—everything performed there becomes meritorious.

अध्याय १४६

श्लोक 17

कोटिवर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते ।ततः स्वर्गात् परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः

koṭivarṣasahasrāṇi rudraloke mahīyate / tataḥ svargāt paribhraṣṭaḥ kṣīṇakarmā divaścyutaḥ

हिन्दी अर्थ

पुण्यदायी एवं पवित्र हैं, नदियों में श्रेष्ठ दिव्य गुणयुक्त सिन्धु पश्चिम के समुद्र में गिरती है विविध्न प्रकार के धातुओं से विभूषित हिंमवान् नामक पर्वत है, जो अस्सी सहसों योजन विस्तृत कहा जाता है, सिद्धों एवं सिद्ध चारणसंको्ण: सिद्धच्चाचारणसेवित:ः । तत्र पुष्करिणी रम्या सुषुम्ना नाम विश्वुता

English

By regularly visiting Sailaklrtipura, one attains all cherished desires. Like Devas he remains invisible to all living beings and roams in the earth.

अध्याय १४६

श्लोक 18

सुवर्णमणिमुक्ताढ्ये कुले जायेत रूपवान् ।कृत्वाभिषेकविधिना हयमेधफलं लभेत्

suvarṇamaṇimuktāḍhye kule jāyeta rūpavān / kṛtvābhiṣekavidhinā hayamedhaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

कुर्याच्छाद्धमथ्थतेषु नित्यमेव यथाविधि। प्रदक्षिणं दिशं गत्वा सर्वकासचिकीर्षक:ः

English

Sraddhas should be offered everyday by one who seeks everlasting benefits at the great holy centre of Kasyapa well known as Kalasarpi.

अध्याय १४६

श्लोक 19

धनाढ्यो रूपवान्दक्षो दाता भवति धार्मिकः ।चतुर्वेदेषु यत्पुण्यं सत्यवादिषु यत्फलम्

dhanāḍhyo rūpavāndakṣo dātā bhavati dhārmikaḥ / caturvedeṣu yatpuṇyaṃ satyavādiṣu yatphalam

हिन्दी अर्थ

त्रेवण्यें बिहिते स्थाने धर्मवर्णाश्रमे तथा । कोयस्थानस्य संत्यागात्प्राप्पते पितृपुजनम् चारणों के समूहों से वह पंत राज भरा पड़ा है। उसमें सुषुम्ता नामक एक परम मनोहर पुष्करिणी है, उसमें जन्म लेनेवाला प्राणी दस सहल्नो व जीवित रहता है, उसमें दिया हुआ श्राद्ध महान् उन्नति करनेवाला तथा अनन्तफल दायी होता है, उसमें श्राद्ध करके मनुष्य अपनी दस अगली और दस पिछली पीढ़ियों को तारता है ।११३-११६। हिमवान् पब॑ंत का प्रत्येक स्थल पुण्यदायी है, गंगा में सर्वत्र पुण्य है । इसी प्रकार समुद्र में गिरने

English

Sraddha performed all round Salagrama 2 becomes ever-lasting. It is not directly visible to sinful persons,

अध्याय १४६

श्लोक 20

तत्फलं लभते नूनं तत्र तीर्थे ऽभिषेचनात् ।तीर्थानां परमं तीर्थं निर्मितं शम्भुना पुरा

tatphalaṃ labhate nūnaṃ tatra tīrthe 'bhiṣecanāt / tīrthānāṃ paramaṃ tīrthaṃ nirmitaṃ śambhunā purā

हिन्दी अर्थ

वाली अम्यान्य नदियाँ तथा स्वयं समुद्र भी सर्वत्र श्राद्धकर्मों में पुषण्यदायी कहा गया है। बुद्धिमान पुरुष इन उपर्युक्त एवं अन्यान्य पविच्न ती्थों में आद्धक्रिया सम्पन्न करे । पवित्रतीर्थों में स्नान एवं दान करके मनुष्य पविन्न हो जाता है ! १७-११५। उच्च गिरिशिखर पर, कन्दरा एवं गुफाओं में पर्वतों की उपत्यकाओं एवं झरनों के समीप, नदियों के तटों, पर युगारम्भ की तिथियों, महासमुद्र के तट पर, गौंओं की शाला में, नदियों के

English

The place is forbidden to the evil-minded and the good ones are allowed entry, since the pure divine king of serpents dwelling in the holy lake accepts the Pintfa of thegood and not that of the bad. Even by the highly illuminated ser¬ pents, the food cannot be eaten (if offered by the bad).

अध्याय १४६

श्लोक 21

हृदयेशः स्वयं विष्णुर् जपेद्देवं महेश्वरम् ।गन्धर्वाप्सरसश्चैव मरुतो मारुतास्तथा

hṛdayeśaḥ svayaṃ viṣṇur japeddevaṃ maheśvaram / gandharvāpsarasaścaiva maruto mārutāstathā

हिन्दी अर्थ

संगम पर बनों में, स्वच्छ लिपी पुती मनोहर पृथ्वी पर, गोबर से लिपे हुए एकास्त घर में नित्य ही विधिपृर्वक श्राद्धकरना चाहिए। सभी मनोरथों की प्राप्ति का इच्छुक मनुष्य इन स्थानों पर श्राद्ध एवं प्रदक्षिण कर सफल होता है ।११९-३२४। सवंदा इन्हीं स्थानों में आलस्थादि छोड़कर सावधान मन से श्राद्ध करना चाहिए। इस प्रकार बुद्धिमान पुरुष ब्रह्मत्व की सिद्धि प्राप्त कर सकता है ।!२३। क्रोधादि को सबंथा छोड़ने पर तीनों उच्च- वर्णा (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वेश्य) से किये धर्म एवं वर्णाश्रम की मर्यादा से अनुमोदित विधि के अनुसार दान करने पर पितरों की पूजा का फल प्राप्त होता है ।१२४। पापात्मा भी इन उपर्युक्त पवित्र तीर्थों की यात्रा धैय॑ एवं, श्रद्धा

English

In these two holy centres, Dharma is directly seen. In Devadaruvana 3 too the same proof can be seen.

अध्याय १४६

श्लोक 22

विश्वेदेवाश्च पितरः सचन्द्राः सदिवाकराः ।मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः

viśvedevāśca pitaraḥ sacandrāḥ sadivākarāḥ / marīciratryaṅgirasau pulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ

हिन्दी अर्थ

तीर्थान्यनुसरन्धीरः श्रदधधानो जितेन्द्रिय: । कृतपापश्च शुध्येत कि पुनः शुभकर्मफृत् ॥

English

The sins shaken off are visible to the meritorious soul. InBhagirathi and Prayaga 4 (the Sraddha performed) is said to be of ever-lasting benefit.

अध्याय १४६

श्लोक 23

प्रचेताश्च वसिष्ठश्च भृगुर्नारद एव च ।च्यवनो गालवश्चैव वामदेवो महामुनिः

pracetāśca vasiṣṭhaśca bhṛgurnārada eva ca / cyavano gālavaścaiva vāmadevo mahāmuniḥ

हिन्दी अर्थ

तियंग्योनि न गच्छेच्च कुदेशे न च जायते । स्वर्गो भवति बै विप्रो मोक्षोपायं च विनचदति अश्वद्धधानाः पाप्मानों नास्तिकाः स्थितसंशया: । हेतुद्रष्टा च पञ्चेते न तोर्थंफलमश्रुते (१२७ गुरुतीर्थे परा सिद्धिस्तीर्थानां परम पदस्। ध्यान तीर्थपरं तस्माहब्रह्मतीय्य॑ सनातनम् १२८

English

Near Vyasa's seat for dhyana and Kantipuri or ancient Kathmandu

अध्याय १४६

श्लोक 24

वालखिल्याश्च गन्धारास्तृणबिन्दुश्च जाजलिः ।उद्दालकश्चर्ष्यशृङ्गो वसिष्ठश्च सनन्दनः

vālakhilyāśca gandhārāstṛṇabinduśca jājaliḥ / uddālakaścarṣyaśṛṅgo vasiṣṭhaśca sanandanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रत्याहार पुनविद्धि मोक्षोपायमसंशयम् । इच्द्रियाणां मनो घोर बुद्धचयादीनां प्रवर्तेनम् (१३१

English

A place near the source of Gandak, the place where Sage Pulaha and Bharata performed penance.

अध्याय १४६

श्लोक 25

शुक्रश्चैव भरद्वाजो वात्स्यो वात्स्यायनस्तथा ।अगस्तिर्मित्रावरुणौ विश्वामित्रो मुनीश्वरः

śukraścaiva bharadvājo vātsyo vātsyāyanastathā / agastirmitrāvaruṇau viśvāmitro munīśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

क्षीणेषु सबंपापेषु क्षोणेष्वेबेन्द्रियिषु च । परिनिर्वाति शुद्धात्मा यथा वह्विनिरिन्धनः ११३३ कारणेम्यो गुणेभ्यो5थ व्यक्ताव्यक्तस्य कृत्स्नशः । वियोजयति क्षेत्रज्ञं तेम्यो योगेन योगवित्

English

Its site is on Ganga near Kcdar in Garhwal; Badarikasrama is situated in this 'Vana'.

अध्याय १४६

श्लोक 26

गौतमश्च पुलस्त्यश्च पौलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।सनातनस्तु कपिलो वाह्निः पञ्चशिखस्तथा

gautamaśca pulastyaśca paulastyaḥ pulahaḥ kratuḥ / sanātanastu kapilo vāhniḥ pañcaśikhastathā

हिन्दी अर्थ

पूवंक दन्द्रियों को स्ववद्ष रख यदि करे तो शुद्ध हो जाता है, शुभ कर्म करने वालों के लिये तो कुछ कहना ही ही नहीं है । इन तीर्थों की यात्रा करने वाला पाप करने वाला भी विश्र तियंक् योनि में कभी जन्म नहीं लेता और न बुरे स्थानों में ही उसका जन्म होता है, प्रत्युत वह स्वर प्राप्त करता है, मोक्ष के उपाय उसे सुलभ हो जाते हैं ।(२५-१ :६। श्रद्धा न करने वाले, पापात्मा, परलोक न माननेवाले अथवा वेदों के निन्‍्दक, स्थिति में सन्देह

English

Modern Allahabad, U.P.

अध्याय १४६

श्लोक 27

अन्ये ऽपि बहवस्तत्र मुनयः शंसितव्रताः ।क्रीडन्ति देवताः सर्व ऋषयः सतपोधनाः

anye 'pi bahavastatra munayaḥ śaṃsitavratāḥ / krīḍanti devatāḥ sarva ṛṣayaḥ satapodhanāḥ

हिन्दी अर्थ

रखने वाले संशयात्मा, एवं सभी पुण्य कार्यों में किसी कारण का अन्वेषण करनेवाले कुतर्की-- इन पाँचों को इन पवित्र तीर्थों का फल नहीं प्राप्त होता । गुरु रूपी तीर्थ में परम सिद्धि प्राप्त होती है, वह सभी तीथों से श्रेष्ठ है। उससे भी श्रेष्ठ तीथं ध्यान है, यह ध्यान साक्षात् ब्रह्म तीर्थ है, इसका कभी विनाश नहीं होता ।7२७-१२८। उपवास से भी यह ध्यान श्रेष्ठ है, यह सभी इन्द्रियों को उनके विषयों से निवत्त करनेवाला है, उपवास से बंधे रहनेवाले व्यक्तिगण प्राणों से विमुक्त होकर इस लोक में पुनः पुतः जन्म धारण करते हैं

English

Sraddfaa should be offered with efforts at Kalanjara, 1 DaSarna, Naimisa, Kurujangala and the city of Varanasi.

अध्याय १४६

श्लोक 28

मनुष्याश्चैव योगीन्द्राः पितरः सपितामहाः ।अस्माहके ऽत्र तिष्ठन्ति सर्व एव न संशयः

manuṣyāścaiva yogīndrāḥ pitaraḥ sapitāmahāḥ / asmāhake 'tra tiṣṭhanti sarva eva na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

प्राण एवं अपान वायु-इन दोनों को समान करके इन्द्रियों, उनके विषयों और बुद्धि को मन में बआंधने पर सब की निवत्ति हो जाती है। मोक्ष के साधन भूत प्रत्याह्र (इन्द्रियों को उनके विषयों से अलग रखना) को पुनः सुनिये । समस्त इन्द्रियों में मन परम चम्चल और घोर है, बुद्धि आदि सबको यही परिचालित करता है ।! ३०- ६ ३१। निराहार रहने से मत की चज्चलता और कठोरता नष्ट हो जाती है, अतः अनशन को परम तप जानता चाहिए।

English

In that city, Yogesvara is present for ever. Hence what is offered there is ever-lasting. Offering Sraddhas in these holy places, one becomes sanctified. The Sraddha yields ever¬ lasting benefits.

अध्याय १४६

श्लोक 29

पितरः पितामहाश्चैव तथैव प्रपितामहाः ।येषां दत्तमुपस्थायि सुकृतं वापि दुष्कृतम्

pitaraḥ pitāmahāścaiva tathaiva prapitāmahāḥ / yeṣāṃ dattamupasthāyi sukṛtaṃ vāpi duṣkṛtam

हिन्दी अर्थ

चंचल बुद्धि और मन इन दोनों को वश में रखने से सुश्दर बुद्धि उत्पन्न होती है। समस्त पापकर्मों के क्षीण हो जाने पर एवं इन्द्रियों के क्षीण हो जाने पर (वा में आ जाने पर) आत्मा शुद्ध होकर इन्धन रहित अग्नि की तरह निर्वाण प्राप्त करती है। समस्त व्यक्त अव्यक्त वस्तुओं के कारण एवं गुणों से योगीजत

English

Penance, Homa, meditation, nay anything performed in Lauhitya, 2 Vaitaranx and SvarnavedI, becomes meritorious.

