Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
171
अध्याय 171 / 232

Adhyaya 171

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अध्याय १७१

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे माण्डव्यशूलारोपणवर्णनं नाम सप्तत्यधिकशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १७१ श्रीमार्कण्डेय उवाच: कथितं ब्राह्मणं द्रष्टुं शूले क्षिप्तं तपोधनैः ।नारायणसमीपे तु गताः सर्वे महर्षयः

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe māṇḍavyaśūlāropaṇavarṇanaṃ nāma saptatyadhikaśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 171 śrīmārkaṇḍeya uvāca: kathitaṃ brāhmaṇaṃ draṣṭuṃ śūle kṣiptaṃ tapodhanaiḥ / nārāyaṇasamīpe tu gatāḥ sarve maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

ते हृष्टमनसः सर्वे राजानं देवदानवाः। ऊचुरस्मज्ज्जयाय त्वं गृहाण वरकार्मुकम् ८१

English

"O fair-complexioned lady, it makes no difference as far as I am concerned whether it is the son or the grand¬ son. O gentle lady, everything shall be in accordance with the words spoken by you."

अध्याय १७१

श्लोक 2

नारदो देवलो रैभ्यो यमः शातातपो ऽङ्गिराः ।वसिष्ठो जमदग्निश्च याज्ञवल्क्यो बृहस्पतिः

nārado devalo raibhyo yamaḥ śātātapo 'ṅgirāḥ / vasiṣṭho jamadagniśca yājñavalkyo bṛhaspatiḥ

हिन्दी अर्थ

अहं जेष्यामि वा युद्धे वेवाअशक़पुरोगमान् । इस्द्रो भवासि धर्मात्मा ततो योत्स्यामि संयुगे. परम बलवान् विख्यात थे । वे राजेय नाम से विख्यात थे, इन्द्र भी उनके क्षात्रबल से भय खाते थे ।७२-७५। उस समय देवताओं ओर राक्षसों में परम दारुण युद्ध मचा हुआ था, देवता औद असुर दोनों दलवालों ने वितामह ब्रह्मा से पुछा, भगवन् ! हम दोनों के वर्गों के इस घमासान युद्ध में कौन वर्ग विज्रयी होगा समस्त लोकों के स्वामित् ! इस बात को हम लोग जानना चाहते हैं, बतलाइये

English

Therefore Satyavatl gave birth to a son, the scion of the family of Bhrgu. He was Jamadagni, the quiescent and self-controlled. He was interested in penance.

अध्याय १७१

श्लोक 3

कश्यपो ऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रो ऽरुणिर्मुनिः ।वालखिल्यादयो ऽन्ये च सर्वे ऽप्यृषिगणान्वयाः

kaśyapo 'trirbharadvājo viśvāmitro 'ruṇirmuniḥ / vālakhilyādayo 'nye ca sarve 'pyṛṣigaṇānvayāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा ने कहा--जिन लोगों के लिए महान् पराक्रमशाली महाराज रजि संग्राम भूमि में हथियार धारण करेगे, वे लोग तीनों लोकों को जीत सकेंगे, इसमें सन्देह नहीं है। जहाँ पर महाराज रजि हैं वहीं लक्ष्मी है, जहाँ पर लक्ष्मी का निवास है, वहीं पर वास्तविक धैये॑ और शान्ति है, जहाँ धैय॑ का निवास है, वहीं पर धर्म रहता है, और जहाँ पर धर्म रहता है, वहीं वास्तविक विजय है ।” देवताओं और दानवों ने रजि

English

Formerly when there was an interchange of Raudra and Vaisnava Cams in the Yajna of Bhrgu, he ate ( Jamanat) the Vaisnava nre and so he came to be known as 'Jamadagni'.

अध्याय १७१

श्लोक 4

ददृशुः शूलमारूढं माण्डव्यमृषिपुंगवाः ।प्रोचुर्नारायणं विप्रं किं कुर्मस्तव चेप्सितम्

dadṛśuḥ śūlamārūḍhaṃ māṇḍavyamṛṣipuṃgavāḥ / procurnārāyaṇaṃ vipraṃ kiṃ kurmastava cepsitam

हिन्दी अर्थ

ढ्वारा जय की बातें सुनकर अपने-अपने पक्ष की विजय आकांक्षा से राजाधिराज रजि की प्रार्थना की । अत्यन्त प्रसन्न मत से देवताओं और दानवों ने राजा रजि के पास जाकर यह निवेदन किया कि 'तुम हमारी विजय के लिए सुदृढ़ धनुष घारण करो! राज़ बोले--हम तुम सब को युद्ध में पराजित कर देंगे, इन्द्र प्रभृति प्रमुख देवगणों को भी हम पराजित कर देंगे, किन्तु हमीं धर्मात्मा इन्द्र होंगे, इसी शर्ते पर हम युद्ध में धनृष धारण करेंगे ।५२॥।

English

Having obtained Visvamitra as his successor, Gadhi the delighter of KuSikas (members of the family of Kusika) attained the status equal to that of Brahmana sages. He was selected to be such by Brahma.

अध्याय १७१

श्लोक 5

सर्वे ते तत्र सांनिध्यान् माण्डव्यस्य महात्मनः ।संभ्रान्ता आगता ऊचुः किं मृतः किं नु जीवति

sarve te tatra sāṃnidhyān māṇḍavyasya mahātmanaḥ / saṃbhrāntā āgatā ūcuḥ kiṃ mṛtaḥ kiṃ nu jīvati

हिन्दी अर्थ

अस्माकमिन्द्र: प्रह्दादस्तस्यार्थें विजयामहे । अस्मिस्तु समये राज॑स्तिष्ठेया देवनोदिते ॥८रे स तयेति ब्रुवस्नेव देवेरप्यभिचोदितः । भविष्यसीन्‍्द्रो जित्बेति देवेरपि निमन्त्रितः ८४ जघान दानवास्सर्वान्समक्षं वज्ञपाणिन:ः । स विप्रनष्टां देवानां परमश्रीः श्रियं वशी ८५ निह॒त्य दानवान्सर्वानाजहार रजिः प्रभुः । त॑ तथा तु राज तत्र देवः सह शतक्तुः ८६

English

In this manner, the lofty-minded Jamadagni, the fore¬ most among those who know Brahman, was born of Satya vatl, thanks to the semen virile of Aurva Rcika. The middle son was Sunahsepha and the youngest was Sunahpuccha.

अध्याय १७१

श्लोक 6

अवस्थां तस्य ते दृष्ट्वा विषादमगमन्परम् ।असहित्वा तु तद्दुःखं सर्वे ते मनसा द्विजाः

avasthāṃ tasya te dṛṣṭvā viṣādamagamanparam / asahitvā tu tadduḥkhaṃ sarve te manasā dvijāḥ

हिन्दी अर्थ

रजिपुत्रो5हमित्युक्त्वा पुनरेजाब्वीदहचः । इन्द्रोडसि राजन्देवानां सर्वेषां नातन्र संशयः । स तु शक्रबचः भ्रुत्वा वच्चितस्तेन मायया । तथेत्येवाब्रवीद्राजा प्रीयमाण: शतक़्तुम्

English

The pious-souled Visvamitra is remembered by the name Visvaratha also. By the favour of Bhrgu, he was born of Kau£ika, as the perpetuator of the race of Kausika.

अध्याय १७१

श्लोक 7

पृच्छयतां यदि मन्येत राजानं भस्मसात्कुरु ।तेषां तद्वचनं श्रुत्वा वाक्यं नारायणो ऽब्रवीत्

pṛcchayatāṃ yadi manyeta rājānaṃ bhasmasātkuru / teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā vākyaṃ nārāyaṇo 'bravīt

हिन्दी अर्थ

ताध्मस्तु देवसदुशे दिवं प्राप्त महीपतो । दायाद्यमिन्द्रादाजहू रुराचारं तनया रजेः ८६ तानि पुत्रशतान्यस्थ तच्च स्थान शचीपतेः । समक्रामन्त बहुधा स्वर्गलोक त्रिविष्टपम् (१६० ततः काले बहुतिये समतीते महाबलः । हतराज्यो5ब्रवोच्छ क्रो हृतभागो बृहस्पतिम् .. ७६१

English

Some other families of the Brahmarsi Kausika, the holy descendant of Pururavas are: Sosrumas and Saindhava-

अध्याय १७१

श्लोक 8

मयि जीवति मद्भ्राता ह्यवस्थामीदृशीं गतः ।धिग् जीवितं च मे किंतु तपसो विद्यते फलम्

mayi jīvati madbhrātā hyavasthāmīdṛśīṃ gataḥ / dhig jīvitaṃ ca me kiṃtu tapaso vidyate phalam

