Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
167
अध्याय 167 / 232

Adhyaya 167

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अध्याय १६७

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे सिद्धेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षट्षष्ट्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १६७ युधिष्ठिर उवाच: नर्मदादक्षिणे कूले त्वच्चिह्नेनोपलक्षितम् ।तीर्थम् एतन् ममाख्याहि सम्भवं च महामुने

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe siddheśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaṭṣaṣṭyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 167 yudhiṣṭhira uvāca: narmadādakṣiṇe kūle tvaccihnenopalakṣitam / tīrtham etan mamākhyāhi sambhavaṃ ca mahāmune

हिन्दी अर्थ

एतत्सोमस्य वे जन्म कीतितं द्विजसत्तमाः । वंश तस्य द्विजश्रेष्ठा: कीत्यंमान॑ निबोधत ४८ ही उस परम ऐद्वयेशाली ने देवताओं को हतश्री कर दिया देवता लोग इससे सन्देह में पड़ गये और तारा से कहने लगे, सच सच बतलाओ, यह पुत्र किसका है, चद्धमा अथवा बृहस्पति का ।३२-३६। देवताओं के इस प्रकार बारम्बार कहने पर भी जब तारा साधु असाधु कुछ नहीं बोल सकी, तब दस्युहस्तम कुमार उसे शाप देने को उतारू हो गया। ब्रह्मा ने कुमार को निवारित करण पुनः तारा से पूछा--तारे ! बतलाओ, इस

English

After killing Lavana, the son of Madhu, Satrughna entered his Madhuvana and founded die city of Mathura there.

अध्याय १६७

श्लोक 2

मार्कण्डेय उवाच: पुरा कृतयुगस्यादौ दक्षिणे गिरिमुत्तमम् ।विन्ध्यं सर्वगुणोपेतं नियतो नियताशनः

mārkaṇḍeya uvāca: purā kṛtayugasyādau dakṣiṇe girimuttamam / vindhyaṃ sarvaguṇopetaṃ niyato niyatāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

बोली - यह महान् बलशाली दस्युहन्तम कुमार चन्द्रमा का है ।४०-४२। दाता प्रजापति ने सुत का शिर सूंघकर उस परम बुद्धिमान् का नाम बुध रखा उस समय बुध पूर्व दिशा में गमन करने के लिये उठ खड़े हुए । राजपुत्री इला के संयोग से बुध ने एक पुत्र उत्पन्न किया बुध के उस परम तेजस्वी पुत्र का नाम पुरूरवा था, वह क् इला के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण ऐल नाम से भी विख्यात था । उयंशी में उस बुध पुत्र के छह परमतेजस्वी

English

Angada and Candraketu were the sons of Laksmana. Their territories at the border of mountain Himalaya were very prosperous and flourishing.

अध्याय १६७

श्लोक 3

ऋषिसङ्घैः कृतातिथ्यो दण्डके न्यवसं चिरम् ।उषित्वा सुचिरं कालं वर्षाणामयुतं सुखी

ṛṣisaṅghaiḥ kṛtātithyo daṇḍake nyavasaṃ ciram / uṣitvā suciraṃ kālaṃ varṣāṇāmayutaṃ sukhī

हिन्दी अर्थ

पुत्र उत्पन्न हुए, राजयक्ष्मा रोग ने जबरदस्ती आकर चद्रमा को विवश एवं परेशान कर दिया, यंक्ष्मा से अतिशय पीड़ित होने पर जब चन्द्रमा का मण्डल क्षीण हो गया, तब वह पितामह ब्रह्मा एबं अत्रि की शरण में गये ।४३-४६। महान् यशस्वी अत्नि ने चन्द्रमा का पाप शमन किया, राज्यक्ष्मा से मुक्ति प्राप्त कर चन्द्रमा पुनः अपनी कान्ति से चारों भोर प्रकाशित हो उठे । द्विजवुन्द ! यह् चन्द्रमा के जन्म का वृत्तान्त आप लोगों को बतला चुका, अब उनके वंश का वर्णन कर रहा हूँ, सुनते जाइये । चन्द्रमा के इस जन्म वृत्तान्त को सुनने पर

English

Angadiya, the capital city of Angada, was in the land Karapatha. 1 Candravakfra, the city of the mighty Candraketu, was very auspicious.

