Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
155
अध्याय 155 / 232

Adhyaya 155

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अध्याय १५५

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कलकलेश्वरतीर्थफलमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुःपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १५५ श्रीमार्कण्डेय उवाच: अतः परं प्रवक्ष्यामि सर्वतीर्थादनुत्तमम् ।उत्तरे नर्मदाकूले शुक्लतीर्थं युधिष्ठिर

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe kalakaleśvaratīrthaphalamāhātmyavarṇanaṃ nāma catuḥpañcāśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 155 śrīmārkaṇḍeya uvāca: ataḥ paraṃ pravakṣyāmi sarvatīrthādanuttamam / uttare narmadākūle śuklatīrthaṃ yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

पितृ भ्र यो यजेज्धूकत्या पितरः पुजयन्ति तम्॥ पितरः पुष्टिकामस्थ प्रजाकामस्थ॒ वा पुनः ॥ पुष्टि प्रजाश्न स्वर्ग व प्रबच्छरित पितामहाः ऑफ परम. या नायाब -अका पाना जन». की" 2-०-करन+-२कअ«-ननवलानन- नागिन ममता 4नरमक ५ + के ताप-वालप + न-जमक पक -+ाका५ ५१3०५.

English

During the bright half (of the month), the Sraddha is to be performed in the forenoon by the skilful performer of a Sraddha. During the dark half, it should be performed in the afternoon. In any case the Rauhina period (the 4th Muhurta of the day), should not be transgressed.

अध्याय १५५

श्लोक 2

तस्य तीर्थस्य चान्यानि पुण्यत्वाच्छुभदर्शनात् ।पृथिव्यां सर्वतीर्थानि कलां नार्हन्ति षोडशीम्

tasya tīrthasya cānyāni puṇyatvācchubhadarśanāt / pṛthivyāṃ sarvatīrthāni kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm

हिन्दी अर्थ

के लिये इससे बढ़कर सरल उपाय कोई दूसरा नहीं है। इस लोक में इसके द्वारा परम संतोष की प्राप्ति होती है-+अतः यत्नपुबंक इसका अनुष्ठात करता चाहिए ।१०४-१०५॥ आलस्य-रहित होकर पर्ष-सल्धियों में जो व्यक्ति इस श्राद्ध विधि का पाठ सावध।नी एवंक सभा आदि में करता है, वह परम तेजस्वी मनुष्य संततिवाव होता है, ओर देवताओं के धमान उसे पवित्र लोक की प्राप्ति होती है ।१०६। जिस् अजन्‍्मा

English

Thus the great and noble souls, the seers of time and place, the Pitrs of great Yoga (yogic power) and great virility should be worshipped.

अध्याय १५५

श्लोक 3

युधिष्ठिर उवाच: तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।भ्रातृभिः सहितः सर्वैस् तथान्यैर् द्विजसत्तमैः

yudhiṣṭhira uvāca: tasya tīrthasya māhātmyaṃ śrotumicchāmi tattvataḥ / bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvais tathānyair dvijasattamaiḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान् स्वयम्भू ने श्राद्ध की पुनीत विधि बतलाई है, उसे हम तमस्कार करते हैं ।!०७। महान् योगेश्वरों के चरणों में हम सर्बदा प्रणाम करते हैं । है तात ये पित्तरमण देवताओं के भी देवता हैं, वे नाशहीन पितरगण इन सात स्थातों में नित्य निवास करते हैं। वे सब परम महात्मा तथा प्रजापति के पुत्र हैं, इनका सर्वप्रथम गण योगियों का है, अतः वे नित्य योगवर्धन के नाम से विख्यात हैं ।१००-१०९। द्वितीय गण देवताओं का, तृतीय देवताओं के शत्रुओं का, शेष अन्य वर्णियों के हैं--इन सबो का वर्णन कर चुका । इन सब लोकों में अवस्थित रहकर देवगण इन सबों की पूजा करते हैं। चारों आश्रम में निवास करते वाले क्रमपूबंक इनकी पूजा करते हैं, चारों वर्ण के लोग भी इन सबों की विधिपूर्वक पूजा करते हैं, इसी प्रकार समस्त म्लेच्छ जाति बाले और संकरवर्ण भी उन सबों की पूजा करते हैं। जो भक्ति पू्वक इन पितरों की पूछा

English

A person always devoted to Pitrs attains the excellent Yoga. After eschewing both auspicious and inauspicious actions they attain salvation through meditation.

अध्याय १५५

श्लोक 4

श्रीमार्कण्डेय उवाच: शुक्लतीर्थस्य चोत्पत्तिमाकर्णय नरेश्वर ।यस्य संदर्शनादेव ब्रह्महत्या प्रलीयते

śrīmārkaṇḍeya uvāca: śuklatīrthasya cotpattimākarṇaya nareśvara / yasya saṃdarśanādeva brahmahatyā pralīyate

हिन्दी अर्थ

करता है, उसकी पूजा पितरगण स्वयं करते हैं, पुष्टि एवं पूजा की कामना करने वाले को ये पितामहादि प्ितिरगण सब प्रकार से पुष्टि, प्रजाएँ और स्वर प्रदान करते हैं ।११०-११३। पुत्र के लिए पितरों का कार्य

English

It is for the sake of (promotion of) sacrifices that after deluding the universe, it (Yoga) was eschewed and kept in the cavity (of the heart, i.e. kept secret) by the noble-souled Kasyapa.

अध्याय १५५

श्लोक 5

नर्मदा सरितां श्रेष्ठा सर्वपापप्रणाशिनी ।यच्च बाल्यं कृतं पापं दर्शनादेव नश्यति

narmadā saritāṃ śreṣṭhā sarvapāpapraṇāśinī / yacca bālyaṃ kṛtaṃ pāpaṃ darśanādeva naśyati

हिन्दी अर्थ

देवकार्यादपि सुनो पित॒का्य विशिष्यते देवतानां हि पितरः पू्बंसाप्यायन स्वयम् ११४ न हि योगगतिः सुक्ष्मा पितुर्णां च परा गतिः। तपसा विप्रकृष्टे न दृश्यते मांसचक्षुषा सर्वेषां राजतं पात्रमथवा रजतान्वितम् । पावन ह्यत्तमं प्रोक्तं देवानां पितृभिः सह ११६ येथां दास्पन्ति पिण्डांस्त्रीन्बास्धवा नासगोन्रतः । सुम्रों कुशोत्तरायां च अपसब्यविधानत:

English

O excellent one among the knowers of Yoga, that nectarine (or immortal) Yoga, the eternal great Dharma was promulgated by Sanatkumara.

अध्याय १५५

श्लोक 6

मोक्षदानि न सर्वत्र शुक्लतीर्थमृते नृप ।शुक्लतीर्थस्य माहात्म्यं पुराणे यच्छ्रुतं मया

mokṣadāni na sarvatra śuklatīrthamṛte nṛpa / śuklatīrthasya māhātmyaṃ purāṇe yacchrutaṃ mayā

हिन्दी अर्थ

एवमेधा स्थिता संस्था बरह्मणा परमेष्ठिना । पित॒णामादिसगगंस्तु लोकानासक्षयाथिनाम्

English

It is a great esoteric secret of the Devas. It is the grea¬ test resort of the sages. It can always (be attained) by the devo¬ tees of Pitrs through filial devotion, piety and endeavour.

अध्याय १५५

श्लोक 7

समागमे मुनीनां तु देवानां हि तथैव च ।कथितं देवदेवेन शितिकण्ठेन भारत ।कैलासे पर्वतश्रेष्ठे तत्ते संकथयाम्यहम्

samāgame munīnāṃ tu devānāṃ hi tathaiva ca / kathitaṃ devadevena śitikaṇṭhena bhārata / kailāse parvataśreṣṭhe tatte saṃkathayāmyaham

हिन्दी अर्थ

इत्येते पितरो देवा देवाभश्व पितरः पुतः । दोहित्रां यजमानाश्र प्रोक्ताश्नव सयाइनघा: ११२२ लोका दुह्तिरश्येव दौहित्राश्व सुतास्तथा दानानि सह झोचेत तीर्थानि च फलाति सच १२३ अक्षयत्वं ट्विजाश्वेब यायावरविधिस्तथा । प्रोक्त सर्व यथान्यायं यथा ब्रह्माअब्नवीत्पुरा । रकमाज-ञकृतक-ग न - "आन वपप्यवान "कम्मयन्ान नकल मन भ+-००- ००-५५ करत ५० नानान न पट जोक ५ ७ न पिननापीयन- ५ +मौकियन “० पकूनननियानभपनाा क- पनरीननाण2ममकीण " प०५त निरपिियनीण पर नणकनतता+ फातक “लता वि लकिनश पल एएाण गण हा

English

There is no doubt in this that one who is devoted to Pitrs shall, with endeavour, attain everything of that Yoga in essence.

अध्याय १५५

श्लोक 8

पुरा कृतयुगस्यादौ तोषितुं गिरिजापतिम् ।तपश्चचार विपुलं विष्णुर्वर्षसहस्रकम् ।वायुभक्षो निराहारः शुक्लतीर्थे व्यवस्थितः

purā kṛtayugasyādau toṣituṃ girijāpatim / tapaścacāra vipulaṃ viṣṇurvarṣasahasrakam / vāyubhakṣo nirāhāraḥ śuklatīrthe vyavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

देवकाय की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण हे, देवताओं से पूर्व पितरों को सन्तुष्ठ करने की बात कही जाती है। पितरों की परम सूक्ष्म योगगति उत्कृष्ट तपस्या के प्रभाव से वंचित मांस के नेत्रों से नहीं दिखाई पड़ती अर्थात् उसे देखने के लिये परम कठोर तप की आवश्यकता है। समस्त देवताओं और पितरों के लिए चाँदी का पात्र विहित है, अभाव में चाँदी से समन्वित (मढ़ा हुआ) होना चाहिए । ऐसे पात्र इनके कार्यों में परम पुनीत कहे

English

To whom are the Sraddhas to be offered; which are the things that yield great benefits when given; what are the holy centres and sacred rivers wherein the Sraddha offered bears everlasting benefits; by what means does one attain heaven—all these have been mentioned to you in brief.

अध्याय १५५

श्लोक 9

ततः प्रत्यक्षतामागाद्देवदेवो महेश्वरः ।प्रादुर्भूतस्तु सहसा तत्र तीर्थे नराधिप

tataḥ pratyakṣatāmāgāddevadevo maheśvaraḥ / prādurbhūtastu sahasā tatra tīrthe narādhipa

हिन्दी अर्थ

जते हैं। जिनके परिवारवर्ग के लोग नाम और गोत्र का उच्चारण कर विधिपूर्वक अपसव्य होकर कुश बिछी भूमि पर तीन पिण्डदान करते हैं, उनके वे तीनों पिण्ड सर्वत्र वर्तमान रहनेबाले पितरों को प्रसन्न करते हैं। जन्यु (मनुष्य) जो आहार करता है, वही आहार उसके पितर का होना चाहिए ।११४-११४। जिस प्रकार चारागाह में सैकड़ों गौओं में छिपी हुई अपनी माता को बछड़ा पा जाता है, उसी प्रकार श्राद्धकमे में दिये गये पदार्थों को मंत्र वहाँ पर पहुंचा देता है, जहाँ वह जीव अवस्थित रहता है। पितरों के नाम, गोत्र और मंत्र श्राद्ध में दिये गये अन्न को उसके पास ले जाते हैं, चाहे वे सैकड़ों योनियों में क्‍यों न गये हों पर श्राद्ध के अन्नादि से उसकी तृत्ति होती है। परमेष्ठी पितामह ब्रह्मा ने इसी प्रकार की श्राद्ध की मर्यादा स्थिर की है, अक्षय लाभ की प्राप्ति के अभिलाषी लोगों के लिये पितरों की यह आदि सृष्टि हुई ।११८-१२१। ये पितरगण ही देवस्वरूप हैं

English

The man who after hearing this explanation of the procedure of Sraddhas, becomes malicious, is an atheist envelo¬ ped in darkness. He will drown himself in the terrible hell.

अध्याय १५५

श्लोक 10

क्रोशद्वयमिदं चक्रे भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ।तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः

krośadvayamidaṃ cakre bhuktimuktipradāyakam / tasmiṃstīrthe naraḥ snātvā mucyate sarvakilbiṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

और देवगण ही पितर स्वरूप हैं। निष्पाप ऋषिगण, दौहित्र (नाती) गण उन पितरों के यजमान हैं। समस्त लोक उनकी पुत्री, नाती और पूत्र के रूप में है। श्राद्धकर्म में पवित्रता, दान, तीर्थ, फल, अक्षय फल प्राप्ति, द्विंज गण, पर्यटन विधि आदि सभी आवश्यक विषयों की चर्चा पूथ्वकाल में ब्रह्माजी ने जिस प्रकार को थी, उन सब विधि को मैं आप लोंगों से बतला चुका

English

He who has perfectly controlled his mind, finds all his great ailments terminated. He who is not mindful of the Airamas (stages in life) stated in the Vedas attains the Kumbhlka hell. He attains the status of a thief and gets his tongue cut.

अध्याय १५५

श्लोक 11

गङ्गा कनखले पुण्या कुरुक्षेत्रे सरस्वती ।ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा

gaṅgā kanakhale puṇyā kurukṣetre sarasvatī / grāme vā yadi vāraṇye puṇyā sarvatra narmadā

हिन्दी अर्थ

७४५२ बायुपुराणम् सत्रे वे बितते पुर्व॑ तदा वर्बसहस्रिके । यस्मिन्गहपतिह्यसीद्ब्ह्मा वे देवता प्रभुः

English

Those who censure Yoga become lumps of clay in the ocean 1 and decay as long as the earth exists. Hence, this is the Dharma (virtue) intended in the Sraddha that it should be per¬ formed by a man with faith (in it).

अध्याय १५५

श्लोक 12

सर्वौषधीनामशनं प्रधानं सर्वेषु पेयेषु जलं प्रधानम् ।निद्रा सुखानां प्रमदा रतीनां सर्वेषु गात्रेषु शिरः प्रधानम्

sarvauṣadhīnāmaśanaṃ pradhānaṃ sarveṣu peyeṣu jalaṃ pradhānam / nidrā sukhānāṃ pramadā ratīnāṃ sarveṣu gātreṣu śiraḥ pradhānam

हिन्दी अर्थ

संवत्सरशतान्पच्च तत्रोपेता इति श्रुतिः। श्लोकाश्वात्र पुरा गीता ऋषिभिन्रह्मवादिभिः

English

Scandalisation of Yogins should be scrupulously avoided. By scandalising (them), a person becomes a worm and rolls there itself.

अध्याय १५५

श्लोक 13

स्नातस्यापि यथा पुण्यं ललाटं नृपसत्तम ।शुक्लतीर्थं तथा पुण्यं नर्मदायां युधिष्ठिर

snātasyāpi yathā puṇyaṃ lalāṭaṃ nṛpasattama / śuklatīrthaṃ tathā puṇyaṃ narmadāyāṃ yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

दीक्षितस्य तदा सत्रे ब्रह्मण: परमात्मनः । तत्नेव जातमत्युग्न पितुणाम्क्षयाथिनास् ॥ लोकानां व् हितार्थाय ब्रह्मणा परमेष्ठिना इति श्रीमहापुराणे बायुप्रोक्ते श्राद्धकत्पे नाम व्यशीतितमोअध्याय: ।5३)।।

English

There is no doubt in this that he who censures Yoga, the cause of salvation unto those who meditate, goes to terrible hell. He who listens to it (the censure), also falls into the hell.

अध्याय १५५

श्लोक 14

सरितां च यथा गङ्गा देवतानां जनार्दनः ।शुक्लतीर्थं तथा पुण्यं नर्मदायां व्यवस्थितम्

saritāṃ ca yathā gaṅgā devatānāṃ janārdanaḥ / śuklatīrthaṃ tathā puṇyaṃ narmadāyāṃ vyavasthitam

हिन्दी अर्थ

बहस्पति ने कह्ा--प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा पूछे जाने पर महर्षि अंग्रिरा.ने पितरों के

English

By denigrating masters of Yoga, a man certainly falls into the hell surrounded by darkness and terrible to behold.

