Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
158
अध्याय 158 / 232

Adhyaya 158

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अध्याय १५८

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे हुङ्कारस्वामितीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १५८ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्परं तीर्थं सङ्गमेश्वरमुत्तमम् ।नर्मदादक्षिणे कूले सर्वपापभयापहम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe huṅkārasvāmitīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma saptapañcāśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 158 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchetparaṃ tīrthaṃ saṅgameśvaramuttamam / narmadādakṣiṇe kūle sarvapāpabhayāpaham

हिन्दी अर्थ

वसिष्ठ की ऐसी बातें सुनकर राजा इक्ष्वाकु परम कुद्ध हुए और बिकुक्षि से बोले--मैंने तुम्हें पित॒कमं के योग्य मांस लाने के लिए आज्ञा की थी, और उसी के लिये तुम शिकार करने गये भी थे, किन्तु वहाँ पर तुमने कुछ भी उचित अनुचित का विचार न कर श्राद्ध के पहिले ही निर्ममतायुबंक एक खरगोश खा लिया इस गुर अपराध के कारण तुम्हें मैं त्याग कर रहा हैं, अब तुम यहाँ से बाहर जहाँ मन कहे चले जाओ और अपने इस नीच कर्म का फल भोगो ।” वत्तिष्ठ के कहने पर इस प्रकार राजा इक्ष्वाकु ने अपने पृत्र विकुक्षि को त्याग दिया उस राजा इशक्ष्वाकु के परलोक गमन के अनन्तर परम धर्मात्मा विकृक्षि ने महर्षि वसिष्ठ के बहुत कहने सुनने पर अयोध्या का राज्य भार अपने ऊपर ले लिया और समस्त पृथ्वी मण्डल का हासन किया ।

English

Since it is after Apana (?), Uttarayana having Dha (Dhaivata) as the starting point, is the Murcchana the deities of which are Pitrs (manes), the deities (worshipped in) Sraddhas.

अध्याय १५८

श्लोक 2

धनदस्तत्र विश्रान्तो मुहूर्तं नृपसत्तम ।पितृलोकात्समायातः कैलासं धरणीधरम्

dhanadastatra viśrānto muhūrtaṃ nṛpasattama / pitṛlokātsamāyātaḥ kailāsaṃ dharaṇīdharam

हिन्दी अर्थ

कालेन गतवांस्तत्र स च न्यूनतरां गतिम् । ज्ञात्वेबमेतदाख्यानं नाविधिभंक्षयेत्तु व २२

English

The great sages worship the Fire-god with the Suddha- Sadja (pure Sa-) note; it should be known as $uddha-Sa<jljika.

अध्याय १५८

श्लोक 3

प्रत्ययार्थं नृपश्रेष्ठ ह्यद्यापि धरणीतले ।कृष्णवर्णा हि पाषाणा दृश्यन्ते स्फटिकोज्ज्वलाः

pratyayārthaṃ nṛpaśreṣṭha hyadyāpi dharaṇītale / kṛṣṇavarṇā hi pāṣāṇā dṛśyante sphaṭikojjvalāḥ

हिन्दी अर्थ

पुबंमाडीवके युद्धे ककुत्स्थस्तेन स स्घृतः । अनेनास्तु कवुत्स्थस्य पृथरानेनसः स्पृतः जज्षे श्रावस्तको राजा श्रावस्ती येन निशिता । श्रायस्तस्थ तु दायादों बृहदश्वो महायशाः १२७

English

It starts from the Pahcama note causing delight to the good people.

