Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
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अध्याय 150 / 232

Adhyaya 150

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अध्याय १५०

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे लिङ्गवाराहतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नामैकोनपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १५० श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेन्महाराज कुसुमेश्वरमुत्तमम् ।दक्षिणे नर्मदाकूले उपपातकनाशनम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe liṅgavārāhatīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāmaikonapañcāśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 150 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchenmahārāja kusumeśvaramuttamam / dakṣiṇe narmadākūle upapātakanāśanam

हिन्दी अर्थ

अनध्त काल तक स्व में निवास करता है। राजाओं द्वारा वह पूजित होता है, उसके धन धाश्यादि की वृद्धि होती है ।३०-३३॥ ऊती, रेह्ममी वस्त्र, श्रेष्ठ, कम्बल, चरम, सुबर्ण सिमित पट्ठट और मृगलोम इन सब वस्तुओं को विधिपूवंक ब्राह्मणों को देना चाहिए इन दानों पर श्रद्धा रखनेवाले सो वाजपेय यज्ञों का फल प्राप्त करते हैं ।३४-३४५। इस लोक में बहुतेरी सुन्दरी स्थ्रियाँ, पुत्र, पुत्र, एवं सेवक गण उसके वश में रहते- हैं, बहुत से लोग उसके अधीन रहते हैं, और वह सबंदा नीरोग रहता है। जो व्यक्ति नवीन रेशमी वस्त्र, सूक्ष्म सुती वस्त्र, सुन्दर साड़ियों को श्राद्धों के अवसर पर दान करता है, वह अपने समस्त मनोरथों को प्राप्त करता हैे। उसकी सारी विपत्तियाँ इस प्रकार दूर हो जाती हैं, जंसे सूयोंदय होने पर अन्धकार । नक्षत्रों में चन्द्रमा के समान देवविमानों में वह अग्रसर होकर सुक्षोभित होता है ।३६-३८। वस्त्र सभी देवताओं द्वारा प्रशंसित तथा सर्वे देवमय है, उस

English

Those whose wives eagerly await the nights and those who run after other men's wives, as well as those who are mad after wealth and love should not be invited to a Sraddha.

अध्याय १५०

श्लोक 2

कामेन स्थापितो देवः कुसुमेश्वरसंज्ञितः ।ख्यातः सर्वेषु लोकेषु देवदेवः सनातनः

kāmena sthāpito devaḥ kusumeśvarasaṃjñitaḥ / khyātaḥ sarveṣu lokeṣu devadevaḥ sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वश्रेष्ठ वस्त्र के अभाव में कोई क्रिया सम्पन्न नहीं होती, न तो यह सम्पन्न होता है और न तपस्या ही सफल होती है। इसलिये श्राद्ध के अवसर पर विश्लेष रूप से बस्त्रों का दान करना चाहिए । ऐसा करने वाला समस्त यज्ञों, वेदों और तपध्याओं का फल प्राप्त करता है। जो व्यवित भ्राद्ध के अवसर पर इन्द्रियों को बश में रखकर बस्त्रों का दान करता है वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है, स्वर्ग और राज्य प्राप्त करता है

English

Those who are opposed to the discipline andtbe duties of the four castes and stages of life, a thief and he who indiscri¬ minately performs Yajna for everyone—all these are defilers of the row in the rite ofSraddha.

अध्याय १५०

श्लोक 3

कामो मनोभवो विश्वः कुसुमायुधचापभृत् ।स कामान् ददाति सर्वान् पूजितो मीनकेतनः

kāmo manobhavo viśvaḥ kusumāyudhacāpabhṛt / sa kāmān dadāti sarvān pūjito mīnaketanaḥ

हिन्दी अर्थ

सभी कामनाओं से सम्पन्न यज्ञ का फल प्राप्त करता है। विविध प्रकार के भद्ष्य पदार्थ, घान्य करम्भ (दही- मिश्रित सत्त), पेठ, घृत और शक्‍कर, खिचड़ी, मधुपक, दुग्ध, दुग्ध में बने हुए पदार्थ, सुन्दर पृुआ--इन सब शकराक्षो संयुक्त पृथुक॑ नित्यमक्षयम् । स्युश्न संवत्सरं प्रीता: कृशरेमंसुरेण च 0४७ सक्तुलाजास्तथा पृषाः कुल्माषव्यअजनेस्तथा । सपिःस्निग्धानि हुआ्यानि दध्ना सक्तंस्तु भोजयेत् ॥।

English

The leavings of the Sraddha food should not be given to women or a Sudra unless he is an attendant. If anyone gives out of passion or delusion, it never reaches Pitrs.

अध्याय १५०

श्लोक 4

तेन निर्दग्धकायेन चाराध्य परमेश्वरम् ।अनङ्गेन तथा प्राप्तमङ्गित्वं नर्मदातटे

tena nirdagdhakāyena cārādhya parameśvaram / anaṅgena tathā prāptamaṅgitvaṃ narmadātaṭe

हिन्दी अर्थ

वेश्वदेव॑ च सौस्‍्यं च खाड्गमांसं परं हृवि। विषाणं वर्जयेत्लाड्गं असुयां नाशयामहे ॥४५ १

English

Hence in a Sraddha rite, the leavings of food should never be given except curds and ghee and that too to a disciple and a son; not otherwise.

अध्याय १५०

श्लोक 5

युधिष्ठिर उवाच: अङ्गिभृतस्य नाशत्वमनङ्गस्य तु मे वद ।न श्रुतं न च मे दृष्टं भूतपूर्वं कदाचन

yudhiṣṭhira uvāca: aṅgibhṛtasya nāśatvamanaṅgasya tu me vada / na śrutaṃ na ca me dṛṣṭaṃ bhūtapūrvaṃ kadācana

हिन्दी अर्थ

वस्तुओं को श्राद्ध के अवसर पर जो व्यक्ति दान करता है वह अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त करता है वर्षा ऋतु में श्राद्ध के अवसर पर विशेषतया मधा नक्षत्र में--पितरगण दही शुद्ध मोरस, विविध प्रकार के भक्ष्य पदार्थ की चिन्ता करते हैं अर्थात् मधानक्षत्र में श्राद्ध करते समय इन पदार्थों को देना चा हिये । श्राद्ध करते समय घृत के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, भूमि पर घृत छोड़ना चाहिए, गया तीथ में हाथी दान करके पित्तरों के विषय में चिन्ता छूट जाती है ।४४-४५। भात, दुग्ध में बने हुए पदार्थ, घृत, मधु, मूल, फल,

English

Only that which is not left over should be given, such as food particularly. Pitrs are propitiated with flowers, ' roots and fruits too as with food.

अध्याय १५०

श्लोक 6

एतत्सर्वं यथा वृत्तमाचक्ष्व द्विजसत्तम ।श्रोतुमिच्छामि विप्रेन्द्र भीमार्जुनयमैः सह

etatsarvaṃ yathā vṛttamācakṣva dvijasattama / śrotumicchāmi viprendra bhīmārjunayamaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

विविध प्रकार की भोजन सामग्री-- इन सब वरतुओं को श्राद्ध के अवसर पर दान करने से इह लोक तथा परलोक में आनन्द की प्राप्ति होती है । दूध मिश्रित शक्कर और चिउड़ा का दान कभी नष्ट होनेवाला नहीं है । मसूर और बिचड़ी के दान से पितर गण एक वर्ष तक सन्तुष्ट रहते हैं। इसी प्रकार सत्तू, धान के लारे, पूआ और कुल्माष (कुल्थी के बने हुए व्यंजनों) से भी एक वर्ष तक पितरगण तृप्त रहते हैं । घुत, मनोहर और हृदय

English

The foodstuffs served are sanctified as long as they are warm. Pitrs partake of the food as long as the invited Brahmanas take their food, with control over their speech.