अध्याय १५५

श्लोक 15

चतुष्पदानां सुरभिर्वर्णानां ब्राह्मणो यथा ।प्रधानं सर्वतीर्थानां शुक्लतीर्थं तथा नृप

catuṣpadānāṃ surabhirvarṇānāṃ brāhmaṇo yathā / pradhānaṃ sarvatīrthānāṃ śuklatīrthaṃ tathā nṛpa

हिन्दी अर्थ

एक सहुस्न वर्ष तक चलनेवाला महायज्ञ सम्पन्न हुआ था, जिसमें गृहपति होकर भगवान् ब्रह्मा पाँच सो वर्षों तक देवताओं पर प्रभुत्व स्थापित किये रहे । ब्रह्मबेत्ता गण इस विषय में कुछ इलोक गाते हैं (जिसका आशय निम्न प्रकार है) उस महान यज्ञ में परमात्मा परमेष्ठी भगवान् ब्रह्मा के दीक्षित होने पर उन्हीं से समस्त लोकों के कल्याणार्थ, अक्षय लाभ के प्रार्थी पितरों का उत्तम जन्म वहीं पर सम्पन्न हुआ

English

There is no doubt about it that he who pays heed to the vilification of masters of Yoga of fully controlled selves, be¬ comes submerged in the Kumbhlpaka hell for a long time.

अध्याय १५५

श्लोक 16

ग्रहाणां तु यथादित्यो नक्षत्राणां यथा शशी ।शिरो वा सर्वगात्राणां धर्माणां सत्यमिष्यते

grahāṇāṃ tu yathādityo nakṣatrāṇāṃ yathā śaśī / śiro vā sarvagātrāṇāṃ dharmāṇāṃ satyamiṣyate

हिन्दी अर्थ

खूत बोले---अपने बुद्धिमान् पुत्र से पूछने पर इस प्रकार पूर्व काल में बृहस्पति ने पितरों के वक्ष का जो बर्णन किया था, वही मैंने आप लोगों को बतलाया । अब इसके उपरास्त मैं वरुण के :वंश का वर्णन

English

One should eschew hatred for Yogins mentally, verbally and physically. He will reap the benefit of the same here itself

अध्याय १५५

श्लोक 17

तथैव पार्थ तीर्थानां शुक्लतीर्थमनुत्तमम् ।दुर्विज्ञेयो यथा लोके परमात्मा सनातनः

tathaiva pārtha tīrthānāṃ śuklatīrthamanuttamam / durvijñeyo yathā loke paramātmā sanātanaḥ

हिन्दी अर्थ

कर रहा हूँ । सुनिये श्री बायुमहापुराण में श्रा्धकल्पतामक तिरासोयाँ अध्याय समाष्स ॥८३।॥।

English

A person who has mastered (all lores) does not get (realize) the Atman. He wanders within the three worlds due to his own actions. A person who has mastered Rgveda, Yajurveda, Samaveda and all their ancillary subjects does not attain Brahman which is devoid of changes and aberrations ( avikaram ) and therefore, becomes distressed.

अध्याय १५५

श्लोक 18

सुसूक्ष्मत्वादनिर्देश्यः शुक्लतीर्थं तथा नृप ।मन्दप्रज्ञत्वमापन्ने महामोहसमन्वितः

susūkṣmatvādanirdeśyaḥ śuklatīrthaṃ tathā nṛpa / mandaprajñatvamāpanne mahāmohasamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

एवमुक्तस्ततः सृतस्तथा।सोौ लोमहषंणः । शुश्रूषासुत्तराख्याने ऋषीणां वाक्यकोवबिदः ॥

English

Verses 54-57, and vv. 61-71 show the blind faith of Puranic writers in Yogins. Since the times of Vasisjha Dh.S. XI. 17, Yatis (recluses) and Yogins had a special place of honour among the invitees to a Sraddha. But Purana writers have prohibited denigration of Yogis even orally.

अध्याय १५५

श्लोक 19

शुक्लतीर्थं ना जानाति नर्मदातटसंस्थितम् ।बहुनात्र किमुक्तेन धर्मपुत्र पुनः पुनः

śuklatīrthaṃ nā jānāti narmadātaṭasaṃsthitam / bahunātra kimuktena dharmaputra punaḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रुवतो मे निबोधस्व ऋषिराह यथा मम ४ वरुणस्य पत्नी सामुद्री शुनादेवोत्युदाहृता । तस्याः पुत्रों कलिवेंचा: सुता च॒ सुरसुन्दरी

English

(Defective verse) 1 * * * He who has crossed the bounds of effects (of Prakrti) goes beyond Prakrti. Mastery, of the three Vedas leads to the crossing (of the limits?) of three gunas The (highest) principle is beyond the twentyfour Yogas (?). He is the master of all, who has passed beyond worldly existe¬ nce. (?)

अध्याय १५५

श्लोक 20

शुक्लतीर्थं महापुण्यं सम्प्राप्तं कल्मषक्षयात् ।यो ऽत्र दत्ते शुचिर्भूत्वा एकं रेवाजलाञ्जलिम्

śuklatīrthaṃ mahāpuṇyaṃ samprāptaṃ kalmaṣakṣayāt / yo 'tra datte śucirbhūtvā ekaṃ revājalāñjalim

हिन्दी अर्थ

श्राद्ध विधि के प्रसंग में वरुण के बंश का वर्णन

English

(Defective verse) By means of his Yogic power, a knower of Yogas withdraws unto himself the dissolution of the Atman, in the same manner as the entire creation of the princi¬ ples by the Atman. He alone becomes the master of all.

अध्याय १५५

श्लोक 21

कल्पकोटिसहस्राणि पितरस्तेन तर्पिताः

kalpakoṭisahasrāṇi pitarastena tarpitāḥ

हिन्दी अर्थ

सूत के ऐसा कहने परम ऋषिगण परम हषित हुए और पुनः जिज्ञासा भाव से उनसे पूछा ऋषियों ने कहा---अमित तेजस्वी राजाओं के वंों का क्रमपू्वेंक वर्णन, उनकी स्थिति एवं उनके प्रभाव को हम लोग सुनना चाहते हैं, बतलाइये । लोमहषंण सृतजी, जो समस्त श्रोता ऋषियों के उत्तर देने में परम प्रवीण सुन्दर वाक्यों के बोलने में सुनिपुण, एवं प्राचीन आख्यानों के कुशल वक्ता थे, ऋषि के इस प्रकार

English

It is the knower of Yogas who knows the Vedas and at¬ tains the knowable. They call him the knower of the Vedas, and the master of Vedas.

अध्याय १५५

श्लोक 22

एकः पुत्रो धरापृष्ठे पित्ःणामार्तिनाशनः ।चाणक्यो नाम राजाभूच्छुक्लतीर्थं च वेद सः

ekaḥ putro dharāpṛṣṭhe pitḥṇāmārtināśanaḥ / cāṇakyo nāma rājābhūcchuklatīrthaṃ ca veda saḥ

हिन्दी अर्थ

सूत ने कहा--ऋषि ने इस विषय में जो कुछ मुझसे बतलाया है उसे मैं बतला रहा हें, सुनिये । अमित तेजस्वी राजाओं के वंश उनकी स्थिति, एवं उनके प्रभाव का वर्णन मैं कर रहा हूं, सुनिये वरुण की पत्नी सामुद्री थीं जो शुना देवी के नाम से पुकारी जाती हैं, उनके कलि और वंच्य नामक दो पुत्र हुए और एक पुत्री सुर सुन्दरी नामक हुई ।४-६। कलि के दो महाबलवान् पुत्र जय भोर विजय नामक हुए । वद्य के

English

After duly knowing the knowable and what should be known (one becomes the knower of Vedas). They call him the knower of the Vedas. All others are thinkers of the Vedas.

अध्याय १५५

श्लोक 23

युधिष्ठिर उवाच: को ऽसौ द्विजवरश्रेष्ठ चाणक्यो नाम नामतः ।शुक्लतीर्थस्य यो वेत्ता नान्यो वेत्ता हि कश्चन

yudhiṣṭhira uvāca: ko 'sau dvijavaraśreṣṭha cāṇakyo nāma nāmataḥ / śuklatīrthasya yo vettā nānyo vettā hi kaścana

हिन्दी अर्थ

कलिपुत्रो महावीयों जयश्न विजयश्व ह्। वेच्यपुत्रौ घृणिश्चेव मुनिश्चेव महाबलौ (७ प्रजानामत्तुकामानामन्योन्यस्य प्रभक्षिणो । भक्षयित्वा तावस्योन्यं विनाश समवापतुः ८ असुतान्यान्कले:ः पुन्नांश्चतुरः पुरुषादकान् । नाक विध्नं च विख्यातं सद्रम॑ं विधमं तथा १० अशिरस्कस्तयोविध्नो नाकश्चंवाशरीरवान् । सद्रमश्चेकहस्तो5भृद्विधमश्चेकपात्स्मृतः

English

A person devoted to Pitrs attains the (fruit of) Yajfias, Vedas, all cherished desires, different kinds of knowledge, longevity, progeny and riches.

अध्याय १५५

श्लोक 24

केनोपायेन तत्तीर्थं तेन ज्ञातं धरातले ।तदहं श्रोतुमिच्छामि परं कौतूहलं हि मे

kenopāyena tattīrthaṃ tena jñātaṃ dharātale / tadahaṃ śrotumicchāmi paraṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

बृहस्पतेरया भगिनी वरस्त्री ब्रह्मतारिणी । योगसिद्धा! जगत्कृत्स्नससक्ता चरते सदा (११४ प्रभासस्य तु सा भार्या वसुनामष्टसस्थ तु । विश्वकर्मा सुतस्तस्या जातः शिल्पिप्रजापतिः १६

English

He who invariably reads this Sraddhakalpa during Sraddha, in the end, gets all these (benefits) and the benefits of charitable gifts at the holy centres.

अध्याय १५५

श्लोक 25

श्रीमार्कण्डेय उवाच: इक्ष्वाकुप्रभवो राजा नप्ता शुद्धोदनस्य च ।चाणक्यो नाम राजर्षिर् बुभुजे पृथिवीमिमाम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca: ikṣvākuprabhavo rājā naptā śuddhodanasya ca / cāṇakyo nāma rājarṣir bubhuje pṛthivīmimām

हिन्दी अर्थ

त्वष्टा विराजा रूपाणां ध्ंपौनत्र उदारधी: । कतई शिल्पसहल्लाणां त्रिदशानां व वास्तुकृतूु धणि और मुनि नामक दो महा बलवान पुत्र हुए । प्रजाओं के भक्षण करने को उत्सुक वे दोनों एक दूसरे को भक्षण करने को उद्यत हुए । और एक दूसरे को भक्षण कर विनाश को भी प्राप्त हुए । सुरा (शुना ?) के गर्भ से कलि की उत्पत्ति हुई, उसके पुत्र का नाम मद कहा जाता है। त्वष्टा की पुत्री हिसा कलि की स्त्री थी, जो ज्येष्ठ स्त्री थी, उसका नाम निक्ृति कहा जाता है ।७-६। उसने कलि के संयोग से जिन चार मनुष्य-

English

He shall be the sanctifier of the row (of diners). He shall be given priority in being fed among the Brahmanas. Or he shall (be eligible to) teach all the Brahmanas and attain all cherished desires.

अध्याय १५५

श्लोक 26

विक्रान्तो मतिमाञ्छूरः सर्वलोकैरवञ्चितः ।वञ्चितः सहसा धूर्तवायसाभ्यां नृपोत्तमः

vikrānto matimāñchūraḥ sarvalokairavañcitaḥ / vañcitaḥ sahasā dhūrtavāyasābhyāṃ nṛpottamaḥ

हिन्दी अर्थ

भक्षी पन्नों को उत्पन्न किया, उनके नाम नाक, विध्न, सद्रम और विधम थे । अगले दोनों पुत्रों में विध्न नामक जो पृत्र था, वह शिर विहीन था, नाक अद्वरीरी था। सद्रम को केवल एक हाथ था, और (विधम एक पैर वाला कहा जाता था ।१०-११। सद्गम की पत्नी परम तमोगुण मयी पूतना नाम से विख्यात थो, विधम की पत्नी रेबती थी, इन दोनों के सहस्रों पुत्र थे । नाक की पत्नी का नाम शकुनि और विघ्न की पत्नी का नाम अयोगुखी था,

English

The text is defective and requires slight modifications as per the same verse printed in the Bd. 3.19.64 which means: "One who has mastered all created things, the products of Prakrti (the nature known as AvidyS), one

अध्याय १५५

श्लोक 27

युधिष्ठिर उवाच: कथं स वञ्चितो राजा वायसाभ्यां कुतो ऽथवा ।पुरा येन प्रतिज्ञातं धीगर्भेण महात्मना

yudhiṣṭhira uvāca: kathaṃ sa vañcito rājā vāyasābhyāṃ kuto 'thavā / purā yena pratijñātaṃ dhīgarbheṇa mahātmanā

हिन्दी अर्थ

जिनके बड़े-बड़े भीषण शिर वाले राक्षस उत्पन्न हुए, जो दोनों सन्ध्याओं में विचरण करते रहते थे । रेवती ओर पृतना के पुत्र नेऋत नाम से विख्यात थे ये समस्त राक्षस ग्रह रूप में लोगों को विशेषतया बालकों को कष्ट पहुँचाते थे। ब्रह्मा की आज्ञा से इन सबों के स्वामी सस्‍्कन्द (स्वामी कौर्तिकेय) हुए ।१२-१४। असक्त भाव से समस्त जगत में सवंदा विचरण करनेवाली ब्रह्मचारिणी एवं परम सुन्दरी योगसिद्धा नामक बृ-स्पति की जो भमिती थी, वह आठवें वसु प्रभास की भार्या थी । उप्के पुत्र शिल्पियों के प्रजापति (स्रष्ठा) विश्वकर्मा हुए । धर्म के पोत्र उदार बुद्धि विश्वकर्मा परम सुन्दर आकृति से सुशोभित थे, देवताओं के सहस्रों शिल्प- कर्मों के वे करनेवाले तथा वास्तु विज्ञान के वेत्ता थे । उन्होंने समस्त देवताओं के विमानों (उडने वाले रथों)

English

He who always listens to this after subduing anger, being without malice and becoming free fromgreed and delusion' attains endless heavenly pleasure.

अध्याय १५५

श्लोक 28

न जीवे वञ्चितो ऽन्येन प्राणांस्त्यक्ष्ये न संशयः ।एतन्मे वद विप्रेन्द्र परं कौतूहलं मम

na jīve vañcito 'nyena prāṇāṃstyakṣye na saṃśayaḥ / etanme vada viprendra paraṃ kautūhalaṃ mama

हिन्दी अर्थ

यः सर्वेषां विभानानि देवतानां चकार ह। मानुषाश्वोपजोवन्ति यस्य शिल्प भहात्मनः

English

He attains the entire benefit of visiting holy centres, and making charitable gifts etc. This is the most excellent means to liberation. This is the greatest means of attaining heaven. He shall have the greatest contentment in this world too. Hence he should assiduously perform this.

अध्याय १५५

श्लोक 29

श्रीमार्कण्डेय उवाच: आत्मानं वञ्चितं ज्ञात्वा तदा संगृह्य वायसौ ।प्रेषयामास तीव्रेण दण्डेन यमसादनम्

śrīmārkaṇḍeya uvāca: ātmānaṃ vañcitaṃ jñātvā tadā saṃgṛhya vāyasau / preṣayāmāsa tīvreṇa daṇḍena yamasādanam

हिन्दी अर्थ

देवचार्यस्य महतो विश्वकर्माधस्य धीमतः । विश्वकर्मात्मजश्चेव विश्वकर्मा भयः स्मृतः १२० असूत तपसा सा तु मनु ज्येष्ठ विवस्व॒तः । यमौ पुनरसुतासौ यम च यघु्नां च ह् ॥

English

He who reads these injunctions about (performance of) Sraddha attentively and with purity of mind, in the assembly (of the learned) during Parvan days, becomes endowed with children. With great brilliance, he attains the same region as that of the heaven-dwellers.

अध्याय १५५

श्लोक 30

वायसावूचतुः ।सुन्दोपसुन्दयोः पुत्रावावां काकत्वमागतौ ।मा वधीस्त्वं महाभाग कस्मिंश्चित्कारणान्तरे

vāyasāvūcatuḥ / sundopasundayoḥ putrāvāvāṃ kākatvamāgatau / mā vadhīstvaṃ mahābhāga kasmiṃścitkāraṇāntare

हिन्दी अर्थ

स॒ तु गत्वा कुरून्देवी वडवारूपधारिणी । सवितुश्राश्वरूपस्य नासिकाम्यां तु तो स्मृतो २३ असृत सा महाभागा व्वस्तरीक्षेश्चिनौं किल । नासत्यं चंव दर्ल च मारतंण्डस्याउपत्सजावुभोी

English

Obeisance to that self-born deity by whom this Kalpa has been prescribed. I always bow down to the great masters of Yoga.