अध्याय १५८

श्लोक 4

विन्ध्यनिर्झरनिष्क्रान्ता पुण्यतोया सरिद्वरा ।प्रविष्टा नर्मदातोये सर्वपापप्रणाशने

vindhyanirjharaniṣkrāntā puṇyatoyā saridvarā / praviṣṭā narmadātoye sarvapāpapraṇāśane

हिन्दी अर्थ

किन्तु राज्य भार ले लेने पर वह राजा विकुक्षि अपने उस पर्व पाप के कारण उत्तरोत्तर गिरता गया उसकी महिमा उत्तरोत्तर क्षीण होती गई इस आख्यान को जानकर लोगों को चाहिए कि विना विधान के मांस को न खाये ।१९-२२। बुद्धिमान् लोग मांस के विषय में यह कहा करते हैं कि “मैं इस लोक में जिसके मांस का भक्षण कर रहा हूँ, वह परलोक में मेरे मांस का भक्षण करेगा--यही माँस भक्षण का नियम्न है ।?” शहर

English

(Defective) That Murcchana which serpents of poiso¬ nous eyes do not approach and the serpent-deities become as it

अध्याय १५८

श्लोक 5

सङ्गमे तत्र यः स्नात्वा पूजयेत् सङ्गमेश्वरम् ।अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्य् असंशयम्

saṅgame tatra yaḥ snātvā pūjayet saṅgameśvaram / aśvamedhasya yajñasya phalaṃ prāpnoty asaṃśayam

हिन्दी अर्थ

भक्षण करनेवाले राजा विकुक्षि का उत्तराधिकारी परम बलवान् राजा ककुत्स्थ हुआ प्रात्रीनकाल में इन्द्र के बैल का स्वरूप धारण करने पर यह राजा उनके ककुद (डील) पर सवार हुआ था। यह प्रसंग पुर्बकाल में होनेवाले भाडीवक नामक युद्ध में घटित” हुआ था, इसीलिये इसका नाम ककुत्स्थ पड़ा । ककुत्स्थ के पुत्र अनेना हुए, अनेना के पुत्र राजा पृथु हुए, पृथु के पुत्र वृषदश्व हुए, उनके परम बलशाली अन्ध्न नामक पुत्र हुआ अन्ध्र के यवनाइव नामक पुत्र हुआ, जिसके पुत्र का नाम श्रावस्त हुआ ।र३-२६। उसी राजा श्रावस्त ने श्रावस्ती नामक पुरी का निर्माण किया था। राजा श्रावस्त के पुत्र महान् यशस्वी राजा बृहदश्व हुए । बृहदश्व के पत्र का नाम कुवलाइव सुना जाता है। यही राजा कुवलाइव घुस्धु के मारने के कारण धुन्धुमार नाम से विख्यात हुए

English

The Murcchana with which Kinnaras (sing) in imitation of birds, is the excellent ( Ultama) MQrcchand. Its deity is the Lord of Birds (Garutfa).

अध्याय १५८

श्लोक 6

घण्टापताकावितनं यो ददेत्सङ्गमेश्वरे ।हंसयुक्तविमानस्थो दिव्यस्त्रीशतसंवृतः

ghaṇṭāpatākāvitanaṃ yo dadetsaṅgameśvare / haṃsayuktavimānastho divyastrīśatasaṃvṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

ऋषियों ने कहा--हे परम बुद्धिमान् सूत जी ! धुन्धु के वध का वृत्तान्त विस्तारपृवंक सुनना चाहते हैं, जिस कारणवश राजा कुवलाइव को धुन्धुमार की उपाधि मिली

English

By the sound of Gandhara Raga, the earth (or cow?) is held in support. Hence it is called Visuddha-Gandharl (of pure Go). And Gandharva is its presiding deity.

अध्याय १५८

श्लोक 7

स रुद्रपदमाप्नोति रुद्रस्यानुचरो भवेत् ।दधि भक्ते न देवस्य यः कुर्याल्लिङ्गपूरणम्

sa rudrapadamāpnoti rudrasyānucaro bhavet / dadhi bhakte na devasya yaḥ kuryālliṅgapūraṇam

हिन्दी अर्थ

खूत बोले--ऋषिवुन्द ! राजा बृहदइव के पुत्रों की संख्या इक्कीस सहखर थी, वे सब के सब्र बमुवुर्धासिकाः सर्वे यज्वानो भूरिदक्षिणा:। कुबलाश्व॑ं महावीय॑ शुरमुत्तमधासिकम्

English

The Murcchana Uttara-Gandharl is so called as it was created after Gandhara. Its (presiding) deities are Vasus.

