अध्याय १४८
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे सिद्धेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तचत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४८ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महीपाल तीर्थमङ्गारकं शिवम् ।उत्तरे नर्मदाकूले सर्वपापक्षयंकरम्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe siddheśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma saptacatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 148 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahīpāla tīrthamaṅgārakaṃ śivam / uttare narmadākūle sarvapāpakṣayaṃkaram
हिन्दी अर्थ
विद्वान हैं, वे भी पंक्तिपावन हैं--इस प्रकार ये उपर्युक्त ब्राह्मण पंक्तिपावन कहे गये हैं ।५८। जो ब्राह्मण किसी' के श्राउ्धकर्म में आमंत्रित होकर स्त्री के साथ समागम करता है, उसके पितरगण उसी मांस को खाते हैं, और उनके वीय॑ पर शयन करते हैं।५६। श्राद्ध देकर तथा श्राद्ध में भोजन कर जो ब्राह्मण मैथुन कम करते हैं, उसके पितरगण उसी मांस को खाते हैं, और उसी बीय॑ पर अवस्थित होते हैं--इसमें सन्देह नहीं ६०। इसी लिये श्राउकर्ता को चाहिए कि, श्राद्धादि में दान अतिथि को दे, भोजन बह्याचारी ब्राह्मण को कराये, इसके अतिरिक्त जो ध्यान परायण (योगाभ्यासी) तथा दयालु हो उसे धर्म की मर्यादा रक्षा के लिये दान करे ।६१। श्राद्धकर्म में वीतराग संन््यासियों को अथवा बालखिल्यों (जो नये अन्े के प्राप्त कर लेने पर पूर्व संचित का स्याग कर देते हैं, अर्थात् जिन्हें जिविका आदि के लिये कोई चिन्ता नहीं रहती) को खिलाना चाहिए ।
English
Since the days of Grhya Sutras, there was insistence on the antecedents learning, character of the invitees (Brahmanas) for rites nertainim* in