अध्याय १५५

श्लोक 31

तावावां कृतसंकल्पौ त्वया कोपेन मानद ।निरस्तावनिरस्तौ वा यास्यावः परमां गतिम्

tāvāvāṃ kṛtasaṃkalpau tvayā kopena mānada / nirastāvanirastau vā yāsyāvaḥ paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

कस्सास्मार्तण्ड इत्येष विवस्वानुच्यते बुधेः किमर्थ साश्वरूपा वे नासिकाभ्यामसुयत ॥। की रचना की थी । उन्हीं परम महात्मा द्वारा प्रचालित शिल्प कम के आश्रय से मनृष्य लोग आज भी अपनी जीविका चलाते हैं ।१५-१८। उन विश्वकर्मा की पत्ती विरोचना थी, जो प्रह्लादी नाम से भी विख्यात थी, वह विरोचन की भगिनी और तिशिरा की माता थी । परम बुद़िमान् विश्वकर्मा देवताओं में शिल्पकर्म के आचाय॑ थे, उनका पुत्र मय भी उसी प्रकार शिल्प कर्म में निपुण होने के कारण विश्वकर्मा नाम से विख्यात हुआ ।

English

O dear one, these Pitrs are the deities of Devas. Pitrs are stationed in these seven abodes for ever. They are free from pain.

अध्याय १५५

श्लोक 32

तदादेशय राजेन्द्र कृत्वा तव महत्प्रियम् ।मुक्तशापौ भविष्यावो ब्रह्मणो वचनं तथा

tadādeśaya rājendra kṛtvā tava mahatpriyam / muktaśāpau bhaviṣyāvo brahmaṇo vacanaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

उस मयकी छोटी बहन, विश्वकर्मा की पुत्री सुरेण नाम से विख्यात थी, जो संज्ञा नाम से सूये की पत्नी हुई । उसने अपने परम तपोबल द्वारा सूर्य के ज्येष्ठ पुत्र सन को उत्पन्न किया । सतदननन्‍्तर उसके यम नाभक पुत्र और यमुना नाम की एक पुत्री- दोनों को जुड़वा उत्पन्न किया ।१६-२२। फिर उस देवी ने कुरु देश में जाकर वडवा (घोड़ी) का रूप धारण किया और अश्वरूप घारण करनेवाले सूर्थ के संयोग से आकाश में

English

All these noble souls are the sons of Prajapati. The first group is that of Yogins. That is eternal and is ever conducive to the increase in the Yogic Power (of Yogins).

अध्याय १५५

श्लोक 33

तच्छ्रुत्वा काकवचनं चाणक्यो नृपसत्तमः ।नाहं जीवे विदित्वैवं वञ्चितः केन कर्हिचित्

tacchrutvā kākavacanaṃ cāṇakyo nṛpasattamaḥ / nāhaṃ jīve viditvaivaṃ vañcitaḥ kena karhicit

हिन्दी अर्थ

अपनी नांसिका के दोनों छिद्रों द्वारा नासत्य और दख नामक दो पुत्रों को उत्पन्न किया, जो दोनों मातंण्डि (सूर्य के पुत्र) कहे जाते हैं, ऐसी प्रसिद्धि है ... ऋ्षियाँ ने पूछा--पण्डित लोग सूर्य को मार्तण्ड किस लिये कहा करते हैं, किस कारणवश संज्ञा ने बड़वा का रूप धारण किया ओर किस प्रकार अपनी नासिका के छिद्रों से पुत्र उत्पन्न किया--इस बात को हम लोग सुनना चाहते हैं-- विस्तारपुरवंक बतलाये

English

All Devas worship them. They are stationed in them (Pitrs). The four Airamas too successively worship them. The four castes also worship them in accordance with the injunc¬ tions. Similarly the mixed castes and the Mlecchas (alien out- castes) also worship them.

अध्याय १५५

श्लोक 34

तस्मात्तीर्थं विजानीतं यमस्य सदने द्विजौ ।प्रेषयामि यथान्यायं श्रुत्वा तत्कथयिष्यथः

tasmāttīrthaṃ vijānītaṃ yamasya sadane dvijau / preṣayāmi yathānyāyaṃ śrutvā tatkathayiṣyathaḥ

हिन्दी अर्थ

सूतजी ने कह्ा--प्राचीनकाल में सुय॑ं देव एक अण्डे के रूप में उत्पन्न हुए थे, बहुत दिवों

English

Pitrs revere him who devotedly worships Pitrs. Pitrs in the form of grandfather grant nourishment, progeny and heavenly pleasure to him who desires nourishment or who desires progeny.

अध्याय १५५

श्लोक 35

तेनैव मुक्तौ तौ काकौ स्रक्चन्दनविभूषितौ ।शीघ्रगौ प्रेषयामास यमस्य सदनं प्रति

tenaiva muktau tau kākau srakcandanavibhūṣitau / śīghragau preṣayāmāsa yamasya sadanaṃ prati

हिन्दी अर्थ

यम्मातंण्डो भवेत्युक्तः पिन्राउण्डे वे द्विधा कृते । तस्मादिवस्वान्मातेण्डः पुराणज्ञविभाष्ते.. ७२६ विवस्वान्कश्यपाज्जन्ञे दाक्षायण्यां महायशाः ॥ तस्य भार्याभवत्त्वाष्ट्री महादेवी विवस्वतः ॥

English

To a son, the rite for Pitrs is preferable to the rite for Devas. Pitrs are to be propitiated even before Devas.

अध्याय १५५

श्लोक 36

राजोवाच: तत्र धर्मपुरं गत्वा विचरन्तावितस्ततः ।यदि पृच्छति धर्मात्मा यमः संयमनो महान्

rājovāca: tatra dharmapuraṃ gatvā vicarantāvitastataḥ / yadi pṛcchati dharmātmā yamaḥ saṃyamano mahān

हिन्दी अर्थ

आदित्यस्य हि तद्॒पं मार्तण्डस्थ हि तेजसा। गात्रेषु प्रतिरुद्ध वे नातिकान्तमिवाभवत्

English

The subtle movement of the Yogic power of Pitrs is in-

अध्याय १५५

श्लोक 37

कुतो वामागतं ब्रूतं केन वा भूषितावुभौ ।मदीया भारती तस्य कथनीया ह्यशङ्कितम्

kuto vāmāgataṃ brūtaṃ kena vā bhūṣitāvubhau / madīyā bhāratī tasya kathanīyā hyaśaṅkitam

हिन्दी अर्थ

तक जब वह अण्डा फूटा नहीं, तब उसे विश्वकर्मा ते फोड़ दिया । उस समय अण्डे को फोड़ते देख गर्भ हत्या के भय से भीत होकर कश्यप जी बहुत दुःखी हुए ।२६। और उस भण्डे को दो भागों में फटा देख विश्वकर्मा से बोले, यह सामान्य अण्डा नहीं हैं, फिर उस अण्डस्थ जीव से बोले--हे निष्पाप ! इस भरे हुए अण्डे से तुम पुनः उत्पन्न हो । निश्चय ही यह अण्डस्थ प्राणी मृत नहीं हुआ है'--इतनी सी बातें स्नेहपूर्वक पिता ने कही । कश्यप की इतनी बातें सुनकर मातंण्ड (मरे हुए अण्डे से उध्पन्न होना) नाम की साथ्रेकता बतलाई जाती हैं। पिता ने अण्डे के दो भागों में विभक्त हो जाने पर भी 'मातंप्ड हो जाओ--ऐसी बातें कही थीं, उसी के आधार पर पुराणों के जानने वाले सूर्य को मार्तण्ड कहते हैं ।३७-२६। अब इसके बाद उस मृत अण्ड से उत्पन्न होने वाले सूये की संतत्तियों का वर्णन कर रहा हूँ । बहुत दिन बीते, उन सूर्य की संज्ञा नामक पत्नी

English

To all of them a silver vessel or one accompanied with silver is ordained. It is said to be sanctifying and excellent (for the rites) of Devas along with (those of) Pit r s.

अध्याय १५५

श्लोक 38

इक्ष्वाकुसंभवो राजा चाणक्यो नाम धार्मिकः ।द्वादशाहे मृतस्यास्य तर्पितावशनादिना

ikṣvākusaṃbhavo rājā cāṇakyo nāma dhārmikaḥ / dvādaśāhe mṛtasyāsya tarpitāvaśanādinā

हिन्दी अर्थ

में तीन पुत्र उत्पन्न हुए थे ।३०। संज्ञा में उक्त दोनों अश्विनी कुमार और उनसे छोटे खावणि मनु नामक पूत्र हुए ये। तदनस्तर शनैश्चर हुए, ये सात (?) मातंण्ड के आत्मज कहे जाते हैं ।११। महान यशस्वी विवस्वान् दाक्षायणी में महर्षि कश्यप के संयोग से उत्पन्न हुए थे । उनकी पत्नी विश्वकर्मा की पुत्री महादेवी सुरेणु थीं, जो संज्ञा नाम से भी विख्यात थीं।३२॥। अमित तेजस्वी भगवान् मार्तण्ड की पत्नी, परमरूपवती एवं

English

The three Pindas which the kinsmen offer invoking the names and Gotra, which they place on the ground strewn with Kusa grass after wearing the sacred thread from right to left, delight the respective parents who are present everywhere. What constitutes the diet of the creature (i.e. the devotee who offers) is the diet of Pitrs as well.

अध्याय १५५

श्लोक 39

तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञो गतौ तौ यमसादनम् ।क्रीडितौ प्राङ्गणे तस्य स्रक्चन्दनविभूषितौ ।धर्मराजेन तौ दृष्टौ पृष्टौ धृष्टौ च वायसौ

tacchrutvā vacanaṃ rājño gatau tau yamasādanam / krīḍitau prāṅgaṇe tasya srakcandanavibhūṣitau / dharmarājena tau dṛṣṭau pṛṣṭau dhṛṣṭau ca vāyasau

हिन्दी अर्थ

योवनवती सुरेणु देवी की सन्तुष्टि पतिरूप में उनसे नहीं होती थी । प्रचुर तेज से देदीप्यमान अदितिपुत्र मातंण्ड के उस शरीर को अपने अंगों में वह नहीं सहन कर पाती थीं, अतः वह परम मनोहर नहीं लगते थे ।१३-३४। यतः कश्यप मे स्नेह पूवंक बिना जाने बूझे ही यह कहा था कि 'इस अण्डे में अवस्थित ये निश्चय ही मरे नहीं हैं, अतः उससे उत्पन्न होने के कारण वे मातंण्ड नाम से पुकारे जाते हैं ।३५। उन कश्यपनन्दन तेजस्त्वभ्यधिक॑ तस्य नित्यमेव विवस्वतः । येनापि तापयामास त्रील्ले।कान्कश्यपात्मजः

English

Just as in a cowpen the calf finds out its lost mother, so also the Mantra takes those articles where the Janlu (the man for whom the pin<la is intended) stays.

अध्याय १५५

श्लोक 40

यम उवाच: कुतः स्थानात्समायातौ केन वा भूषितावुभौ ।वृत्तं वै कथ्यतामेतद्वायसावविशङ्कया

yama uvāca: kutaḥ sthānātsamāyātau kena vā bhūṣitāvubhau / vṛttaṃ vai kathyatāmetadvāyasāvaviśaṅkayā

हिन्दी अर्थ

त्रीण्यपत्यानि संज्ञायां जनयामास वे रविः । दुवो सुतो तु महावीयों कनन्‍्यां कालिन्दसिव च ॥

English

The name, Gotra and Mantra take the food offered to him. Even if they had taken a hundred births, the satisfaction follows them. (They are satiated by the Sraddha offering.)

अध्याय १५५

श्लोक 41

काकावूचतुः ।इक्ष्वाकुसम्भवो राजा चाणक्यो नाम धार्मिकः ।द्वादशाहे मृतस्यास्य तर्पितावशनादिभिः

kākāvūcatuḥ / ikṣvākusambhavo rājā cāṇakyo nāma dhārmikaḥ / dvādaśāhe mṛtasyāsya tarpitāvaśanādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

मनुविवस्वतो ज्येष्ठः श्राद्धदेवः प्रजापतिः॥ ततो यमो यमोी चेव यमजों संबभुवतुः ॥रे८ शातवर्ण तु तद्ग॒पं दुष्ट्वा संज्ञा विवस्वतः । असहन्ती स्वकां छायां सवर्ण निर्मसे पुनः वदस्व कि मया कार्य सा संज्ञा तामथाब्रवीत् । अहूं यास्थामि भद्रं ते स्वमेव भवन पितुः ४ १ त्वयेह भवने महा वस्तव्यं निविशद्धया । इसो च बालकों मह्ां कन्या च वरवर्णिनो ३४२ भत्रें वे नेवमास्येयसिदं भगवंते त्वया । एवमुक्ताउश्रवीत्संज्ञां संज्ञा या पारथिवी तु सा

English

Thus this convention is established by Brahma, the supreme god. This first creation of Pitrs is for the worlds that seek everlasting bliss.

अध्याय १५५

श्लोक 42

तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा सदा वैवस्वतो यमः ।चित्रगुप्तं कलिं कालं वीक्ष्यताम् इदम् अब्रवीत्

tayostadvacanaṃ śrutvā sadā vaivasvato yamaḥ / citraguptaṃ kaliṃ kālaṃ vīkṣyatām idam abravīt

हिन्दी अर्थ

आकेशग्रहणाहेवि आशय नेव कहिचित् । आव्यास्यामि मतं तुभ्यं गच्छ देवि स्वमालयम् ॥४डंड समाधाय च र्ता संज्ञा तथेत्युक्तां तय! च सा। त्वष्टः समीपसगमद्त्रीडितेव तपस्विनी

English

Thus these Pitrs are Devas and Devas are Pitrs. O sinless ones, all these (following) have been recounted by me— Dauhilras, (i.e. daughter's sons), Yajamanas, worlds, daughters, grandsons, sons, charitable gifts, along with the mode of purity, holy centres, fruit thereof, everlasting nature of the benefit, (the different types of) Brahmanas and the rules governing Yayavaras (wandering ascetics). Everything has been mentioned in the manner that Brahma prescribed formerly.

अध्याय १५५

श्लोक 43

अण्डजस्वेदजातीनां भूतानां सचराचरे ।विहितं लोककर्त्ःणां सान्निध्यं ब्रह्मणा मम

aṇḍajasvedajātīnāṃ bhūtānāṃ sacarācare / vihitaṃ lokakartḥṇāṃ sānnidhyaṃ brahmaṇā mama

हिन्दी अर्थ

पिता तामागतां दृष्ट्वा क्ुद्धः संज्ञामथाब्रवीत् । भर्तु: समीप॑ गर्छ त्वं मा जुगुप्स दिघाकरम् मातंण्ड का तेज नित्य अधिकाधिक बढ़ने लगा। जिसके द्वारा उन्होंने तीनों लोकों को खूब तपाया । उन्होंने संज्ञा नामक अपनी पत्नी से तीन सस्ततियाँ उत्पन्न कीं, जिनमें दो महाबलशाली' पुत्र थे, तीसरी कालिन्दी नामक कत्या थी ३६-३७। सूर्य के ज्येष्ठ पुत्र श्राद्धदेव प्रजापति मनु थे। उनसे छोटे यमराज और यमी--- ये दोनों जुड़वा उत्पन्न हुए । विवस्वान् (सूथें) के उस परम तेजोमय रूप एवं चमकने वाले वंण को देखकर

English

This, Angiras explained in an assembly while the sages sat listening when he had been asked to clear the doubts regard¬ ing Pitrs.