अध्याय १५०

श्लोक 7

श्रीमार्कण्डेय उवाच: आदौ कृतयुगे तात देवदेवो महेश्वरः ।तपश्चचार विपुलं गङ्गासागरसंस्थितः

śrīmārkaṇḍeya uvāca: ādau kṛtayuge tāta devadevo maheśvaraḥ / tapaścacāra vipulaṃ gaṅgāsāgarasaṃsthitaḥ

हिन्दी अर्थ

को लुभाने वाली अन्यान्य खाद्य सामाग्री तथा दही के साथ सत्तू का भोजन श्राद्ध के अवसर पर देना चाहिए। जो व्यक्ति इन सब वस्तुओं को श्राद्ध के अवसर पर दान करता है, वह कई पद्म का खजाना प्राप्त करता है।४६-४८। जो सत्कार एवं यत्नपूर्वक श्राद्ध के अवसर पर नवीन अन्न का दान करता है बह सभी प्रकार के भोगों को प्राप्त करता है, पूजित होता है तथा स्व प्राप्त करता है ।४:। जो मनुष्य विविध प्रकार के खाद्य पदार्थ, भक्ष्य सामग्रियाँ, तथा पीने और चाटने की क्षेष्ठ सामग्रियाँ श्रद्धकाल में देता है, बह सर्वश्रेष्ठ होता है। इस थाद्ध में वंश्वदेव और सोम को उनका भाग देना चाहिए, गैंडे के माँस की अहुति देती चाहिए--बही सर्व श्रेष्ठ हवि है । केवल गैंडे की सोंग छोड़ देनी चाहिए-इसे वर्जित कर हम पितरों की घृणा को नष्ट करते हैं । अर्थात्

English

All these rites and particularly the rite of gifting away,

अध्याय १५०

श्लोक 8

तेन सम्पादिता लोकास्तपसा ससुरासुराः ।जग्मुस्ते शरणं सर्वे देवदेवं शचीपतिम्

tena sampāditā lokāstapasā sasurāsurāḥ / jagmuste śaraṇaṃ sarve devadevaṃ śacīpatim

हिन्दी अर्थ

तरुणादित्यसंकाश विमान हंसवाहनम् । अन्नदों लभते तिख्रः कन्याकोटीस्तथंव च ..

English

Those who are steadfast in their holy rites, those who

अध्याय १५०

श्लोक 9

व्यापकः सर्वभूतानां देवदेवो महेश्वरः ।संतापयति लोकांस्त्रींस्तन्निवारय गोपते

vyāpakaḥ sarvabhūtānāṃ devadevo maheśvaraḥ / saṃtāpayati lokāṃstrīṃstannivāraya gopate

हिन्दी अर्थ

जीवदानात्परं दानं न किचिदिह विद्यते अन्लेर्जीवन्ति त्रलोक्यमन्नस्थेव हि तत्फलम् अन्ने लोका: प्रतिष्ठन्ति लोकदानस्य तत्फलम् अन्न प्रजापति: साक्षात्तेन सर्बंसिदं ततम् ॥

English

The whole of the three worlds is pervaded or ever by the masters of Yoga. Hence they (can) observe whatever there is in the universe.

अध्याय १५०

श्लोक 10

श्रुत्वा तद्वचनं तेषां देवानां बलवृत्रहा ।चिन्तयामास मनसा तपोविघ्नायचादिशत्

śrutvā tadvacanaṃ teṣāṃ devānāṃ balavṛtrahā / cintayāmāsa manasā tapovighnāyacādiśat

हिन्दी अर्थ

प्रतिभ्रयं सदा द्चादतिथिभ्यः कृताजलिः । देवास्ते संप्रतीक्षस्ते दिव्यातिथ्य: सहस्नशः (५६ सर्वाप्येतानि यो दद्यात्यृथिव्यामेकराइ्भवेत् । त्रिभिद्वस्यामथैकेन दानेन तु सुखी भवेत्

English

The noble souls keep both the manifest and the un¬ manifest under their control. They control even that which is greater than all. Truth and falsehood have been perceived by them. Sat, Asat have been seen by them. All knowable things, absolution etc. are' seen by the noble souls. Hence one who is devoted to them attains everything auspicious.

अध्याय १५०

श्लोक 11

अप्सरां मेनकां रम्भां घृताचीं च तिलोत्तमाम् ।वसन्तं कोकिलं कामं दक्षिणानिलमुत्तमम्

apsarāṃ menakāṃ rambhāṃ ghṛtācīṃ ca tilottamām / vasantaṃ kokilaṃ kāmaṃ dakṣiṇānilamuttamam

हिन्दी अर्थ

वलनदया/मणबुाननासलााआ+--मनमा ४५० गआ-83० 8००८ ०--०-००००व-००++०+»कमुैनन०००++++नानामभारमममभानातान नव पानता नानी नम मातम मा हा मत नमन ्मप॒भनकनक पना नानक न 0 न॒म- नागा गान नम भानानापुभ४४--ल्‍ "नमन के -- कम म पनान्नानन्ममह पन्ना 5 नढनकम्त++नननन+ मनु पब्न पर सन न आना नम अमान «मम ७००००4५०४+ ना कु» मम ० न्‍म मनाया रे कं न पर गैंडे की सींग को पितरगण घ॒णा दृष्टि से देखते हैं। हाथ जोड़कर अतिथियों को भोजन कराते समय आगे आसन देना चाहिए, जो ऐसा करता है वह सभी यज्ञों एवं सत्कियाओं का फल प्राप्त करता है ।१५०-५३। जो भूला अतिथि हों, उसे अति ज्वीध्रता पूवंक खूब पकी हुई गरमागरम भोजन सामग्री देती चाहिए । यत्नपूर्वंक भक्ति एवं सत्कार के साथ उसे चिकना स्निग्ध भोजव देना चाहिए । जो ऐसा करता है, उसे मध्याक्ष के सूर्य के समान

English

He who knows the Rks knows the Vedas. He who knows the Yajur Mantras knows Yajna. He who knows Saman Mantras knows Brahman. He who knows Manasa (? mind) knows everything.

अध्याय १५०

श्लोक 12

गत्वा तत्र महादेवं तपश्चरणतत्परम् ।क्षोभयध्वं यथान्यायं गङ्गासागरवासिनम्

gatvā tatra mahādevaṃ tapaścaraṇatatparam / kṣobhayadhvaṃ yathānyāyaṃ gaṅgāsāgaravāsinam

हिन्दी अर्थ

तैजस्वी हंसी के वाहनों से समन्वित विमान की प्राप्ति छ्लोती है। भ्राद्ध के अवसर पर अन्न दान करनेवाला तीन करोड़ सुन्दरी कन्याओं को प्राप्त करता है ।१३-५४। इस मरत्यलोक में अन्नदान से बढ़कर कोई अन्यदान' नहीं है। इसमें किसी की सन्देह न होगा कि अन्न से ही समस्त जीव प्रथ्वी पर उत्पन्न होते हैं और जीवन: चलाते हैं । उसी प्रकार इस मत्यंत्रोक -में जीव दान के समान कोई अन्य दान नहीं हैं। अन्नों द्वारा यह

English

Henceforth I shall recount the various types of religious gifts and the benefits thereof. 1 A religious gift enables all living beings to cross (the ocean of worldly existence). It is the pleas¬ ing pathway unto heaven.