अध्याय १५८

श्लोक 8

सिक्थसंख्यं शिवे लोके स वसेत् कालम् ईप्सितम् ।श्रीफलैः पूरयेल्लिङ्गं निःस्वो भूत्वा भवस्य तु

sikthasaṃkhyaṃ śive loke sa vaset kālam īpsitam / śrīphalaiḥ pūrayelliṅgaṃ niḥsvo bhūtvā bhavasya tu

हिन्दी अर्थ

बृहदश्वोइभ्यषिज्चत्तं तस्मित्राष्ट्रे नराधिपः । पुत्रसंक्रामितश्रीस्तु बन राजा विवेश ह ७३ २ बृहदश्यं महाराज शुरमुत्तमधासिकम् । प्रयात॑ तमुत्तड्धूस्तु ब्रह्मषिः प्रत्यवारयत्

English

The Satfja Murcchana first approached god Brahma (Pitamaha). Hence its greatness. Its deity is the Fire-god.

अध्याय १५८

श्लोक 9

सो ऽपि तत्फलमाप्नोति गतः स्वर्गे नरेश्वर ।अक्षया सन्ततिस्तस्य जायते सप्तजन्मसु

so 'pi tatphalamāpnoti gataḥ svarge nareśvara / akṣayā santatistasya jāyate saptajanmasu

हिन्दी अर्थ

भवता रक्षणं कार्य तत्तावत्कतुंमहेति । निरुद्धिग्सस्तपः करतुं' न हि शक्नोमि पार्थिव ३४ समा5अ्रससमोपेषु समेषु सरुधन्वसु । ससुद्रो वालुकापुण्णस्तत्र तत्र तिष्ठति भूपते स मनोस्तनय: क्रो धुन्धुर्नाम सुदारण:। शतं लोकविनाशाय तप आस्थाय दारुणम् ३७ संवत्सरस्य पयन्ते स निश्चासं प्रमु्यति । यदा यदा मही तत्र घलति सम सकानना

English

The Murcchana called Mandasastha is divine and extensive. The names of its equalities cannot be described. Its deity is Paflcama (the note Pa).

अध्याय १५८

श्लोक 10

स्नपनं देवदेवस्य दध्ना मधुघृतेन वा ।यः करोति विधानेन तस्य पुण्यफलं शृणु

snapanaṃ devadevasya dadhnā madhughṛtena vā / yaḥ karoti vidhānena tasya puṇyaphalaṃ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

सभी विद्याओं में पारज़ुत, परम बलवान्, दुर्दमनीय, प्रचुरदक्षिणा देते वाले, यज्ञकर्त्ता एवं घामिक विचारों वाले थे। नराधिप बृहदद्व ने सबों में परम धामिक, शूरवीर एवं साहसी कु+लाइ्व को अपने राज्य के उत्तराधिकारी पद पद अभिषिक्त किया और इस प्रकार योग्य पुत्र को राज्य भी समयित कर र्त्यं वन को चले गये । ब्रह्म उत्तदू: ते परम धघामिक महाराज बृहदश्व को वन में जाते हुए निवारित किया ।३०-३ ३।

English

All the seven Notes ( Svaras) and the Murcchanas are recounted completely. Murcchanas with Sadharana Svaras 1 Ce.g. Antara Gandhara, Kakall Nisada) are many. Only six of them are known.

अध्याय १५८

श्लोक 11

धृतक्षीरवहा नद्यो यत्र वृक्षा मधुस्रवाः ।तत्र ते मानवा यान्ति सुप्रसन्ने महेश्वरे

dhṛtakṣīravahā nadyo yatra vṛkṣā madhusravāḥ / tatra te mānavā yānti suprasanne maheśvare