अध्याय १४६

श्लोक 30

अक्षयं तत्र तत्सर्वं यत्कृतं योधनीपुरे ।मातरं पितरं त्यक्त्वा सर्वबन्धुसुहृज्जनान्

akṣayaṃ tatra tatsarvaṃ yatkṛtaṃ yodhanīpure / mātaraṃ pitaraṃ tyaktvā sarvabandhusuhṛjjanān

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्‍्ते श्राउ्धकल्पे तीथंयात्रा नाम सप्तसप्ततितमो5ष्याय: ।७७। ।

English

Only once, is (Sraddha) seen (performed) near the sea-shore by men of meritorious actions. So also in Gaya, Dharmaprstha and in Brahma's lake.

अध्याय १४६

श्लोक 31

धनं धान्यं प्रियान्पुत्रांस् तथा देहं नृपोत्तम ।गच्छते वायुभूतस्तु शुभाशुभसमन्वितः

dhanaṃ dhānyaṃ priyānputrāṃs tathā dehaṃ nṛpottama / gacchate vāyubhūtastu śubhāśubhasamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

यहस्पतिरुवाच अतः पर प्रवक्ष्यासि दानानि च फलानि च। श्राद्धकमंणि मेध्यानि वर्जनीयानि यानि च नक्तं तु वर्जयेच्छाडं राहोरन्यत्र दर्शनात् । सर्वस्वेनापि कर्तव्य क्षिप्र॑ वे राहुदशंने

English

The Sraddha offered in Gaya and Grdhrakuta yields great benefit. Snow falls all round it upto a distance of five Yojanas (1 Yojana = 12 Kms.). The forest surrounding the her¬ mitage of Bharata is remembered as the most meritorious. The foot-print of Matanga is seen there with the physical eye.

अध्याय १४६

श्लोक 32

अदृश्यः सर्वभूतानां परमात्मा महत्तरः ।शुभाशुभगतिं प्राप्तः कर्मणा स्वेन पार्थिव

adṛśyaḥ sarvabhūtānāṃ paramātmā mahattaraḥ / śubhāśubhagatiṃ prāptaḥ karmaṇā svena pārthiva

हिन्दी अर्थ

अपनी आत्मा को वियुक्त करते हैं, जिसके फलस्बरूप इस जन्म के उपरान्त उनकी न कोई गति होती है, न

English

This spot is glorified as (conducive to) entire righte¬ ousness. It is an example for this world. Similarly the Panca- vana is very holy. It is resorted to by men of meritorious actions. The holy centre Panduvisala is also a ready example.

अध्याय १४६

श्लोक 33

युधिष्ठिर उवाच: शुभाशुभं न बन्धूनां जायते केन हेतुना ।एकः प्रसूयते जन्तुरेक एव प्रलीयते

yudhiṣṭhira uvāca: śubhāśubhaṃ na bandhūnāṃ jāyate kena hetunā / ekaḥ prasūyate jantureka eva pralīyate

हिन्दी अर्थ

कोई स्थान रहता है. निश्चय ही वे व्यक्त एवं अव्यक्त किसी में नहीं रहते । न वे सत् हैं न असत् उनकी स्थिति के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता ।!३२-१२०। बृहस्पति ने कहा--अब इसके उपरान्त मैं श्राडकर्म में दिये जाने वाले दान एवं उनसे मिलने वाले फलों के बारे में बतला रहा हैं, यह भी बतला रहा हूँ कि श्राद्ध में कौन सी वस्तुएँ पवित्र और कौन सी वर्जित रखी हैं ।!। हिम गिरते समय हिम का भ्रक्षण (१?) करना चाहिए, तदवम्तर अर्थात् वसन्त ग्रीष्म आदि में अग्निहोत्र करना चाहिए यह विधि परम पुण्य प्रद कही जाती है। रात्रि के समय

English

(Defective) The persons who perpetrate sins come to the surface (become exposed) by means of weighing balances, by its arcs 3 and by various scriptures when they get attached (visit) to that Tlrtha (?).

अध्याय १४६

श्लोक 34

एको हि भुङ्क्ते सुकृतमेक एव हि दुष्कृतम्

eko hi bhuṅkte sukṛtameka eva hi duṣkṛtam

हिन्दी अर्थ

श्ाद्धकर्म वजित रखना चाहिए। रात्रि के बिना अन्य अवसर पर २ हु के दशन के समय सर्वस्व व्यय करके शीघ्र ही श्राद्धकम करना चाहिए। जो व्यक्ति प्रहण के अवसर पर श्राद्धकर्म नहीं करता है बह कीचड़ में

English

Highly efficacious is the Sraddha offered at the silent (deep) great lake Pavamandala in the (river) Kausiki in the third quarter on the third Tithi (day).

अध्याय १४६

श्लोक 35

मार्कण्डेय उवाच: एष त्वयोक्तो नृपते महाप्रश्नः स्मृतो मया

mārkaṇḍeya uvāca: eṣa tvayokto nṛpate mahāpraśnaḥ smṛto mayā

हिन्दी अर्थ

” एतदर्ध॑स्थाने 'आसच्न: सदसन्तैव किचित्स्थित:” इति क. पुस्तके । उपरागे न कुर्याद्च: पड़े गौरिव सीदति। कुर्वाणस्तुद्धरेत्पापास्मज्जनरिव सागरे

English

The places mentioned are identified as follows:

अध्याय १४६

श्लोक 36

पितामहमुखोद्गीतं श्रुतं ते कथयाम्यहम् ।यन्मे पितामहात्पूर्वं विज्ञातम् ऋषिसंसदि

pitāmahamukhodgītaṃ śrutaṃ te kathayāmyaham / yanme pitāmahātpūrvaṃ vijñātam ṛṣisaṃsadi

हिन्दी अर्थ

विश्वदेव॑ च सौम्पं च बहुमांसपरं हृवि: । विषाणं वर्जयेत्खाइूगमसुयानाशनाय वे कर त्वष्टा वे बायंमाणस्तु देवेशेन सहात्मना । पिबञ्शच्रीपतेः सोम पृथिव्यामपतत्पुरा

English

It appears that sinners are supposed to be weighed in the balance.

अध्याय १४६

श्लोक 37

न माता न पिता बन्धुः कस्यचिन्न सुहृत्क्वचित् ।कस्य न ज्ञायते रूपं वायुभूतस्य देहिनः

na mātā na pitā bandhuḥ kasyacinna suhṛtkvacit / kasya na jñāyate rūpaṃ vāyubhūtasya dehinaḥ

हिन्दी अर्थ

शामाकास्तु तथोत्पन्नाः पिन्रर्थभपि पूजिताः । विध्रुषस्तस्य नासाभ्यामसक्ताभ्यां तथेक्षव ३७ श्लेष्माण: शीतला हदया मधुराश्व तथेक्षवः श्यामाकरिक्षुभिश्वव पित॒णां सावेकासिकम् ॥ श्यामाका हस्तिनामा चर पटोलं ब्रहृतीफलम् । अगस्त्यस्य शिखा तीज़ा कषाया: सब एबं च

English

After performing a very severe penance for many celes¬ tial Yugas, the intelligent deity Mahadeva set foot on Mun<Ja- prstha.

अध्याय १४६

श्लोक 38

यद्येवं न भवेत्तात लोकस्य तु नरेश्वर ।अमर्यादं भवेन्नूनं विनश्यति चराचरम्

yadyevaṃ na bhavettāta lokasya tu nareśvara / amaryādaṃ bhavennūnaṃ vinaśyati carācaram

हिन्दी अर्थ

वंशीकरीराः सुरसाः सर्जक भुस्तृणानि च्। वर्जनीयानि वक्ष्यमि श्राद्धकर्मंणि नित्यशः

English

Within a very short time, a righteous man discards his sin quickly like a serpent casting off its slough.

अध्याय १४६

श्लोक 39

एवं ज्ञात्वा पूरा राजन्समस्तैर्लोककर्तृभिः ।मर्यादा स्थापिता लोके यथा धर्मो न नश्यति

evaṃ jñātvā pūrā rājansamastairlokakartṛbhiḥ / maryādā sthāpitā loke yathā dharmo na naśyati

हिन्दी अर्थ

+ लशुनं गुऊजनं चेव पलाण्डः पिण्डमुलकम् । करम्भाद्यानि चान्यानि हीनानि रसगन्धतः फंसी गौ की तरह यातना सहता है । और जो करता है वह अपने पापों से सागर में नाव" की तरह उद्घार पा जाता है २-४। विश्व देव, सोम्य और प्रचुर मांस युक्त हि, गड़े का सींग पितरों की असूया (द्वेष) नष्ट करने के लिये वजित रखना चाहिए ।५। प्राचीन काल में महात्मा देवेश के निषेध करने पर भी त्वष्टा (विश्वकर्मा) ने शचीपति (इन्द्र) का सोमरस पान किया था उनके पीते समय पृथ्वी पर वह गिर पड़ा,

English

Sraddha offered there is said to yield everlasting benefit. An excellent man becomes Tree from his three-fold indebtedness by taking his bath there.

अध्याय १४६

श्लोक 40

धर्मे नष्टे मनुष्याणाम् अधर्मो ऽभिभवेत् पुनः ।ततः स्वधर्मचलनान्नरके गमनं ध्रुवम्

dharme naṣṭe manuṣyāṇām adharmo 'bhibhavet punaḥ / tataḥ svadharmacalanānnarake gamanaṃ dhruvam

हिन्दी अर्थ

जो साँवा के रूप में उत्पन्न हुआ पितरों के लिए वह पूजित माना गया है। उत्ती समय पीते हुए त्वष्टा के अधक्त नासिका के छिद्रों से उस सोमरस के बूंद भो टरथ्वी पर गिरे, जो ईख के रूप में उत्पन्न हुए । इसी कारण ईखें शीतलता प्रदान करनेवाली, रुचिकर, मधुर और कफ कारक होती है। इन सावाँ और ईखों से पितरों की सारी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। जो इन दोनों वस्तुओं को श्राद्धकर्म में निवेदित करता है

English

On the banks of that lake, there is a great shrine of the lord. After mounting up to it and performing Japas, one be¬ comes a Siddha and thereafter goes to heaven.

अध्याय १४६

श्लोक 41

लोको निरङ्कुशः सर्वो मर्यादालङ्घने रतः ।मर्यादा स्थापिता तेन शास्त्रं वीक्ष्य महर्षिभिः

loko niraṅkuśaḥ sarvo maryādālaṅghane rataḥ / maryādā sthāpitā tena śāstraṃ vīkṣya maharṣibhiḥ

हिन्दी अर्थ

वह शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त करता है ।६-८। साँवा, हस्तिनाम, पटोल, बुहतीफल, अभस्त्य की तीखी शिखाएं, ये सभी कषाय स्वादुवाले हैं । इसी प्रकार अन्यान्य सुस्वादु एवं मधुर द्रव्य पितरों को प्रिय हैं। श्राद्धकर्म में नागर और दीघेमूलक भी देना चाहिए ।६-१०। इसी प्रकार वंशी करीर, सुरसा, सर्जक और भूस्तृण भी देने चाहिए । श्रा्धकर्म में सर्बदा जो वर्जित वस्तुएँ हैं, उन्हें बतला रहा हूँ !१। लहसुन, गाजर, प्याज, पिण्डमूलक, करम्भ आदि वस्तुएँ, जो रस और गन्ध से निन्ध हैं, श्रा़कर्म में वजित रखनी चाहिए, इनका कारण बतला रहा

English

After going to the northern Manasa, 1 one attains excellent Siddhi. On going to the excellent city 2, a very wonder¬ ful thing is seen.

अध्याय १४६

श्लोक 42

स्नानं दानं जपो होमः स्वाध्यायो देवतार्चनम् ।पिण्डोदकप्रदानं च तथैवातिथिपूजनम्

snānaṃ dānaṃ japo homaḥ svādhyāyo devatārcanam / piṇḍodakapradānaṃ ca tathaivātithipūjanam

हिन्दी अर्थ

न पधनुश्चित्वान्तगंतग्रन्थों ड. पुस्तके वास्ति । १. आनम्दाश्रम की प्रति का मूल गत पाठ भ्रामक समझ कर यहाँ छोड़ दिया गया है। --अनुवादक

English

One should perform Sraddha there according to one's capacity and physical strength. He should attain divine pleasures and the means to liberation (from Sariisara) for ever.

अध्याय १४६

श्लोक 43

पितरः पितामहाश्चैव तथैव प्रपितामहाः ।त्रयो देवाः स्मृतास्तात ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः

pitaraḥ pitāmahāścaiva tathaiva prapitāmahāḥ / trayo devāḥ smṛtāstāta brahmaviṣṇumaheśvarāḥ

हिन्दी अर्थ

श्राद्धकर्मणि वर्ज्यानि कारण चात्र वक्ष्यते । पुरा दे (दे) वासरे युद्धे निजितस्थ बलेः सुरेः अथ वेदोक्तनिर्यासाल्लेंवणान्यूषणानि च। श्राद्धकर्माणि वर्ज्यानि याश्र नार्यो रजस्वला: ३१५

English

In the excellent Manasa lake, a very wonderful thing is seen. The highly blessed goddess Ganga of three-fold path, slipping dawn from heaven, shines in the sky. Falling off the lunar rays on to the earth, it appears like festoons in the sky with the brightness of the sun.

अध्याय १४६

श्लोक 44

पूजितैः पूजिताः सर्वे तथा मातामहास्त्रयः ।तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्रुतिस्मृत्यर्थनोदितान्

pūjitaiḥ pūjitāḥ sarve tathā mātāmahāstrayaḥ / tasmāt sarvaprayatnena śrutismṛtyarthanoditān

हिन्दी अर्थ

वन्‍्यमुलफलाहार: भ्राद्ध॑ कुर्यातु श्रद्धया । राष्ट्रमिष्टमवाप्नोति स्वर्ग मोक्ष यशस्करम् ११६ अनिष्टशब्दसंकीर्ण जस्तुव्याप्तमथापि वा। पुतिगन्धां तथा भूमि श्राद्धक्ंणि व्जयेत् २०

English

It is diving with golden splendour. It is like the gate to heaven thrown wide open. It is from this place that it flows again towards the eastern ocean in its final stage.