अध्याय १५०

श्लोक 13

एवमुक्तास्तु ते सर्वे देवराजेन भारत ।देवाप्सरःसमोपेता जग्मुस्ते हरसन्निधौ

evamuktāstu te sarve devarājena bhārata / devāpsaraḥsamopetā jagmuste harasannidhau

हिन्दी अर्थ

त्रेलोक्य जीवित है, यह सारा विध्वप्रपंच अन्न का ही परिणाम है। अन्न में ही समस्त लोकों की स्थिति और प्रतिष्ठा है, अन्न दात से ही वे वर्तमान हैं, अन्न ही साक्षात् प्रजापति है उसी से यह सारा त्ैलोक्य व्याप्त है । इस कारण अन्न दान के समान कोई अन्य दाव ने तो जगत् में था और न भविष्यत्काल में कभी होगा ।५५-१७ इस पृथ्वी में जितने भी वाहन हैं, जितनी भी सुन्दर स्त्रियाँ हैं, उव सब को पितरों में भक्त रखनेवाला मनुष्य शीघ्र ही प्राप्त करता है इसलिये उसे सब्वेदा हाथ जोड़कर अतिथियों को आश्रय देना चाहिए सहस्रों देवगण दिव्य (मनोरम) आतिथ्य प्राप्त के लिये प्रतीक्षा करते रहते हैं। जो व्यक्ति ऊपर कही गई समस्त वस्तुओं को श्राद्ध में दान करता है वह पृथ्वी का एकच्छत्र सम्राद होता है, अथवा इनमें से तीत, दो या एक ही का दान करता है वह भी सुखी होता है ।५८-६०। ये दान परमेधमं हैं, सत्परुषों

English

Though ancient works on Dharma Sastra insist upon avoidance of lavishness in Sraddha, later Puraijas encourage profuse expenditure on Sraddha, e.g. Pd. P. Srsti-Khada 9.179-181, Varaha 50-51, VP. III. 14.22-23. Pitrs are reported to have two Gathas expressing their desire to have a descendant who would bestow on Brahmanas (for the benefit of Pitrs) jewels, clothes, land, costly vehicles. This text encourages

अध्याय १५०

श्लोक 14

वसन्तमासे कुसुमाकराकुले मयूरदात्यूहसुकोकिलाकुले ।प्रनृत्य देवाप्सरगीतसंकुले प्रवाति वाते यमनैरृताकुले

vasantamāse kusumākarākule mayūradātyūhasukokilākule / pranṛtya devāpsaragītasaṃkule pravāti vāte yamanairṛtākule

हिन्दी अर्थ

७३२ बायूपुराणन्.

English

That which is the most excellent in the world, that which is conducive to the attainment of heaven, nay, everything that is pleasing to oneself, must be offered to Pitrs by one who seeks one's own eternal salvation.

अध्याय १५०

श्लोक 15

तेन संमूर्छिताः सर्वे संसर्गाच्च खगोत्तमाः ।मधुमाधवगन्धेन सकिन्नरमहोरगाः

tena saṃmūrchitāḥ sarve saṃsargācca khagottamāḥ / madhumādhavagandhena sakinnaramahoragāḥ

हिन्दी अर्थ

दानानि परमो धर्म: सद्धिः सत्कृत्य पुजितः । त्रलोक्यस्या5डथिपत्यं हि दानादेव व्यवस्थितम राजा तु लभते राज्यमधनश्नोत्तमं धनम् क्षीणायुलेभते चा55युः पितुभक्तः सदा बरः ॥ यान्कामान्मनसाष्थेंत तांस्तस्य पितरो ददुः द ६२

English

A person who offers cooked rice, derives the benefit of attaining a divine golden chariot dazzling like the sun and filled with divine Apsaras-s.

अध्याय १५०

श्लोक 16

यावद् आलोकते तावत्तद्वनं व्याकुलीकृतम् ।वीक्षते मदनाविष्टं दशावस्थागतं जनम्

yāvad ālokate tāvattadvanaṃ vyākulīkṛtam / vīkṣate madanāviṣṭaṃ daśāvasthāgataṃ janam

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्‍्ते श्राद्धकल्पे दानफल नामाशीतितमोध्ध्याय: ॥६०॥।

English

Pie who gifts a cloth fresh from the loom at the time of the Sraddha rite attains longevity, ample wealth, beauty and a son.

अध्याय १५०

श्लोक 17

देवदेवो ऽपि देवानाम् अवस्थात्रितयं गतः ।सात्त्विकीं राजसीं राजंस्तामसीं तां शृणुष्व मे

devadevo 'pi devānām avasthātritayaṃ gataḥ / sāttvikīṃ rājasīṃ rājaṃstāmasīṃ tāṃ śṛṇuṣva me

हिन्दी अर्थ

अथेकाशीतितमोअध्याय: अत ऊर्ध्व प्रवक््यासि श्राउउकर्मणि पुणितस् । काम्यने सिसिकाजस भ्राउइकर्मणि नित्यशः ३१ पुत्रदा धनमुलाः स्पुरष्टकास्तिस्त्र एबं च्। पूर्पपक्षों बरिष्ठो हि पूर्वा चित्री उदाहता

English

The knower of Dhannas who gives a sacred thread at the time of Sraddha and offers water to all Brahmanas attains the fruit of Brahmadana (the gift of Vedic learning).

अध्याय १५०

श्लोक 18

एकं योगसमाधिना मुकुलितं चक्षुर्द्वितीयं पुनः पार्वत्या जघनस्थलस्तनतटे शृङ्गारभारालसम् ।अन्यद्दूरनिरस्तचापमदनक्रोधानलोद्दीपितं शम्भोर्भिन्नरसं समाधिसमये नेत्रत्रयं पातु वः

ekaṃ yogasamādhinā mukulitaṃ cakṣurdvitīyaṃ punaḥ pārvatyā jaghanasthalastanataṭe śṛṅgārabhārālasam / anyaddūranirastacāpamadanakrodhānaloddīpitaṃ śambhorbhinnarasaṃ samādhisamaye netratrayaṃ pātu vaḥ

हिन्दी अर्थ

कर २४ नकनिरनिनीनीतनय न. ननजनचनन+ -++-- ५ पलना--२+-3-ज ५ । ०" "नकल क्‍ॉन्‍नननगाओा न-बापन- ५० ० -जीपनए अर गनगणधणगण ५ नीयत मे पिभीयजप- मनन. +िनतफओ नि डपाण “न २ अधीन जनता ते “तन न- -- +- +०-++ क०+त+--क -+ जन ५ ““+वण “जन 4 न-नवततज लीन “० -जन-ब- का है अप नन 3.“ “हसन 24५५-०५ कसिननम-म-पन-नन++ नन--ना: क्‍3४3४४-काव- ००००-००...

