Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
156
अध्याय 156 / 232

Adhyaya 156

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अध्याय १५६

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे चाणक्यसिद्धिप्राप्तिवर्णनं नाम पञ्चपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १५६ श्रीमार्कण्डेय उवाच: नास्ति लोकेषु तत्तीर्थं पृथिव्यां यन्नरेश्वर ।शुक्लतीर्थेन सदृशमुपमानेन गीयते

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe cāṇakyasiddhiprāptivarṇanaṃ nāma pañcapañcāśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 156 śrīmārkaṇḍeya uvāca: nāsti lokeṣu tattīrthaṃ pṛthivyāṃ yannareśvara / śuklatīrthena sadṛśamupamānena gīyate

हिन्दी अर्थ

है, जिसकी प्रशंसा भीमसेत ने नागरों के पास की थी, जिसके कारण वह उनका प्रिय हुआ -विकल, उपनीत, विनस, भागेवप्रिय, अभिरम्य, शुक्र, पुण्यप्रद पुण्यारक- ये सब मान्धार ग्राम के अन्तर्गत हैं ।

English

(I shall narrate the story) now taking up the present creation of Vaivasvata Manu. The first bom Manu had nine sons equal to him.

अध्याय १५६

श्लोक 2

शुक्लतीर्थं महातीर्थं नर्मदायां व्यवस्थितम् ।प्रागुदक्प्रवणे देशे मुनिसङ्घनिषेवितम्

śuklatīrthaṃ mahātīrthaṃ narmadāyāṃ vyavasthitam / prāgudakpravaṇe deśe munisaṅghaniṣevitam

हिन्दी अर्थ

क॑ इृदमध नास्ति क. पुस्तके । तथा पड्चदशेच्छन्ति गान्धारप्रामसंस्थितानु । ससौवीरा तु गान्धारों ब्रह्मणा ह्ापगीयते.

English

These nine are remembered as the sons of Manu: Iksvaku, Nahusa, Dhrsta, Saryati, Narisyanta, tha tall ( Pramsu ) Nabhaga, Arista, Karusa and Prsadhra.

अध्याय १५६

श्लोक 3

वैशाखे च तथा मासि कृष्णपक्षे चतुर्दशी ।कैलासादुमया सार्द्धं स्वयमायाति शङ्करः

vaiśākhe ca tathā māsi kṛṣṇapakṣe caturdaśī / kailāsādumayā sārddhaṃ svayamāyāti śaṅkaraḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तरादिस्वरस्पेव ब्रह्म वे देवता5त्र च। हरिवेशससुत्पन्ना हरिणास्था व्यजायत ॥

English

Know that formerly Manu, on being urged by Brahma, began to create willingly, but he was unsuccessful.

अध्याय १५६

श्लोक 4

मध्याह्नसमये स्नात्वा पश्यत्यात्मानमात्मना ।ब्रह्मविष्ण्विन्द्रसहितः शुक्लतीर्थे समाहितः

madhyāhnasamaye snātvā paśyatyātmānamātmanā / brahmaviṣṇvindrasahitaḥ śuklatīrthe samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

मूर्छना हरिणास्पेव अस्या इस्द्रोडईघिदेवतम् ५१ करोपनीतवितता मरुद्धि: स्व॒रमण्डले । सा कलोपनता तस्मान्मास्तश्रात्र देवतम् मरुदेशसमुत्पन्ना मूछना शुद्धमध्यमा । सध्यमोत्र स्वरः शुद्धो गन्धवंश्रात्र देवता

English

Then Prajapati, desirous of sons, performed a great Isfi (Yajna). Manu offered the oblation (Ahuti) in the share of Mitra and Varuna.

अध्याय १५६

श्लोक 5

कार्त्तिक्यां तु विशेषेण वैशाख्यां च नरोत्तम ।ब्रह्मविष्णुमहादेवान् स्नात्वा पश्यति तद्दिने

kārttikyāṃ tu viśeṣeṇa vaiśākhyāṃ ca narottama / brahmaviṣṇumahādevān snātvā paśyati taddine

हिन्दी अर्थ

मृगे: सह संचरते सिद्धानां मार्गदशने । यस्मात्तस्मात्स्तृता मार्गी मृगेस्द्रोसस्याश्व देवता ५४ सा चा55श्रमसमायुक्ता अनेकान्यौरवान्नवान् । सूछेना योजना होषा रजसा रजनी ततः॥ ..

English

It is heard, that Ida 1 was born thereof. She wore heavenly garments and was bedecked in celestial ornaments. Her body too was divine.

अध्याय १५६

श्लोक 6

देवराजः सुरैः सार्द्धं वायुमार्गव्यवस्थितः ।कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां स्नात्वा पश्यति शङ्करम्

devarājaḥ suraiḥ sārddhaṃ vāyumārgavyavasthitaḥ / kṛṣṇapakṣe caturdaśyāṃ snātvā paśyati śaṅkaram

हिन्दी अर्थ

ताल उत्तरमद्द्रांशः षड्जदेवतकां विदुः तस्मादृत्तरतालं च प्रथम स्वायतं बिदुः ॥ तस्मादृत्तरमर्द्रो5्यं देवताइस्य श्रुवों भुवम् ५६ आयामादुत्तरत्वाच्च घेवतस्योत्तरायण: । स्यादियं सूछंना छोव॑ पितरः श्राइददेवताः यः सतां मूछनां कृत्वा पझचमस्वरको भवेत् । यक्षीणां मूछना सा तु याक्षिका सूछता स्मृता ५६ नागदृष्टिविषा गीता नोपसपन्ति मुछंनाम् । भवन्तीव हता होते बरह्मणा नागदेवताः

English

It is remembered that Manu, the bearer of the staff of justice, addressed her as 'Ila' and said, "Welfare unto you, I shall follow you". Ila replied to the Prajapati who was desirous of sons, in the following words sanctioned by Dharma. "O fore¬ most of the eloquent ones, I am born in the share of Mitra and Varuna. I will (first) approach them. May not Dharma violated by us kill us". After speaking thus, the noble lady went near them (Mitra and Varuna).