हिन्दी अर्थ

उत्तक॒क ने कहा--हे राजनू ! आपको हम लोगों की रक्षा करनी चाहिए, अतः हमारी रक्षा कीजिये, उद्विग्न चित्र होने के कारण तपस्या करने में हम असमर्थ हो रहे हैं। भूपते ! हमारे आश्रम के समीप ही इस समान मरुभूमि में बालू का समुद्र है। उसी में भूमि के अध्दर निवास बनाकर परम विकराल शरीरवाला, महाबलवान धुन्धु रहता है, देवबगण भी उस धुन्धु का वध नहीं कर सकते, वह बाल में रहता है । वह धुन्धु मनु का पुत्र है, फिर भी परम क्र और दारुण चित्तवृत्तिहाला है। लोकों का विनाश्ष करने के लिए वह सौ वर्षों से दारुण तप कर रहा है ।३४-३७। एक वर्ष बीतने पर वह एक श्वास छोड़ता है, जिस समय वह श्वास छोड़ता है, उस समय जंगलों समेत सारी पृथ्वी हिलने लगती है। उसकी निःश्वास वायु से ध्ल का विकराल बवंडर उठ पड़ता है, जिससे सूर्य का मार्ग ही घिर जाता है, सात दिनों तक भूमि कॉँपती

English

After knowing the views of earlier teachers, I shall explain in due order, the thirty embellishments of music. Listen to them while I am expounding.

अध्याय १५८

श्लोक 12

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यस्तु दद्यान्महेश्वरे ।तत्सर्वं सप्तजन्मानि ह्यक्षयं फलम् अश्नुते

patraṃ puṣpaṃ phalaṃ toyaṃ yastu dadyānmaheśvare / tatsarvaṃ saptajanmāni hyakṣayaṃ phalam aśnute

हिन्दी अर्थ

रहती है। चारों ओर अग्नि की चिनगारियाँ उठ पड़ती हैं, विकराल ज्वालाएँ निकलने लगती है, अतिदारुण धूएँ में सारी दिशाएं आकी्ण हो जाती हैं, है राजन् ! इन सब उत्पातों से हम अपने इस आश्रम में भी निवास नही कर पाते ।३८-४०। है महाबाहु राजन ! लोकरक्षा के ध्यान से उसे उत्पात से निवारित कीजिये ।

English

The Alankaras (embellishments of music) are to be explained along with their Varnas (movements of notes such as 'steady', 'ascending' and others) as their specific basis and also along with their associated configuration ( Samsthana ), always in regard to dramatic performance 2 etc.

अध्याय १५८

श्लोक 13

सर्वेषामेव पात्राणां महापात्रं महेश्वरः ।तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पूजनीयो महेश्वरः

sarveṣāmeva pātrāṇāṃ mahāpātraṃ maheśvaraḥ / tasmāt sarvaprayatnena pūjanīyo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

त॑ वारय भहाबाहो लोकानां हितकाम्यया । तेजस्ते सुमहाविष्णुस्तेजसा55प्याययिष्यति ॥॥४ १ लोकाः स्वस्था भवन्‍न्त्वय्य तस्मिन्विनिहते5सुरे । त्वं हि तस्य वधायाद्य समर्थ: पृथवोपते ४२ विष्णुना च बरो दत्तो मम पूर्व ततो४नघ । न हि धुन्धुमहावीयंस्तेजसाइल्‍पेन शक्‍्यते निर्दग्पुं पथिवीपाल अपि वर्षशतेरिह । वीर्य हि सुमहत्तस्थ देवरपि दुरासहम् ४४

English

The SSdharana Svaras are:

अध्याय १५८

श्लोक 14

ब्रह्मचर्यस्थितो नित्यं यस्तु पूजयते शिवम् ।इह जीवन्स देवेशो मृतो गच्छेद् अनामयम्

brahmacaryasthito nityaṃ yastu pūjayate śivam / iha jīvansa deveśo mṛto gacched anāmayam

हिन्दी अर्थ

राजा संन्यस्तशस्त्रो5हमयं तु तनयो मस । भविष्यति द्विजश्रेष्ठ धुन्धुमारों न संशय:

English

Vide Bharata's NafyaSastra Volume. IV, p -92 (Baroda Edition)

अध्याय १५८

श्लोक 15

शिवे तु पूजिते पार्थ यत्फलं प्राप्यते बुधैः ।योगीन्द्रे चैव तत्पार्थ पूजिते लभते फलम्

