Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
147
अध्याय 147 / 232

Adhyaya 147

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पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय १४७

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे अस्माहकतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्चत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४७ मार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल सिद्धेश्वरमनुत्तमम् ।नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe asmāhakatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaṭcatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 147 mārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla siddheśvaramanuttamam / narmadādakṣiṇe kūle tīrthaṃ paramaśobhanam

हिन्दी अर्थ

कराता है, वह चाहे उस कम के लिये नियुक्त हो अथवा न नियुक्त हो, पाप का भागी होता है, उप्तके बावली, कप, तड़ाग, बगीचे आदि लगाने के पुण्य इस पंक्ति पाप से शीघ्र हो नष्ट हो जाते हैं ।४७-५१। सभी कामों में बीतराग संम्यासी ब्राह्मणों से श्रेष्ठ कहे गये हैं। जो श्रेष्ठ ब्राह्मण चारों वेद तथा पाँचवे वेद रूप इतिहास (महाभारत) का पाठ करता है उसे संन्‍्यासी के बाद पण्डितों को चाहिए कि श्राद्धादि में यथा योग्य स्थान पर

English

O blessed Brahmanas, I shall recount the opinion of that sage in detail, in regard to Sraddha. Listen to it from me.

अध्याय १४७

श्लोक 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेद् वृषभध्वजम् ।सर्वपापविनिर्मुक्तो गतिं यात्यश्वमेधिनाम्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayed vṛṣabhadhvajam / sarvapāpavinirmukto gatiṃ yātyaśvamedhinām

हिन्दी अर्थ

मियुक्त करें । इसके उपरान्त तीन वेदों के अध्ययन करनेवाले ब्राह्मगों को नियुक्त करे। उसके बाद दो वेदों के अध्यायी को निमुक्त करे १२-१३। उसके बाद एक वेद के अम्यासी को, सब के बाद न्याय (तके शास्त्र) के अध्ययन करनेवाले ब्राह्मण को श्राद्धादि में नियुक्त करता चाहिए । अब पंक्ति से पवित्र पं क्तिपावन जो ब्राह्मण कहे पये हैं, उनके बारे में बंतला रहा हूँ, सुनिये ।५४। जो ये पूबं प्रसंग में कद्दे गये ब्राह्मण हैं, वे क्रमशः श्राद्धादि के लिये जानने चाहिए । बेद के छहों अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुवत, छन्द ओर ज्योतिष) के अध्ययन करनेवाले, विनयी, घोग परायण, सभी शास्त्रों में स्व॒तन्त्र विचार रखनेवाले, एवं स्वेदा गमन करनेवाले अर्थात् किसी एक निर्दिष्ट

English

The Sraddha rite as well as the mode of its performance have been previously mentioned by me. I shall also mention what remains in the proper order as regards the Brahmanas.

अध्याय १४७

श्लोक 3

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा श्राद्धं कुर्यात् प्रयत्नतः ।पित्ःणां प्रीणनार्थाय सर्वं तेन कृतं भवेत्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā śrāddhaṃ kuryāt prayatnataḥ / pitḥṇāṃ prīṇanārthāya sarvaṃ tena kṛtaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

यथावद्वतंमानश््य सर्वे ते पद्क्तपावनाः । त्रिनाचिकेतस्त्रेविद्यो यश्व धर्मान्पठद्द्विजः ५७

English

It is not that Brahmanas should always be (subjected to) tests and investigation. But in regard to rites pertaining to gods and Pitrs (employment of) tests has been laid down in the Sruti. 1

अध्याय १४७

श्लोक 4

तत्र तीर्थे मृतानां तु जन्तूनां नृपसत्तम ।गर्भवासे मतिस्तेषां न जायेत कदाचन

tatra tīrthe mṛtānāṃ tu jantūnāṃ nṛpasattama / garbhavāse matisteṣāṃ na jāyeta kadācana

हिन्दी अर्थ

आमन्त्रितस्तु यः भ्राद्धे योषितं सेवते द्विजः पितरस्तस्य त॑ मासं तस्य रेतसि शेरते ५६ तस्मादतिथये देयं भोजयेद्ब्रह्मचारिणम् । ध्याननिष्ठाय दातव्यं सानुक्नीशाय धामिकम् १६१ पति वा बालखिल्यान्वा भोजयेच्छाड्कर्मणि । बानप्रस्तोपकुर्बाणः पूजासात्रेण तोषितः १६२ गृहस्व॑ भोजयेच्स्तु विश्वेदेवास्तु पूजिताः। बानप्रस्थेत ऋषयों बालखिल्य: पुरंदरः ॥

English

One shall scrupulously avoid that person in whom de¬ fects are seen or who is shunned by good men or who, through contacts or staying together, is known to be wicked.

अध्याय १४७

श्लोक 5

गर्भवासो हि दुःखाय न सुखाय कदाचन ।तत्तीर्थवारिणा स्नातुर् न पुनर्भवसम्भवः

garbhavāso hi duḥkhāya na sukhāya kadācana / tattīrthavāriṇā snātur na punarbhavasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

स्थान पर निवास ते करने बलि-इन पाँच प्रकार के ब्र।हाणों को पंक्ति पावन सभझना चाहिए । अठारहों विद्याओं में से, जो एक में भी परज्भत हो, वह भी पंक्तिपवन है ।१५५-५६॥ इसके उपराग्त ये सब भी पंक्तिपावन हैं, जैसे त्रिमाचिकेत (नचिकेता की तीनों विद्याओं के अध्यम करनेवाले) तीनों विद्याओं के जाननेवले धर्म शास्त्र के अध्ययन करनेवाले ट्विंज भी पंक्तिपावन कहे गये हैं ।५७॥ इसके अतिरिक्त बृहस्पति के शास्त्र में जो पांरंगत

English

A sensible man should always test a Brahmana who is not known before, at the time of Sraddha. 2

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 147
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.