हिन्दी अर्थ

दानथों ने कद्दा--हम लोगों के इन्द्र प्रह्ाद हैं, उन्हीं के लिये विजय की आकांक्षा हम सबों को है, पर है साजन् ! देवता द्वारा प्रेरित इस प्रतिज्ञा में हम सभी सहमत हैं। दानवों की यह बात सुनकर महाराज रजि स्वीकारोक्ति दे ही रहे थे कि देवतागण भी बोल उठे उन लोगों ने भौ यह निमंत्रण दिया कि आप दानवों को पराजित कर हम सब के इन्द्र हो सकते हैं ।८३-८४। देवताओं के इस निमंत्रण को स्वीकार कर रजि ने वज्जपाणि देधराज इन्द्र के देखते-देखते सभी दानवों का संहार कर डाला, इस प्रकार उस जितेन्द्रिय परम प्रभावशाली महाराज रजि ने देवताओं की विनष्ट राजलक्ष्मी क। समस्त दानवों का संहार कर उद्धार किया । उस युद्ध में विजय प्राप्त करनेवाले महाराज रजि से देवता ओं समेत शतक्रतु इन्द्र बोले, हे महाराज ! मैं आपका पुत्र हूं । पुनः इन्द्र ने कहा, राजन् आप समस्त देवताओं के इन्द्र हैं, इसमें सन्देह नहों ।

English

Astaka, born of Drsadvat!, was also Visvamitra's son. Astaka's sons (and descendants) constituting the Jahnu family have already been recounted by me.

अध्याय १७१

श्लोक 9

दृष्ट्वा शूलस्थितं ज्येष्ठं मन्मनो नु विदीर्यते ।परं किं तु करिष्यामि येन राष्ट्रं सराजकम्

dṛṣṭvā śūlasthitaṃ jyeṣṭhaṃ manmano nu vidīryate / paraṃ kiṃ tu kariṣyāmi yena rāṣṭraṃ sarājakam

हिन्दी अर्थ

हे शत्रविनाशक मैं इन्द्र आप के पुत्र के रूप में विख्यात हँगा ।५५-८७। शक्र की ऐसी बातें सुनकर ओर उसको माया से ठगे जाकर महराज रजि ने प्रसन्न होकर कहा कि अच्छी बात है। उस देवतुल्य महाराज रजि के स्वर्गंगामी हो जाने पर उनके पुत्रों ने इन्द्र से उनका सम्पूर्ण उत्तराधिकार छीन लिया। इस प्रकार इन्द्र के स्थान पर महाराज रजि के सौ पुत्रों ने अपना अधिकार जमा लिया, और अनेक प्रकार से एक ही साथ सारे

English

What are the characteristics of Dharma, penance and learning whereby Brahmana-hood was attained by Visvamitra and other kings?

अध्याय १७१

श्लोक 10

भस्मसाच्च करोम्यद्य भवद्भिः क्षम्यतामिह ।एवमुक्त्वा गृहीत्वासौ करस्थमभिमन्त्रयेत्

bhasmasācca karomyadya bhavadbhiḥ kṣamyatāmiha / evamuktvā gṛhītvāsau karasthamabhimantrayet

हिन्दी अर्थ

स्वर्ग शोक को आक्रान्त कर लिया ।८८-६०। बहुत दिवस बीत जाने पर महाबलशाली हतभाग्य इन्द्र, राज्य छीन लिये जाने पर बृहस्पति के समीप गये और बोले, ब्रह्मषि आप बैर के फल जितना बड़ा पुरोडाश (चरु) का बदरीफलमात्र बे पुरोडाशं विधत्स्व मे । ब्रह्म्ष येन तिष्ठेयं तेजसाइध्प्यायितस्ततः ६२ ब्रह्मन्कृशो5यं विमना हृतराज्यो हताशनः । हतौजा दुर्बलो मुढो रजिपुत्रेः प्रसोद से

English

The list of Gotras of Kaufika clan given in w. 91-97 is incomplete (dot ML P. A Study, p -409).

अध्याय १७१

श्लोक 11

क्रोधेन पश्यते यावत्तावद्धुंकारको ऽभवत् ।तेन हुङ्कारशब्देन ऋषयो विस्मितास्तदा

krodhena paśyate yāvattāvaddhuṃkārako 'bhavat / tena huṅkāraśabdena ṛṣayo vismitāstadā

हिन्दी अर्थ

यदेव चोदितः शुक्र त्वया स्यां पु्बंभेव हि। नाभविष्यत्त्वत्प्रियार्थ नाकतंव्यं ममानघ

English

Thus requested, he ( Sula ) spoke these meaningful words:

अध्याय १७१

श्लोक 12

माण्डव्यस्य समीपे तु ह्यपृच्छंस्ते द्विजोत्तमाः ।निवारयसि किं विप्र शापं नृपजिघांसनम्

māṇḍavyasya samīpe tu hyapṛcchaṃste dvijottamāḥ / nivārayasi kiṃ vipra śāpaṃ nṛpajighāṃsanam

हिन्दी अर्थ

प्रयतिष्यामि देवेन्द्र त्वद्धितार्थ महाद्यते । तथा भागं च राज्यं च अचिरात्प्रतिपत्स्यसे १६५ तथा शक्क गमिष्यामि मा भूत्ते विकक्‍लवं मनः । ततः कर्म चकारास्य तेज: संवर्धनं महत् ६६ तेषा च बुद्धिसंमोहमकरोद्बुद्धिसत्तमः । ते यदा ससुता मुढा रागोन्मत्ता विर्धापणः ३६७ ब्रह्मद्विषश्च संवत्ता हतवीयंपराक्रमा: । ततो लेमे सुरश्वय॑मैच्धस्थानं तथोत्तमम् ॥€८ अंश मेरे लिये बनाइये, जिससे टिक सकू, उसी के तेज से मेरी सन्तुष्टि हो सकेगी। ब्रह्मत् ! क्‍योंकि इस समय मेरी स्थिति बहुत शोचनीय हो गई है, मैं बहुत दुबंल हो बया हूं, मेरा मत नहीं लगता, मेरा राज्य-पाठ छीन लिया गया है, भोजन भी छीन लिया गया है मेरी सारी शक्ति नष्ट हो गई है, शरीर भी दुबंल हो गया है, मेरी बुद्धि भी मारी गयी है, रजि के पुत्रों से हमारी रक्षा कीजिये

English

A sinful soul, a base man, may give charitable gifts to Brahmanas after proclaiming his intention to perform righteous deeds to the people out of hypocrisy. An uncontrol¬ led man overwhelmed by passion and delusion may perform severe Japas and in the end may give charitable gifts for the purpose of sanctifying himslf. But these charitable gifts offered by him do not yield fruits. The charitable gifts of a wicked- souled man indulging in violence, do not stay (i.e. do not yield fruits) even if he engaged himself in holy rites. Similarly the Danas offered by one who has amassed wealth by painful

अध्याय १७१

श्लोक 13

अपापस्य तु येनेह कृतमस्य जिघांसनम् ।ऋषीणां वचनं श्रुत्वा कृच्छ्रान् माण्डव्यको ऽब्रवीत्

apāpasya tu yeneha kṛtamasya jighāṃsanam / ṛṣīṇāṃ vacanaṃ śrutvā kṛcchrān māṇḍavyako 'bravīt

हिन्दी अर्थ

बहस्पति ने कहा--शक्र ! यदि तुम पहले ही मुझसे अपनी स्थिति बतलाये होते तो तुम्हारी यह स्थिति न होती, तुम्हारा कुछ ,भी अनिष्ठ न होता, निष्पाप तुम्हारे कल्याण के लिए मैं कुछ भी अकर्त्तव्य नहीं समझता अर्थात् तुम्हारे लिए सब कर सकता हूं। है महाकान्तिशालिन ! देवराज तुम्हारे लिए मैं वही प्रयत्न करूँग्रा, जिससे तुम्हारा अंश और राज्य तुम्हें पुनः शीघ्र ही वापस मिल जाय ।: ४-६५।

English

Riches acquired by just (proper) means must be gifted to pious, deserving persons. If one performs; Tajnas and makes charitable gifts without harbouring any specific desire in his mind, he attains the fruits of that Dana. His; Dana results in happiness. One attains enjoyment through Dana and goes

अध्याय १७१

श्लोक 14

अभिवन्दामि वो मूर्ध्ना स्वागतं ऋषयः सदा ।अर्घ्यसन्मानपूजार्हाः सर्वे ऽत्रोपविशन्तु ते

abhivandāmi vo mūrdhnā svāgataṃ ṛṣayaḥ sadā / arghyasanmānapūjārhāḥ sarve 'tropaviśantu te

हिन्दी अर्थ

हे शक्र ! मैं बसा करने जा रहा हूँ, तुम मन की विकलता छोड़ दो ।? इस प्रकार इन्द्र को सानन्‍्त्वना देकर बृहस्पति ने इन्द्र की प्रताप-बद्धि के लिए महान् अनुष्ठान किया परम बुद्धिमान् बृहस्पति ने रजि के पुत्रों की बुद्धि को मोहित कर दिया। जिससे उन सब की मति मारी गईं, पुत्रों के समेत वे विधरमम में निरत हो गये, परिणामत: रोग्रग्रस्त एवं उन्मत्त से हो गये । ब्राह्मणों से द्वेघ करने लगे, सब के पराक्रम एवं बल का विनाह्ष हो गया । ऐसी दक्शा में, जब कि वे सब के सब काम क्रोध मोह में लिप्त हो गये, इन्द्र ने उन राजि पुत्रों का संहार कर डाला, और अपना उत्तम देवताओं का स्वामित्व पद पुत्र: प्राप्त किया जो व्यक्ति शतकतु इस्द्र

English

Th in; an evidence of social mobility in ancient India.