English

If anyone offers a good waterpot at the time of Sraddhas to the Brahmanas, a cow exuding honey and milk approaches the donor.

अध्याय १५०

श्लोक 19

एवं दृष्टः स देवेन सशरः सशरासनः ।भस्मीभूतो गतः कामो विनाशः सर्वदेहिनाम्

evaṃ dṛṣṭaḥ sa devena saśaraḥ saśarāsanaḥ / bhasmībhūto gataḥ kāmo vināśaḥ sarvadehinām

हिन्दी अर्थ

ने इसका सवंदा सत्कार और पूजन किया है। समस्त बेलोक्य का आधिपत्य दान से ही व्यवस्थित है । राजा लोग राज्य प्राप्त करते हैं, निर्धेन लोग उत्तम धन प्राप्त करते हैं, क्षीणायु दीर्घायु प्राप्त करते हैं, पितरों में भक्ति रखनेवाला मनुष्य मन से भी जिन अभिलाषाओं का चित्तन करता है, उनको पितरगण पूर्ण बिशेष तिथियों में श्राद्ध के किये जाने का फल इहस्पति ने कहा--अब इसके बाद मैं नित्य, नमित्तिक और काम्य श्राद्धों का विवरण बतला रहा हूँ, और यह भी बतला रहा हूं कि श्ाइ्धकर्म पुजनतादि किस प्रकार सम्पन्न होते हैं ।१। तीनों अष्टकाएँ पुत्र को देनेवली और घन सम्पत्ति भादि की कारणीभूत हैं। इस श्राद्षकर्म में पूव्वपक्ष अर्थात्:

English

He who gives a circular waterpot at the time of Sraddha obtains a milk-yielding divine cow that can be milked for whatever he wishes.

अध्याय १५०

श्लोक 20

कामं दृष्ट्वा क्षयं यातं तत्र देवाप्सरोगणाः ।भीता यथागतं सर्वे जग्मुश्चैव दिशो दश

kāmaṃ dṛṣṭvā kṣayaṃ yātaṃ tatra devāpsarogaṇāḥ / bhītā yathāgataṃ sarve jagmuścaiva diśo daśa

हिन्दी अर्थ

एकाशीतितमोः्ष्यायः छरेरे

English

If anyone gives a complete bed-equipment decorated with garlands of flowers, it becomes a palace and follows him as he goes (to heaven).

अध्याय १५०

श्लोक 21

कामेन रहिता लोकाः ससुरासुरमानवाः ।ब्रह्माणं शरणं जग्मुर्देवा इन्द्रपुरोगमाः

kāmena rahitā lokāḥ sasurāsuramānavāḥ / brahmāṇaṃ śaraṇaṃ jagmurdevā indrapurogamāḥ

हिन्दी अर्थ

प्राजापत्या द्वितीया स्थात्तुतोया वैश्वदेविकी । आद्या पू्पे: सदा कार्या मांसेरनन्‍्या भवेत्सदा 0३ (शाकरन्या तृतोया स्याहैव द्रव्यगवों विधिः । अन्वष्टका पित॒णां वे नित्यमेव विधीयते 8 परत्रेह च सर्वेषु नित्यमेव सुखीभवेत् । पुजकानां सदोत्कर्षो नास्तिकानामधोगतिः १६ पितरः पर्वकालेषु तिथिकालेषु देवता: । सर्वे पुरुषमायान्ति निपानसिव धेनवः ७ मा सम ते प्रतिगच्छेयु रष्टकाः सुरपूजिताः । मोघस्तस्य भबेललोको लब्धं चास्य विनश्यति ८ देवांस्तु दायिनों यान्ति तियंग्गच्छस्त्यदायिनः। प्रा पुष्टि स्वाति मेधां पुत्रानेश्वयंमेव च १६

English

By giving a house full of gems, furnished with bed, seats and food, at the time of Sraddha to ascetics, one rejoices in heaven.

अध्याय १५०

श्लोक 22

सीदमानं जगद् दृष्ट्वा तमूचुः परमेष्ठिनम् ।जानासि त्वं जगच्छेषं प्रभो मैथुनसम्भवात्

sīdamānaṃ jagad dṛṣṭvā tamūcuḥ parameṣṭhinam / jānāsi tvaṃ jagaccheṣaṃ prabho maithunasambhavāt

हिन्दी अर्थ

द्वितीयायां तु यः कुर्याद्द्विपदाधिपतिभंवेत् ।) वराधिनां तृतीया तु शत्रुध्नी पापनाशिनो ११

English

He obtains pearls, lapis lazuli, garments, varieties of precious stones, divine vehicles, hundred thousands and trillions in number and a divine aerial chariot that dazzles like a great blazing fire, that;has the lustre of the moon and the sun and that is furnished with jewels according to one's desire. The aerial chariot has the speed of the mind and can go anywhere as per his pleasure. It is surrounded by Apsaras-s. He remains at the head of the aerial chariot eulogised by eveyone allround. The Gandharva-s and Apsaras-s sprinkle him with divine scents and showers of flowers. They sing and play on the instruments.

अध्याय १५०

श्लोक 23

प्रजाः सर्वा विशुष्यन्ति कामेन रहिता विभो

prajāḥ sarvā viśuṣyanti kāmena rahitā vibho

हिन्दी अर्थ

कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया हैं। तीनों अष्टक।ओं में प्रथम चित्नरी कही गई है। दूसरी प्राजापत्य भौर तीसरी धैदवदेवी है । इन तीनों में पहिली को पुओं द्वारा, हूंसरी को मांसों द्वारा तथा तीसरी को शाकों द्वारा करना चाहिए । यह इन तीनों अष्टकाओं के लिये पदार्थों का नियम है। पितरों के लिये अन्वष्टका श्राद्ध सर्वत्र करना चाहिए ।२-४॥ यदि कोई अन्य चौथी अष्टका मिले तो उसे भी विधिपूर्वक सम्पन्न करे । बुद्धिमान पुरुष को इन सब अष्टकाओं में सर्व॑स्व व्यय करके भी श्राद्ध करना चाहिए । ऐसा करनेवाला प्राणी इह लोक तथा परलोक--दोनों में सबंदा आनन्द का अनुभव करता है। पूजा आदि करनेवालों की सदा उन्नति होती है और जो नास्तिक विचारवाले होते हैं, उनकी स्बदा अधोगति होती है ।५-६। पितरगण पर्व के अवसरों पर तथा देवगण विशेष-विशेष तिथियों पर श्राद्धादि एवं पूजा आदि करनेवाले पुरुष के पास इस प्रकार उपस्थित

English

by the gilts ol a thousand horses, a hundred chariots and a thousand elephants, a man lives with a Yogint,

अध्याय १५०

श्लोक 24

एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां देवानां प्रपितामहः ।जगाम सहितस् तत्र यत्र देवो महेश्वरः

etacchrutvā vacasteṣāṃ devānāṃ prapitāmahaḥ / jagāma sahitas tatra yatra devo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

होते हैं जँंसे गौएं जलाशय के समीप पाती पीने के लिये आती हैं ।७। वे पितरगण देवताभों द्वारा पूजित इन अष्टकाओं के समीप नहीं जाते । जो व्यक्ति इन अध्टकाओं में पितरों की पूजा आदि नहों करते, उनका यह लोक (जन्म) ध्यर्थ हो जाता है और जो कुछ प्राप्त हुआ रहता है वह नष्ट हो जाता है ।८। जो इन अवसरों पर श्राद्धादि का दान करते हैं वे देवताओं के समीप अर्थात् स्वर्ग लोक को जाते हैं और जो नहीं देते वे तियंक्

English

He who offers water (and) lamp to Pitrs and Yogins, attains the fruit of the gift of thousands of gold coins.

