Vayu Purana· Vāyu Purāṇa
182
अध्याय 182 / 232

Adhyaya 182

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अध्याय १८२

श्लोक 1

॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे भृगुकच्छोत्पत्तिवर्णनं नामैकाशीत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १८२ श्रीमार्कण्डेय उवाच: ततो भृगुः श्रिया चैव समेतः कच्छपं गतः ।अभिनन्द्य यथान्यायम् उवाच वचनं शुभम्

|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe bhṛgukacchotpattivarṇanaṃ nāmaikāśītyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 182 śrīmārkaṇḍeya uvāca: tato bhṛguḥ śriyā caiva sametaḥ kacchapaṃ gataḥ / abhinandya yathānyāyam uvāca vacanaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

पिता ने शुक्राचाय के लिए ज॑ंसा बतलाया था, उस मृदुभाषिणी ने उनके लिए वैसा ही आचरण किया, कान को मीठी लगने वाली सुन्दर वाणियों से उसने शुक्राचार्य की स्तुति की। समय-समय पर सुख पहुंचाने के लिए चरणादि का संवाहन किया, अत्यन्त अनुकूल आचरण करती हुई, सेवा में दिन रात दत्तचित्त रहकर उसने बहुत वर्षों तक उपवास रखा। इस प्रकार उस परम घोर सहस्न वर्ष वाले श्र म्रश्नत के समाप्त हो जाने पर

English

The third war is'Varaha (that of the Boar incarnation); the fourth was at the time of the churning of the ocean for nectar. The fifth was the terrible war of Tarakamaya (on the abduction of Tata byCandra).

अध्याय १८२

श्लोक 2

त्वया धृता धरा सर्वा तथा लोकाश्चराचराः ।तथैव पुण्यभावत्वात्स्थितस्तत्र महामते

tvayā dhṛtā dharā sarvā tathā lokāścarācarāḥ / tathaiva puṇyabhāvatvātsthitastatra mahāmate

हिन्दी अर्थ

महादेव जी शुक्राचाय के ऊपर परम प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान देते हुए बोलने, भृगुनन्दत ! इस परम कठोर तप का अकेले तुम्हीं ने पालन किया है, किसी अश्य ते इसका पालन आज तक नहीं किया है, इसलिए तुम अपनी इस परम कठोर तपस्या, बुद्धि, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, एवं तेज से समस्त देवताओं को पराजित करोगे, है ब्राह्मण ! यज्ञों एवं उपनिषदों की जो कुछ भी मंत्रशक्ति मुझमें विद्यमान है, उनके जो भी विविश अंग उपाजु एवं गूढ़ रहस्य मुझे विदित हैं, वे सब तुम्हें सर्वांशतः प्राप्त होंगे, किसी दूसरे को

English

Verses 68-70 show that Asuras and Suras were cousin-clans who lived amicably under Asura Kings also. See vv. 88-92.

अध्याय १८२

श्लोक 3

चातुर्विद्यस्य संस्थानं करोमि रमया सह ।यदि त्वं मन्यसे देव तदादेशय मां विभो

cāturvidyasya saṃsthānaṃ karomi ramayā saha / yadi tvaṃ manyase deva tadādeśaya māṃ vibho

हिन्दी अर्थ

घनुदिचिल्वान्तर्गतग्रन्थ: ख. पुस्तके नास्ति ।

English

Verses 72-87 describe the twelve wars between Devas and Asuras, which made Visnu to incarnate to help Devas. The list of Visnu's incar¬ nations is different ( vide Introduction —Vaisnavisra).

अध्याय १८२

श्लोक 4

कूर्म उवाच: एवमेव द्विजश्रेष्ठ मम नामाङ्कितं पुरम् ।भविष्यति महत्कालं ममोपरि सुसंस्थितम्

kūrma uvāca: evameva dvijaśreṣṭha mama nāmāṅkitaṃ puram / bhaviṣyati mahatkālaṃ mamopari susaṃsthitam

हिन्दी अर्थ

सर्वाभिभावी तेन त्वं द्िजश्नेष्ठो भविष्यिस एवं दत्त्वा वरास्तस्से भागवाय पुनः पुनः अजे एत्वं धनेशत्वमवध्यत्वं च वे ददो एताल्लब्ध्वा वरान्काव्यः संप्रहष्टतन्रुहः

English

The tenth war should be known as Varta (Vartra?) (pertaining to V r tra); the next one is Halahala. The twelfth war among them is remembered as the terrible Kolahala.

अध्याय १८२

श्लोक 5

अचलं सुस्थिरं तात न भीः कार्या सुलोचने ।एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं कच्छपस्य मुखाच्च्युतम्

acalaṃ susthiraṃ tāta na bhīḥ kāryā sulocane / etacchrutvā śubhaṃ vākyaṃ kacchapasya mukhāccyutam

हिन्दी अर्थ

हर्षात्प्रादुबंभौ तस्य देवस्तोत्रं महेश्वरम् । तदा तिर्यब्स्थितस्त्वेबं तुष्दुबे नोललोहितम्

English

Hiranyakasipu, a Daitya, was killed by Narasirhha. Bali was bound by Vamana when the three worlds were over¬ taken (were measured by Vamana s steps).

अध्याय १८२

श्लोक 6

हृष्टस्तुष्टः श्रिया सार्द्धं पद्मयोनिसुतो भृगुः ।अभीचि उदये प्राप्ते कृतकौतुकमङ्गलः

hṛṣṭastuṣṭaḥ śriyā sārddhaṃ padmayonisuto bhṛguḥ / abhīci udaye prāpte kṛtakautukamaṅgalaḥ

हिन्दी अर्थ

नमो5स्तु शितिकण्ठाय सुरूपाय सुबर्चसे । रिरिहाणाय लोपाय वत्सराय जगत्पते १६२ कपदिने हा ध्वेरोम्णे हूयाय करणाय च। संस्कृताय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे १६३ उष्णीषिणे सुवबत्राय सहल्लाक्षाय मोढुषे । वसुरेताय रुद्राय तपसे चौरवाससे १६४ हस्वाय मुक्तकेशाय सेनान्ये रोहिताय च। (कवये राजवुद्धाय तक्षकक्कीडनाय च) सहस्रशिरसे चेव बहुरूपाय वेधले। भवाय विश्वरूपाय श्वेताय पुरुषाय च १६८ निषद्धिणे कवचिने सुक्ष्माय क्षषणाय च। ताम्राय चेव भीमाय उग्माय च शिवाय घ १६९ बच्नवे च पिशज्भाय पिड्जलायारुणाय च्। महादेवाब शर्वाय विश्वरूपशिवाय च ११७०

English

Hiranyaksa who was of very great strength and prowess and who had never been defeated in wars, was killed in a duel (by Visnu in his incarnation as the Boar), when the clash with Devas ensued.

अध्याय १८२

श्लोक 7

नन्दने वत्सरे माघे पञ्चम्यां भरतर्षभ ।शस्ते तु ह्युत्तरायोगे कुम्भस्थे शशिमण्डले

nandane vatsare māghe pañcamyāṃ bharatarṣabha / śaste tu hyuttarāyoge kumbhasthe śaśimaṇḍale

हिन्दी अर्थ

वे नहीं प्राप्त होंगे। उन सब महान् प्रभाव से तुम सब को पराजित करने वाले श्रेष्ठ द्विज होगे।१५३- १५८१ह। महादेव जीने भूगुतन्दन शुक्राचायं को यह वरदान देकर बारम्बार अजेय, धनेश और अवध्य होने का वरदान दिया। इन सब बरदानों को प्राष्त कर शुक्राचार्य परम आनन्दित हुए मारे खुशी के उनको रोमाओ्च हो गया । इस हर्षातिस्क में नीचे शिर किये हुये उन्होंने नील लोहित भगवान् शंकर की निम्न

English

Virocana, the son of Prahlada, always attempted to kill Indra. In the Tarakamaya war he was killed by Indra

अध्याय १८२

श्लोक 8

रेवाया उत्तरे तीरे गम्भीरे चाभिवारुणि ।प्रागुदक्प्रवणे देशे कोटितीर्थसमन्वितम्

revāyā uttare tīre gambhīre cābhivāruṇi / prāgudakpravaṇe deśe koṭitīrthasamanvitam

हिन्दी अर्थ

स्तुति की, उसी समय यह महान् प्रभावशाली देवस्तोत्र उनके मुख से प्रकाशित हुआ ।११६-१६!। शितिकण्ठ को हमारा नमस्कार, सुरूप, सुव्चंस, रिरिहाण, लोप, वत्सर, जगत्पति ।१६ । कपर्दी, ऊध्वरोमा, हय, करण, संस्कृत, सुतीर्थ, देवदेव, रहस् ॥१६३॥। उष्णीषी, सुबकत्र, सहत्नाक्ष, मीढूष, वसुरेता, रुद्र, तप, चीरवासा, ।१६४। हस्व, मुक्तकेश, सेनानी रोहित, कवि, राजवुद्ध, तक्षककीडन, ।१६१५। गिरिश, अकेनेत्र, बहुरूप, वेधा, भव, विश्वहूप, इवेतपुरुष, निषद्धी, कवची, सूक्ष्म, क्षपण, ताम्र, भीम, उम्र, शिव, वश्चु, पिशंग, पिगल, अरुण, महादेव, शर्व, विश्वरूय, शिव, ।१६६-१७०। हिरण्य, शिष्ट, श्रेष्ठ, मध्यम, वश्रु,

English

Jamblia who had acquired the boon of avadhyatd (the state of not being killed or immunity from death) along with special miraculous weapons was killed in the sixth war by Visnu who entered the body of Sakra.

