Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
168
अध्याय 168 / 232

Adhyaya 168

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अध्याय १६८

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे मार्कण्डेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम सप्तषष्ट्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १६८ श्रीमार्कण्डेय उवाच: नर्मदादक्षिणे रोधस्यङ्कूरेश्वरमुत्तमम् ।तीर्थं सर्वगुणोपेतं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe mārkaṇḍeśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma saptaṣaṣṭyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 168 śrīmārkaṇḍeya uvāca: narmadādakṣiṇe rodhasyaṅkūreśvaramuttamam / tīrthaṃ sarvaguṇopetaṃ triṣu lokeṣu viśrutam

हिन्दी अर्थ

कि न पश्यसि रे मूर्ठ मदसुढं विरुध्य साम् । वंब गता5सि वरारोहे धिक्ते (इसमे) जीवितमीदृशम् ॥

English

From Udavasu was born the extremely pious-souled Nandivardhana. From Nandivardhana was born the heroic and pious Suketu.

अध्याय १६८

श्लोक 2

यत्र सिद्धं महारक्ष आराध्य तु महेश्वरम् ।शङ्करं जगतः प्राणं स्मृतिमात्रावहारिणम्

yatra siddhaṃ mahārakṣa ārādhya tu maheśvaram / śaṅkaraṃ jagataḥ prāṇaṃ smṛtimātrāvahāriṇam

हिन्दी अर्थ

अथापश्यच्च तां राजा कुरुक्षेत्र महाबलः प्लक्षतीरथें पुष्करिण्यां विगाढेनास्वुना55प्लुताम् । क़ीडन्तीमप्सरोसिश्व पचभिः सह शोभनाम् ७३३ अपश्यत्सा ततः सुश्र् राजानमविदूरतः । उबंशी ता: सखीः प्राह अय॑ स पुरुषोत्तम:

English

From Suketu was born the pious-souled Devarata of great strength. It is heard that the pious-souled Brhaduccha was Devarata's son.

अध्याय १६८

श्लोक 3

युधिष्ठिर उवाच: किं तद्रक्षो द्विजश्रेष्ठ किंनाम कस्य वान्वये ।एतद्विस्तरतः सर्वं कथयस्व ममानघ

yudhiṣṭhira uvāca: kiṃ tadrakṣo dvijaśreṣṭha kiṃnāma kasya vānvaye / etadvistarataḥ sarvaṃ kathayasva mamānagha

हिन्दी अर्थ

दष्द्वा तु राजा तां प्रीतः प्रलापानकुरुते बहुन् । आयाहि तिष्ठ मनसा धोरे वचसि तिष्ठ है.

English

Brhaduccha's son was the valorous Mahavlrya. Dhrti- man was the son of Mahavlrya and his son was Sudhrti.

अध्याय १६८

श्लोक 4

अज्ञानतिमिरान्धा ये पुमांसः पापकारिणः ।युष्मद्विधैर् दीपभूतैः पश्यन्ति सचराचरम्

ajñānatimirāndhā ye pumāṃsaḥ pāpakāriṇaḥ / yuṣmadvidhair dīpabhūtaiḥ paśyanti sacarācaram

हिन्दी अर्थ

संव॒त्सरात्कुमारस्ते भविता नेव संशय: । निशामेकां तु वे राजा अवसत्तु तया सह समहुष्ठो जगामाथ स्वपुरं तु महायशाः । गते संव॒त्सरे राजा उर्वशी पुनरागमत् ३ € उषधित्वा तु तया साधमेकरात्र महामनाः । कामातंश्राब्रवीदीनो भव नित्यं ममेति व ३४०

English

The pious-souled Dhrstaketu, the oppressor of enemies, was the son of Sudhrti. Dhrstaketu's son was well known by the name of Haryasva.

अध्याय १६८

श्लोक 5

धर्मपुत्रवचः श्रुत्वा मार्कण्डेयो मुनीश्वरः ।स्मितं कृत्वा बभाषे तां कथां पापप्रणाशनीम्

dharmaputravacaḥ śrutvā mārkaṇḍeyo munīśvaraḥ / smitaṃ kṛtvā babhāṣe tāṃ kathāṃ pāpapraṇāśanīm

हिन्दी अर्थ

हो, है सुन्दरी ! मेरे साथ विरोध भाव ठानकर तू कहाँ चली गई, हमारे ऐसे जीवन को घधिक्‍कार है। इस प्रकार विलाप करते हुए उप्त महाबलवान् राजा ने घूमते-घूमते कुरुक्षेत्र में उसे देखा उस समय वह सुन्दरी प्लक्ष तीथे में एक पुष्करिणी के गहरे जल में पाँच अन्य सुन्दरी अप्सराओं के साथ क्रौड़ा कर रहो थी

English

Maru was Haryasva's son. Pratitvaka 2 was Maru's son. The pious-souled king Kirtiratha was the son of Pratit¬ vaka.

अध्याय १६८

श्लोक 6

मार्कण्डेय उवाच: मानसो ब्रह्मणः पुत्रः पुलस्त्यो नाम पार्थिव ।वेदशास्त्रप्रवक्ता च साक्षाद्वेधा इवापरः

mārkaṇḍeya uvāca: mānaso brahmaṇaḥ putraḥ pulastyo nāma pārthiva / vedaśāstrapravaktā ca sākṣādvedhā ivāparaḥ

हिन्दी अर्थ

सुन्दर भौहोंवाली उबंशी ते सप्लिकट आने पर राजा पुरूरवा को देख लिया और अपनी सखियों से कहा, अरे ! यह पुरुष श्रेष्ठ वही राजा है, जिसके साथ मैं निवास करती थी, ऐसा कहकर उसने राजा को दिखाया । उवंशी के ऐसा कहने पर वे पाँचों सुन्दर अप्सराएँ जल से बाहर भा गईं। राजा ने उवंशी को देखकर बहुत विलाप किया । उसे परम प्रसन्नता प्राप्त हुई। वह कहने लगा, हें सुन्दरी ! आओ । मन से मेरे इस कठोर हृदय में निवास करो ।३४-३६। अपनी पूर्व की बातों पर स्थित रहो । इस प्रकार सूक्ष्म बातें उन दोनों ने परस्पर कीं । अस्त में उवंशी ते पुरूरवा से कहा. प्रभो ! मैं आपके संयोग से गर्भवती है, एक व में तुम्हारा पुत्र मुन्से उत्पन्न होगा--इसमें सम्देह नहीं ।!” राजा ने वहाँ एक रात फिर उबंशी के साथ निवास क्रिया । महान् यदस्वी पुरूरबा दूसरे दिन अत्यन्त हरषित होकर अपने पुर को वापस आया । एक वर्ष

English

The son of Kirtiratha was well known as Devamldha. and Vibudhawas the son of Devamldha and Vibudha's son was Dhrti.

