अध्याय १४७
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे अस्माहकतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्चत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४७ मार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल सिद्धेश्वरमनुत्तमम् ।नर्मदादक्षिणे कूले तीर्थं परमशोभनम्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe asmāhakatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaṭcatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 147 mārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla siddheśvaramanuttamam / narmadādakṣiṇe kūle tīrthaṃ paramaśobhanam
हिन्दी अर्थ
कराता है, वह चाहे उस कम के लिये नियुक्त हो अथवा न नियुक्त हो, पाप का भागी होता है, उप्तके बावली, कप, तड़ाग, बगीचे आदि लगाने के पुण्य इस पंक्ति पाप से शीघ्र हो नष्ट हो जाते हैं ।४७-५१। सभी कामों में बीतराग संम्यासी ब्राह्मणों से श्रेष्ठ कहे गये हैं। जो श्रेष्ठ ब्राह्मण चारों वेद तथा पाँचवे वेद रूप इतिहास (महाभारत) का पाठ करता है उसे संन््यासी के बाद पण्डितों को चाहिए कि श्राद्धादि में यथा योग्य स्थान पर
English
O blessed Brahmanas, I shall recount the opinion of that sage in detail, in regard to Sraddha. Listen to it from me.