अध्याय १४६

श्लोक 45

धर्मं समाचरन्नित्यं पापांशेन न लिप्यते ।श्रुतिस्मृत्युदितं धर्मं मनसापि न लङ्घयेत्

dharmaṃ samācarannityaṃ pāpāṃśena na lipyate / śrutismṛtyuditaṃ dharmaṃ manasāpi na laṅghayet

हिन्दी अर्थ

उत्तरेण महानद्या दक्षिणेन च कंकटठात् । देशस्त्रशद्भूवो नाम वर्जित: श्राउ्धकर्मणि २२ कारस्करा: कलिडगाश्य सिन्धोरुत्तरमेव च । प्रनष्टअ्मधर्माश्व वर्ज्या देशाः प्रयत्नतः ३२२३ हूँ । प्राचीनकाल में देवताओं और ओर राक्षसों के युद्ध में देवताओं द्वारा पराजित बलि के शरीर में जो घाव थे, उनसे रक्त के विन्दु निकलकर पृथ्वी पर गिरे, वे ही इन वस्तुओं के रूप में हुये, अतः श्राद्धकम में इनको सबंदा वर्जित रखना चाहिए ।१२-१४। वेद में गिनाये गये समस्त निर्यास (मोंद) द्रव्य, लवण, एवं ऊषण (पिप्पलोमूल, चीता) ये वस्तुएं भी श्राद्धकम में वजित रखी जायें। इसी प्रकार जो रजस्वला स्त्रियाँ हों; वे भी भ्राद्धक्म

English

It sanctifies all living beings and particularly those who know righteousness. Candrabhaga (Chenab) and

अध्याय १४६

श्लोक 46

इह लोके परे चैव यदीच्छेच्छ्रेय आत्मनः ।पितापुत्रौ सदाप्येकौ बिम्बाद्बिम्बमिवोद्धृतौ

iha loke pare caiva yadīcchecchreya ātmanaḥ / pitāputrau sadāpyekau bimbādbimbamivoddhṛtau

हिन्दी अर्थ

में प्रवत्त न हों। दुर्गन्धि युक्त, फेनों से व्याप्त, छोटे गड़ढों का जिसमें मौओं की तृप्ति नहीं होती, जो रात में ग्रहण किया गया हो, भेंड, मृग, बकरी, ऊँट एवं अन्य एक खुरवाले पशुओं से पीकर दृषित किया गया, महिष, चमर आदि अन्य पशुओं द्वारा गेंदला किया गया जल, श्राद्धकर्म में विद्वान् पुरुष वर्जित रखें! ६-१७। अब इसके उपरान्त उन स्थानों को बतलाने कौ चेष्टा कहूँग्रा, जिन्हें भरसक श्राद्धकर्म में

English

Can it be the Kara Kul of northern Pamirs as suggested by M. Ali (AGP )? The so-called Uttara Manasa at Gaya is an ordinary pond.

अध्याय १४६

श्लोक 47

विभक्तौ वाविभक्तौ वा श्रुतिस्मृत्यर्थतस्तथा ।उद्धरेदात्मनात्मानम् आत्मानम् अवसादयेत्

vibhaktau vāvibhaktau vā śrutismṛtyarthatastathā / uddharedātmanātmānam ātmānam avasādayet

हिन्दी अर्थ

वर्जित रखना चाहिए । इसके अतिरिक्त उन लोगों को भी बतला रहा हूँ, जिन्हें श्राद्ध कम देखना भी नहीं चाहिए । इस प्रकार सभी प्रकार की पवित्रता एवं अपवित्रता के बारे में बतला रहा हूं । श्रद्धा पूर्वक वन में उत्पन्न होनेवाले मूल एवं फलों के आहारों से श्राद्धकर्म सम्पन्न करने चाहिए । ऐसे करनेवाले को राष्ट्र मित्र की भाँति सम्मान देता है और यश की बृद्धि होती है, स्वर्ग की प्राप्ति होती है।१८-१६। अनिष्टकारी शब्दों से एवं जीव जम्तुओं से व्याप्त, दुगंन्धि युक्त भूमि को श्राद्धकम में वजित रखना चाहिए। सागर तक जानेवाली समस्त नदियाँ, दक्षिण पूर्व के द्वार एवं त्रिश्डकु देश इनको वारह योजन से छोड़ देना चाहिए । यह त्रिशंकु देश महानदी के उत्तर, कंकट देश से दक्षिण फैला हुआ है, यह श्राकर्म में वर्जित है ।२०-२२। कारस्कर, कलिड्, सिन्धु के उत्तरवर्ती देश एवं वे देश जहाँ पद वर्णाश्रम धर्म नष्ट हो चुका है, प्रयत्न पूर्वक श्राद्ध में वजित

English

No mention of any city is here in the context. Bd. P. ibid V. 117 reads Sarafreffhe 'inthat excellent lake*.

अध्याय १४६

श्लोक 48

पिण्डोदकप्रदानाभ्यामृते पार्थ न संशयः ।एवं ज्ञात्वा प्रयत्नेन पिण्डोदकप्रदो भवेत्

piṇḍodakapradānābhyāmṛte pārtha na saṃśayaḥ / evaṃ jñātvā prayatnena piṇḍodakaprado bhavet

हिन्दी अर्थ

एवमुक्तो महातेजा बृहस्पतिरुवाच तम् । सर्वेषासेव सृतानां त्रयी संवरणं स्मृतप्म्

English

There is the mountain named Himavan. It is embellished with various kinds of minerals. It is said that it ex¬ tends to eighty thousand Yojanas. It is crowded with Siddhas and Caranas. It is served and resorted to by Siddhas and Cara¬ cas. There is a PuskarinI (lake) on it, well known by the name Susumna.

अध्याय १४६

श्लोक 49

आयुर्धर्मो यशस्तेजः सन्ततिश्चैव वर्धते ।पृथिव्यां सागरान्तायां पितृक्षेत्राणि यानि च

āyurdharmo yaśastejaḥ santatiścaiva vardhate / pṛthivyāṃ sāgarāntāyāṃ pitṛkṣetrāṇi yāni ca

हिन्दी अर्थ

वृष यश्न परित्यज्य मोक्षमन्यत्र मार्गति । वथा वेदाश्रमास्तस्मिन्यों वे सम्यदून पश्यति पाषण्डवे कृतास्तात नैषा सृष्टि: स्वयंभुवः। यद्दिश्राद्धक निर्गन्‍्था: शक्‍्त्या जीवन्ति कर्पटा:..

English

One who is born there lives upto ten thousand years. Sraddha offered thereyields ever-lasting benefits, and great pros¬ perity. The performer of Sraddhas enables ten previous genera¬ tions and ten succeeding ones to cross (hell).

अध्याय १४६

श्लोक 50

तानि ते सम्प्रवक्ष्यामि येषु दत्तं महाफलम् ।गयायां पुष्करे ज्येष्ठे प्रयागे नैमिषे तथा

tāni te sampravakṣyāmi yeṣu dattaṃ mahāphalam / gayāyāṃ puṣkare jyeṣṭhe prayāge naimiṣe tathā

हिन्दी अर्थ

ये धर्म नानुवतंन्ते ते बे नग्नादयों जना:। वृथाजटी वुधासुण्डी वथानग्नश्व यो द्विज: ३१ वृथात्रती बुथाजापी ते ब॑ नग्नादयों जनाः। कुलंधमा निकाशाश्व तथा पुष्टिकलंशका: ३२

English

Everything belonging to Himavan is holy. The Gahga is sacred everywhere (throughout). The ocean-going rivers and all the oceans all round are holy.

अध्याय १४६

श्लोक 51

संनिहत्यां कुरुक्षेत्रे प्रभासे कुरुनन्दन ।पिण्डोदकप्रदानेन यत्फलं कथितं बुधैः

saṃnihatyāṃ kurukṣetre prabhāse kurunandana / piṇḍodakapradānena yatphalaṃ kathitaṃ budhaiḥ

हिन्दी अर्थ

रखने चाहिए । नंगे आदि असंस्कृत लोग शाद्धकम न देखें--ऐसी व्यवस्था है। उन लोगों द्वारा देखे जाने पर श्राद्ध को बस्तुयें पितामहादि पितरों को नहीं प्राप्त होती शंयु ने कहा--'हे भगवन् वे नंगे आदि कौन हैं? है श्रेष्ठ ब्राह्मणों में पूज्य मैं उनके बारे में जानना चाहता हूं, विस्तार पूवंक उनका यथातथ्य वर्णन कौजिये' ।२५। हांयु के इस प्रकार पूछने पर महा तेजस्वी बृहस्पति ने उनसे कहा संसार के समस्त जीवों (मनुष्यों) के लिये तीनों वेद आच्छादान करनेवाले (शान्ति देनेवाले) कहे गये हैं जो लोग अज्ञानवश उन्हें छोड़ देते हैं, वे नंगे हैं। मनुष्य जब वेद

English

A sensible man should perform Sraddha in all these places and at similar ones. Even by taking bath, he becomes sanctified. By offering (Sraddha*?) he becomes so (all the more).

अध्याय १४६

श्लोक 52

अस्माहके तदाप्नोति नर्मदायां न संशयः ।तत्र ब्रह्मा मुरारिश्च रुद्रश्च उमया सह

asmāhake tadāpnoti narmadāyāṃ na saṃśayaḥ / tatra brahmā murāriśca rudraśca umayā saha

हिन्दी अर्थ

से पराइमुख हो जाता है तब वह वेद रूप वृष निरवलम्ब हो जाता है ।२६। जो इस धर्म रूप वृष को छोड़ फेर अस्यत्र मोक्ष का मार ढूँढ़ता है, उसका वेदादि के अध्ययन का श्रम व्यर्थ है, क्योंकि वह इन वेदों में दिये हुये मोक्ष के स्वरूप को भली भाँति नहीं देखता है ।२७। प्राचीनकाल में देवताओं और असुरों के युद्ध में पराजित हुये अधुरों द्वारा सभी ब्राह्मण क्षत्रिय वैद्य शूद्र पाषण्डी होकर विक्ृत ( पतित ) हो गये, तात !

English

Sraddha can be performed in the following places: On the high summits and ridges of mountains, crevasses, in the solitary sides, springs and fountains, on the sandy banks of rivers, on the auspicious anniversaries of the beginning of Yugas, on great oceans, in cowpens, in the confluence of two rivers, in the forests, well-cleaned and scrubbed ground, pleasing fragrant spots, in solitary houses, on the ground polished with cow-dung, etc. One should perform Sraddha in these places in accordance with injunctions. Those who seek fulfilment, of all desires shall perform Sraddha in these places carefully. They should perform circumambulation in all the quarters. An intelligent man per- ormmg thus, shall attain the Siddhi of Brahmatva (Brahmahood).

अध्याय १४६

श्लोक 53

इन्द्राद्या देवताः सर्वे पितरो मुनयस्तथा ।सागराः सरितश्चैव पर्वताश्च बलाहकाः

indrādyā devatāḥ sarve pitaro munayastathā / sāgarāḥ saritaścaiva parvatāśca balāhakāḥ

हिन्दी अर्थ

तह स्वयम्भू की वह सृष्टि नहीं रह गयी । जो लोग श्राद्धादि कार्यों के विरोध करनेवाले सद्ग्रन्थों के विरोधी, अपनी इच्छा एवं शक्ति के भरोसे जीवन यापन करते हैं, जो घर्मं का आचरण नहीं करते, वे नेंगे लोग हैं। व्यथ में जटा बढ़ानेवाले, व्यथ में मुण्डित शिर रहनेवाले, व्यथ्ं में तग्न रहनेवाले जो द्विजाति हैं, वे सब भी नंगे लोग हैं ।२५-३ १। व्यय ब्रत रखनवाले, व्यथं में जप करनेवाले कुल को पीड़ा पहुँचानेवाले निषाद, पुष्टि विनाशक एवं किये गये सत्कमों पर आक्षेप करनेवाले कुमार्गी कहे गये हैं। ऐसे लोगों द्वारा

English

The worship of Pit r s becomes fruitful if anger etc.

अध्याय १४६

श्लोक 54

तिष्ठन्ति पितरः सर्वे सर्वतीर्थाधिकं ततः ।स्थिता ब्रह्मशिला तत्र गजकुम्भनिभा नृप

tiṣṭhanti pitaraḥ sarve sarvatīrthādhikaṃ tataḥ / sthitā brahmaśilā tatra gajakumbhanibhā nṛpa

हिन्दी अर्थ

एतदपंस्थानेव्यं पाठ:--द्विश्राद्धकश्व निम्न॑न्था: शाक्था पुष्टिकलशंका:” इति क. पुस्तके ।

English

Even a person who has committed sins becomes sancti¬ fied if he boldly and faithfully makes the pilgrimage to the holy centres and courageously controls his senses. What need be said in regard to a person of meritorious deeds?

अध्याय १४६

श्लोक 55

कलौ न दृश्या भवति प्रधानं यद्गयाशिरः ।वैशाखे मासि सम्प्राप्ते ऽमावास्यां नृपोत्तम

kalau na dṛśyā bhavati pradhānaṃ yadgayāśiraḥ / vaiśākhe māsi samprāpte 'māvāsyāṃ nṛpottama

हिन्दी अर्थ

कृतकर्म क्षितास्त्वेते कुपथाः परिकीतिता: । एभिनिव त्त वा भ्राउं वृथा गच्छति मानवानू. ब्रह्मघ्नश्व झतध्नभ्व नास्तिका गुरुतल्पगा: दस्यवश्च नृशंसाभ्न दर्शनेनेव वर्जिता: ३४ ये चान्ये पापकर्माणः सर्वास्तान्परिवर्जयेत् । देवदेवर्धिनिदायां रताश्चेव विशेषतः (३४५

English

He is not reborn in an animal womb. He is not born again in an impious land. A Brahmana attains heaven and at¬ tains the means to salvation (Moksa).

अध्याय १४६

श्लोक 56

व्याप्य सा तिष्ठते तीर्थं गजकुम्भनिभा शिला ।तच्च गव्यूतिमात्रं हि तीर्थं ततः प्रवक्षते

vyāpya sā tiṣṭhate tīrthaṃ gajakumbhanibhā śilā / tacca gavyūtimātraṃ hi tīrthaṃ tataḥ pravakṣate

हिन्दी अर्थ

अपमानापविन्रश्न कुक्कुटो ग्रामसुक रः । वा चेव दर्शनादेव हन्ति ्राउ न संशय:

English

These five do not attain the benefit of pilgrimage: those who have no faith, sinners, atheists, permanent doubters and those who always seek a cause (for everything).