अध्याय १६८

श्लोक 7

तृणबिन्दुसुता तस्य भार्यासीत्परमेष्ठिनः ।तस्य धर्मप्रसङ्गेन पुत्रो जातो महामनाः

tṛṇabindusutā tasya bhāryāsītparameṣṭhinaḥ / tasya dharmaprasaṅgena putro jāto mahāmanāḥ

हिन्दी अर्थ

बीत जाने पर वह पुनः उर्वशी के पास गया । महा मनस्वी पुरूरवा उस्र अवसर पर पुनः एक रात उबंशी के साथ निवास करने के उपरान्त कामार्त होकर दीन भाव से बोला तुम मेरे साथ सबवेदा निवास करो

English

MahadhftPs son was Klrtiraja, a king of great valour. Klrtiraja s son was a scholar well known as Maharoma.

अध्याय १६८

श्लोक 8

यस्माद्वेदेतिहासैश्च सषडङ्गपदक्रमाः ।विश्रान्ता ब्रह्मणा दत्ता नाम विश्रवसेति च

yasmādvedetihāsaiśca saṣaḍaṅgapadakramāḥ / viśrāntā brahmaṇā dattā nāma viśravaseti ca

हिन्दी अर्थ

उर्बशी ने राजा को प्रत्युत्तर दिया कि है महाराज ! गन्धंगण तुम्हें ऐसा वरदान देंगे, उन्हीं से इस बात की ब॒ण नित्यं हि सालोक्य गन्धर्वाणां महात्मनाम्। तथेत्युक्त्वा वरं वन्ने गन्धर्वाश्व॒ तथास्त्विति

English

Also called Janakapur, capital of Videha in the district of Darbhanga (Bihar). It was famous for its Brahmanical University (upto 14th cent. A.D ). Now a new Sanskrit University has been founded there some years

अध्याय १६८

श्लोक 9

कस्मिंश्चिद् अथ काले च भरद्वाजो महामुनिः ।स्वसुतां प्रददौ राजन्मुदा विश्रवसे नृप

kasmiṃścid atha kāle ca bharadvājo mahāmuniḥ / svasutāṃ pradadau rājanmudā viśravase nṛpa

हिन्दी अर्थ

स्थालीमगनेः पुरयित्वा गन्धर्वाश्व तमब्र॒वन् । अनेन इष्ट्वा लोक त॑ प्राप्स्यसि त्वं नराधिष

English

Pratimbaka in Bd.P.v, 11. Pargiter records 'Pratindhaka* as his name

अध्याय १६८

श्लोक 10

स तया रमते सार्धं पौलोम्या मघवा इव ।मुदा परमया राजन्ब्राह्मणो वेदवित्तमः

sa tayā ramate sārdhaṃ paulomyā maghavā iva / mudā paramayā rājanbrāhmaṇo vedavittamaḥ

हिन्दी अर्थ

अश्वत्थादर्राण कृत्वा मथित्वाईग्नि यथाविधि । तेनेष्ट्वा तु सलोक नः प्राप्स्यसि त्वं नराधिप मथित्वा5घ्न त्रिधा कृत्वा ह्ययजत्स नराधिपः । इष्ट्वा यज्ञबंहुविधर्गंतस्तेषां सलोकताम् ४८ वासाय च स गन्धवंस्त्रेतायां स महारथः । एकोग्निः पुबंसासीह ऐलस्त्रीस्तानकल्पयत्

English

From Maharoma was born, the famous Svarnaroma. Svarnaroma's son was the king Hrasvaroma.

अध्याय १६८

श्लोक 11

केनचित् त्वथ कालेन पुत्रः पुत्रगुणैर्युतः ।जज्ञे विश्रवसो राजन्नाम्ना वैश्रवणः श्रुतः

kenacit tvatha kālena putraḥ putraguṇairyutaḥ / jajñe viśravaso rājannāmnā vaiśravaṇaḥ śrutaḥ

हिन्दी अर्थ

एवंप्रभावों राजा5सोदलस्तु द्विजसत्तमाः । देशे पुण्यतमे चैव मह॒पषिभिरलंकृते १४०

English

It is heard that the son of Hrasvaroma was the scholar Slradhvaja. While this king was ploughing, Sita, of great fame, was born. She became the chaste queen of Rama. She was devoted to her husband and a virtuous wife.

अध्याय १६८

श्लोक 12

सो ऽपि मौनव्रतं कृत्वा बालभावाद्युधिष्ठिर ।सर्वभूताभयं दत्त्वा चचार परमं व्रतम्

so 'pi maunavrataṃ kṛtvā bālabhāvādyudhiṣṭhira / sarvabhūtābhayaṃ dattvā cacāra paramaṃ vratam

हिन्दी अर्थ

याचना फौजिये, आप उनसे मिलकर यह कहिये कि महात्मा गान्धर्वों के लोक में मैं स्वदा निवास करते का वरदान चाहता हूँ । उवंशी की इस बात को राजा ने अंगीकार किया और गन्धरवोों से वरदान की याउना की । गन्धवों ने राजा की प्रांना पर यह कहा कि आप जंसा कह रहे हैं, वैसा ही होगा ।” उन लोगों ने स्थाली को आग से भरकर राजा से कहा, नराधिप ! इसी अग्नि से हवन करने पर तुम्हें उक्त गन्धबलोक की प्राप्ति होगी ।४१-४२। तदनन्तर राजा पुरूरवा ने उबंशी के गर्भ से समुत्पन्न कुमार को लेकर अपने नगर को चलने का उपक्रम किया । और उस अग्नि को अरणि में रखकर पुत्र के समेत अपने घर को प्रस्थान किया । वहाँ आने पर उन्होंने उस अग्नि को देखा, और उसे लेने पर अश्वत्थ के वृक्ष का भी उन्हें दर्शन हुआ। समीप में स्थित अद्वत्थ के वृक्ष को देखकर राजा को परम विस्मय हुआ । तब उन्होंने गन्धरवों से इस वृत्तासत को

English

How was Sita of great fame born while (the field) was being ploughed. Why did the king plough the field wherein she was born?