अध्याय १५०

श्लोक 25

अतोषयज्जगन्नाथं सर्वभूतमहेश्वरम् ।स्तुतिभिस्तण्डकैः स्तोत्रैर्वेदवेदाङ्गसम्भवैः

atoṣayajjagannāthaṃ sarvabhūtamaheśvaram / stutibhistaṇḍakaiḥ stotrairvedavedāṅgasambhavaiḥ

हिन्दी अर्थ

(अधम, पक्षी आदि) योनियों में जाते हैं। उसकी बृद्धि, पुष्टि, स्मरणशक्ति, धारणाशकित, पुत्र पोौनादि, एवं ऐश्वर्य की वृद्धि होती है, जो पूर्णमासी के अवसर पर श्राद्धादि करता है, इस प्रकार वह पूर्ण पर्व का फल भोगता है। इसी प्रकार प्रतिपदा धन सम्पत्ति के लाभ के लिये होती है, एवं करनेवाले की प्राप्त वस्तु नष्ट नहीं होती ।६-१०। द्वितीयातिथि को जो पितरों के उद्देश से भ्राद्धांदि करता है, वह दो पादवालों (मनुष्यों का राजा होता है। उत्तम आर्थ की प्राप्ति के अभिलाषी व्यक्ति के लिये भ्षाद्भादि में तृतीया विहित है, बह तृतीया

English

No other gift is more excellent than the gift of life. Hence, by all means protection to life should be given.

अध्याय १५०

श्लोक 26

ततस् तुष्टो महादेवो देवानां परमेश्वरः ।उवाच मधुरां वाणीं देवान्ब्रह्मपुरोगमान्

tatas tuṣṭo mahādevo devānāṃ parameśvaraḥ / uvāca madhurāṃ vāṇīṃ devānbrahmapurogamān

हिन्दी अर्थ

घनुश्चिह्नास्तगंतग्रन्थ: ग. पुस्तके नास्ति ...

English

At the time of Sraddha, one should give golden vessels having good characteristics. Sweet (divine) juices and bevera¬ ges, good foodstuffs and good fortune approach him.

अध्याय १५०

श्लोक 27

किं कार्यं कश्च सन्तापः किं वागमनकारणम् ।देवतानाम् ऋषीणां च कथ्यतां मम माचिरम्

kiṃ kāryaṃ kaśca santāpaḥ kiṃ vāgamanakāraṇam / devatānām ṛṣīṇāṃ ca kathyatāṃ mama māciram

हिन्दी अर्थ

क्राउ्ड तवस्यां कुर्वाणं ऐश्वर्य काइटक्षितां स्त्रियम् । कुव॑न्दशम्यां तु नरो ब्राह्मीं क्रियमवाप्तुयात् वेद शभ्रिवाउपप्नुयात्सवन्धिणाशभेनसस्तथा । एकादश्यां पर दानसैश्वयं सततं तथा ॥.

English

In the Sraddha rite, one should give a silver or gold vessel. By giving it, the donor gets ample virtue (as reward).

अध्याय १५०

श्लोक 28

देवा ऊचुः ।कामनाशाज्जगन्नाशो भवितायं चराचरे ।त्रैलोक्यं त्वं पुनः शम्भो उत्पादयितुम् अर्हसि

devā ūcuḥ / kāmanāśājjagannāśo bhavitāyaṃ carācare / trailokyaṃ tvaṃ punaḥ śambho utpādayitum arhasi

हिन्दी अर्थ

तथा विषमजातानां यमलानां तु सर्वेशः। अमावास्यां प्रयस्नेन श्रां कुर्याच्छूचि: सदा ११६ सर्वास्का मानवाप्नोति स्वगंमानन्त्यमश्नुते । ऋत॑ दह्यादसावास्यां सोमसाप्यायनं महत् २०

English

He who makes a gift of a cow that has calved but once, along with a milking pot, at the time of a Sraddha, obtains several cows and the nourishment of the cows.

अध्याय १५०

श्लोक 29

एतच्छ्रुत्वा वचस् तेषां विमृश्य परमेश्वरः ।चिन्तयामास कामस्य विग्रहं भुवि दुर्लभम्

etacchrutvā vacas teṣāṃ vimṛśya parameśvaraḥ / cintayāmāsa kāmasya vigrahaṃ bhuvi durlabham

हिन्दी अर्थ

शत्रुओं का नाथ करनेवाली तथा पापनाशिनी है। जो चतुर्थी तिथि को श्राद्ध करता है वह शत्रुओों का छिल्र देखता है, भर्थात् उसे छात्र की समस्त कट चालों का ज्ञान हो जाता है। पत्यममी तिथि को श्राद्ध करनेवाला उत्तम लक्ष्मी की प्राप्ति करता है ।११-१२। जो षष्ठीतिथि को श्राद्वादि कर्मों को सम्पन्न करते हैं उनकी पूजा प्राप्त करते हैं भऔर गणों के स्वामी होते हैं । जो मनुष्य अष्टमी को श्राद्ध करता है वह सम्पूर्ण समृद्धियाँ प्राप्त करता है। नवमीतिथि को श्राद्ध कर्म करनेवाले को प्रचुर ऐश्वर्य एवं मन के अनुसार चलनेवाली स्त्री की प्राप्ति होती है । दशमी तिथि को श्लवाद्ध करनेवाल। मनुष्य ब्रह्मत्व की लक्ष्मी प्राप्त करता है ।११३-१५। एकादशी तिथि को श्राद्धादि का दान सर्वश्रेष्ठ दात है जो उबत तिथि को न्राद्धादि का दान करता है, वह समस्त वेदों को

English

He who gives the above-mentioned articles at a Sraddha, attains the benefit of a horse-sacrifice. In ordinary Sraddhas or at the time of Darsa Sraddha, one should give to the Brahmanas of good qualities, vessels full of ghee with.very great respect. He shall attain good memory and fine intellect.