अध्याय १५६

श्लोक 7

गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः सिद्धविद्याधरोरगाः ।तद्दिने ते ऽपि देवेशं दृष्ट्वा मुञ्चन्ति किल्बिषम्

gandharvāpsaraso yakṣāḥ siddhavidyādharoragāḥ / taddine te 'pi deveśaṃ dṛṣṭvā muñcanti kilbiṣam

हिन्दी अर्थ

मध्यमग्राम बीस हैं, पडजग्रामों की संख्या चौदह है, गान्धारग्राम को लोग पन्‍्द्रह मानते हैं। भगवान् ब्रह्मा सोवीर के साथ गान्धारी का गान करते हैं ।४१-५०। उत्तरादि स्वरों के अधिदेवता ब्रह्मा ही माने गये हैं, हरिदेश में उत्पन्न मूछेना हरिणास्गा के नाम से प्रत्तिद्ध है, इसके अधिदेवता इन्द्र हैं। समस्त स्वर मण्डल में मरुतों हारा प्रसारण पूर्वक ग्रहण किये जाने से कलोपनता के मारुत अधिदेवता माने गये हैं। मरुदेश में समुत्यन्न

English

After going near them, the beautiful lady spoke these words with palms joined in reverence: "O Devas, I am born in your share. What should I do?

अध्याय १५६

श्लोक 8

अर्धयोजनविस्तारं तदर्द्धेनैव चायतम् ।शुक्लतीर्थं महापुण्यं महापातकनाशनम्

ardhayojanavistāraṃ tadarddhenaiva cāyatam / śuklatīrthaṃ mahāpuṇyaṃ mahāpātakanāśanam

हिन्दी अर्थ

मूछेना भुद्ध मध्यमा कही जाती है । इसमें शुद्ध स्वर मध्यम है, इसके अधिदेवता गन्धवं हैं। सिद्धों का मार्य दिल्ललाते समय मृगों के साथ विचरण करने के कारण मूछना मार्गी नाम से प्रसिद्ध हुई, इसके अधिदेवता मृगेन्द्र हैं (५१-५४। यह मूछेना अनेक स्व॒रों की आश्रयभूत होने के कारण अनेक पुरों में गाये जानेवाले स्वरों में प्रयुक्त होती है । (?) यह रजती नामक मूछेना रजोगुण से संयुक्त करनी चाहिए । (?) उत्तर मन्द्रांश ताल का अधिदेवता षडज है। उसका उत्तरवर्ती ताल भी प्रथम का अनुयायी माना जाता है । इसीलिए उसका नाम भी उत्तरमन्द्र कहा जाता है, उसके अधिदेवता ध्रूव हैं ।(५-५६। विस्तृत और उत्तरवर्ती होने के कारण धैबत की मुछना उत्तरायण है. इसके अधिदेवगण श्राद्ध में पूजित होनेवाले पितरगण हैं। महषियों ने शुद्ध पडज् स्वर 8 रा अग्ति की उपासना की थी, इसलिये उस स्वर को लोग शुद्ध पडजिक नाम से जानते हैं

English

I have been requested by Manu, thus, 'Follow me' ". When the chaste lady Ida spoke thus, both of them, Mitra and Varuna spoke these words: "O fair-complexioned lady of beautiful hips, O knower of Dharma, we are delighted by your humility, self-control and truthfulness. O blessed lady, you will become renowned as our daughter".

अध्याय १५६

श्लोक 9

यत्र स्थितैः प्रदृश्यन्ते वृक्षाग्राणि नरोत्तमैः ।तत्र स्थिता महापापैर् मुच्यन्ते पूर्वसंचितैः

yatra sthitaiḥ pradṛśyante vṛkṣāgrāṇi narottamaiḥ / tatra sthitā mahāpāpair mucyante pūrvasaṃcitaiḥ

हिन्दी अर्थ

पद्चम स्वर की मूरछना सत्पुरुषों के मन को भी मूच्छित कर देती है, यह यक्षों की पत्नियों की मूछेना है, इसीलिये उसका नाम भी याक्षिकी मूछेना प्रसिद्ध है ।५६। दृष्टि से ही विष विक्रीरित करनेवाले नागगण जिस

English

In RV. it was used in the sense of 'refreshing draught* Later on it came to mean 'a cow*, and 'a goddess of speech*. In Sat. Br. I<Ja is Manu's daughter. But in our text she is the daughter of ('bora of the share of*) Mitra and Varuna.

अध्याय १५६

श्लोक 10

पापोपपातकैर्युक्तो नरः स्नात्वा प्रमुच्यते ।उपार्जिता विनश्येत भ्रूणहत्यापि दुस्त्यजा

pāpopapātakairyukto naraḥ snātvā pramucyate / upārjitā vinaśyeta bhrūṇahatyāpi dustyajā

हिन्दी अर्थ

(अहीनां मुछेना होषा वरुणभ्रात्र देवता । + जलाधिपेन दृष्टा स्थादप्सु लोला तथव च शउुन्तकानां कृत्वा च उपगायन्ति किनराः । उत्तमा मुछुना तस्मात्पक्षिराजोउन्र देवता (१६२ मनो सन्दयती तेषां मुछेता मन्दनीत्यपि । ऋषीणां स्नातकानां च विश्वे देवात्र (स्तु) देवतम् ॥ अश्वा इवाक़मन्ते वा रमन्ते वा5त्र वाजिनः। अश्वक्कान्तेति नित्या वे अश्यिनी वाइन्र देवतम्

English

The son of Manu, the rightcous-souled promoter of Manti's race is the beloved of the universe. He who is revered in the three worlds is famous as Sudyumna. He has attained the form of a lady. 1 That noble lady returned to her father after securing the boon.

अध्याय १५६

श्लोक 11

यस्मात्तत्रैव देवेश उमया सह तिष्ठति ।वैशाख्यां च विशेषेण कैलासादेति शङ्करः

yasmāttatraiva deveśa umayā saha tiṣṭhati / vaiśākhyāṃ ca viśeṣeṇa kailāsādeti śaṅkaraḥ

हिन्दी अर्थ

+ गान्धाररागशब्देन गां धारयतेर्थतः । तस्मादिशुद्ध गान्धारी गन्धवंश्राधिदेवतम् ६५ गान्धारानन्तरं गत्वा सृष्टेयं मुछंना यतः । तस्मादुत्तरगान्धारी बसवश्रात्र देवता:

English

After getting an opportune moment, she was invited for love making'(sexual intercourse) by Budha (the planet Mer¬ cury). From Budha, the son of Soma, Pururavas, the son of Ila was born.

