Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
149
अध्याय 149 / 232

Adhyaya 149

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अध्याय १४९

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराणे एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे मङ्गलेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टाचत्वारिंशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १४९ श्रीमार्कण्डेय उवाच: तस्यैवानन्तरं तीर्थं लिङ्गेश्वरमिति श्रुतम् ।दर्शनाद् देवदेवस्य यत्र पापं प्रणश्यति

|| iti śrīskānde mahāpurāṇe ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe maṅgaleśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmāṣṭācatvāriṃśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 149 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tasyaivānantaraṃ tīrthaṃ liṅgeśvaramiti śrutam / darśanād devadevasya yatra pāpaṃ praṇaśyati

हिन्दी अर्थ

अतः पर प्रवक्ष्यासि दानानि च फलानि च। तारणं सर्वभुतानां स्वर्गंसाग सुखावहमू... कुछ होता है, उसे देखते हैं । व्यक्ति, अव्यक्त, सबसे परे जो कुछ पदार्थ हैं उन सब को बे वश में रखते हूँ । सत् असत् जो कुछ भी भाव या पदार्थ हैं उनके देखे हुए हैं, महात्मा पुरुषों के लिये सत् असत् सभी पदाथथ वशीइत हैं ।६१-६२। महात्माओं के लिए निश्चित मोक्षादि, एवं समस्त ज्ञान उनके भधिकृत रहते हैं । इसलिये उन योगपरायण महापुरुषों में भासक्त (प्रेम) रखनेवाला परम कल्याण का भाजन होता । जो ऋग्वेद

English

Those who are mentioned before, are mentioned in their order. The Panktipavanas 1 (those who sanctify the row of diners) arc the following:—Sadangl (a person who has learnt all the six ancillary subjects of the Veda), Vinayl (the discipli¬ ned one), Yogin, Sarvatantrasvatantra (he who has mastered all systems of philosophy) and Yaydvara (a wandering mendicant saint). All these five should be known as Panktipavanas. He who has mastered completely one of the eighteen lores, he who ful¬ fills his duty duly—all of them are also so. The Trinaciketas 2 (a Brahmana who learns the three Vidyas of Naciketas), the Traividya (he who has mastered three Vidyas), the Brahmana who learns Dharmasastras, the Brahmana who has mastered the Barhaspatya scripture—all these Brahmanas are said to be those who sanctify the row.

अध्याय १४९

श्लोक 2

कृत्वा तु कदनं घोरं दानवानां युधिष्ठिर ।वाराहं रूपमास्थाय नर्मदायां व्यवस्थितः

kṛtvā tu kadanaṃ ghoraṃ dānavānāṃ yudhiṣṭhira / vārāhaṃ rūpamāsthāya narmadāyāṃ vyavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

को जानता है, बह सभी वेदों को जानता है, जो यजुर्वेद को जानता है वह समस्त यज्ञों का जाननेवाला है, जो सामवेद जानता है, वह पूर्णब्रह्मआनी है, जो मानस (?) जानता है वह सब कुछ जानता है

English

If a Brahmana invited in a Sraddha indulges in sexual intercourse with a woman, the Pitrs lie down in his semen virile for the period of that month (?)

अध्याय १४९

श्लोक 3

तत्र तीर्थे तु यः स्नानं कृत्वा देवं नमस्यति ।स मुच्यते नृपश्रेष्ठ महापापैः पुराकृतैः

tatra tīrthe tu yaḥ snānaṃ kṛtvā devaṃ namasyati / sa mucyate nṛpaśreṣṭha mahāpāpaiḥ purākṛtaiḥ

हिन्दी अर्थ

श्राद्ध में दान के फल बृहरुपति ने कद्ा--अब इसके उपरास्त पुनः दान और उसके फलों को बतला रहा हूं। सभी जीवों के उद्धार करनेवाले, स्वर्गमार्ग में सुख देनेवाले, लोक में सर्वश्रेष्ठ, स्वगप्रदान करनेवाले, अपने को विशेष