अध्याय १६७

श्लोक 4

तान् ऋषीन् समनुज्ञाप्य शिष्यैरनुगतस्ततः ।निवृत्तः सुमहाभाग नर्मदाकूलम् आगतः

tān ṛṣīn samanujñāpya śiṣyairanugatastataḥ / nivṛttaḥ sumahābhāga narmadākūlam āgataḥ

हिन्दी अर्थ

धनसा रोग्यमायुष्यं पुण्य कल्मषशो धनम् । सोमस्य जन्म श्रुत्वेव सर्वपाप: प्रमुच्यते ४ ६

English

Tak?a and Puskara were the heroic sons of Bharata.

अध्याय १६७

श्लोक 5

पुण्यं च रमणीयं च सर्वपापविनाशनम् ।कृत्वाहमास्पदं तत्र द्विजसंघसमायुतः

puṇyaṃ ca ramaṇīyaṃ ca sarvapāpavināśanam / kṛtvāhamāspadaṃ tatra dvijasaṃghasamāyutaḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते सोमोत्पत्तिकथनं नाम नवतितमोड्ध्यायः चन्‍्ड््वच्याव्कीर्त वस्तु

English

Modem Karabagh or Baghan on the west bank of the Indus, at the foot of salt range called Niti hill in the Bannu district (cf. RaghuvamJa. XV-90).

अध्याय १६७

श्लोक 6

ब्रह्मचारिभिराकीर्णं गार्हस्थ्ये सुप्रतिष्ठितैः ।वानप्रस्थैश्च यतिभिर्यताहारैर् यतात्मभिः

brahmacāribhirākīrṇaṃ gārhasthye supratiṣṭhitaiḥ / vānaprasthaiśca yatibhiryatāhārair yatātmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

. ब्रह्मवादी पराक़ान्तः शत्रुभियुंधि दुर्जयः । आहर्ता चारिनहोत्रस्प यज्वनां च् ददो महीम्

English

The beautiful city of Tak§a, viz. Takasila 1 is renowned in all the quarters. Puskaravati, 2 the city of the heroic Puskara, is also well-known.

अध्याय १६७

श्लोक 7

तपस्विभिर्महाभागैः कामक्रोधविवर्जितैः ।तत्राहं वर्षमयुतं तपः कृत्वा सुदारुणम्

tapasvibhirmahābhāgaiḥ kāmakrodhavivarjitaiḥ / tatrāhaṃ varṣamayutaṃ tapaḥ kṛtvā sudāruṇam

हिन्दी अर्थ

सत्यवाक्कमंबुद्धि श्र कान्‍त: संवृतमैथुनः । अतोव पुत्रों लोकेयु रूपेणाप्र तिमोभवत् ३३ धन आरोग्य, आयु, पुण्य, एवं पापशान्ति होती है । इसे सुनते ही मनुष्य समस्त पापकर्मों से छटकारा पा जाता है

English

The people who know the Puranas sing this Gatha (laudatory verse): "All the principles are fettered to (con¬ centrated in) intelligent Rama due to his greatness."

अध्याय १६७

श्लोक 8

आराधयं वासुदेवं प्रभुं कर्तारम् ईश्वरम् ।जपंस्तपोभिर्नियमैर्नर्मदाकूलमाश्रितः

ārādhayaṃ vāsudevaṃ prabhuṃ kartāram īśvaram / japaṃstapobhirniyamairnarmadākūlamāśritaḥ

हिन्दी अर्थ

चरद्रवंश का वर्णन

English

Rama was a dark-complexioned, youthful, red-eyed, bright-faced hero with arms extending upto the knees. With a smiling face and leonine shoulders, that mighty-armed (one) uttered only measured words.