अध्याय १५०

श्लोक 30

आजगाम ततः शीघ्रम् अनङ्गो ह्यङ्गतां गतः ।प्राणदः सर्वभूतानां पश्यतां नृपसत्तम

ājagāma tataḥ śīghram anaṅgo hyaṅgatāṃ gataḥ / prāṇadaḥ sarvabhūtānāṃ paśyatāṃ nṛpasattama

हिन्दी अर्थ

प्राप्त करता है, उसके सम्पूर्ण पापकर्मों का विनाश हो जाता है तथा निरन्तर ऐह्वर्य की प्राप्ति होती है। द्वादशीतिथि को श्राद्ध करने से राष्ट्र का कल्याण तथा बअन्नों की प्राप्ति होती कही गई है। त्रयोदशी तिथि को श्राद्धादि कर्म करने से सन्‍्तति, बुद्धि, पशु धारणाशवित, स्वतन्त्रता, उत्तम पुष्टि, दीर्घायु तथा ऐश्वय, की प्राप्ति होती है । जिसके घर के जवान लोग मर गये हों उसे चाहिए कि उन सबों के उद्देश्य से चतुदं शी -

English

He obtains the benefit of many cows yielding potfuls

अध्याय १५०

श्लोक 31

ततः शङ्खनिनादेन भेरीणां निःस्वनेन च ।अभ्यनन्दंस् ततो देवं सुरासुरमहोरगाः

tataḥ śaṅkhaninādena bherīṇāṃ niḥsvanena ca / abhyanandaṃs tato devaṃ surāsuramahoragāḥ

हिन्दी अर्थ

तिथि को श्राद्ध करे । इसी प्रकार हथियारों के द्वारा जिसकी मृत्यु हुई हो, उतके लिये भी चतुर्दशी को श्राद्धकर्म करे ।१६-१८। इसी प्रकार समस्त विषम उत्पन्न होनेवालों (अर्थात् तीन कन्याओं के बाद जो पृत्र उत्पन्न होते हैं, भथवा तीन पुत्रों के बाद जो कम्यायें उत्पन्न होती हैं) तथा जुड़वाँ उत्पन्न होनेवालों के लिये सबंदा पवित्र होकर अमावस्थातिथि को प्रयत्न पूर्वक श्राद्ध करता चाहिए । जो इस प्रकार शक्षाद्वादि कर्म सम्पन्न करते हैं, बे समस्त मनोरथों को प्राप्त करते हैं और अनन्तकाल पर्यन्त स्वर्ग का उपभोग करते हैं। अमावात्या तिथि को ब्राह्मण को भोजन देना चाहिए, चस्द्रमा के लिये भी तपंण करना चांहिये, इसका महान फल होता है

English

By giving the thing wished for, at the time of Sraddha, one gets the benefit of the sacrifice called Pundarlka. By giving a beautiful residential place, one attains the fruit of Rajasuya sacrifice.

अध्याय १५०

श्लोक 32

नमस्ते देवदेवेश कृतार्थाः सुरसत्तमाः ।विसर्जिताः पुनर्जग्मुर् यथागतम् अरिन्दम

namaste devadeveśa kṛtārthāḥ surasattamāḥ / visarjitāḥ punarjagmur yathāgatam arindama

हिन्दी अर्थ

एकाशीतितमोड्ष्याये: ७१५

English

By giving a forest full of flowers and fruits, one obtains sweet smelling substances. By giving wells, parks, tanks, fields, cowsheds and houses, one rejoices in heaven as long as the moon and the stars stay. By giving beds and bedsheets embellished with jewels, one attains endless heavenly pleasure. Pitps are pleased with him. He is worshipped (honoured) by kings. He flourishes with wealth and grain.

अध्याय १५०

श्लोक 33

गतेषु सर्वदेवेषु कामदेवो ऽपि भारत ।तपश्चचार विपुलं नर्मदातटमाश्रितः

gateṣu sarvadeveṣu kāmadevo 'pi bhārata / tapaścacāra vipulaṃ narmadātaṭamāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

एंबमाप्यायितः सोमस्त्रील्लोकान्धारयिष्यति । सिद्धचा रणगन्धर्वे: स्तुयमानस्तु नित्यशः ३२१ स्तवं: पुष्पेम॑नोज्ञेश्न सर्वकामपरिच्छदे: । नुत्यवादि्रगीतेश्व अप्सरोभिः सहखशः उपक्रीडविमानेस्तु पितृभक्त दृढब्नतम् । स्तुबन्ति देवगन्धर्वा: सिद्धसंघाश्व त॑ सदा

English

Woollen and silk garments, excellent blankets, deer-skin, gold brocade, coloured cloth and wool—these should be given to Brahmanas after duly feeding them. A person who has faith then gets the benefit of a hundred Vajapeya Yajiias. 1

अध्याय १५०

श्लोक 34

तपोजपकृशीभूतो दिव्यं वर्षशतं किल ।महाभूतैर्विघ्नकरैः पीड्यमानः समन्ततः

tapojapakṛśībhūto divyaṃ varṣaśataṃ kila / mahābhūtairvighnakaraiḥ pīḍyamānaḥ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

पितृभक्तस्त्वमावस्यां सर्वान्कामानवाप्नुयात् । प्रत्यक्षमचितास्तेन भवन्ति पितरः सदा २४ पितृदेवा मधा यस्मात्तस्मात्तास्वक्षय स्मृतम् । पित्यं कुर्व॒न्ति तस्थां तु विशेषेण विचक्षणाः

English

Many beautiful women, sons, servants and attendants, nay all living beings, become submissive to him in this world. He becomes free from all ailments.

अध्याय १५०

श्लोक 35

आत्मविघ्नविनाशार्थं संस्मृतः कुण्डलेश्वरः ।चकार रक्षां सर्वत्र शरपाते नृपोत्तम

ātmavighnavināśārthaṃ saṃsmṛtaḥ kuṇḍaleśvaraḥ / cakāra rakṣāṃ sarvatra śarapāte nṛpottama

हिन्दी अर्थ

तस्मान्मघां वे वाउछन्ति पितरो नित्यमेव हि। पितृदेवतभक्ता ये तेईपि यान्ति परां गतिमू इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते श्राउ्धकल्पे तिथिविशेषे श्र (द्धफलवर्णनं नार्मकाशीतितमोअध्यायः ।।७०॥॥।

English

He who gives silk, woven silk, cotton and velvet cloth, in Sraddhas obtains the fulfilment of all his cherished desires.

अध्याय १५०

श्लोक 36

ततस्तुष्टो महादेवो दृढभक्त्या वरप्रदः ।वरेण छन्दयामास कामं कामविनाशनः

tatastuṣṭo mahādevo dṛḍhabhaktyā varapradaḥ / vareṇa chandayāmāsa kāmaṃ kāmavināśanaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार तपित होकर सोमदेव तीनों लोकों को धारण करेंगे। दुढ़ब्नत परायण, पितरों में भक्ति रखनेवाले व्यकित की सिद्ध, चारण और गस्धर्वगण नित्य स्तुति करते हैं ।२१। उनके साथ सहस्नों अप्सराएं अपने नाच, गान, वाद्य, स्तुति, मनोहर पुष्प निचय एवं सभी श्रकार के अभिलषित वस्त्रादिकों से उसे प्रसन्न करती हैं ।

English

He dispels all inglorious things and misfortunes im¬ mediately like the darkness at the time of sunrise. He shines on an aerial chariot like the moon among stars.

