अध्याय १८७
श्लोक 1
॥ इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां पञ्चम आवन्त्यखण्डे रेवाखण्डे कनखलेश्वरतीर्थमाहात्म्यवर्णनं नाम षडशीत्युत्तरशततमो ऽध्यायः ॥ र्क्व् अध्याय १८७ श्रीमार्कण्डेय उवाच: जालेश्वरं ततो गच्छेल्लिङ्गमाद्यं स्वयम्भुवः ।कालाग्निरुद्रं विख्यातं भृगुकच्छे व्यवस्थितम्
|| iti śrīskānde mahāpurāṇa ekāśītisāhasryāṃ saṃhitāyāṃ pañcama āvantyakhaṇḍe revākhaṇḍe kanakhaleśvaratīrthamāhātmyavarṇanaṃ nāma ṣaḍaśītyuttaraśatatamo 'dhyāyaḥ || rkv adhyāya 187 śrīmārkaṇḍeya uvāca: jāleśvaraṃ tato gacchelliṅgamādyaṃ svayambhuvaḥ / kālāgnirudraṃ vikhyātaṃ bhṛgukacche vyavasthitam
हिन्दी अर्थ
महात्मा होकर भी अपनी काम वशीभूत आत्मा को वश में न रख सके । परम धर्मात्मा होकर भी उन्होंने ममता से समागम किया, जिस समय वीयघान कर रहे ये, गर्भत्थ शिशु ने उनसे कहा--ताव ! आप आप अपना वीय॑े यहाँ न निहित करें, क्योंकि इसमें दो प्राणियों का निवास सम्भव नहीं है तुम भी अमोधवीर्य वाले हो, मैं यहाँ पहिले हो से उपस्थित हूँ ।४०-४३। गर्भस्थ शिक्ु के इस वाक्य से बृहस्पति के वोर्याधान
English
Suras (in Bd. P. v. 74) is the correct reading.