अध्याय १६७

श्लोक 9

ततस्तौ वरदौ देवौ समायातौ युधिष्ठिर ।प्रत्यक्षौ भास्करौ राजन्नुमाश्रीभ्यां विभूषितौ

tatastau varadau devau samāyātau yudhiṣṭhira / pratyakṣau bhāskarau rājannumāśrībhyāṃ vibhūṣitau

हिन्दी अर्थ

सूत बोले--“ऋषिव॒ुन्द ! चन्द्रमा के पुत्र बुध और बुध के पुत्र पुरूरवा हुए। राजा पुरूरवा परमतेजस्वी, दानी, यज्ञकर्ता एवं विपुल दक्षिणा देने वाला था वह ब्रह्मवेत्ता था, शत्रुलोग युद्ध में उसे किसी प्रकार भी नहीं जीत सकते थे, शत्रओं का तो उसने विध्वंश कर डाला था।ववह अग्निद्दोत्र का उपासक था, यज्ञ करनेवालों को उसने सारी पृथ्वी दान में दे दी थी ।१-२। वह सर्वेदा सत्य वचन बोलता था, कर्मशील एवं परम बुद्धिमान् था, देखने में परम धुन्दर था, वह गुप्त या उच्छु खलता रहित भैथुन वाला था, लोक में वह एक

English

Rama reigned for ten thousand years. The sound of the chanting of Rk, Saman and Yajur Mantras and the twanging of his bow string were always heard.

अध्याय १६७

श्लोक 10

प्रणम्याहं ततो देवौ भक्तियुक्तो वचो ऽब्रुवम् ।भवन्तौ प्रार्थयामि स्म वरार्हौ वरदौ शिवौ

praṇamyāhaṃ tato devau bhaktiyukto vaco 'bruvam / bhavantau prārthayāmi sma varārhau varadau śivau

हिन्दी अर्थ

तं ब्रह्मवादिन दान्‍्तं धर्मज्ं सत्यवादिनम् । उबंशी वरयासास हित्वा मान यशस्विनी

English

Proceeding in search of Slta, that renowned leader of men killed the (demon) of the family of Pulastya, who had committed sins before.

अध्याय १६७

श्लोक 11

धर्मस्थितिं महाभागौ भक्तिं वानुत्तमां युवाम् ।अजरो व्याधिरहितः पञ्चविंशतिवर्षवत् ।अस्मिन्स्थाने सदा स्थेयं सह देवैरसंशयम्

dharmasthitiṃ mahābhāgau bhaktiṃ vānuttamāṃ yuvām / ajaro vyādhirahitaḥ pañcaviṃśativarṣavat / asminsthāne sadā stheyaṃ saha devairasaṃśayam

हिन्दी अर्थ

तया सहावसद्राजा दश वर्षाणि चाष्ट च सप्त षट् सप्त चाष्टो च दश चाष्टो च वीयंबान बने चेत्ररथे रम्ये तथा मनन्‍्दाकिनोतटे । अलकायां विशालायां ननन्‍दने च वनोत्तमे

English

Rama, son of Dasaratha, was brilliant with his own splendour. He possessed Sattvic qualities. He was richly endowed with good attributes. He surpassed even the Sun and the blazing fire in brilliance.

अध्याय १६७

श्लोक 12

एवमुक्तौ मया पार्थ तौ देवौ कृष्णशङ्करौ ।मामूचतुः प्रहृष्टौ तौ निवासार्थं युधिष्ठिर

evamuktau mayā pārtha tau devau kṛṣṇaśaṅkarau / māmūcatuḥ prahṛṣṭau tau nivāsārthaṃ yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

गन्धमादनपादेषु मेरुशज्रे नगोत्तमे । उत्तरांश्व कुरून्प्राप्प कलापग्रामसेव च .

English

Thus the mighty-armed scion of the family of Iksvaku killed Ravana along with all of his followers and then went back to Heaven.

