Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
170
अध्याय 170 / 232

Adhyaya 170

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अध्याय १७०

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे काममोदिनीहरणवर्णनं नामैकोनसप्तत्यधिशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १७० श्रीमार्कण्डेय उवाच: कामप्रमोदिनीसख्यो नीयमानां च तेन तु ।दृष्ट्वा ताश् चुक्रुशुः सर्वा निःसृत्य जलमध्यतः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe kāmamodinīharaṇavarṇanaṃ nāmaikonasaptatyadhiśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 170 śrīmārkaṇḍeya uvāca: kāmapramodinīsakhyo nīyamānāṃ ca tena tu / dṛṣṭvā tāś cukruśuḥ sarvā niḥsṛtya jalamadhyataḥ

हिन्दी अर्थ

एवं व्यर्थ में नाच गान में लगे हुए लम्पट प्रतीत होते है।' माता मेना की ऐसी बातों को स्त्री स्वभाव

English

These and similar subtle words they exchanged. Urvasi then spoke to Aila: "O lord, I have been rendered pregnant by you. Undoubtedly your son will be born within a year." The king stayed for a night with her.

अध्याय १७०

श्लोक 2

गता राजगृहे सर्वाः कथयन्ति सुदुःखिताः ।कामप्रमोदिनी राजन्हृता श्येनेन पक्षिणा

gatā rājagṛhe sarvāḥ kathayanti suduḥkhitāḥ / kāmapramodinī rājanhṛtā śyenena pakṣiṇā

हिन्दी अर्थ

विषण्णवदना देवी महावदेवमभाषत । नेह वत्स्याम्यहूं देव नय मां स्व॑ं निवेशनम् ३३४ तथोक्तस्तु महादेवः सवल्लिकानवेक्ष्य ह। वासार्थं रोचयामास पृथिव्यां तु द्विजोत्तमाः ॥ दिवोदासेन तां ज्ञात्वा निंविष्टां नगरीं भवः । पाश्वेस्थं स समाहुय गणशं क्षेमक ब्रवीत् ३३६

English

The king went back to his city with great delight. When a year elapsed, the king of great fame came to Urvasi again.

अध्याय १७०

श्लोक 3

क्रीडन्ती च जलस्थाने तडागे देवसन्निधौ ।अन्वेष्या च त्वया राजंस्तस्य मार्गं विजानता

krīḍantī ca jalasthāne taḍāge devasannidhau / anveṣyā ca tvayā rājaṃstasya mārgaṃ vijānatā

हिन्दी अर्थ

श्रेयस्तेहं करिष्यामि स्थान मे रोवयानघ । मद्ग॒पां प्रतिसां कृत्वा नगयेंन्‍्ते निवेशय ३३६ तथा स्वप्ने यथा दृष्टं सर्वे कारितवान्द्विजा: । नगरीद्ाय॑नुज्ञाप्प राजानं तु बथाविधि (४४०

English

After staying with her for a night, the lofty-minded king became overwhelmed by passionate love. In a pitiable tone he spoke: "Be mine for ever".

अध्याय १७०

श्लोक 4

तासां तद्वचनं श्रुत्वा देवपन्नः सुदुःखितः ।हाहेत्युक्त्वा समुत्थाय रुदमानो वरासनात्

tāsāṃ tadvacanaṃ śrutvā devapannaḥ suduḥkhitaḥ / hāhetyuktvā samutthāya rudamāno varāsanāt

हिन्दी अर्थ

अन्नप्रदानयुक्तेश्व अत्यद्धतसिबाभवत् । एवं संपूज्यते तन्न नित्यसेव गणेश्वरः १४२ बहा पार्वती सहन ने कर सकीं। वरदान देने वाली पावंती मन्द हास्य करती हुई महादेव के समीप आई ओर वहाँ खिन्‍न मुख होकर महादेव से बोलीं--देव ! अब मैं यहाँ पर निवास नहीं करूँग्री, मुझे अपने यहाँ ले चलिये । देवी के ऐसा कहने पर महादेव ने तीनों लोकों में अपने योग्य स्थान देखा ॥ द्विजवयंवन्द ! समस्त भूमंडल भर में महान् तेजस्वी महेश्वर ने अपने निवास योग्य स्थान सिद्ध क्षेत्र वाराणसी को ही पसन्द