अध्याय १५६

श्लोक 12

तेन तीर्थं महापुण्यं सर्वपातकनाशनम् ।कथितं ब्रह्मणा पूर्वं मया तव तथा नृप

tena tīrthaṃ mahāpuṇyaṃ sarvapātakanāśanam / kathitaṃ brahmaṇā pūrvaṃ mayā tava tathā nṛpa

हिन्दी अर्थ

सेयं खलु महाभूता पितामहमुपस्थिता । षड्जेय॑ मुछंना तस्मात्स्मृता ह्ानलदेवता ) दिव्येयं चायता तेन मन्दषष्ठा च मूछेने । निवृत्तमुणनासानं पञचर्म चान्न देवतम्

English

After giving birth to the son born of Budha, she became Sudyumna again. Sudyumna had three sons, all extremely virtuous.

अध्याय १५६

श्लोक 13

रजकेन यथा धौतं वस्त्रं भवति निर्मलम् ।तथा तत्र वपुःस्नानं पुरुषस्य भवेच्छुचि

rajakena yathā dhautaṃ vastraṃ bhavati nirmalam / tathā tatra vapuḥsnānaṃ puruṣasya bhavecchuci

हिन्दी अर्थ

मूछेता को सनकर चल फिर नहीं सकते, और ब्रह्मा द्वारा मृतक के समान हो जाते हैं, वह भहिमृछेना कही जाती है, उसके अधिदेवता वरुण हैं। जलराशि में अवस्थित इस मूर्छना को सर्वप्रथम जलाधिप वरुण ने देखा था ।६०-६१। किन्नर गण पक्षियों के स्वर का अनुकरण कर जिसका गान करते हैं, उस परमश्रेष्ठ मुछेना के भधिदेवता पक्षिराज गरुड़ हैं। ऋषियों और विद्या में पारंगत स्नातकों के भी मन को

English

They were Utkala, Gaya and Vinatasva. The land of Utkala went over to Utkala. The western region went over to Vinatasva. In the quarter of the Wind-god (north-west) was Gaya, the city of Gaya, the saintly king.

अध्याय १५६

श्लोक 14

पूर्वे वयसि पापानि कृत्वा पुष्टानि मानवः ।अहोरात्रोषितो भूत्वा शुक्लतीर्थे व्यपोहति

pūrve vayasi pāpāni kṛtvā puṣṭāni mānavaḥ / ahorātroṣito bhūtvā śuklatīrthe vyapohati

हिन्दी अर्थ

जो मन्द कर देती है वह मन्दनी नामक मूछना है, उसके अधिदेवता विश्वेदेवगण हैं। अव्व के समान तीदत्र गति से चलने अथवा जिसको सुनकर अश्वमण विहार (प्रसन्न होते हैं) करते हैं उस स्थिर मूछेना का भश्वक्रान्ता नाम हैं, उसके अधिदेवता दोनों अश्विनीकुमार हैं ।६२-६४। गान्धार राग के शब्द से गौ (पृथ्वी) को धारण करते हैं, (अर्थात् इसकी स्वरमहिमा से पृथ्वी फ्री स्थिति शक्ति की धृद्धि होती है) इस निरुक्ति से इस मूछ॑ना का नाम विशुद्ध गास्धारी कहा जाता है, इसके अधिदेवता ग्रन्धवं हैं । गास्धार के अन्तर इस मूछना की सृष्टि हुई है, अतः इसे उत्तर गान्धारी कहते हैं, इसके अधिदेवता वसुगण हैं। षडज् नामक यह मुछेना सबसे प्रथम पितामह के समीप उपस्थित हुई अतः यह सबसे अधिक महत्त्वशालिनी है, इसके अधिदेवता अनल कहे जाते हैं ।६५-६७। यह मन्दषष्ठा नामक मूछेना बहुत विस्तृत है, इसके प्रभाव दिव्य हैं, इसके गुणों की

English

(Defective verse) When Manu was abandoned (created) the Sun (Divakara) created the subjects and divided the whole region of the earth into ten.

अध्याय १५६

श्लोक 15

शुक्लतीर्थे महाराज राकां रेवाजलाञ्जलिम् ।कल्पकोटिसहस्राणि दत्त्वा स्युः पितरः शिवाः

śuklatīrthe mahārāja rākāṃ revājalāñjalim / kalpakoṭisahasrāṇi dattvā syuḥ pitaraḥ śivāḥ

हिन्दी अर्थ

धनुदिचित्वान्तगंतग्रन्थों ग. पुस्तके तास्ति। -+तास्तीदमध॑ क. पुस्तके। ३८ धनुरिच्वान्तगंतग्रन्थः क. पुस्तके नारित । +एत्ंस्थान इदमर्ध गांधारयते शब्देन गांधारेध्यथ वा पुनरिति ह. पुश्तके ।

English

Iksvaku had ten other sons. In view of his being a lady (as well), Sudyumna had no share.

अध्याय १५६

श्लोक 16

न माता न पिता बन्धुः पतनं नरकार्णवे ।उद्धरन्ति यथा पुण्यं शुक्लतीर्थे नरेश्वर

na mātā na pitā bandhuḥ patanaṃ narakārṇave / uddharanti yathā puṇyaṃ śuklatīrthe nareśvara

हिन्दी अर्थ

पूर्णा सप्त स्व॒रा होव॑ मुछनाः संप्रकीतिता: । नानासाधारणाश्चेव षडेबानुविदस्तथा ६६९ इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्‍्ते वैवस्वतमनुवंशगान्धव॑मूछुनालक्षणकथनं नाम षडशीतितमोड्ध्याय: पुर्वाचार्यमतं बुद्ध्वा प्रवक्ष्याम्यनृपुर्बंशः । त्रिशतं वे अलंकारास्तान्से निगदतः शूणु ३१ अलंकारास्तु वक्तव्याः स्वेः स्वेबंणें: प्रहेतवः । संस्थानयोगेश्व तथा पदानां चान्ववेक्षया

English

At the instance of Vasistha, the establishment of the noble-souled Sudyumna, the virtuous king of great lustre, was (took place) in Pratisthana. After getting the kingdom, he, of great renown, gave it to Pururavas. The characteristics of wo¬ men and men among human beings, O blessed ones, (will be duly manifest). Sudyumna, the son of Manu, attained the status of a woman again.