अध्याय १८२

श्लोक 9

क्रोशप्रमाणं तत्क्षेत्रं प्रासादशतसंकुलम् ।अचिरेणैव कालेन तपोबलसमन्वितः ।विचिन्त्य विश्वकर्माणं चकार भृगुसत्तमः

krośapramāṇaṃ tatkṣetraṃ prāsādaśatasaṃkulam / acireṇaiva kālena tapobalasamanvitaḥ / vicintya viśvakarmāṇaṃ cakāra bhṛgusattamaḥ

हिन्दी अर्थ

घनुश्ि्वास्तर्गतग्रन्थो ड.. पुस्तके नास्ति ।

English

When Devas were unable to protect the city of three gods* (?) all Danavas along with (the demon) Tripura were killed by the three-eyed god Siva.

अध्याय १८२

श्लोक 10

ब्राह्मणा वेदविद्वांसः क्षत्रिया राज्यपालकाः ।वैश्या वृत्तिरतास्तत्र शूद्राः शुश्रूषकास्त्रिषु

brāhmaṇā vedavidvāṃsaḥ kṣatriyā rājyapālakāḥ / vaiśyā vṛttiratāstatra śūdrāḥ śuśrūṣakāstriṣu

हिन्दी अर्थ

दुग्दुम्घायकपादाय अर्हाय बुद्धये तथा। मृगव्याधाय सर्पाय स्थाणवे भीषकाय च बहुरूपाय चोग्राय त्रिनेत्रायेश्वराय च । कपिलायकदा राय मृत्यवे ह्यमस्बकाय च वास्तोष्पते पिनाकाय शंकराय शिवाय च। आरण्याय गृहस्थाय यतये ब्रह्मचारिणे बुद्धाय चेव शुद्धाय मुक्ताय केवलाय च। रोधसे चेकितानाय ब्रह्ानष्ठाय मह॒षंये चतुष्पादाय मेध्याय धर्मिणे शीघध्रगाय च । शिखण्डिने कपालाय + वक्षिणे विश्वमेधसे अप्रतीघाताय दीप्ताय भास्कराय सुमेधसे । क्राय विकृतायेव बीभत्साय शिवाय च

English

In the eighth war, Asuras, Raksasas who were Andhakarakas (causing blindness, invisible?) were defeated

अध्याय १८२

श्लोक 11

एवं श्रिया वृतं क्षेत्रं परमानन्दनन्दितम् ।निर्मितं भृगुणा तात सर्वपातकनाशनम् ।इति भृगुकच्छोत्पत्तिः

evaṃ śriyā vṛtaṃ kṣetraṃ paramānandananditam / nirmitaṃ bhṛguṇā tāta sarvapātakanāśanam / iti bhṛgukacchotpattiḥ

हिन्दी अर्थ

सौम्पाय चेब पुण्याय धासिकाय शुभाय च। अवध्यायामृताड्राय नित्याय शाश्वताय च॒

English

The mighty-armed Vipracitti began to fight with Mahendra hiding himself by means of his Maya. Indra aimed at his banner and cut him down.

अध्याय १८२

श्लोक 12

मार्कण्डेय उवाच: ततः कालेन महता कस्मिंश्चित् कारणान्तरे ।देवलोकं जगामाशु लक्ष्मीर् ऋषिसमागमे

mārkaṇḍeya uvāca: tataḥ kālena mahatā kasmiṃścit kāraṇāntare / devalokaṃ jagāmāśu lakṣmīr ṛṣisamāgame

हिन्दी अर्थ

शुचये रेरिहाणाय सद्योजातांय मृत्यवे । पिशिताशाय खर्वाय मेधाय वेद्युताय च त्रिपुरध्नाय दीप्ताम चक्राय रोसशाय च। तिग्मायुधाय सेध्याय सिद्धाय ज पुलस्तये

English

These twelve battles took place between Devas and Asuras resulting in exhausting both Devas and Asuras. They brought about misfortune to the people also.

अध्याय १८२

श्लोक 13

समर्प्य कुञ्चिकाट्टालं भृगवे ब्रह्मवादिने ।पालयस्व यथार्थं वै स्थानकं मम सुव्रत

samarpya kuñcikāṭṭālaṃ bhṛgave brahmavādine / pālayasva yathārthaṃ vai sthānakaṃ mama suvrata

हिन्दी अर्थ

पिशज्भ, पिगल; अरुण पिनाकी, इथुमान्, चित्र ।१७!१। रोहित, दुन्दुभ्य, एकपाद, अहं, बुद्धि, मृगव्याध, सपे, स्थाणु, भीषण, बहुरूप, उम्र, त्रिनेत्र, ईह्वर,-कपिल, एकवीर, मृत्यु, व्यम्बक ।१७२-१७३॥ वास्तोंष्पति, पिनाक, शंकर, शिव, आरण्य, गृहस्थ, यति, ब्रह्मचारी, सांख्य, योग, ध्यानी, दीक्षित, अन्तहिंत, शव, मान्य, मालो, ।(७४- १७४ बुद्ध, शुद्ध, मुक्त, केवल, रोधा, चेकितान, ब्रह्मिष्ठ, महषि, चतुष्पाद, मेध्य, धर्मी, शीघत्षम, शिखण्डी,

English

Hiranyakasipu shone as the ruler and. king of the three worlds for one hundred and seven million two hundred and eighty thousand years.

अध्याय १८२

श्लोक 14

देवकार्याण्यशेषाणि कृत्वा श्रीः पुनरागता ।आजगाम रमा देवी भृगुकच्छं त्वरान्विता

devakāryāṇyaśeṣāṇi kṛtvā śrīḥ punarāgatā / ājagāma ramā devī bhṛgukacchaṃ tvarānvitā

हिन्दी अर्थ

कपाल, दंष्ट्री, विश्वमेधा, ।0६७-१७७। अप्रतीधात, दीप्त, भास्कर, सुमेधा, क्र, विक्रृत, बीभत्स, शिव, सौम्य, + नास्त्य्ध मिदं क. पुस्तके । + पनुदिच ्वान्तन्तयंतग्रन्थो ड. पुस्तके नास्ति ।

English

By succession Bali became the king and he ruled for one hundred and three million and sixty thousand years.

अध्याय १८२

श्लोक 15

प्रार्थितं कुञ्चिकाट्टालं स्वगृहं सपरिग्रहम् ।भृगुर्यदा तदा पार्थ मिथ्या नास्ति तदा वदत

prārthitaṃ kuñcikāṭṭālaṃ svagṛhaṃ saparigraham / bhṛguryadā tadā pārtha mithyā nāsti tadā vadata

हिन्दी अर्थ

रोचमानाय खण्डाय स्फीताय ऋषभाय च्। भोगिने युअुजमानाय शान्तायबोध्वरेतसे १८४ अघध्नाय मस्तध्ताय सृत्यवे यज्ञियाय च । कृशानवे प्रचेताय बह्लयये किशलाय च

English

Prahlada ruled in the company of Asuras for as many years as the period of Bali's administration.

अध्याय १८२

श्लोक 16

एव विवादः सुमहान्संजातश्च नरेश्वर ।ममेति मम चैवेति परस्परसमागमे

eva vivādaḥ sumahānsaṃjātaśca nareśvara / mameti mama caiveti parasparasamāgame

हिन्दी अर्थ

दक्षाय च जघन्याय लोकानामीश्वराय च । अनामयाय चोर्ध्वाय संहृत्याधिष्ठिताय च श्रेष्ठाय वामदेवाय ईशानाय च धीमते । सहाकल्पाय दीप्ताय रोदनाय हसाय च १६० दृढधस्वने कवचिने रथिने न वरूथिने । भृगुनाथाय शुक्राय वह्लिरिष्टाय धोमते ॥१€१ अघाय अघसंसाय(? )विप्रियाय प्रियाय च । दिग्वासः कृत्तिवासाय भगध्नाय नमोस्तु ते

English

These three were very famous as the Indras of Asuras. They were very mighty. All these worlds were under Daityas fora period of ten Yugas.

अध्याय १८२

श्लोक 17

ततः कालेन महता भृगुणा परमर्षिणा ।चातुर्विद्यप्रमाणार्थं चकार महतीं स्थितिम्

tataḥ kālena mahatā bhṛguṇā paramarṣiṇā / cāturvidyapramāṇārthaṃ cakāra mahatīṃ sthitim

हिन्दी अर्थ

वषट्कारतमायव तुम्यमन्तात्मते नमः । ख्ष्ट्रे धान्रे तथा होन्रे हत्रे च क्षषणाय च १६४ भूतभव्यभयायेव तुम्यं कालात्मने नमः । वसवे चेव सत्याय त्यागाय च शमाय च

English

Then the entire kingdom was free from enemies for a period of ten Yugas. Then the three worlds began to be pro¬ tected by Mahendra without any change.

