अध्याय १५८
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे हुङ्कारस्वामितीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तपञ्चाशदधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १५८ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो गच्छेत्परं तीर्थं सङ्गमेश्वरमुत्तमम् ।नर्मदादक्षिणे कूले सर्वपापभयापहम्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe huṅkārasvāmitīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma saptapañcāśadadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 158 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato gacchetparaṃ tīrthaṃ saṅgameśvaramuttamam / narmadādakṣiṇe kūle sarvapāpabhayāpaham
हिन्दी अर्थ
वसिष्ठ की ऐसी बातें सुनकर राजा इक्ष्वाकु परम कुद्ध हुए और बिकुक्षि से बोले--मैंने तुम्हें पित॒कमं के योग्य मांस लाने के लिए आज्ञा की थी, और उसी के लिये तुम शिकार करने गये भी थे, किन्तु वहाँ पर तुमने कुछ भी उचित अनुचित का विचार न कर श्राद्ध के पहिले ही निर्ममतायुबंक एक खरगोश खा लिया इस गुर अपराध के कारण तुम्हें मैं त्याग कर रहा हैं, अब तुम यहाँ से बाहर जहाँ मन कहे चले जाओ और अपने इस नीच कर्म का फल भोगो ।” वत्तिष्ठ के कहने पर इस प्रकार राजा इक्ष्वाकु ने अपने पृत्र विकुक्षि को त्याग दिया उस राजा इशक्ष्वाकु के परलोक गमन के अनन्तर परम धर्मात्मा विकृक्षि ने महर्षि वसिष्ठ के बहुत कहने सुनने पर अयोध्या का राज्य भार अपने ऊपर ले लिया और समस्त पृथ्वी मण्डल का हासन किया ।
English
Since it is after Apana (?), Uttarayana having Dha (Dhaivata) as the starting point, is the Murcchana the deities of which are Pitrs (manes), the deities (worshipped in) Sraddhas.