English

Urvasi then said to Aila: "The Gandharvas will grant you (that) boon. O great king, choose that boon and tell them this yourself:

अध्याय १७०

श्लोक 5

मन्त्रिभिः सहितस्तस्मिंस्तडागे जलसन्निधौ ।न चिह्नं न च पन्थानं दृष्ट्वा दुःखान्मुमोह च

mantribhiḥ sahitastasmiṃstaḍāge jalasannidhau / na cihnaṃ na ca panthānaṃ dṛṣṭvā duḥkhānmumoha ca

हिन्दी अर्थ

किया ।३२-३५। भव ने उक्त वाराणसी नगरी को उस समय राजा दिवोदास के अधीन जानकर अपने समीप रहनेवाले गणेह्वर क्षेमक को बुलाकर कहा । गणेश्वर ! तुम वाराणसी पुरी को जाओ, और उसे खाली कराओ । देखना, मृदुल उपायों द्वारा उसे खाली कराना, क्‍योंकि वहाँ का राजा दिवोदास महान् पराक्रमी है

English

T choose the boon of Salokya (having the same world) with the noble-souled Gandharvas' ". The king accepted the suggestion saying "So be it", and requested the Gandharvas for the boon. The Gandharvas replied, "So be it".

अध्याय १७०

श्लोक 6

तस्य राज्ञस्तु दुःखेन दुःखितो नागरो जनः ।क्षणेनाश्वासितो राजा मन्त्रिभिः सपुरोहितैः

tasya rājñastu duḥkhena duḥkhito nāgaro janaḥ / kṣaṇenāśvāsito rājā mantribhiḥ sapurohitaiḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार शिव की आज्ञा से प्राचीन काल में निकुम्भ वाराणसी पुरी को प्रस्थित हुआ, और वहाँ जाकर उसने स्वयं को मद्भून नामक नापित को स्वप्न में दिखाया, और उससे कहा, निष्पाप ! मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा, मेरे लिए एक स्थान तू बना इस नगरी के अन्तिम छोर पर मेरी प्रतिमा बनाकर स्थापित कर दे ट्विजवन्द ! मद्धुन ने स्वप्न में देखी हुई सभी बातों को पूर्ण किया, राजा से आज्ञा प्राप्त कर उसने नगरी के प्रवेश द्वार पर विधिपूर्वक निकुम्भ की प्रतिमा स्थापित की ।३८-४०। उस स्थान पर निकुम्म की मूति को नित्यप्रति बड़ी पूजा होने लग्ी। गन्ध, धृपष, पुष्प, माला, अन्नादि वस्तुओं के देने से एक अद्भुत दृश्य उपस्थित हो गया । इस प्रकार गणेश्वर की नित्यप्रति पुजा होती थी। गणेश्वर ने भी पूजा

English

After filling the Sthali (mud-pot) with fire, the Gandharvas spoke to him: "O king, performing the sacrifice with this, you will attain that world." 1

अध्याय १७०

श्लोक 7

किं कुर्म इत्युवाचेदमस्मिन्काले विधीयताम् ।सर्वैस्तत्संविदं कृत्वा वाहिनीं चतुरङ्गिणीम्

kiṃ kurma ityuvācedamasminkāle vidhīyatām / sarvaistatsaṃvidaṃ kṛtvā vāhinīṃ caturaṅgiṇīm

हिन्दी अर्थ

ततो बरसहस्राणि नगराणां प्रयच्छति। पुत्रान्हिरिण्यमायूंषि सर्वकार्मांस्तथव च ..

English

He took the fire and went back to his city along with the prince. He placed the fire in the Arani and went to his abode along with his son.