अध्याय १४६

श्लोक 57

तस्मिन्दिने तत्र गत्वा यस्तु श्राद्धप्रदो भवेत् ।पित्ःणाम् अक्षया तृप्तिर्जायते शतवार्षिकी

tasmindine tatra gatvā yastu śrāddhaprado bhavet / pitḥṇām akṣayā tṛptirjāyate śatavārṣikī

हिन्दी अर्थ

शावसूतकसंसृष्टो दीर्घरोगिभिरेव च। सलिने: पतितेश्चैव न द्रष्टव्यं कथंचन ३६ अच्च पश्येयुरेते ब॑ न॑तत्स्याद्धवव्यकव्ययो: । तत्संस्पृष्ठ प्रधानार्थ संस्कारश्वापदों भवेत् ४० सम्पन्न श्राद्धकर्म पितरों के लिये व्यर्थ हो जाते हैं। ब्रह्महत्या करनेबाले, क्ृतन्न, नास्तिक, गुरु पत्नी गामी दस्यु, नृशंस, आत्मतत्त्वज्ञान से वंचित, गवं अन्यान्य जो पापकर्म परायण लोग हैं, उन्हें सबको श्राद्धकर्म में वर्जित रखना चाहिए ।६२-३४। विद्येषतया देवताओं एवं देवियों की निन्‍दा में निरत रहने वाले जो लोग हों, उन्हें भी वर्जित रखना चाहिए। इसी प्रकार असुरों एवं यातुधानों को भी श्राद्ध कम में वजित रखना था हिये ।

English

Great Siddhi is achieved in the holy centre of Guru (the preceptor). He is the most excellent of all sacred objects and spots. Meditation is a still greater Tirtha. It is the eternal Bra- hmatfrtha, 1

अध्याय १४६

श्लोक 58

अन्यस्यामप्यमावास्यां यः स्नात्वा विजितेन्द्रियः ।करोति मनुजः श्राद्धं विधिवन्मन्त्रसंयुतम्

anyasyāmapyamāvāsyāṃ yaḥ snātvā vijitendriyaḥ / karoti manujaḥ śrāddhaṃ vidhivanmantrasaṃyutam

हिन्दी अर्थ

इन उपर्युक्त लोगों द्वारा देखा गया श्राद्कर्म॑ निष्फल हो जाता है। सतयुग को ब्राह्मणों का युग कहा गया है, त्रेता क्षत्रियों का युग कहा जाता है, द्वापर बेदयों का युग है, इसी प्रकार कलियुग शूद्रों का युग कहा गया है ।३५०३६। ह क्‍

English

Meditation is greater than observance of fasts. It makes all the sense organs shun (their objects). Those who are wedded to observance of fasts are reborn again and again along with their vital breaths.

अध्याय १४६

श्लोक 59

तस्य पुण्यफलं यत्स्यात् तच्छृणुष्व नराधिप ।अग्निष्टोमाश्वमेधाभ्यां वाजपेयस्य यत्फलम्

tasya puṇyaphalaṃ yatsyāt tacchṛṇuṣva narādhipa / agniṣṭomāśvamedhābhyāṃ vājapeyasya yatphalam

हिन्दी अर्थ

पितरगण बोले:--सतयुग में वेदों को रजा होती थो, भेतायुग में देवगण पृज्य माने जाते थे। द्वापर में लोगों को युद्ध प्रिय था, कलियुग में लोगों की पाषण्ड में सवंदा रुचि रहती है अपमानित एवं अपविन्न लोब, कुक्कुट (मुर्गे) प्राम्य सुअर, और कुत्ता-- इनके तो केवल दर्शन से श्राद्ध नष्ट हो जाता है--इसहैं सन्देह नहीं ।३८। बच्चों का सृतक जिनके घर में हो, दीर्घकाल से जो रोग ग्रस्त हो, मलिन एवं पतित विचारों वाला हो, इनको किसी प्रकार भी श्राद्धकर्म नहीं देखता चाहिए ।३६। यदि ये लोग श्राद्ध के अन्न को देख लेते हैं तो वह अन्न भी हव्य के लिये उपर्युक्त नहीं है, इनके द्वारा स्पर्श किये गये श्राद्धादि

English

One shall equalise Prana and Apana. One should res¬ train in mind objects and the sense organs and restrain the intellect in the mind. Then every sense-organ recedes.

अध्याय १४६

श्लोक 60

तत्फलं समवाप्नोति यथा मे शङ्करो ऽब्रवीत् ।रौरवादिषु सर्वेषु नरकेषु व्यवस्थिताः

tatphalaṃ samavāpnoti yathā me śaṅkaro 'bravīt / rauravādiṣu sarveṣu narakeṣu vyavasthitāḥ

हिन्दी अर्थ

संस्कार अपवित्र हो जाते हैं। जमे हुये घृत को प्रथमतः वर्जित रखना चाहिए। श्राद्धकमं में मिट्टी से मिले हुये जल से सिंचन करना चाहिए ।४०-४१। पीजे सरसों से अथवा काले तिल से अवकीौरण (विकी रण, पृथ्वी पर

English

Understand that undoubtedly Pratyahara (the withdra¬ wal of all sense organs) is the sure means to salvation. Among the sense-organs, the mind is the most terrible. It makes the intellect and other organs function.

अध्याय १४६

श्लोक 61

पिता पितामहाद्याश्च पितृके मातृके तथा ।पिण्डोदकेन चैकेन तर्पणेन विशेषतः

pitā pitāmahādyāśca pitṛke mātṛke tathā / piṇḍodakena caikena tarpaṇena viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

सिद्धार्थकः कृष्णतिल:ः कार्य वाध्प्पवको रणम् । गुशसूर्याग्निवस्तुनां दर्शनं वाईपि यत्नतः अशितं परिदुष्टं च तथवाग्रावलेहितम् । शकराकेशपाषाण: कीटंयेच्चाप्युपद्ुतम् ४४

English

(The restlessness of the mind) is subdued by not taking food. Know that fasting is a penance. By restraining the intel¬ lect and the mind, the intellect is sublimated (the intellect be¬ comes beautiful).

अध्याय १४६

श्लोक 62

क्रीडन्ति पितृलोकस्था यावद् आभूतसम्प्लवम् ।ये कर्मस्था विकर्मस्था ये जाताः प्रेतकल्मषाः

krīḍanti pitṛlokasthā yāvad ābhūtasamplavam / ye karmasthā vikarmasthā ye jātāḥ pretakalmaṣāḥ

हिन्दी अर्थ

वाससा चावधृतानि वर्ज्यानि श्राद्धकमंणि । सन्ति वेदविरोधेन केचिद्विज्ञानमानिन: (४६ अयज्ञपतयों नाम ते श्राद्धस्थ यथा रजः । दधि शाक तथा5भक्ष्या: शुक्ल चौषं विवर्जितम्

English

When all the sins are mitigated, when the sense organs are weakened (subdued) the pure soul attains bliss of libera¬ tion like fire without fuel.

अध्याय १४६

श्लोक 63

पिण्डेनैकेन मुच्यन्ते ते ऽपि तत्र न संशयः ।अस्माहके शिला दिव्या तिष्ठते गजसन्निभा

piṇḍenaikena mucyante te 'pi tatra na saṃśayaḥ / asmāhake śilā divyā tiṣṭhate gajasannibhā

हिन्दी अर्थ

वार्ताक वर्जयेहबद्यात्सर्वानिषवानपि । सेन्धवं लवण यच्च तथा मानससंभवम् ॥ै४८ गमयेन्मस्तक चेब ब्रह्मतीर्थ हि तत्स्मृतम् । द्रव्याणां प्रोक्षणं कार्य तथेवा5:बपन पुनः (५०

English

The influence of Yoga is so profound on the Purana writer that Yogic meditation is regarded superior to Tirthayatra (w. 128-131). The importance of feeding a Yogin at the time of Sraddhas has been already extolled in previous chapters.

अध्याय १४६

श्लोक 64

ब्रह्मणा निर्मिता पूर्वं सर्वपापक्षयंकरी ।उपर्यस्या यथान्यायं पित्ःन् उद्दिश्य भारत

brahmaṇā nirmitā pūrvaṃ sarvapāpakṣayaṃkarī / uparyasyā yathānyāyaṃ pitḥn uddiśya bhārata

हिन्दी अर्थ

छींटना) करता चाहिए । यत्नपूर्वक गुरु. सूयं और अग्ति की वस्तुओं का दर्शन करना चाहिए ।४२। आसनासीन

English

A knower of Yogas separates the individual soul from all manifest and unmanifest causes and Glows by means of his Yogic power.

अध्याय १४६

श्लोक 65

दक्षिणाग्रेषु दर्भेषु दद्यात्पिण्डान्विचक्षणः ।भूमौ चान्नेन सिद्धेन श्राद्धं कृत्वा यथाविधि

dakṣiṇāgreṣu darbheṣu dadyātpiṇḍānvicakṣaṇaḥ / bhūmau cānnena siddhena śrāddhaṃ kṛtvā yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

से चाटी हुई, शक्कर, (बालुका) केश और पत्थर से दूषित, कीड़ों से गन्दी की गयी वस्तुयें श्राद्धकम॑ में वर्जित हैं ४३-४४ तिल और जव में, तिलों के चूरे न मिले हों, बनाये गये जो अक्षत खाने के लिये रखे गये हों तथा जिसमें नमक का अंश मिला हुआ हो, इसी प्रकार वस्त्र से जो स्पर्श किया गया हो; वे सब अन्नादि पदार्थ श्राद्धकर्म में दूषित माने गये हैं। कुछ विज्ञान के मानने वाले वेदों का विरोध करते हैं, वे यज्ञ के अनधिकारी हैं, और श्राद्ध के धल की तरह (विनाशक) हैं, उन्हें भी श्रा्कर्म॑ में वरजित रखना चाहिए। इसी प्रकार दही, न खाप्रै जानेवाले शाक, तथा श्वेत वर्ण का चोष्य (चूसा जानेवाला) पदार्थ--- ये सब भी श्राउकर्म में वजित हैं।४५-४७ भाँटे को भी श्राद्ध में वर्जित रखे। सभी प्रकार के अभिषवों को ( मद्य अथवा आसव ) देना चाहिए (?) जो समुद्र से निकला हुआ लवण है,

English

There is no place for him to go, whether manifest or unmanifest. He is neither Asat (non-existent) nor Sat-A sat. No¬ thing can be said of his existence.

अध्याय १४६

श्लोक 66

श्राद्धिभ्यो वस्त्रयुग्मानि छत्रोपानत्कमण्डलु ।दक्षिणा विविधा देया पित्ःन् उद्दिश्य भारत

śrāddhibhyo vastrayugmāni chatropānatkamaṇḍalu / dakṣiṇā vividhā deyā pitḥn uddiśya bhārata

हिन्दी अर्थ

तथा मानस से उत्पन्न हुआ लवण है, वह परम पवित्र माना गया है, ये दोनों लवण होने पर भी निषिद्ध नहीं हैं। उन्हें आग में छोड़कर पुनः दोनों हाथों से यत्नपूवंक निकाल ले और अपने मह्तक पर लगा ले, मस्तक ब्रह्मतीर्थ कहा जाता है। समस्त श्राद्धीय दृव्यों को सबंप्रथम जल से सिचित करना चाहिए पुनः उनके ऊपर लगी हुईं मैल आदि को छुड़ा देता चाहिए ।४८-५०। फिर रखकर जल से पुनः सिंचन करना

English

Henceforth, I shail recount the various types of Danas (religious gifts) and the benefits thereof. I shall also mention the pure things to be used in the Sraddha rite and those that should be avoided.

अध्याय १४६

श्लोक 67

यो ददाति द्विजश्रेष्ठ तस्य पुण्यफलं शृणु ।तस्य ते द्वादशाब्दानि तृप्तिं यान्ति न संशयः

yo dadāti dvijaśreṣṭha tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu / tasya te dvādaśābdāni tṛptiṃ yānti na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

चाहिए, पुनः जल में छोड़ देना चाहिए। अरिष्ट, तुमुल, विल्व, इंगुद, श्वदन, और विदल इन सभी वस्तुओं का भ्राद्धादि में चमं की तरह विधिवत् शुद्धि करनी चाहिए । इसी प्रकार दाँत, अस्थि, (हड्डी) काष्ठ एवं शंग (सींग) आदि को विधिवत् स्वच्छ और पवित्र कर लेना चाहिए ।५१-५२। सभी प्रकार के मृतिका के सिद्धार्थंकानां कल्केन तिलकल्केन वा पुनः । स्थाच्छौचं सर्ववालानामाबिकानां च सर्वेशः ३५४ आविकानां च सर्वेषां मुझ्धि रख्िविधीयते । आद्यन्तयोस्तु शौचानामद्धिः प्रक्षालनं पुनः

English

It should be performed on snow-capped precipice (?) or he should also bring snow from there (?). Hence Agnihotra is laid down (in the scriptures) as the greatest and holiest.

अध्याय १४६

श्लोक 68

अस्माहके महाराज पितरश्च पितामहाः ।वायुभूता निरीक्षन्ते आगच्छन्तं स्वगोत्रजम्

asmāhake mahārāja pitaraśca pitāmahāḥ / vāyubhūtā nirīkṣante āgacchantaṃ svagotrajam

हिन्दी अर्थ

तथा कार्पासिकानां च भस्मना समुदाहतम् । फलपुष्पशलाकानां प्लावनं चाड्डरिष्यते ५६

English

One shall avoid Sraddha-performancc during the night. On other occasions also, since Rahu is seen, one should quickly perform Sraddha as soon as Rahu is seen 1 even by spending one's entire possession.