śive tu pūjite pārtha yatphalaṃ prāpyate budhaiḥ / yogīndre caiva tatpārtha pūjite labhate phalam

हिन्दी अर्थ

स॒ त॑ व्यादिश्य तनयं धुन्धुमारणमुद्यतम् । जगाम पबंतायव तपसे शंसितत्रतः ३४७ कुबलाश्वस्तु धर्मात्मा पितुर्बचननमास्थित: । सहस्नरेकाविशत्या पुवाणां सह पाथिव: ॥ तमाविशत्ततो विष्णुभंगवान्स्वेन तेजसा । उत्तड्भस्य नियोगात्तु लोकानां हितकाम्यया

English

The fulfilment of embellishment is achieved by the implications of sentences and connotations of the word-com- binations.

अध्याय १५८

श्लोक 16

ते धन्यास्ते महात्मानस् तेषां जन्म सुजीवितम् ।येषां गृहेषु भुञ्जन्ति शिवभक्तिरता नराः

te dhanyāste mahātmānas teṣāṃ janma sujīvitam / yeṣāṃ gṛheṣu bhuñjanti śivabhaktiratā narāḥ

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे इस उपकार काये में भगवान् विष्णु अपने तेजोबल से तुम्हारी सन्तुष्टि करेगें अर्थात् सहायता करेंगे। उस महान् असुर के मारे जाने पर सभी लोक स्वस्थ हो जायेंगे। है प्रथ्वीपति ! तुम उस महान् असुर के मारने में आज समर्थ हो है निष्पाप ! पृवेकाल में भगवान् विष्णु ने यह वरदान दिया है कि महाबलवान् घुन्धु अल्प बल से अधीन नहीं किया जा सकता । अर्थात् इसे वश्य करने के लिये किसी महान् बलशाली

English

One should understand that there are three place of utterance. They are the chest, the throat and the head. The best procedure (of production of notes) begins in these three places.

अध्याय १५८

श्लोक 17

संनिरुध्येन्द्रियग्रामं यत्रयत्र वसेन्मुनिः ।तत्र तत्र कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च

saṃnirudhyendriyagrāmaṃ yatrayatra vasenmuniḥ / tatra tatra kurukṣetraṃ naimiṣaṃ puṣkarāṇi ca

हिन्दी अर्थ

को आवश्यकता है, है प्रथ्वीपाल ! सकड़ों वर्षो में भी इसे कोई पराजित नहीं कर सकता, उसका बल महान् है, देवगण भी उसे पराजित नहीं कर सर्कतिे' ४१-४४। महात्मा उत्तड्धू के ऐसा कहते पर रजर्षि बृहृदश्व ने धुन्धु के उपद्रयों को निर्म्ल करने के लिये उन्हें अपने पुत्र कुबलाश्व को समर्पित करते हुए बोले। महष ! मैं राजा हैँ, सभी का पालन करता हमारा धर्म है; परन्तु हम अस्त्र शस्त्र छोड़ चुके हैं, है द्विंजभ्रेष्ठ ! यह हमारा पुत्र निस्सन्देह उस धुन्धु को मारने में समथ होगा । इस प्रकार धुन्धु के मारने के लिए सत्यप्रतिज्ञ राजा बृहदश्व ने अपने पुत्र कुवलाश्व को नियुक्त कर स्वयं तपस्या के लिये पर्वत की और प्रस्थान किया । इधर पिता की आज्ञा शिरोघार्य कर धर्मात्मा महाराज कुबलाश्व ने अपने इक्कीस सहख्र पुत्रों को तथा महृषि उत्तद्भु को साथ लेकर उस धुन्धु के निवारणार्थं प्रस्थान किया ।४५-४८। महषि उत्तद्भू के प्रयत्न पूर्वक प्रार्थना

English

In the original stage (Prakftau), there are four varnas (tone-patterns) with fourfold movement. The alternative movement is eightfold; 1 and gods know it as sixteenfold.