अध्याय १८२

श्लोक 18

अस्मदीयं यथा सर्वं नगरं मृगलोचने ।चातुर्विद्या द्विजाः सर्वे तथा जानन्ति सुन्दरि

asmadīyaṃ yathā sarvaṃ nagaraṃ mṛgalocane / cāturvidyā dvijāḥ sarve tathā jānanti sundari

हिन्दी अर्थ

विश्ञाय मदते चेव तुम्यं देवात्मने नमः । अग्नीषोसत्विगिज्याय पशुसन्त्रौषधाय च ११९६ मृत्यु, यशिय, कणानु, प्रभेता, वह्ति, किशल १८४-१८५। सिकत्य, प्रसन्न; वरेण्य, चंक्षु, क्षिप्रगु, सुधन्व, प्रमेध्य, पिव, रक्षोन्न, पशुन्न, विषम, शयन, विश्रान्त, महान्त, अन्ति, दुर्गंम, दक्ष, ।॥१८४६-१८७। जधन्य, लोकों के अधीक्षवर, अनामय, ऊध्वं, संहत्याधिष्ठित (समूह में अर्थात् अपने अनुचर गणों में रहनेवाले अथवा भली तरह लोकों के विनाश कर्म में निरत रहने वाले), हिरण्यबाहु, सत्य, शमन, असिकल्प, माघ, रीरिण्य, एकचेक्षु, ८८-

English

When the kingdom of the three worlds (inherited) by Prahlada was taken away by the lapse of time, when the kingdom of the three worlds came to Indra (the chastiser of Paka) by rotation, Yajna forsook Asuras and went over to Devas.

अध्याय १८२

श्लोक 19

श्रीरुवाच: प्रमाणं मम विप्रेन्द्र चातुर्वण्या न संशयः ।मदीयं वा त्वदीयं वा कथयन्तु द्विजोत्तमाः

śrīruvāca: pramāṇaṃ mama viprendra cāturvaṇyā na saṃśayaḥ / madīyaṃ vā tvadīyaṃ vā kathayantu dvijottamāḥ

हिन्दी अर्थ

१८९। श्रेष्ठ, वामदेव, ईशान, धीमान, महाकल्प, दीप्त, रोदन, हस, दृढ़धन्वा, कबची, रथी, वरुथी, भुगुनाथ,

English

"Even as we are looking on, Yajna went over to

अध्याय १८२

श्लोक 20

ततः समस्तैर्विबुधैः सम्प्रधार्य परस्परम् ।द्विधा तैर्वाक्स्थलं दृष्ट्वा ब्राह्मणा नृपसंहितम्

tataḥ samastairvibudhaiḥ sampradhārya parasparam / dvidhā tairvāksthalaṃ dṛṣṭvā brāhmaṇā nṛpasaṃhitam

हिन्दी अर्थ

भगवन् ! तुम्हें हूम तमस्कार करते हैं। हें पशुओं (सब को समान दुष्ठि से देखने वालो--देवताओं) के स्वामी, समस्त जीवों के रक्षक तुम्हें हम नमस्कार करते हैं। है भगवन् ! आप ही प्रणव, ऋणगू, यजु, साम तीनों वेद स्वधा, सुध, ।१६२-१६३५ वधट्कारस्वरूप एवं अनन्तात्मा हैं, आपको हमारा नमस्कार है, स्रष्ठा, धाता, होता हर्ता, क्षपण, भूत, भव्य भव नामों वाले काल स्वरूप भगवन् ! तुम्हें हमारा नमस्कार है। है वसु, साध्य, रुद्र, आदित्य, अध्वन, विश्वेदेव, एवं मझ्त् प्रभूति गण देवताओं के स्वरूपभगवन् ! तुम्हें हमारा नमस्कार है । अग्नि, सोम, ऋत्विक, इज्य, पशु, मच्त्र, औषध ।१६४-१६६। दक्षिणा, अवभूष एवं यज्ञ स्वरूप तुम्हें हम

English

Production of nectar from Yajna is not known. Bd. 3.72.87 reads yajnasya'vabhTthe 'at the time of the valedictory avabhrtha bath.

अध्याय १८२

श्लोक 21

अष्टादशसहस्राणि नोचुर्वै किंचिदुत्तरम् ।अष्टादशसहस्रेषु भृगुकोपभयान्नृप ।उक्तं च तालकं हस्ते यस्य तस्येदमुत्तरम्

aṣṭādaśasahasrāṇi nocurvai kiṃciduttaram / aṣṭādaśasahasreṣu bhṛgukopabhayānnṛpa / uktaṃ ca tālakaṃ haste yasya tasyedamuttaram

हिन्दी अर्थ

8४०४ वायुपुराणम्

English

This verse should have been 89 as Prahlada succeeded his father Hiranyakasipu.

अध्याय १८२

श्लोक 22

एतच्छ्रुत्वा तु सा देवी निगमं नैगमैः कृतम् ।क्रोधेन महताविष्टा शशाप द्विजपुंगवान्

etacchrutvā tu sā devī nigamaṃ naigamaiḥ kṛtam / krodhena mahatāviṣṭā śaśāpa dvijapuṃgavān

हिन्दी अर्थ

दक्षिणावभुथायेव तुम्यं यज्ञात्मने नमः । तपसे चेब सत्याय त्यागाय च॒ शमाय च अहिसायाप्यलोभाय सुवेशायातिशाय च। स्व भुतात्मभृताय तुम्य॑ लोकात्मने नमः

English

Rainfall, medicinal herbs and the two things, the Earth and Wealth—all these are retained by me. Only a fourth of it is with Suras. I shall hand over to you everything that I

अध्याय १८२

श्लोक 23

श्रीदेव्युवाच: यस्मात्सत्यं समुत्सृज्य लोभोपहतमानसैः ।मदीयं लोपितं स्थानं तस्माच्छृण्वन्तु मे गिरम्

śrīdevyuvāca: yasmātsatyaṃ samutsṛjya lobhopahatamānasaiḥ / madīyaṃ lopitaṃ sthānaṃ tasmācchṛṇvantu me giram

हिन्दी अर्थ

प्रथिव्य चान्तरिक्षाय दिवाय च महाय च् । जनस्तपाय सत्याय तुभ्यं लोकात्मने नमः १६६

English

On seeing Asuras sustained by the intelligent

अध्याय १८२

श्लोक 24

त्रिपौरुषा भवेद्विद्या त्रिपुरुषं न भवेद्धनम् ।न द्वितीयस्तु वो वेदः पठितो भवति द्विजाः

tripauruṣā bhavedvidyā tripuruṣaṃ na bhaveddhanam / na dvitīyastu vo vedaḥ paṭhito bhavati dvijāḥ

हिन्दी अर्थ

नमस्ते त्रिषु लोकेषु स्वरन्तेषु भवादिषु । सत्यान्तेषु महान्तेषु चतुर्षु च नमोस्तु ते नमः स्तोत्रे मया ह्ास्मिन्सदसद्व्याहुतं विभो । मद्भूक्त इति ब्रह्माण्य सर्व तत्क्षन्तुमहँसि २०३

English

With great fury Devas rushed at Danavas and killed them. Being harassed by them, Danavas hastened to Kavya (for protection).

अध्याय १८२

श्लोक 25

गृहाणि न द्विभौमानि न च भूतिः स्थिरा द्विजाः ।पक्षपातेन वो धर्मो न च निःश्रेयभावतः

gṛhāṇi na dvibhaumāni na ca bhūtiḥ sthirā dvijāḥ / pakṣapātena vo dharmo na ca niḥśreyabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहापुराणे वायुप्रोक्ते विष्णुमाहात्म्ये शंभुस्तवकीतंन नाम सप्तनवतितमोःध्याय:

English

Kavya saw that the sons of Dili were attacked by Devas and that they were in great distress because they were wounded in battle by various weapons 1.