अध्याय १६८

श्लोक 13

तस्य तुष्टो महादेवो ब्रह्मा ब्रह्मर्षिभिः सह ।सखित्वं चेश्वरो दत्त्वा धनदत्वं जगाम ह

tasya tuṣṭo mahādevo brahmā brahmarṣibhiḥ saha / sakhitvaṃ ceśvaro dattvā dhanadatvaṃ jagāma ha

हिन्दी अर्थ

कहने का इरादा किया पृथ्वी पर आये हुए राजा पुरूरवा ने इस अग्नि से यज्ञ करने के बारे में जब गन्धर्वों से जिज्ञासा प्रकट की तब उन लोगों ने सब बातें सुन लेते पर अरणि से मम्थन करने का आदेश दिया। उन्होंने कहा--है नराधिप ! इस अश्वत्य वक्ष से अरणि लेकर विधिवत् मनन्‍्थन करने पर जो अग्नि उत्न्न हो, उसी से हवन करने पर तुम हम लोगों के लोक को प्राप्त करोगे ४४-४७। गर्धवों के कथनानुसार नराधिप

English

While the Agniksetra (the field where sacrifice was to be performed) was being ploughed in accordance with the injunction in the course of the horse-sacrifice of the noble soul she was born out of it.

अध्याय १६८

श्लोक 14

यमेन्द्रवरुणानां च चतुर्थस्त्वं भविष्यसि ।ब्रह्माप्युक्त्वा जगामाशु लोकपालत्वम् ईप्सितम्

yamendravaruṇānāṃ ca caturthastvaṃ bhaviṣyasi / brahmāpyuktvā jagāmāśu lokapālatvam īpsitam

हिन्दी अर्थ

पुरूरवा ने अरणि का मन्धन कर अग्नि को तीन भागों में विभक्त कर यज्ञ का अनुष्ठान किया, और अनेक प्रकार के यज्ञों का विधान समाप्त कर गन्धवों का लोक प्राप्त किया वहाँ निवास के लिये उनसे गनन्‍्धर्वों के समान सुविधा प्राप्त की, त्रेता युग में वह राजा पुरूरवा महारथी था, अग्नि पूब॑ काल में केवल एक थे, उसने उनका तीव विभाग किया। ऋषिवृस्द ! इला का पुत्र वह राजा पुरुरवा इसी प्रकार का महान् प्रभावशाली एवं योद्धा था । महषियों से सुशोभित परम पुण्यप्रद प्रयाग तीर्थ में वह प्रथ्वी पति राज्य करता था, उस मह

English

From Slradhvaja was born the Maithila (king of Mithila) named Bhanuman. His brother was Kusadhvaja, the lord and king of Kasl.

अध्याय १६८

श्लोक 15

ततस्त्वनन्तरे काले कैकसी नाम राक्षसी ।पातालं भूतलं त्यक्त्वा विश्रवं चकमे पतिम्

tatastvanantare kāle kaikasī nāma rākṣasī / pātālaṃ bhūtalaṃ tyaktvā viśravaṃ cakame patim

हिन्दी अर्थ

राज्यं स कारयामास प्रयागे परथिवीपतिः । उत्तरे यामुने तीरे प्रतिष्ठाने महायशाः ५१ तस्थ पुत्रा बभव॒ह षडिस्द्रोपमतेजसः । गन्धवंलोके विदिता आयुर्धोसानसावसुः ५२ विश्वायुश्च शतायुश्व॒ गतायुश्चोबंशीसुताः । अमावसोस्तु वे जातो भीमो राजाइ्थ विश्वजित्

English

Bhanuman's son was the valorous Pradyumna. His son was Muni and from him Urjavaha is remembered (as born).

अध्याय १६८

श्लोक 16

पुत्रो ऽथ रावणो जातस्तस्या भरतसत्तम ।कुम्भकर्णो महारक्षो धर्मात्मा च विभीषणः

putro 'tha rāvaṇo jātastasyā bharatasattama / kumbhakarṇo mahārakṣo dharmātmā ca vibhīṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रीमान्भी मस्य दायादो राजाउब्सीत्का्नप्रभः। विद्वांस्तु काच्चनस्यापि सुहोत्रोइभुन्महाबलः ४५४ सुहोत्रस्याभवज्जह नुः कौशिकागर्भसंभव: । प्रतिगत्य ततो गड्भा बितते यज्ञकमंणि ३५४५ प्लावयामास त॑ देशं भाविनोथंस्य दर्शनात् । गद्भाया प्लाबितं दृष्ट्वा यज्ञवार्ट समन्‍्ततः ५६

English

From Orjavaha was born Sutadvaja. Sakuni was his son. Sakuni's son was Svagata. 1 Suvarcas is remembered as his son.

अध्याय १६८

श्लोक 17

कुम्भश्चैव विकुम्भश्च कुम्भकर्णसुतावुभौ ।महाबलौ महावीर्यौ महान्तौ पुरुषोत्तम

kumbhaścaiva vikumbhaśca kumbhakarṇasutāvubhau / mahābalau mahāvīryau mahāntau puruṣottama

हिन्दी अर्थ

एतत्ते बिफूलूं सर्व पीतमम्भः करोम्यहम् । राजषिणा ततः पीतां गड्ां दृष्द्वा सुरषेय (५८ उपनिन्युमहाभागा दुहितृत्वेन जाह्नवीम् । योवनाश्वस्य पोन्नों तु कावेरों जह नुरावहत् १५६ युवनाभ्वस्य शापेन गड्भां येन विनिम॑मे । कावेरी सरितां श्रेष्ठां जह नुभयामिनिन्दिताम्

English

Sruta was his successor. Susruta was his son. Jaya was Susruta's son. Vijaya was the son of Jaya.