अध्याय १५८

श्लोक 18

यत्फलं वेदविदुषि भोजिते शतसंख्यया ।तत्फलं जायते पार्थ ह्येकेन शिवयोगिना

yatphalaṃ vedaviduṣi bhojite śatasaṃkhyayā / tatphalaṃ jāyate pārtha hyekena śivayoginā

हिन्दी अर्थ

आदि करने के कारण तथा लोक हित की भावना से भगवान् विष्णु स्वयं उस रार्जाष कुवलाश्व में अपने तेज सहित आविष्ट हुए । इस प्रकार ,राजि कुवलाइ्व ने जिस समय धुन्धु के निवा रणार्थ प्रस्थान किया उस समय भाकाद्ष में चारों ओर से घोर शब्द होने लगे । और चारों ओर से यह आवाज आने लगी कि आज यह राजा

English

[ The designations of Varnas: ]

अध्याय १५८

श्लोक 19

यत्र भुञ्जति भस्माङ्गी मूर्खो वा यदि पण्डितः ।तत्र भुञ्जति देवेशः सपत्नीको वृषध्वजः

yatra bhuñjati bhasmāṅgī mūrkho vā yadi paṇḍitaḥ / tatra bhuñjati deveśaḥ sapatnīko vṛṣadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

दिव्य: पुष्पेश्न त॑ देवा: समसंमत अद्भुतम् । स गत्वा पुरुषव्याश्नस्तनये: सह वीय॑वान् समुद्रं खनयामास वालुकाणंवमव्ययम् । नारायणेत राजर्षिस्तेजस455प्याथितो हि सः ५२

English

There is one (Varna viz. Sthayin) which has steady employment. Sancara is a mixed movement. One should indicate the descent of Varnas (i.e. Svaras) as Avarohana.

अध्याय १५८

श्लोक 20

विप्राणां वेदविदुषां कोटिं संभोज्य यत्फलम् ।भिक्षामात्रप्रदानेन तत्फलं शिवयोगिनाम्

viprāṇāṃ vedaviduṣāṃ koṭiṃ saṃbhojya yatphalam / bhikṣāmātrapradānena tatphalaṃ śivayoginām

हिन्दी अर्थ

तस्य पुत्र: खनद्दिश्व वालुकान्तहितस्तदा । धुन्चुरासादितस्तत्न दिशामाश्षित्य पश्चिमाम् ५४ सुखजेनारिनना कुद्धों लोकानुद्वतंयन्चिव । वारि सु्लाव योगेन सहोदधिरिवोदये ह ५५ सोमस्य सोसपश्रेष्ठ धारोमभिकलिलो महान् । तस्य पुत्रास्तु निदंग्धास्त्रिभिरूनास्तु राक्षकाः

English

There are four embellishments, viz. Sthapani, These are mentioned in the Puranas, only later writers do not refer to them.

अध्याय १५८

श्लोक 21

सङ्गमेश्वरमासाद्य प्राणत्यागं करोति यः ।न तस्य पुनरावृत्तिः शिवलोकात् कदाचन

saṅgameśvaramāsādya prāṇatyāgaṃ karoti yaḥ / na tasya punarāvṛttiḥ śivalokāt kadācana

हिन्दी अर्थ

ततः स राजाउतिबलो धुन्धुबन्धुनिबहेँण: । तस्य वारिमयं वेगमपिबत्स नराधिप:ः ४७ योगी योगेन वलछ्लि वा शमयामास वारिणा। निरस्य तं॑ महाकाय॑ घबलेनोदक राक्षसम् श्द उत्तड़ं दर्शयामास कृतकर्मा नराधिप:। उत्तडु:श्व बरं प्रादात्तस्भे राजे महात्मने ५६ अवात्तस्पाक्षयं वित्त शत्रुभिश्वाप्यधुष्यताम् । धर्म रत च सतत स्वर्ग वास तथा5क्षयम् ॥॥ पुत्राणां चाक्षयॉल्लोकान्स्वर्गे ये रक्षसा हताः

English

The exigencies of the metre have led to the change in the order of Vardas. The order should have been:

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 158
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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