अध्याय १५०

श्लोक 37

ज्ञात्वा तुष्टं महादेवमुवाच झषकेतनः ।प्रणतः प्राञ्जलिर् भूत्वा देवदेवं त्रिलोचनम्

jñātvā tuṣṭaṃ mahādevamuvāca jhaṣaketanaḥ / praṇataḥ prāñjalir bhūtvā devadevaṃ trilocanam

हिन्दी अर्थ

उसकी सेवा में उपस्थित रहते हैं। पितरों में भक्ति रखनेवाला मनुष्य अमावास्था को सभी मनोरथ प्राप्त करता है बयोंकि सबंदा उस तिथि को पितरगण उससे प्रत्यक्षतः पूजा प्राप्त करते हैं ।२२-२४। मघा नक्षत्र पितरों को अभीष्ट सिद्धि देनेवाला है, अतः उक्त नक्षत्र के दिन किया गया श्राद्ध अक्षय कहा जाता है। इसी लिये विवेकशील लोग विशेषतया उसी नक्षत्र में पितरों के श्राद्धादि कर्म सम्पन्न करते हैं। यही कारण है कि पितरगण भी उसे सर्वदा अधिक पसन्द करते हैं। पितरों और देवताओों में जो केवल भव्िति रखते हैं, वेभी परमगति

English

A garment is praised by all Devas; garment belongs to all the deities. In the absence af cloth, no holy rite—neither Yajiias nor (study of) Vedas nor penances, can be performed.

अध्याय १५०

श्लोक 38

यदि तुष्टो ऽसि देवेश यदि देयो वरो मम ।अत्र तीर्थे जगन्नाथ सदा संनिहितो भव

yadi tuṣṭo 'si deveśa yadi deyo varo mama / atra tīrthe jagannātha sadā saṃnihito bhava

हिन्दी अर्थ

प्राप्त करते हैं

English

Hence clothes should be given at the time of Sraddha particularly. He obtains all those things—Yajiias, the Vedas and the penances.

अध्याय १५०

श्लोक 39

तथेति चोक्त्वा वचनं देवदेवो महेश्वरः ।जगामाकाशमाविश्य स्तूयमानो ऽप्सरोगणैः

tatheti coktvā vacanaṃ devadevo maheśvaraḥ / jagāmākāśamāviśya stūyamāno 'psarogaṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

श्री बायुमहापुराण के श्राद्धकल्प में तिथिविशेष सम्बन्धी श्राद्धफल वर्णन नामक ७३६ . बायुपुराणम

English

The promise of the fruit of sacrifices (which require a lot of trouble and expenditure) for dim must have resulted as a disincentive for perfor¬ mance of sacrifice and these Brahmanical advocates of such cheap and easy

अध्याय १५०

श्लोक 40

गते चादर्शनं देवे कामदेवो जगद्गुरुम् ।स्थापयामास राजेन्द्र कुसुमेश्वरसंज्ञितम्

gate cādarśanaṃ deve kāmadevo jagadgurum / sthāpayāmāsa rājendra kusumeśvarasaṃjñitam

हिन्दी अर्थ

पमस्तु यानि श्राद्धानि प्रोवात शिवबिस्दवे । तानि में शूणु कात्स्स्यंन नक्षत्रेषु पुृथकपूथकू..

English

He who always gives them during Sraddhas with faith and purity, obtains all his desires and all realms H f *

अध्याय १५०

श्लोक 41

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा ह्युपवासपरायणः ।चैत्रमासे चतुर्दश्यां मदनस्य दिने ऽथवा

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā hyupavāsaparāyaṇaḥ / caitramāse caturdaśyāṃ madanasya dine 'thavā

हिन्दी अर्थ

श्राउ्ड यः कत्तिकायोगे करोति सततं नरः । अग्नीनाधाय सापत्यो जायते स गतज्बरः २ अपत्यकासो रोहिण्यां सौम्पेनोजस्विता भवेत् । प्रायशः क्ररकर्मा तु चाउ5द्रायां श्राद्धभाचरेतू क्षेत्रभागी भवेत्पुत्री भ्राद्धं कुव॑स्पुनरवंसों। धनधान्यसमाकीर्ण: पुत्रपौत्नसमाकुलः ४ तुष्टिकामः पुनस्तिष्ये श्राउ्ध कुबोत मानवः । आश्लेषासु पित॒नच्य वीरान्पुत्नानवाप्नुयात् ३४ श्रेष्ठों भवति ज्ञातीनां भधासु श्राद्धमाचरन् । फाट्गुनोषु पितनर्च्य सोभाग्य लभते लभते नरः

English

By giving cooked rice, milk pudding, ghee, honey, fruits

अध्याय १५०

श्लोक 42

प्रभाते विमले प्राप्ते स्नात्वा पूज्य दिवाकरम् ।तिलमिश्रेण तोयेन तर्पयेत् पितृदेवताः

prabhāte vimale prāpte snātvā pūjya divākaram / tilamiśreṇa toyena tarpayet pitṛdevatāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रधानशोलः सापत्य उत्तरासु करोति यः। स सत्सु मुख्यो भवति हस्ते यस्तपंयेत्पित॒न्

English

Beaten rice mixed with sugar and milk is always of everlasting benefit. If Masuradal and Ki-sara (rice cooked with

अध्याय १५०

श्लोक 43

कृत्वा स्नानं विधानेन पूजयित्वा च तं नृप ।पिण्डनिर्वपणं कुर्यात् तस्य पुण्यफलं शृणु

kṛtvā snānaṃ vidhānena pūjayitvā ca taṃ nṛpa / piṇḍanirvapaṇaṃ kuryāt tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

विशेष नक्षत्रों में किये गये श्राद्धों के फरले ग्रेहस्पतिं बोले+विशेष नक्षत्रों में पृथक्-पृथक् श्राद्ध के करने से क्‍या फंल होते हैं--इस

English

Fried grain-powder, fried rice, pies, cooked horse-gram dishes all mixed with curds-He who gives all these in Sraddha obtains the treasure of Kubera.

अध्याय १५०

श्लोक 44

सत्त्रयाजिफलं यच्च लभते द्वादशाब्दिकम् ।पिण्डदानात्फलं तच्च लभते नात्र संशयः

sattrayājiphalaṃ yacca labhate dvādaśābdikam / piṇḍadānātphalaṃ tacca labhate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

मनुष्य सबंदा कृत्तिका नक्षत्र के योग में श्राद्ध करता है, और अग्नि की स्थापना करता है, वह अपनी सन्तततियों समेत चिन्ताओं एवं व्याधियों से मुक्त होंता है।१-२। सन्‍्तान की कामना से रोहिणी में श्राद्ध करना चाहिए । मृगशिरा नक्षत्र में श्राद्ध करने से तेजस्बिता का लाभ होता है। आरर्द्रो में श्राद्धकार्य प्रायः करकर्म करने वाले ही करते हैं। पुनव॑ंसु नक्षत्र में श्राद्ध करनेवाला क्षेत्र का अधिकारी और पुत्रवान् होता है।

English

The man who offers the most excellent foods and edibles, beverages, lambatives and juicy things, becomes the most excel¬ lent of all.