अध्याय १५५

श्लोक 44

गतः कुत्र दुराचारश्चाणक्यो नामतस्त्विह ।अन्विष्यतां पुराणेषु त्वितिहासेषु या गतिः

gataḥ kutra durācāraścāṇakyo nāmatastviha / anviṣyatāṃ purāṇeṣu tvitihāseṣu yā gatiḥ

हिन्दी अर्थ

संज्ञा उसे सहन करने में असमर्थ हुईं, और अपनी ही भाँति अपना एक प्रतिबिम्ब निर्माण किया । तदनन्‍्तर मिट्टी की बनी हुई और उसी के समान सुन्दरी वह नारी हाथ जोड़कर विनम्रभाव से उसके सम्मुख उपस्थित हुई ओर फिर संज्ञा से बोली । 'बतलाइये मैं क्या करूँ?” संज्ञा ने उससे कहा, भद्दे ! मैं अपने पिता के घर जा रही हूं, तुम बिना किसी हांका के मेरे इस घर में निवास करो ।३८-४१३। ये दो मेरे बालक और

English

It was formerly in the course of an extensive Satra (sacri¬ fice) lasting for a thousand years wherein the lord of the house was the deity. Lord Brahma.

अध्याय १५५

श्लोक 45

ततस् तैर् धर्मपालैस् तु धर्मराजप्रचोदितैः ।निरीक्षिता पुराणोक्ता कर्मजा गतिरागतिः

tatas tair dharmapālais tu dharmarājapracoditaiḥ / nirīkṣitā purāṇoktā karmajā gatirāgatiḥ

हिन्दी अर्थ

यह एक सुन्दरी कन्या है, (इनकी देखरेख करना) इस भेद की बात को कभी भी हमारे तेजस्वी पतिदेव से मत कहना ।' संज्ञा के ऐसा कहने पर उस मृण्मयी संता ने कहा, हें देवि ! शिर्र के केशों के पकड़े जाने तक तो मैं इस तुम्हारे गुप्त भेद की चर्चा कभो भी किसी से भी नहीं करूँगी, तुम अपने अभीष्ट स्थान को जाओ ।' इस प्रकार अपनी छाया रूपिणी नारी से ऐसी बातें कर अपने पिता विश्वकर्मा के पास वह तपतल्विनी बड़ी लण्जा के साथ प्रस्थित हुई। अपने घर पर आई हुई संज्ञा को देखकर पिता (विश्वकर्मा) परम कृद्ध होकर बोले, 'तुम अपने पति के पास जाओ, दिवाकर के प्रति अपने मन में किसी प्रकार की घृणित भावना मत करो ।४२-४६। पिता के ऐसा कहने पर; और बारम्बार आग्रहपृ्वक कहने पर भी वह एक सहख्रवर्षो

English

It is heard that Brahma presided over it for hundreds

अध्याय १५५

श्लोक 46

ततः प्रोवाच वचनं धर्मो धर्मभृतां वरः ।शृण्वतां धर्मपालानां मेघगम्भीरया गिरा

tataḥ provāca vacanaṃ dharmo dharmabhṛtāṃ varaḥ / śṛṇvatāṃ dharmapālānāṃ meghagambhīrayā girā

हिन्दी अर्थ

उश्द बायुपुराण॑भ्

English

Brhaspati who had been asked by his intelligent son formerly, told thus. He recounted the family of Pitrs. What he said has been mentioned (by me). Henceforth I shall' recount (the race) ofVaruna. Understand (it).

अध्याय १५५

श्लोक 47

शुक्लतीर्थे मृतानां तु नर्मदाविमले जले ।अण्डजस्वेदजातीनां न गतिर्मम सन्निधौ

śuklatīrthe mṛtānāṃ tu narmadāvimale jale / aṇḍajasvedajātīnāṃ na gatirmama sannidhau

हिन्दी अर्थ

सेबमुक्ता तदा पित्रा नियुक्ता च पुनः पुनः । वर्षाणां तु सहस्न वे वसति सम पितुग़ है पुव॑जस्य मनोस्तुल्यों सादृश्येन तु तो प्रभु: । श्रुतश्रवं तु धर्मज्न श्रुत॒कर्माणमेव च

English

The sages to whom this ( Sraddha Kalpa ) was narrated became very much delighted. Extremely eager to hear further, they asked him thereafter.

अध्याय १५५

श्लोक 48

तत्तीर्थं धार्मिकं लोके ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ।निर्मितं परया भक्त्या लोकानां हितकाम्यया

tattīrthaṃ dhārmikaṃ loke brahmaviṣṇumaheśvaraiḥ / nirmitaṃ parayā bhaktyā lokānāṃ hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

श्रुतश्षवा सनुः सो5पि सार्वाणवें भविष्यति। श्रुतकर्मा नु विज्ञेयों प्रहो वे यः शनेश्वरः

English

Please narrate (to us) in proper sequence the condition of the races of the kings of unmeasured spledour as well as valour. We implore you.

अध्याय १५५

श्लोक 49

पापोपपातकैर्युक्ता ये नरा नर्मदाजले ।शुक्लतीर्थे मृताः शुद्धा न ते मद्विषयाः क्वचित्

pāpopapātakairyuktā ye narā narmadājale / śuklatīrthe mṛtāḥ śuddhā na te madviṣayāḥ kvacit

हिन्दी अर्थ

चकाराभ्यधिक स्नेहूं न तथा पूव॑जेषु व । मनुस्तच्चाक्षमत्सवं यमस्तद्व न चाक्षमत् पदा तर्जयसे यस्मात्पितृभार्या यशस्विनीम् । तस्मात्तवतष चरणः पतिष्यति न संशयः ५५

English

Thus entreated, Suta Lomakarfana an expert in the narration of tales and proficient in the art of speech, (observed) the desire of the sages to hear the story and spoke these words:

अध्याय १५५

श्लोक 50

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं तौ काकौ यमभाषितम् ।आगतौ शीघ्रगौ पार्थ दृष्ट्वा यमपुरं महत्

etacchrutvā tu vacanaṃ tau kākau yamabhāṣitam / āgatau śīghragau pārtha dṛṣṭvā yamapuraṃ mahat

हिन्दी अर्थ

तक अपने पिता के घर में हौ निवास करती रही । (तुम अपने पति के पास चली जाओ-ऐसा बारस्बार कहने पर उस अनिन्‍्दनीय चरित्रशालिनी ने अपने स्वरूप को छिपाने के लिए वडवा का रूप धारण किया और पिता के घर से प्रस्थान किया। उत्तर कु प्रदेश में जाकर तृणों को चर कर जीविका चलाने लगी ।४७-४८। इधर उस नकली संज्ञा में सूये ने असली संज्ञा की भावना से दो अपने ही समान परम

English

Even as I recount, listen, and understand the state and position of the dynasties of the kings of unmeasured splendour, in the proper order and their prowess.

अध्याय १५५

श्लोक 51

पृष्टौ तौ प्रणतौ राज्ञा यथावृत्तं यथाश्रुतम् ।कथयामासतुः पार्थ दानवौ काकतां गतौ

pṛṣṭau tau praṇatau rājñā yathāvṛttaṃ yathāśrutam / kathayāmāsatuḥ pārtha dānavau kākatāṃ gatau

हिन्दी अर्थ

तेजस्वी पुत्रों को उत्पन्न किया । वे दोनों पुत्र भी अपने बड़े भाई मनु के समान ही स्वरूपवान् थे, उनकी भी उसी प्रकार प्रभुता थी। उन दोनों पुत्रों के ताम श्रुतश्रवा और श्रुतकर्मा थे, जो परमधरमंश थे । इनमें अतश्रवा नामक जो पुत्र था, वह भी भविष्य में सावर्णि मनु नाम से प्रसिद्ध होगा, श्रृतकर्मा नामक जो दुसरा पुत्र था, उसे शनेरचर' ग्रह नाम से जानिये ।४९-११। वह भी मनु होगा ओर सा वणि नाम से विख्यात होगा । वह मृष्मयी संज्ञा अपने पुत्र को बहुत अधिक स्नेह करती थी, उतता प्रेम भाव उन बड़ी सन्ततियों में नहीं रखती थी। उसके इस मनोभाव को मनु सब प्रकार से सहन कर लेते थे, पर यमराज को यह कतई नापसन्द था। सपत्नी (सौत) के पुत्र होने के कारण जब अपमान की सात्रा बहुत अधिक हो गई तो वे अतिशय दुःखित हुए। एक दिन बालस्वभाववश अथवा भावी वश भअतिक्षय क्रुंद्ध होकर सुयय-पुत्र॒ यमराज ने संज्ञा

English

This chapter corresponds to Bd. 3.59; only verse numbers from that chapter are quoted in notes.

अध्याय १५५

श्लोक 52

अस्मात्स्थानाद्गतावावां यमस्य पुरमुत्तमम् ।पृथिव्या दक्षिणे भागे ह्यतीत्य बहुयोनिजम्

asmātsthānādgatāvāvāṃ yamasya puramuttamam / pṛthivyā dakṣiṇe bhāge hyatītya bahuyonijam

हिन्दी अर्थ

को अपने पैर से ठोकर लगा दी। समान वर्णवाली माता ने इस दुव्यंवहार से अतिशय कऋ्रुद्ध होकर यमराज को यह शाप दे दिया--यतः अपने पिता की स्त्री (माता) को, जो अपने सात्तिक बल से परम यशस्विनी है, पैर से ठोकर मार रहे हो, अतः तुम्हारा यह पैर गिर पड़ेगा--इसमें सन्देह नहीं

English

Varuna's wife was the daughter of the ocean and was called "Sunodevi". She had two sons Kali and Vaidya and a daughter Surasundarl.

अध्याय १५५

श्लोक 53

तत्पुरं कामगं दिव्यं स्वर्णप्राकारतोरणम् ।अनेकगृहसम्बाधं मणिकाञ्चनभूषितम्

tatpuraṃ kāmagaṃ divyaṃ svarṇaprākāratoraṇam / anekagṛhasambādhaṃ maṇikāñcanabhūṣitam

हिन्दी अर्थ

यमस्तु तेन शापेन भू्श पोडितमानसः । सनुना सह धर्मात्मा पितुः सर्वे न्‍्यवेदयत् ॥५:६ शप्तो5हमस्मि लोकेश जनन्या तपतां बर। तन्न प्रसादो नस्त्रातु होतस्मान्महतों भयात् ४८ विवस्वानेवसमुक्तस्तु यम प्रोवाच वे प्रभ: । असंशयं पुत्र महू विष्यत्यनत्न कारणम् ४६ येन त्वामाविशत्क्रोधों धर्मज्ञं सत्यवादिनम् । न शक्यमेतन्मिथ्या तु कतुं सातुबंचस्तव ६० कुमयों मांसमादाय याघ्यन्ति तु महीं तब ॥ ततः पाद॑ महाप्राज्ञ पुनः संप्राप्स्यसे सुखस् ३६१

English

Kali had two very powerful sons (namely): Jaya and Vijaya. Vaidya too had two sons of great strength, viz. Ghrni and Muni.

अध्याय १५५

श्लोक 54

चतुष्पथैश्चत्वरैश्च घण्टामार्गोपशोभितम् ।उद्यानवनसंछन्नं पद्मिनीखण्डमन्दितम्

catuṣpathaiścatvaraiśca ghaṇṭāmārgopaśobhitam / udyānavanasaṃchannaṃ padminīkhaṇḍamanditam

हिन्दी अर्थ

तां शप्तुकामों भगवान्नाशाय कुपितः प्रभुः। सा तत्सवें यथातत्त्वमाचचक्षे विवस्व॒तः

English

When the subjects became desirous of eating, they ate each other. Devouring each other, they perished.

अध्याय १५५

श्लोक 55

हंससारससंघुष्टं कोकिलाकुलसंकुलम् ।सिंहव्याघ्रगजाकीर्णम् ऋक्षवानरसेवितम्

haṃsasārasasaṃghuṣṭaṃ kokilākulasaṃkulam / siṃhavyāghragajākīrṇam ṛkṣavānarasevitam

हिन्दी अर्थ

माता के इस शाप से मन में अतिशय दुःखित होकर धर्मात्मा यमराज बहुत क्षुब्ध हुए और मनु को साथ लेकर पिता से सारी बातें ज्यों को त्यों बतला दीं। कहा, है तेजस्थियों में श्रेष्ठ ! लोकेश ! संज्ञा (माता) की बातों से हम एकदम हतप्रभ हो गये हैं, उसके शाप के भय से हम संत्रस्त है, अपने लड़कपन के कारण अथवा अज्ञान के कारण हमने यह अपराध किया है, पर फिर भी आपको हमारी रक्षा करनो चाहिए। है तात ! माता ने हमें ऐसा भीषण शाप दे दिया है, इस महान् भय से हमारी रक्षा केवल आपको पा से ही हो सकती है ।६६-५८। यमराज के ऐसा कहने पर सूर्य बोले-हहें पुत्र इस दुघंटना में अवश्य ही कोई महान कारण है, जो तुम्हारे जैसे सत्यवादी एवं धर्मात्मा के मन में क्रोध का संचार हुआ, किन्तु तुम्हारी माता के इस शापवचन को निष्फल करने की सामथ्यं मुझमें नहीं है । तुम्हारे मांस को लेकर जब क्रमि पृृथ्वीतल पर जायेंगे,

English

Kali begot ofSura (a son). That son of his is remembered as Mada. Himsa, the daughter of Tvastr, was the eldest wife of Kali. She was known as Nikfti (too).

अध्याय १५५

श्लोक 56

नरनारीसमाकीर्णं नित्योत्सवविभूषितम् ।शंखदुन्दुभिर्निर्घोषैर् वीणावेणुनिनादितम्

naranārīsamākīrṇaṃ nityotsavavibhūṣitam / śaṃkhadundubhirnirghoṣair vīṇāveṇunināditam

हिन्दी अर्थ

हे परमबुद्धिमान् ! तब तुम पुनः अपने पर को बिता अभ्यास के ही सुख पूवक प्राप्त करोगे ।१६-६१। ऐसा करने पर तुम्हारी माता के वचन भी सत्य रह जायेंगे और शाप के परिहार हो जाने से तुम्हारी भी रक्षा हो जायगी ।६२। यमराज से ऐसा कहने के अनन्तर आदित्य ने संज्ञा से कहा, सभी पुत्रों के समान होने पर भी तुम एक पुत्र में बहुत अधिक स्नेह क्‍यों करती हो ? संज्ञा ने उस ग्रुप्त भेद को छिपाने की

English

She bore four other man-eating sons to Kali, viz. Naka, the famous Vighna, Sadrama and Vidhama.

अध्याय १५५

श्लोक 57

यममार्गे ऽपि विहितं स्वर्गलोकमिवापरम् ।गतौ तत्र पुनश्चान्यैर्यमदूतैर्यमाज्ञया

yamamārge 'pi vihitaṃ svargalokamivāparam / gatau tatra punaścānyairyamadūtairyamājñayā

हिन्दी अर्थ

इच्छा से सूर्य की इन बातों का कोई उत्तर नहों दिया। तब सूर्य ने अपने योगबल एवं समाक्षि द्वारा वास्तविक स्थिति का पता लगाया । और सब बातें जानकर उन परम तेजस्वी भास्कर ने संज्ञा का विनाश करने के विचार से शाप देने का निश्चय किया, तब भयभीत होकर संज्ञा ने सूर्य से सारी बातें यथा तथ्य रूप में प्रकट कर दीं ।६३-६५॥ उस मृष्मयी छाया द्वारा सारी बातें अवग॒त कर सूय परम क्रंद्ध हुए ओर निर्देश्धुकास रोषेण सान्त्वयामास वे शने: । तवातितेजसा युक्तमिदं रूपं न शोभते ३६७

English

Among them Vighna was devoid of head; Naka had no body; Sadrama was single-handed; and Vidhama had a single foot.

अध्याय १५५

श्लोक 58

विदितौ प्रेषितौ तत्र यत्र देवो जगत्प्रभुः ।प्राणस्य भीत्या दृष्टो ऽसौ सिंहासनगतः प्रभुः

viditau preṣitau tatra yatra devo jagatprabhuḥ / prāṇasya bhītyā dṛṣṭo 'sau siṃhāsanagataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

श्ाध्यां योवनसंपन्नां योगमास्थाय गोपते । अनुकलं भवेदेव॑ यदि स्थात्समयों मतः ६६

English

Sadrama's wife was remembered as Putana. She had Tamasic qualities. Revat! was the wife of Vidhama. Their sons were in thousands.