अध्याय १८२

श्लोक 26

इष्टो गोत्रजनः कश्चिल्लोभेनावृतमानसः ।न च द्वैधं परित्यज्य ह्येकं सत्यं भविष्यति

iṣṭo gotrajanaḥ kaścillobhenāvṛtamānasaḥ / na ca dvaidhaṃ parityajya hyekaṃ satyaṃ bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

तमस्कार करते हैं। तप, सत्य, त्याग, शुभ १६९७। अहिसक, अलोभ, सुवेश, अतिशय, सर्वेभृतात्मभूत, योगात्मन् ! तुम्हें हमारा नमस्कार है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष, दिव, मह, जन, तप, सध्य प्रभृति लोक स्वरूप भगवन् ! तुम्हें हम नमस्कार करते हैं । अव्यक्त, महानू, भूत, इन्द्रिय, तन्मात्र, महास्त, प्रभृति तत्त्व स्वरूप भगवन् ! तुम्हें नमस्कार है ।!६८-२००। नित्य, लिज्ञ, सूक्ष्म, शुद्ध, विभु, नित्यात्मन् ! तुम्हें हम नमस्कार करते हैं। स्वरन्त तीनों (भू: भुवः और स्वः) एवं सत्यास्त चारों (मह जन, तप और सत्य) महान् लोकों में व्याप्त रहनेवाले भगवन् ! तुम्हें नमस्कार है । विभो ! इस स्तुति में मैंने जो कुछ सदसत् कहा है, उसे यह समझकर कि यह मेरा भक्त है, आप क्षमा कर दे । क्योंकि आप ब्राह्मणों के ऊपर कृपा करने वाले हैं ।२०१-२० ३।

English

On seeing Devas also standing there he reflected over the fate. 2 Remembering the previous incidents, he spoke to them (Asuras):

अध्याय १८२

श्लोक 27

अद्यप्रभृति सर्वेषाम् अहङ्कारो द्विजन्मनाम् ।न पिता पुत्रवाक्येन न पुत्रः पितृकर्मणि

adyaprabhṛti sarveṣām ahaṅkāro dvijanmanām / na pitā putravākyena na putraḥ pitṛkarmaṇi

हिन्दी अर्थ

धनुध्ििह्वान्तगंतग्रत्थो घ. पुस्तके नास्ति ।

English

"All the three worlds were conquered by Vamana by means of three paces. Bali was bound. Jambha was killed. Virocana was slain.

अध्याय १८२

श्लोक 28

अहङ्कारकृताः सर्वे भविष्यन्ति न संशयः ।इति शप्त्वा रमादेवी तदैव च दिवं ययौ

ahaṅkārakṛtāḥ sarve bhaviṣyanti na saṃśayaḥ / iti śaptvā ramādevī tadaiva ca divaṃ yayau

हिन्दी अर्थ

लिषए-ुस्ताह्डाल्म्यव्की स्ते च्वस्त् एवमाराध्य देवेशमोशानं नोलोहितम्। ब्रह्मेति प्रणतस्तस्म प्राआजलिवॉक्यमब्वीत् १ काव्यस्य गात्र संस्पृश्य हस्तेन प्रीतिमान्भवः । निकाम दर्शन दत्त्वा तत्रेवान्तरधीयत

English

In twelve great and terrible battles they were killed by Suras. By various means most of the important persons have been killed.

अध्याय १८२

श्लोक 29

ततो गतायां वै लक्ष्म्यां देवा ब्रह्मर्षयो ऽमलाः ।क्रोधलोभमिदं स्थानं ते ऽपि चोक्त्वा दिवं ययुः

tato gatāyāṃ vai lakṣmyāṃ devā brahmarṣayo 'malāḥ / krodhalobhamidaṃ sthānaṃ te 'pi coktvā divaṃ yayuḥ

हिन्दी अर्थ

ततः सो5न्तहिते तस्मिन्देवेशानुचरे तदा। तिष्ठन्तीं प्राहुजलिभृत्वा जयन्तोमिदमन्रवीत् ३ कस्य त्वं सुभगे का वा दुःखिते सयि दुःखिता । महता तपसा थुक्त किसर्थ मां” जुगोपसि ढ॑

English

Only a few of you have been spared in these latest battles. I shall now employ a great strategy. Please wait for a short while.

अध्याय १८२

श्लोक 30

गतां दृष्ट्वा ततो देवीम् ऋषींश्चैव तपोधनान् ।भृगुश्च परमेष्ठी स विषादम् अगमत् परम् ।प्रसादयामास पुनः शङ्करं त्रिपुरान्तकम्

gatāṃ dṛṣṭvā tato devīm ṛṣīṃścaiva tapodhanān / bhṛguśca parameṣṭhī sa viṣādam agamat param / prasādayāmāsa punaḥ śaṅkaraṃ tripurāntakam

हिन्दी अर्थ

किमिच्छसि वरारोहे कस्ते कामः सम्ृृध्यताम् । त॑ ते संप्रयाम्यद्य यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम् ४६ विष्णु-माहात्म्य-कीत॑न

English

Bd. P. v. 103 reads: samrak$ata samstrastdn 'protected the frightened /(sons of Did)*

अध्याय १८२

श्लोक 31

तपसा महता पार्थ ततस्तुष्टो महेश्वरः ।उवाच वचनं काले हर्षयन् भृगुसत्तमम्

tapasā mahatā pārtha tatastuṣṭo maheśvaraḥ / uvāca vacanaṃ kāle harṣayan bhṛgusattamam

हिन्दी अर्थ

सूत बोले :--ऋषिव॒न्द ! शुक्राचायं में इस प्रकार नौललोहित देवेश भगवान् शझद्भूर की आराधना कर पुनः प्रमाण किया और हाथ जोड़े हुए ब्रह्म का उच्चारण किया, प्रा्थता से परम प्रसन्न महादेव जी अपने हाथ से शुक्राचार्य के छारीर का स्पर्श कर एवं पर्याप्त दर्शन देकर वहीं अस्तहिंत हो गये । १-२। देवेश के अन्तर्घान हो जाने पर हाथ जोड़कर सामने उपस्थित जयन्ती से शुक्राचायं बोले-- सुन्दरि !

English

Daivam in Bd. P.

अध्याय १८२

श्लोक 32

किं विषण्णो ऽसि विप्रेन्द्र किं वा सन्तापकारणम् ।मयि प्रसन्ने ऽपि तव ह्येतत्कथय मे ऽनघ

kiṃ viṣaṇṇo 'si viprendra kiṃ vā santāpakāraṇam / mayi prasanne 'pi tava hyetatkathaya me 'nagha

हिन्दी अर्थ

तुम किसकी पुत्री हो, मेरे दुःख के समय दुःख उठाने वाली तुम कोन हो ? ऐसी महान् तपस्या में निरत रहकर तुम किस लिए भेरी रक्षा में दत्तचित रही हो है सुन्दर अंगों बाली, सुश्रोणि ! तुम्हारी इस सबंदा एक रूप रहने वाली भक्ति, कष्टसहिष्णुता, प्रणय और स्मेह से मैं बहुत प्रसन्न हूं । है सुस्दरि ! तुम क्‍या चाहती हो, मैं तुम्हारी किस कामना की पूति करूँ, तुम्हारी जो भी अभिलाषा होगी--चाहे वह अत्यस्त कठिन ही क्‍यों न होगी मैं भाज पूर्ण करना चाहुेगा ।३-६। शुक्राचाये के इस प्रकार कहने पर जयन्ती ने कहा,

English

I shall go to Mahadeva for acquiring Mantras for the sake of your victory. Brhaspati is performing Homa and wor¬ shipping Agni by means of Mantras.

अध्याय १८२

श्लोक 33

भृगुरुवाच: शापयित्वा द्विजान्सर्वान्पुरा लक्ष्मीर्विनिर्गता ।अपवित्रमिदं चोक्त्वा ततो देवा विनिर्गताः

bhṛguruvāca: śāpayitvā dvijānsarvānpurā lakṣmīrvinirgatā / apavitramidaṃ coktvā tato devā vinirgatāḥ

हिन्दी अर्थ

एवमुक्ताउन्नवीदेनं तपसा ज्ञातुमहेंसि । चिकीषितं मे ब्रह्मिष्ठ त्वं हि बेत्थ यथातथम्

English

Hence I shall go unto the lord Nllalohita (Siva) for the sake of Mantras. I shall bless you all after my return.

अध्याय १८२

श्लोक 34

ईश्वर उवाच: पुरा मया यथा प्रोक्तं तत्तथा न तदन्यथा ।क्रोधस्थानम् असंदेहं तथान्यदपि तच्छृणु

īśvara uvāca: purā mayā yathā proktaṃ tattathā na tadanyathā / krodhasthānam asaṃdehaṃ tathānyadapi tacchṛṇu

हिन्दी अर्थ

देवेन्द्रानलवणभि वरारोहे सुलोचने । इमं वृुणीष्व काम ते मत्तो वे वल्गुभाषिणि १० एवं भवतु गच्छामों गृहान्व मत्तकाशिनि । ततः स्वगूहमागम्प जयन्त्या सहितः प्रभुः स तया संवसेद्देव्या दश वर्षाणि भागशः । अदृश्यः सर्वेभुतानां मायया संवृतस्तदा ..

English

All of you perform penance in the forest clad in bark garments. Dcvas will not kill you until I return.

अध्याय १८२

श्लोक 35

तत्र स्थानसमुद्भूता महद्भयविवर्जिताः ।ब्राह्मणा मत्प्रसादेन भविष्यन्ति न संशयः

tatra sthānasamudbhūtā mahadbhayavivarjitāḥ / brāhmaṇā matprasādena bhaviṣyanti na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

कृताथंमागत॑ दृष्ट्वा काव्यं सर्वे दितेः सुताः॥ अभिजम्सुगृ हूं तस्थ मुदितास्ते दिदुक्षबः १३

English

After obtaining the Mantras that will never go against us, from Lord Mahesvara, we shall fight Dcvas again. You will surely gain victory."