अध्याय १६७

श्लोक 13

देवावूचतुः ।अस्मिन्स्थाने स्थितौ विद्धि सह देवैः सवासवैः ।एवमुक्त्वा ततो देवौ तत्रैवान्तरधीयताम्

devāvūcatuḥ / asminsthāne sthitau viddhi saha devaiḥ savāsavaiḥ / evamuktvā tato devau tatraivāntaradhīyatām

हिन्दी अर्थ

एतेषु वनमुख्येषु सुरेराचरितेषु च उर्वश्या सहितो राजा रेसे परमया सुदा ८ गन्धर्वी चोवंशी देवी राजानं मानुषं कथम् । देवानुत्सुज्य संप्राप्ता तन्नो ब्ृहि बहुआुत ९

English

Srirama's son was called Kusa, He had another son Lava of great prowess. Understand (the names of) their realms.

अध्याय १६७

श्लोक 14

अहं च स्थापयित्वा तौ शङ्करं कृष्णमव्ययम् ।कृतकृत्यस्ततो जातः सम्पूज्य सुसमाहितः

ahaṃ ca sthāpayitvā tau śaṅkaraṃ kṛṣṇamavyayam / kṛtakṛtyastato jātaḥ sampūjya susamāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

आत्मनः शापमोक्षार्थ नियमं सा चकार तु । अनग्नदर्शनं चेब अकामात्सह मेथुनम् ११

English

According to VR. VII. 101.10-15 it was founded by Bharata. Probably the same as 'Poukelaotes* mentioned by Greeks as being sacked by Alexander the great. De ( ) identifies it with Charsaddah eighteen miles north of Peshawar, on the Landi near its junction with the Kabul river.

अध्याय १६७

श्लोक 15

तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयेत् परमेश्वरम् ।मार्कण्डेश्वरनाम्ना वै विष्णुं त्रिभुवनेश्वरम्

tasmiṃstīrthe naraḥ snātvā pūjayet parameśvaram / mārkaṇḍeśvaranāmnā vai viṣṇuṃ tribhuvaneśvaram

हिन्दी अर्थ

दौ मेषो शयनाभ्यासे स तावद्य्यवतिष्ठते । घृतमात्र॑ तथा5डहारः कालमेक॑ तु पाथिव १२ अनृपम पुत्र था, सुन्दरता में वह बेजोड़ था ! उस ब्रह्मवादी, क्षमाशील, दानपरायण, धमेश, एवं सत्यभाषी पुरूरवा को अपने रूप के लिये परम यद्य प्राप्त करनेवाली उर्वशी ने अपना मान छोड़कर पतिरूप में वरण किया ।३-४। उस उबंशी के साथ परम बलवान राजा पुरूरवा ने दस आठ, सात, छ, सात, आठ, दस आठ, कुल मिलाकर चोंसठ वर्षों तक सुखपूर्वंक निवास किया। कभी मनोरम च॑त्ररथ नामक वन में, कभी मन्दाकिनी

English

Modem Nasik or Paficavafi in Maharashtra.

अध्याय १६७

श्लोक 16

स गच्छेत्परमं स्थानं वैष्णवं शैवमेव च ।घृतेन पयसा वाथ दध्ना च मधुना तथा

sa gacchetparamaṃ sthānaṃ vaiṣṇavaṃ śaivameva ca / ghṛtena payasā vātha dadhnā ca madhunā tathā

हिन्दी अर्थ

के रमणीय तटवर्ती प्रान्त में, कभी अलकापुरी में, कभी विशालापुरी में, सर्वश्रेष्ठ वन में, कभी गन्धमादन पव॑त के शिखरों पर, कभी नगराजसुमेरु की चोटियों पर, कभी उत्तर कुरु प्रदेश में, कभी कलाप ग्राम में इन प्रमुख वनों एवं देवताओं की क्रीड़ा भूमियों में वह राजा पुरूरवा परम आनन्द समेत उवंशी के साथ विहार करता रहा

English

Ahlnagu's successor was Pariyatra of great fame. His son was Dala and from him was born the king Bala.