English

It was believed that persons of specially high character, merit, learning etc. purify excommunicated or degenerate members of the society by associating with them, by sitting in their row for dining or even by their beneficent look (v 91 below). The belief was probably current before the time of Dharma Sutras: vide Apartamba Dh. S.II. 7.17-22. Curiously enough, Gautama (15.28), Baudhayana Dh.S. II. 8.2, Manu III. 185-186, Yajnavalkya Smfti (I. 219) use the same words about these sanctifiers of diners ( Panktipavanas ). We get a long list of such sanctifiers in Mbh. Anuiasana 90.25-31, Mt. 7-23, KP. II.21-1-14. Bd. 3.15.28-

अध्याय १४९

श्लोक 4

द्वादश्यां कृष्णपक्षस्य शुक्ले च समुपोषितः ।गन्धमाल्यैर्जगन्नाथं पूजयेत् पाण्डुनन्दन

dvādaśyāṃ kṛṣṇapakṣasya śukle ca samupoṣitaḥ / gandhamālyairjagannāthaṃ pūjayet pāṇḍunandana

हिन्दी अर्थ

लोके श्रेष्ठतमं स्वग्यंमात्मनश्वापि यत्प्रियम् । सर्व पित्॒णां दातव्यं तेषामेबाक्षयाथिता २ जाम्बूनदमयं दिव्यं विमान सुर्यंसंनिभम् दिव्याप्सरोधिः संकीर्णमन्नदो लभते फलम्

English

Our text practically repeats the same lines.

अध्याय १४९

श्लोक 5

ब्राह्मणांश्च महाभाग दानसंमानभोजनैः ।पूजयेत्परया भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु

brāhmaṇāṃśca mahābhāga dānasaṃmānabhojanaiḥ / pūjayetparayā bhaktyā tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

आच्छादन तु यो दद्यादहतं श्ाद्धकर्मणि । आयुः प्रकाममेश्वर्य रूपं च लभते सुतम् ४ उपवोतं तु यो दद्याच्छाड्कालेषु धर्मंवित् । पानं च् सब विप्राणां ब्रह्मदानस्थ यत्फलम् ५ कृतं विप्रेष यो दह्याच्छाद्धकाले कमण्डलुम्। मधुक्षो रखवा धेनुर्दातारमुपतिष्ठति ६ चक्राविद्धं तु यो दद्याच्छाद्धकाले कमण्डलुम्। धेनुं स लभते दिव्यां पयोदां काम्यदोहिनीमू. सुमहज्ज्वलनप्रख्यं रत्वकामसमन्वितम् । सुर्यचन्द्रनिभ दिव्यं विमान लभतेक्षयम् ११ अप्सरोभिः परिवुतं कामर्ग तु मनोजवस् । बसते स विसानागरूचे स्तुयमानः समन्ततः ३१२

English

Trindciketa is alternately explained as:

अध्याय १४९

श्लोक 6

सत्रयाजिफलं जन्तुर् लभते द्वादशाब्दकैः ।ब्राह्मणान्भोजयंस्तत्र तदेव लभते फलम्

satrayājiphalaṃ jantur labhate dvādaśābdakaiḥ / brāhmaṇānbhojayaṃstatra tadeva labhate phalam

हिन्दी अर्थ

प्रिय लगनेवाले पदार्थों को अक्षय तृप्ति के लिये उन पितरों को देना चाहिए ।३-२। श्राद्धादि में अन्न का दान करनेवाला मनुष्य सुवर्ण के बने हुए, सूर्य के समान चमऊते हुए, दिव्य सीौन्दयंशालिनी अप्सराओं से भरे हुए दिव्य विमान को प्राष्त करता है ।३। जो मनुष्य श्राद्धकर्म में विता फटा हुआ ओढ़ने का वस्त्र प्रदान करता है, वह दीर्वायु, ऐश्वयं सुन्दरता तथा पुत्र की प्राप्ति करता है ४। जो घर्मात्मा मनुष्य श्राद्धकर्म में यश्ञोपवीत का

English

If the performer of a Sraddha or he who takes food in a 3raddha, indulges in sexual intercourse, undoubtedly the Pitrs are stationed in his semen virile that month.