अध्याय १७१

श्लोक 15

निविष्टैकाग्रमनसा सर्वान्माण्डव्यको ऽब्रवीत्

niviṣṭaikāgramanasā sarvānmāṇḍavyako 'bravīt

हिन्दी अर्थ

हंत्वा रजिसुतान्सबन्कासक्रोधपरायणान् । य इ॒दं पावन स्थान प्रतिष्ठान शतक्तोः ॥

English

Bhargavyoma in Bd. P.

अध्याय १७१

श्लोक 16

प्राप्तं दुःखं मया घोरं पूर्वजन्मार्जितं फलम् ।मा विषादं कुरुध्वं भोः कृतं पापं तु भुज्यते

prāptaṃ duḥkhaṃ mayā ghoraṃ pūrvajanmārjitaṃ phalam / mā viṣādaṃ kurudhvaṃ bhoḥ kṛtaṃ pāpaṃ tu bhujyate

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोवत्ते रजियुद्धं नाम द्विनवतितमोथ्ध्याय: ॥ मरुत्तन कथ्थ कन्या राज्ञे सा महात्मना । किवीर्यश्व महात्मानो जाता सरुत्तकन्यकाः

English

Sutahotra's successors were three extremely righteous ones, viz. KaSa, Sala and lord Gjrtsamada.

अध्याय १७१

श्लोक 17

ऋषय ऊचुः ।केन कर्मविपाकेन इह जात्यन्तरं व्रजेत् ।दानधर्मफलेनैव केन स्वर्गं च गच्छति

ṛṣaya ūcuḥ / kena karmavipākena iha jātyantaraṃ vrajet / dānadharmaphalenaiva kena svargaṃ ca gacchati

हिन्दी अर्थ

आहवन्तं मरत्सोममन्नकासः प्रजेश्वरम् । मासि मासि महातेजाः षष्टिसंवत्सरास्नृपः

English

Sunaka was the son of Grtsamada and his son was Saunaka. In his race Brahmanas, Vaisyas and Sudras were born as a result of their diverse Karmans. O Brahmana, Salas son was Arsti$ena and Caranta was liis son.

अध्याय १७१

श्लोक 18

माण्डव्य उवाच: अदत्तदाना जायन्ते परभाग्योपजीविनः ।न स्नानं न जपो होमो नातिथ्यं न सुरार्चनम्

māṇḍavya uvāca: adattadānā jāyante parabhāgyopajīvinaḥ / na snānaṃ na japo homo nātithyaṃ na surārcanam

हिन्दी अर्थ

की पुनः इन्द्र पद प्राप्त का एवं महाराज रजि का यह परम पवित्र वृत्तान्त पढ़ता या सुनता है, वह कभी दुर्गति में नहीं पड़ता ।६ ६-६६। ऋषियों ने पूछा;--सूत जी ! महान् पराक्रमी मरुत्त नें राजा को किस प्रकार अपनी कन्या प्रदान की थी? और मरुत्त की कन्या से उत्पस्न होने वाले वे महान् बलशाली पुत्र कितने पराक्रमी

English

The Saunakas and the Arstisenas were Brahmanas endowed with qualities characteristic of Ksatriyas. Kasa's sons were Kasaya, Rasta and Dirghatapas.

अध्याय १७१

श्लोक 19

न पर्वणि पितृश्राद्धं न दानं द्विजसत्तमाः ।व्रजन्ति नरके घोरे यान्ति ते त्वन्त्यजां गतिम्

na parvaṇi pitṛśrāddhaṃ na dānaṃ dvijasattamāḥ / vrajanti narake ghore yānti te tvantyajāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

सूत बोलेः--महान् तेजस्वी राजा ने अन्न की कामना से साठ वर्षों तक प्रत्येक मास में प्रजापति

English

Dharma was the son of Dirghatapas. The scholarly Dhanvantari was his son. He was of great brilliance due to his

अध्याय १७१

श्लोक 20

पुनर्दरिद्राः पुनरेव पापाः पापप्रभावान्नरके वसन्ति ।तेनैव संसरिणि मर्त्यलोके जीवादिभूते कृमयः पतङ्गाः

punardaridrāḥ punareva pāpāḥ pāpaprabhāvānnarake vasanti / tenaiva saṃsariṇi martyaloke jīvādibhūte kṛmayaḥ pataṅgāḥ

हिन्दी अर्थ

तेन ते मरुतस्तस्य मरुत्सोमेन तोषिताः। अक्षय्यान्नं ददुः प्रीताः स्वकामपरिच्छदम् ३ अन्न तस्थ सकृत्पक्वमहोरात्रे न क्षीयते । केटिशों दीयभानं च सुययस्योदयनादपि ३४ मिन्रज्योतिस्तु कन्यायां मरुत्तस्य च धीमतः । तस्माज्जाता महासत्तवा धर्मज्ञा मोक्षद्शिनः १३४. संन्‍्यस्य गह॒धर्माणि वेराग्यं समुपस्थिताः । यतिधरमंमवाप्येह ब्रह्मभुयाय ते गताः ६ अनपायस्ततो जातस्तदा धर्मप्रदत्तवान् (? )। क्षत्रधमंस्ततो जातः प्रतिपक्षों महातपा: १७

English

This Chapter corresponds to Ch. 2.3.67 in Bd. P. The references are to verses of the chapter in Bd. P.

अध्याय १७१

श्लोक 21

ये स्नानशीला द्विजदेवभक्ता जितेन्द्रिया जीवदयानुशीलाः ।ते देवलोकेषु वसन्ति हृष्टा ये धर्मशीला जितमानरोषाः

ye snānaśīlā dvijadevabhaktā jitendriyā jīvadayānuśīlāḥ / te devalokeṣu vasanti hṛṣṭā ye dharmaśīlā jitamānaroṣāḥ

हिन्दी अर्थ

विजयस्य जय: पुत्रस्तस्य हय॑द्वतः स्मृतः । हयेह्तस्ततो राजा सहदेवः प्रताषवान् ६ सह॒देवस्य धर्मात्मा अदीन इति विश्वुतः। अदीनस्य जयत्सेनस्तस्य पुत्नोध्य संकृतिः १० संस्कृतेरपि धर्मात्मा कृतधर्मा महायशा: इत्येते क्षत्रधर्माणो नहुषस्य निबोधत ११

English

As stated at the end of the last chapter, this chapter describes the race of Ayu who ruled at Kasi. Dhanvantari, the famous physician-king, the founder of the systematic science of Ayurveda was bom in Ayu's lineage. Hence the title specifically refers to him in preference to his forebears.