अध्याय १७०

श्लोक 8

प्रेषयामि दिशः सर्वा हस्त्यश्वरथसंकुला ।वादित्राणि च वाद्यन्ते व्याकुलीभूतसंकुले

preṣayāmi diśaḥ sarvā hastyaśvarathasaṃkulā / vāditrāṇi ca vādyante vyākulībhūtasaṃkule

हिन्दी अर्थ

राज्ञस्तु महिषी श्रेष्ठा सुयशा नाम विश्रुता । पुत्रार्थभागता साध्वी राज्ञा देवी प्रचोदिता पैडड पुजां तु बिपुलां कृत्वा देवी पुत्रानयाचत पुनः पुनरथा55गम्य बहुशः पुत्रकारणात् ४४५ न प्रयच्छति पुत्रांस्तु निकुम्भः कारणेन तु । राजा यदि तु क्ष्येत ततः किचिटवतंते अथ दीघेंण कालेन क्रोधो राजानमाविशत् । भृतं त्थिदं महाद्यारि नागराणां प्रयच्छति ४७

English

As w. 40-45 show, this Puraria attributes to Pururavas, the institution (or encouragement) of the performance of Yajha out of the fire created from Arafii ( of Asvattha wood) by attrition. Bd. 3.66.19 gives the credit of introducing three fires (Daksinagni etc.) to Pururavas.

अध्याय १७०

श्लोक 9

नाराचैस्तोमरैर्भल्लैः खड्गैः परश्वधादिभिः ।राजा संनाहबद्धो ऽभूद्गनं ग्रसते किल

nārācaistomarairbhallaiḥ khaḍgaiḥ paraśvadhādibhiḥ / rājā saṃnāhabaddho 'bhūdganaṃ grasate kila

हिन्दी अर्थ

तत्राचितभ्र बहुशो देव्या मे तत्र कारणात् । न ददाति च पुत्न॑ से कृतघ्नो बहुभोजनः ३४६ अतो नाहंति पूजां तु मत्सकाशात्कथंचन । तस्मात्तु नाशयिष्यामि तस्य स्थान दुरात्मनः

English

S rim an, the successor of Bhima, was a king with go en lustre (otherwise known as Kancanaprabha). The scholarly and powerful Suhotra was the son of Kancana (i.e. Kancana- prabha).

अध्याय १७०

श्लोक 10

न देवो न च गन्धर्वो न दैत्यो न च राक्षसः ।किं करिष्यति राजाद्य न जाने रोषनिष्कृतिम्

na devo na ca gandharvo na daityo na ca rākṣasaḥ / kiṃ kariṣyati rājādya na jāne roṣaniṣkṛtim

हिन्दी अर्थ

भग्नमायतन दृष्ट्वा राजानमगमत्प्रभुः । यस्मादनपराध॑ मे त्वया स्थान विनाशितम् से सस्तुष्ट होकर नगरनिवासियों के लिए सहस्रों वरदान प्रदान किये, पुत्र, सुवंग, दीर्घायु, एवं अन्य सभी प्रकार के मनोरथों की पूर्ति की ।४१-४३। राजा दिवोदास कौ पटरानी का नाम सुयशा था जो परम साध्वी थीं । राजा की प्रेरणा से वह भी पुत्र प्राप्ति की कामना से उपस्थित हुई और विपुल पूजा करने के उपरास्त पुत्रों का वरदान माँगा । इसी प्रकार बारम्बार आकर उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए पूजा और वरदान-याचना की ।४४-४४॥।

English

Jahnu was the son of Suhotra, born of Kesika s

अध्याय १७०

श्लोक 11

नागरो ऽपि जनस्तत्र दृष्ट्वा चकितमानसः ।चतुर्दशसहस्राणि दन्तिनां सृणिधारिणाम्

nāgaro 'pi janastatra dṛṣṭvā cakitamānasaḥ / caturdaśasahasrāṇi dantināṃ sṛṇidhāriṇām