अध्याय १५५

श्लोक 59

महाकायो महाजङ्घो महास्कन्धो महोदरः ।महावक्षा महाबाहुर् महावक्त्रेक्षणो महान्

mahākāyo mahājaṅgho mahāskandho mahodaraḥ / mahāvakṣā mahābāhur mahāvaktrekṣaṇo mahān

हिन्दी अर्थ

तेनासो ब्रीडितो देवो रूपेण तु दिवस्पतिः । तस्मात्त्वष्ठा स चक्र तु बहु मेने महातपा: ॥॥७ १ कान्तात्कान्ततरं द्रष्ट्मशुभ शुशुभे ततः । ददर्श योगमास्थाय स्वां भायाँ बडवां तथा ७४

English

Sakuni was the wife of Naka and AyomukhI was the wife of Vighna. Raksasas of huge heads roaming about at dawn and dusk (were born of them).

अध्याय १५५

श्लोक 60

महामहिषमारूढो महामुकुटभूषितः ।तत्रान्यश्च कलिः कालश्चित्रगुप्तो महामतिः

mahāmahiṣamārūḍho mahāmukuṭabhūṣitaḥ / tatrānyaśca kaliḥ kālaścitragupto mahāmatiḥ

हिन्दी अर्थ

मेथुनाय विचेष्टन्ती परपुंसोपशडूया। सा तन्निरधमच्छुक्न नासिकाम्यां विवस्वतः ७६

English

The sons of Revat! and Putana are remembered by the name of Nairrtas. All these Raksasas were evil demons known as Grahas. They particularly harassed children (by haunting them). With the permission of Brahma, lord Skanda became their overlord.

अध्याय १५५

श्लोक 61

समागतौ तदा दृष्टौ मध्ये ज्वलितपावकौ ।पुण्यपापानि जन्तूनां श्रुतिस्मृत्यर्थपारगौ

samāgatau tadā dṛṣṭau madhye jvalitapāvakau / puṇyapāpāni jantūnāṃ śrutismṛtyarthapāragau

हिन्दी अर्थ

उसी क्रोधावेश में विद्वकर्मा के पास पहुंचे । विश्वकर्मा ने सूये का समुचित सत्कार एवं पूजन किया और क्रोध से भस्म करने को उद्यत भास्कर को धीरे-धीरे सान्त्वना देते हुए प्रकृतिस्थ किया । तब कहा, परम तेजोमय होने के कारण तुम्हारा यह रूप शोभा नहीं देता, इस प्रकार स्वरूप को सहन करने में अपने को असमर्थ पाकर संज्ञा अब हरे भरे घास के मंदान में चर रही है । अपनी उस शुभमार्गगासमिनी, स्वरूपवती, यौवनशालिनी, प्रशंसनीय गुणोंवाली पत्नी को आप आज देखेंगे, शर्त यही है कि आप हमारी सम्मति अंगरीकार करें और ज॑सा हम कहें वसा करें। है शत्रुओं को वश में करने वाले ! तुम्हारे इस श्रेष्ठ तेजोमय पूवेरूप को हम परिवर्तित करना चाहते हैं ।६९-६६९१। उस समय सूर्य का तेजोमय स्वरूप तिरछा, ऊंचा और नीचा था, अर्थात् उनकी किरणें तिरछे, ऊँचे, नीचे सवंत्र

English

Brhaspati's sister was a noble lady (named) Yogasiddha. Observing celibacy and being detached, she roamed over the whole universe.

अध्याय १५५

श्लोक 62

विचारयन्तौ सततं तिष्ठाते तौ दिवानिशम् ।ततो ह्यावां प्रणामान्ते यमेन यममूर्तिना

vicārayantau satataṃ tiṣṭhāte tau divāniśam / tato hyāvāṃ praṇāmānte yamena yamamūrtinā

हिन्दी अर्थ

प्रखर तेजोमयी थीं । अपने उक्त रूप की चर्चा से दिनकर देव लज्जित हुए। अपने जिस प्रसिद्ध चक्र से सूर्य के रूप-परिवतंन को चर्चा महातपस्वी विश्वकर्मा ने की थी, उस चक्र को बहुत सम्मान से देखा सूर्य से रूप परिवर्तन की आज्ञा प्राप्तकर विश्वकर्मा मातंण्ड के सम्मुख सचक्र उपस्थित हुए और अपने उस चक्र (धान) पर रखकर उनके तेज को खराद दिया । चक्र द्वारा तेज की प्रखरता के खराद देने पर सूर्य का शेष

English

She became the wife of the eighth of the Vasus, vizi Prabhasa. Visvakarma, the creator of arts and crafts was born as her son.

अध्याय १५५

श्लोक 63

पृष्टावागमने हेतुं तमब्रूव शृणुष्व तत् ।उज्जयिन्यां महीपालश्चाणक्यो ऽभूत् प्रतापवान्

pṛṣṭāvāgamane hetuṃ tamabrūva śṛṇuṣva tat / ujjayinyāṃ mahīpālaścāṇakyo 'bhūt pratāpavān

हिन्दी अर्थ

तेज परम सुशोभित हुआ । और देखने में पहिले जो अच्छा नहीं लगता था वही सुन्दर से भी सुन्दरतर दिखाई पड़ने लगा । तदनन्तर सूर्य ने योगबल द्वारा वडवारूपधारिणी अपनी स्त्री को देखा ।७०-७४। उस समय वह अपने तेज एवं नियमों के कारण सभो जीवों से अदृइय थी । उसे देख मार्तण्ड ने अश्व का रूप धारण किया ओर मुख की ओर से काम-भावना प्रकट की । काम-चेष्टा करने पर संज्ञा ने पराये पुरुष की छांका से यूर्य के वीये को अपनी म।सिक्रा के दोनों छिद्रों द्वारा बाहर गिरा दिया । उस बाहर गिराये हुए सूर्य के वीर्य

English

(He was known as) Tvastr. He created many forms. He was the grandson of Dharma. He was liberal-minded. He was the creator of thousands of arts and crafts. He was the Architect of Devas.

अध्याय १५५

श्लोक 64

द्वादशाहे मृतस्यास्य भुक्त्वा प्राप्तौ यमालयम् ।ततो ऽस्माकं वचः श्रुत्वा कम्पयित्वा शिरो यमः

dvādaśāhe mṛtasyāsya bhuktvā prāptau yamālayam / tato 'smākaṃ vacaḥ śrutvā kampayitvā śiro yamaḥ

हिन्दी अर्थ

देवों तस्मादजायेतामश्विनौ भिषजां वरो । नासत्यश्चेव दख्नश्न स्पृतौं द्वावश्चिनाविति ७७ मातंण्डस्य सुतावेतावष्टमस्य प्रजापते: । तां तु रूपेण कानतेन दर्शयामास भास्कर: द ७८

English

He made aerial chariots for all the Devas. Human beings

अध्याय १५५

श्लोक 65

उवाच वचनं सत्यं सभामध्ये हसन्निव ।अस्ति तत्कारणं येन चाणक्यः पापपूरुषः

uvāca vacanaṃ satyaṃ sabhāmadhye hasanniva / asti tatkāraṇaṃ yena cāṇakyaḥ pāpapūruṣaḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मण रञझुजयामास धमंराजस्ततस्तु सः। सोइलभत्कमंणा तेन शुभेन परमद्युतिः पितृणामाधिपत्यं च लोकपालत्वमेव च । मनुः प्रजापतिस्त्वेब॑ सावर्णं: स महायशाः ८९१ भाव्यस नागते तस्मिन्मनु: सावणिके5न्तरे । मेरुपृष्ठ सुरम्ये वे अद्यापि चरते प्रभुः

English

Tvastr's wife was the famous daughter of Prahlada and was the sister of Virocana and the mother of Trisiras

अध्याय १५५

श्लोक 66

नायातो मम लोके तु सर्वपापभयंकरे ।शुक्लतीर्थे मृतानां तु नर्मदायां परं पदम्

nāyāto mama loke tu sarvapāpabhayaṃkare / śuklatīrthe mṛtānāṃ tu narmadāyāṃ paraṃ padam

हिन्दी अर्थ

यवीयसो तयोरया तु यमुना च यशस्विनो । अभवत्सा सरिच्छ ष्ठा यमुना लोकभाविनी ८४

English

Maya, the son of the intelligent preceptor of Devas in craftsmanship of all kinds, is remembered as Visvakarma also

अध्याय १५५

श्लोक 67

जायते सर्वजन्तूनां नात्र काचिद्विचारणा ।अवशः स्ववशो वापि जन्तुस्तत्क्षेत्रमण्डले

jāyate sarvajantūnāṃ nātra kācidvicāraṇā / avaśaḥ svavaśo vāpi jantustatkṣetramaṇḍale

हिन्दी अर्थ

से परम बेद्य दोनों अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई, जो दिव्यगुणसम्पन्न थे। वे दोतों अश्वनीकुमार नासत्य और दल््न नाम से विख्यात हैं ।७२-७७। ये दोनों आठवें प्रजापति मार्तण्ड के पुत्र कहे जाते हैं। तदनन्‍्दर अपने मनोहर स्वरूप को भास्कर ने संज्ञा को दिखाया, पत्नी संश्ा अपने पति के इस परम सुन्दर अभिनव स्वरूप को देखकर परम सन्तुष्ट ओर मोहित हुई । उधर मृण्मयी संज्ञा के उक्त ज्ञाप के कारण यमराज बहुत ही दुःखी ओर क्षुब्ध थे, किन्तु अपने धर्माचरण द्वारा उन्होंने सब को परम प्रसन्न किया, जिससे उनवा माम ही धर्म- राज हुआ । अपने शुभकर्मों द्वारा यम से परम सुन्दर कान्ति प्राप्त की ।७८-८०। यही नहीं, समस्त पितरों का माधिपत्य एवं लोकपालकत्त को पदवी भी उन्हें प्राप्त हुई। महान् यशस्‍्वी सावरणि मनु इस प्रकार साव्णि मन्वन्तर में प्रजापति रूप में प्रतिष्ठित होंगे । वे प्रभु सुरम्य सुमेरु के पृष्ठभाग पर आज भी तपश्चर्या में

English

His younger sister, the daughter of Tva lt r (originally) famous by the name of Surenu, became the wife of the Sun and was well known as Samjna.

अध्याय १५५

श्लोक 68

मृतः स वै न सन्देहो रुद्रस्यानुचरो भवेत् ।तद्धर्मवचनं श्रुत्वा निर्गत्य नगराद्बहिः

mṛtaḥ sa vai na sandeho rudrasyānucaro bhavet / taddharmavacanaṃ śrutvā nirgatya nagarādbahiḥ

हिन्दी अर्थ

निरत हैं ।८१-८२। उसी स्थान पर उनके भ्राता शनेश्चर ग्रह रूप में प्रतिष्ठित हुए । विश्वकर्मा ने सुयें के उस खरादे हुये तेजोमयरूप से विष्णु के उस चक्र का तिर्माण किया, जो युद्धस्थल में दानवों का विध्वंसक एवं महान् शक्तिशाली है ।5३। उन दोनों की छोटी यशस्विनी भगिनी जो थी, वह यमुना नाम से विख्यात हुई। जो लोक को पविन्न करनेवाली सरिताओं में श्रेष्ठ यमुना के रूप में परिणत हुई। सूर्य के उन दोनों पुत्रों में

English

Assuming the form of a mare, the noble lady went to the land of Kurus. The blessed lady bore two sons to the Sun who had assumed the form of a horse. She gave birth to them through nostrils. They were the twin gods, the Asvins Nasatya and Dasra. Both of them were the sons of Martanda (the Sun-god). ' v

अध्याय १५५

श्लोक 69

पश्यन्तौ विविधां घोरां नरके लोकयातनाम् ।त्रिंशत्कोट्यो हि घोराणां नरकाणां नृपोत्तम

paśyantau vividhāṃ ghorāṃ narake lokayātanām / triṃśatkoṭyo hi ghorāṇāṃ narakāṇāṃ nṛpottama

हिन्दी अर्थ

जो ज्येष्ठ पुत्र थे, उनका नाम मनु था, उन मनु का बंश आज भी प्रथ्वी तल पर विद्यमान है, उसे विस्तार पूर्वक बतला रहा हूं महातेजस्वी, सूर्य के इन सातों देवरूप पुत्रों के जन्म विषयक इस वत्तान्त को, जो मनुष्य सुनता इ॒वं तु जन्म देवानां शुणुयाद्वा पठेत वा । वेवस्व॒तस्थ पुत्राणां सप्तानां तु महौजसाम् ॥

English

Why is (the Sun) called Martanda by learned men? Why did she, in the form of a mare, give birth to them through the nostrils? We wish to know this. Please explain this to us who ask you.

अध्याय १५५

श्लोक 70

दृष्टा भीतौ परामार्तिगतौ तत्र महापथि ।नरको रौरवस्तत्र महारौरव एव च

dṛṣṭā bhītau parāmārtigatau tatra mahāpathi / narako rauravastatra mahāraurava eva ca

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते बैवस्वतोत्पत्तिवर्णनं नाम चतुरशीतितमोउ्याय:

English

Fora long time, the egg did not break (did not get hatched). It was broken open by Tvastr. On seeing it, Kas'yapa became sad as he feared that the foetus was killed.

अध्याय १५५

श्लोक 71

पेषणः शोषणश्चैव कालसूत्रो ऽस्थिभञ्जनः ।तामिस्रश्चान्धतामिस्रः कृमिपूतिवहस्तथा

peṣaṇaḥ śoṣaṇaścaiva kālasūtro 'sthibhañjanaḥ / tāmisraścāndhatāmisraḥ kṛmipūtivahastathā

हिन्दी अर्थ

तस्य वेवस्वतो वक्ष्ये सांप्रतस्य महात्मनः । आनृपृव्येण वे विप्राः कीत्यंमान॑ निबोधत है भयवा पढ़ता है, वह आपत्तियों में फंसफर भी छुटकारा पा जाता है, और भहान् यश का भाभी

English

When the egg was broken into two parts, he looked into it and said to Tvastr, "This is certainly not an (ordinary)egg". (Then to the child he said) "O Sinless one, be Martanda".

अध्याय १५५

श्लोक 72

दृष्टश्चान्यो महाज्वालस्तत्रैव विषभोजनः ।नरकौ दंशमशकौ तथा यमलपर्वतौ

dṛṣṭaścānyo mahājvālastatraiva viṣabhojanaḥ / narakau daṃśamaśakau tathā yamalaparvatau

हिन्दी अर्थ

श्राद्धीय प्रसंग में बेवस्वत मनु के वंश का वर्णन सूत ने कहा-हे विप्रवन्द ! तदनन्तर चाक्ष॒ष मन्वन्तर के व्यतीत हो जाने पर, जब देवगण भी व्यतीत हो गये, तब महान् प्रभावशाली सुर्य-पुत्र मनु समस्त पृथ्वी के सम्राट पद के अधिकारी हुए ।१। उन

English

The father affectionately said—"Indeed this (child) in the egg is not dead". On hearing his words, the relevancy of the name has been understood.