अध्याय १६८

श्लोक 18

अङ्कूरो राक्षसश्रेष्ठः कुम्भस्य तनयो महान् ।विभीषणं च गुणवद्दृष्ट्वैवं राक्षसोत्तमः

aṅkūro rākṣasaśreṣṭhaḥ kumbhasya tanayo mahān / vibhīṣaṇaṃ ca guṇavaddṛṣṭvaivaṃ rākṣasottamaḥ

हिन्दी अर्थ

जह् नुश्च दयित पुत्र सुहोत्रं नाम घामिकस् । कावेया जनयामास अजकस्तस्य चाउ5त्मजः यक्षस्वी की राजधानी यमुना के पविन्न उत्तर तट पर अवस्थित प्रतिष्ठान पुर में थी ।४५०५१॥ उस राजा पुरुरवा के इन्द्र के समान महान् तेजस्वी छः पुत्र थे, गन्धवों के लोक में इनकी बड़ी प्रतिष्ठा और ख्याति थी। उनके नाम थे आयु, श्रीमान्, अमावसु, विश्वायु, छतायु ओर गतायु--ये सब उवंशी के पुत्र थे । अमावसु के पुत्र राजा मीम हुए, जो विध्व-विजयी थे । उस राजा भीम का उत्तराधिकारी परम कल्तिमान् राजा काइचनप्रभ हुआ।

English

Vijaya's son was Rta and Sunaya was the son of Rta. From Sunaya was born Vitahavya, and Vitahavya's son was

अध्याय १६८

श्लोक 19

ततः स यौवनं प्राप्य ज्ञात्वा रक्षः पितामहम् ।परं निर्वेदमापन्नश्चचार सुमहत्तपः

tataḥ sa yauvanaṃ prāpya jñātvā rakṣaḥ pitāmaham / paraṃ nirvedamāpannaścacāra sumahattapaḥ

हिन्दी अर्थ

काव्चनप्रभ का पुत्र महाबलवान् एवं परम विद्वान् राजा सुहोत्र हुआ ।१५२-४४। राजा सुहोत्र के पुश्र जह नु हुए, ये राजा जह्नु कौछिका के भर्भ से उत्पन्न हुए थे। इन राजा जहनु ने एक बार पृथ्वी पर यज्ञ का अनुष्ठान प्रारम्भ किया था, समस्त यज्ञ सामग्रियाँ पृथ्वी पर विस्तृत थीं, भावी वश गंगा की धारा ने उस प्रान्त को अपने जल से प्लाबित कर दिया। चारों ओर से यज्ञ भूमि को गंगा से प्लावित देखकर सुहोन्न के पुत्र राजा जह नु को,

English

Dhrti's son was Bahulasva and Bahulasva's son was Krti. 2 It is with him that the race of Janaka is terminated. Thus the Maithilas (kings of Mithila) are enumerated. Understand the race of Soma also.

अध्याय १६८

श्लोक 20

दक्षिणं पश्चिमं गत्वा सागरं पूर्वमुत्तरम् ।नर्मदायां प्रसङ्गेन ह्यङ्कूरो राक्षसेश्वरः

dakṣiṇaṃ paścimaṃ gatvā sāgaraṃ pūrvamuttaram / narmadāyāṃ prasaṅgena hyaṅkūro rākṣaseśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

जो परम दयालु और याचकों को मन चाहा देनेवाले थे, परम क्रोध आ गया, आँखें क्रोध से लाल हो गईं, और उसी भावावेश में उन्होंने कहा-गरु ! इह धमंड का फल तुम्हें शीत्र ही मिलेगा, तुम्हारे इस सब जल राशि को पीकर मैं व्यर्थ किये देता हूँ ।' ।१५५-५७३। ऐसा कह कर राजषि जहनु ने गंगा कौ समस्त जलराशि पी डाली । महाभाग्यशाली देवता ओर ऋषिगण गज्जा के पीने को देखकर गड्भा को उनकी कन्या के रूप में उपहार स्वरूप समपित कर दिया, तभी से गज्भा का नाम जाह्नवी पड़ा । राजा योवनाइव की पौन्री कावेरी को जह नु ने पत्नी रूप में अंगीकार किया था। युवनाश्व के शाप से उसने गज़ा का निर्माण किया था जह नु को भार्या कावेरी सरिताओं में श्रेष्ठ एवं प्रशंसनीय गुणों वालों है। जहनु ने कावेरी में परम धामिक सुहोत्र नामक पुत्र को उत्पन्न किया, जो उसका परम प्रिय था। उसका पुत्र अजक हुआ

English

The list in AIHT, shows that our text and Bd.P. jumped twelve generations downwards and declared Svagata as the son of Sakuni.

अध्याय १६८

श्लोक 21

तपश्चचार सुमहद्दिव्यं वर्षशतं किल ।ततस्तुष्टो महादेवः साक्षात् परपुरंजयः

tapaścacāra sumahaddivyaṃ varṣaśataṃ kila / tatastuṣṭo mahādevaḥ sākṣāt parapuraṃjayaḥ

हिन्दी अर्थ

अजकस्य तु दायादो बलाकाश्वो महायशाः। बभृवुश्च॒ मयः शीलः कुशस्तस्या5घत्मज: स्मपृत:

English

Krtaksana in AIHT,

अध्याय १६८

श्लोक 22

वरेण छन्दयामास राक्षसं वृषकेतनः ।वरं वृणीष्व भद्रं ते तव दास्यामि सुव्रत

vareṇa chandayāmāsa rākṣasaṃ vṛṣaketanaḥ / varaṃ vṛṇīṣva bhadraṃ te tava dāsyāmi suvrata

हिन्दी अर्थ

सुदुर्ग तापसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरंदरः समर्थ: पुत्रजनने स्वयसेवास्य शाश्वत: १६५ तां गाधिः पुत्रा काव्याय रुचीकय दो प्रभुः द

English

The highly intelligent Brahmana had sublimated his sexual urge. He stood without even winking his eyes. His body attained the status of Soma.

अध्याय १६८

श्लोक 23

प्रोवाच राक्षसो वाक्यं देवदेवं महेश्वरम् ।वरदं सो ऽग्रतो दृष्ट्वा प्रणम्य च पुनःपुनः

provāca rākṣaso vākyaṃ devadevaṃ maheśvaram / varadaṃ so 'grato dṛṣṭvā praṇamya ca punaḥpunaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा चा55हय णिधतिम्रचीकों भागंवस्तदा । उपयोज्यश्ररुरयं त्वया मात्रा च ते शुभे . ६६

English

The sage of sanctified soul in the state of Soma rose up (to the sky). The Soma juice exuded from his eyes illuminating all the quarters.