हिन्दी अर्थ

किल्तु निकुम्म ते उक्त कारणवश् पुत्रों का वरदान नहीं दिया, उसने सोचा कि यदि रानी को मैं वरदान न दूंगा तो राजा क्रुठ हो जायग्रा और तब हमारा सब काम सध जायग्रा। इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जाने पर राजा को क्रोव आ गया, वह सोचने लगा, कि यह भूत हमारी इस नगरी के महान् द्वारदेश पर स्थित है, नगरवासियों के ऊपर प्रसन्‍त होकर संकड़ों वरदान इसने प्रदान किये, किन्तु हमें कुछ भी नहीं देता,

English

Amavasu was the founder of Kanyakubja kingdom—Pargiter, AITH,

अध्याय १७०

श्लोक 12

अश्वारोहसहस्राणि ह्यशीतिः शस्त्रपाणिनाम् ।रथानां त्रिसहस्राणि विंशतिर्भरतर्षभ

aśvārohasahasrāṇi hyaśītiḥ śastrapāṇinām / rathānāṃ trisahasrāṇi viṃśatirbharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

हमाशी ही प्रजाओं द्वारा इसकी पूजा नित्य होती है, मेरी ही नगरी में इसका आवासस्थल है, देवी ने मेरे कहने से इसकी अनेक प्रकार से पूजाएँ भी कों, किस्तु इस इृतध्न को मेरे लिए एक भी पुत्र देने का अवसर नहीं मिला, यह बड़ा खत्बू है, अतः आज से इसकी पूजा नहीं करनी चाहिए, मेरी ओर से इसको पूजा किसी प्रकार भी नहीं होगी। इस दुरात्मा का स्थान नष्ट करा दूंगा ।! ।४६-५०। इस प्रकार का निश्चय कर दुरात्मा एवं कुटिल राजा ने कुमतिवश होकर गणेश्वर निकुम्भ का स्थान नष्ट करा दिया । अपने आवासस्थल को नष्ट भ्रष्ट देखकर परम प्रभावशाली गणपति निकुम्भ राजा के पास आये और बोले, तुमने यतः बिना किसी अपराध के ही हमारे स्थान को नष्ट करवा दिया हैं, इसलिये है नराधिप ! तुम्हारी यह नगरी बिना किसी

English

It was a result of the curse of Yuvanasva that Ganga was produced by him. Kaverl, the most excellent of all rivers, became the praise-worthy wife of Jahnu. Jahnu begot a beloved righteous son named Suhotra, of Kaverl. Suhotra's son was Ajaka.

अध्याय १७०

श्लोक 13

सङ्ग्रामभेरीनिनदैः खुररेणुर्नभोगता ।एतस्मिन्नन्तरे तात रक्षको नगरस्य हि

saṅgrāmabherīninadaiḥ khurareṇurnabhogatā / etasminnantare tāta rakṣako nagarasya hi

हिन्दी अर्थ

परेद भायुपुराणम्

English

Ajaka's successor was Balakasva of great fame. Gaya, Slla and Kusa are remembered as sons born to him.

अध्याय १७०

श्लोक 14

गृहीत्वाभरणं तस्यास्त्वङ्गप्रत्यङ्गिकं तथा ।कुण्डलाङ्गदकेयूरहारनूपुरझल्लरीः

gṛhītvābharaṇaṃ tasyāstvaṅgapratyaṅgikaṃ tathā / kuṇḍalāṅgadakeyūrahāranūpurajhallarīḥ