अध्याय १४९

श्लोक 7

तर्पयित्वा पित्ःन् देवान् स्नात्वा तद्गतमानसः ।जपेद् द्वादशनामानि देवस्य पुरतः स्थितः

tarpayitvā pitḥn devān snātvā tadgatamānasaḥ / japed dvādaśanāmāni devasya purataḥ sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

दान करता है तथा सभी समागत ब्राह्ीणों को सुन्दर जलपान कराता है उसे ब्रह्म (विद्या) दाव का फल प्राप्त होता हैं।।५। जो मनुष्य श्राद्ध के अवसर पर ब्राह्मणों के लिये सुन्दर कमण्डलु का दान करता है, उस दाता के लिये मधु के समान मीठा दूध देनेवाली गो नियुक्त रहती है ।६॥ जो श्राद्धकाल में चक्राकार चिह्न से चिह्नित कृमण्डलु प्रदान करता है, वह सभी मनोरथों की श्रदात क्रनेवाली, दिव्य गुग सम्पन्न दूध देनेवाली गौ प्राप्त करता है ।७। जो पुष्प की मालाओं से विभूषित, सभी सामग्रियों से समन्वित सुन्दर शब्या का दान करता है, उसकी वह शय्या उत्तम प्रासाद (राजमहल) के रूप में उसके पीछे-पीछे (परलोक में) चलती है ।८5। श्राद्ध के अवसर पर रत्नादि से युक्त शय्या, एवं आसनादि से अलंकृत भवन को यतियों के लिए दान करनेवाला मनुष्य स्त्रगं में आनन्द की प्राप्ति करता है। मोती, बंदूय, विविधवस्त्र, रत्न, करोड़ों अरबों की संख्या में दिव्य

English

Hence a Dana (religious gift) is to be made to the guest and a Brahmacarin (celibate person) is to be fed. The Dana is to be made to one engrossed in meditation and having sympathetic feelings. In the Sraddha rite, a righteous ascetic or a Valakhilya (a mendicant who docs not hoard anything) should be fed. A Vanaprastha (forest-dweller) and an Upakur- vdiia (Brahmacarin who completes his studies and pays his teacher and is about to be a householder) is propitiated by mere worship.

अध्याय १४९

श्लोक 8

मासि मासि निराहारो द्वादश्यां कुरुनन्दन ।केशवं पूजयेन् नित्यं मासि मार्गशिरे बुधः

māsi māsi nirāhāro dvādaśyāṃ kurunandana / keśavaṃ pūjayen nityaṃ māsi mārgaśire budhaḥ

हिन्दी अर्थ

बाहन, तथा अतिप्रकाशमान, रत्नादि से विभूषित, चन्द्रमा और सूर्य के समान एक दिव्यवाहन प्राप्त करता है उस दिव्य विमान का कभी विनाश नहीं होता ।६-११। इच्छानुस्तार गमन करनेवाला, सन के समान वेगश्ञाली बह रथ चारों ओर से अप्सराभों द्वारा घिरा रहता है। उस श्रेष्ठ विमान में चारों ओर से उसकी स्तुति की.

English

If a householder is fed, Visvedevas are worshipped. By worshipping a Vanaprastha, sages are worshipped. By worshipping Valakhilyas, Purandara (i.e. Indra) is wor¬ shipped.

अध्याय १४९

श्लोक 9

पौषे नारायणं देवं माघमासे तु माधवम् ।गोविन्दं फाल्गुने मासि विष्णुं चैत्रे समर्चयेत्

pauṣe nārāyaṇaṃ devaṃ māghamāse tu mādhavam / govindaṃ phālgune māsi viṣṇuṃ caitre samarcayet

हिन्दी अर्थ

जोबितस्य प्रदानाद्धि नान्यहानं विशिष्यते । तस्मात्सवंप्रयत्नेन देय प्राणाभिरक्षणम् .. १७ अहिसा सर्वंदेवेभ्यः पवित्रा सर्वदायिनी । दान हि जीवितस्था558ु: प्राणिनां परम बुधाः १८ पात्र वे तेजस दह्यान्मनोज्ञ श्राद्धभोजने । पात्र भवति कामानां रूपस्य च धनस्थ च॑ ६२० (+ राजतं का्चनं बाइपि दद्याच्छाद्वे तु कर्माणि। दत्त्वा तु लभते दाता प्रकाम धर्ममेव च)

English

In worshipping ascetics, Brahma himself is wor¬ shipped. These Asramas are holy. There are five Anasramas through deceitfulness (?)