अध्याय १६८

श्लोक 24

यदि तुष्टो महादेव वरदो ऽसि सुरेश्वर ।दुर्लभं सर्वभूतानाममरत्वं प्रयच्छ मे

yadi tuṣṭo mahādeva varado 'si sureśvara / durlabhaṃ sarvabhūtānāmamaratvaṃ prayaccha me

हिन्दी अर्थ

िताननसन लक करनान सका -++ “मनन कैम". --7:-4--4-44--ननरनकन५- ५-3५ +-- तनमन ना अजक का उत्तराधिकारी राजा बलाकाश्व परम यशस्वी राजा था । उसके गय, शील और कुश नामक पुत्र कहे जाते हैं। कुश के चार पुत्र हुए, जो वेद ज्ञान में यहा प्राप्त करनेवाले थे, उनके बाम थे कुशाइव, कुशनाभ, अमूतंरयश् और वसु। राजाओं में श्रेष्ठ कुशस्तम्ब ने पुत्र प्राप्ति के लिये तपस्या की, एक सहख्र वर्ष बीतने पर उसने इस्द्र का दर्शन किया ! ।६२-६४। स हस्ननेत्रवाले पुरनदर ने परम कठोर तप ३

English

On being ordered by Vidhi (Brahma), the ten Devis (i.e. the quarters) gathered together there and received it in their womb collectively, but could not do so (for long).

अध्याय १६८

श्लोक 25

मम नाम्ना स्थितो ऽनेन वरेण त्रिपुरान्तक ।सदा संनिहितो ऽप्यत्र तीर्थे भवितुम् अर्हसि

mama nāmnā sthito 'nena vareṇa tripurāntaka / sadā saṃnihito 'pyatra tīrthe bhavitum arhasi

हिन्दी अर्थ

में निरत राजा कुशस्तम्ब को देखकर, स्वयमेव उनके पुत्र रूप में होने का निश्चय किया। इस प्रकार पुरन्वर ने स्वयमेव पुत्रत्व॒ का निश्चय किया। पाकज्ासब इस्द्र राजा कुशस्तम्ब के पुत्र के रूप सें ग्राधि नाम से ख्यात हुए, उनका एक दूसरा कौशिक नाम भी हुआ। राजा कुशस्तम्ब की पत्नी पौरकुत्सा थो, जिसमें गाधि की उत्पत्ति हुई। महाभाग्यशालिती, कल्याणदायिनी बड़ी कन्या सत्यवत्ती को ऐदवर्यशाली ग्राधि ने भगु गोत्र में

English

When those goddesses (ladies) were unable to hold the foetus in their wombs, the foetus endowed with lustre, illu¬ minated the worlds like the Moon (now) blessing everyone; it emerged from the quarters (womb of the ladies) and fell on the ground (assuming the form of) the Moon along with them (the goddesses).

अध्याय १६८

श्लोक 26

ईश्वर उवाच: यावद् विभीषणमतं यावद् धर्मनिषेवणम् ।करिष्यसि दृढात्मा त्वं तावदेतद्भविष्यति

īśvara uvāca: yāvad vibhīṣaṇamataṃ yāvad dharmaniṣevaṇam / kariṣyasi dṛḍhātmā tvaṃ tāvadetadbhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न होने वाले रुचीक को समपित किया। ।६५-६७। उस सत्यवती में भुगुनन्दन, भुगुबंश शिरोमणि जमदग्नि उत्पन्न हुए । भूगुवंशोत्पन्न ऋषिवर्य रुचीक ने अपने और गाधि के पुत्र के लिए एक चंद बनाया। अपनी पत्नी णिधृति (सत्यवती) को बुलाकर उन्होंने कहा, 'कल्याणी ! यह चरु तुम और तुम्हारी माता इस क्रम से खाना । इसके प्रभाव से तुम्हारी माता में क्षत्रिय जाति में श्रेष्ठ, परमका न्तिमान् एक पुत्र उत्पन्न होगा, वह युद्धभमि में अन्यास्य क्षत्रियों द्वारा पराजित नहीं होगा, बड़े बड़े योद्धा क्षत्रियों का वह विनाश करनेवाला होगा। हे कल्याणि ! तुम्हारा पुत्र भी परम ज्ञान्त, तपोमय, धैयंशाली एवं बुद्धिमा नू होगा यह चरु उसे ब्राह्मण जाति में सर्वश्रेष्ठ बनायेगा, अर्थात् इसके प्रभाव से वह समस्त ब्राह्मण जाति में श्रेष्ठ गुणोंवाला होगा

English

On seeing Soma falling, Brahma, the grandfather of the worlds, placed him in a chariot, with a desire for the welfare of the worlds.

अध्याय १६८

श्लोक 27

एवमुक्त्वा ययौ देवः सर्वदैवतपूजितः ।विमानेनार्कवर्णेन कैलासं धरणीधरम्

evamuktvā yayau devaḥ sarvadaivatapūjitaḥ / vimānenārkavarṇena kailāsaṃ dharaṇīdharam

हिन्दी अर्थ

एवमुक्‍त्वा तु तां भायस्रचीको भूगुनन्दनः । तपस्थाभिरतो नित्यमरण्यं प्रविवेश ह (७१ गाधिः सदारस्तु तदा ऋचीकाश्रसमभ्यगात् । तीर्थयात्राप्रसद्भोन सुतां द्रष्दुं नरेश्वरः ७२ चरुद्रयं गृहीत्वा तु ऋषे: सत्यवती तदा । भर्तुरबंचनमव्यग्रा हृष्ठा मात्रे न्‍्यवेदयत्

English

O Brahmanas, indeed he (the Moon) was a Deva(god) himself, a seeker of righteousness and truthful to the. promise. We have heard that (the chariot) was (fitted with) yoked to a thousand white horses.

अध्याय १६८

श्लोक 28

गते चादर्शनं देवे स्नात्वाचम्य विधानतः ।स्थापयामास राजेन्द्र ह्यङ्कूरेश्वरमुत्तमम्

gate cādarśanaṃ deve snātvācamya vidhānataḥ / sthāpayāmāsa rājendra hyaṅkūreśvaramuttamam

हिन्दी अर्थ

माता तु तस्‍्ये देवेन दुहित्रे स्व॑ चर ददौ । तस्याश्वरुमधाज्ञानादात्मगः सा चकार ह ७४ अथ सत्यवती गर्भ क्षत्रियान्तकरं शुभम् । धारयामास दीप्तेन वपुबा घोरदर्शना ७५ तमृचीकस्ततो दृष्ट्वा योगेनाप्यनुमृश्य व । तदाइब्रवीदृद्विजश्रेष्ठः स्वां भार्या वरवणिनीमू मात्राईसि वन्च्चिता भद्े चश्व॒त्या सहेतुना । जनिष्यति हि पुत्रस्ते क्रूरकर्माइतिदारुण: ७७ माता जनिष्यते वाइपि तथाभूतं तपोधनम् । विश्व हि ब्रह्म तपसा मया तत्न समपितम् ७८

English

When that great soul, the son of Atri, had fallen,

अध्याय १६८

श्लोक 29

गन्धपुष्पैस्तथा धूपैर्वस्त्रालङ्कारभूषणैः ।पताकैश् चामरैश् छत्रैर् जयशब्दादिमंगलैः

gandhapuṣpaistathā dhūpairvastrālaṅkārabhūṣaṇaiḥ / patākaiś cāmaraiś chatrair jayaśabdādimaṃgalaiḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणापसदस्त्वन्य इत्युक्तो मुनिरब्रवीत् ७६ नेष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथा त्वया। उप्रकर्मा भवेत्पुत्रः पितुर्मातुश्च कारणात् ८०

English

There itself, the sons of Angiras and Bhj*gu eulogised by means, of Rks, Yajur mantras and many Atharva Ahgirasa mantras.