हिन्दी अर्थ

शप्त्वा पुरी निकुम्भस्तु महादेवमथानयत् । शुन्यां पुरीं महादेवो निर्ममे परमात्मना ५४ तुल्याँ देवविभृत्यास्तु देव्याश्चेब महात्मनः । रमते तत्न वे देवी रममाणों महेश्वरः ५५ न राति तत्र वे देवी लभते गृहविस्मयात् । देव्याः क़ीडार्थमीशानों देवो वाक्यमथाब्रवीत् ५६ नाहूं वेश्म विभोक्ष्यामि अविमुक्त हि में गृहम् । प्रहस्येनासथोवाच अविमुक्त हि से गृहम् ५७ नाह देवि गमिष्यासि गच्छस्वेह वसाम्यहम् । तस्मात्तदविमुक्त हि प्रोक्तं देवेन वे स्वयम् ४८ एवं वाराणसी शप्ता अविमुक्त च कीतितम् । यस्मिन्वसति वे देवाः सर्वदेवनसस्कृतः ॥। द

English

Kusa had four sons brilliant due to their Vedic know¬ ledge. They were Kusasva, Kusanabha, Amurtarayasas and Vasu.

अध्याय १७०

श्लोक 15

निवेद्याकथयद्राज्ञे मया दृष्टं त्ववेक्षणात् ।तापसानामाश्रमे तु माण्डव्यो यत्र तिष्ठति

nivedyākathayadrājñe mayā dṛṣṭaṃ tvavekṣaṇāt / tāpasānāmāśrame tu māṇḍavyo yatra tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

युगेषु त्रिष धर्मात्मा सह देव्या महेश्वर

English

The excellent king Kusastamba desirous of a son, performed a penance. When a thousand years were completed he saw Satakratu (Indra).

अध्याय १७०

श्लोक 16

तापसैर्वेष्टितो यत्र ददृशे तत्र सन्निधौ ।दण्डवासिवचः श्रुत्वा प्रत्यक्षाङ्गविभूषणम्

tāpasairveṣṭito yatra dadṛśe tatra sannidhau / daṇḍavāsivacaḥ śrutvā pratyakṣāṅgavibhūṣaṇam

हिन्दी अर्थ

7रण के ही सनी हो जायगी ।” निकुम्भ के इसी शाप के कारण प्राचीनकाल में वाराणसोपुरी सूनी हुई थी । इस प्रकार वाराणसी को शाप देकर निकृम्भ ने वहाँ पर महादेव जी को बुलाया ।११-५४। देवाधिदेव महादेवजी ने उस सूनी प्री का हैविकविभ्त्तियों द्वारा पुनर्तिर्माण किया, उसमें महान् ऐश्वयंशाली महादेव का तथा दिव्यगुणमयी पाबंती का निध्य विहार होने लगा। अपने भवन को देखकर पावंती जी को परम विस्मय होता था, उन्हें कुछ दिन के बाद इसमें सन्‍्तोष नहीं मिला, तब ईशानदेव ने देवी की फक्रीडा के लिए उनसे यह बात कही, 'देवि ! मैं अपने इस सन्दर भवन का परित्याग नहाँ करूँगा, मेरा यह गृह अविमुक्त है, इस प्रकार हँसते हुए महादेव जी ने पाव॑ती से फिर" कहा कि मेरा यह भवन अविमुक्त है। मैं तो यहाँ से कही अन्यन्र नहीं जाऊँगा. तुम चाहो तो यहाँ से जा सकती हो, मैं तो यहीं पर रहेंगा। यतः महादेव जी ने स्वयं अपने मुख

English

On seeing him who performed severe penance, the thousand-eyed Purandara decided to become his son, as he was competent to do so. The enemy of Paka (i.e. Indra) became his son and took the name Gadhi. He was called Kausika also, being a member of the family of Kusa.