अध्याय १५६

श्लोक 17

तपसा ब्रह्मचर्येण न तां गच्छन्ति सद्गतिम् ।शुक्लतीर्थे मृतो जन्तुर्देहत्यागेन यां लभेत्

tapasā brahmacaryeṇa na tāṃ gacchanti sadgatim / śuklatīrthe mṛto janturdehatyāgena yāṃ labhet

हिन्दी अर्थ

बाक्याथंपदयोगार्थेरलंकारस्य प्रणम् । पदानि गीतकस्या55हुः पुरस्तात्पृष्ठतो5थवा

English

On hearing this the sages asked thereafter: "How did Sudyumna, the son of Manu, attain womanhood?"

अध्याय १५६

श्लोक 18

कार्त्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशीम् ।घृतेन स्नापयेद् देवमुपोष्य प्रयतो नरः

kārttikasya tu māsasya kṛṣṇapakṣe caturdaśīm / ghṛtena snāpayed devamupoṣya prayato naraḥ

हिन्दी अर्थ

महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता, इसके अधिदेवता पतञ्चम हैं। इस प्रकार सातों स्वरों, समस्त मूर्छेनाओं, (?) एवं उनके छः साधारण भेदों का वर्णत मैं कर चुका गीतों के अलंकारों का वर्णन

English

The beloved goddess (Uma) spoke these words to her lover (Siva) for the sake of his love: "O Lord, the man who enters my personal hermitage will certainly become a woman. She will be auspicious and on a par with the celestial damsels.'*

अध्याय १५६

श्लोक 19

स्नात्वा प्रभाते रेवायां दद्यात्सघृतकम्बलम् ।सहिरण्यं यथाशक्ति देवमुद्दिश्य शङ्करं

snātvā prabhāte revāyāṃ dadyātsaghṛtakambalam / sahiraṇyaṃ yathāśakti devamuddiśya śaṅkaraṃ

हिन्दी अर्थ

अब इसके उपरान्त पृवंवर्ती आचार्यों के मतानुसार तीन सौ संगीत के अलंकारों का क्रम पूर्वक वर्णन मैं कर रहा हूँ, सुनिये । अपने-अपने वर्णों एवं पद समूहों के विशेष संयोग से संगठित होने को ही अलंकार कहना चाहिए ।१-२। पद एवं वाक्य के योगा के द्वारा अलंकार की पूति होती है । गीत के पद समूह पूर्व अथवा पीछे दोनों स्थानों में विन्यस्त होते है--ऐसा लोग कहते हैं ।३। गीतों के स्थान तीन होते हैं, उर:थल, कण्ठ तथा शिर ।

English

All the living beings there, Pisacas, and the animals became women and played with Rudra like heavenly ladies.

अध्याय १५६

श्लोक 20

देवस्य पूरणं कुर्याद्घृतेन घृतकम्बलम् ।स गच्छति महातेजाः शिवलोकं मृतो नरः

devasya pūraṇaṃ kuryādghṛtena ghṛtakambalam / sa gacchati mahātejāḥ śivalokaṃ mṛto naraḥ

हिन्दी अर्थ

इन्हीं तीन स्थानों में प्रारम्भ किया गया स्वर उत्तम होता है ।४। प्रकृति गत बंणों की संख्या चार है, इनका चत्वारः प्रकृतों वर्णाः प्रविचारश्चतुविध: । विकल्पयष्टधा चेव देवा: षघोडशधा बिदु: ५

English

That king who had gone a-hunting entered Uma's forest. He attained womanhood along with the Pisacas, Bhutas and Rudras. Hence that king attained womanhood. By the grace of Mahadeva, he shall attain the lordship of the Ganas.

अध्याय १५६

श्लोक 21

एकविंशकुलोपेतो यावदाभूतसम्प्लवम् ।शुक्लतीर्थे नरः स्नात्वा ह्युमां रुद्रं च यो ऽर्चयेत्

ekaviṃśakulopeto yāvadābhūtasamplavam / śuklatīrthe naraḥ snātvā hyumāṃ rudraṃ ca yo 'rcayet

हिन्दी अर्थ

आरोहणेन चा55रोहवर्ण वर्णविदा बिदुः। एतेषासेव वर्णानामलंकारान्निबो धत ८ अलंकारास्तु चत्वार: स्थापनी क़मरेजिन: । प्रमावश्चाप्रमादश्व तेषां वक्ष्यामि लक्षणम् ६ विस्व॒रोष्ट्रकलाश्रेव स्थानादेकानतरं गताः । आवतंस्याक्रमोत्पत्ती है कार्ये परिणामतः १०

English

(Listen to and) understand the details of Manu's sons. Pjrsadhra tortured the cow of his preceptor and ate it. Due to the curse of the noble-souled Cyavana, he attained the status of a Sudra.

अध्याय १५६

श्लोक 22

गन्धपुष्पादिधूपैश्च सो ऽश्वमेधफलं लभेत् ।मासोपवासं यः कुर्यात् तत्र तीर्थे नरेश्वर

gandhapuṣpādidhūpaiśca so 'śvamedhaphalaṃ labhet / māsopavāsaṃ yaḥ kuryāt tatra tīrthe nareśvara

हिन्दी अर्थ

श्येनस्त्वेकान्तरे जात: कलामात्रन्तरे स्थितः । तस्मिश्वव स्वरे वृद्धिस्तिष्ठते तहिलक्षणा श्येनस्तु अपरोहस्तु उत्तरः परिकीतित: । कलाकलप्रमाणाच्च सबिन्दुर्नाम जायते .

English

Bhalandana had a very powerful son named Pramsu. Pramsu had a son who became well known as Prajani.