अध्याय १८२

श्लोक 36

वेदविद्याव्रतस्नाताः सर्वशास्त्रविशारदाः ।ये ऽपि ते शतसाहस्रास्त्वरिता ह्यागतास्त्विह

vedavidyāvratasnātāḥ sarvaśāstraviśāradāḥ / ye 'pi te śatasāhasrāstvaritā hyāgatāstviha

हिन्दी अर्थ

बृहस्पतिस्तु संरुद्ध ज्ञात्वा काव्य चकार हू । पिन्नर्थ दश वर्षाणि जयन्त्या हिंतकाम्यया १५ बुद्ध्वा तदन्तरं सो5थ देत्यानामिव चोदितः । काव्यस्य रूपमास्थाय सोसुरान्समभाषत १६ ततः समागतान्दृष्ट्वा बृहस्पतिरुवाच तान्। स्वागत मस याज्यानां संप्राप्तोईइस्सि हिताय च

English

After deliberating thus Asuras spoke to Devas:

अध्याय १८२

श्लोक 37

अपठस्यापि मूर्खस्य सर्वावस्थां गतस्य च ।उत्तरादुत्तरं शक्रो दातुं न तु भृगूत्तम

apaṭhasyāpi mūrkhasya sarvāvasthāṃ gatasya ca / uttarāduttaraṃ śakro dātuṃ na tu bhṛgūttama

हिन्दी अर्थ

वनगानगान का. १०५०० पिनियाययाण + नल + विन“ ००7“

English

Then Kavya said to them: "Wait for some time per¬ forming penance without enthusiasm, waiting for an opportunity to achieve the object in view. All Devas including Vasava are in my father's hermitage."*

अध्याय १८२

श्लोक 38

कोटितीर्थम् इदं स्थानं सर्वपापप्रणाशनम् ।अद्यप्रभृति विप्रेन्द्र भविष्यति न संशयः

koṭitīrtham idaṃ sthānaṃ sarvapāpapraṇāśanam / adyaprabhṛti viprendra bhaviṣyati na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रद्मज्ञानी ब्रह्म ! मेरे मनोरथ को आप अपने तपोबल से जान सकते हैं, मेरी सारी अभिलाषाओं को आप जानते हैं।' जयन्ती के ऐसा कहने पर शुक्राचायं ने अपने दिव्य दृष्टि द्वारा उसके मनोश्थों को जानकर बोले, 'इन्द्रपुत्रि सुन्दरि, तुम यहां मेरी रक्षा के लिए भाई हुई थी, है भामिनि : सुश्रोणि मेरे साथ दस वर्षों तक सभी प्राणियों से अदृश्य रहकर तुम निवास करना चाहती हो, देवेन्द्रपुत्रि ! अग्ति के समान गौरवर्ण वाली ! सुन्दरि, सुलोचने ! भृदुभाषिणि ! अपने इस मनोरथ की मुझसे पूण॑ता प्राप्त करोगी। तुम्हारा मनोरथ सफल होगा। मत्त चाल चलने वाली ! चलो, अब हम अपने निवास को चल रहे हैं ।! इस प्रकार जयन्ती से बातें कर भगवान् शुक्राचायं अपने निवास स्थल पर आये और समल्त्र प्राणधारियों से अदृद्य होकर मायापूर्वक दश वर्षों तक उसके साथ निवास करने का निदंचय किया ।७-१२। इधर

English

After instructing Asuras thus, Kavya approached Mahadeva. After bowing to the lord, the cause of origin of the universe, he said:

अध्याय १८२

श्लोक 39

मत्प्रसादाद्देवगणैः सेवितं च भविष्यति ।भृगुक्षेत्रे मृता ये तु कृमिकीटपतंगकाः

matprasādāddevagaṇaiḥ sevitaṃ ca bhaviṣyati / bhṛgukṣetre mṛtā ye tu kṛmikīṭapataṃgakāḥ

हिन्दी अर्थ

शुक्राचायं को सफल मनोरथ होकर लौट आने का वृत्तान्त जब देत्यों को विदित हुआ तो वे परम प्रसन्न हुए और देखने की इच्छा से उनके आश्रम पर गये । वहाँ जाने पर जयन्ती के साथ अज्ञात वास करते हुए अपने आचाये को नहीं देख सके, और उनकी इस नीतिनिपुणता को जानकर परम मुदित हुए। उधर देवगुरु बृहस्पति ने जब यह सुना कि देवताओं की हितकारिणी जयल्ती ने अपने पिता की हितकामना से

English

"O lord, I wish to secure such Mantras as are not in the possession of Brhaspati. I want them to be the bestowers of fearlessness on Asuras. I wish to defeat Devas.

अध्याय १८२

श्लोक 40

वासस् तेषां शिवे लोके मत्प्रसादाद् भविष्यति ।वृषखाते नरः स्नात्वा पूजयित्वा महेश्वरम्

vāsas teṣāṃ śive loke matprasādād bhaviṣyati / vṛṣakhāte naraḥ snātvā pūjayitvā maheśvaram

हिन्दी अर्थ

दस वर्षों के लिए शुक्राचायं के पास गई थी, शुक्राचायं को एकान्तवास करते सुना तो एक अच्छा अवसर देखा ।१३-१५)। उन्होंने शुक्राचायं का स्वरूप बनाकर, इस मुद्रा में मानों देत्यों ने उन्हें ही तपस्या के लिए प्रेरित किया था, शुक्राचायं के दर्शन करने के लिए आये हुए असुरों से कहा- मेरे यजमानों का स्वागत है, तुम लोगों के हित के लिए मैं तपस्या से निवत्त होकर आ गया। मैंने वह विद्या, जिसकी प्राप्ति के लिए अष्ट्नवतितमीअध्याय। है ०७

English

Thus requested, the lord said: "O Brahmana! do you wish for the Mantras? Perform then the holy rites indicated by me, with purity of mind and observing celibacy.

अध्याय १८२

श्लोक 41

सर्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम् ।भृगुतीर्थे नरः स्नात्वा तर्पयेत् पितृदेवताः

sarvamedhasya yajñasya phalaṃ prāpnotyasaṃśayam / bhṛgutīrthe naraḥ snātvā tarpayet pitṛdevatāḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्व काम्य (व्य) स्तदा तस्मिन्समये दशवा्िके । ययौ च समकालं स सद्योत्पन्नमतिस्तदा

English

For full thousand years you must stay in a topsy turvy position inhaling the smoke from the holy sacrificial fire-pit. Welfare unto you. If you perform (a sacred tite) like this, you will obtain the Mantra from me."

अध्याय १८२

श्लोक 42

तस्य ते द्वादशाब्दानि शान्तिं गच्छन्ति तर्पिताः ।दधिक्षीरेण तोयेन घृतेन मधुना सह

tasya te dvādaśābdāni śāntiṃ gacchanti tarpitāḥ / dadhikṣīreṇa toyena ghṛtena madhunā saha

हिन्दी अर्थ

समयान्‍्ते देवयानी सद्योजाता सुता तदा। बुद्धि चक्र ततश्रवापि याज्यानां प्रत्यवेक्षणे १२० देवि गच्छामहे द्रष्टु तव याज्याञ्शुचिस्मिते । वि आन्तप्रेक्षिते साध्वि त्रिवर्णायतलोचने

English

Thus advised by the lord of Devas, Sukra of great penance, touched the feet of the lord and said: "Yes, my lord I shall perform the holy rites and observe all the other things as instructed." Then he was engaged by the lord in¬ haling the smoke from the holy fire-pit.

अध्याय १८२

श्लोक 43

ये स्नपन्ति विरूपाक्षं तेषां वासस्त्रिविष्टपे ।मत्प्रसादाद् द्विजश्रेष्ठ सर्वदेवानुसेवितम्

ye snapanti virūpākṣaṃ teṣāṃ vāsastriviṣṭape / matprasādād dvijaśreṣṭha sarvadevānusevitam

हिन्दी अर्थ

एवमुक्ता5ब्रवीदेवी भज भक्तान्महात्रत एप ब्र ह्वास्सतां धर्मो न धर्म लोपयामि ते १२२

English

When Sukra had gone to Mahesvara and was staying there observing celibacy for the acquisition of the Man¬ tras with the welfare of Asuras in view, Devas understood that the kingdom was set aside by Asuras as a measure of strategy. Finding that loophole, the infuriated Devas attacked them. They had sharp weapons in their hands and Brhaspati led them all.

अध्याय १८२

श्लोक 44

भविष्यति भृगुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रादिभिः समम् ।मार्तण्डग्रहणे प्राप्ते यवं कृत्वा हिरण्मयम्

bhaviṣyati bhṛgukṣetraṃ kurukṣetrādibhiḥ samam / mārtaṇḍagrahaṇe prāpte yavaṃ kṛtvā hiraṇmayam

हिन्दी अर्थ

ततो गत्वाउसुरान्दृष्द्वा देवाचायेंण धीमता । वन्धितान्काव्यरूपेण वेधसा5सुरमब्नवीत् २३ काव्य मां तात जानीध्वमेष ह्याड्िरसो भुवि वड्िचिता बत यूयं वे सयि शक्ते तु दातनवाः

English

On seeing Devas armed with weapons again Asuras became frightened and fled suddenly.