अध्याय १४९

श्लोक 10

वैशाखे मधुहन्तारं ज्येष्ठे देवं त्रिविक्रमम् ।वामनं तु तथाषाढे श्रावणे श्रीधरं स्मरेत्

vaiśākhe madhuhantāraṃ jyeṣṭhe devaṃ trivikramam / vāmanaṃ tu tathāṣāḍhe śrāvaṇe śrīdharaṃ smaret

हिन्दी अर्थ

जाती है गन्धवे ओर अप्सराओं के बुन्द दिव्य सुगन्धित द्रब्यों एवं पुष्प की बृष्टियों से उसे आाष्छादित करते हैं। मनोहुः गायन और वबादन द्वारा उसका मनोरंजन करते हैं। परम धसुन्दरी अप्सराओं के साथ मुख्य-मुख्य युवती कन्यायें मनोरम संगीतमय स्वरों से उन्हें सवंदा जगाती हैं ।१२-१४। एक सहुस्न अइवों के दान करने से, एक सौ रथों के दान करने से तथा एक सहस्न हाथियों के दात करने से मनुष्य योगिनी के साथ निवास

English

Four Asramas (i. e. people in the four stages of life) are to be worshipped in the rites ot Devas and Pitrs. A Sraddha

अध्याय १४९

श्लोक 11

हृषीकेशं भाद्रपदे पद्मनाभं तथाश्विने ।दामोदरं कार्त्तिके तु कीर्तयन् नावसीदति

hṛṣīkeśaṃ bhādrapade padmanābhaṃ tathāśvine / dāmodaraṃ kārttike tu kīrtayan nāvasīdati

हिन्दी अर्थ

करता है ।१५। जो व्यक्ति योग परायण पितरों के उद्देश्य से जल में दोपदान करता है, उसे एक श्रहखल निष्कों के दान का फल प्राप्त होता है।१६॥ जीवनदान के समान विशेषता किसी अन्य दान की नहीं है; इसलिये सब प्रयत्त करके प्राणों की रक्षा का दान करना चाहिए ।१७। अहिंसा देवताओं की भपेक्षा पवित्र एवं सबकुछ देनेवाली है, प्राणियों को जीवन का दान करना सभी दातों से श्रेष्ठ है--ऐसा बुद्धिमान लोग कहते हैं ।१८। प्ाद्ध में सभी लक्षणों से युक्त सुबर्ण के पात्रों का दान करना चाहिए जो लोग श्राद्ध में इस प्रकार के सुवर्ण निर्भित पात्रों का दान करते हैं, उन्हें विविध प्रकार के खाद्य पदार्थ, रस एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है ।१६। श्राद्धकाल में भोजन के अवसर पर सुन्दर बने हुए तंजस (चाँदी के)पात्रों का दान करना चाहिए, वह पात्र दाता के स्वरूप, धन-सम्पत्ति और सभी मनोरधों

English

Even if he stays hungry, let him stay so outside the four stages of life. The non-ascetic and the Salvationist—both of them are the defilers of the row. 1

अध्याय १४९

श्लोक 12

वाचिकं मानसं पापं कर्मजं यत्पुरा कृतम् ।तन्नश्यति न सन्देहो मासनामानुकीर्तनात्

vācikaṃ mānasaṃ pāpaṃ karmajaṃ yatpurā kṛtam / tannaśyati na sandeho māsanāmānukīrtanāt

हिन्दी अर्थ

को पूर्ण करनेबाला होता है, (श्राद्धकर्म में सुवर्ण अथवा चाँदी के बने हुए पात्रों को जो दाता देते हैं, वे परम धर्म की प्राप्ति करते हैं।) जो व्यक्ति श्राद्ध में दोहन पात्र के साथ एक बार की ब्याई हुई गौ का दान करता है, उसे अनेक गोौयें प्राप्त होती हैं और सबंदा पुष्टि रहती हैं ।१०-२२। शिश्षिर ऋतु में श्राद्ध के अवसर पर जो

English

Those who shave off their hair in vain, those who wear matted hair, those who wear all sorts of robes, those who are devoid of mercy, those who break all codes of good con¬ duct and those who are indiscriminate in eating—are to be avoided.