अध्याय १५६

श्लोक 23

मुच्यते स महत्पापैः सप्तजन्मसुसंचितैः ।उष्ट्रीक्षीरमविक्षीरं नवश्राद्धे च भोजनम्

mucyate sa mahatpāpaiḥ saptajanmasusaṃcitaiḥ / uṣṭrīkṣīramavikṣīraṃ navaśrāddhe ca bhojanam

हिन्दी अर्थ

बिख्दुरेककला कार्या वर्णान्तस्थायिनी भवेत् विपयंयस्व॒रो5पि स्थाद्यस्य दुर्घटितोईपि न

English

Prajani had a valorous son named Khanitra. His son was the glorious Ksupa of great fame.

अध्याय १५६

श्लोक 24

वृषलीगमनं चैव तथाभक्ष्यस्य भक्षणम् ।अविक्रये ऽनृते पापं माहिषे ऽयाज्ययाजके

vṛṣalīgamanaṃ caiva tathābhakṣyasya bhakṣaṇam / avikraye 'nṛte pāpaṃ māhiṣe 'yājyayājake

हिन्दी अर्थ

एकास्तरा तु वाद्य तु षएडुजतः परम: स्वरः। आक्षेपास्कर्दनं कार्य काकस्थेबोच्चप्रुष्कलप्त १४ विचार भी चार प्रकार का होता है। विकल्प से आठ प्रकार कहे जाते हैं, देवगण इनकी संख्या सोलह बतलाते हैं ।५। वर्णों के तत्त्वज्ञ लोग स्थायी, संचारी, अवरोहण तथा आरोहण--ये चार वर्ण जानते हैं। एक ही प्रकार के भाव वर्ण में जिसका संचरण होता है वह स्थायी, विभिन्न प्रकार के भावों में जिसका संचरण होता है वह संचारी, निम्न गति जिसकी होती है वह अवरोहण तथा उन्नति शील जो होता है वह आरोहण कहा

English

Ksupa's son was Virhsa who had no one equal to him. Vimsa's son was Vivimsa, the righteous performer of religi¬ ous rites.

अध्याय १५६

श्लोक 25

वार्द्धुष्ये पङ्क्तिगरदे देवब्राह्मणदूषके ।एवमादीनि पापानि तथान्यान्यपि भारत

vārddhuṣye paṅktigarade devabrāhmaṇadūṣake / evamādīni pāpāni tathānyānyapi bhārata

हिन्दी अर्थ

जाता है--ऐसा वर्णवेत्ता लोग जानते हैं ! इन्हीं चार प्रकार के वर्णों का अलंकार सुनिये ।६-८। मुख्यतः अलंकार चार प्रकार के होते हैं, स्थापनी, क्रमरेजित, प्रसाद और प्रस्तार, उनके लक्षणों को बतला रहा हूं । उष्टूकल नामक विकृत स्वर एक स्थान से उत्पन्न होकर दूसरे स्थान में समाप्त होते हैं, उस भावत्त (चक्राकार घ॒माव) को उत्पत्ति और उसका क्रय ये दोनों परिणाम के अनुरूप करना चाहिए ।६-१०। अन्य कुमार नामक

English

Vivimsa's son was the virtuous-souled and valorous Kha- ninetra. In the beginning of Tretavuga, his son Karandhama was born.

अध्याय १५६

श्लोक 26

चान्द्रायणेन नश्यन्ति शुक्लतीर्थे न संशयः ।शुक्लतीर्थे तु यः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः

cāndrāyaṇena naśyanti śuklatīrthe na saṃśayaḥ / śuklatīrthe tu yaḥ snātvā tarpayet pitṛdevatāḥ

हिन्दी अर्थ

स्वर को अत्यभल्प विस्तार करनेवाला जानना चाहिए। दूसरा अपाज्ु नामक और मभात्राधिक कुलारेक नामक अभलड्ार होता है । १ १। श्येन नामक स्वर एक ही स्थान में उत्पन्न होता है, और कलामात्र के अन्तर में प्रतिष्ठित होता है । इसी स्वर में विलक्षण वद्धि होती है ।२। यही ध्येन स्व॒र उत्तर अवरोह कहा जाता है। सविन्दु नामक स्त्रर कला-कला के परिणाम में उत्पन्न होता है । विन्दु को एक कला की करनी चाहिए, यह एक ही वर्ण के अन्त में स्थिर रहनेवाली है ! स्व॒रों का विपर्यय (उलट फेर) भी हो जाता है, जहाँ अनवधानता भी नही होती है। षडज से एक स्वर का अन्तर देकर एकास्तरा वाद्य करने से उत्कृष्ट स्वर होता है । इसमें काक के समान स्वर का आशक्षेप करने से उच्च पुष्कल स्वर होता है ।१३-१५॥ कार्य और कारण रूप से दोनों संतारो

English

Karandhama's son was the vigorous Aviksit. By means of his good qualities, Aviksit surpassed his father.

अध्याय १५६

श्लोक 27

तस्य ते द्वादशाब्दानि तृप्तिं यान्ति सुतर्पिताः ।पादुकोपानहौ छत्रं शय्यामासनम् एव च

tasya te dvādaśābdāni tṛptiṃ yānti sutarpitāḥ / pādukopānahau chatraṃ śayyāmāsanam eva ca

हिन्दी अर्थ

संतारो तौ तु संचायों कार्य वा कारण तथा । आक्षिप्रमवरोह्माषि प्रोक्षमद्यस्तथेव च १६ द्वाद्श च कलास्थानमेकान्तरगत ततः ।(प्रेड्डोलितमलंकारमेव स्व॒रसमस्वितम् ३१७ स्वरसंक्रामकाच्चेव ततः प्रोक्तं तु पुष्कलम् । प्रक्षिप्समेव फलया पादनीतरयों भवेत् १८

English

The term ' Murcchana ' means the changing of key or modulation of voice (and sounds) in the Science of Music. For more explanation see Footnote No 3,

अध्याय १५६

श्लोक 28

सुवर्णं धनधान्यं च श्राद्धं युक्तहलं तथा ।अन्नं पानीयसंहितं तस्मिंस्तीर्थे ददन्ति ये

suvarṇaṃ dhanadhānyaṃ ca śrāddhaṃ yuktahalaṃ tathā / annaṃ pānīyasaṃhitaṃ tasmiṃstīrthe dadanti ye