अध्याय १७१

श्लोक 22

विद्याविनीता न परोपतापिनः स्वदारतुष्टाः परदारवर्जिताः ।तेषां न लोके भयमस्ति किंचित्स्वभावशुद्धा गतकल्मषा हि ते

vidyāvinītā na paropatāpinaḥ svadāratuṣṭāḥ paradāravarjitāḥ / teṣāṃ na loke bhayamasti kiṃcitsvabhāvaśuddhā gatakalmaṣā hi te

हिन्दी अर्थ

मरुत एवं सोम का यज्ञ किया था। उसके उस मरुत्सोम पन्न से परम प्रसन्‍्त होकर मरुतों ने अक्षय अन्न प्रदात किये, जो सभी मनोरथों को पूर्ण करने वाले थे ।२-३॥। एक बार का पकाया गया उसका अन्न दित रात भर में भी नष्ट नहीं होता था। और सुयोदिय से करोड़ों बार दिये जाने पर भी वह नहीं चुकता था । परम बुद्धिमान मरुत्त की कन्या में मित्रज्योति का जन्म हुआ उससे महान् पराक्रमी मोक्षदर्शी, धर्मज्ञ पुत्रों की उत्पत्ति हुई, जो गृहस्थाश्रम क्ष्मं का परित्याग कर वराग्य पथ के अनुगामी हुए, और अस्त में संन्‍्यासियों का घर्मं अपनाकर ब्रह्मत्व -को प्राप्त हुए ।४-६। तत्पश्चात् अनपाय की उत्पति हुई, जिससे घ्मंप्रदत्तवानू (९) की उत्पत्ति हुई, उससे क्षत्रधर्म की उत्पत्ति हुई क्षत्र धर्म से महान् तपस्वी प्रतिपक्ष की उत्पत्ति हुई । प्रतिपक्ष के पुत्र संजय नाम से विख्यात हुए। संजय के पुत्र जय हुए और जय से विजय नामक पुत्र की

English

Ksatravrddha in Bd. P. A line is missing here. Bd. P. supplies the names of the remaining three sons, viz. Rambha, Raji and Anenas (Bd.P. Op. Cit. v. 2).

अध्याय १७१

श्लोक 23

ऋषय ऊचुः ।पूर्वजन्मनि विप्रेन्द्र किं त्वया दुष्कृतं कृतम् ।येन कष्टमिदं प्राप्तं सन्धानं शूलगर्हितम्

ṛṣaya ūcuḥ / pūrvajanmani viprendra kiṃ tvayā duṣkṛtaṃ kṛtam / yena kaṣṭamidaṃ prāptaṃ sandhānaṃ śūlagarhitam

हिन्दी अर्थ

उत्पत्ति हुई । विजय का पुत्र भी जय नाम से विर्यात हुआ, जय का पुत्र हयंद्गवत नाम से प्रसिद्ध हुभा । हयंद्त के उपरान्त परम प्रतापशालो राजा सहदेव हुये सहदेव के पुत्र धर्मात्मा अदीन नाम से प्रसिद्ध हुए । अदीन के पुत्र जयत्सेन के पुत्र हुए, जयत्सेन के पुत्र संकृति हुए । संकृत के पुत्र महान् यहास्व्री एवं धर्मात्मा सजा कृतधर्मा ह ये । ये सब राजा गण क्षत्रिय ग्रुण कम॑ स्वभाववाले थे। अब इसके उपरन्त राजा नहुष के वंश

English

How was Dhanvantari, a god, born among human

अध्याय १७१

श्लोक 24

शूलस्थं त्वां समालक्ष्य ह्यागताः सर्व एव हि ।जीवन्तं त्वां प्रपश्याम त्वन्तरन्नवतारयन् ।रुजासंतापजं दुःखं सोढ्वापि त्वमवेदनः

śūlasthaṃ tvāṃ samālakṣya hyāgatāḥ sarva eva hi / jīvantaṃ tvāṃ prapaśyāma tvantarannavatārayan / rujāsaṃtāpajaṃ duḥkhaṃ soḍhvāpi tvamavedanaḥ

हिन्दी अर्थ

का वर्णन सुनिये ।७-११। राजा नहुष के इन्द्र के समान तेजस्वी छः पुत्र उत्पन्न हुए, वे महान् तेजस्वी नहुष पुत्र पितरों की कन्या विरजा में उत्पन्न हुये थे । उनके नाम थे यति, ययाति, संयाति, आयति, पत्च (?) दय (१) । इन सब पुत्रों में पति सबसे बड़े थे, ययाति उनसे छोटे थे यति ने राजा काकुत्स्थ की कन्या मो को पत्नी काकुत्स्थकन्यां गां नाम लेभे पत्नीं यतिस्तदा । संयातिमक्षिमास्थाय ब्रह्मभुतोइ्भवन्धुनि:ः

English

O Brahmanas, may the origin of Dhanvantari be heard.

अध्याय १७१

श्लोक 25

माण्डव्य उवाच: स्वयमेव कृतं कर्म स्वयमेवोपभुज्यते ।सुकृतं दुष्कृतं पूर्वे नान्ये भुञ्जन्ति कर्हिचित्

māṇḍavya uvāca: svayameva kṛtaṃ karma svayamevopabhujyate / sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ pūrve nānye bhuñjanti karhicit

हिन्दी अर्थ

तेषां मध्ये तु पश्चानां ययातिः पृथिवीपतिः । देवयानीसुशनसः सुतां भार्यासवाप ह् १५ शर्भिष्ठामासुरीं चेव तनयां वृषपर्बंण:। अजीजनन्महावीर्यान्सुतान्देवसुतोपमान् १६ दुह्मंं चानुं च पुरं च शर्मिष्ठा वार्षप्वणी । अजीजनन्महावोर्यान्सुतान्देवसुतोपमान्

English

He was born prior to everyone. 1 He was enveloped in a halo of glory all round. On seeing him with perfectly shaped limbs, (gods) stood surprised and said, "You are Aja (the unborn) ". Heivie he is remembered as Aja.

अध्याय १७१

श्लोक 26

यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।तथा पूर्वकृतं कर्म कर्तारम् उपगच्छति

yathā dhenusahasreṣu vatso vindati mātaram / tathā pūrvakṛtaṃ karma kartāram upagacchati

हिन्दी अर्थ

रथं तस्मे ददो रुद्रः प्रीतः परमभास्वरम् । असड्भं काचचन दिव्यमक्षयों च महेघुधी १८ ययातिर्युधि दुर्ध्षों देवदानवमानवेः । पौरवाणां नृषाणां श्र सर्वेधां सोइभवद्रथः २०

English

Aja spoke to Visnu: "O lord, most excellent of gods, I am your son. Please assign me my share (in

अध्याय १७१

श्लोक 27

न माता न पिता भ्राता न भार्या न सुताः सुहृत् ।न कस्य कर्मणां लेपः स्वयमेवोपभुज्यते

na mātā na pitā bhrātā na bhāryā na sutāḥ suhṛt / na kasya karmaṇāṃ lepaḥ svayamevopabhujyate

हिन्दी अर्थ

गाग्यंस्थ हि सुतं बालः स॒ राजा जनमेजय: । दुर्बद्धिहिंसपामास लोहगन्ध नराधिपम्

English

"O lord, if you are satisfied, be pleased to be born as my righteous son." After agreeing to it saying "So be it he vanished there itself.

अध्याय १७१

श्लोक 28

श्रूयतां मम वाक्यं च भवद्भिः पृच्छितो ह्यहम् ।पूर्वे वयसि भो विप्रा मलस्नानकृतक्षणः

śrūyatāṃ mama vākyaṃ ca bhavadbhiḥ pṛcchito hyaham / pūrve vayasi bho viprā malasnānakṛtakṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

रूप में बरण किया था संयाति ने मोक्ष मार्ग का आश्रय लेकर मुन्यों के समान ब्रह्म पद की प्राप्ति की इन पाँचों भाइयों में यथाति प्रथ्वी पति (राजा) हुआ उसने शुक्राचाये की देवयानी नामक कन्या से विवाह किया । असुरराज वषपर्वा की शभिष्ठा नामक कन्या को भी उसने पत्नी रूप में वरण किया था। देवयानी' ने घदू और त्वंस नामक दो प्रश्न उत्पन्न किये। बषपर्वा की पूत्री शामिष्ठा ने, द्ृह्मू, अनु और पुरु नामक तौम पुत्र उत्पन्न किये। इस प्रकार राजा ययाति ने इन देवताओं के समान सुन्दर एवं पराक्रमशाली,

English

God Dhanvantari was born in his house. The great king, king of Ka$I became the destroyer of all ailments.

अध्याय १७१

श्लोक 29

अज्ञानाद्बालभावेन यूका कण्टे ऽधिरोपिता ।तैलाभ्यक्तशिरोगात्रे मया यूका घृता न हि

ajñānādbālabhāvena yūkā kaṇṭe 'dhiropitā / tailābhyaktaśirogātre mayā yūkā ghṛtā na hi

हिन्दी अर्थ

महाबलवान् पत्रों को उत्पन्न किया ।१५-१६। महादेव जी ने प्रसन्न होकर उस राजा ययाति को परम सुन्दर, चमकनेवाला, सवर्ण निर्मित एक दिव्य रथ प्रदान किया था, इसके अतिरिक्त दो कभी नष्ट न होनेवाले तरकश भी दिये थे। उस सुन्दर “रथ में मन के समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। उसी रथ षर चढ़कर शुक्र की पुत्री देवगनी को साथ लेकर राजा ययाति ने समस्त प्रृथ्वी को जीता था। वह राजा ययाति युद्षभूमि में

English

Sage Bharadvaja created the science of Ayurveda along with its therapeutics. 1 The king divided it into eight parts and taught them to his disciples.