अध्याय १५५

श्लोक 73

नदी वैतरणी दृष्टा सर्वपापप्रणाशिनी ।शीतलं सलिलं यत्र पिबन्ति ह्यमृतोपमम्

nadī vaitaraṇī dṛṣṭā sarvapāpapraṇāśinī / śītalaṃ salilaṃ yatra pibanti hyamṛtopamam

हिन्दी अर्थ

वर्तमान महात्मा सूयंपुनत्र मनु के वंश का वर्णत हम क्रमपूर्वक कर रहे हैं, आप लोग सुनिये प्रथमतः उन्हीं वेवसस्‍्वत मनु के वंश को लेकर बतला रहा हूँ सबसे बड़े मनु के उन्हीं के समान प्रभावज्ञाली "नव पुत्र १. गणना से पुत्रों की संख्या दस होती ।

English

Since he was addressed by the father, "Be born of the dead (broken) egg", when the egg was broken, Vivasvan is cal-

अध्याय १५५

श्लोक 74

तदेव नीरं पापानां शोणितं परिवर्तते ।असिपत्रवनं चान्यद्दृष्टान्या महती शिला

tadeva nīraṃ pāpānāṃ śoṇitaṃ parivartate / asipatravanaṃ cānyaddṛṣṭānyā mahatī śilā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मणा तु मनुः पुर्व॑ चोदिवस्तु निबोधत। स्रष्दुं प्रचक्रमे।कार्म निष्फलं समवतंत ५ अथाकरो त्पुत्रकामः परामिष्टिं प्रजापति: । मित्रावरुणयोरंशे मनुराहुतिमाबपत् ६

English

Henceforth I shall mention the progeny of Martanda Vivasvan. Formerly three children were born of his wife Samjna

अध्याय १५५

श्लोक 75

अग्निपुंजनिभाकारा विशाला शाल्मली परा ।इत्यादयस्तथैवान्ये शतसाहस्रसंज्ञिताः

agnipuṃjanibhākārā viśālā śālmalī parā / ityādayastathaivānye śatasāhasrasaṃjñitāḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मयुक्तमिदं वाच्य॑ पुत्रकाम॑ प्रजापतिम् । मित्रावरुणयोरंशे जातास्मि वदतां वर ९ तयो: सकाशं यास्यामि मानो धर्मो हतोइबधीत्। सेवसुक्त्वा पुनर्देवी तयोरन्तिकमागतम् १० गत्वाइन्तिकं बरारोहा प्राउजलिकबॉक्यमब्रवीत् । अंशेस्मि युवयोर्जाता देवो कि करवाणि वाम् मनुनवाहमुक्ताइस्मि अनुगच्छस्व मासिति तथा तु वदती साध्वीमिडामाश्ित्य ताबुभो

English

(Later) the younger Manu Savarni and Sanaiscara

अध्याय १५५

श्लोक 76

घोरघोरतरा दृष्टाः क्लिश्यन्ते यत्र मानवाः ।वाचिकैर्मानसैः पापैः कर्मजैश्च पृथग्विधैः

ghoraghoratarā dṛṣṭāḥ kliśyante yatra mānavāḥ / vācikairmānasaiḥ pāpaiḥ karmajaiśca pṛthagvidhaiḥ

हिन्दी अर्थ

देवों न मित्रावरुणाविदं वचनमुचतुः । अनेन तव धमंज्ञे प्रश्येण दसेन च ११३

English

Vivasvan of great fame, was born of KaSyapa and a daughter of Daksa. The noble lady, the daughter of Tva?tr be¬ came the wife of Vivasvan. Originally she was well known by the name Surenu and later came to be known as Samjna.

अध्याय १५५

श्लोक 77

अहंकारकृतैर् दोषैर् मायावचनपूर्वकैः ।पिता माता गुरुर्भ्राता अनाथा विकलेन्द्रियाः

ahaṃkārakṛtair doṣair māyāvacanapūrvakaiḥ / pitā mātā gururbhrātā anāthā vikalendriyāḥ

हिन्दी अर्थ

हुए जिनके माम इध्वाकु, नहुष , धृष्ट, शर्याति, मरिष्यन्त, प्रांशु, (नाभाग अरिष्ट) करूष और पृषप्नथे, ये नव (?) मनु के पुत्रों के नाम से विख्यात हुए ।२-४। सुनिये, प्राचीन काल में ब्रह्मा की प्रेरणा से भनु ने सृष्टि विस्तार का कम प्रारम्भ किया, पर निष्फल रहे । तदनन्तर पुत्र की कामना से प्रजापति मनु ने पृत्रेष्टि यश का अनुष्ठान किया, और मित्रावरुण के लिये आहुति अग्नि में छोड़ी ऐसा सुना जाता है कि उस यज्ञ- भूमि से परम दिव्य मनोहर वस्त्रों को घारण किये, दिव्य आभरण से विभूषित दिव्य अंगों वाली इडा उत्पन्न हुई ।५-७। दण्डधा रण किये हुए मनु ने ऐसा कहा जाता है कि उसे “'इला' कहकर सम्बोधित किया । तब इला ते पुत्र के अभिलाषी प्रजापति मनु को यह धर्म युक्त प्रत्युत्तर दिया, भद्द ! मैं आप की अनुगामिनी (आज्ञा कारिणी) हें, आप का कल्याण हो । बोलने वालों में श्रेष्ठ! मैं सिन्रावरुण के अंश से उत्पन्न हुई हूं अतः

English

The wife of lord Martanda of excessive splendour was a woman of great beauty in the prime of youth. She was dis¬ satisfied with the dazzling form of her husband.

अध्याय १५५

श्लोक 78

भ्रमन्ति नोद्धृता येषां गतिस्तेषां हि रौरवे ।तत्र ते द्वादशाब्दानि क्षपित्वा रौरवे ऽधमाः

bhramanti noddhṛtā yeṣāṃ gatisteṣāṃ hi raurave / tatra te dvādaśābdāni kṣapitvā raurave 'dhamāḥ

हिन्दी अर्थ

उन्हीं के पास जा रही हँ, जिससे हमारा धर्म नष्ट न हो और हमारे विनाश का कारण न बने । इसी बात को पुन: कहऋर वह दिव्य गुण सम्पन्ना इडा मित्रावरण के पास चली गई ।५-१०। सुन्दरी, उन. दोनों के पास पहुँच कर हाथ जोड़ते हुए बोली, है युगल देव ! मेरा जन्म आप दोनों के अंश से हुआ है, अतः मेरे लिए क्या आज्ञा है? मैं आपका वया उपकार करूँ? मनु ने मुझसे यह कहा था कि तुम मेरी अनुगामिती बनो' इस

English

The dazzlingly brilliant person of Martanda, the son of Aditi, coming into contact with her body was not very pleas¬ ing to her.

अध्याय १५५

श्लोक 79

इह मानुष्यके लोके दीनान्धाश्च भवन्ति ते ।देवब्रह्मस्वहर्त्ःणां नराणां पापकर्मणाम्

iha mānuṣyake loke dīnāndhāśca bhavanti te / devabrahmasvahartḥṇāṃ narāṇāṃ pāpakarmaṇām

हिन्दी अर्थ

पर आप लोगों की क्‍या आज्ञा है (?) उस परम चरित्रवती इडा के इस श्रकार कहने पर वे दोनों देवगण उसके समीप चले आये ओर उसे पकड़कर बोले, है धर्म के महत्त्व को जाननेवाली ! तुम्हारे इस सत्याचरण, इन्दिय दमन, एवं प्रश्रय से हम लोग बहुत ही प्रसन्न हैं ।११-१३। है सुम्दर अंगों वाली महाभाग्यशालिनी, तुम सुद्युम्न इति विश्यातिस्त्रिषु लोकेषु पुजितः जगत्प्रियों ध्मंशीलो मनोव॑शविवर्धनः

English

Being unaware, Kasyapa said out of affection, "Indeed this (child) in the egg is not dead". Hence he is called Mar¬ tanda.

अध्याय १५५

श्लोक 80

महारौरवमाश्रित्य ध्रुवं वासो यमालये ।ततः कालेन महता पापाः पापेन वेष्टिताः

mahārauravamāśritya dhruvaṃ vāso yamālaye / tataḥ kālena mahatā pāpāḥ pāpena veṣṭitāḥ

हिन्दी अर्थ

मानवः स तु सुद्युम्तः स्त्रीभावमगमत्प्रभुः। सा तु देवी बर॑ लब्ध्वा निवत्ता पितरं प्रति. ४१६ बुधेनान्तरमासाथ मैथुनायोपमन्त्रिता । सोमपुत्रादुवुधाच्चास्या ऐलो जज्ञे पुरूरवाः ..

English

The brilliance of Vivasvan increased day by day where¬ by he, the son of Kasyapa, scorched the three worlds.

अध्याय १५५

श्लोक 81

जायन्ते कण्टकैर्भिन्नाः कोशे वा कोशकारकाः ।मृगपक्षिविहङ्गानां घातका मांसभक्षकाः

jāyante kaṇṭakairbhinnāḥ kośe vā kośakārakāḥ / mṛgapakṣivihaṅgānāṃ ghātakā māṃsabhakṣakāḥ

हिन्दी अर्थ

बुधात्सा जनयित्वा तु सुझ्यम्नं पुनरागता । सुथ्युम्तस्य तु दायादास्त्रयः परमधासिका: प्रविसृष्टे मनो तस्मिन्प्रजाः सृुष्ट्वा दिवाकरः । दशथा तद्धत्क्षेत्रमक रोत्पृथिवीमिसाम्

English

Ravi (the Sun-god) begot of Samjna three children, two sons of great prowess and the daughter Kalindi (Yamuna).

अध्याय १५५

श्लोक 82

पेषणं नरकं यान्ति शोषणं जीवबन्धनात् ।तत्रत्यां यातनां घोरां सहित्वा शास्त्रचोदिताम्

peṣaṇaṃ narakaṃ yānti śoṣaṇaṃ jīvabandhanāt / tatratyāṃ yātanāṃ ghorāṃ sahitvā śāstracoditām

हिन्दी अर्थ

बशिष्ठवचनाच्चा5ध्सी त्प्रतिष्ठा. नो महाद्युतिः प्रतिष्ठा धर्मराजस्य सुशुम्नस्य महात्मनः.

English

Manu was the eldest son of Vivasvan. He was a Praja- pati and known as Sraddhadeva. Yama and Yami were born as twins.

अध्याय १५५

श्लोक 83

इह मानुष्यतां प्राप्य पङ्ग्वन्धबधिरा नराः ।गवार्थे ब्राह्मणार्थे च ह्यनृतं वदतामिह

iha mānuṣyatāṃ prāpya paṅgvandhabadhirā narāḥ / gavārthe brāhmaṇārthe ca hyanṛtaṃ vadatāmiha

हिन्दी अर्थ

तत्प्रूरवसे प्रादाद्राष्ट्रं प्राप्प सहायशा: । मानवेध्यो महाभागा स्त्रीपुंसोलंक्षणं प्रति ॥ हम दोनों की कन्या के रूप में प्रतिष्ठित होगी । पुनः तीनों लोकों में पृजणनीय, जगत के प्रिय, धर्म शील, मनु के वंश के विस्तारक सुद्युम्न रूप में विख्यात होगे, वे सुद्युम्न पुनः स्त्री रूप में परिणत हुए । देवी इला वरदान प्राप्ति के बाद पिता के पास वापस आई। उचित अवसर देखकर उसे बुध ने काम तृप्ति के लिए निमंत्रित किया । चन्द्रमा के पुत्र बुध से इला को पुलूरवा नामक पृत्र उत्पन्न हुआ ।ह४-१७। बुध के संयोग से पुरूरवा

English

On seeing the whetted brilliance of Vivasvan and una¬ ble to endure it, Samjna created her own shadow of the same complexion as hers.

अध्याय १५५

श्लोक 84

पतनं जायते पुंसां नरके कालसूत्रके ।तत्रत्या यातना घोरा विहिता शास्त्रकर्तृभिः

patanaṃ jāyate puṃsāṃ narake kālasūtrake / tatratyā yātanā ghorā vihitā śāstrakartṛbhiḥ

हिन्दी अर्थ

को जन्म देकर वह पुनः सुदझ्युम्न रूप में परिणत हो गई। सुद्युम्त के तीन परम धामिक पुत्र हुए, जिनके नाम उत्कल, गय और विनताइव थे। उत्कल का राष्ट्र उत्कल प्रदेश, विनताइव का पद्चमी प्रदेश और राजधि दिक्ष्षवात (विनताइव ?) की गया नामक पुरी थी ।१८-१९। उस मभन्‍न्वन्तर में मनृपुत्र सूर्य ने इस प्रकार सृष्टि का विस्तार कर समस्त पृथ्वीमण्डल को दस भागों में विभक्त किया। इक्ष्वाकु ने अन्य दस पुत्रों को प्राप्त किया,

English

That woman of earthly form, bom of her shadow came to her humbly with palms joined in reverence and spoke to Samjna:

अध्याय १५५

श्लोक 85

भुक्त्वा समागता ह्यत्र ते यास्यन्त्यन्त्यजां गतिम् ।बन्धयन्ति च ये जीवांस्त्यक्त्वात्मकुलसन्ततिम्

bhuktvā samāgatā hyatra te yāsyantyantyajāṃ gatim / bandhayanti ca ye jīvāṃstyaktvātmakulasantatim

हिन्दी अर्थ

जो राज्य के उत्तराधिकारी थे, कन्या होने के कारण सुद्युम्न इस राज्य के उत्तराधिकार को नहीं प्राप्त कर सके । तब बसिष्ठ के अदेशानुसार धर्मराज महात्मा सुद्युम्न प्रतिष्ठान (?) के उत्तरांधिकारी हुए। किन्तु परम यशस्वी मनु पुत्र सुचम्त राज्य प्राप्त कर फिर से स्त्री रूप में जब हो गये तब राज्य को पुरूरवा को दे दिया, मनुष्य में स्त्री पुरुषों के चित्न की सहज ही जानकारी रहती है। सूत की ऐसी बातें सुन ऋषियों ने पूछा, मनु पुत्र सुद्युम्त पुरुष हो कर स्त्री रूप में किस प्रकार परिणत हुए

English

The Vedic word is Marlaptfa 'born of an (apparently) dead egg'. Martanda is a later Puranic form, though the derivation is the same.

अध्याय १५५

श्लोक 86

पतन्ति नात्र सन्देहो नरके ते ऽस्थिभञ्जने ।तत्र वर्षशतस्यान्त इह मानुष्यतां गताः

patanti nātra sandeho narake te 'sthibhañjane / tatra varṣaśatasyānta iha mānuṣyatāṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रोवाच वचन देवी प्रियहेतो: प्रियं प्रिया । समे मसा55श्रमे देव यः पुमास्संप्रवेक्ष्यति ॥ भविष्यति श्षुव नारो सा तुल्याप्सरसां शुभा

English

You must remain m my house without any hesitation These two sons of mine and this daughter of splendid complex¬ ion (should be looked after).

अध्याय १५५

श्लोक 87

कुब्जा वामनकाः पापा जायन्ते दुःखभागिनः ।ये त्यजन्ति स्वकां भार्यां मूढाः पण्डितमानिनः

kubjā vāmanakāḥ pāpā jāyante duḥkhabhāginaḥ / ye tyajanti svakāṃ bhāryāṃ mūḍhāḥ paṇḍitamāninaḥ

हिन्दी अर्थ

उमावन प्रविष्टस्तु स राजा म्ृगयां गतः । पिशाच:ः सह भुतेस्तु घद्रः स्त्रीभावमास्थिते ७२७ तत्मात्स राजा सुद्युम्नः स्त्रीभावं लब्धवान्पुनः महादेवप्रसादाच्च गाणपत्यमवाप्नुयात् २८ इति महापुराणे वायुप्रोक्ते वेवस्वतमनोः सृष्टिकथन नाम पश्चाशीतितमोअध्याय:

English

This (arrangement) should not be mentioned to the lord, my husband".

अध्याय १५५

श्लोक 88

ते यान्ति नरकं घोरं तामिस्रं नात्र संशयः ।तत्र वर्षशतस्यान्ते इह मानुष्यतां गताः

te yānti narakaṃ ghoraṃ tāmisraṃ nātra saṃśayaḥ / tatra varṣaśatasyānte iha mānuṣyatāṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

खूत ने कद्दा--प्राचीनकाल की बात है एक बार देवी (पावती) ने देव से यह प्रिय निवेदन अपने हित की दृष्टि से किया था कि है देव ! मेरे इस आश्रम में जो कोई पुरुष प्रवेश करेगा वह निश्चय अप्सराओं के समान सुल्दरी स्त्री के रूप में परिणत हो जायगा। पार्वती के इस बचन के अनुसार उस आश्रम में भूत, पिशाच, पशु आदि जितने जीवगण थे सब स्त्री रूप धारण कर इन्द्र के साथ अप्सराओं के समान क्रीडा करने

English

"O noble lady, until the hair is caught hold of, I will never speak your secret idea. O noble lady, go back to your own house".

अध्याय १५५

श्लोक 89

दुश्चर्माणो दुर्भगाश्च जायन्ते मानवा हि ते ।मानकूटं तुलाकूटं कूटकं तु वदन्ति ये

duścarmāṇo durbhagāśca jāyante mānavā hi te / mānakūṭaṃ tulākūṭaṃ kūṭakaṃ tu vadanti ye

हिन्दी अर्थ

लगे । मृगया खेलते हुए राजा उमा के, उस बन में प्रविष्ट हुए। वहाँ पिशाचों और भूतों के साथ रद् स्त्री रूप में विराजमान थे। इसी कारण वह राजा सुद्युम्न पुनः स्त्री रूप को प्राप्त हुए, और महादेव की कृपा से गणों का आधिपत्य प्राप्त किया शापाच्छद्रत्वमापन्न श्व्यवनस्य महात्मन: । करूषस्य तु कारूषा: क्षत्रिया युद्धदुमंदाः

English

After consoling Samjna, she said, "So be it". She- the woman in a pitiable condition, went nearTvastras though greatly ashamed.