अध्याय १६७

श्लोक 17

नार्मदेनोदकेनाथ गन्धधूपैः सुशोभनैः ।पुष्पोपहारैश्च तथा नैवेद्यैर् नियतात्मवान्

nārmadenodakenātha gandhadhūpaiḥ suśobhanaiḥ / puṣpopahāraiśca tathā naivedyair niyatātmavān

हिन्दी अर्थ

ऋषियों ने पूछा--बहुश्रत सूतजी ! गन्धर्व को कन्या दिव्यग्रुणयुक्त उबंशी ने मनुष्य पुत्र॒ राजा पुरूरवा को, समस्त देवताओं को छोड़कर, क्‍यों पतिरूप में वरण किया-हइसे हमें बतलाइये सूत बोले--ऋषिवृन्द ! गन्धवंपुत्री सुन्दरी उर्वशी ने ब्रह्मशाप के कारण मनुष्य को पति- रूप में वरण किया था, उसने प्रतिज्ञा करके इला पुत्र राजा पुरुरवा के साथ रहने की व्यवस्था की थो। शाप से मुक्ति पाने के लिए उसने नियम निश्चित किया था । उसने कहा था, “है राजन् ! मैथुन के अवसर को छोड़कर बिना कामासक्ति के, किसी भी समय मैं आपको नंगा नहीं देखूंगी, हमारी शब्या के समीप

English

Bala's son was a pious-souled (king) Auhka 2 by name. His son was Vajranabha whose son was Sarikhana.

अध्याय १६७

श्लोक 18

एवं विष्णोः प्रकुर्वीत जागरं भक्तितत्परः ।स्नानादीनि तथा राजन्प्रयतः शुचिमानसः

evaṃ viṣṇoḥ prakurvīta jāgaraṃ bhaktitatparaḥ / snānādīni tathā rājanprayataḥ śucimānasaḥ

हिन्दी अर्थ

यद्येष समयो राजन्यावत्कालश्र ते दृढम् । तावत्कालं तु वत्स्पामि एप नः समयः कृतः

English

Sankhana's son Dhyusitasva was a renowned scholar. King Visvasaha was the son of Dhyusitasva.

अध्याय १६७

श्लोक 19

ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे चतुर्दश्यामुपोषितः ।द्वादश्यां कारयेद् देवपूजनं वैष्णवो नरः

jyeṣṭhe māsi site pakṣe caturdaśyāmupoṣitaḥ / dvādaśyāṃ kārayed devapūjanaṃ vaiṣṇavo naraḥ

हिन्दी अर्थ

तस्थास्तं समय सर्व स॒ राजा पर्यपालयत् । एवं सा चावसत्तर्मिन्पुरूरवसि भामिनी समयद्युत्क्रमात्सा बे राजानं त्यक्ष्यते यथा । तदहूं वच्मि वः सर्व यथा त्यक्ष्यति सा नृपणू

English

Hiranyanabha belonged to Kosala. His son was Vasistha. He was remembered as the disciple of the grandson of Jaimini in all auspicious rites.

अध्याय १६७

श्लोक 20

एवं कृत्वा चतुर्दश्यामेकादश्यां नरोत्तम ।वैष्णवं लोकम् आप्नोति विष्णुतुल्यो भवेन्नरः

evaṃ kṛtvā caturdaśyāmekādaśyāṃ narottama / vaiṣṇavaṃ lokam āpnoti viṣṇutulyo bhavennaraḥ

हिन्दी अर्थ

ससहायो गमिष्यामि युष्माक॑ कार्यसिद्धये । एचमुक्त्वा गतस्ततन्न प्रतिष्ठान महायशा:ः १६ स निशायामथा55गम्य मेषमेक जहार वे। मातृबद्वतंते सा तु मेषयोश्रारुहासिनो

English

He had studied five hundred Vedic Samhitas. 3 The Yoga philosophy was learned from him by the intelligent Yajfiavalkya.