अध्याय १७१

श्लोक 30

कङ्कतीं रोप्य केशेषु सासा कण्टे ऽधिरोपिता ।तेषु पापं कृतं सद्यः फलमेतन्ममाभवत्

kaṅkatīṃ ropya keśeṣu sāsā kaṇṭe 'dhiropitā / teṣu pāpaṃ kṛtaṃ sadyaḥ phalametanmamābhavat

हिन्दी अर्थ

वह महान् रथ व्यवहार में लाया जाता था जब क्रुवंश के राजा परीक्षित के पुत्र जनमेजय शासनारूढ़ हुए, उस समय भी वह सन्दर रथ उनके अधीन धा । बुद्धिमान् गाग्यं के शाप से वह रथ नष्ट हुआ ।१७-२१। राजा जनमेजय ने कुबुद्धि में आकर गाग्यं के पुत्र का संहार कर दिया था, जिससे फ्रुंद्ध होकर उन्होंने नरपति जममेजय को लोहगंध, (लोहे के समान दुर्गन्‍्धवाला ) होने का अभिशाप दे दिया था !२२। राजपिं जनमेजय लोहगंध होने पर इधर उधर बहुत दौड़े पर कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिली, ग्राम-निवासियों ने भी उनका परित्याग कर

English

Dhanvantari's son was famous by the name Ketuman. Ketuman's son was the powerful king Bhimaratha. He was famous by the name Divodasa 2 and he was the king of Varanasi.

अध्याय १७१

श्लोक 31

किंचित्कालं क्षपित्वाहं प्राप्स्ये मोक्षं निरामयम् ।भवन्तस्त्विह सन्तापं मां कुरुध्वं महर्षयः

kiṃcitkālaṃ kṣapitvāhaṃ prāpsye mokṣaṃ nirāmayam / bhavantastviha santāpaṃ māṃ kurudhvaṃ maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्रोतो नाम विद्यातो योइसौ सुनिरुदारधीः । याजयामास चेन्द्रोतः शौनको जनमेजयम् ॥। द अश्वमेधेन राजानं पावनार्थ द्विजोत्तमः

English

In the meanwhile, the city of Varanasi had become desolate and a Raksasa named Ksemaka occupied it.

अध्याय १७१

श्लोक 32

इमाम् अवस्थां भुक्त्वाहं कंचिच्छपे न चोच्चरे ।अहनि कतिचिच्छूले क्षपयिष्यामि किल्बिषम्

imām avasthāṃ bhuktvāhaṃ kaṃcicchape na coccare / ahani katicicchūle kṣapayiṣyāmi kilbiṣam

हिन्दी अर्थ

प्रददो वासुदेवाय प्रीत्या कौरवनन्दनः ३२७ जरावली च मां तात पलितानि च पर्यगुः। काव्यस्थयोशनसः शापात्न च तृप्तो5स्मि यौवने

English

Though our text does not mention it, Bd. 3.67. 23-24 informs us that Dhanvantari learnt Ayurveda (ihz science of medicine) along with its therapeutics from Bharadvaja. Dhanvantari divided it into eight sections and taught them to different disciples.

अध्याय १७१

श्लोक 33

प्राक्तनं कर्म भुञ्जामि यन्मया संचितं द्विजाः ।क्षन्तव्यमस्य राज्ञो ऽथ कोपश्चैव विसर्ज्यताम्

prāktanaṃ karma bhuñjāmi yanmayā saṃcitaṃ dvijāḥ / kṣantavyamasya rājño 'tha kopaścaiva visarjyatām

हिन्दी अर्थ

त्वं यदो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह। जरां मे प्रतियृह्लीष्व त॑ यदृः प्रत्युवाच ह

English

He is regarded as the contemporary of Dasaratha of the Iksvaku dynasty of Ayodhya. It was during his reign that god Siva occupied it by first making it desolate through crafty machination of one of his chief Ganas (aptly called demon) Ksemaka. To get a flourishing capital city vacated for one's honey-moon in the manner described later (w. 36-53) is not creditable to a great god ie. Siva.

अध्याय १७१

श्लोक 34

श्रुत्वा तु तस्य तद्वाक्यं माण्डव्यस्य महर्षयः ।प्रहर्षमतुलं लब्ध्वा साधु साध्वित्यपूजयन्

śrutvā tu tasya tadvākyaṃ māṇḍavyasya maharṣayaḥ / praharṣamatulaṃ labdhvā sādhu sādhvityapūjayan

हिन्दी अर्थ

दिया था इस प्रकार अत्यन्त दःखत हो जाने पर भी उनको जब कहीं शान्ति का स्थान नहीं मिल सका तो अनमन्यौपाय एवं परम दुःखी होकर शाप देनेवाले ऋषि की शरण में गये ।२३-२४। पर उदार बुद्धिवाले शुनक गोत्रोत्पन्न इन्द्रोत नामक परम विख्यात मुनि ने राजा जनमेजय को इस घोर पाप से छुड़ाने के लिये यज्ञ कराया। इस प्रकार ट्विजश्रेष्ठ इच्दोत ने अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान कराया, तब उन्हीं के निवास में राजा का लोहगग्धत्व दूर हुआ । वहू दिव्य रथ उसके अधिकार से (?) चेदि देशाधिपति राजा वस् के अधीन हुआ वसुसे इन्द्र ने प्राध्त किया, इन्द्र मे स्तुष्ट होकर राजा बुृह॒ंद्रथ को दिया । ब्रहद्रथ' को मार कर उसे जरासंघ ने छीना, इसके उपरान्त जरासंब से उस दिव्य रथ को भीम ने प्राप्त किया। कौरवनन्दन भीम ने प्रसन्नता पूर्वक उस रथ को वासुदेव को समर्पित किया

English

Formerly that city had been cursed by the noble-souled Nikumbha, 'The city (of Varanasi) will be desolate for a thousand years'. He had repeated the curse many times.

अध्याय १७१

श्लोक 35

नारायण उवाच: इदं जलं मन्त्रपूतं कस्मिन्स्थाने क्षिपाम्यहम् ।येन राजा भवेद्भस्म सराष्ट्रः सपुरोहितः

nārāyaṇa uvāca: idaṃ jalaṃ mantrapūtaṃ kasminsthāne kṣipāmyaham / yena rājā bhavedbhasma sarāṣṭraḥ sapurohitaḥ

हिन्दी अर्थ

नहुषपुत्र राजषि ययाति जब बहुत वृद्ध हो गये तब अपने सब से बड़े और योग्य पुत्र यदु से यह बात बोले, पुत्र ! यदु शुक्राचार्य के शाप के कारण वृ॒द्धता, चमड़े कौ सिकुड़न और पलितादि ने मुझे चारों ओर से घेर लिया, किन्तु मैं अभी तक यौवनावस्था से सस्तुष्ट नहीं हों सका। हुम मेरी इस वद्धता और पाप कौ ग्रहण कर लो।” ययाति की ऐसी बातें सुनकर यदु ने उत्तर दिया तात ! मैंने अनन्तकाल तक

English

As soon as the city was cursed, Divodasa the king, founded a beautiful city on the banks of Gomatl, near the extremities of his realm.

अध्याय १७१

श्लोक 36

माण्डव्य उवाच: इदं जलं च रक्षस्व कालकूटविषोपमम् ।समुद्रे क्षिपयिष्यामि देवकार्यं समुत्थितम्

māṇḍavya uvāca: idaṃ jalaṃ ca rakṣasva kālakūṭaviṣopamam / samudre kṣipayiṣyāmi devakāryaṃ samutthitam

हिन्दी अर्थ

१. यहाँ पर ग्रन्थ का मूल पाठ अ्रष्ट मालूम पड़ता है। पूर्व कथा से पर कथा की कोई संग्रति नहीं मिलती । जनभेजय भीम के बाद हुये थे । फिर जनमेजय के बाद भीम को रथ की प्राप्ति किस प्रकार सम्भव जराया बहवो दोषा यानभोजनकारिणः। तस्माज्जरां न ते राजन्प्रहीतुमहमुत्सहे ३२

English

Why did Nikumbha curse Varanasi in the days of yore? Nikumbha was a righteous soul. Why did he curse the holy centre of Siddhas?