अध्याय १५५

श्लोक 90

नरके ते ऽन्धतामिस्रे प्रपच्यन्ते नराधमाः ।शतसाहस्रिकं कालमुषित्वा तत्र ते नराः

narake te 'ndhatāmisre prapacyante narādhamāḥ / śatasāhasrikaṃ kālamuṣitvā tatra te narāḥ

हिन्दी अर्थ

भलन्दनस्य पुत्रोइसुत्पांशर्नाम महाबलः। प्रांशोरेकी5भवत्पुन्रः प्रजानिरिति विश्वुतः

English

On seeing her come back, the father became angry and spoke to Samjna: "Go back to your husband. Do not hate Diva- kara (the Sun-god)."

अध्याय १५५

श्लोक 91

इह शत्रुगृहे त्वन्धा भ्रमन्ते दीनमूर्तयः ।पितृदेवद्विजेभ्यो ऽन्नमदत्त्वा ये ऽत्र भुञ्जते

iha śatrugṛhe tvandhā bhramante dīnamūrtayaḥ / pitṛdevadvijebhyo 'nnamadattvā ye 'tra bhuñjate

हिन्दी अर्थ

विविशपुत्रों धर्मात्मा खनिनेत्रः प्रतापवान् । करन्धमस्तस्यपुन्रस्त्रेतायुगमुखेडभवत् वैवस्वत मनु के वंश-प्रसंग में गन्धर्वों की मूच्छेना का वर्णन

English

Though urged thus by her father and compelled (to go) again and again, she lived in her father's house for a thousand years.

अध्याय १५५

श्लोक 92

नरके कृमिभक्ष्ये ते पतन्ति स्वात्मपोषकाः ।ततः प्रसूतिकाले हि कृमिभुक्तश्च सव्रणः

narake kṛmibhakṣye te patanti svātmapoṣakāḥ / tataḥ prasūtikāle hi kṛmibhuktaśca savraṇaḥ

हिन्दी अर्थ

मनु के पुत्रों का सृष्टि-विवुरण विस्तार पूव॑क सुनिये । मनु-पुश्र परषश्न अपने गुरु महात्मा च्यवन की गौ को मार कर झा गये, जिसके कारण शापवश्य शूुद्र वर्ण में प्राप्त हुए। करुष के कारुष नामक पुत्रगण संग्राम में दु्दंननीय थे। नाभाग अरिष्ट का पुत्र भलन्दन परमविद्वान् और सहसौरों क्षत्रियों के समूहों में एक मात्र बलशाली हुआ ।१-३। भलन्दन का पुत्र महाबलवान् प्रांधु हुआ, उस प्रांशु को एक पूत्र हुआ जो प्रजानि

English

"Go to your husband's house". When insisted upon again and again thus,that uncensured (praise-worthy) lady con¬ cealed her real form and assumed the form of a mare. She went to the northern Kurus and began to graze grass.

अध्याय १५५

श्लोक 93

जायते ऽशुचिगन्धो ऽत्र परभाग्योपजीवकः ।स्वकर्मविच्युताः पापा वर्णाश्रमविवर्जिताः

jāyate 'śucigandho 'tra parabhāgyopajīvakaḥ / svakarmavicyutāḥ pāpā varṇāśramavivarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

नाम से विख्यात हुआ ॥४। प्रजानि का खनिन्न नामक वीयंशाली पुत्र हुआ, उस खनित्र का पुत्र महायशस्वी क्षप हुआ, जो परम शोभा सम्पन्न था ।१। क्षुप के पुत्र विश हुए, जिनके समान कोई नहीं हुआ । विश्व के पुत्र घमिक विचारों वाले, कल्याणकारी विविश हुए ।६। विविश के पुत्र प्रतापश्ञाली, धर्मात्मा खनिनेत्र हुए, उनके पुत्र करन्धम हुए, जो त्रेतायुग के प्रारम्भ में वतंमान थे ।७। करन्धम के आविक्षित् नामक प्रतापशाली पुत्र अतव्रा55षंत्वादाकारंकादिशाभाव: ।

English

Considering that she (the shadow of Saihjna) was the real Samjna, the Sun begot of the shadow, the second Samjna, two sons of the splendour of Aditya (the Sun).

अध्याय १५५

श्लोक 94

नरके पूयसम्पूर्णे क्लिश्यन्ते ह्ययुतं समाः ।पूर्णे तत्र ततः काले प्राप्य मानुष्यकं भवम्

narake pūyasampūrṇe kliśyante hyayutaṃ samāḥ / pūrṇe tatra tataḥ kāle prāpya mānuṣyakaṃ bhavam

हिन्दी अर्थ

करन्धमसुतश्रापि आविक्षिन्नाम वोयंबान्ू आविक्षितो व्यतिक्रामत्पितरं ग्रुणवत्तया

English

The sons were Srutasrava, the knower of Dharma, and Srutakarman. Both of those lordly ones were equal to Manu the eldest-born.

अध्याय १५५

श्लोक 95

उद्वेजनीया भूतानां जायन्ते व्याधिभिर्वृताः ।अग्निदो गरदश्चैव लोभमोहान्वितो नरः

udvejanīyā bhūtānāṃ jāyante vyādhibhirvṛtāḥ / agnido garadaścaiva lobhamohānvito naraḥ

हिन्दी अर्थ

मनुत्तो नाम धर्मात्मा चक्नवरतिसमों नृपः । संवर्तेन दिवं नीतः ससुहत्सह बान्धव: १९ विवादोउत्र महानासीत्संवर्तस्य बृहस्पतेः । ऋच्धि दृष्ट्वा तु यज्ञस्थ कुद्धस्तस्थ ब्रहस्पतिः १० संबर्तेन हृते यज्ञे चुकोप सुभुश तदा । लोकानां स हि नाशाय दवतहिं प्रसादितः ११ मनुत्तश्नक्नवर्तोी स नरिष्यन्तमवाप्तवा न् । नरिष्यन्तस्य दायादो राजा दण्डधरो दमः तस्य पुत्रस्तु विक्रान्तो राजा5धसीद्राष्ट्रवर्धन: सुधुती तस्य पुत्रस्तु नरः सुधृतिनः सुतः ३१३ केवलस्तस्य पुत्रस्तु बन्धमान्केवलात्मजः अथ बन्धुमतः पुत्नो धर्मात्मा वेगवाच्मपः

English

Srutasravas will become Savarni Manu. The planet Sanaiscara (Saturn) is to be known as Srutakarman.

अध्याय १५५

श्लोक 96

नरके विषसम्पूर्णे निमज्जति दुरात्मवान् ।तत्र वर्षशतात्कालादुन्मज्जनमवस्थितः

narake viṣasampūrṇe nimajjati durātmavān / tatra varṣaśatātkālādunmajjanamavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

बुधों बेगवतः पृत्रस्तृणबिन्दुर्बृंधात्मज । त्रेतायुगमुखे राजा तृतीये संबभूव ह .

English

It is known that Savarni became Manu. The earthly form of Samjna was affectionate only towards her (own) sons and not towards the earlier born ones. Manu bore.it patiently, but. Yama did not brook it.

अध्याय १५५

श्लोक 97

भुवि मानुषतां प्राप्य कृपणो जायते पुनः ।पादुकोपानहौ छत्रं शय्यां प्रावरणानि च

bhuvi mānuṣatāṃ prāpya kṛpaṇo jāyate punaḥ / pādukopānahau chatraṃ śayyāṃ prāvaraṇāni ca

हिन्दी अर्थ

कन्या तु तस्य द्रविडा साता विश्रवसों हि सा। पुत्रश्चास्य विशालो5मृद्राजा परसधामिक: विशालस्य समुत्पन्ना विशाला येन निर्मिता । विशालस्य सुतो राजा हेमचन्द्रो महाबलः.

English

On being insulted many times (by the step-

अध्याय १५५

श्लोक 98

अदत्त्वा दंशमशकैर्भक्ष्यन्ते जन्यसप्ततिम् ।पितुर्द्रव्यापहर्तारस्ताडनक्रोशने रताः

adattvā daṃśamaśakairbhakṣyante janyasaptatim / piturdravyāpahartārastāḍanakrośane ratāḥ

हिन्दी अर्थ

सुचन्द्र इति बिश्यातो हेमचन्द्रादनन्तरम् । सुचन्ब्रतनयो राजा धूम्राश्व इति विश्वुतः १८ धम्राश्वतनयो विद्वान्युआजयः समपच्चयत सृअ्जयस्य सुतः श्रीमान्सहदेवः प्रतापवान्

English

"Since you are threatening the renowned wife of your father, this leg of yours will undoubtedly fall off."

अध्याय १५५

श्लोक 99

पीडनं क्रियते तेषां यत्र तौ युग्मपर्वतौ ।या सा वैतरणी घोरा नदी रक्तप्रवाहिनी

pīḍanaṃ kriyate teṣāṃ yatra tau yugmaparvatau / yā sā vaitaraṇī ghorā nadī raktapravāhinī

हिन्दी अर्थ

हुए आविशक्षित् ने अपने गुणों द्वारा अपने. पिता का अतिक्रमण किया, उनके पुत्र परमधर्मात्मा, चक्रतरतियों के समान प्रभावशाली राजा मनुत्त (महत्त) नामक हुए, जिन्होंने संव्तं नामक ऋषि की प्रेरणा से अपने मित्रों, तथा परिवार वर्ग वालों के साथ स्वगगं प्राप्त किया । इस कार्य में संवर्त और बृहस्पति के बीच में महान् विवाद छ्ड़ा हो गया। उस यज्ञ की समृद्धि को देखकर बृहस्पति क्रूढ हुए ८-१० संवर्ते के निविष्त यज्ञ समाप्त कर देने पर तो वे बहुत क्रद्ध हुए , समस्त लोकों के क्नाश की सम्भावना देखकर देवताओं ने ब्रृहस्पति को प्रसन्न किया । चक्रवर्ती राजा मनुत्त ने पुत्र छूप में नरिष्यन्त को प्राप्त क्रिया, नरिष्यन्त का उत्तराधिकारी पुत्र दम हुआ, जो दण्ड देने में बड़ा कठोर था। उसका पुत्र राष्ट्रवर्धन पराक्रमी था। उसका पुत्र सुधृती और सुधृती का पुत्र नर हुआ ।११-१३॥ उसका पुत्र केवल हुआ, केवल का पुत्र बच्चुमान हुआ। बन्चुमान का उतर

English

With his mind deeply afflicted due to that curse, Yama of virtuous soul reported everythin g to his father, along with Manu (i.e. accompanied by him.)

अध्याय १५५

श्लोक 100

पिबन्ति रुधिरं तत्र ये ऽभियान्ति रजस्वलाम् ।असिपत्रवने घोरे पीड्यन्ते पापकारिणः

pibanti rudhiraṃ tatra ye 'bhiyānti rajasvalām / asipatravane ghore pīḍyante pāpakāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

परम धर्मात्मा राजा वेगवान हुआ । वेगवान का पुत्र बुध और बुध का पुत्र तृणविन्दु हुआ, यह राजा तृणविन्दु तीसरे त्रेतायुग के प्रारम्भ काल में विद्यमान था ।१४-१३॥ उस (तृणविन्दु) की कन्या द्रविडा थो जो विश्ववा की माता थी। इसका पुत्र परम धार्मिक राजा विशाल हुआ, इसी राजा विज्ञाल ने विशाला नामक पुरी का निर्माण किया था, राजा विज्ञाल के पुत्र महाबलवान् राजा हेमचर्व हुए। हेमचर्ः के उपदान्त उनके पुत्र

English

"I am much distressed due to the fear of the curse (tak¬ ing effect). I have been defeated (?) by the (statement) words of Saiiijfia. (This mistake is) due to my childishness or delusion. Sir, please protect me.

अध्याय १५५

श्लोक 101

परपीडाकरा नित्यं ये नरो ऽन्त्यजगामिनः ।गुरुदाररतानां तु महापातकिनामपि

parapīḍākarā nityaṃ ye naro 'ntyajagāminaḥ / gurudāraratānāṃ tu mahāpātakināmapi

हिन्दी अर्थ

राजा सुचन्द्र की ख्याति हुई। राजा सुचन्द्र का पुत्र धूमाक्व नाम से विख्यात हुमा ।१६-१८। राजा धूमाध्व के पुत्र परम विद्वान् राजा सुञ्जय उत्पन्न हुए। सृञुजय के पुत्र श्रीमान् परम प्रताषी सहदेव हुए । सह॒देव के ७६ ष्द वायुपुराणम्

English

O lord of the worlds, foremost one among those who

अध्याय १५५

श्लोक 102

शिलावगूहनं तेषां जायते जन्मसप्ततिम् ।ज्वलन्तीमायसीं घोरां बहुकण्टकसंवृताम्

śilāvagūhanaṃ teṣāṃ jāyate janmasaptatim / jvalantīmāyasīṃ ghorāṃ bahukaṇṭakasaṃvṛtām

हिन्दी अर्थ

कुशाश्वः सहदेवस्य पुत्र: परमाधमिक: । कृशाश्वस्य महातेजा: सोमदत्तः प्रतापवान्

English

Thus implored, lord Vivasvan spoke to Yama: "O son, undoubtedly there will be a great reason behind this (incident).

अध्याय १५५

श्लोक 103

शाल्मलीं ते ऽवगूहन्ति परदाररता हि ये ।परस्य योषितं हृत्वा ब्रह्मस्वमपहृत्य च

śālmalīṃ te 'vagūhanti paradāraratā hi ye / parasya yoṣitaṃ hṛtvā brahmasvamapahṛtya ca

हिन्दी अर्थ

तृणबिन्दुप्रसादेन सर्वे वशालका नृपा: । दीर्घायुषों महात्मानों वीय॑बन्तः सुधामिकः रेवस्य रवतः पुत्र: ककुझी नाम धार्मिक: । ज्येष्ठो भ्रातृशतस्था55सीद्राजा प्राप्य कुशस्थलीम्

English

That was why anger took possession of you who are the knower of virtue and the speaker of the truth. The words of your mother too cannot be falsified.

अध्याय १५५

श्लोक 104

अरण्ये निर्जले देशे स भवेत्क्रूरराक्षसः ।देवस्वं ब्राह्मणस्वं च लोभेनैवाहरेच्च यः

araṇye nirjale deśe sa bhavetkrūrarākṣasaḥ / devasvaṃ brāhmaṇasvaṃ ca lobhenaivāharecca yaḥ

हिन्दी अर्थ

कन्यया सह श्रुत्वा च गान्धर्व ब्रह्मणोन्तिके । मुह्॒तं देवदेवस्य साय बहुयुगं विभोः २६

English

In this way, your mother's words will be true and effec¬ tive. By removal of the curse, you will also be saved." Aditya then spoke to Samjna, "When the sons are all equal, why is more affection shown by you towards one?"

अध्याय १५५

श्लोक 105

स पापात्मा परे लोके गृध्रोच्छिष्टेन जीवति ।एवमादीनि पापानि भुञ्जन्ते यमशासनात्

sa pāpātmā pare loke gṛdhrocchiṣṭena jīvati / evamādīni pāpāni bhuñjante yamaśāsanāt

हिन्दी अर्थ

भोजवुृष्ण्यन्धकंगुंप्ता वसुदेवपुरोगमः । तां कथां रंबत: श्रुत्वा यथातत्त्वमरिदम: २८ +कन्यां तु बलदेवाय सुब्रतां नाम रेवतीम् । दत्त्वा जगाम शिखरं मेरोस्तपसि संस्थितः २६ पुत्र कुशाइव हुए, जो परम धार्मिक राजा थे । इक्षाइव के पुत्र परम प्रतापी महान् तेजस्वी राजा सोमदत्त हुए । राजषि सोमदत्त के पुत्र जनमेजय हुए। राजा जनमेजय के पुत्र प्रमति नाम से विख्यात हुए ।१६-२१। राजा तृणविन्दु की कृपा से ये सभी विद्वाला पुरी के नृपतिगण, दीर्घायुवाले, परम पराक्रमी, परम धामिक एवं महात्मा हुए । राजा शर्याति की दो सन्ततियाँ हुईं। पुत्र का नाम आनते और कन्या का नाम सुकन्या था,

English

Avoiding (the necessity of disclosing the secret) she did not say anything to Vivasvan. But by means of his Yogic power and concentration, the Sun found out the truth.