अध्याय १७०

श्लोक 17

स क्रोधरक्तनयनो मन्त्रिणो वीक्ष्य नैगमान् ।ईदृग्भूतसमाचारो ब्राह्मणो नगरे मम

sa krodharaktanayano mantriṇo vīkṣya naigamān / īdṛgbhūtasamācāro brāhmaṇo nagare mama

हिन्दी अर्थ

से इसे अविमक्त कहा था, अतः उसका अविमृक्त नाम पड़ा ।५५-४८। इस प्रकार वाराणसीपुरी को जिस कारणवश शाप दिया गया था और उसका अविमुक्त नाम जिस कारण से पड़ा था, वह सब मैं कह चुका उस वाराणसी नगरी में सभी देवताओं के ममस्करणौय धर्मात्मा महादेव जी पा्बयंती के साथ तीनों युगों में निवास करते हैं ।५९। केवल कलियुग में महात्मा शंकर का वह पुर अन्तहित हो जाता है। उसके अन्तहित हो जाने

English

Kusastamba's wife was Paurukutsa and Gadhi was born of her. Lord Gadhi gave his eldest daughter, the splendid and blessed Satyavati, to Rcika who was a descendant of Bhrgu (Kavya?).

अध्याय १७०

श्लोक 18

चौरचर्यां व्रतच्छन्नः परद्रव्यापहरकः ।तेन कन्या हृता मे ऽद्य तपस्विपापकर्मिणा

cauracaryāṃ vratacchannaḥ paradravyāpaharakaḥ / tena kanyā hṛtā me 'dya tapasvipāpakarmiṇā

हिन्दी अर्थ

पर वह वाराणसी पुरी पुनः वहाँ प्रतिष्ठित होती है। इस प्रकार निकुम्भ के शाप से शापित वाराणसी पुत प्रतिष्ठित हुई । प्राचीनकाल में नरपति दिवोदास ने राजा भद्रश्नेण्य के परम धनुर्धारी सो पुत्रों का निधन करके उसके पुर में प्रवेश किया और परम बलशाली उसने भरद्रश्रेण्य के राज्य को भी छीत लिया था। भद्रश्नण्य का एक पुत्र दुर्दभम नामक था, राजा दिवोदास ने उसे निपट बालक समझ कर, उसके जीतने का कोई

English

Her husband, himself a descendant of Bhrgu and the delighter of the Bhrgu family, prepared Cam (consecrated cooked rice) for the sake (of the birth) of a son to himself as well as to Gadhi. The courageous sageRcIka, the descendant of Bhrgu, called (his wife Satyavati and said): "O splendid lady, this Caru should be taken by you and this by your mother. A brilliant leader of Ksatriyas will be born to her. He cannot be conquered by Ksatriyas in battle. He will be the destroyer of prominent Ksatriyas. This Caru will give you, O splendid lady, an excellent Brahmana as a son. He will be courageous and quiescent, possessing penance as his wealth (i.e. he will become a great sage)."

अध्याय १७०

श्लोक 19

शाकुन्तं रूपमास्थाय जलस्थो गगनं ययौ ।पाखण्डिनो विकर्मस्थान् बिडालव्रतिकाञ्छठान्

śākuntaṃ rūpamāsthāya jalastho gaganaṃ yayau / pākhaṇḍino vikarmasthān biḍālavratikāñchaṭhān

हिन्दी अर्थ

बत्सपुत्रों ह्यालकंस्तु संनतिस्तस्य चा5घत्मजः । अलक॑ प्रति राजषिगीतश्लोको पुरातनों ६६ षष्टिवर्षसहत्लाणि षष्टिवर्षशतानि च । युवा रूपेण संपन्नो ह्मलकेः काशिसत्तमः ॥

English

After saying entered the forest,

अध्याय १७०

श्लोक 20

चाटुतस्करदुर्वृत्तान् हन्यान्नस्त्यस्य पातकम् ।न द्रष्टव्यो मया पापः स्तेयी कन्यापहारकः

cāṭutaskaradurvṛttān hanyānnastyasya pātakam / na draṣṭavyo mayā pāpaḥ steyī kanyāpahārakaḥ