अध्याय १४९

श्लोक 13

स्वयं विनुद्धः सततमुन्मिषन्निमिषंस्तथा ।शीघ्रं प्रपश्य भुञ्जानो मन्त्रहीनं समुद्गिरेत्

svayaṃ vinuddhaḥ satatamunmiṣannimiṣaṃstathā / śīghraṃ prapaśya bhuñjāno mantrahīnaṃ samudgiret

हिन्दी अर्थ

एतदधेस्थान इदमर्ध दिव्य; पुष्पे: प्रसिश्वन्ति पूर्णवृष्टि भिरेव च! इति ख. ग. घ. ह. पुस्तकेषु । +घनुश्चित्वान्तगंतग्रन्थो घ. पुस्तके नास्ति । शिशिरेषु तथा त्वग्नि बहुकाष्ठ तथेव च। -- इन्धनानि तु यो दद्यादृद्विजिम्यः शिशिरागसे ॥३२ ३

English

In the matter of Havya and Kavya, one shall avoid Karukas (a Saiva sect) and men of no disciplined conduct of life, men ostracised from the Vedic Society, musicians and actors (who imitate deities).

अध्याय १४९

श्लोक 14

परमापद्गतस्यापि जन्तोरेषा प्रतिक्रिया ।यन्मासाधिपतेर् विष्णोर् मासनामानुकीर्तनम्

paramāpadgatasyāpi jantoreṣā pratikriyā / yanmāsādhipater viṣṇor māsanāmānukīrtanam

हिन्दी अर्थ

श्राउेष्वेतानि यो दह्यादश्वमेधफलं लभेत् । श्राद्धकाले निवेद्यं च॒ दर्शभ्राद्ध उपस्थिते

English

A person who has social and other contacts with these, attains black complexion (taint). He who dines with Sudras—all these are defilers of the row (of diners).

अध्याय १४९

श्लोक 15

ता निशास्ते च दिवसास्ते मासास्ते च वत्सराः ।नराणां सफला येषु चिन्तितो भगवान्हरिः

tā niśāste ca divasāste māsāste ca vatsarāḥ / narāṇāṃ saphalā yeṣu cintito bhagavānhariḥ

हिन्दी अर्थ

५८ कुस्भदो हनधेनूनां बह्लीनां च फलं लभेत् । अस्मिस्तु सोदते लोके स्यन्दनेश्न सुवाहने: अग्नि एवं प्रचुर परिमांण में इन्धन का दान करता हैं, अथवा शिशिर ऋतु के आ जाने पर जो ब्राह्मणों के लिए इन्धन दान करता है, वह संग्राम में सवंदा विजयी होता है, ओर. शोभा सम्पन्न होकर परम तेजस्वी होता है। श्रा्ध के अवसर पर सुगन्धित पुष्पों की मालाएँ तथा सुन्दर पात्रों को सत्कार पुृवंक दान करना चाहिए। जो ऐसा करता है, उसे महानदियाँ सुगन्धित से युक्त होकर परम सुख पहुँचाती हैं, विविध सुखों की प्राप्ति

English

Killing (of animals etc.), destruction with force, agriculture, trading activities, animal husbandry, secret service to a person other than the preceptor—these should not be followed by a Brahmana.