हिन्दी अर्थ

यस्तु स्थादवरोहो वा तारतो मन्द्रतोषपि वा । एकान्तरहिता होते तमेव स्व॒रमन्ततः १२० मणिप्रच्छेदनो नाम चतुष्कलगणः स्मृतः । अलंकारा भवस्त्येते त्रिशदे वे प्रकोतिताः ॥ संस्थान च प्रमाणं च विकारी लक्षण तथा। चतुविधासद ज्ञेयसलंकारप्रयोजनम् द

English

A. reads: Nabhaga was the son of Arista. Bhalandana was a scholar.

अध्याय १५६

श्लोक 29

हृष्टाः पुष्टा मृता यान्ति शिवलोकं न संशयः ।तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या शिवमुद्दिश्य भारत

hṛṣṭāḥ puṣṭā mṛtā yānti śivalokaṃ na saṃśayaḥ / tatra tīrthe tu yo bhaktyā śivamuddiśya bhārata

हिन्दी अर्थ

यथा5घत्मनो ह्ालंकारों विपयंस्तो5४तिगहितः वर्णमेबाप्यल कतु विषम ह्यात्मसंभवात् २३ नानाभरणसंयोगाद्यथा नार्या विभृषणम् । वर्णस्य चेवालंकारो विपयंस्तोइतिगहितः २४

English

(His son) named Marutta was a virtuous-souled king equal to an emperor. He was taken to heaven by (sage) Sam- varta along with his friends and kinsmen.

अध्याय १५६

श्लोक 30

भिक्षामात्रं तथान्नं ये ते ऽपि स्वर्यान्ति वै नराः ।यज्विनां व्रतिनां चैव तत्र तीर्थनिवासिनाम्

bhikṣāmātraṃ tathānnaṃ ye te 'pi svaryānti vai narāḥ / yajvināṃ vratināṃ caiva tatra tīrthanivāsinām

हिन्दी अर्थ

का संचारण करना चाहिए । इस प्रकार क्षिप्र गति तक अवरोह स्वर संचार करने से उसी प्रकार का प्रोक्षमच अलंकार होता है ।१६। तदनन्तर एकास्तर गत द्वादश कला स्थान है । इस प्रकार के स्वर संयुक्त एक प्रेंखो लित अनद्भर होता है । पुनः कुछ अधिक स्वरों के संक्रमण होने के कारण ही वह पृष्कल कहा जाता है। मात्रा के प्रक्षेप और पाद संक्रमण होने से जो द्विकलात्मक अलझ्भार होता है वह प्नासित कहा जाता है। स्वरोच्चार और विस्वर के संयोग से अष्टस्वर का अन्तर हो जाता है ।७-१६। तार और मन्द्र के क्रम से जो स्वरावरोह होते हैं, वे अन्त में उसी स्वर के एक अन्तरा के बाद उपयुक्त माने जाते हैं। मणिप्रच्छेदन तामक गण चार कलाओं वाला कहा जाता है। वर्ण, स्थान औद् प्रयोग विशेष के अतुसार कलामात्र प्रमाण के अनुसार अलंकार निश्चित किये गये हैं । इस प्रकार कहे गये तीसों अलंकारों का वर्णन कर चुका । संस्थान, प्रमाण, विकार और लक्षण--

English

In this connection a great dispute arose between Sam- vavta and Byhaspati. On seeing the magnificence of the Yajfia, Byahspati became angry with him.

अध्याय १५६

श्लोक 31

अपि वालाग्रमात्रं हि दत्तं भवति चाक्षयम् ।अग्निप्रवेशं यः कुर्याच्छुक्लतीर्थे समाहितः

api vālāgramātraṃ hi dattaṃ bhavati cākṣayam / agnipraveśaṃ yaḥ kuryācchuklatīrthe samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

ये चार अलंकारों के प्रयोजन जान , चाहिए ।३०-२२। जिस प्रकार मनुष्य के अपने अलंकार योग्य स्थान पर न पड़कर अथवा अति निम्न कोटि के होकर शरीर शोभा की हानि करते हैं, वृद्धि नहीं करते उसी प्रकार ये संगीत के अलंकार भी अपने योग्य स्थान पर पड़कर तथा निक्ृष्ट कोटि के होकर वर्णों की द्योभा बढ़ाने में सशक्त नहों होते, इसलिए स्त्रियों के आभूषण की भांति इन संगीतालंकारों का यथा स्थान सब्निवेश करना

English

When the Yajfla was brought to a successful conclusion by Samvarta, he (Brhaspati) became more furious. He was in¬ tent on the destruction of the worlds but he was propitiated by the deities (gods).

अध्याय १५६

श्लोक 32

रागद्वेषविनिर्मुक्तो हृदि ध्यात्वा जनार्दनम् ।सर्वकामसुसम्पूर्णः स गच्छेद् वारुणं पुरम्

rāgadveṣavinirmukto hṛdi dhyātvā janārdanam / sarvakāmasusampūrṇaḥ sa gacched vāruṇaṃ puram

हिन्दी अर्थ

आवश्यक होता है जिस प्रकार विविध अलंकारों से अलंकृत होने पर स्त्रियों का सौन्दर्य बढ़ जाता है, उसी प्रकार इन वर्णों के अलंकारों से अलंकृत होकर संगीत की शोभा बढ़ जाती है। इनके यथा स्थान विभूषित न होने की बड़ी निन्‍दा की गई है । जिस प्रकार पेर में बंधे हुए कुण्डल नहीं देखे जाते और कण्ठ में करधनी नहीं धनृश्चि्नान्तगंतग्रन्थों ग। पुस्तके नास्ति ।

English

Emperor Marutta obtained Narisyanta (as son). Nari-?yanta's successor was the king Dama, wielding the staff of jus¬ tice and punishment.

अध्याय १५६

श्लोक 33

न रोगो न जरा तत्र यत्र देवो ऽंभसां पतिः ।अनाशकं तु यः कुर्यात् तस्मिंस्तीर्थे युधिष्ठिर

na rogo na jarā tatra yatra devo 'ṃbhasāṃ patiḥ / anāśakaṃ tu yaḥ kuryāt tasmiṃstīrthe yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

न पादे कुण्डले दृष्टे न कण्ठे रसना तथा। एवमेव ह्ालंकारो विपयंस्तो विगहितः २५ क्रियमाणो5प्यलंकारो राग॑ यश्चंव दशयेत् । यथोहिष्टस्य सार्गस्य कतंव्यस्प विधीयते

English

The valorous king Ra$travardhana was his son. His son was Sudhytin and Sudhrtin's son was Nara.