हिन्दी अर्थ

शापस्यान्ते महाबाहुहेत्वा क्षेमकराक्षसम् । रम्यभावासयामरास पुरीं वाराणसी नृपः ६८ संनतेरपि दायादः सुनीथो नाम धामिकः । सुनीथस्य तु दायादः सुकेतुर्नाम धामिकः ६९ सुकेतुतनयश्रापि धर्मकेतुरिति श्रुतिः। धर्मकेतोस्तु दायादः सत्यकेतुर्महारथः . (७० सत्यकेतुसतश्रधापि विभुर्नाम प्रजेश्वरः। सुविभुस्तु विभोः पुत्र: सुकुमारस्ततः स्मृतः ७१ सुकुमारस्य पुत्रस्तु धुष्टकेतुः स धामिकः। धृ ध्टकेतोस्तु दायादो वेणुहोत्रः प्रजेश्वरः

English

Then Satyavatl Conceived in her womb a foetus that

अध्याय १७०

श्लोक 21

शूलम् आरोप्यतां क्षिप्रं न विचारस्तु तस्य वै ।स च वध्यो मया दुष्टो रक्षोरूपी तपोधनः

śūlam āropyatāṃ kṣipraṃ na vicārastu tasya vai / sa ca vadhyo mayā duṣṭo rakṣorūpī tapodhanaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणा क्षत्रियाश्चेव तयोः पुत्राः सुधासिकाः । विक्वान्ता बलवन्तश्न सिहतुल्यपराक्षमाः ७४

English

On seeing it and pondering over it by means of Yogic power, Rcika, the excellent Brahmana, spoke to his fair- complexioned wife:

अध्याय १७०

श्लोक 22

एवं ब्रुवंश्चलन्क्रोधादादिश्य दण्डवासिनम् ।कार्याकार्यं न विज्ञाय शूलमारोपयद्द्विजम्

evaṃ bruvaṃścalankrodhādādiśya daṇḍavāsinam / kāryākāryaṃ na vijñāya śūlamāropayaddvijam

हिन्दी अर्थ

महत्त्व न समझ कर घृणा से छोड़ दिया था ।६०-६३। राजा दिवोदास से दुषढ्गवती नामक पत्नी में प्रतदत नामक वौर पुत्र उत्पन्न हुआ, भव्रश्नेण्य के उस बालक उतर ने प्रतच॑ईन से छीना हुआ राज्य पुनः छीन लिया । उस राजाधिराज ने इस प्रकार अपने वर का बदला चुका लिया। प्रतदंत के वत्स और गगे नामक दों पुत्र कहे जाते हैं। वत्स के पुत्र अलक हुए, जिनके पुत्र का नाम सन्नति हुआ । राजषि अलको के लिए ये पुराने दो श्लोक गाये जते हैं, जिनका आद्यय इस प्रकार है। साठ सहस्त साठ सौ वर्षो तक काशिराज अलक युवा था, लोपामुद्रा की कपा से उसे इतनी बड़ी आयु प्राप्त हुई थी ।६४-६७॥ एक सहख . वर्ष के शाप के व्यंतीत हो जाने पर महाबाहु राजा अलक ने उस क्षेमक नामक राक्षस को मार कर पुनः मनोहर वाराणसी पुरी को बसाया सन्‍तति का उत्तराधिकारी सुनीथ नामक धाभिक राजा हुआ । सुनीथ का उत्तराधि-

English

Your mother will give birth to such a saintly son. The entire Brahman (Vedic knowledge) has been instilled into it by me.

अध्याय १७०

श्लोक 23

पौरा जानपदाः सर्वे अश्रुपूर्णमुखास्तदा ।हाहेत्युक्त्वा रुदन्त्यन्ये वदन्ति च पृथक्पृथक्

paurā jānapadāḥ sarve aśrupūrṇamukhāstadā / hāhetyuktvā rudantyanye vadanti ca pṛthakpṛthak

हिन्दी अर्थ

कारी सुकेत नामक धामिक विचारों वाला राजा हुआ सुकेतु का पुत्र धर्मकेतु नाम से सुना जाता है । घर्ंकेतु का उत्तराधिकारी भहारथी सत्यवेतु हुआ सत्यकेतु का पुत्र प्रजश्वर विश्र हुआ, विश्र का पुत्र सुविश्ञ और उससे सुकुमार नामक पुत्र की उत्पत्ति कही जाती है ।६८-७१। सुकुमार का उत्र परम धामिक यष्टकेतु हुआ, धृष्ठकेतु का उत्तराधिकारी प्रजापालक वेणहोत्र हुआ। वेणहोत्र का पुत्र गाग्ये नाम से विख्यात हुआ