अध्याय १६८

श्लोक 30

पूजयित्वा सुरेशानं स्तोत्रैर्हृद्यैः सुपुष्कलैः ।जगाम भवनं रक्षो यत्र राजा विभीषणः

pūjayitvā sureśānaṃ stotrairhṛdyaiḥ supuṣkalaiḥ / jagāma bhavanaṃ rakṣo yatra rājā vibhīṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

भुगुवंशोत्पन्न ऋचीक अपनी ज्री सत्यवती से ये बातें कर तपस्या के लिए जंगल की ओर चले गये, वे सवंदा तपस्या ही में लगे रहते थे संयोगतः उसी अवसर पर अपनी स्त्री समेत राजा गाधि ऋचीक के आश्रम पर तीर्थयात्रा के प्रसंग से घूमते घुमते अपनो पुत्री को देखने को आ गये ॥9१-७२। परम शाभ्तचित्त सत्यवती ने ऋषिवरय ऋचीक के दिये हुए दोनों चझओं को लेकर परमप्रसन्‍न मन से माता से उस वृत्तास्त को साचन्‍्त बतलाया । भाग्यवश उनकी माता ने अपना चर पुत्री सत्यवती को दिया और बिना उसका प्रभाव जाने ही सत्य- बती के चरु को स्वयं ग्रहण किया । फलतः सत्यवती ने क्षत्रियों का विनाश करनेवाला परम तेजस्वी गर्भ को धारण किया । उस समय उसकी कान्ति बहुत बढ़ गई, शरीर से वह भयानक दिखाई पड़ने लगी । द्विजश्र ष्ठ ऋचीक ने अपनी सुन्दरी पत्नी की यह दशा देखकर योगबल से सारी स्थिति जान ली । वे बोले, भद्दे ! माता ने तुम्हें ठग

English

The brilliance of the shining Moon who was being eulo¬ gised, developed further and it purified all the three worlds.

अध्याय १६८

श्लोक 31

पूजितः स यथान्यायं दानसन्मानगौरवैः ।सौदर्ये स्थापितो भावे सो ऽवात्सीत्परयामुदा

pūjitaḥ sa yathānyāyaṃ dānasanmānagauravaiḥ / saudarye sthāpito bhāve so 'vātsītparayāmudā

हिन्दी अर्थ

लिया है, उसने विशेष कारण से तुम्हारे चरु को स्वयं ले लिया है इसके फलस्वरूप तुम्हारा पुत्र परम कठोर वित्तवाला एवं क्ररकर्मा उत्पन्न होगा ।७३-७७ और तुम्हारी माता, परम तपस्वी पुत्र उत्पन्न करेगी, जैसा मैंने तुम्हें बतलाया था । मैंने तुम्हारे उस चरु में अपने तपोबल से समस्त ब्रह्मज्ञान को समर्पित किया था । पति के ऐसा कहने पर महाभाग्यशालिनी सत्यवती ने पति की बड़ी आराधना की और इस बात के लिए राजी किया कि मेरा

English

In that prominent chariot, he circumambulated the earth extending upto the ocean twenty-one times.

अध्याय १६८

श्लोक 32

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत् परमेश्वरम् ।अङ्कूरेश्वरनामानं सो ऽश्वमेधफलं लभेत्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā pūjayet parameśvaram / aṅkūreśvaranāmānaṃ so 'śvamedhaphalaṃ labhet

हिन्दी अर्थ

पुत्र वैसा न हो जो नीच ब्राह्मण कहा जाय ।” सत्यवती की इस प्रार्थना पर मुनिवर ऋचीक ने कहा; भद्ठी ! भेंने या तुमने विचार करके ऐसी इच्छा नहीं की थी कि हमारा पुत्र ऐसा क्रूर कर्मा हो अर्थात् यह देव विधान है। प्रायः पिता और माता के कारण से पुत्र उग्रकर्मे करनेवाले होते हैं॥७८-८०। ऋचीक के ऐसा कहने पर सत्यवती पपैय वायुपुराणम् पुनः सत्यवती वाक्यमेवमुक्त्वाउन्रवीदिदस् । इच्छल्लेंकानपि मुने सुजेथा: किः पुनः सुतप्

English

His splendour that reached the earth became medicinal herbs. They sparkle by means of his brilliance.

अध्याय १६८

श्लोक 33

माण्डव्यखातमारभ्य सङ्गमं वापि यच्छुभम् ।रेवाया आमलक्याश्च देवक्षेत्रं महेश्वरम्

māṇḍavyakhātamārabhya saṅgamaṃ vāpi yacchubham / revāyā āmalakyāśca devakṣetraṃ maheśvaram

हिन्दी अर्थ

शमात्सकमजु भर्त: पुत्र मे दातुमहेसि । काससेवंविधः पुत्रो सम स्यात्तु बद प्रभो ८२ मय्यन्यथा न शक्यं बे कर्तुमेव द्विजोत्तम । ततः प्रसादमकरोत्स तस्यास्तपसो बलात्

English

O excellent Brahamans! He sustains subjects of four types and the universe with them (herbs). Lord Soma is indeed the nourisher of the universe.