अध्याय १७१

श्लोक 37

अथ ते मुनयः सर्वे माण्डव्यं प्रणिपत्य च ।आमन्त्रयित्वा हर्षाच्च कश्यपाद्या गृहान्ययुः

atha te munayaḥ sarve māṇḍavyaṃ praṇipatya ca / āmantrayitvā harṣācca kaśyapādyā gṛhānyayuḥ

हिन्दी अर्थ

अशक्तः कार्यकरणे परिभृतस्तु यौवने । महोषभीतिभिश्चव तां जरां नाभिकासये ३४ सन्ति ते बहुबः पुत्रा मत्तः प्रियतरा नृप । प्रतिगृहन्तु धर्मज्ञ पुत्रमन्‍्यं वृणीष्व वे (३५ स एवमुक्तो यदुना तीवरकोपसमन्वितः । उबाच बदतां श्रेष्ठो ज्येष्ठ त॑ गहू यन्सुतम् ३६ आश्रम: कश्न्व वाउन्यो5स्ति को वा धर्मविधिस्तव मामनादृत्य दुर्बुद्धे यदात्थ नवदेशिक

English

After gaining the city, King Divodasa, the saintly king of great splendour lived in that flourishing city.

अध्याय १७१

श्लोक 38

गच्छमानास्तु ते चोक्ताः पञ्चमे ऽहनि तापसाः ।आगन्तव्यं भवद्भिश्च मत्सकाशं प्रतिज्ञया

gacchamānāstu te coktāḥ pañcame 'hani tāpasāḥ / āgantavyaṃ bhavadbhiśca matsakāśaṃ pratijñayā

हिन्दी अर्थ

एवमुकत्वा यदुं राजा शशापेनं स मन्युमान् । यस्त्वं मे हृदयाज्जातो बयः स्वं न प्रयच्छसि तस्मान्न राजभाग्मृढ प्रजा ते वे भविष्यति । तुंसो प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह ॥३ ६

English

In the meantime, Mahesvara who had married (Uma) stayed near the Devas* and desired to do what was pleasing to the goddess.

अध्याय १७१

श्लोक 39

तथेति ते प्रतिज्ञाय नारदाद्या अदर्शनम् ।गतेषु विप्रमुख्येषु शाण्डिली च तपोधना

tatheti te pratijñāya nāradādyā adarśanam / gateṣu vipramukhyeṣu śāṇḍilī ca tapodhanā

हिन्दी अर्थ

वद्धता ग्रहण करने में मै अधक्त हें ।२८-३१। राजन् ! इस वृद्धता में भोजन पान आदि के बहुत बड़े दोष हो जाते हैं, अर्थात् बुढ़ापे में ठीक से अन्न नहीं पचता, पानी आदि भी बहुत सवाच कर (जाँच कर) पीना पड़ता है, खान-पान फे थोड़े-से ही असंयम से बड़ा कष्ठ मिलता है। इसलिए भी आपको इस बृंद्धता को अंग्रीकार करने का उत्साह मुझमें नहीं हो रहा है । दवेत बाल धारण करनैवालों फो यह वद्धता एकदम शिथिल कर

English

His attendants and the saints assuming various forms continued to delight the great godddess by means of their diverse forms mentioned before.

अध्याय १७१

श्लोक 40

द्वितीये ऽह्नि समायाता न तु बुद्ध्वाथ तं ऋषिम् ।भर्तारं शिरसा धार्य रात्रौ पर्यटते स्म सा

dvitīye 'hni samāyātā na tu buddhvātha taṃ ṛṣim / bhartāraṃ śirasā dhārya rātrau paryaṭate sma sā

हिन्दी अर्थ

देती है । शरीर में सिकुड़न आ जाती है, देखने में चेहरा भद्दा हो जाता है, प्रकृति दुबंल हो जाती है, कोई कायं करमे की भी शक्ति महीं रह जाती, यौवन के सुखों से वंचित एवं पराभूत होना पड़ता हैं। इस प्रकार की अनैक महान् विपत्तियों से घिरी हुई उस वृद्धता को मै अंगीकार नहीं करूँगा ।३२-३४ नृपति ! आपके अन्य पुत्र भी हैं, जों मुझसे भी अधिकु प्रिय हैं, है धर्म ! आप उन्हीं से इसका प्रस्ताव कीजिये, अन्य पुत्रों से ही इसको याचना करना उचित है ।” यदू के ऐसा कहने पर बोलने वालों में प्रवीण राजा ययाति परम ऋ्रंद्ध होकर अपने बड़े पुत्र यदु की भत्संना करते हुए बोले । दुर्बुद्ध ! तुम्हारा कौन-सा आश्रम है ? गृहस्थाश्रम के अतिरिक्त क्‍या तुम्हारा कोई अन्य आश्रम धर्म है ? तुम्हारे धर्म की विधि कौन-सी है ? नये ढंग से उपदेश

English

(She said to Uma) "Your husband Mahesvara is carrying on ill-mannered activities in (my) presence. O sinless girl, he is by all means very indigent. Without wearying him¬ self out, he sports and dallies".

अध्याय १७१

श्लोक 41

न दृष्टः शूलके विप्रो भराक्रान्त्या युधिष्ठिर ।स्खलिता तस्य जानुभ्यां शूलस्थस्य पतिव्रता

na dṛṣṭaḥ śūlake vipro bharākrāntyā yudhiṣṭhira / skhalitā tasya jānubhyāṃ śūlasthasya pativratā

हिन्दी अर्थ

करनेवाले ! कुमति ! भेरा निरादर करके जिस घ॒र्म का तुम पालन कर रहे हो, वह कौन-सा धर्म आश्रम या विधि है ।१४-१७ इस प्रकार की क्रोध पूर्ण बातें कर परम क्रोध में भरे हुए राजा ययाति ने यदु को छाप दे दिया + 'जो तुम मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी मुझे अपनी यौवन अवस्था नहीं दे रहे हो, सो है मृढ़, तुम्हारी प्रजा और तुम कोई भी हमारे राज्य के उत्तराधिकारी न होगे ।” इस प्रकार शाप देकर राजा ययाति ने तुर्वेसु

English

On being thus taunted by her mother, she did not brook it as was but natural to women. After smiling (at the words of her mother) the goddess, the granter of boons, went

अध्याय १७१

श्लोक 42

सर्वाङ्गेषु व्यथा जाता तस्याः प्रस्खलनान् मुनेः ।ईदृशीं वर्तमानां च ह्यवस्थां पूर्वदैविकीम्

sarvāṅgeṣu vyathā jātā tasyāḥ praskhalanān muneḥ / īdṛśīṃ vartamānāṃ ca hyavasthāṃ pūrvadaivikīm

हिन्दी अर्थ

नामक अपने पुत्र से कहा, तुर्वसु ! मेरी वृद्धावस्था और मेरे पाप को तुम अंगीकार कर लो, पुत्र ! तुम्हारी यौवनावस्था से मैं विविध प्रकार के भोगों का उपभोग करना चाहता हूँ । एक सहख्र वर्ष बीतने पर तुम्हारी परेण गायुपुराणन्

English

With a dejected face the goddess spoke to Mahadeva.

अध्याय १७१

श्लोक 43

पुनः पापफलं किंचिद्धा कष्टं मम वर्तते ।व्यथितो ऽहं त्वया पापे किमर्थं सूनकर्मणि

punaḥ pāpaphalaṃ kiṃciddhā kaṣṭaṃ mama vartate / vyathito 'haṃ tvayā pāpe kimarthaṃ sūnakarmaṇi

हिन्दी अर्थ

स्व चेव प्रतिपत्स्यासि पाप्मानं जरया सह ४०

English

Thus requested, the great god, Mahesvara of great splendour, surveyed all the worlds. O excellent Bra a$as,

अध्याय १७१

श्लोक 44

स्वैरिणीं त्वां प्रपश्यामि राक्षसी तस्करी नु किम् ।एवमुक्त्वा क्षणं मोहात्क्रन्दमानो मुहुर्मुहुः

svairiṇīṃ tvāṃ prapaśyāmi rākṣasī taskarī nu kim / evamuktvā kṣaṇaṃ mohātkrandamāno muhurmuhuḥ

हिन्दी अर्थ

न कामये जरां तात कामभोगप्रणाशिनीम् । जराया बहुवो दोषाः पानभोजनकारिणः। यसत्व॑ में हृदयाज्जातो वयः स्वं न प्रयच्छसि । तस्मात्प्रजा समुच्छेदं तुबंसो तब यास्यति

English

Nikumbha then went to the city of Varanasi and revealed himself to a barber named Mankana in his dream and said, "O sinless one, I shall bring welfare unto you. Assign a place for me. Make an image of my form and place it at the outskirt of the city."