अध्याय १४६

श्लोक 69

अत्र तीर्थे सुतो ऽभ्येत्य स्नात्वा तोयं प्रदास्यति ।श्राद्धं वा पिण्डदानं वा तेन यास्याम सद्गतिम्

atra tīrthe suto 'bhyetya snātvā toyaṃ pradāsyati / śrāddhaṃ vā piṇḍadānaṃ vā tena yāsyāma sadgatim

हिन्दी अर्थ

कुर्यात्पुरीषं च शिरोउवगुण्ठ्य न च स्पृशेत्तत्र शिरः करेण शुष्केस्तृणेर्वा काए्ठेर्वा पत्रेबेंणुदलेन वा। मृण्सयर्भाजनर्वाईपि तिरोधाय वसुंधराम्

English

He who does not perform Sraddha at the time of eclipse becomes distressed like the cow (stuck up) in mire

अध्याय १४६

श्लोक 70

स्नाने कृते तु ये केचिज् जायन्ते वस्त्रविप्लुषः ।प्रीणयेन्नरकस्थांस्तु तैः पित्ःन् नात्र संशयः

snāne kṛte tu ye kecij jāyante vastravipluṣaḥ / prīṇayennarakasthāṃstu taiḥ pitḥn nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

उद्धुतोदकसादाय मृत्तिकां चेव वाग्यतः दिवा उदडूमुखः कुर्याद्वात्रों वे दक्षिणामुखः ३६१

English

During the sacrifice to Vis'vedevas and Saumyas, the Haou can contain plenty of meat. But one should avoid the horn ol the rhinoceros to mitigate the malice (of Pitrs) (9)

अध्याय १४६

श्लोक 71

केशोदबिन्दवस् तस्य ये चान्ये लेपभाजिनः ।तृप्यन्त्यनग्निनसंस्कारा यं मृताः स्युः स्वगोत्रजाः

keśodabindavas tasya ye cānye lepabhājinaḥ / tṛpyantyanagninasaṃskārā yaṃ mṛtāḥ syuḥ svagotrajāḥ

हिन्दी अर्थ

बने हुए पदार्थों को पुनः जला लेना कहा गया है । इसी प्रकार सभी प्रकार के मणि, हीरे प्रवाल, मुक्ता, शंख आदि के लिये पीली सरसों अथवा काले तिल का कल्‍लक बनाकर छुद्धि करनी बाहिये। केशों की भी शुद्धि इसी प्रकार करनी चाहिए ।५३-५४। भेंड के बाल की अथवा सभी प्रकार के भेड़ों के बालों के शुद्धि मिट्टी और जल से हो जाती है, पवित्र करने के पहिले और अन्त में--दोनों बार पुनः जल द्वारा धो लेना चाहिए । कपास के बने हुने पदार्थों की शुद्धि भस्म द्वारा कही गई है। फल पुष्प एवं शलाका की शुद्धि जल में डुबोने से हो जाती है ५५-५४ ६। पृथ्वी की शुद्धि प्रथम बटोरकर, जल से सिचितकर फिर लीपने से हो जाती है ग्राम से बाहर निकलने पर पृथ्वी वायु द्वारा शुद्ध रहती है। थर्थात् वस्ती की पृथ्वी के लिए बटोरने, जल छिड़कने और लीपने को आवश्यकता है, ग्राम से बाहर की पृथ्वी वायु से ही

English

Cf. Bd. 3.14. 3-4, KP. II. 16.8; Brahma -51-54 Eclipses are the proper times for Kdmya Sraddhas. eclipses

अध्याय १४६

श्लोक 72

तत्र तीर्थे तु ये केचिच् छ्राद्धं कृत्वा विधानतः ।नरकादुद्धरन्त्याशु जपन्तः पितृसंहिताम्

tatra tīrthe tu ye kecic chrāddhaṃ kṛtvā vidhānataḥ / narakāduddharantyāśu japantaḥ pitṛsaṃhitām

हिन्दी अर्थ

पवित्र रहती है। धनुर्धारी और पक्षियों की शुद्धि मिट्टी से की जाती है, शुद्धि के लिये यह उत्तम क्रम कहा गया है । इसके उपरान्त शौच की कुछ अन्य विधियाँ बतला रहा हूँ, सुनो ।५७-४८। प्रातः काल अपने घर से पश्चिम या दक्षिण दिशा की ओर एक बाण की जहाँ तक गति हो उतनी दूर पर या अक्षमात्र दूर स्थान पर मल त्याग करना चाहिए । उस समय शिर को वस्त्रादि से ढक लेना चाहिए, हाथ से शिर का स्पशे नहीं करना

English

Syamaka (rice), Hastinaman (?), Patola (fruit of Tri- chosanthes Diaoeca), fruits ofBrhatl (Brinjals) and the crest of Agastya—all are very astringent.

अध्याय १४६

श्लोक 73

वनस्पतिगते सोमे यदा सोमदिनं भवेत् ।अक्षयाल्लभते लोकान्पिण्डेनैकेन मानवः

vanaspatigate some yadā somadinaṃ bhavet / akṣayāllabhate lokānpiṇḍenaikena mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

चाहिए ।५६। सूखे हुये तृण से, काष्ठ से, पत्तों से, बाँस के पत्तों से, अथवा मिट्टी के बरतन से उस समय पृथ्वी को ढक देना चाहिए ।६०। पुनः चुप रहकर मिट्टी और ऊपर उठाये गये जल से शुद्धि करनी चाहिए दिन में उत्तर मुख और रात्रि में दक्षिणमुख होकर मलत्याग करना चाहिए ।६१। दाहिने हाथ से दक्षिणेन च हस्तेन गृह्लीयाई कमण्डलुम् । शौच च वामहस्तेन गुदे तिख्नस्तु मृत्तिकाः ॥६ २ दश चापि पुनर्दद्याह्ममहस्तक़मेण तु। द्ाभ्यां वाउपि पुनर्दद्याद्धस्तानां पत्च मृत्तिकाः द्रे मृदा प्रक्षाल्य पादो च आचम्प च यथाविधि । आपस्त्याज्यास्त्रयश्वव सुर्याग्निपवनास्भसाम्

English

The exudations mentioned in the Vedas, the salts found in arid lands are to be avoided in the Sraddha rites. Women in their monthly course shall not take part in Sraddhas.

अध्याय १४६

श्लोक 74

अक्षयं तत्र वै सर्वं जायते नात्र संशयः ।नरकादुद्धरन्त्याशु जपन्ते पितृसंहिताम्

akṣayaṃ tatra vai sarvaṃ jāyate nātra saṃśayaḥ / narakāduddharantyāśu japante pitṛsaṃhitām

हिन्दी अर्थ

कुर्यात्संनिहितं नित्य॑ प्राज़्स्तीथें कमण्डलुम्। असत्कायें कार्यमेतेयथावत्पादधावनम् ६५ आचमनं द्वितीयेन देवकार्य ततः परम् । उपबासस्थत्रिराज्न तु दुष्ट हस्ते ह्ादाहतः .

English

For the lists of kinds of corns to be used for Sraddha food vide MK -9-11 (quoted by Hemadri), VP. III. 16.5-6, Visnu Dhs. 80.2.

अध्याय १४६

श्लोक 75

तस्मिंस्तीर्थे त्वमावास्यां पित्ःन् उद्दिश्य भारत ।नीलं सर्वाङ्गसम्पूर्णं यो ऽभिषिच्य समुत्सृजेत्

tasmiṃstīrthe tvamāvāsyāṃ pitḥn uddiśya bhārata / nīlaṃ sarvāṅgasampūrṇaṃ yo 'bhiṣicya samutsṛjet

हिन्दी अर्थ

सानुषास्थीनि संस्पृश्य उपोष्यं शुद्धिकारणम्। त्रिरातमुक्त सन्‍्नेहमेकरात्रमतोअत्यथा ६८ कारस्करा: पुलिन्दाश्र तथाइबन्‍्प्रशबरादय:ः । पीत्वा चापो भूतिलये गत्वा तब युगंधरास् ६६ सिन्धोरुत्त रपर्यन्तं तथा दिव्यन्तरे शतसम् । पापदेशाश्व ये केचित्पापेरध्युषिता जनेः (७० शिष्टेश्व वर्जिता ये च ब्राह्मणेवेंदपारग: । गत्वा देशानपुण्यास्तु कत्स्तं पापं समश्नुते ७१ सनोव्यक्तिर्थास्निश्व काले चेवोपलेपनम् । विख्यापनं च शौचानां नित्यसज्ञानसेब च (७२

English

A comparison of our text with Bd, 3.14 shows that some lines are missing here while others are mixed up.

अध्याय १४६

श्लोक 76

तस्य पुण्यफलं वक्तुं न तु वाचस्पतिः क्षमः ।अस्माहके वृषोत्सर्गाद्यत्पुण्यं समवाप्यते

tasya puṇyaphalaṃ vaktuṃ na tu vācaspatiḥ kṣamaḥ / asmāhake vṛṣotsargādyatpuṇyaṃ samavāpyate

हिन्दी अर्थ

अप ०-3 ना -कनर 5 जप वन जा 3५० 4 बगल "नीम डक ७ किक ल न कक नल की कम ननफ न 9 नजनिटटगणा४ ८.

English

Cf. Bd. ,14.22-27; Smjrti Candrikd —Sraddha, p -416.

अध्याय १४६

श्लोक 77

तव शुश्रूषणात् सर्वं तत्प्रवक्ष्यामि भारत ।रौरवादिषु ये किंचित् पच्यन्ते तस्य पूर्वजाः

tava śuśrūṣaṇāt sarvaṃ tatpravakṣyāmi bhārata / rauravādiṣu ye kiṃcit pacyante tasya pūrvajāḥ

हिन्दी अर्थ

कमंडलु (जलपात्र) ग्रहण करना चाहिए मश्नद्रार को बाएँ हाथ से तीन बार मिट्टी लगा कर शुद्ध करना घौहिये ।६२। बाएँ हाथ में दस बार मृत्तिका लगाकर अथवा दोनों हाथों में पाँच बार मृत्तिका लगानी चाहिए । पुनः मिट्टी लगाकर पैरों को भली भाँति स्वच्छकर विधिपूर्वक' आचमन करे। पुनः सुर्य, अग्नि, और पवन के उद्देदय से तीन बार जल त्याग करे ।६३-६४। बुद्धिमान् पुरुष को तीर्थ के समीप में रावंदा कमंडलु रखना चाहिए । इस कमंडलु के जल से पादप्रक्षालनन---आदि छोटे-छोटे कार्य भी करने चाहिए। पादग्रक्षालन के उपरान्त आचमन करना चाट्टिये तदुपरान्‍्त देवकायं करना साहिये। अपवित्र हाथ से आचमन और देवकार्य करने पर तीन रात का उपवास कहा गया है ।६५-६६। उपवास न करने पर अतिशय कष्ट द्वारा प्रायश्चित्त का विधान किया गया है । इवान अथवा चाण्डाल का स्पर्श करके तप्तकृच्छु प्रायश्चित करना

English

The milk of ewes, deer, camel, single-horned animals, buffalo and the Camarl deer should be avoided by a wise man. 2

अध्याय १४६

श्लोक 78

वृषोत्सर्गेण तान्सर्वांस्तारयेदेकविंशतिम् ।लोहितो यस्तु वर्णेन मुखे पुच्छे च पाण्डुरः

vṛṣotsargeṇa tānsarvāṃstārayedekaviṃśatim / lohito yastu varṇena mukhe pucche ca pāṇḍuraḥ

हिन्दी अर्थ

चाहिए ।६७। मनुष्य की अस्थियों का स्पर्श करने पर उपवास ही शुद्धि का कारण है। स्नेह पूर्वक यह उपवास तीन रात अथवा एक रात का कहा गया है ।६८। कारस्कर, पुलिन्द, आमन्ध्र, शबर प्रभृति अपविश्व देशों की यात्रा कर, भूतिलय (स्थान विशेष) में जलपाल कर तथा युगस्धर नामक स्थान को यात्रा कर, सिन्धु के उत्तरीय प्रदेश, दिव्यन्तर के शत चामक देश, एवं अन्याय पापियों के प्रदेशों की, जहां

English

Henceforth I shall mention the places that should be avoided assiduously. I shall also mention, by whom Sraddha should not be seen. I shall also recount what is pure and impure in a Sraddha.

अध्याय १४६

श्लोक 79

पिङ्गः खुरविषाणाभ्यां स नीलो वृष उच्यते ।यस्तु सर्वाङ्गपिङ्गश्च श्वेतः पुच्छखुरेषु च

piṅgaḥ khuraviṣāṇābhyāṃ sa nīlo vṛṣa ucyate / yastu sarvāṅgapiṅgaśca śvetaḥ pucchakhureṣu ca

हिन्दी अर्थ

जाने के लिए बेदों के पारंगत ब्राह्मण एवं शिष्ट लोग निषेध करते हैं अथबा जहाँ पाप ऐसे लोगों का सवंधा अभाव रहता है तथा जहाँ जाने से पाप के की वृद्धि होती है, यात्रा करने पर समस्त पाप का भागी होना पड़ता है ।६६-७१। मनोव्यक्ति, अग्ति, सममबश ऊछिया हुआ उप्लेपन, छौच के लिये नि्षिद्ध ४१४ . बायुपुराणम

English

With great faith one should perform a Sraddha by means of fruits, roots and foodstuffs available in forests. Thereby he at¬ tains desirable country, heaven and liberation (from Samsara) as well as fame.

अध्याय १४६

श्लोक 80

स पिङ्गो वृष इत्याहुः पित्ःणां प्रीतिवर्धनः ।पारावतसवर्णश्च ललाटे तिलको भवेत्

sa piṅgo vṛṣa ityāhuḥ pitḥṇāṃ prītivardhanaḥ / pārāvatasavarṇaśca lalāṭe tilako bhavet

हिन्दी अर्थ

अतोष्य्यधा तु यः कुर्यान्मोहाच्छौचस्य संकरम् । पिशाचास्यातुधानांश्य फल गच्छुत्यसंश यम शोचमश्रद्ृधानस्य म्लेच्छजातिषु जायते । अयज्ञाश्रेव पापो था तियंग्योनिगतो5पि बा शोचेन मोक्ष कुर्वाणः स्वर्गंवासी भवेश्षर: शुचिकामा हि देवा बे देवेरेतदुदाहतभ् बोभत्समशुचि चव वर्जयन्ति सुरा: सदा। त्रीणि शौचानि कुर्वन्ति न्‍्यायतः शुभकर्मणः

English

Places full of noise-pollution and teeming with insects and a place with foul smell shall be avoided for the performance of Sraddha. 3

अध्याय १४६

श्लोक 81

तं वृषं बभ्रुमित्याहुः पूर्णं सर्वाङ्गशोभनम् ।सर्वाङ्गेष्व् एकवर्णो यः पिङ्गः पुच्छखुरेषु च

taṃ vṛṣaṃ babhrumityāhuḥ pūrṇaṃ sarvāṅgaśobhanam / sarvāṅgeṣv ekavarṇo yaḥ piṅgaḥ pucchakhureṣu ca

हिन्दी अर्थ

तस्ते: प्रीता: प्रयच्छन्ति पितरों योगवर्धना: । मनसा काइलक्षितान्कामांस्त्रेलोक्यप्रभवानिति इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते श्राद्धकल्पो नामाष्टसप्ततितमोष्याय:

English

A place within a distance of twelve Yojanas from all the rivers joining the sea (i.e. so far from their confluence with the sea), a door at the south-east as well as the land of Tris- anku, should be avoided.

