Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
165
अध्याय 165 / 232

Adhyaya 165

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अध्याय १६५

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे सांवौरेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम चतुःषष्ट्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १६५ श्रीमार्कण्डेय उवाच: नर्मदादक्षिणे कूले सिद्धेश्वरमिति श्रुतम् ।तीर्थं परं महाराज सिद्धैः कृतमिति प्रभो

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe sāṃvaureśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma catuḥṣaṣṭyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 165 śrīmārkaṇḍeya uvāca: narmadādakṣiṇe kūle siddheśvaramiti śrutam / tīrthaṃ paraṃ mahārāja siddhaiḥ kṛtamiti prabho

हिन्दी अर्थ

त॑ सिनी च कुहश्चव वपुः पुष्टि: प्रभा दसु:। कीतिध तिश्व लक्ष्मीथ्र नव देव्यः सिषेविरे

English

After a long time those sixty thousand sons (of Sagara) attained youth. Of those who (later) (closely) followed the horse (of Asvamedha) the eldest son of Sagara was a tiger among men. The powerful one was famous as Asamanja, otherwise known as Barhiketu.

अध्याय १६५

श्लोक 2

तत्र तीर्थं महापुण्यं सर्वतीर्थेषु पावनम् ।नर्मदाया महाराज दक्षिणं कूलमाश्रितम्

tatra tīrthaṃ mahāpuṇyaṃ sarvatīrtheṣu pāvanam / narmadāyā mahārāja dakṣiṇaṃ kūlamāśritam

हिन्दी अर्थ

प्राप्यावभूथमव्यग्र: सर्वदेवर्धिपुजित: । अतिराजातिराजेरखोो दशधाइतापयहिशः २६ तंदा तत्प्राप्य दुष्पापमंश्वयंम्षिसंस्तुतम् । स विश्वसमतिविश्रा विनयोउविनयाहतः हैं, उन्हीं के गर्भ से परम तेजस्वी एवं सर्वेसमर्थ चन्द्रमा की उत्पत्ति हुई और वे अपने कर्मों द्वारा प्रख्यात हुए । ऋषिवन्द ! तदनन्तर ब्रह्मतानियों में श्रेष्ठ भगवान् ब्रद्मा ने चन्द्रमा को समस्त बीजों, ओषधियों, ब्राह्मणों एवं जल जगत् का राज्यभार समर्पित किया । इस महान् दायित्वपूर्ण राज्य पद पर प्रतिष्ठित होने पर चन्द्रमा का प्रताप बहुत अधिक बढ़ गया, तपस्वियों में अग्रगण्य चन्द्रमा ने इस पद पर प्रतिष्ठित होकर अपने सुन्दर

English

Since he was engaged in activities against the interest of the citizens, he was banished by his father at the very outset. The son of Asamanja was the powerful Amsuman.

अध्याय १६५

श्लोक 3

तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः ।श्राद्धं तत्रैव यो दद्यात् पित्ःन् उद्दिश्य भारत

tatra tīrthe naraḥ snātvā tarpayet pitṛdevatāḥ / śrāddhaṃ tatraiva yo dadyāt pitḥn uddiśya bhārata

हिन्दी अर्थ

स्वभाव से समस्त लोक को परम सन्तुष्ट रखा। प्रचेता के पुत्र दक्ष ने दाक्षायणी के गर्भ से उत्पन्न, परम तपो ब्रत पालनेवाली सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को समपित कीं, जिन्हें लोग नक्षत्र नाम से जानते हैं ।१८-२१। ब्राह्मणों के स्वामी चन्द्रमा ने इत बड़े राज्याधिकार की प्राप्ति के बाद एक विराद् राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया, जिसमें लाखों की दक्षिणा प्रदात की। उस विशाल राजसूय यज्ञ में भगवान् हिरण्यगर्भ उदगाता के पद

English

His son was a virtuous soul. He was well-known by the name of Dilipa. From Dillpa was born Bhagiratha, a hero of great splendour.