अध्याय १७१

श्लोक 45

तपस्विनो ऽथ ऋषयः सर्वे संत्रस्तमानसाः ।पश्यमाना मुनेः कष्टं पृच्छन्ते ते युधिष्ठिर

tapasvino 'tha ṛṣayaḥ sarve saṃtrastamānasāḥ / paśyamānā muneḥ kaṣṭaṃ pṛcchante te yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

असंकोर्णा च धर्मेण प्रतिलोमवरेषु च। पिशिताशिषु चान्येषु मुठ राजा भविष्यसि ॥॥४ ३ गुरुद्रप्रसकतेषु तियंग्योनिगतेषु वा। पशुधर्मेषु स्लेच्छेषु भविष्यसि न संशय:

English

O Brahmanas, the barber did everything m accordance with what he was told in dream. After getting the permission of the king, he did everything duly at the gate of the city.

अध्याय १७१

श्लोक 46

पर्यटसे किमर्थं त्वं निशीये वहनं नु किम् ।क्षिप्तं तु झोलिकाभारं किंवागमनकारणम् ।व्यथामुत्पाद्य ऋषये दुःखाद्दुःखविलासिनि

paryaṭase kimarthaṃ tvaṃ niśīye vahanaṃ nu kim / kṣiptaṃ tu jholikābhāraṃ kiṃvāgamanakāraṇam / vyathāmutpādya ṛṣaye duḥkhādduḥkhavilāsini

हिन्दी अर्थ

यौवनावस्था तुम्हें वापस कर दूँगा, और निश्चय ही उस समय मैं अपने पाप और वृद्धावस्था को ले लूँगा तुतखु ने कहाः--तात ! ऐच्छिकभोगों को नष्ट कुरनेवाली, विषयादि सुखों से वंचित करनेवाली तुम्हारी बृढ्धता को मैं पसन्द नहीं करु सकता । राजेन्द्र इस वृद्धता से तो भोजन पानादि में भी बड़ी भड़चर्ने पड॒ती हैं। इसलिए उस वद्धता के ग्रहण करने का उत्साह मुझमें नहीं है

English

He used to grant thousands of boons to the people of the city, such as sons, gold, longevity and similar desires.

अध्याय १७१

श्लोक 47

शाण्डिल्युवाच: नासुरीं न च गन्धर्वीं न पिशाचीं न राक्षसीम् ।पतिव्रतां तु मां सर्वे जानन्तु तपसि स्थिताम्

śāṇḍilyuvāca: nāsurīṃ na ca gandharvīṃ na piśācīṃ na rākṣasīm / pativratāṃ tu māṃ sarve jānantu tapasi sthitām

हिन्दी अर्थ

ययाति बोलेः--तुवंसो ! मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी तुम मेरे लिए अपनी अवस्था नहीं दे रहे हो, अतः तुम्हारी सन्‍्ततियाँ नाश को प्राप्त होंगी प्रतिलोम रीति से वे संकरवर्ण की हो जाय॑ंगी। धर्म से च्युत मांसाहारी एवं अन्य दुराचारों में निरत रहनेवाली प्रजाओं के तुम राजा होगे। गुर की स्त्री के साथ गमन करनेवाले, नीच योनियों में जन्म धारण करनेवाले पशु के समान अविवेकशील, म्लेच्छों के देश के तुम राजा

English

The senior queen-consort of the king was well-known by the name Suyasa. That chaste lady was urged by the king and she came (to that deity) with a desire to have a son.

अध्याय १७१

श्लोक 48

न मे कामो न मे क्रोधो न वैरं न च मत्सरः ।अज्ञानाद् दृष्टिमान्द्याच्च स्खलनं क्षन्तुमर्हथ

na me kāmo na me krodho na vairaṃ na ca matsaraḥ / ajñānād dṛṣṭimāndyācca skhalanaṃ kṣantumarhatha

हिन्दी अर्थ

होगे--इसमें सन्देह नहीं है सूत बोलेः--ऋषिबुन्द राजा ययाति ने इस प्रकार अपने पुत्र तुबंसु को शाप देने के उपरान्त शमिष्ठा

English

She performed (his) worship on a grand scale and requested him for sons. She frequented (the shrine) again and again for (the boon of getting) a son.

अध्याय १७१

श्लोक 49

वहनं भर्तृसौख्याय दिवा सम्पीड्यते रुजा ।अयं भर्ता विजानीथ झोलिकासंस्थितः सदा

vahanaṃ bhartṛsaukhyāya divā sampīḍyate rujā / ayaṃ bhartā vijānītha jholikāsaṃsthitaḥ sadā

हिन्दी अर्थ

धनुश्चिह्नान्तगंतग्रग्थ: क. पुस्तके नास्ति ।

English

There was a reason behind Nikumbha's not granting sons. If the king were to be infuriated something could be done.

अध्याय १७१

श्लोक 50

भरणं पानं वस्त्रं च ददाम्येतस्य रोगिणः ।ऋषिः शौनकमुख्यो ऽसौ शाण्डिलीं मां विजानत

bharaṇaṃ pānaṃ vastraṃ ca dadāmyetasya rogiṇaḥ / ṛṣiḥ śaunakamukhyo 'sau śāṇḍilīṃ māṃ vijānata

हिन्दी अर्थ

त्रिनवतितमोअध्यायः ८रेहै द्ुह्म त्वं प्रतिपद्चस्व वर्णरूपविनाशिनीम् । जरां वर्षसहस्त्र वे यौवन स्वं ददस्व से

English

After the lapse of a long period, the king became furious. (He thought) 'This spirit at the main gate delightedly bestows hundreds of boons on the town-people but does not do anything (for me). In my city he is worshipped by my people. He has been worshipped by my queen there for that specific reason. Though he eats much, he does not grant me a son. He is ungrateful. Hence he does not deserve further

अध्याय १७१

श्लोक 51

स्वभर्तृधर्मिणीं कोपं मा कुरुष्वातिथिं कुरु ।सतां समीपं सम्प्राप्तां सर्वं मे क्षन्तुम् अर्हथ

svabhartṛdharmiṇīṃ kopaṃ mā kuruṣvātithiṃ kuru / satāṃ samīpaṃ samprāptāṃ sarvaṃ me kṣantum arhatha

हिन्दी अर्थ

पूर्ण वर्षसहस्रे ते प्रतिदास्यामि यौवनम् । स्वं चा55दास्यामि भूयो5हूं पाप्मानं जरया सह ॥ै४७

English

On seeing the shrine shattered, the lord (of Ganas) approached the king (and said), "O king, since, without any offence on my part, my shrine has been destroyed by you, the city will be void and desolate all of a sudden". Then, due to that curse Varanasi became desolate.

अध्याय १७१

श्लोक 52

ऋषय ऊचुः ।परव्यथां न जानीषे व्यचरन्ती यदृच्छया ।प्रभाते ऽभ्युदिते सूर्ये तव भर्ता मरिष्यति

ṛṣaya ūcuḥ / paravyathāṃ na jānīṣe vyacarantī yadṛcchayā / prabhāte 'bhyudite sūrye tava bhartā mariṣyati

हिन्दी अर्थ

न गज न रथ नाश्व॑ जोरों भूडक्त न च स्त्रिम। न सद्भश्वास्प भवति न जरां तेन कामये. यस्त्य॑ं मे हृदयाज्जातों वयः स्वं न प्रयच्छसि । तस्मादद्ुह्म प्रियः कामो न ते संपत्स्यते क्वचित् ॥

English

Nikumbha brought Mahadeva to that desolate cursed city. Mahadeva rebuilt that desolate city by means of (the powers of) his great soul.

अध्याय १७१

श्लोक 53

आत्मदुःखात् परं दुःखं न जानासि कुलाधमे ।तेन वाक्येन घोरेण शाण्डिली विमनाभवत्

ātmaduḥkhāt paraṃ duḥkhaṃ na jānāsi kulādhame / tena vākyena ghoreṇa śāṇḍilī vimanābhavat

हिन्दी अर्थ

अनो त्वं प्रतिपद्यस्थ पाप्मानं जरया सह ५ एवं वर्षसहर्न॑ तु चरेयं योवनेन ते ४१

English

The city was befitting the Vibhuti (prosperity and glory) of the goddess and the lord. The goddess sported there, even as lord Mahesvara too sported there. But the goddess did not derive (permanent) pleasure due to her surprise at the (peculiar) house. For the sake of playing with the goddess, lord Isana spoke these words.