अध्याय १४६

श्लोक 82

खुरपिङ्गं तमित्याहुः पित्ःणां सद्गतिप्रदम् ।नीलं सर्वशरीरेण स्वारक्तनयनं दृढम्

khurapiṅgaṃ tamityāhuḥ pitḥṇāṃ sadgatipradam / nīlaṃ sarvaśarīreṇa svāraktanayanaṃ dṛḍham

हिन्दी अर्थ

समय, इनके अतिरिक्त जो अनज्ञानवश श्योच संस्कार में व्यतिक्रम करते हैं उनके फल पिशाचों और याहुघानों को प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं ७२-७३। जो शोंच के आचारों एवं नियमों में अश्रद्धा रखते हैं, वे म्लेच्छ जाति में उत्पन्न होते हैं।जो यज्ञादि को नहीं करते सवंदा पाप कर्म में निरत रहते हैं, अथवा तियंक योनियों में उत्तन्न होते हैं, वे भी शौच द्वारा अपने पापों से मुक्त हो स्वगंवासी

English

The land to the north of Mahanadi and to the south of Kaikata is the land of Trisanku. It is forbidden for the rite of Sraddha. 4

अध्याय १४६

श्लोक 83

तमेव नीलमित्याहुर्नीलः पञ्चविधः स्मृतः ।यस्तु वैश्यगृहे जातः स वै नीलो विशिष्यते

tameva nīlamityāhurnīlaḥ pañcavidhaḥ smṛtaḥ / yastu vaiśyagṛhe jātaḥ sa vai nīlo viśiṣyate

हिन्दी अर्थ

होते हैं । देवता लोग पवित्रता के इच्छुक रहते हैं, देवताओं ने ही शौच के ये आचार बतलाये हैं देवगण सर्वदा बीभत्स आचरण करनेवीले, अपवित्र लोगों को वर्जित रखते हैं। सत्क्म परायण लोग स्यायत: सबंदा तीन शुद्धि करते हैं है ऋषिवृुसद, ब्राह्मणादि की रक्षा करनेवाले, अतिथिपरायण पवित्रात्मा, बुद्धिमान, पितरों में भवित रखने वाले, शान्‍्त एवं कृपालु लोगों के योगवरद्धक पितरगण उनके किये गये सत्कर्मों से, प्रसन्न होकर मन से अभिलषित, त्लोक्य में प्राप्त होने वाले समस्त ममोरथों

English

The lands of Karankara (Karkal in south Kanara Dist.), Kalinga, the land to the north of Sindhu and those lands wherein the practice of the pious rites of different stages of life and castes are not in vogue, should be avoided scrupulously.

अध्याय १४६

श्लोक 84

न वाहयेद्गृहे जातं वत्सकं तु कदाचन ।तेनैव च वृषोत्सर्गे पित्ःणाम् अनृणो भवेत्

na vāhayedgṛhe jātaṃ vatsakaṃ tu kadācana / tenaiva ca vṛṣotsarge pitḥṇām anṛṇo bhavet

हिन्दी अर्थ

को पृर्ण करते हैं

English

The naked and similar (apostates and non-Vedic sects) people should not see the Sraddha rite. 5 This is the rule.

अध्याय १४६

श्लोक 85

जातं तु स्वगृहे वत्सं द्विजन्मा यस्तु वाहयेत् ।पतन्ति पितरस्तस्य ब्रह्मकोकगता अपि

jātaṃ tu svagṛhe vatsaṃ dvijanmā yastu vāhayet / patanti pitarastasya brahmakokagatā api

हिन्दी अर्थ

श्री बायुमहापुराण में श्राद्धकल्प नामक अठहलरवाँ अध्याय समाध्च ।।७५।॥। अहो धीमंत्त्यथा सूत श्राड्कल्पस्तु कीतित: श्रुतो नः भराउकल्पो वे ऋषिशिः परिकीतित:

English

Mk. P. 29.15-17

अध्याय १४६

श्लोक 86

यथायथा हि पिबति पीत्वा धूनाति मस्तकम् ।पिबन्पित्ःन् प्रीणयति नरकादुद्धरेद् धुनन्

yathāyathā hi pibati pītvā dhūnāti mastakam / pibanpitḥn prīṇayati narakāduddhared dhunan

हिन्दी अर्थ

अतीब विस्तरो यस्‍य विशेषेण प्रकीतितः । बद शेष महाप्राज्ञ ऋषेस्तस्य यथामतम् २

English

Gf. Brahma 169; VP. III. 16.11; MK. 17-19.

अध्याय १४६

श्लोक 87

यथा पुच्छाभिघातेन स्कन्धं गच्छन्ति बिन्दवः ।नरकादुद्धरन्त्याशु पतितान् गोत्रिणस् तथा

yathā pucchābhighātena skandhaṃ gacchanti bindavaḥ / narakāduddharantyāśu patitān gotriṇas tathā

हिन्दी अर्थ

कर्तयिष्यामि ते विप्रा ऋषेस्तस्य मतं तु यत्। श्रद्धं प्रति महाभागास्तन्मे शुणुत बिस्तरात् उक्त भ्राद्धं मया पूर्व विधिश्र भ्राद्कर्मणि । परिशिष्टं प्रवक््यामि ब्रह्मणानां यभाक़मस ४ ने मीमांस्था: सदा विप्रा: (पवित्र छोतदुसमम् । देवे पिश्ये च सततं श्ष॒ते वे परीक्षणम् ३४

English

Gf. Mk.P. 29.19.

अध्याय १४६

श्लोक 88

गर्जन्प्रावृषि काले तु विषाणाभ्यां भुवं लिखन् ।खुरेभ्यो या मृदुद्भूता तया संप्रीणयेद् ऋषीन्

garjanprāvṛṣi kāle tu viṣāṇābhyāṃ bhuvaṃ likhan / khurebhyo yā mṛdudbhūtā tayā saṃprīṇayed ṛṣīn

हिन्दी अर्थ

ऋषियों ने कह्ाः:--परम बुद्धिमान् सूत जी ! ऋषियों द्वारा कहे गये श्राद्धकल्प का वर्णन विशेषतमा अति विस्तारपूर्वक तुम कर चुके ओर हम लोग उसे सुन भी चुके । है महामति ! अब भ्राद्ध के विषम में जो कुछ उस ऋषि की शेष बातें हों, उन्हें बतलाइये

English

It is not clear why places like Orissa, Telangana or regions north of Indus were declared unfit for & raddha-performance. Were they beyond the pale of Brahmanism when this s ection of the text came to be written? Gf. Bd. 3.14.31-33.

अध्याय १४६

श्लोक 89

पिबन्पित्ःन् प्रीणयते खादनोल्लेखने सुरान् ।गर्जन्नृषिमनुष्यांश्च धर्मरूपो हि धर्मज

pibanpitḥn prīṇayate khādanollekhane surān / garjannṛṣimanuṣyāṃśca dharmarūpo hi dharmaja

हिन्दी अर्थ

खूतजी ने कद्दा--हे विप्रणण ! उत ऋषि का श्राद्ध के विषय में जो मत है, उसे बतला रहा हूँ । है महाभाग्यशालियो ! विस्तारपूर्वक उसे सुनिये ।३। पूर्व प्रसंग में श्रा्धकर्म में की जाने वाली श्राद्धीय विधियों का वर्णन मैं कर चुका हूँ, अब ब्राह्मणादि के बारे में जो शेष नियमादि हैं, उनका वर्णन कर रहा हूँ ब्राह्मण लोग मोमांसा के परे होते हैं, अर्थात् ब्राह्मणों के विषय में मीमांसा नहीं करनी चाहिए। वे परमपवित्र तथा सभी जातियों में उत्तम हैं। किन्तु ऐसा होने पर भी देवताओं भौर पितरों के कार्य में बाह्यणों को परीक्षा सवंदा होती सुनी गई है।४-५। जिसमें लोग दोष देखते हैं, अथवा सज्जन

English

As explained below (w.26ff), those who do not have the protec¬ tive covering of the Vedas. The term includes not only non-Vedic sects like

अध्याय १४६

श्लोक 90

भूतैर्वापि पिशाचैर्वा चातुर्थिकज्वरेण वा ।गृहीतो ऽस्माहकं गच्छेत् सर्वेषाम् आधिनाशनम्

bhūtairvāpi piśācairvā cāturthikajvareṇa vā / gṛhīto 'smāhakaṃ gacchet sarveṣām ādhināśanam

हिन्दी अर्थ

घनुश्नि ह्वास्तर्गतग्रन्थः ख. पुत्सके नास्ति।।

English

O holy lord, O leader of important Brahmanas, please recount in detail and precisely to me who ask about the naked and similar people.

अध्याय १४६

श्लोक 91

स्नात्वा तु विमले तोये दर्भग्रन्थिं निबन्धयेत् ।मस्तके बाहुमूले वा नाभ्यां वा गलके ऽपि वा

snātvā tu vimale toye darbhagranthiṃ nibandhayet / mastake bāhumūle vā nābhyāṃ vā galake 'pi vā

हिन्दी अर्थ

उर्बी सागरप़र्यन्तां देवा योगेश्वरास्तथा । नानारूपश्ररन्त्येते प्रजा धर्मण पालयन् (३६ तत्प्राप्तुयाच्छट्धानों नरो वे सर्वे: कासभोजबेच्वस्तु विप्रान् ।

English

Thus requested, Bfhaspati of great brilliance said to him • The Trayi (the three Vedas) is remembered as the protec¬ tive covering unto all living beings.

अध्याय १४६

श्लोक 92

गत्वा देवसमीपं च प्रादक्षिण्येन केशवम् ।ततः समुच्चरन् मन्त्रं गायत्र्या वाथ वैष्णवम्

gatvā devasamīpaṃ ca prādakṣiṇyena keśavam / tataḥ samuccaran mantraṃ gāyatryā vātha vaiṣṇavam

हिन्दी अर्थ

यस्तु भ्राद्धेइतिथि प्राप्य दवे बाधप्प्रवसन्‍्यते । त॑ थे देवा निरस्यंति होता यद्वत्परां बसुमु (१)

English

Those who discard it out of delusion are the naked O excellent Brahmana. If a man forsakes that protection, he becomes supportless and is ruined.

अध्याय १४६

श्लोक 93

नारायणं शरण्येशं सर्वदेवनमस्कृतम् ।नमो यज्ञाङ्गसम्भूत सर्वव्यापिन्नमो ऽस्तु ते

nārāyaṇaṃ śaraṇyeśaṃ sarvadevanamaskṛtam / namo yajñāṅgasambhūta sarvavyāpinnamo 'stu te

हिन्दी अर्थ

देवाश्य पितरश्रेव बह्धिश्नेव हि तान्द्रिजानु । आबिश्य भुज्जते तह लोकानृप्रहकारणात् ६१४ जिसे अपने समाज से बहिष्कृत रखते हैं, अथवा संसर्ग से जिसके लिए यह मालूम पड़े कि बह कुसंगी है, ऐसे लोगों को प्रयत्वपूर्वक वर्जित रखना चाहिए ।६। बुद्धिमान् पुरुष बिना जाने सुने ब्राह्मण की श्राद्धक्म में सबंदा परीक्षा कर ले। सिद्ध लोग ब्राह्वेश धारणकर इस पृथ्वी पर विचरण किया करते हैं, इसलिए ठार पर अतिबिरूप में आते पर हाथ जोड़कर अगबानी करनी चाहिए। फिर पैर घोने के लिए

English

If a man discards. Dharma and seeks liberation ( Moksa ) elsewhere, his labour therein is in vain. For he has not the cor- rect perspective.

अध्याय १४६

श्लोक 94

नमो नमस्ते देवेश पद्मगर्भ सनातन ।दामोदर जयानन्त रक्ष मां शरणागतम्

namo namaste deveśa padmagarbha sanātana / dāmodara jayānanta rakṣa māṃ śaraṇāgatam

हिन्दी अर्थ

जल आदि समपित कर विधिधत् भोजनादि हारा उसकी पूजा करनी चाहिए ।७-८। योगपरायण देवगण समुद्रपयेन्‍्त पौली हुई इस विशाल प्रृथ्वी पर विविधवेश धारणकर धर्मपूर्वक प्रजाओं का पालन करते हुए विचरण करते रहते हैं। विविवत् मुजा कर लेने के उपराध्त बुद्धिमान् पुरुष अतिथिरूप में आमे हुए. ब्राह्मण के भोजन के लिए विविध व्यक््जन एवं फल समपित करें ।६-१०। ऐसा सुना जाता हैं कि केवल

English

Formerly, all the Brahmanas, Ksatriyas, Vai£yas and Sudras were made heretics and placed in a deformed state by Asuras who were defeated in the battle between Devas and Asuras. This is not the creation of the self-born god Brahma*. Nor are these:

अध्याय १४६

श्लोक 95

त्वं कर्ता त्वं च हर्ता च जगत् यस्मिंश्चराचरे ।त्वं पालयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च

tvaṃ kartā tvaṃ ca hartā ca jagat yasmiṃścarācare / tvaṃ pālayasi bhūtāni bhuvanaṃ tvaṃ bibharṣi ca

हिन्दी अर्थ

जल (दूध) देने से अग्निष्टोमयज्ञ का फल प्राप्त होता है।धृत देने से सुन्दर नेन्न मिलते हैं, और सोलह दिन में सम्पन्न होनेवाले यज्ञ का फल मिलता है। मधु के देने से अतिरात्र यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।११। जो श्रद्धालु व्यक्ति अपने सभी प्राप्त साधतों द्वारा भक्तिपू्वक अतिथिपृवंक में समागत ब्राह्मणों को भोजन कराता है वह सर्वदा समस्त यज्ञों के फल का उपभोग करता है, क्योंक्रि अतिधिरूप में आये हुए विप्रों का अतिथि सत्कार सभी मनोररथों को देनेवाला है ।॥१३। जो ब्यक्ति श्राद्धक्म में अथवा किसी देवकाय में आये हुए अतिथि की अवहेलना करता है, उसे देवगण इस प्रकार छोड़ देते हैं, (वंचित रखते हैं) जेसे हवन करनेवाला परावसु (नीचे गिरी हुई भाहुति ?) को ।१३॥ लोक के ऊपर बनुग्रह करने के तात्पय॑ से देवगण, पितरगण और अग्नि देव इन ब्राह्मणों में आविष्ट होकर श्रादुधादि में भोजन

English

Those who do not practise piety come underthe category of the naked and similar people" (Nagnadayah). A Brahmana who keeps matted hair without any specific aim, who shaves off his hair for nothing and who goes about naked purposelessly is also called so.