English

Thus warned by her husband, the blessed lady Satya¬ vatl propitiated her husband: "May my son never be like this. Let another be a base Brahmana". Thus requested, the sage said: "O gentle lady, this has never been thought of nor desired by me or by you. The son may be one of terrible activities due to the fault of his father or mother".

अध्याय १७०

श्लोक 24

कुत्सितं च कृतं कर्म राज्ञा चण्डालचारिणा ।ब्राह्मणो नैव वध्यो हि विशेषेण तपोवृतः

kutsitaṃ ca kṛtaṃ karma rājñā caṇḍālacāriṇā / brāhmaṇo naiva vadhyo hi viśeṣeṇa tapovṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

गाग्ये का पुत्र गर्भभूमि और बुद्धिमान् वत्स का पुत्र वात्स्य हुआ। ईने दोनों राजाओं के पुत्र ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों वर्णोवाले हुए, जो परम उत्साही बलशाली, एवं सिंह के समान प्राक्ष्मी थे। काशी के राजाओं का वर्णन कर चुका अब रजि के पुत्रों का वर्णन सुनिये। महाराज रजि के सौ पूत्र थे, जिसमें पांच पृथ्वी में इत्येते काश(श्य) पाः प्रोक्ता रजेरपि निबोधत । रजेः पुत्रशतान्यासन्पच्च वीयेवतो भुवि ॥

English

Thus addressed, Satyavatl spoke again these words: "O sage, if you wish, you can create many worlds. What then a mere son?

अध्याय १७०

श्लोक 25

यदि रोषसमाचारो निर्वास्यो नगराद्बहिः ।न जातु ब्राह्मणं हन्यात् सर्वपापे ऽप्यवस्थितम्

yadi roṣasamācāro nirvāsyo nagarādbahiḥ / na jātu brāhmaṇaṃ hanyāt sarvapāpe 'pyavasthitam

हिन्दी अर्थ

राजेपमिति विख्यात क्षत्रमिद्वभयावहम् "७४५ तदा दवासुरे युद्ध समुत्पन्ने सुदारुण । देवाश्चेवासुराश्वेव पितामहमथाबुवन् ,

English

This explains why Parasuraraa, though ]a Brahmana, was of a militant nature and Visvamitra, though K?atriya by birth, attained Brahm ana-hood. O holy lord, O master, it behoves you to grant me a son who will be quiescent and straightforward. O Lord, say 'Let such a son be born'.

अध्याय १७०

श्लोक 26

राष्ट्रादेनं बहिष्कुर्यात् समग्रधनमक्षतम् ।नाश्नाति च गृहे राजन्नाग्निर्नगरवासिनाम् ।सर्वे ऽप्युद्विग्नमनसो गृहव्याप्तिविवर्जिताः

rāṣṭrādenaṃ bahiṣkuryāt samagradhanamakṣatam / nāśnāti ca gṛhe rājannāgnirnagaravāsinām / sarve 'pyudvignamanaso gṛhavyāptivivarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

आवयोभंगबन्युद्धे विजेता को भविष्यति । ब्रृहि नः सर्वलोकेश श्रोतुसिच्छामहे वयम् ७७ येबासर्थाय सहःग्रामे रजिरात्तायुधः प्रभु: योत्स्यते ते विजेष्यस्ति त्रील्लाँकान्नात्र संशय: ७८ रजियंतस्ततो लक्ष्मीयंतो लक्ष्मीस्ततों धुतिः यतो धृतिस्ततों धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ७६

English

O excellent Brahmana, nothing other than this can be done to me". Thereafter, by means of the power of his penance, he made her delighted.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 170
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.