अध्याय १७१

श्लोक 54

परं विषादमापन्ना क्षणं ध्यात्वाब्रवीद् वचः ।कोपात् संरक्तनयना निरीक्षन्ती मुनींस् तदा

paraṃ viṣādamāpannā kṣaṇaṃ dhyātvābravīd vacaḥ / kopāt saṃraktanayanā nirīkṣantī munīṃs tadā

हिन्दी अर्थ

के बड़े पुत्र द्रह्यु से यह बात कही, प्रिय पुत्र द्रुहयु ! वर्ण एवं रूप के विनाशक इस मेरी वुद्धता को तुम स्वीकार कर लो, एक सहस्न वर्ष के लिए अपनो यौवनावस्था मुझे प्रदाव कर दो । एक सहस्न वर्ष व्यतीत हो जाने पर तुम्हारी यौवनावस्था मैं तुम्हें वापस कर दूंगा और उसी समय समस्त परापकर्मों समेत अपनी बृुद्धता तुमसे ठह्य ने कहाः--पिता जी ! वृद्ध पुरुष न तो हाथी पर चढ़ सकता है, न घुड़सवारी का आनन्द लट सकता है म अच्छे सुस्वादु अन्न का ही भोग कर सकता है, न सुन्दरो स्त्री ही उसके लिए आनन्ददायिती हो सकती है + कोई वृद्ध पुरुष के पास बेठना भी नहीं चाहता, इन कारणों से मैं तुम्हारी इस बृद्धता को पसन्द

English

"I shall not abandon my abode. My abode is Avimukta 1 (unabandonedl ". He laughed and spoke again to her: "My abode is Avimvkta. O Goddess, I shall not go away (from here). You may go. I shall sport here". Hence indeed it is Avimukta since it was said so by the lord himself.

अध्याय १७१

श्लोक 55

सतां गेहे किल प्राप्ता भवतां चापकारिणी ।सामेनातिथिपूजायां शिष्टे च गृहमागते

satāṃ gehe kila prāptā bhavatāṃ cāpakāriṇī / sāmenātithipūjāyāṃ śiṣṭe ca gṛhamāgate

हिन्दी अर्थ

ययाति बोलेः--द्ुह यु तुम मेरे हृदय से उत्पन्न होकर भी अपनी अवस्था मुझे नहीं दे रहे हो । अतः तुम्हारा भनचाहा कभी नहीं और कहीं नहीं सम्पन्य होगा, जिस देश में लोग सबंदा नाव और छोटी-छोटी नौकाओं तथा धश्नद्यों द्वारा जा सकते हैं, जहाँ पर राजवंश का सवंधा अभाव तथा सुन्दरता की नितान्‍्त कमी रहेगी, वहाँ पर तुम्हें सवंद निवास करना पड़ेगा ।' द्रुह्म को इस प्रकार शाप देकर राजा ययाति ने अनु से

English

This is the story of how the city of Varanasi was cursed and then glorified as 'Avimukta'. In it lives the lord revered by all Devas in the three Yugas. The pious-souled Mahesvara is accompained by the goddess also. He vanished during the Kali age. That city of the great soul is reoccupied by the people when the lord vanishes.

अध्याय १७१

श्लोक 56

भवद्भिर् ईदृगातिथ्यं कृतं चैव ममैव तु ।स्वर्गापवर्गधर्मश्च भवद्भिर् न निरीक्षितम्

bhavadbhir īdṛgātithyaṃ kṛtaṃ caiva mamaiva tu / svargāpavargadharmaśca bhavadbhir na nirīkṣitam

हिन्दी अर्थ

कहा, अनु ! मेरी वद्धावस्था तथा पापकर्मों को तुम ले लो, इस प्रकार एक सहस्न वर्ष तक तुम्हारी यौवनावस्था से मैं विषयों का उपभोग करना चाहता है जोणं: शिशुरहूं तात जरया ह्यशुचिः सदा। न भजामि महाराज तां जरां नाभिकामये ५२

English

Thus Varanasi was cursed and was re-inhabited. King Divodasa killed king Bhadrasrenya's one hundred sons who were noted for their mastery in archery and occupied (his capital). The kingdom of Bhadrasrenya was usurped by that powerful king. But the son of Bhadrasrenya named Dur- dama was let off by Divodasa, out of mercy, t in 'ing a

अध्याय १७१

श्लोक 57

प्राजापत्याम् इमां दृष्ट्वा मां यथा प्राकृताः स्त्रियः ।भवन्तः स्त्रीबलं मेऽद्य पश्यन्तु दिवि देवताः

prājāpatyām imāṃ dṛṣṭvā māṃ yathā prākṛtāḥ striyaḥ / bhavantaḥ strībalaṃ me'dya paśyantu divi devatāḥ

हिन्दी अर्थ

पुरो त्व॑ प्रतिपद्यस्व पाप्मानं जरया सह । जरावली च मां तात पलितानि च॒ पयंगुः 4.8 काव्यस्योशनसः शापाप्न च तृप्तोइस्मि यौवने । कंचित्कालं चरेय॑ं वे विषयान्वयसा तव ५६ पूर्ण वर्षसहलज्रे ते प्रतिदास्यामि यौवनम् । स्व चव प्रतिपत्स्यासि पाप्मान जरया सह ५७

English

Heroic Pratardana was born of Divodasa and Drsa- This explains why Varanasi is called 'Avimukta.

अध्याय १७१

श्लोक 58

मरिष्यति न मे भर्ता ह्यादित्यो नोदयिष्यति ।अन्धकारं जगत्सर्वं क्षीयते नाद्य शर्वरी

mariṣyati na me bhartā hyādityo nodayiṣyati / andhakāraṃ jagatsarvaṃ kṣīyate nādya śarvarī

हिन्दी अर्थ

एबमुक्तः प्रत्युवाच पुत्र: पितरमझजसा । यथाउनुमन्यसे तात करिष्यासि तथेब च अनु ने कह्दा;--हे तात ! आप बहुत बुद्ध हो गये हैं, मैं अभी बालक हूँ, आपकी बृद्धावस्था से मैं वृद्ध हो जाऊंगा, जिससे स्वंदा अपविन्न बना रहूँगा। है महाराज ! इसलिये मैं उस वृद्धावस्था को ग्रहण नहीं कर सकता, वह हमें पसन्द नहीं है ।५२। द

English

It is heard that Suketu's son was Dharmaketu. Heroic

अध्याय १७१

श्लोक 59

एवमुक्ते तया वाक्ये स्तम्भिते ऽर्के तमोमयम् ।न च प्रजायते सर्वं निर्वषट्कारसत्क्रियम्

evamukte tayā vākye stambhite 'rke tamomayam / na ca prajāyate sarvaṃ nirvaṣaṭkārasatkriyam

हिन्दी अर्थ

ययाति बोलेः-- तुम मेरे हृदय से उत्पन्न होकरू भी अपनी यौवनावस्था नहीं दे रहे हो, तो वृद्धावस्था का जो दोष तुमने बतलाया है, वह सब तुम्हें प्राप्त होगा, तुमारी प्रजाएँ यौवनावस्था को प्राप्त करते ही विनष्ट हो जायंगी तुम भी अग्नि में गिरकर भस्म हो जाओगे ।' अनु को ऐसा शाप देने के उपरान्त महाराज ययाति अपने सब से छोटे पुत्र पुरु से बोले, प्रियपुत्र पुरु ! तुम मेरे पापों के साथ मेरी इस बृद्धावस्था

English

Satyaketu's son was the king named Vibhu. Suvibhu was the son of Vibhu and Sukumara was his son. Sukumara's son was Dhrstaketu. He was very virtuous. Dhfstaketu's successor was the king Venuhotra.

अध्याय १७१

श्लोक 60

स्वाहाकारः स्वधाकारः पञ्चयज्ञविधिर्नहि ।स्नानं दानं जपो नास्ति सन्ध्यालोपव्यतिक्रमः ।षण्मासं च तदा पार्थ लुप्तपिण्डोदकक्रियम्

svāhākāraḥ svadhākāraḥ pañcayajñavidhirnahi / snānaṃ dānaṃ japo nāsti sandhyālopavyatikramaḥ / ṣaṇmāsaṃ ca tadā pārtha luptapiṇḍodakakriyam

हिन्दी अर्थ

को ग्रहण कर लो, मेरे अंगों में सिकुड़न आ यई है, केश सकेद हो गये हैं, चारों ओर से बुढ़ापे ने आक्रान्त कर लिया है, किन्तु इतने पर भी मैं शुक्राचार्य के शाप के कारण यौवनावस्था से सन्तुष्ठ नहीं हो सका हूँ, तुम्हारी यौवनावस्था प्राप्त कर मैं कुछ समय तक और विषयों का सेवत करना चाहता हूँ, एक सहल्न वर्ष बीत जाने पर मैं तुम्हारी यौवनावस्था तुम्हें वापस कर दूंगा, और उसी समय अपने समस्त पाप कर्मों समेत बुद्धता को तुमसे वापिस कर लूगा ।५३-५७। ः।

English

Venuhotra's son was Gargya. He was very famous. Vatsya was the son of the intelligent Vatsa.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 171
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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