अध्याय १८२

श्लोक 45

दत्त्वा शिरसि यः स्नाति भृगुक्षेत्रे द्विजोत्तम ।अविचारेण तं विद्धि संस्नातं कुरुजाङ्गले

dattvā śirasi yaḥ snāti bhṛgukṣetre dvijottama / avicāreṇa taṃ viddhi saṃsnātaṃ kurujāṅgale

हिन्दी अर्थ

इतना कठोर तप करना पड़ा, पा ली है, उसे तुम सब को पढ़ाऊँगां ।” बृहस्पति की ऐसी बातें सुनकर देत्यगण बहुत प्रसन्न हुए और विद्याध्ययन के लिए वहाँ एकत्र हुए। जयल्ती के अनुरोधानुसार इस दस वर्ष की अवधि के पूर्ण होने पर शुक्राचायं का मोह नष्ट हुआा और उन्हें सदबुद्धि प्राप्त हुई, अवधि के अन्त में जयन्ती के संयोग से उनकी पुत्री देवयानी उत्पन्न हुई। तदनन्तर उन्होंने अपने यजमानों की देखभाल करने का

English

"We have laid down our weapons and conceded victory unto them. Our preceptor is observing holy rites. Devas have abrogated the terms of agreement. They are desirous of slaying us, (their) enemies. Welfare unto you all, we arc now without a preceptor (to guide us). We had been credulous. We remained quiet performing penances. We are clad in bark and coarse garments. We have no holy rite. We have nothing to grasp and hold on to. By no means are we able to conquer Devas in war. In this nasty situation* it is better that wc seek refuge in the mother of Kavya.

अध्याय १८२

श्लोक 46

अहं चैव वसिष्यामि अम्बिका च मम प्रिया ।सर्वदुःखापहा देवी नाम्ना सौभाग्यसुन्दरी

ahaṃ caiva vasiṣyāmi ambikā ca mama priyā / sarvaduḥkhāpahā devī nāmnā saubhāgyasundarī

हिन्दी अर्थ

शुक्र बोले :--शुचिस्मिते देवि ! साध्वि ! दीघनेत्रे ! सुन्दर प्रेक्षणे ! मैं अब तुम्हारे यजमानों को देखने के लिए जाना चाहता हूँ।' शुक्राचार्य के ऐसा कहने पर जयन्ती ने कहा, महात्रत ! अपने भक्तों का कल्याण कीजिये, सत्पुरुषों का यही धमम है, आपके धर्म को मैं नष्ट नहीं करूँगी ।३१-२२॥। सूत बोले :--इस प्रकार जयम्ती से बातें कर श॒ुक्राचायं ने जाकर असुरों को देखा कि उन्हें परम बुद्धिमान् देवताओं के गुरु बृहस्पति ने मेरा स्वरूप धारण कर ठग लिया है। ऐसा देखकर वे परम विस्मित होकर अपुरों से बोले, दानवो ! शुक्राचार्य तो मैं हैँ, यह तो अंगिरा का पुत्र बृहस्पति है, मुझे खेद है कि मेरे रहते हुए भी तुम लोग ठगे गये । शुक्राचायं को ऐसा कहते हुए देखकर देत्यगण किकर्तव्य-

English

We shall wait here till the return of the preceptor. We shall tell him everything. When Kavya returns we shall fight with Suras."

अध्याय १८२

श्लोक 47

वसिष्यामि तया देव्या सहितो भृगुकच्छके ।एवमुक्त्वा स्थितो देवो भृगुकच्छे ऽम्बिका तथा

vasiṣyāmi tayā devyā sahito bhṛgukacchake / evamuktvā sthito devo bhṛgukacche 'mbikā tathā

हिन्दी अर्थ

विमूढ़ हो गये, और वहीं पर परम लिन्न एवं विस्मत होकर दोनों गुरुओं की ओर देखने लगे। बड़ी देर

English

Saying this to one another, they sought shelter with the mother of Kavya. They had been frightened but the boon of fearlessness was offered unto them as they sought shelter. (The mother of Kavya said:) "O Danavas, do not be afraid, do not be afraid. Cast off all fear. You need not be afraid as long as you are with me." On seeing 'Asuras frightened, Devas pursued them earnestly without caring for strength or weakness. On seeing the frightened Asuras being harassed by Devas, the gentle lady (the mother of Kavya) became infu¬ riated and said to them: "I shall cause Anindratva (the state of

अध्याय १८२

श्लोक 48

भृगुस्तु स्वपुरं प्रायाद्ब्रह्मघोषनिनादितम् ।ऋग्यजुःसामघोषेण ह्यथर्वणनिनादितम्

bhṛgustu svapuraṃ prāyādbrahmaghoṣanināditam / ṛgyajuḥsāmaghoṣeṇa hyatharvaṇanināditam

हिन्दी अर्थ

संप्रमुढा: स्थिताः सर्वे प्रापद्चन्त न किचन । ततस्तेषु प्रमूढेषु काव्यस्तान्पुनरत्रवीतू.. आचार्यों वो ह्हें काव्यो देवाचार्योडयमड्िराः । अनुगच्छत गां सर्वे त्यजतनं बृहस्पतिम

English

On seeing Indra in that helpless condition after being rendered motionless like the sacrificial post, Devas became afraid and fied from there.

अध्याय १८२

श्लोक 49

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा वृषमुत्सृजते नरः ।स याति शिवसायुज्यमित्येवं शङ्करो ऽब्रवीत्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā vṛṣamutsṛjate naraḥ / sa yāti śivasāyujyamityevaṃ śaṅkaro 'bravīt

हिन्दी अर्थ

बृहस्पतिरवाचेतानसंभ्रान्तो 5यमज़िरा: । काव्यो5हं वो गुरुदेत्या मद्र॒पोड्यं ब्रहस्पतिः २६ स मोहयति रूपेण मामकेनेष बो5सुराः । श्रुत्वा तस्य ततस्ते वे संमन्‍्त्यार्थवचो5ब्रवीत् ३० अय॑ नो दश वर्षाणि सततं शास्ति वे प्रभु :। एप वे गुरुरस्माकमन्तरेप्सुरयं ह्विज:

English

When the groups of Suras had gone, Visnu said to Indra: "O lord of Suras, welfare unto you. Enter me. I shall take you away."

अध्याय १८२

श्लोक 50

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा चैत्रे मासि समाचरेत् ।दद्याच्च लवणं विप्रे पूज्य सौभाग्यसुन्दरीम्

tatra tīrthe tu yaḥ snātvā caitre māsi samācaret / dadyācca lavaṇaṃ vipre pūjya saubhāgyasundarīm

हिन्दी अर्थ

ततस्ते दानवाः सर्वे प्रणिपत्याभिवाद्य च। बचन जगृहुस्तस्थ चिराभ्यासेन मोहिताः तक इसी प्रकार से अश्षान में पड़े रहे, किसी भी निश्चय पर नहों पहुँच सके हैह्यों के किकत्तव्यविमृढ़ हो जाने पर शुक्राचायं ने पुत: उनसे कहा, अरे दानवों ! तुम लोगों का आचार्य शुक्र मैं ही हूं, यह अंगिरा का पुत्र देवताओं का गुरु बृहस्पति है, मेरी आज्ञा मानो, इसके कहने में न आवो, इसको छोड़ो । शुक्राचार्य के इस प्रकार कहने पर भी सब दानवगण दोनों आचारयों की ओर देखते ही रह गये, उन्हें उन दोनों

English

Thus advised Purandara (Indra) entered Visnu. On seeing him saved by Visnu, the infuriated lady spoke these words:

अध्याय १८२

श्लोक 51

गोभूहिरण्यं विप्रेभ्यः प्रीयेतां ललिताशिवौ ।न दुःखं दुर्भगत्वं च वियोगं पतिना सह

gobhūhiraṇyaṃ viprebhyaḥ prīyetāṃ lalitāśivau / na duḥkhaṃ durbhagatvaṃ ca viyogaṃ patinā saha

हिन्दी अर्थ

में कोई विशेषता नहीं जान पड़ी ।२३-२८। तदुपरान्‍्त बिना किसी घबराहट के स्वाभाविक स्वर में बृहस्पति बोले, हैत्यो! धतुम लोगों के गुरु शुक्राचायं हमीं हैं, यह मेरा स्वरूप धारण कर अंगिरा पुत्र बृहस्पति है। अरे असुरो ! मेरा, स्वरूप घारण कर यह तुम लोगों को मोहित कर रहा है।' बृहस्पति की ऐसी बातें सुनकर वेत्यों ने आपस में सम्मति करके निरचय पूवंक यह वचन कहा--परम ऐश्वयंशाली यही

English

"O Maghavan, here itself I will burn you down along with Visnu even as all the living beings observe. May the power of my penance be witnessed."