अध्याय १६७

श्लोक 21

माहेश्वरे च राजेन्द्र गणवन्मोदते पुरे ।श्राद्धं च कुरुते तत्र पित्ःन् उद्दिश्य सुस्थिरः

māheśvare ca rājendra gaṇavanmodate pure / śrāddhaṃ ca kurute tatra pitḥn uddiśya susthiraḥ

हिन्दी अर्थ

गश्धर्वागम्न ज्ञात्वा शयनस्था यशस्विनो । राजानमन्रवीत्सा तु पुत्रों मेडहियतेति वे २१ 'मन-+-न-८ कर मननानाय नमन न तन-++्०्न्गा

English

Pusya, his son, was a great scholar. His son was Dhruvasandhi. Sudarana was his son and Agnivarna was born of Sudarsana.

अध्याय १६७

श्लोक 22

तस्य ते ह्यक्षयां तृप्तिं प्राप्नुवन्ति न संशयः ।नर्मदायां द्विजः स्नात्वा मौनी नियतमानसः

tasya te hyakṣayāṃ tṛptiṃ prāpnuvanti na saṃśayaḥ / narmadāyāṃ dvijaḥ snātvā maunī niyatamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

दो मेढ़े सवंदा बंधे रहेंगे, और केवल एक सम्रय घृत मात्र का आहार मैं करूँगी । है राजन् ! जब तक हमारे इन नियमों को दढ़तापूर्वक आप अक्षुण्ण पालन करते रहेंगे, तब तक मैं. निश्चय आपके साथ रहूंगी, यही हमारी प्रतिज्ञा है।” राजा पुरूरवा ने उवंशी की इस प्रतिज्ञा का जब तक अक्षरश पालन किया, तब तक सुन्दरी उवंशी उसके साथ निवास करती रही । इस प्रकार ब्रह्मशाप से मोहित होकर

English

Agnivarna's son was Slghra and Manu (Maru in Bd. P.) is remembered as the son of Slghraka. Manu adopted

अध्याय १६७

श्लोक 23

उपास्य सन्ध्यां तत्रस्थो जपं कृत्वा सुशोभनम् ।तर्पयित्वा पित्ःन्देवान्मनुष्यांश्च यथाविधि

upāsya sandhyāṃ tatrastho japaṃ kṛtvā suśobhanam / tarpayitvā pitḥndevānmanuṣyāṃśca yathāvidhi

हिन्दी अर्थ

उवंशी चौंसठ वर्षों तक भक्ति पूर्वक मनुष्य योनि में उत्पन्न होनेवाले राजा पुरूरवा के साथ रहीं, उधर गन्षवें लोग उसके वियोग से परम चिन्तित थे १०-१५॥ गन्चर्व गण बोले--'हे, महाभाग्यशालियों ! स्वर्ग को विभूषित करनेवाली परम सुन्दरी उवंशी जिस प्रकार देवताओं को पुनः प्राप्त हो-इस बात की चिन्ता करते जाइये ।” उस समय बोलने में सब से प्रवीण विश्वासु नामक गरधवे बोला, निष्पाप ! गन्धवंगण ! मेरी ऐसी धारणा है कि उवंशी ने अवद्य कोई प्रतिज्ञा उस राजा के साथ की होगी, जिसके संग निवास कर रही है उस प्रतिज्ञा के टूट जाने

English

Dc(p. Ill) identifies it with Ujjain but our text locates it on the ridges of the Vindhya mountain.

अध्याय १६७

श्लोक 24

कृष्णस्य पुरतः स्थित्वा मार्कण्डेशस्य वा पुनः ।ऋग्यजुःसाममन्त्रांश्च जपेदत्र प्रयत्नतः

kṛṣṇasya purataḥ sthitvā mārkaṇḍeśasya vā punaḥ / ṛgyajuḥsāmamantrāṃśca japedatra prayatnataḥ

हिन्दी अर्थ

से वह जिस प्रकार उस राजा को छोड़ देगी, वह उपाय तुम लोगों को मैं बतला रहा हूँ । तुम लोगों की कार्य सिद्धि के लिये मैं सहायक के साथ उसके पास जा रहा हूँ महान यशस्वी विद्ववासु ने भस्धवों से ऐसी बातें करने के उपरान्त प्रतिष्ठानपुर की ओर प्रस्थान किया ।१६-१६९। रात के समय उसने शयनागार में प्रवेश- कर एक मेढ़े को चुरा लिया, उन दोनों भेढ़ों पर सुन्दर हेसनेवाली उर्वशी माता के समान स्नेह रखती थी ।

English

'Uluka* as per Bd. P.v. 205. Pargiter, in the list of kings of Ayodhya, calls him'Uktha* ( A1HT\ ).