अध्याय १५०

श्लोक 45

अङ्कुल्लमूले यः पिण्डं पित्ःनुद्दिश्य दापयेत् ।तस्य ते द्वादशाब्दानि तृप्तिं यान्ति पितामहाः

aṅkullamūle yaḥ piṇḍaṃ pitḥnuddiśya dāpayet / tasya te dvādaśābdāni tṛptiṃ yānti pitāmahāḥ

हिन्दी अर्थ

घनवान्यादि से समन्वित तथा पुत्र पोत्रादि से संयुक्त होता हैं ।३-४॥ सन्‍्तोष लाभ की अभिलाषा से मनुष्य को पृष्य नक्षत्र में श्राद्ध करना चाहिए। अश्लेषा में पितरों की पूजा करके मनुष्य वीर पुत्रों का लाभ करता है। मघा में श्राद्ध करनेबाला अपनी जाति में सर्वेश्रेष्ठ होता है। फाल्युनी नक्षत्रों में पितरोंकी पूजा कर मनुष्य सौभाग्य की प्राप्ति करता है ।५-६। उत्तरा नक्षत्रों में श्राद्ध करनेवाले अपने सन्‍्तान समेत समाज का प्रमुख व्यक्ति होता है जो हस्त नक्षत्र में पितरों की पूजा करता है वह सत्पुरुषों में अग्रगण्य होता है। जो चित्रा

English

The devotee, with palms joined in reverence, should offer the best seat to the guests while feeding. He shall then attain the excellent fruit of all the rites and Yajnas.

अध्याय १५०

श्लोक 46

कृमिकीटपतङ्गा ये तत्र तीर्थे युधिष्ठिर ।प्राप्नुवन्ति मृताः स्वर्गं किं पुनर्ये नरा मृताः

kṛmikīṭapataṅgā ye tatra tīrthe yudhiṣṭhira / prāpnuvanti mṛtāḥ svargaṃ kiṃ punarye narā mṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

आषाढाभिश्रोत्तराभिरवीतशोको भवेज्नर: । श्रवर्णन तु लोकेषु प्राप्नृपात्परमां गतिम् (१११

English

A dish consisting of sesamum and grain (mixture of rice peas with a few spices)— MW, The person who ofTers food attains an aerial chariot resembling the mid-day sun and fitted with swans for three crores ofKalpas (crores of maidens in Bd. P.).

अध्याय १५०

श्लोक 47

संन्यासं कुरुते यो ऽत्र जितक्रोधो जितेन्द्रियः ।कुसुमेशे नरो भक्त्या स गच्छेच्छिवमन्दिरम्

saṃnyāsaṃ kurute yo 'tra jitakrodho jitendriyaḥ / kusumeśe naro bhaktyā sa gacchecchivamandiram

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते नक्षत्रविशेषे श्राद्धफलवर्णनं नाम हचशीतितमोध्ध्याय: ॥5र।। नक्षत्र में श्राद्ध करता है वह रूपवान पुत्रों को देखता (प्राप्त करता) है। जो विद्वान पुरुष स्वाती नक्षत्र में भ्राद्ध करता है, वह लाभ प्राप्त करता है ।७-८। मनुष्य को पुत्र प्राप्ति के लिये विशाखा नक्षत्र में श्राद्ध करने की अभिलाषा करनी चाहिए । अनुराधा में श्राद्ध करनेवाला मनुष्य राज्य का विस्तार करता है। जो सदा ज्येष्ठा नक्षत्र में श्राद्ध करता है वह उत्तम आधिपत्य प्राप्त करता है। मूलनक्षत्र से लोग अरोग्य की इच्छा करते हैं,

English

There is nothing here greater than the gift of food and they are sustained by it without any doubt.

अध्याय १५०

श्लोक 48

तत्र दिव्याप्सरोभिश्च देवगन्धर्वगायनैः ।क्रीडते सेव्यमानस्तु कल्पकोटिशतं नृप

tatra divyāpsarobhiśca devagandharvagāyanaiḥ / krīḍate sevyamānastu kalpakoṭiśataṃ nṛpa

हिन्दी अर्थ

आषाढ़ा में महान् यश प्राप्त करते हैं, उत्तराषाढ़ नक्षत्र में श्राद्ध करने वाला मनुष्य शोक रहित होता है। श्रवण नक्षत्र में आाद्ध करने से सभी लोकों में परम गति प्राप्त होती है ।९-१ १ धनिष्ठा नक्षत्र में श्राद्ध करनेवाला राज्य और विपुल घन प्राप्त करता है। अभिजित् नक्षत्र में श्राद्ध करनेवाला अंगों समेत समस्त बेदों का अधिकारी होता है । शतभिष् नक्षत्र में श्राद्ध क्रने से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। पूर्व भाद्रपद में श्वाद्ध करनेबाला

English

There is no gift nobler than the gift of life. The set of the three worlds lives by means of food. That is the fruit of offering cooked rice. All the worlds are founded (dependent) on food. It is the fruit of the gift of the worlds. Food is Prajapati himself. All these worlds are pervaded by it. Hence a gift on par with that of food has never been before nor will there be any ever in future.

अध्याय १५०

श्लोक 49

पूर्णे चैव ततः काल इह मानुष्यतां गतः ।जायते राजराजेन्द्रैः पूज्यमानो नृपो महान्

pūrṇe caiva tataḥ kāla iha mānuṣyatāṃ gataḥ / jāyate rājarājendraiḥ pūjyamāno nṛpo mahān

हिन्दी अर्थ

अजावबिक (?) फल प्राप्त करता है।१२-१३। उत्तरा भाद्रपद में श्राद्ध कर्ता श्राद्ध करने के फलस्वहप सहस्रों गोंएँ प्राप्त करता है। रेवती में श्राद्ध करनेवाला बहुत सा द्रव्य प्राप्त करता है। इसी प्रकार अश्विनी में अश्व कौर भरणी में उत्तम आयु प्राप्त करता है। इस श्राद्ध विधि का विधिवत् पालन कर शशविन्दु ने इस समस्त पृथ्वी को प्राप्त किया था और उसकी प्रत्तशा की थी १४-१५। ' एतदर्धस्थान इदमर्थम् -- कुत्स्तां सलभतोस्‍्कृष्टां लब्ध्वा च प्रशशास तासू ई ति! ह: पुस्तके ।

English

A man devoted to Pitrs immediately attains all the jewels, vehicles and women on the earth.

अध्याय १५०

श्लोक 50

सुरूपः सुभगो वाग्मी विक्रान्तो मतिमाञ्छुचिः ।जीवेद्वर्षशतं साग्रं सर्वव्याधिविवर्जितः

surūpaḥ subhago vāgmī vikrānto matimāñchuciḥ / jīvedvarṣaśataṃ sāgraṃ sarvavyādhivivarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

छरेद द वायुपुराण॑म्

English

One should with palms joined in reverence, always offer- shelter to the guests. They are the Devas awaiting in thousands, for the divine hospitality. He who makes all gifts (mentioned before) shall be the sole emperor on the earth. He shall become happy even if he makes three, two or even one of those gifts.

अध्याय १५०

श्लोक 51

एतत्पुण्यं पापहरं तीर्थकोटिशताधिकम् ।कुसुमेशेति विख्यातं सर्वदेवनमस्कृतम्

etatpuṇyaṃ pāpaharaṃ tīrthakoṭiśatādhikam / kusumeśeti vikhyātaṃ sarvadevanamaskṛtam

हिन्दी अर्थ

ध्नाद्ध पे ज्निज्ञव्कात्तिव्कसुप्ल्तिस्ताध्यलड्रलय व्विछोष्पगाया धश्ना छ्हा- हवींषि भ्रा्धकाले तु यानि श्राद्धविदो विदुः । तानि मे शुण सर्वाणि फल॑ चेषां यथावलम्

English

Making gifts is the greatest virtue (Dharma). It is honourd and revered by good men. The Lordship of the three worlds is to be attained only through Dana.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 150
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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