अध्याय १४९

श्लोक 16

परमापद्गतस्यापि यस्य देवो जनार्दनः ।नावसर्पति हृत्पद्मात्स योगी नात्र संशयः

paramāpadgatasyāpi yasya devo janārdanaḥ / nāvasarpati hṛtpadmātsa yogī nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

होती है ।२३-२४५। मनोरम युवती स्त्रियाँ उस दाता के पास उपस्थित होती हैं । विविध प्रकार की शय्पा, मनोहर आपन, प्रचुर भूमि एवं विविध वाहइन-“इन सब को जो श्राद्ध के अवसर पर देता है, वह अध्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। सामान्य श्राद्धों के अवसर पर अथवा दर्श श्राद्धों के अवसर पर जो इन वस्तुओं का दान सर्वगुषसम्पन्त ब्राह्मणों को करता है वह सुन्दर स्मरण शक्ति और बुद्धि को प्राप्त करता है। श्राद्ध के अवसर

English

Those who are real Brahmanas, pursue knowledge and meditation. Even if they are born as Brahmanas, those who have false conceptions are of evil conduct.

अध्याय १४९

श्लोक 17

ते भाग्यहीना मनुजाः सुशोच्यास्ते भूमिभाराय कृतावताराः ।अचेतनास्ते पशुभिः समाना ये भक्तिहीना भगवत्यनन्ते

te bhāgyahīnā manujāḥ suśocyāste bhūmibhārāya kṛtāvatārāḥ / acetanāste paśubhiḥ samānā ye bhaktihīnā bhagavatyanante

हिन्दी अर्थ

पर घृत से भरे हुए अनेक पात्रों का साकार पूर्वक दान करना चाहिए, जो ऐसा करता है, वह दोहन कलश समेत अनेक गौओं के दान का फल प्राप्त करता है । इस लोक में सुन्दर वाहनों एवं रथों का आनन्द प्राप्त करता है ।२६-२९। श्राद्ध के अवसर पर याचक की मनचाही वस्तु का दान करने से पुण्डरीक यज्ञ का एवं सुन्दर निवास स्थल का दान करने से राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त करता है। एवं फलों से समिस्वत बत का दाच करने से सुगन्धित पदार्थों की प्राप्ति होती है। कूपों, बगीचों, तड़ायों, क्षेत्रों, गोशालाओं और गहों के दाव करने से दाता स्वर्ग लोक में तब तक निवास करता है, जब तक चन्द्रमा और ताराएं विद्यमान रहती हैं। श्राद्ध काल में र॒त्नजटित बिछावन और दय्या का दान करता है, उसके पितरगण सन्तुष्ट होते हैं, ओर दाता

English

The preachers of wrong/heretic doctrines should be avoided. So also the arrogant, the scandal-monger, and people defiled by minor sins and great sins should be avoided.

अध्याय १४९

श्लोक 18

ते पूर्णकार्याः पुरुषाः पृथिव्यां ते स्वाङ्गपाताद्भुवनं पुनन्ति ।विचक्षणा विश्वविभूषणास्ते ये भक्तियुक्ता भगवत्यनन्ते

te pūrṇakāryāḥ puruṣāḥ pṛthivyāṃ te svāṅgapātādbhuvanaṃ punanti / vicakṣaṇā viśvavibhūṣaṇāste ye bhaktiyuktā bhagavatyanante

हिन्दी अर्थ

,-इत उत्तरमेतदधेमधिकरम् 'का्याग्निदीप्ति: प्राकाइ्ये रूपं सौभाग्यमेव च' इति ख. घ. ड. पुस्तकेषु ।

English

Those who make use of Vedas as a means of em¬ ployment out of greed and delusion or for profit are the sellers of Vedas. They are to be avoided in the Sraddha rite.

अध्याय १४९

श्लोक 19

स एव सुकृती तेन लब्धं जन्मतरोः फलम् ।चित्ते वचसि काये च यस्य देवो जनार्दनः

sa eva sukṛtī tena labdhaṃ janmataroḥ phalam / citte vacasi kāye ca yasya devo janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

एतदर्घस्थाने5्यं पाठ: 'कुम्भदोदोह॒धे नूनां वह्दीनां फलमस्नुते' इति ख. ग. घ ड. पुस्तकेषु । अर्णाकौशेयवस्त्राणि तथा प्रवरकम्बलौ । अजिन॑ कान पहट्ट' प्रवेणीमृगलोमकम् ३३४ दानान्येतानि विप्रेभ्यों भोजग्रित्वा यथाविधि। प्राप्नोति श्रहधानस्तु वाजपेयशर्तं फलम्

English

A person hired to teach the Vedas and one who is taught by such a person—both of them do not deserve invit¬ ation to a Sraddha as the sellers and buyers of the Vedas.