अध्याय १६८

श्लोक 34

माण्डव्यखातात् पश्चिमतस्तीर्थं तदङ्कूरेश्वरम् ।तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा शुचिः प्रयतमानसः

māṇḍavyakhātāt paścimatastīrthaṃ tadaṅkūreśvaram / tatra tīrthe naraḥ snātvā śuciḥ prayatamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

पुत्रे नास्ति विशेषों से पोत्रे वा वरवरणिनि। त्वया यथोक्त बचन तथा भद्दे भविष्यति ८४ तस्मात्सत्यवती पुत्र जनयामास भागंवम् । तपंस्यभिरतं दान्‍्तं जमर्दाग्न शमात्मकम् विश्वामित्रं तु दायादं गाधिः कुशिकनदनः । प्राप्य ब्रह्मषिसमतां जगास ब्रह्मणा बृतः ८७ सा हि सत्यवती पुण्या सत्यक्षतपरायणा । कौशिकीति समाख्याता प्रवत्तेयं महानदो ८८ परिश्रुता महाभागा कोशिकी सरितां बरा । इक्ष्वाकुबंशे त्वभवत्सुवेणुर्नाण पार्थिव: ८६ तस्य कन्या सहाभागा कामली नाम रेणुका। रेणुकायां तु कासल्यां तपोधुतिसमन्वितः ॥

English

Having acquired splendour through the penance (of Atri), the eulogy (of Devas and sages) and his own religious activities, the blessed one (Soma) performed penance for ten times ten Padma years, (one Padma<= a thousand billion).

अध्याय १६८

श्लोक 35

सन्ध्यामाचम्य यत्नेन जपं कृत्वाथ भारत ।तर्पयित्वा पित्ःन्देवान् मनुष्यान् भरतर्षभ

sandhyāmācamya yatnena japaṃ kṛtvātha bhārata / tarpayitvā pitḥndevān manuṣyān bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

आर्चोको जनयामास जमदग्नि: सुदारुणम् १९०

English

Soma who is famous by his own Karmans will be the pervader of those (ten) gold-complexioned goddesses (viz. quarters) who sustain the whole world.

अध्याय १६८

श्लोक 36

सचैलः क्लिन्नवसनो मौनमास्थाय संयतः ।अष्टम्यां वा चतुर्दश्याम् उपोष्य विधिवन्नरः

sacailaḥ klinnavasano maunamāsthāya saṃyataḥ / aṣṭamyāṃ vā caturdaśyām upoṣya vidhivannaraḥ

हिन्दी अर्थ

पुनः बोली, मुंनिवर्य ! आप इच्छा करें तो समस्त लोकों की सृष्टि कर सकते हैं, ऐसे पुत्र को उत्पन्न करने की तो बात ही क्या है ? है पतिदेव ! मुझे परम शान्‍्त, सरल, एवं सत्पुरुष पुत्र दोजिये। यह तो हो सकता है कि हमारा पौत्र उग्र एवं कठोर स्वभाववाला हो । है प्रभो ! द्विजोत्तम अब मेरे लिये यह-तो करना ही होगा । आप अन्यथा नहीं करेंगे--ऐसी विशेष प्रार्थना कर रहो हूं ! मुनिवर ऋचीक ने अपने तपोबल से उसकी मनः कामना पूर्ण कर प्रसन्न किया । वे बोले, सुन्दरि ! मुझे पुत्र या पौत्र किसी में कोई विशेषता नहीं दिखाई पड़ती, किन्तु तुम्हारा थदि आग्रह ऐसा है तो मैं बंसा ही करूँगा, भद्दे तुम्हारी बात सत्य होयी ।८१-८४। ऋचोक के वचनानुसार सत्यवती ने भागंव जमदग्नि को उत्पन्न किया । वे परमशान्त, क्षमाक्षील एवं तपः परायण थे। इस भ्रकार प्राचीनकाल में रुद्व एवं विष्णु के चर में परिवतंन हो जाने से विष्णु एवं अग्नि

English

Thereafter, Brahma the foremost among the knowers of Brahman, entrusted him with the kingdom of seeds, herbs, Brahmanas and waters.

अध्याय १६८

श्लोक 37

पूजां यः कुरुते राजंस्तस्य पुण्यफलं शृणु ।साग्रं तु योजनशतं तीर्थान्यायतनानि च

pūjāṃ yaḥ kurute rājaṃstasya puṇyaphalaṃ śṛṇu / sāgraṃ tu yojanaśataṃ tīrthānyāyatanāni ca

हिन्दी अर्थ

के तेज के जमन (भक्षण) किये जाने से भृगुवंश में जमदस्नि नामक ऋषि उत्पन्न हुए इधर कुशिकनन्दन ग्राप्रि ने विदवामित्र को पुत्र रूप में उत्पन्न किया, उन विश्वामित्र ने ब्रह्मधियों की समानता प्राप्त कर ब्राह्मणों समेत स्वयं को प्रस्थान किया सत्यव्रत परायण वह सत्यवती परम पुष्यदायिनी महानदी कौछिकी के नाम से प्रवाहित हुई ।८५-५८८। महाभाग्यश्ालिनी, नदियों में श्रेष्ठ कोशिकी को परम ख्याति प्राप्त हुई। इक्ष्वाकु के थंश में सुधेण्

English

Being naturally the foremost among those who shine brilliantly and, thereafter, being crowned over a big kingdom, (Soma) of great splendour became the king of kings and puri¬ fied the worlds and developed them.

अध्याय १६८

श्लोक 38

भवन्ति तानि दृष्टानि ततः पापैः प्रमुच्यते ।तत्र तीर्थे तु यद्दानं देवमुद्दिश्य दीयते

bhavanti tāni dṛṣṭāni tataḥ pāpaiḥ pramucyate / tatra tīrthe tu yaddānaṃ devamuddiśya dīyate

हिन्दी अर्थ

नामक एक राजा थे। उनकी कन्या महाभाग्यशालिनी कामली थी, जिसका दूसरा नाम रेणका भी था, उस कामली रेणुका में परम तपस्वी, धेयंशील, ऋचीक के पुत्र जमदरिन ने परम कठोर स्वभाववाले परशुराम को उत्पन्न किया, वे परशुराम सभी विद्याओं में पारंगत, विशेषतया धनुर्वेद के परम जानकार, क्षत्रियों के विनादाक सर्वविद्यास्तगं श्रेष्ठ धनु्वेदस्य पारगम् । राम॑ क्षत्रियहन्तार॑ प्रदीप्तमिव पावकम् 0६ १ ओर्व॑स्थेबम्तत्तोकस्य सत्यवत्यां महासनाः । जमदग्निस्तपोवीर्याज्जज्ञे ब्रह्मविदां वरः ॥

English

Daksa, the son of Pracetas, gave twenty-seven Daksa- yanls (daughters of Daksa) of great holy rites to Indu (the Moon). They (people) know them as Naksatras (constellations). Having attained that great kingdom, Soma the lord of possessors of Sonia (i.e. Brahmanas) performed the Rajasuya sacrifice, wherein the Daksina amounted to hundred thousands.