अध्याय १४६

श्लोक 96

प्रसीद देवदेवेश सुप्तमङ्गं प्रबोधय ।त्वद्ध्याननिरतो नित्यं त्वद्भक्तिपरमो हरे

prasīda devadeveśa suptamaṅgaṃ prabodhaya / tvaddhyānanirato nityaṃ tvadbhaktiparamo hare

हिन्दी अर्थ

अपूजिता दहन्त्येते दद्यु: का्मांश्र पूजिता:। सर्वस्वेनापि तस्माह पुजयेदतिथीन्सदा

English

He who observes holy rites in vain, he who performs Japas in vain is also called '"Naked etc." So also those who blow off their homes, the hunters and those who destroy property (are considered so).

अध्याय १४६

श्लोक 97

इति स्तुतो मया देव प्रसादं कुरु मे ऽच्युत ।मां रक्ष रक्ष पापेभ्यस्त्रायस्व शरणागतम्

iti stuto mayā deva prasādaṃ kuru me 'cyuta / māṃ rakṣa rakṣa pāpebhyastrāyasva śaraṇāgatam

हिन्दी अर्थ

बानप्रस्थो गहस्थश्वव गृहमभ्यागतो5थवा । बाला: लिज्ना यतिश्वेव जानीयादतिथीन्सदा है ने घोरो नापि संकीर्णों नाविद्यो न विशेषवित् ।॥ न च संतानसमृद्धो न सेवी नाचरोतिथिः: ॥

English

They are denounced as men of evil ways finding fault with every action committed. The Sraddha performed or witnes¬ sed by these, goes to men(and not to Pitfs).

अध्याय १४६

श्लोक 98

एवं स्तुत्वा च देवेशं दानवान्तकरं हरिम् ।पुनरुक्तेन वै स्नात्वा ततो विप्रांस्तु भोजयेत्

evaṃ stutvā ca deveśaṃ dānavāntakaraṃ harim / punaruktena vai snātvā tato viprāṃstu bhojayet

हिन्दी अर्थ

पिपासिताय श्रान्ताय जान्तायातिबुभुक्षते । तस्में सत्कृत्य दातब्यं यज्ञस्य फलमिच्छता १६ आरुह्म भगुतुड़्रे तु गत्वा पुण्यां सरस्वतीम्। आपनगां तु न॒दीं पुण्यां गड्भां देवों महानदीमू. 0२० द . हिमवत्प्रभवा नझो याश्वान्या ऋषिपूजिताः । +: सरस्तीर्थाभिसंबेश्ा नदी नववहास्तथा

English

The Brahmana-slayer, the ungrateful, the atheists, the defilers of the preceptor's bed, robbers and wicked men are shun¬ ned at the very sight.

अध्याय १४६

श्लोक 99

वेदोक्तेन विधानेन स्नानं कृत्वा यथाविधि ।पिण्डनिर्वपणं कृत्वा वाचयेत्स्वस्तिकं ततः

vedoktena vidhānena snānaṃ kṛtvā yathāvidhi / piṇḍanirvapaṇaṃ kṛtvā vācayetsvastikaṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

गत्वेतान्मुच्यते पाप: स्वर्गे नित्यं महीयते । दशरात्रमशौच॑ तु प्रोक्त वे मृतसुतके ॥२२.. उदक्या सर्ववर्णानां त्रिरात्रेण तु शुध्यति । उदक्यां सूतिककां जब श्वानमन्त्यावसायिनम्

English

One shall avoid all those who commit sins and parti¬ cularly those who indulge in slandering Devas and the divine sages.

अध्याय १४६

श्लोक 100

एवं स्तुत्वा च देवेशं दानवान्तकरं हरिम् ।पुनरुक्तेन वै स्नात्वा ततो विप्रांस्तु भोजयेत्

evaṃ stutvā ca deveśaṃ dānavāntakaraṃ harim / punaruktena vai snātvā tato viprāṃstu bhojayet

हिन्दी अर्थ

०3०० पल“ 'फपबमनर्णण-- कसा एप जता, पता बरला-+-५-रण नाना पब्प क पक ह नि तिजाण यान लनरकनभाषण + परणअ न वफणओ न लिन पमय + लीभका- तप कल किक कली + ४: हि विदा १2. , वनननमन “न 2 -न जा अर: आ-अममआऑण २ +ब. आ४ 43 मपानन : जननवपपाप+ 3२००२. 4-पल-»न का... जय कमा: अब “८: अामाकत। -े "7 जन टिक 7० पल (२ तपपशानआऑनड। एन+-बजपपखतान जे पाप पपताम ते सर थ जि 'क' हक पड त.०+ ४ ह न डे जकननन पकने जग कपिय कक जी+-- ० + टीका समता

English

Whatever is witnessed by these, goes over to Asuras and Yatudhanas.

अध्याय १४६

श्लोक 101

वेदोक्तेन विधानेन स्नानं कृत्वा यथाविधि ।एवं तान्वाचयित्वा तु ततो विप्रान्विसर्जयेत्

vedoktena vidhānena snānaṃ kṛtvā yathāvidhi / evaṃ tānvācayitvā tu tato viprānvisarjayet

हिन्दी अर्थ

करते हैं ।(४ ये अतिथि लोग श्रादुधादि में अपूजित होकर जला देते हैं और पूजित होकणय सभी मनोरथों को पूर्ण करते हैं। भतः स्धंदा द्वार पद समागत इन अतिथियों की सर्वेस्व जगाकद भी पूजा करनी चाहिए ।१५॥। वानप्रस्थ में रहनेवाले गृहस्थाश्नम में रहमेवाले अपने घर पर आनेवाले बालकगण, लोक से उदास रहतेवाले विरागीगण, एवं यति इन सबको सर्वदा जतिथि जानना चाहिए ।१६। जो किसी वस्तु की याचता करने के लिए अपने द्वार पर आता है बह अभ्यागत है, जो विना किसी प्रयोजन के आता हैं वही अतिथि है, अतिथि का अतिथि श्रेष्ठ अतिथि है, वह योगी के समान परम पण्यदायी कहा जाता है ॥१७। घोर हृदयवाला न हो, संकीर्ण विचारोंवाला न हो, विद्या विहीन न हो, विशेष जाननेवाला न हो, अधिक संततियों से समन्वित न हो; सेवक न हो,

English

The chief materials touched by them become desecra¬ ted. Solidified ghee shall be avoided at the very outset. Sprink¬ ling with water mixed with clay is laid down (for the consecra¬ tion of materials of Sraddha).

अध्याय १४६

श्लोक 102

यत्तत्रोच्चरितं किंचित्तद्विप्रेभ्यो निवेदयेत् ।तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा नारी वा भक्तितत्परा ।शक्तितो दक्षिणां दद्यात्कृत्वा श्राद्धं यथाविधि

yattatroccaritaṃ kiṃcittadviprebhyo nivedayet / tatra tīrthe naraḥ snātvā nārī vā bhaktitatparā / śaktito dakṣiṇāṃ dadyātkṛtvā śrāddhaṃ yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

जड़ हो, वही सच्चा अतिथि है ।१5 यज्ञ के फल की अभिलाषा करनेवाले को चाहिमे कि पिपासाकुलित, थके हुए, भूले भटके और भूखे अतिथि को सत्कार पु्वेक भोजनादि दे 7९। भृगुतुग पर अरोहण कर पुण्यसलिला सरस्वती की यात्राकर, परम-पुण्यमथी देवनदी गंगा, तथा महानदी की यात्रा कर, एवं अन्यान्य हिमालय से निकलने वाली नदियाँ, जिनकी पूजा ऋषि लोग भी किया करते हैं,

English

Scattering of yellow mustard and black gingelly seeds should be done. The articles should be assiduously shown to the preceptor, the sun and the fire.

अध्याय १४६

श्लोक 103

तत्र तीर्थे नरो यावत् स्नापयेद् विधिपूर्वकम् ।क्षीरेण मधुना वापि दध्ना वा शीतवारिणा

tatra tīrthe naro yāvat snāpayed vidhipūrvakam / kṣīreṇa madhunā vāpi dadhnā vā śītavāriṇā

हिन्दी अर्थ

तथा अन्य जितने सरोवर, तीथ एवं पृषण्यप्रद नदियाँ हैं, उन सब की यात्रा कर मनुष्य अपने पाप कर्मों के छठकारा पाते हैं मौर सब्ंदा स्वर्गलोक में पुजित होते हैं ॥२०-२१॥ किसी की मृत्यु हो जाने पर विशेषतमा ब्राह्मण को दस रात का अशौच लगता है। क्षत्रिय को बारह रात का कहा जाता है, वैश्य पनद्रह दिनों तक तथा शुद्र एक मास तक शुद्ध होता है। सभी जातिवालों को ऋतुमती स्त्रियाँ तीन शत में शुद्ध + नास्तीदमर्ध घ. पुस्तके ।

English

The following should be avoided in Sraddha: that which is trodden upon by people while climbing on to their seats, that which is seen by the mobile beings that are defiled; dried up and stale things; partly eaten things, defiled objects; that which is licked at the tip; that which is defiled by gravel.

अध्याय १४६

श्लोक 104

तावत्पुष्करपात्रेषु पिबन्ति पितरो जलम् ।अयने विषुवे चैव युगादौ सूर्यसंक्रमे

tāvatpuṣkarapātreṣu pibanti pitaro jalam / ayane viṣuve caiva yugādau sūryasaṃkrame

हिन्दी अर्थ

७१५८ आायुपुराणब्

English

One hould avoid (the egg-plant) and all distilled liquors. The salt extracted from the ocean (water) and from the (waters of the) Manasa (lake) (is holy). All sorts of baskets (wicker-work) should be purified ac¬ cording to the conventional practice. Vessels made of tooth (ivory)-bone, wood and horns should be scrubbed and scraped.

अध्याय १४६

श्लोक 105

पुष्पैः सम्पूज्य देवेशं नैवेद्यं यः प्रदापयेत् ।सो ऽश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति पुष्कलम्

puṣpaiḥ sampūjya deveśaṃ naivedyaṃ yaḥ pradāpayet / so 'śvamedhasya yajñasya phalaṃ prāpnoti puṣkalam

हिन्दी अर्थ

एवं शोचविधिदुष्टः सर्ववर्णेषु नित्यदा । परिदद्यान्पृदस्तिन्नो हस्तपादावसेचनम् २८ आरंण्यं शोचसेतत्तु ग्राम्यं वक्ष्यास्थतः परम् । मृदस्तिस्रः पादयोस्तु हस्तयोस्तिस्र एव च ३२६ होती हैं। ऋतुमती, सूतिका, ब्वान, चाण्डाल नंगे एवं मुर्दों के ढोनेवालों को स्पर्श कर शुद्धि करनी चाहिमे। मृत्तिका से बस्त्रों समेत बारह बार स्तान करने से घुद्धि होती है ।२२-२५। यही विधि मैथुन, झौर वमन के उपरान्त भी विहित है। मिट्टी से दोनों हाथों को धोकर मनुष्य को ज्ौच करना चाहिमे

English

All earthen pots should be burnt again (for purifica¬ tion). Gems, diamonds, corals, pearls and conchs are to be purified by (brushing with) the residues of powdered yellow mustard or gmgclly seeds. The same can be used to purify sheep wool and all types of hair.

अध्याय १४६

श्लोक 106

तत्र तीर्थे तु यो राजन् सूर्यग्रहणम् आचरेत् ।सूर्यतेजोनिभैर्यानैर्विष्णुलोके महीयते

tatra tīrthe tu yo rājan sūryagrahaṇam ācaret / sūryatejonibhairyānairviṣṇuloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमान् पुरुष जल से दोनों हाथों को धोकर पुनः मिट्टी से स्नान करे, फिर दो बार गुह्ल (गोपनीम) स्थान पर मृत्तिका लगाकर फिर एक बार मृत्तिका लगावे सभी जातियों के लिये शौच के वही नियम सबंदा देखे गये हैं। तीन बार मृत्तिका लेकर हाथ और पैर को धोना चाहिए । यही नियम वानप्रस्थियों के लिये है, अब इसके उपरान्त प्राम्य (गृहस्थाश्षमी) लोगों के लिये जो औच के नियम हैं, उन्हें बतला रहा हुँ । तीन बार

English

All kinds of sheep's wool can be purified with clay and water, (but) at the beginning and end of all purificatory proces- ses washing with water is recommended. Purification of cotton cloth is effected with sacred ashes.