अध्याय १४९

श्लोक 20

एतत्तीर्थवरं पुण्यं लिङ्गो यत्र जनार्दनः ।वञ्चयित्वा रिपून्संख्ये क्रोधो भूत्वा सनातनः

etattīrthavaraṃ puṇyaṃ liṅgo yatra janārdanaḥ / vañcayitvā ripūnsaṃkhye krodho bhūtvā sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

बह्ुचो नाये: सुरुपास्तु पुत्रा भृत्याश्व किकरा: । वशे तिष्ठन्ति भूतानि अस्मिललोके त्वनामयम्

English

Those (Brahmanas) who buy and sell for the purpose of livelihood are despicable ones. This is the profession of a Vaisya but a sin unto Brahmanas.

अध्याय १४९

श्लोक 21

उपप्लवे चन्द्रमसो रवेश्च यो ह्यष्टकानामयनद्वये च ।पानीयमप्यत्र तिलैर्विमिश्रं दद्यात् पितृभ्यः प्रयतो मनुष्यः

upaplave candramaso raveśca yo hyaṣṭakānāmayanadvaye ca / pānīyamapyatra tilairvimiśraṃ dadyāt pitṛbhyaḥ prayato manuṣyaḥ

हिन्दी अर्थ

कोशेय क्षौ मकार्पासं दुकूलमह॒तं तथा। श्ाद्धेष्वेतानि यो दह्यात्कामानाप्नोति पुष्कलान् ३७ सर्वदेवमय वासो सर्वदेबेस्व्वभिष्टुतम् । वस्त्राभावे क्विया नास्ति यज्ञा वेदास्तरपासि लू ॥३ ६९ तस्मादस्त्राणि देयानि श्राद्धकाले विशेषतः । तामि सर्वाण्यवाप्नोति यज्ञवेदतपांसि च ॥४ ० नित्य श्राउेषु यो दह्यात्प्रयतस्तत्परायण: । सर्वान्कामानवाप्नोति स्वर्ग राज्य तंत्र च

English

They say that he who depends for his livelihood upon the Vedas and he who depends upon those who know Vedas for livelihood do not deserve invitation to a Sraddha. The husband of one's daughter also shall not be invited. He who goes unto his wife in vain (i.c. an issueless person) and he who performs Yajna in vain—both of these do not deserve an (invitation to) a Sraddha. A Brahmana (who is) an atheist also shall not be invited.

अध्याय १४९

श्लोक 22

घोणोन्मीलितमेरुरन्ध्रनिवहो दुःखाब्धिमज्जत्प्लवः प्रादुर्भूतरसातलोदरबृहत्पङ्कार्धमग्नक्षुरः ।फूत्कारोत्करनुन्नवातविदलद्दिग्दन्तिनादश्रुतिन्यस्तस्तब्धवपुः श्रुतिर्भवतु वः क्रोडो हरिः शान्तये

ghoṇonmīlitamerurandhranivaho duḥkhābdhimajjatplavaḥ prādurbhūtarasātalodarabṛhatpaṅkārdhamagnakṣuraḥ / phūtkārotkaranunnavātavidaladdigdantinādaśrutinyastastabdhavapuḥ śrutirbhavatu vaḥ kroḍo hariḥ śāntaye

हिन्दी अर्थ

सकामसमृद्धस्य यज्ञषस्य फलसश्नुते । भव्ष्यान्धा ना: करम्भांश्व पिष्ठकार्धृतश्क रा: ६४२

English

He who cooks food for himself only and he who does not offer anything to Dcvas and guests—both of them are fallen and they are Brahmaraksasas. They do not deserve (invitation to) a Sraddha.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 149
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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