अध्याय १६७

श्लोक 25

ऋचमेकां जपेद्यस्तु ऋग्वेदस्य फलं लभेत् ।यजुर्वेदस्य यजुषा साम्ना सामफलं लभेत्

ṛcamekāṃ japedyastu ṛgvedasya phalaṃ labhet / yajurvedasya yajuṣā sāmnā sāmaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

शय्या पर लेटे लेटे ही यशस्विनी उवंशी को गन्धर्वों के आने का बृत्ताश्त विदित हो गया और वह वहीं से राजा से केवल इतना बोली--मेरा एक पुत्र चुराया जा रहा है। उर्वशी इस बात को जिस समय राजा से कह एबमुक्तो विनिश्चित्य नर्नस्तिष्ठति वे नृपः । नग्न द्रक्ष्यति मां देवी समयो वितथों भवेत् २२ ततो भूयस्तु गन्धर्वा द्वितीय मेषमाददुः । द्वितीयेउपहलते मेषे ऐल॑ देवी तमब्रवीत्

English

Bd.P. v. 207 states that Pausyaiiji was his teacher in Sama Veda. Pau?yanji, a disciple of Sukarman, taught 500 branches of the Sama Veda.

अध्याय १६७

श्लोक 26

एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता ।मृतप्रजा तु या नारी वन्ध्या स्त्रीजननी तथा

ekasminbhojite vipre koṭirbhavati bhojitā / mṛtaprajā tu yā nārī vandhyā strījananī tathā

हिन्दी अर्थ

पुत्री मम हतो राजन्ननाथाया इब प्रभो । एवमुक्तस्तवोत्थाय नग्नो राजा प्रधावितः

English

Manu'ssonwas Prasusruta. His son was Susandhi. Susandhi's son was A-marsa, otherwise known by the name Sahasvan.

अध्याय १६७

श्लोक 27

रुद्रांस्तु विधिवज्जप्त्वा ब्राह्मणो वेदतत्त्ववित् ।लिङ्गस्य दक्षिणे पार्श्वे स्थापयेत् कलशं शिवम्

rudrāṃstu vidhivajjaptvā brāhmaṇo vedatattvavit / liṅgasya dakṣiṇe pārśve sthāpayet kalaśaṃ śivam

हिन्दी अर्थ

प्रकाशिता तु सहसा ततो नग्नमवेक्ष्य सा। नग्नं दृष्ट्वा तिरोभूत्सा अप्सरा कामरूपिणी २६ . उत्पष्टाबुरणो दृष्ट्वा राजाध्युद्याधप्गतः प्रभुः । अपश्य॑स्तां तु वे राजा विललाप सुदुःखितः

English

Sahasvan's son was the king known by the name ViSrutavan. Visrutavan's son was the king Brhadbala.

अध्याय १६७

श्लोक 28

रुद्रैकादशभिर्मन्त्रैः स्नापयेत् कलशाम्भसा ।पुत्रमाप्नोति राजेन्द्र दीर्घायुषमकल्मषम्

rudraikādaśabhirmantraiḥ snāpayet kalaśāmbhasā / putramāpnoti rājendra dīrghāyuṣamakalmaṣam

हिन्दी अर्थ

बनेषु सरिता क्लेष्वालयेषु सहेषु च। विचचार गिरिष्वेको निर्भरोपवनेषु च

English

These are the mostly remembered kings, the successors of Iksvaku. The most important members of the race have been enumerated here. One who reads well this creation of Vivasvan, the son of Aditi, becomes endowed with progeny. He attains identity with Vaivasvata Manu, lord Sraddha-Deva who bestows prosperity on the subjects. He becomes free from sins and Rajasic qualities. He becomes long-lived and does not swerve from the righteous path.