अध्याय १५६

श्लोक 34

अनिवर्तिका गतिस् तस्य रुद्रलोकाद् असंशयम् ।अवशः स्ववशो वापि जन्तुस्तत्क्षेत्रमण्डले

anivartikā gatis tasya rudralokād asaṃśayam / avaśaḥ svavaśo vāpi jantustatkṣetramaṇḍale

हिन्दी अर्थ

लक्षण पर्यवस्थापि वरणिकाभिः प्रवर्तनम् । यातातथ्येन वक्ष्यासि मासो:दू वमुखोउद्ू वे स्वरालंप्रत्ययश्चेव सर्वेषां प्रत्ययः स्पृतः । अनुगम्य वहिर्गोतं विज्ञातं पद॑श्चदेवतम

English

Kevala was his son and Bandhuman was the son of Ke- vala. The virtuous-souled king Vegavan was Bandhuman's son.

अध्याय १५६

श्लोक 35

मृतः स तु न सन्देहो रुद्रस्यानुचरो भवेत् ।शुक्लतीर्थे तु यः कन्यां शक्त्या दद्याद् अलंकृताम्

mṛtaḥ sa tu na sandeho rudrasyānucaro bhavet / śuklatīrthe tu yaḥ kanyāṃ śaktyā dadyād alaṃkṛtām

हिन्दी अर्थ

गन्धारांशेन गीयन्ते चत्वारि मद्रकानि च। पश्चमों सध्यमश्चेव धेवते तु निषादज: ॥।

English

Budha was Vegavan's son and Tynabindu was the son of Budha. He became king at the beginning of the third Treta- yuga.

अध्याय १५६

श्लोक 36

विधिना यो नृपश्रेष्ठ कुरुते वृषमोक्षणम् ।तस्य यत् फलम् उद्दिष्टं पुराणे रुद्रभाषितम्

vidhinā yo nṛpaśreṣṭha kurute vṛṣamokṣaṇam / tasya yat phalam uddiṣṭaṃ purāṇe rudrabhāṣitam

हिन्दी अर्थ

घपड्जबंभश्न जानीमो भव्रकेष्वेब नानन्‍तरे हें चापरान्तिके विद्याद्धयशुल्लाष्टकस्य तु । प्राकृते बेणवेश्वेव गान्धारांशे प्रयुज्यते

English

His daughter was Dravi(ja (Idaviqla in Bd. P.) who be¬ came the mother of Visravas. He had a son also named Visala. He was an extremely virtuous king.

अध्याय १५६

श्लोक 37

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्वैकमना नृप ।यावन्तो रोमकूपाः स्युः सर्वाङ्गेषु पृथक्पृथक्

tadahaṃ sampravakṣyāmi śṛṇuṣvaikamanā nṛpa / yāvanto romakūpāḥ syuḥ sarvāṅgeṣu pṛthakpṛthak

हिन्दी अर्थ

पदस्य तु त्रयं रूप सप्तरूषं तु कशिकम् । गान्धारांशेन कात्स्स्पेंन पर्ययस्थ विधिः स्मृतः ॥

English

The city of Visala (Vaisali) 1 was built by king Visala. Visala's son was the king Hemacandra of great strength.

अध्याय १५६

श्लोक 38

तावद् वर्षसहस्राणि रुद्रलोके महीयते ।शुक्लतीर्थे तु यद् दत्तं ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः

tāvad varṣasahasrāṇi rudraloke mahīyate / śuklatīrthe tu yad dattaṃ grahaṇe candrasūryayoḥ

हिन्दी अर्थ

देखी जाती। अर्थात् ये निन्दित हैं उसी प्रकार अनृपयुक्त स्थान में पड़े अलंकार भी अत्यन्त गहित माने गये हैं ।२३-२५। जो गायक अलंकारों को यथा स्थान सन्निविष्ट कर के राग का प्रदर्शन करते हैं, वे संगीत के समु- चित कत्तंब्य का पालन करते हैं ।२१६। अब इसके उपरान्त मैं प्यंव का लक्षण, वर्णिका के द्वारा उनका प्रवर्तत मासोद्भुव ओर भुखोद्भूव को यथार्थ रूप से बतला रहा हूँ ।२७। षडज् स्वर के तेईस प्रकार के अलंकार विपर्यय के द्वारा अस्सी/ प्रकार के हो जाते हैं । षड्ज पक्ष भी तत्त्व के आदि में और हीन स्वर हो जाता है २८। षड्ज और मध्यम, एवं दोनों ग्राम का पये य, उत्तर मन्द तथा अविक का मान छः प्रकार का होता है । स्वर, अलदडूतर और प्रत्यय सब के प्रत्यय होते हैं । बहिर्गीतों के विश्लेषण से ये भी पञ्च दंवत ही जाने गये हैं ।२६-३०। गोरूपों के आगे मध्यमांश का स्थापन ही पर्यय है । इन दोनों का विभाग गीतों की सौन्‍्दयें-

English

After Hemacandra (his son) Sucandra became very famous. Sucandra's son was the well known king Dhumrasva.

अध्याय १५६

श्लोक 39

वर्धते तद्गुणं तावद्दिनानि दश पञ्च च ।शुक्लतीर्थे शुचिर्भूत्वा यः करोति प्रदक्षिणम्

vardhate tadguṇaṃ tāvaddināni daśa pañca ca / śuklatīrthe śucirbhūtvā yaḥ karoti pradakṣiṇam

हिन्दी अर्थ

वृद्धि में सहायक होता है । मैंने स्वसार और स्वरान्तर का गौणरूप में वर्णन कर दिया। सप्त स्वर, और पदक्रम के अनुसार पर्यय का प्रयोग होता है। चारों मद्रक गान्धारां से गाये जाते हैं, पचम धैवत में निषादज का प्रयोग होता है। मद्रकों में पहज और ऋषभ का ही प्रयोग होता है इतर का नहीं

English

Dhumrasva's son Synjaya became a great scholar. Syn- jaya's son was the glorious and valorous Sahadeva. Krsasva was Sahadeva's son. He was extremely righte¬ ous. The valorous Somadatta of great brilliance was Krsasva's son.