अध्याय १५५

श्लोक 106

येषां तु दर्शनादेव श्रवणाज्जायते भयम् ।तथा दानफलं चान्ये भुञ्जाना यममन्दिरे

yeṣāṃ tu darśanādeva śravaṇājjāyate bhayam / tathā dānaphalaṃ cānye bhuñjānā yamamandire

हिन्दी अर्थ

सुकन्या च्यवन की स्त्री हुई। राजा आनते का उत्तराधिकारी परम पराक्रमी रेव नामक राजा हुआ, आनते का समस्त राज्य और कृञ्नस्थली पुरी पर उसका आधिपत्य था।२२-२४। रेव का पुत्र परम धामिक रेवत हुआ, जो ककुझी नाम से भी विख्यात् हुआ । ककुझी अपने अन्य सौ भाइयों में सब से ज्येष्ठ थे, इन्होंने भी कुश€्यली पुरी में रज्य किया । एक बार अपनी कन्या के साथ यह ब्रह्मा के समीप संगीत सुनने के लिए गये

English

The infuriated Sun-god was about to curse her bringing about her destruction. She then confessed factually everything to Vivasvan. On hearing it, Vivasvan was enraged and hastened to Tvastr. Tvastr honoured with due formalities the Sun-god who wanted to burn down everything. He pacified him slowly saying: "Your present form which is excessively dazzling, is not attractive.

अध्याय १५५

श्लोक 107

दृष्टाः श्रुतं कथयतां दूतानां च यमाज्ञया ।रथैरन्ये गजैरन्ये केचिद्वाजिभिर् आवृताः

dṛṣṭāḥ śrutaṃ kathayatāṃ dūtānāṃ ca yamājñayā / rathairanye gajairanye kecidvājibhir āvṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

थे, वहाँ देवाधिदेव ब्रह्मा के केवल एक मृहूतं॑ (दो घड़ी) भर इत्होंते अवस्थान किया था, किन्तु ब्रह्मा की वह दो घड़ी मानव वर्षमान से अनेक युगों की थी। वहाँ से राजा युवावस्था में ही अपनी पुरी को जब वापस लौटे तो उनकी वह पुरी यदुवंशियों से अधिकृत थी, उसके चारों ओर अनेक सुन्दर द्वार बने थे और अब वह कुशस्थली नाम से नहीं प्रत्युत रवती नाम से प्रसिद्ध थी ।२५-२७। बसुदेव प्रभृति प्रमुख भोज, वृष्णि एवं अख्धक वंशों के लोग उसकी रक्षा कर रहे थे। शत्रुओं को वश में करने वाले रैवत ने इस घटना को जानकर अपनो साध्वी ब्रतपरायण कन्या रेवती को बलदेव को समर्पित कर दिया, और स्वयं मेर के शिखर पर जाकर

English

It is because she could not endure it that Saihjna is wandering in the forests and meadows. You will see your wife of auspicious conduct today itself.

अध्याय १५५

श्लोक 108

दृष्टास्तत्र महाभाग तपःसंचयसंस्थिताः ।गोदाता स्वर्णदाता च भूमिरत्नप्रदा नराः

dṛṣṭāstatra mahābhāga tapaḥsaṃcayasaṃsthitāḥ / godātā svarṇadātā ca bhūmiratnapradā narāḥ

हिन्दी अर्थ

अत्रेवाध्यायसमाप्ति: ख. घ. पुस्तकयोः। +कर्पों तु बलदेवाय इत्यारभ्य सप्ताशीतितमाध्यायस्य-

English

O lord of rays, by using your Yogic power, you will see your praiseworty wife superbly endowed with youthful charm. Everything will be favourable if my condition is accepted. O suppressor of enemies! At the outset, I shall change your personal form into an excellent one". The form of Vivasvan, then, was sideways, upwards and below (i.c. the rays were diffused everywhere). Hence Divaspati (the Sun-god) was ashamed of that form. So the deity of great penance praised the wheel of Tvastr. Tvastr was then permitted to change the form. With the concurrence of the Sun-god (Martanda Vivasvan), Tvastr mounted him on the wheel and whetted his brilliance. Then the brilliance had pleasant refulgence due to reduction in dazzle.

अध्याय १५५

श्लोक 109

शय्याशनगृहादीनां स लोकः कामदो नृणाम् ।अन्नं पानीयसहितं ददते ये ऽत्र मानवाः

śayyāśanagṛhādīnāṃ sa lokaḥ kāmado nṛṇām / annaṃ pānīyasahitaṃ dadate ye 'tra mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

रेमे रामश्र धर्मात्मा रेवत्या सहितः किल । तां कथामृषयः श्रुत्वा पप्रच्छुस्तदनन्तरम् १३० कर्थ बहुयुगे काले व्यतीते सुतनन्दन । न जरां रेवतो प्राप्ता पलितं च कुतः प्रभो

English

The refulgence became very pleasing to behold. What was inauspicious before shone splendidly. Then (the Sun) made use of Yogic power and saw his wife in the form of a mare.

अध्याय १५५

श्लोक 110

तत्र तृप्ताः सुसंतुष्टाः क्रीडन्ते यमसादने ।अत्र यद्दीयते दानमपि वालाग्रमात्रकम्

tatra tṛptāḥ susaṃtuṣṭāḥ krīḍante yamasādane / atra yaddīyate dānamapi vālāgramātrakam

हिन्दी अर्थ

कियन्तो वा सुरगणा गन्धर्वास्तत्र कीद्शा:। यच्छ त्वा रबतः कालान्मुह॒तंमिव मन्यते ३३

English

She had been invisible to all living beings due to her brilliance and observance of rites. In the form of a horse, Mar¬ tanda approached her and declared his love. In the physical activity of sexual intercourse, she suspec¬ ted him to be someone other than her lord. She therefore dis¬ charged the semen virile of Vivasvan through her nostrils.

अध्याय १५५

श्लोक 111

तदक्षयफलं सर्वं शुक्लतीर्थे नृपोत्तम ।एतत्ते कथितं सर्वं यद्दृष्टं यच्च वै श्रुतम्

tadakṣayaphalaṃ sarvaṃ śuklatīrthe nṛpottama / etatte kathitaṃ sarvaṃ yaddṛṣṭaṃ yacca vai śrutam

हिन्दी अर्थ

न जरा क्षुत्पिपासा वा न च सृत्युभयं ततः। न च् रोगः प्रभवति ब्रह्मतोकगतस्य हि गान्धर्व प्रति यच्चापि पृष्ठस्तु मुनिसत्तमाः । ततोहह संप्रवक्ष्यासि याथातथ्येन सुन्नताः

English

From that semen were born the twin gods Asvins, the excellent physicians, Nasatya and Dasra. They are remembered as Asvins.

अध्याय १५५

श्लोक 112

कुरुष्व यदभिप्रेतं यदि शक्नोषि मुच्यताम् ।तयोस्तद्वचनं श्रुत्वा चाणक्यो हृष्टमानसः

kuruṣva yadabhipretaṃ yadi śaknoṣi mucyatām / tayostadvacanaṃ śrutvā cāṇakyo hṛṣṭamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

सप्त स्व॒रास्त्रयों ग्रामा मुछ॑नास्त्वेकाविशति: । तालाभ्रेकोनपण्चाशदित्येतत्स्वरमण्डलम्

English

They are the sons of Martanda, the eighth Prajapati. Bhaskara (the Sun-god) showed his beautiful form to her. On seeing him the wife was satisfied and fascinated. Yama was much afflicted in the mind due to that curse.

अध्याय १५५

श्लोक 113

विसर्जयामास खगावभिनन्द्य पुनःपुनः ।ताभ्यां गताभ्यां सर्वस्वं दत्त्वा विप्रेषु भारत

visarjayāmāsa khagāvabhinandya punaḥpunaḥ / tābhyāṃ gatābhyāṃ sarvasvaṃ dattvā vipreṣu bhārata

हिन्दी अर्थ

तपस्या में प्रवत्त हुए। यह सर्वप्रसिद्ध बात है कि बलराम जी ने रेवती के साथ दाम्पत्य सुख का अनुभव किया । (सूत से) ऐसी कथा सुनने के उपरान्त ऋषियों ने पुछा ऋ:पषयों ने पूछा- सृतनन्दन ! यह कंसे सम्भव हुआ कि अनेक युगों के बीत जाने पर भी रेवती में वृद्धत्व का समागम नहीं हुआ और उसके अंगों में पलित का भी आभास नहीं हुआ और मेरु पबंत पर तपस्या चले जाने पर राजा शर्याति को सन्‍्तति प्राप्ति किस प्रकार हुई, जो आज भी प्रथ्वी में उनके नाम से विख्यात है। इसको हम यथाथेतः सुनना चाहते हैं। ब्रह्मा की उस सभा में कितने देवता निवास

English

He pleased (all) by means of his Dharma. Then ne became known as Dharmaraja. By means of his auspicious acti¬ vity, he became extremely refulgent and attained the lordship of Pitrs and guardianship of the quarters. Savarni Manu of great fame shall become the Manu in the Savarnika Manvan- tara. Even today the holy lord performs penance on the beautiful ridge of the Meru mountain.

अध्याय १५५

श्लोक 114

कामक्रोधौ परित्यज्य जगामामरपर्वतम् ।तत्र बद्ध्वोडुपं गाढं कृष्णरज्ज्वावलम्बितम्

kāmakrodhau parityajya jagāmāmaraparvatam / tatra baddhvoḍupaṃ gāḍhaṃ kṛṣṇarajjvāvalambitam

हिन्दी अर्थ

करते हैं ? वहां के ग्न्धवं किस प्रकार के हैं, जिनके संगीत को सुनकर राजा रेवत ने इतने समय को दो घड़ी

English

Their brother SanaiScara attained the status of a planet. With'the (chopped off) brilliance (of the Sun) Tvastr made Visnu's discus. 1 It was unobstructed (irresistible) in battles to check Danavas. Their younger sister Yamuna of great fame, became the excellent river Yamuna, the purifier of all the worlds. 2

अध्याय १५५

श्लोक 115

प्लवमानो ऽशु ध्यायन्देवं जनार्दनम् ।आरोग्यं भास्करादिच्छेद्धनं वै जातवेदसः

plavamāno 'śu dhyāyandevaṃ janārdanam / ārogyaṃ bhāskarādiccheddhanaṃ vai jātavedasaḥ

हिन्दी अर्थ

सूत ने कहा---ऋषिदृन्द ! ब्रह्मलोक में जानेवाले प्राणी में न चुद्धता का समावेश होता है, न उसे भूख लगती है, न प्यास लगती है, न मृत्यु ही का भय सताता है, यही नहीं किसी प्रकार का रोग भी उस प्राणी को नहीं सताता । है सद्व्नतपरायण ! मुनिवर्यव॑न्द ! उस गान्धव विद्या (संगीत शास्त्र) के विषय में आप लोगों ने जो कुछ मुझसे पूछा है, उसे जो कुछ जानता हूँ बतला रहा हूँ सूत बोले--उस संगीतशास्त्र में सात स्वर, तीन ग्राम, इक्क्रीस मूर्छनाएँ, तथा उनचास ताल होते हैं-“-यही स्वरमण्डल कहा जाता है। षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पच्चम, धैवत, और निषाद-ये

English

I shall now narrate the details of Vaivasvata Manu who was the eldest among them. He had great splendour and his creation is current (and he presides over the present Manvan- tara).

अध्याय १५५

श्लोक 116

प्राप्नोति ज्ञानमीशानान्मोक्षं प्राप्नोति केशवात् ।नीलं रक्तं तदभवन्मेचकं यद्धि सूत्रकम्

prāpnoti jñānamīśānānmokṣaṃ prāpnoti keśavāt / nīlaṃ raktaṃ tadabhavanmecakaṃ yaddhi sūtrakam

हिन्दी अर्थ

शाड्री व पावनी चेव दृष्टाका च यथाक्रमम् । मध्यमग्रासिकाः ख्याताः षड्जग्राम॑ं निबोधत

English

He who listens to or reads the origin of Devas, the seven powerful sons of Vivasvan, shall be released, if-he attains misfortune. He shall attain great glory. When the Caksusa Manvantara had elapsed, when the Devas (pertaining to that epoch) too had gone, the kingdom of the earth was assigned to the great Vaivasvata (Manu). 3

अध्याय १५५

श्लोक 117

शुद्धस्फटिकसङ्काशं दृष्ट्वा रज्जुं महामतिः ।आप्लुत्य विमले तोये गतो ऽसौ वैष्णवं पदम्

śuddhasphaṭikasaṅkāśaṃ dṛṣṭvā rajjuṃ mahāmatiḥ / āplutya vimale toye gato 'sau vaiṣṇavaṃ padam

हिन्दी अर्थ

गांधा रग्रासीकां श्रान्पान्की त्यं मानान्िबोधत । आर्निष्टोमिकमा्ं तु द्वितीयं वाजपेयिकम् सप्तमं गोसवबं नाम महावृष्टिकमष्टसम् । ब्रह्मदानं च नवमं प्राजापत्यमनन्तरम् नागपक्षाश्रयं विद्यादगोतरं च तथेव च । हयक्रान्तं मृगक़रान्तं विष्णुक्रान्तं मनोहरम् सुर्यक्रास्त वरेण्यं च मत्तकोकिलवादिनम् । सावितन्रमर्धेंसावित्रं सर्वंतोभद्रमेव च

English

The creation of Visnu's discus Sudarsana from -the pruned part of the Sun-god is mentioned in VP. III. 2.11.

अध्याय १५५

श्लोक 118

गायन्ति यद्वेदविदः पुराणं नारायणं शाश्वतमच्युताह्वयम् ।प्राप्तः स तं राजसुतो महात्मा निक्षिप्य देहं शुभशुक्लतीर्थे

gāyanti yadvedavidaḥ purāṇaṃ nārāyaṇaṃ śāśvatamacyutāhvayam / prāptaḥ sa taṃ rājasuto mahātmā nikṣipya dehaṃ śubhaśuklatīrthe

हिन्दी अर्थ

अलम्बुषेष्टश्व तथा नारदप्रिय एवं च । कथितो भीमसेनेन नागराणां यथा प्रियः

English

This story of the Sun-god, his wife Samjna and Chaya, his children from them, pruning of the Sun-god*s excessive lustre, his approach to his wife Samjna (who was in a marc's form) and birth of Asvin gods—these are traditional accounts found in Mbh. Adi 76, AnuSasana 150, VP. III. 2 and other Puraas. Description of dynasties of kings is an integral part of a Purana of five characteristics. Vaivasvata Manu, being the progenitor of these dynasties, is described in all Puranas.

अध्याय १५५

श्लोक 119

एषा ते कथिता राजन्सिद्धिश्चाणक्यभूभृतः ।तथान्यत्तव वक्ष्यामि शृणुष्वैकाग्रमानसः

eṣā te kathitā rājansiddhiścāṇakyabhūbhṛtaḥ / tathānyattava vakṣyāmi śṛṇuṣvaikāgramānasaḥ

हिन्दी अर्थ

सांत स्वर हैं। सौवी री, हरिणास्था, कलोपबला, शुद्धमध्यमा, हाजी, पावनी ओर दृष्टाका ये मध्यमग्राम के नाम से विख्यात हैं- षड्जग्राम को सुनिये उत्तरमन्द्रा जननी, उत्तरायता (?) शुद्धघडजा आदि षड्जग्राम में कही जाती हैं, इसे सातवीं जानना चाहिए ।३६-४०। अन्य गान्धारग्राम के विषय में बतला रहा हूँ, चुनिये प्रथम गोसव, अष्टम महावुष्टिक, नवम ब्रह्मदान, तदनन्तर प्राजापत्य, नागपक्षाश्रय, गोतर, हयक्रान्त, मृगरक्रास्त, मनोहर विष्णुक्रास्त, सर्वेश्रष्ठ सुयंकान्त, मत्तकोकिलवादिन्, सावित्र अर्धसावित्र, सर्वतोभद्र, सुवर्ण, सुतन्द्र, विष्णु, वेष्णुवर, सागर, सभी जीवों के मन को हरनवाला विजय, हंस को सर्वेश्नेष्ठ हम लोग जानते हैं, तुम्बुरुप्रिय, मनोहर अधात्य--जो सभी गन्धवों द्वारा प्रशंसित, विशेषतया अलम्बुष को अभिमत एवं नारद को परम प्रिय

English

O Brahrnanas, I shall recount in the proper order the race of that noble-souled current Manu, the son of Vivasvan. (Listen to) and understand what is being narrated.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 155
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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