अध्याय १८२

श्लोक 52

प्राप्नोति नारी राजेन्द्र भृगुतीर्थाप्लवेन च ।यस्तु नित्यं भृगुं देवं पश्येद्वै पाण्डुनन्दन

prāpnoti nārī rājendra bhṛgutīrthāplavena ca / yastu nityaṃ bhṛguṃ devaṃ paśyedvai pāṇḍunandana

हिन्दी अर्थ

हमें आज दस वर्षों से पढ़ाते आ रहे हैं अतः यह्दी हमारे वास्तविक ग्रुरु हैं, यह ब्राह्मण हम लोगों के. भेद को जानने की इच्छा से यहाँ कंत्रिम वेश धारणकर आया हुआ है।” इस प्रकार कह कर चिरकाल के अभ्यास से मोह को प्राप्त होने वाले उवब समस्त असुरगणों ने पुनः बृहस्पति को ही शुक्राचायं समझकर प्रणाम ओर अभिवादन किया और उन्हीं की बातें अंगीकार कीं। इतना ही नहीं, शुक्राचयं के ऊपर वे परमर्तृद्ध हो गये उनके नेन्न लाल हो आये, और वे आवेश में भरकर बोले, हमारे कल्याण के चाहनेवाले आचार्य यही हैं, तुम हमारे आचार्य नहीं हो, यहाँ से चले जाओ ।२९-३३। यह चाहे भृगु के पुत्र शुक्राचाय हों या अंगिरा के पुत्र बृहस्पति हों, यही अब हमारे गुर हैं, हम सब अब इन्हीं के भादेश में स्थित हैं, तुम यहाँ से चले जाओ, देर मत करो, इसी में तुम्हारी भलाई है। ऐसा कहकर हैत्यगण बृहस्पति के समीप

English

The lords Indra and Visnu, on being oppressed by her, conversed (under their breath). Visnu asked Indra—"How can both of us get free jointly?".

अध्याय १८२

श्लोक 53

आ ब्रह्मसदनं यावत्तत्रस्थैर्दैवतैः सह ।यत्फलं समवाप्नोति तच्छृणुष्व नृपोत्तम

ā brahmasadanaṃ yāvattatrasthairdaivataiḥ saha / yatphalaṃ samavāpnoti tacchṛṇuṣva nṛpottama

हिन्दी अर्थ

चले आये। इस प्रकार शुक्र चार्य की महान् कल्याणकारिणी बातों की अवज्ञाकर जब हैत्यगण उनके

English

Indra replied: cc O lord, kill her before she burns us both. Especially I have been attacked. Hence, kill her. Do not delay."

अध्याय १८२

श्लोक 54

सुवर्णशृङ्गीं कपिलां पयस्विनीं साध्वीं सुशीलां तरुणीं सवत्साम् ।दत्त्वा द्विजे सर्वव्रतोपपन्ने फलं च यत्स्यात्तदिहैव नूनम्

suvarṇaśṛṅgīṃ kapilāṃ payasvinīṃ sādhvīṃ suśīlāṃ taruṇīṃ savatsām / dattvā dvije sarvavratopapanne phalaṃ ca yatsyāttadihaiva nūnam

हिन्दी अर्थ

चुकोप भाग॑वस्तेषामवलेपेन वे तदा । बोधिता5पि मया यस्मान्न मां भजत दानवाः 0३६ तस्मात्प्रनष्टसंज्ञा वे पराभव गसिष्यथ । इति व्याहृत्य तान्काव्यों जगामाथ सथागतम् ३३७ ज्ञात्वाइभिशस्तानसुरान्काव्येन तु बृहस्पतिः । कृतार्थ: स तदा हृष्टः स्वरूप प्रत्यपद्यत ॥ ततो5सुराः परित्रस्ता वेवेभ्यस्त्वरिता ययुः । प्रह्लादमग्नतः कृत्वा काव्यस्थानुगर्म पुनः ॥३४ १ ततः काव्यं समासाञ्य अभितस्थुरवाइःमुखा: तानागतास्पुनदु ष्ट्वा काव्यों याज्यानुबाच हु

English

Then on seeing her (thus intending to kill them) Visiu got ready (even) to kill that woman. Caught in adverse cii- cumstances, the lord hurriedly remembered his discus.

अध्याय १८२

श्लोक 55

समाः सहस्राणि तु सप्त वै जले म्रियेल् लभेद् द्वादशवह्निमध्ये ।त्यजंस्तनुं शूरवृत्त्या नरेन्द्र शक्रातिथ्यं याति वै मर्त्यधर्मा

samāḥ sahasrāṇi tu sapta vai jale mriyel labhed dvādaśavahnimadhye / tyajaṃstanuṃ śūravṛttyā narendra śakrātithyaṃ yāti vai martyadharmā

हिन्दी अर्थ

मया5पि बोधिताः काले यतो मां नाभिनन्‍्दथ । ततस्तेनावलेपेन गता यूयें पराभवम् ..

English

While she was hastening to kill them, the discus (Sudarsana), the destroyer of the enemies of Suras, hastened still more. On realising the ruthless attempt of the woman (tne mother of Kavya) Visnu became furious. Taking up that we apon the husband of Ma (i.e. LaksmI) cutoffhcr head.

अध्याय १८२

श्लोक 56

आख्यानमेतच्च सदा यशस्यं स्वर्ग्यं धन्यं पुत्र्यमायुष्यकारि ।शृण्वंल्लभेत्सर्वमेतद्धि भक्त्या पर्वणि पर्वण्याजमीढस् सदैव

ākhyānametacca sadā yaśasyaṃ svargyaṃ dhanyaṃ putryamāyuṣyakāri / śṛṇvaṃllabhetsarvametaddhi bhaktyā parvaṇi parvaṇyājamīḍhas sadaiva

हिन्दी अर्थ

पास नहीं गये तब शुक्राचायं उनके गब से परम कुपित हो उठे और बोले, “अरे दानवो! मेरे बहुत समझाने पर भी तुम लोग मेरे कहने में नहीं आ रहे हो, अतः तुम सब की चेतना मारी जायग्री भोर निशूचय ही तुम्हारी पराजय होगी । देत्यों को ऐसा शाप देकर शुक्राचायं जहाँ से जेसे आये थे चले गये । इधर शुक्राचाय द्वारा उन असुरों को दूषित एवं शापग्रस्त जानकर बृहस्पति अपने उद्देश में सफल हो गये, उन्हें परम प्रसन्नता प्राप्त हुई, और वे अपने वास्तविक स्परूप में आ गये जब उन्होंने समझ लिया कि असुरभण अपनी उद्देश्यसिद्धि में विफल हो चुके हैं, तब अपने को कृतार्थ समझकर अन्‍्तहित दो भये। ।१४-३८। इस प्रकार बृहस्पति के अस्तर्धाव हो जाने पर दानवगण परम व्याकुल हो गये ओर आपस में कहने लगे कि 'हाय उसने हम लोगों को ठग लिया, हमें घिककार है ।३६। हम लोग अपने कत्तंव्य से विमुख हो

English

On seeing that terrible slaughter of a woman (his wife) the holy lord Bhrgu became furious. Then Vi?nu was cen¬ sured and cursed by Bhrgu for the murder of his wife.

अध्याय १८२

श्लोक 57

संन्यासं कुरुते यस्तु भृगुतीर्थे विधानतः ।स मृतः परमं स्थानं गच्छेद्वै यच्च दुर्लभम्

saṃnyāsaṃ kurute yastu bhṛgutīrthe vidhānataḥ / sa mṛtaḥ paramaṃ sthānaṃ gacchedvai yacca durlabham

हिन्दी अर्थ

गये, विधाता ने हमें पीछे से दण्ड दिया, अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए देवगुरु ने माया करके हमें छल लिया, इस तरह हम लोग नष्ट हो गये ।४०। ऐसी बातें परस्पर करते हुए असुरगण देवताओं से परम संत्रस्त होकर भाग खड़े हुए और प्रह्लाद को अग्रुआ बनाकर पुनः शुक्राचायं के पीछे-पीछे दौड़े, मोर शुक्राचार्य के समीप जाकर नीचे मुखकर के खड़े हो गये। शुक्राचायं ने अपने यजमानों को पुनः अपनी शरण में

English

"Since (according to Dharma) a woman should not be killed and that you have killed one even though you are con¬ versant with what is Dharma, you will have to take birth

अध्याय १८२

श्लोक 58

एतच्छ्रुत्वा भृगुश्रेष्ठो देवदेवेन भाषितम् ।प्रहृष्टवदनो भूत्वा तत्रैव संस्थितो द्विजः

etacchrutvā bhṛguśreṣṭho devadevena bhāṣitam / prahṛṣṭavadano bhūtvā tatraiva saṃsthito dvijaḥ

हिन्दी अर्थ

आया हुआ देखकर उनसे कहा, देत्यों! ठोक समय पर मैंने तुम लोगों को समझाया बुझावा था; परन्तु तुम लोगों ने मेरी एक बात गी नहीं भानी, अतः उसी अभिमान के कारण तुम लोग पराजय को प्राप्त हो रहे हो ।४१-४३। शुक्राचायं की ऐसी बात सुनकर प्रह्लाद ने कहा, भृगुनन्दन ! आप भमर्ष छोड़ दें, अपने यजमान विशेषतया परमभक्त एवं अनुगामी असुरों को बचाइये । आपने हुम लोगों को समय समय त्वया पृष्ठा बय॑ं तेन देवाचायेंण मोहिताः । भक्तानहँसि नस्त्नातुं ज्ञात्वा दीघेंण चक्षुषा ४५

English

Thereafter, as a result of that curse he incarnates again and again in the world (of mortals) for the we are o a, whenever virtue (Dharma) declines. Thus addressed with the emphasis on truth, the gentle lady regained her life. Then he sprinkled her with cool water and uttered, "Get up".