अध्याय १६८

श्लोक 39

स्नात्वा तु विधिवत्पात्रे तदक्षयमुदाहृतम् ।होमाद्दशगुणं प्रोक्तं फलं जाप्ये ततो ऽधिकम्

snātvā tu vidhivatpātre tadakṣayamudāhṛtam / homāddaśaguṇaṃ proktaṃ phalaṃ jāpye tato 'dhikam

हिन्दी अर्थ

विश्वामित्रस्तु धर्मात्मा नाम्ना विश्वरथः स्पृतः । जज्ञे मुगुप्रसादेन कौशिकाहंशवर्धनः ९३ विश्वामित्रस्य पुत्रस्तु शुनःशेपो5भवन्पुनिः । हरिश्रन्द्वस्य यज्ञे तु पशुत्वे नियतः स थे १९४ देवर्दत्त: शुनः शेपो विश्वामित्राय वे पुनः । देवदंत्तः स वे यस्माहेवरातस्ततोभवत् ६५ विश्वामित्रस्य पुत्राणां शुनःशेपो5्ग्रजः स्मृतः । मधुच्छन्दों नयश्चेव कृतदेवों प्रुवाष्टको

English

In that sacrifice, Hiranyagarbha was the Udgatr (the presiding priest who recites mantras); Brahma occupied the seat of Brahma and lord Narayana Hari was the Sadasya (member of the witnessing assembly). He was surrounded by Sanatkumara and other leading original Brahmarsis. O Brah¬ manas, we have heard that Soma gave the three worlds as

अध्याय १६८

श्लोक 40

त्रिगुणं चोपवासेन स्नानेन च चतुर्गुणम् ।संन्यासं कुरुते यस्तु प्राणत्यागं करोति वा

triguṇaṃ copavāsena snānena ca caturguṇam / saṃnyāsaṃ kurute yastu prāṇatyāgaṃ karoti vā

हिन्दी अर्थ

कच्छपः प्रणश्चेव विश्वामित्रसुतास्तु वे । तेषां गोत्राणि बहुधा फोशिकानां महात्मनाम् वाधथिवा वेवराताश्व याज्ञवल्क्या: समर्षंणा: । उद्म्बरः उदुम्लानास्तारका यमसुचचताः ६८ लोहिण्या रेणवश्चेव तथा कारीषवः स्मृता: बश्रवः पाणिनश्चेव ध्यानजप्यास्तथेव च १६६९

English

Nine Devls, viz. Smi,_Kuhu,v P Though implored by Devas and celestial sages, he

अध्याय १६८

श्लोक 41

अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकादसंशयम् ।कृमिकीटपतङ्गानां तत्र तीर्थे युधिष्ठिर ।अङ्कूरेश्वरनामाख्ये मृतानां सुगतिर्भवेत्

anivartikā gatistasya rudralokādasaṃśayam / kṛmikīṭapataṅgānāṃ tatra tīrthe yudhiṣṭhira / aṅkūreśvaranāmākhye mṛtānāṃ sugatirbhavet

हिन्दी अर्थ

शालावत्या हिरण्याक्षा स्यड॒कृता गालवाः स्पृता: । देवला यामदूताभ्व सालड्भायनबाष्कलाः

English

O Brahraanas, Usanas, one of the Ahgiras (?) took h is side. Indeed, he had been the highly brilliant disciple of Bphas-

अध्याय १६८

श्लोक 42

एतत्ते कथितं राजन्नङ्कूरेश्वरसम्भवम् ।तीर्थं सर्वगुणोपेतं परमं पापनाशनम्

etatte kathitaṃ rājannaṅkūreśvarasambhavam / tīrthaṃ sarvaguṇopetaṃ paramaṃ pāpanāśanam

हिन्दी अर्थ

ददातिबादराश्चान्ये विश्वामित्रस्य धीमतः ऋष्यन्तरविवाह्यस्ते बहुवः कोशिका: स्मृता: एवं अग्नि के समान परम तेजस्वी थे । उ् के पुत्र ऋचीक के सत्यवती में ज्येष्ठ पुत्र महामनस्वी जमदग्नि हुए, उनके तपोबल से मध्यम पुत्र शुन'शेप हुए, जो परम ब्रह्मज्ञानी थे। शुनःपुष्छ ऋचीक के सब से कनिष्ठ पुत्र थे ।5६-६९२॥। धर्मात्मा विश्वामित्र विश्वरथ के नाम से प्रख्यात थे । महर्षि भृगु कौ कृपा से ये कौशिक के संयोग से उश्पन्न हुए थे, वे कौशिक वंश में सबसे अधिक प्रभावशाली थे। उन विक््वामित्र के पुत्र शुनःशेप नामक

English

Thanks to that affection, lord Rudra took The great miraculous weapon was discharged by that noble soul aiming at the chief Brahmana sage and Devas whereby their fame was destroyed.

अध्याय १६८

श्लोक 43

ये ऽपि शृण्वन्ति भक्त्येदं कीर्त्यमानं महाफलम् ।लभन्ते नात्र सन्देहः शिवस्य भुवनं हि ते

ye 'pi śṛṇvanti bhaktyedaṃ kīrtyamānaṃ mahāphalam / labhante nātra sandehaḥ śivasya bhuvanaṃ hi te

हिन्दी अर्थ

मुनि हुए । वे शुनःशेप राजा हरिशचन्द्र, के यज्ञ कर्म में बलिदान देने के लिये नियुक्त हुए थे। देवताओं ने शुनःशेप को पुनः विश्वामित्र को वापस कर दिया। देवताओं के देने के कारण इनका बाद में देवरात नाम पड़ा । विद्वामित्र के पुत्रों में शुनःशेप सब से बड़े कहे जाते हैं। इनके अतिरिक्त मधुच्छन्द, नय, कत, देव, थ्र व, अष्टक, कच्छप, और पूरण--ये सब भी विद्वाभित्र के पुत्र हैं। इन सबों के गोत्र प्रायः महान् पराक्रमी

English

There ensued a great battle directly (between Devas andAsuras). It was called Tarakamaya 1 2 (concerningTara?)• It caused great destruction of Devas, Danavas and all the worlds.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 168
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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