अध्याय १६५

श्लोक 4

तृप्यन्ति पितरस्तस्य द्वादशाब्दान्न संशयः ।तत्र तीर्थे तु यो भक्त्या स्नात्वा पूजयते शिवम्

tṛpyanti pitarastasya dvādaśābdānna saṃśayaḥ / tatra tīrthe tu yo bhaktyā snātvā pūjayate śivam

हिन्दी अर्थ

पर ब्रह्मा ब्रह्मा के पद पर नारायण विष्णु सदस्य के स्थान पर, सनत्कुमार प्रभृति आद्य मह्षियों समेत विराजमान थे। द्विजवयंवन्द ! उस यज्ञ में चन्द्रमा ने उन प्रमुख ब्रह्मधियों को तथा जो सदस्य बने हुए थे उन्हें दक्षिण रूप में तीनों लोकों को समपित कर दिया--ऐसा हमने सुना है ।२३-३४ उस चन्द्रमा की सिनी कुह, वपु, पृष्टि, प्रभा, वसु, कौति, धृति तथा लक्ष्मी ये नवों देवियाँ सेवा कर रही थीं। उस राजसूय यज्ञ का अवभृथ स्तान कर चुकने के उपरास्त सभी देवताओं और ऋषियों से सत्कार प्राप्त कर चन्द्रमा जब निश्चित हो गये, तब अपने विशाल साम्राज्य के सिहासन पर समासीन होकर, राजाधिराज बनकर दसों दिशाओं को दस प्रकार से तपाने लगे ।२५-३६। विश्रव॒न्द ! ऋषि लोग जिसकी स्तुति करते थे --ऐसे दुष्प्राप्प ऐश्वरयं की प्राप्ति

English

Ganga, the most excellent of rivers, rendered beauti¬ ful with aerial chariots, was (brought here in this world) by him. She was given the status of a daughter by the (king), the

अध्याय १६५

श्लोक 5

रात्रौ जागरणं कृत्वा पठेत्पौराणिकीं कथाम् ।ततः प्रभाते विमले स्नानं कुर्याद्यथाविधि

rātrau jāgaraṇaṃ kṛtvā paṭhetpaurāṇikīṃ kathām / tataḥ prabhāte vimale snānaṃ kuryādyathāvidhi

हिन्दी अर्थ

स याचमानो देवेश्व तथा देवषिभिश्व हू । नेव व्यसर्जयत्तारां तसस्‍्मायाजिरसे तदा (१२६

English

"Bhaglratha brought down Ganga by means of his active endeavour. Hence Ganga is called Bhaglrathl by those who are the foremost ones among those conversant with genealogies (of kings)."

अध्याय १६५

श्लोक 6

वीक्षते गिरिजाकान्तं स गच्छेत् परमां गतिम् ।पुरा सिद्धा महाभागाः कपिलाद्या महर्षयः

vīkṣate girijākāntaṃ sa gacchet paramāṃ gatim / purā siddhā mahābhāgāḥ kapilādyā maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

तेन स्नेहेन भगवानरद्वस्तस्य बृहस्पते: । पारष्णिग्राहो5भवदेबः प्रगुह्मा55जगवं धनुः ३१ तेन ब्रह्मपिमुस्येम्यः परमास्त्र महात्मना । उद्दिश्य देवानुत्सुष्टं येनेषां नाशितं यशः ३२ तत्र तदयुद्धमभवत्प्रत्यक्षं तारकामयम् । देवानां दानवानां च लोकक्षयकरं महत् ३ ३ तत्न शिष्टास्त्रयों देवास्तुषिताश्वेव ये स्मृताः.। ब्रह्मा शरण जग्सुरादिदेव॑ पितामहम् ३३४ ततो निवार्योशनसं रुद्रं ज्येष्ठ च शंक्रम् । ददावाड्िरसे तारां स्वयमेव पितामहः ३४५ अस्तवंत्नी च तां दृष्टूवा तारां ताराधिपाननाम् । गर्भमुत्सूजसे न त्वं विप्रः प्राह बृहस्पति:

English

Bhaglratha s son was Sruta by name. His successor was Nabhaga. He was always engaged in religious activities.

अध्याय १६५

श्लोक 7

जपन्तश्च परं ब्रह्म योगसिद्धा महाव्रताः ।सिद्धिं ते परमां प्राप्ता नर्मदायाः प्रभावतः

japantaśca paraṃ brahma yogasiddhā mahāvratāḥ / siddhiṃ te paramāṃ prāptā narmadāyāḥ prabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

मदीयायां तनौ योनौ गर्भो धाय: कर्थ च न अथो नावसूजत तु कुमारं दस्युहन्तमम्

English

Ambarisa was his son. Sindhudvlpa succeeded him. It is well-known that the knowers of the Purana of genealogies sing thus:

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 165
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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