अध्याय १६७

श्लोक 29

मार्कण्डेश्वरवृक्षान्यो दूरस्थान् अपि पश्यति ।ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते शङ्करो ऽब्रवीत्

mārkaṇḍeśvaravṛkṣānyo dūrasthān api paśyati / brahmahatyādipāpebhyo mucyate śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

रहौ थी, उस समय' राजा नग्न पड़ा हुआ था, अतः उसने निश्चय किया कि यदि इस समय मैं उठ पड़गा तो मुझे नंगे रूप में देवी देख लेगी और तब उसकी प्रतिज्ञा टट जायमी ।२०-२२। इसी बीच में गन्धर्वों ने दूसरे मेढ़े को भी चुरा लिया । दूसरे को चुरा लेने पर उवंशी ने राजा पुरूरवा से कहा, राजन् ! प्रभो ! मेरे दोनों पुत्र अनाथ के पुत्रों की तरह चुरा लिए गये । उर्वशी के ऐसा कहने पक राजा नग्न अवस्था ही में शब्या से उठकर दौंड पड़ा और गरन्धवों तथा दोनों भेढ़ों के पद चिक्नों का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ा । गरधवाँ ने इस अवसर पर एक बड़ी चाल चली, उन्होंने सारे राज्य भवन को शीक्रता से प्रकाशयुक्त कर दिया, और उवंशी ने राजा को नंगा देख लिया। इच्छानुकूल स्वरूप घारण करने वाली अप्सरा उवेशी राजा को नंगा

English

Now (listen to and) understand the race of Nimi 3, the younger brother of Vikuksi. It was he who founded a city well known as Jayanta near the hermitage of Gautama.

अध्याय १६७

श्लोक 30

य इदं शृणुयाद्भक्त्या पठेद्वा नृपसत्तम ।सर्वपापविशुद्धात्मा जायते नात्र संशयः

ya idaṃ śṛṇuyādbhaktyā paṭhedvā nṛpasattama / sarvapāpaviśuddhātmā jāyate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

देखते ही अन्तेंघान हो गयी ।२३-२६७ उवंशी को अरन्तहित जान गन्धवों ने उन दोनों मेढ़ों को छोड़ दिया और स्वयं वहीं पर अन्तहित हो गये । छटे हुए दोनों मेढ़ों को पकड़ कर राजा शबनागार में आये और वहाँ पर उबंशी को न देखकर बहुत दुःखित होकर विलाप करने लगे। इधर उधर उवंशी को ढूंढ़ते हुए वह प्रथ्बी भर घूम आये । जगत् के स्वामी होकर भी उवंशी के वियोग में राजा परम दुःखित होकर जयत् भर घूमते

English

Probably a fictitious It I I * r! sar t e a s° a pleasure 1 haunt of This chapter corresponds to Bd. r. 2.3.0*.,

अध्याय १६७

श्लोक 31

इदं यशस्यमायुष्यं धन्यं दुःखप्रणाशनम् ।पठतां शृण्वतां वापि सर्वपापप्रमोचनम्

idaṃ yaśasyamāyuṣyaṃ dhanyaṃ duḥkhapraṇāśanam / paṭhatāṃ śṛṇvatāṃ vāpi sarvapāpapramocanam

हिन्दी अर्थ

रहे। वनों में, नदियों के तटों पर, भवनों में, पर्वतों में, नि्लरों और उपवनों में, शिकार खेलने के स्थानों पर पर्बंतों के समौपवर्ती ग्रामों में, बगीचों एवं वाटिकाओं में. नगर-नगर में घूम-घूम कर वह सभी जीवधारियों से पूछते हुए परम विषण्ण होकर यह कहता फिरता था ।३७-३ १। अरे मुझ दुःखिये को तू क्‍यों नहीं देख रही अन्र संधिराष:।. +घनुश्चिह्नास्तर्गतग्रश्थः ख पुस्तके विद्यते ।

English

Mithi was a king of great prowess whereby the capital city became (known as) Mithila 1 and the king was Janaka. Janaka's son was Udavasu.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 167
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.