अध्याय १५६

श्लोक 40

पृथ्वी प्रदक्षिणा तेन कृता यत्तस्य तत्फलम् ।शोभनं मिथुनं यस्तु रुद्रम् उद्दिश्य पूजयेत्

pṛthvī pradakṣiṇā tena kṛtā yattasya tatphalam / śobhanaṃ mithunaṃ yastu rudram uddiśya pūjayet

हिन्दी अर्थ

हयशुल्लाष्टक के अपर और अन्तिम दो भेद होते हैं। गान्धारांश में और प्राकृत में वेण सम्बन्धी रागों का प्रयोग होता है। पद के तीन रूप होते हैं, केशिक के सात। सम्पूर्ण गान्धारांश से पर्यंय विधि सम्पन्न की जाती है। इसी प्रकार मध्यमांश के मध्यम पद के भी क्रमिक विधान का निर्देश किया गया धानि गीतानि प्रोक्तानि रूपेण तु विशेषतः । तत्तु सप्तस्वरं कार्य सप्तरूपं च केशिकम् ३६ अडगदशंनमित्याहुर्माने है समके तथा । ट्वितीयभावाचरणा मात्रा नाभिप्रतिष्ठिता १३७ उत्तरे च प्रकृत्येब॑ मात्रा तल्‍लीयते तथा । हन्तारः पिण्डको यत्र मात्रायां नातिवतंते ३८ पादेनेकेन मात्रायां पादोनामतिवीरणा। संख्यायाश्रोपहननं तत्र यानमिति स्मृतम्

English

Janamejaya was the son of the saintly king Somadatta. Janamejaya's son named Pramati was very famous.

अध्याय १५६

श्लोक 41

सप्त जन्मानि तस्यैव वियोगो न च वै क्वचित् ।एतत्ते कथितं राजन् संक्षेपेण फलं महत्

sapta janmāni tasyaiva viyogo na ca vai kvacit / etatte kathitaṃ rājan saṃkṣepeṇa phalaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

द्वितोयं पादभड्गं च ग्रहेणाभिप्रतिष्ठितम् । पूर्व॑मष्टतृतीये तु द्वितोयं चापरीतके ॥॥४ ० अर्थेंन पादसाम्यस्य पादभागाच्च पश्चके पादभागं सपादं तु प्रकृत्यासपि संस्थितस् ३४१ चतुर्थमुत्तरे चेव मद्रवत्या च मद्रके । मद्रके दक्षिणास्थापि यथोक्ता बतेते कला

English

By the grace of Tynabindu, all the kings ruling over Visala were long-lived, noble-souled, valorous and very righteous. Saryati begot twins, a son and a daughter Th* tnn u

अध्याय १५६

श्लोक 42

शुक्लतीर्थस्य यत्पुण्यं यथा देवाच्छ्रुतं मया ।य इदं शृणुयाद्भक्त्या पुराणे विहितं फलम्

śuklatīrthasya yatpuṇyaṃ yathā devācchrutaṃ mayā / ya idaṃ śṛṇuyādbhaktyā purāṇe vihitaṃ phalam

हिन्दी अर्थ

एकत्वमुपयोगस्प द्योयद्धि द्विजोत्तम । अनेकसमवायस्तु पताकाहरिणं स्मृतभ् ४४ हैं ।३४-३५। जिन गीतों का वर्णन विशेष रूप से रूप के साथ किया गया है उनको संप्त स्वरों से युक्त करना चाहिए और केशिक को सप्तरूप में । इस प्रकार अंगदर्शन, दो मान और समक को कहा गया है। ह्वितीय भावाचरण मात्रा उपयुक्त नहीं होती । और स्वभावतः उत्तर (मन्द्र) में मात्रा लोन हो जाती है। जहाँ हन्तार पिण्डक मात्रा से अधिक नहीं होता, ओर जिस मात्रा में एक चरण ओर पौन चरण रहते हैं

English

Anarta's successor was the heroic (kin j n

अध्याय १५६

श्लोक 43

स लभेन्नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं पुनः पुनः ।पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्

sa labhennātra sandehaḥ satyaṃ satyaṃ punaḥ punaḥ / putrārthī labhate putraṃ dhanārthī labhate dhanam

हिन्दी अर्थ

अर्थात् जो मात्रा पोने दो चरण की होती है उसको अतिवीरण कहते हैं और उसमें संख्या के संधर्ष होने पर यान नामक अलंकार की उत्पत्ति होती है।३६-३६। द्वितीय पाद भंग को ग्रह नाम से प्रतिष्ठित किया गया है पहला, आठवाँ, तीसरा और दूसरा अपर और अन्तिम, पाद साम्य के आधे भाग के साथ, पाँचों में वाद भाग, और संपाद पाद भाग प्रकृति में स्थिर रहते हैं। उत्तर, मद्रवती, मद्रक में चोथी कला तथा मद्रक में

English

O son of Suta, O holy lord, how is it that even after the lapse of a long period of many Yugas, Revati did not become old? How did her hair not turn grey? After going to the mountain Meru how did Saryati's son have progeny of his own? How did they survive till now on the earth? We wish to hear precisely.-

अध्याय १५६

श्लोक 44

मोक्षार्थी लभते मोक्षं स्नानदानफलं महत्

mokṣārthī labhate mokṣaṃ snānadānaphalaṃ mahat

हिन्दी अर्थ

दक्षिण की उक्त कला रहती है।४०-४२। पहले ही अनुयोग को द्वितीय बुद्धि इष्ट रहती है। इसके बाद दो पादों के और कलाओं के आकलन का विधान आचार्यों ने नहों बताया है। द्विजोत्तम ! दोनों के उपयोग की एकता और अनेक कलाओं के एकन्न संगठन को पताकाहरिण कहते हैं। बत्ति में तीन बृत्तियों की आवृत्ति दक्षिणा कहीं गई है। सोवीरी मृच्छेना ओर वे भाठ समवाय ये भी आवृत्त (दुहराना) होते इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते गीतालंकारनिर्देशो नाम सप्ताशीतितमोअध्याय: ॥

English

How many are the groups of gods? How are the Gan- dharvas? How was that music on hearing which Raivata consi¬ dered a long period as only a Muhurta?

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 156
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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