अध्याय १४६

श्लोक 107

तत्र तीर्थे तु यः श्राद्धं पितृभ्यः सम्प्रयच्छति ।सत्पुत्रेण च तेनैव सम्प्राप्तं जन्मनः फलम्

tatra tīrthe tu yaḥ śrāddhaṃ pitṛbhyaḥ samprayacchati / satputreṇa ca tenaiva samprāptaṃ janmanaḥ phalam

हिन्दी अर्थ

दोनों पेरों में तथा तीन बार दोनों हाथों में मृत्तिका लगानी चाहिए ।२७-२९। हाथ आदि अपविज्न स्थानों में विभाग करके पद्वह बार मृत्तिका लगाती चाहिए। अपवित्र स्थानों में मिट्टी लग्नाकर शुद्धि करते के उपरान्त जल से सफाई करनी चाहिए ।३०। कण्ठ और शिर को आवृत कर सड़क पर पैदल चलमे पर भी पैरों को पविच्र करना चाहिए। बिता पर धोकर जल का आचमन करनेवाला भी अशुचि रहता है ।३१। हाथ पर भादि धोकर जल पात्र रखकर पुनः आचमन करे फिर श्राद्ध सम्बन्धी या यज्ञ सम्बन्धी बस्तुओं के ऊपर जल का छीदा दे ।३१। पुष्प, तृण एवं हवनीय द्रव्यांदि जितनी भी वस्तुएँ हों, उन सब का सिंचन करे। इसी प्रकार दूसरों ह्वारा लाये गये द्वव्यों को रखकर उनके ऊपर भी जल छिड़कना चाहिए। शाद्ध कम में तथा देवका्य में विना जल से सेवत किये कोई भी वस्तु काम न लानी चाहिए। बेदी

English

Purification of the earth (ground) is by sweeping, sprinkling and smearing (with cowdung). Outside the village the ground (earth) is purified by the wind. Purification (cleans- *ng) of bow and arrows is effected by (brushing) it with clay. Thus the excel lent modes of purification have been mentioned.

अध्याय १४६

श्लोक 108

इति श्रुत्वा ततो देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ।ब्रह्मविष्णुमहेशाश्च स्थापयांचक्रुर् ईश्वरम्

iti śrutvā tato devāḥ sarve śakrapurogamāḥ / brahmaviṣṇumaheśāśca sthāpayāṃcakrur īśvaram

हिन्दी अर्थ

दें उत्तर दिशा की नोर से वस्तुएँ लानी चाहिए और दक्षिण दिशा से विसर्जेत करना चाहिए

English

One should evacuate the bowels early in the morning at a distance of an arrow-shot from the house in the south-wes¬ tern direction and within the view of the house. He should cover the head (with a cloth). He shall not touch 4 the head with the hands. 1 (Before evacuating) the ground should be covered with dry grass, wooden sticks or leaves, bamboo chips or broken mud pots. He should take water in a pot and hold clay also in the hand in complete silence. He should sit facing the north during the day and the south during the night.

अध्याय १४६

श्लोक 109

सर्वरोगोपशमनं सर्वपातकनाशनम् ।यस्तु संवत्सरं पूर्णममावास्यां तु भावितः

sarvarogopaśamanaṃ sarvapātakanāśanam / yastu saṃvatsaraṃ pūrṇamamāvāsyāṃ tu bhāvitaḥ

हिन्दी अर्थ

करासम्यामेव देवानां पित॒णां बिकरं (? ) शुभम् । क्षुभितस्वप्नयोश्चेब तथा मृत्रपुरीषयों:. ४३६ निष्ठीविते तथा व्यक्त भुकत्वा विपरिधाय च्। उच्छिष्टस्य चर संस्पर्श तथा पादावसेचने ३७ बिसा यज्ञोपवीतेन मोहात्त यद्युपस्पशेत् । ओष्ठस्य दन्‍्तसंस्पर्श दशने चान्त्यवासिनाम्

English

He should hold the water-pot with the right hand and wash the anus with the left hand applying clay three times.

अध्याय १४६

श्लोक 110

पितृभ्यः पिण्डदानं च कुर्यादस्माहके नृप ।त्रिपुष्करे गयायां च प्रभासे नैमिषे तथा

pitṛbhyaḥ piṇḍadānaṃ ca kuryādasmāhake nṛpa / tripuṣkare gayāyāṃ ca prabhāse naimiṣe tathā

हिन्दी अर्थ

जिह्या चंत संस्पृश्य दन्तासक्त तथेव च। सशब्दमहःगुलीभिश्न प्रणतश्रावलोकयन् ४०

English

He should scrub the left hand with clay ten times and then each of the two hands five times. Washing the feet after applying clay, he should duly perform Acamana (sipping of water). He should then pour water down three times with (invocation of) the sun, fire and water.

अध्याय १४६

श्लोक 111

यत्पुण्यं श्राद्धकर्त्ःणां तदिहैव भवेद्ध्रुवम् ।तिलोदकं कुशैर्मिश्रं यो दद्याद्दक्षिणामुखः

yatpuṇyaṃ śrāddhakartḥṇāṃ tadihaiva bhaveddhruvam / tilodakaṃ kuśairmiśraṃ yo dadyāddakṣiṇāmukhaḥ

हिन्दी अर्थ

अभ्युक्षणं तथा तस्य यद्यमीमांसितं भवेत् । एबमाचमनं तस्य वेदा यज्ञास्तपांसि च ४४ दानानि ब्रह्मचय व भवन्ति सफलास्तथा । क्वियां यः कुरुते मोहादनाचस्यव नास्तिकः ४५ देवकार्य एवं पितरकार्य में परस्पर समानता नहीं होती, उप्तमें परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं रहता । दक्षिण वेदी को दाहिने हाथ से रेखाड्ित करना चाहिए देवताओं और पितरों--दोनों के यज्ञादि कार्यों में दोनों हाथों से विकिरण (छीटना) करना कल्याणदायी कहा गया है। क्षुधा से तथा नींद से पीड़ित, मूत्र एवं मल का त्याग करनेवाले, धूकनेवाले---ये सभी अपवित्र रहते हैं इसी प्रकार भोजनकर, वस्त्रादि घारणकर, जूठे पदार्थ को स्पर्श

English

A sensible man should always keep a water-pot handy. Subsidiary actions and washing of the feet shall be done by means of this pot.

अध्याय १४६

श्लोक 112

मन्वादौ च युगादौ च व्यतीपाते दिनक्षये ।यो दद्यात् पितृमातृभ्यः सो ऽश्वमेधफलं लभेत्

manvādau ca yugādau ca vyatīpāte dinakṣaye / yo dadyāt pitṛmātṛbhyaḥ so 'śvamedhaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

कर, पर को अच्छी तरह न धोकर, अज्ञान वश विना यज्ञोपवीत के ही कुछ भोजनादि वस्तुओं का स्पर्श कर, दाँत से होठों का स्पर्श कर, चाण्डालादि का दर्शन कर, दाँत में लगी हुई वस्तुओं का जीभ से स्पर्श कर, शब्द करतीं हुई उँगलियों से तथा ताकते हुयें प्रणाम कर, अज्ञान वश किसी अवर्म भावना में निरत रहकर आचमन करने पर भी अपवित्र रहता है, अतएवं उसे चाहिए कि किसी पवित्र स्थान पर बंठकर पूर्व अथवा उत्तर दिज्ञा

English

The performance of Acamana and divine duties shall be done by means of a second (vessel). If such actions are per¬ formed with a defiled hand, one should observe fast for three nights. In protracted cases of default, the rite of Krcchra is prescribed for expiation. After touching a dog or a Candala one should perform Taptakrcchra rite.

अध्याय १४६

श्लोक 113

अस्माहके नरो यस्तु स्नात्वा सम्पूजयेद्धरिम् ।ब्रह्माणं शङ्करं भक्त्या कुर्याज् जागरणक्रियाम्

asmāhake naro yastu snātvā sampūjayeddharim / brahmāṇaṃ śaṅkaraṃ bhaktyā kuryāj jāgaraṇakriyām

हिन्दी अर्थ

की ओर मुखकर विभम्र होकर हाथों ओर पैरों को धोकर घुटनों के बीच में हाथों को रखकर स्वस्थ चित्त हो बंठे भोर तब यज्ञादि की वस्तुओं का स्पर्य करे। उस समय इन्द्रियों को वश में रख सावधान होकर तीन घूंट निमंल जल पान करे, दो बार मार्जन कर एक बार वस्तुओं का सेचन करे। फिर अपने खानि- आँख, कात, दिर, हाथ पर आदि का जल से सेचन करे ।३५-४३। इसी प्रकार उन अन्यान्य अंगों का भी सेचन करना भाहिमे, जिनकी पवित्रता के विषय में कोई मीमांसा न हो । तदुपरान्त आचमन करना चाहिए, जो इस प्रकार बिधि-पूर्वक भाचमन करते हैं, उनके वेदाध्ययन, यज्ञ, तपस्या, दान, ब्रह्मचयं--सभी सफल होते हैं । जो मास्तिक व्यक्ति विना आचमन किये सत्क्रियाओं को करने लगते हैं, उनकी सारी क्रिया नष्ट हो जाती है--इसमें

English

If human bones are touched, fasting is the purification (for it). It is prescribed that if (the bones are) touched delibera-

अध्याय १४६

श्लोक 114

सर्वपापविनिर्मुक्तः शक्रातिथ्यमवाप्नुयात् ।तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा यः पश्यति जनार्दनम्

sarvapāpavinirmuktaḥ śakrātithyamavāpnuyāt / tatra tīrthe naraḥ snātvā yaḥ paśyati janārdanam

हिन्दी अर्थ

५९० बायुपुराणम्ं

English

After dealing with the purification of things or materials for Sraddha, the aut hor deals with the purification of the man performing the Sraddha in w. 59 to the end of the Chapter. The Purana-writers (in fact the whole tribe of writers on Dharma-Sastra in the mediaeval period) appear to have been so much obsessed with 'purity-psychosis' that they lost sight of the social necessity of assimilating foreigners or backward people in Hinduism and prohibited their own followers from going beyond the contrac¬ ting geographical limits of Brahmanism (vide w. 69-71), By going to unholy places, one acquires all sorts of

अध्याय १४६

श्लोक 115

विशेषविधिनाभ्यर्च्य प्रणम्य च पुनःपुनः ।सपुत्रेण च तेनैव पित्ःणां विहिता गतिः

viśeṣavidhinābhyarcya praṇamya ca punaḥpunaḥ / saputreṇa ca tenaiva pitḥṇāṃ vihitā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

तस्मे सत्कृत्य यो दह्यादयुपो यज्ञ उच्यते । अप्लुष्टान्नं शतान्न तु कृशव॒ृत्तिमयाचकम् (४८ शकास्तशीलं ह्ोमन्‍्तं सदा भ्राद्धेषु भोजयेत्। यो ददात्यन्तिसेभ्यश्र स ब्ह्नृध्तो दुरात्मवानू. ॥(४६ अपि जातिशतं गत्वा न स मुच्येत किल्विषात् । विषम भोजयेद्विप्रानेकपड्क्‍त्यां च यो नरः नियुक्तो वाइनियुक्तो वा पडक्‍्त्या हरति दुष्कृतम् । पापेन गृह्मत्ते क्षिप्रमिष्टापुर्तं च नश्यति

English

One who has no faith in purificatory rites is born among Mlecchas. Those who do not perform Yajnasand sinners are born among the lower strata of animals. A man gets released from sins through purificatory rites and attains heaven. Devas indeed desire purity. This has been declared by Devas themselves.

अध्याय १४६

श्लोक 116

एकमूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।सत्कार्यकारणोपेताः सुसूक्ष्माः सुमहाफलाः

ekamūrtistrayo devā brahmaviṣṇumaheśvarāḥ / satkāryakāraṇopetāḥ susūkṣmāḥ sumahāphalāḥ

हिन्दी अर्थ

न-अ-का- “करन पाप उलच लक कटा बन तीर अकत-पतकििका “7 विफ्टयक्‍टापाती न बट 7 लक 7 टिका एल एटा एक (कै टण।णण एज विरकाणा तक तिकानल का ली कक कककत पता एच किन का लिए एह्तक ए 'पट-नलगकहनमन पक री गान --2०++नन»नन वावनअन ५ अपटातताहि बनाने लगाना कं परानततभृइलानानटन-“ह चाह कट न गन 7 विलका एप खकक पट 7 पक

English

Suras always forsake the hideous and the unclean. Men of auspicious rites perform three types of purificatory rites justifiably. O intelligent Suta, the Sniddhakalpa has been recounted by you. The Sraddhakalpa glorified by sages, has been heard by us.

अध्याय १४६

श्लोक 117

एतत्ते कथितं राजन्महापातकनाशनम् ।अस्माहकस्य माहात्म्यं किमन्यत् परिपृच्छसि

etatte kathitaṃ rājanmahāpātakanāśanam / asmāhakasya māhātmyaṃ kimanyat paripṛcchasi

हिन्दी अर्थ

सम्देह नहीं । वचन से शुद्ध, पुनीत अथवा सभी विधियों से सुसम्पन्न, दोषादि रहित एवं अनिन्दित जो क्रियायें होती हैं वे पवित्र मानी गयी हैं, जो इनके बिपरीत हैं, वे अपवित्र तथा दोषपूर्ण हैं ।४४-४६२। क्षुधा से पीड़ित ब्राह्मण को कभी कुछ न कहना चाहिए, उसे सत्कार पूर्वक उस अवस्था में जो कुछ दे दिया जाता है वह बिना यज्ञ स्तम्भ के ही एक यज्ञ है, अर्थात् वह भी एक यज्ञ के समान फलदायी है। श्राद्धादि में सर्बद। कठिनतां से जीविका उपाजित करनेवाले, किन्तु अयाचक, एकान्त प्रेमी, लज्जावान् ब्राह्मण को खूब पके हुए अन्न का भोजन कराना चाहिए, वह अन्न सड़ा हुआ अथवा जला भुना हुआ न हो । जो ध्यक्ति भाद्धादि कार्यों में चाण्डाल आदि अन्त्यज जातियों को भोजन कराता है, वह ब्रह्महत्यारा एवं दुरात्मा है, सकऊड़ों जन्म लेने पर भी वह पाप से छटकारा नहीं पाता जो मनुष्य एक ही पाँत में कुछ उच्च एवं कुछ तीच ब्राह्मणों को बिठाकर भोजन

English

Its extensive details have been particularly narrated. O extremely intelligent one, please mention the remaining topics too, according to the opinion of that sage.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 146
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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