अध्याय १८२

श्लोक 59

तिरोभावं गते देवे भृगुः श्रेष्ठो द्विजोत्तमः ।स्वमूर्ति तत्र मुक्त्वा तु ब्रह्मलोकं जगाम ह

tirobhāvaṃ gate deve bhṛguḥ śreṣṭho dvijottamaḥ / svamūrti tatra muktvā tu brahmalokaṃ jagāma ha

हिन्दी अर्थ

ज्ञात्वा काव्यों यथातत्त्वं कारुण्येनानुकम्पया । एवं शुक्रोडनुनीतः स ततः कोप॑ न्ययच्छत ।

English

On seeing her getting up as if from sleep, all living beings loudly applauded "Well done! Well done!" Such an applause of invisible (incorporeal) voices arose from all the quarters.

अध्याय १८२

श्लोक 60

भृगुकच्छस्य चोत्पत्तिः कथिता तव पाण्डव ।संक्षेपेण महाराज सर्वपामप्रणाशनी

bhṛgukacchasya cotpattiḥ kathitā tava pāṇḍava / saṃkṣepeṇa mahārāja sarvapāmapraṇāśanī

हिन्दी अर्थ

न शक्यमन्यथाकर्तुमदृष्ट हि बलवत्तरम्। संज्ञा प्रनष्टा या बोध्य काम ता प्रतिलप्स्यथ ४६ प्राप्त: वर्यायकालो व इति ब्रह्माउन्यभाषत । मत्प्रसादाच्च युष्माभिर्भुक्त त्रेलोक्यमुजितसू. युगारुया दश संपूर्णा देवानाक़रम्य सूर्धनि । तावस्तमेव॑ काल॑ वे ब्रह्मा राज्यमभाषत

English

Even as all living beings were observing, the lady was resuscitated to life by Bhrgu. That was really miraculous. On seeing his wife resuscitated lo life by Bhrgu with¬ out the least agitation Sakra was not at all happy, because he was afraid of Kavya (all the more).

अध्याय १८२

श्लोक 61

एतत्पुण्यं पापहरं क्षेत्रं देवेन कीर्तितम् ।चतुर्युगसहस्रेण पितामहदिनं स्मृतम्

etatpuṇyaṃ pāpaharaṃ kṣetraṃ devena kīrtitam / caturyugasahasreṇa pitāmahadinaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

साव्णिके पुनस्तस्य राज्यं किल भविष्यति । लोकानामीश्वरो भावो पौत्रस्तव पुनबलिः १३२ एवं किलमहू प्रोक्तः पौत्रस्ते ब्रह्मणा स्वयम् । तथा ह॒तेषु लोकेषु तपो5स्थ न किलाभवत्

English

Indra had no sleep at all (after the incident). The intelligent chastiser of Paka (i.e. Indra) called his daughter Javantl and spoke to her.

अध्याय १८२

श्लोक 62

प्राप्ते ब्रह्मदिने विप्रा जायते युगसम्भवः ।न पश्यामि त्विदं क्षेत्रम् इति रुद्रः स्वयं जगौ

prāpte brahmadine viprā jāyate yugasambhavaḥ / na paśyāmi tvidaṃ kṣetram iti rudraḥ svayaṃ jagau

हिन्दी अर्थ

पर रक्षा की है, आप अपनी दिव्य दृष्टि से यह जान सकते हूँ कि हमें देवाचार्य ने ठयथ लिया था, हस आप के भक्त हैं, हमारी रक्षा कीजिये। है भृगुनन्दन यदि आज आप हम लोगों की रक्षा नहीं करते, तो फिर आप से अपमानित होंकर हम लोग रसातल को जा रहे हैं ।४४-४६॥।

English

"O daughter, this Kavya is performing a terrible penance for the sake of my destruction (lit. Indra-lcss-ncss). I have been rendered much dispirited by that (Bralimana) of great fortitude. Go and honour him with auspicious (services) remov¬ ing his fatigue and by rendering alertly and deligcntly service pleasing to his mind".

अध्याय १८२

श्लोक 63

यः शृणोति त्विदं भक्त्या नारी वा पुरुषो ऽपि वा ।स याति परमं लोकम् इति रुद्रः स्वयं जगौ

yaḥ śṛṇoti tvidaṃ bhaktyā nārī vā puruṣo 'pi vā / sa yāti paramaṃ lokam iti rudraḥ svayaṃ jagau

हिन्दी अर्थ

खूत बोले--ऋषिवन्द ! हैत्यों एबं दानवों के इस प्रकार निवेदन करने पर शुक्राचायें को सब बातें यथार्थत: ज्ञात हुईं, उनका क्रोध दूर हो गवा, देत्यों के ऊपर उन्हें बड़ी करुणा हुई, अनुकम्पा के स्वर में यह बोले, देत्यो! डरो मत, रसातल भरत जाओ । किश्तु अबश्य घटित होनेवाली यह घटना तो मेरे प्रयत्नशील रहने पर भी घटित होगी ।४७-४८।॥ अदुष्ट महाबलवान् होता है, उसे हम टाल नहीं

English

The gentle lady Jayanti, the daughter of Indra, of auspicious conduct, saw Kavya engaged in meditation. Although he was weak, he was quiet and self-possessed, endowed with fortitude, as her father had already mentioned to her. She rendered every service to Kavya in accordance with the behest of her father. In sweet and pleasing words she eulogised him. Frequently she massaged his body and served him in various other pleasant ways. Thus she stayed there for many years.

अध्याय १८२

श्लोक 64

देवखाते नरः स्नात्वा पिण्डदानादिसत्क्रियाम् ।यां करोति नृपश्रेष्ठ ताम् अक्षयफलां विदुः

devakhāte naraḥ snātvā piṇḍadānādisatkriyām / yāṃ karoti nṛpaśreṣṭha tām akṣayaphalāṃ viduḥ

हिन्दी अर्थ

सकते । तुम लोगों की चेतना नष्ट होने का आज जो अभिश्ञाप मैंने दिया है, उसे तो अवश्यमेव भोगना पड़ेगा । ब्रह्मा ने यह कहा है, अर्थात् उनको यह अभीष्ट है कि तुम लोगों का यह अवनतिकाल प्रारम्भ हो, अतः वह अवनति का क्रम प्राप्त हो गया है। मेरे अनुग्रह से तुम लोगों ने तैलोक्य की समस्त समृद्धियों का उपभोग किया है ।४६-५०। देवताओं के शिर पर आक्रमण कर राज्य प्राप्त किये हुए तुम लोगों के बस युग व्यतीत हो चके, उतने ही समय तक का राज्य ब्रह्मा ने तुम लोगों के लिए कहां है सार्वाणक मन्वन्तर के भाने पर तुम्हें पुन निश्चय ही राज्य की प्राप्ति होगी । उस समय लि समस्त लोकों का अधौदवर होगा ।५१-५२। इन सब बातों को मुझसे स्वयं ब्रह्मा ने कह्दा है, जो वे अवश्यमेंव घटित होंगी, तुम्हारे पौत्र बलि से समस्त लोक छिन जायेंगे । उसके तपोबल से कुछ

English

When the terrible rite of inhaling the smoke lasting Due to his excessive joy, the following hymn to the lord Mahesvara manifested itself. Prostrating (before the Lord), he eulogised Nilalohita (Lord Siva):

अध्याय १८२

श्लोक 65

य इमं शृणुयाद् भक्त्या भृगुकच्छस्य विस्तरम् ।कोटितीर्थफलं तस्य भवेद् वै नात्र संशयः

ya imaṃ śṛṇuyād bhaktyā bhṛgukacchasya vistaram / koṭitīrthaphalaṃ tasya bhaved vai nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

गा, उसकी प्रवृत्तियाँ निस्वार्थ होगी, उस समय अजन्मा

English

''Obeisance to Sitikantha (Blue-throated god) to Surupa (of good form), to Suvarcas (of good brilliance), to Ririhdna (one who exhibits the mystic mudra of frequently lick¬ ing with the tongue), to Lop a (the destroyer), to Vatsara (the presiding deity of the year), to the Jagatpati (the lord of the universe).

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_revAkhANDa-of-the-vAyupurANa-rkv.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Vayu Purana — Chapter 182
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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